विवेचन सारांश
प्रकृति के तीन गुणों का मानवीय वृत्तियों पर प्रभाव
सत्र का आरंभ दीप प्रज्वलन और गुरु वंदना से हुआ। परम पावन शरद पूर्णिमा की रात है जिसमें ऐसा माना जाता है कि माता पार्वती और भगवान शिव शंकर पूरे विश्व का अवलोकन करते हैं कि "को जागृति" कौन से जीव जागृत हैं और कौन माता की आराधना कर रहे हैं? इस अध्याय के चिंतन हेतु जो उपस्थित हैं वे भी जागना चाहते हैं। वे जीव स्वयं की पहचान पाना चाहते हैं और यह जानने के लिए लालायित हैं कि उनका इस जगत से और इस जगदीश्वर से क्या नाता है? जिनके हाथ में गीता आ गई, वह जाग रहे हैं, वह जागना चाहते हैं। गीता मां का चिंतन करने का प्रयास कर रहे हैं। ज्ञानेश्वर महाराज जी ने भी गीता जी की महती गाते हुए माता पार्वती और भगवान शंकर का रूपक दिया है और बताया है की गीता की महत्ता माता पार्वती ने भगवान शंकर से सुनी। यह दोनों एक दूसरे से अलग नहीं हैं। एक शिव है और दूसरी उनकी शक्ति है। अगर ऐसे कहें कि एक Potential energy है और दूसरी kinetic energy है, तो गलत नहीं होगा। माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि गीता जी का यह शाश्वत ज्ञान किस तरह युगों युगों तक जीवों का उद्धार करने वाला होता है? भगवान शंकर ने कहा कि हे देवी! जिस तरह तुम्हारा रूप नित्य नूतन है। जिस तरह हर ऋतु में सृष्टि अपना रूप बदलती है। जैसे अभी शरद ऋतु है। चांदनी है और आसमान में पूर्ण चंद्रमा है। फिर हेमंत आएगा, फिर शिशिर, बसंत, ग्रीष्म ,वर्षा और फिर से शरद ऋतु। इन ऋतुओं में जिस प्रकार सृष्टि का रूप नित्य नूतन होता है उसी प्रकार गीता नित्य नूतन है। अनेक युगों बाद भी इसका ज्ञान बासी नहीं होगा। जो इसमें गोता लगाएगा और जो प्रयास करेगा, वह अपने जीवन को उन्नयन की ओर ले जाएगा। उसे नए-नए अर्थ के रत्न प्राप्त होते जाएंगे। ज्ञानेश्वर महाराज जी कहते हैं कि यह ऐसा सुंदर अध्याय है जो व्यावहारिक तौर पर भी हमारा जीवन उन्नयन की ओर ले जाएगा। ऐसा अध्याय जिसका नाम श्रद्धात्रयविभागयोग है। इस अध्याय का आरंभ करने से पहले सोलहवें अध्याय के अंतिम श्लोक को जानना आवश्यक है जिसमें भगवान अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं ;
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।
भगवान ने कहा ; हे अर्जुन! तुम शास्त्र को जानो। दुविधा के समय शास्त्रीय नियमों का आधार लो। कार्य और अकार्य क्या है इसे समझ लो। इस प्रकार कर्म करना तुम्हारे लिए योग्य होगा और तुम्हें उन्नयन की ओर ले जाएगा। गीता भी शास्त्र है। जैसे लौकिक ज्ञान के जो भी शास्त्र हैं उनके भी कुछ नियम होते हैं। उदाहरण के तौर पर रसोई बनाने का शास्त्र, न्यायपालिका का शास्त्र, बिजली विभाग का शास्त्र इत्यादि। नियम के दायरे में रहते हुए प्रत्येक शास्त्र सीखना होता है और अध्ययन करते हुए उसे जीवन में उतारना होता है। इसी तरह इस अध्यात्म शास्त्र के भी कुछ नियम तो होंगे ही। जैसे करोना काल में इस बीमारी से बचने के लिए कुछ नियम निर्धारित किए गए जिनका पालन नहीं करने वालों को नुकसान झेलना पड़ा। आज के युवा यह प्रश्न अक्सर पूछते हैं कि ऐसा क्यों करना चाहिए? उन्हें इसके लिए आज्ञा पालन करना सीखना होगा। जब तक हम इन नियमों का पालन नहीं करेंगे हम अपने असली थ्येय तक नहीं पहुंच सकते। इसलिए जीवन के असली उद्देश्य की पूर्ति हेतु हमें शास्त्र यानी नियमों को अपने जीवन में जरूर धारण करना चाहिए।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।
भगवान ने कहा ; हे अर्जुन! तुम शास्त्र को जानो। दुविधा के समय शास्त्रीय नियमों का आधार लो। कार्य और अकार्य क्या है इसे समझ लो। इस प्रकार कर्म करना तुम्हारे लिए योग्य होगा और तुम्हें उन्नयन की ओर ले जाएगा। गीता भी शास्त्र है। जैसे लौकिक ज्ञान के जो भी शास्त्र हैं उनके भी कुछ नियम होते हैं। उदाहरण के तौर पर रसोई बनाने का शास्त्र, न्यायपालिका का शास्त्र, बिजली विभाग का शास्त्र इत्यादि। नियम के दायरे में रहते हुए प्रत्येक शास्त्र सीखना होता है और अध्ययन करते हुए उसे जीवन में उतारना होता है। इसी तरह इस अध्यात्म शास्त्र के भी कुछ नियम तो होंगे ही। जैसे करोना काल में इस बीमारी से बचने के लिए कुछ नियम निर्धारित किए गए जिनका पालन नहीं करने वालों को नुकसान झेलना पड़ा। आज के युवा यह प्रश्न अक्सर पूछते हैं कि ऐसा क्यों करना चाहिए? उन्हें इसके लिए आज्ञा पालन करना सीखना होगा। जब तक हम इन नियमों का पालन नहीं करेंगे हम अपने असली थ्येय तक नहीं पहुंच सकते। इसलिए जीवन के असली उद्देश्य की पूर्ति हेतु हमें शास्त्र यानी नियमों को अपने जीवन में जरूर धारण करना चाहिए।
17.1
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य, यजन्ते श्रद्धयान्विताः|
तेषां(न्) निष्ठा तु का कृष्ण, सत्त्वमाहो रजस्तमः||17.1||
अर्जुन बोले - हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र-विधि का त्याग करके श्रद्धापूर्वक (देवता आदि का) पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी-तामसी
विवेचन: अर्जुन ने श्रीभगवान से पूछा कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? श्रीमद्भगवद्गीता हिमालय की कंदराओं में कहा हुआ अथवा गंगा मैया के तट पर या किसी मंदिर में कहा हुआ कोई प्रवचन नहीं अपितु एक संवाद है। यहां अर्जुन हमारे प्रतिनिधि हैं और हमारे मन की बात इस अध्याय के द्वारा उन्होंने भगवान के सामने रखी। चौदहवें अध्याय में भगवान ने बताया कि हमारी प्रकृति तीन गुणों पर आधारित है। अर्जुन के मन की दुविधा है कि क्या पूजन में शास्त्र का पालन करना चाहिए? क्या पूजन में भी सात्विक, राजसी और तामसी विभाग होते हैं? क्या श्रद्धा में भी ऐसा होता है? अर्जुन ने पूछा कि जो मनुष्य शास्त्र विधि का पालन ना करते हुए श्रद्धा से युक्त होते हुए पूजन करते हैं उनकी निष्ठा कैसी कही जाएगी? सात्विक राजसी अथवा तामसी? इस अध्याय का नाम श्रद्धात्रयविभागयोग है। श्रद्धा एक भाववाचक शब्द है जो मन से प्रस्फुटित होती है। जैसे कर्म कर्मेद्रियों से, भक्ति मन से और तर्क बुद्धि से पैदा होता है। अंग्रेजी में हम इसे action, emotion और reason का नाम देते हैं। हमारी बुद्धि तर्क को मानती है लेकिन मन इसके विपरीत श्रद्धा और भाव की बात करता है। जैसे एक बालक की अपने माता-पिता में श्रद्धा होती है। वह इस भाव को किस तर्क से बुद्धि को समझा सकता है? कोई मनुष्य कैसे यह तर्क दे सकता है कि उसकी अपने गुरु के प्रति श्रद्धा क्यों है? श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीभगवान ने श्रद्धा को बहुत महत्व दिया है। चौथे अध्याय में भगवान ने कहा है कि जिस मनुष्य के हृदय में श्रद्धा रहती है, वही ज्ञान को प्राप्त कर सकता है।
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं।
हमारे देश में श्रद्धा को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए इसके साथ अंधश्रद्धा शब्द को जोड़ दिया गया। श्रद्धा से जुड़े जितने भी कर्म हमारे देश में किए जाते हैं उस भाव के लिए 'क्यों' का उत्तर दे पाना तर्क से संभव नहीं। अर्जुन का प्रश्न भी यही है कि अगर शास्त्र को नहीं जाना, पूरा नहीं पढ़ा, पढ़ने का समय भी नहीं, लेकिन यह जिस प्रकार परंपरा से चला आया है अगर उसे श्रद्धावश मान लिया जाए, श्रद्धा दृढ़ होने पर निष्ठा बन जाए तो यह निष्ठा कैसी होगी? हम केवल देह नहीं है। हम सूक्ष्म तत्व है, हम चैतन्य हैं। इसलिए हमारा अध्यात्म शास्त्र हमें हमारे मूल स्वरूप तक पहुंचाना चाहता है और हमें देह छोड़ने के बाद का सुख भी दिलाना चाहता है जिससे हमारी आत्मिक उन्नति हो और हम अपने अंतिम ध्येय की ओर अग्रसर हों। इलेक्ट्रॉनिक्स में हम रदरफोर्ड का सिद्धांत पढ़ते हैं जिसमें उन्होंने न्यूक्लियस में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन बता कर यह बताया है कि इलेक्ट्रॉन न्यूक्लियस के चारों और घूमते हैं। यह एक सर्वमान्य सत्य (Hypothesis) है जिसे विज्ञान का हर विद्यार्थी बिना किसी तर्क के स्वीकार करता है। अगर हमें आत्मिक उन्नति करनी है तो हमें अपने स्वरूप को जानना होगा। हमें ऋषियों पर श्रद्धा रखनी पड़ेगी। ऋषियों की श्रद्धा त्रिनेत्र श्रद्धा होती हैं जिसका तीसरा नेत्र ज्ञान का नेत्र है। वे इसे ग्रहण कर ग्रंथो के माध्यम से हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता भी हमारे ऋषियों ने सिद्धांतों के माध्यम से हमारे लिए प्रकट की है। भगवान वेदव्यास जी ने इसका संपादन किया है। इसिलिए ऋषियों की वाणी पर विश्वास रखना हमारे आत्मिक उत्थान के लिए आवश्यक है और यही हमें हमारे अंतिम पड़ाव की ओर ले जाता है। परन्तु श्रद्धा पर भी वातावरण और पूर्व जन्मों के संस्कारों का प्रभाव पड़ता है इसलिए भगवान आगे कहते हैं ;
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं।
हमारे देश में श्रद्धा को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए इसके साथ अंधश्रद्धा शब्द को जोड़ दिया गया। श्रद्धा से जुड़े जितने भी कर्म हमारे देश में किए जाते हैं उस भाव के लिए 'क्यों' का उत्तर दे पाना तर्क से संभव नहीं। अर्जुन का प्रश्न भी यही है कि अगर शास्त्र को नहीं जाना, पूरा नहीं पढ़ा, पढ़ने का समय भी नहीं, लेकिन यह जिस प्रकार परंपरा से चला आया है अगर उसे श्रद्धावश मान लिया जाए, श्रद्धा दृढ़ होने पर निष्ठा बन जाए तो यह निष्ठा कैसी होगी? हम केवल देह नहीं है। हम सूक्ष्म तत्व है, हम चैतन्य हैं। इसलिए हमारा अध्यात्म शास्त्र हमें हमारे मूल स्वरूप तक पहुंचाना चाहता है और हमें देह छोड़ने के बाद का सुख भी दिलाना चाहता है जिससे हमारी आत्मिक उन्नति हो और हम अपने अंतिम ध्येय की ओर अग्रसर हों। इलेक्ट्रॉनिक्स में हम रदरफोर्ड का सिद्धांत पढ़ते हैं जिसमें उन्होंने न्यूक्लियस में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन बता कर यह बताया है कि इलेक्ट्रॉन न्यूक्लियस के चारों और घूमते हैं। यह एक सर्वमान्य सत्य (Hypothesis) है जिसे विज्ञान का हर विद्यार्थी बिना किसी तर्क के स्वीकार करता है। अगर हमें आत्मिक उन्नति करनी है तो हमें अपने स्वरूप को जानना होगा। हमें ऋषियों पर श्रद्धा रखनी पड़ेगी। ऋषियों की श्रद्धा त्रिनेत्र श्रद्धा होती हैं जिसका तीसरा नेत्र ज्ञान का नेत्र है। वे इसे ग्रहण कर ग्रंथो के माध्यम से हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता भी हमारे ऋषियों ने सिद्धांतों के माध्यम से हमारे लिए प्रकट की है। भगवान वेदव्यास जी ने इसका संपादन किया है। इसिलिए ऋषियों की वाणी पर विश्वास रखना हमारे आत्मिक उत्थान के लिए आवश्यक है और यही हमें हमारे अंतिम पड़ाव की ओर ले जाता है। परन्तु श्रद्धा पर भी वातावरण और पूर्व जन्मों के संस्कारों का प्रभाव पड़ता है इसलिए भगवान आगे कहते हैं ;
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा, देहिनां(म्) सा स्वभावजा|
सात्त्विकी राजसी चैव, तामसी चेति तां(म्) शृणु||17.2||
श्री भगवान बोले - मनुष्यों की वह स्वभाव से उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी - ऐसे तीन तरह की ही होती है, उसको (तुम) मुझसे सुनो।
विवेचन: अर्जुन ने भगवान से प्रश्न निष्ठा के बारे में पूछा और भगवान ने उसका उत्तर श्रद्धा करके दिया क्योंकि श्रीभगवान के लिए श्रद्धा सर्वोपरि है। निष्ठा का जन्म ही श्रद्धा से होता है। श्रद्धा दृढ़ होती जाती है, तो निष्ठा में परिवर्तित हो जाती है। श्रद्धा तीन प्रकार की होती है जैसे पंक में रहने वाले को पंकज कहा जाता है ठीक उसी प्रकार अपने स्वभाव के अनुसार पैदा होने वाली श्रद्धा को भी श्रीभगवान ने तीन प्रकार का बताया है सात्विक, राजसी और तामसी। श्रद्धा को हम केवल भोली भक्ति मानते हैं। लेकिन श्रद्धा के बिना हम भगवान को प्राप्त नहीं कर सकते। श्रीभगवान ने कहा कि जो जिस प्रकार की श्रद्धा से युक्त होकर मेरा भजन करता है, मैं उसकी वैसी श्रद्धा को दृढ़ कर उसका रास्ता भगवत् प्राप्ति हेतु प्रशस्त करता हूं। सत्य को जानने का एकमात्र उपाय श्रद्धा ही है जिस प्रकार अगर हम अणु या बिंदु की व्याख्या को मानेंगे तभी हम रेखागणित पढ़ पाएंगे। किसी वैज्ञानिक ने कह दिया कि हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक अणु मिलकर H2O यानी पानी बनता है और विज्ञान का हर विद्यार्थी बिना किसी जांच पड़ताल के इस बात को स्वीकार करता है। हाइड्रोजन एक ज्वलनशील गैस है और ऑक्सीजन जलने में सहायता करती है परंतु दोनों के योग से पानी बनता है जो आग को बुझाने के काम आता है। यह ना तो स्वयं जलता है, ना जलने में मदद करता है। जब हम यह मानकर चलते हैं तब ही विज्ञान पढ़ सकते हैं। इसी प्रकार अध्यात्म शास्त्र में ऋषियों ने हमारे लिए जो जो बातें कहीं, जो जो सिद्धांत ग्रंथों में हमारे लिए कहे गए, अगर हम उन पर विश्वास करेंगे तब ही हम अपनी इस आध्यात्मिक यात्रा के अंतिम पड़ाव, लक्ष्य एवं ध्येय की ओर अग्रसर हो पाएंगे और परमात्मा के साक्षात्कार कर पाएंगे। चौदहवें अध्याय में भगवान ने बताया है कि प्रकृति त्रिगुणात्मक है। सत्त्व, रज् और तम् यह तीनों गुण प्रकृति में विद्यमान है। जब तक हम स्वयं को नहीं पहचानेंगे तब तक हम सृष्टि को नहीं जान पाएंगे। एक आश्रम में गुरुजी आत्म ज्ञान की बातें कर रहे थे और आत्मा की अमरता का उपदेश दे रहे थे। एक व्यक्ति विशेष ने उनसे कहा कि आप लोगों को भ्रमित क्यों कर रहे हैं? जिस बात को आप प्रमाणित नहीं कर सकते वह क्यों बता रहे हैं? गुरु जी ने शांति से उत्तर दिया कि आपके हाथ में यह जो पुस्तक है इस पर क्या लिखा है? उस व्यक्ति ने पुस्तक पर लिखा शीर्षक पढ़कर बता दिया। पर गुरु जी ने कहा, "मुझको तो लगता है की किसी कौवे के पैरों को स्याही में डुबोकर कोई कलाकारी की गई है।" तो उस व्यक्ति ने कहा, "आपको नहीं पता कि यह उर्दू भाषा है। अगर आपको इसे पढ़ना है तो पहले उर्दू सीखनी पड़ेगी।" इस पर गुरु जी ने उत्तर दिया कि उसी प्रकार आपको आत्म ज्ञान की भाषा सीखनी पड़ेगी और वह भाषा हमें ऋषि ग्रंथों के माध्यम से सिखाते हैं। श्रीभगवान ने कहा कि हे अर्जुन! यह श्रद्धा भी अंतःकरण की वृत्तियों के अनुसार ही होती है। भिन्न-भिन्न स्वभाव के लोगों की श्रद्धा भी भिन्न-भिन्न होती है। उनका पूजन भी भिन्न भिन्न होता है।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य, श्रद्धा भवति भारत|
श्रद्धामयोऽयं(म्) पुरुषो, यो यच्छ्रद्धः(स्) स एव सः||17.3||
हे भारत ! सभी मनुष्यों की श्रद्धा अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धामय है। (इसलिये) जो जैसी श्रद्धावाला है, वही उसका स्वरूप है अर्थात् वही उसकी निष्ठा (स्थिति) है।
विवेचन: श्रीभगवान ने अर्जुन को यहां भारत कहा है। भा अर्थात प्रकाश, आभा और तेज। रत अर्थात रमना। इसिलिए हमारे देश का नाम भी भारत है जो ज्ञान में रमने वाला है। भगवान अर्जुन को कहते हैं कि इस कुरुक्षेत्र में तुम्हारी ज्ञान की लालसा बढ़ रही है। ज्ञान में रमने की तुम्हारी इच्छा प्रबल हो रही है। भगवान ने अर्जुन को कहा कि है भारत! यह समझ लो कि हर मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःकरण के अनुरूप होती है। हमारी एक पहचान हमारी देह है जो हमारी मां हमें देती है और दूसरी पहचान वह चैतन्य तत्व है जो हमसे यह गीता मां करवाना चाहती है। हर मनुष्य श्रद्धामय है। हर व्यक्ति की अपनी निजी श्रद्धा होती है। बुरे व्यक्ति की श्रद्धा भी उसे बुरा कर्म सिखाने वाले में होती है। हमारा जैसा अंतःकरण होगा, वैसी हमारी श्रद्धा होगी। देहीनाम स्वभावजा।
एक मां की कोख से जन्म लेने वाले दो बेटों के स्वभाव भी भिन्न भिन्न होते हैं। हर मनुष्य की प्रवृत्ति, अंतःकरण की वृतियां भिन्न होती हैं। कुछ पूर्व जन्मों के संस्कारों का भी प्रभाव होता है। यह माना जाता है कि संस्कार वातावरण से आते हैं, अनुवांशिक होते हैं या गुणसूत्रों से आते हैं। लेकिन केवल इतनी सी बात नहीं है। अगर ऐसा होता तो एक ही मां के दो बेटे अलग-अलग कैसे हो सकते हैं? इसके लिए पूर्व जन्म के संस्कारों की भी भूमिका मानी जाती है। उदाहरण के तौर पर अगर एक मां के तीन बेटे हैं और पहला बेटा घर आने पर अपना भोजन करने के बाद अपना गृह कार्य बिना कहे कर लेता है तो वह सत्व गुणी हुआ। दूसरा अगर ऐसा ही मां के बार-बार कहने पर,कुछ लालच देने पर करे तो वह रजोगुणी हुआ। लेकिन अगर तीसरा बेटा लालच देने के बाद भी, बार बार कहने पर भी अपना गृह कार्य ना करे तो वह तमोगुणी हुआ। हमारा व्यवहार, हमारी प्रतिक्रिया बताती है कि हमारे अंतःकरण की वृत्ति कैसी है? प्रत्येक व्यक्ति में यह तीनों गुण विद्यमान रहते हैं परन्तु व्यक्ति का आंकलन उसकी अंतःकरण की वृत्ति के अनुरूप होता है। केवल बहिरंग से उसकी पहचान नहीं होती। जैसे दो हजार रुपये का नोट सड़क पर गिरा हुआ देखकर सात्विक व्यक्ति उसे किसी अच्छे कार्य में लगाने की चेष्टा करेगा जबकि राजसी व्यक्ति उससे मनोरंजन आदि करने के बारे में सोचेगा और तामसी व्यक्ति इस पैसे को जुआ, शराब आदि दुर्व्यसनों में नष्ट कर देगा। व्यक्ति का स्वभाव इन तीनों गुणों के कारण होता है। जिस गुण की प्राथमिकता ज्यादा रहती है वह व्यक्ति वैसा ही बन जाता है।
एक मां की कोख से जन्म लेने वाले दो बेटों के स्वभाव भी भिन्न भिन्न होते हैं। हर मनुष्य की प्रवृत्ति, अंतःकरण की वृतियां भिन्न होती हैं। कुछ पूर्व जन्मों के संस्कारों का भी प्रभाव होता है। यह माना जाता है कि संस्कार वातावरण से आते हैं, अनुवांशिक होते हैं या गुणसूत्रों से आते हैं। लेकिन केवल इतनी सी बात नहीं है। अगर ऐसा होता तो एक ही मां के दो बेटे अलग-अलग कैसे हो सकते हैं? इसके लिए पूर्व जन्म के संस्कारों की भी भूमिका मानी जाती है। उदाहरण के तौर पर अगर एक मां के तीन बेटे हैं और पहला बेटा घर आने पर अपना भोजन करने के बाद अपना गृह कार्य बिना कहे कर लेता है तो वह सत्व गुणी हुआ। दूसरा अगर ऐसा ही मां के बार-बार कहने पर,कुछ लालच देने पर करे तो वह रजोगुणी हुआ। लेकिन अगर तीसरा बेटा लालच देने के बाद भी, बार बार कहने पर भी अपना गृह कार्य ना करे तो वह तमोगुणी हुआ। हमारा व्यवहार, हमारी प्रतिक्रिया बताती है कि हमारे अंतःकरण की वृत्ति कैसी है? प्रत्येक व्यक्ति में यह तीनों गुण विद्यमान रहते हैं परन्तु व्यक्ति का आंकलन उसकी अंतःकरण की वृत्ति के अनुरूप होता है। केवल बहिरंग से उसकी पहचान नहीं होती। जैसे दो हजार रुपये का नोट सड़क पर गिरा हुआ देखकर सात्विक व्यक्ति उसे किसी अच्छे कार्य में लगाने की चेष्टा करेगा जबकि राजसी व्यक्ति उससे मनोरंजन आदि करने के बारे में सोचेगा और तामसी व्यक्ति इस पैसे को जुआ, शराब आदि दुर्व्यसनों में नष्ट कर देगा। व्यक्ति का स्वभाव इन तीनों गुणों के कारण होता है। जिस गुण की प्राथमिकता ज्यादा रहती है वह व्यक्ति वैसा ही बन जाता है।
यजन्ते सात्त्विका देवान्, यक्षरक्षांसि राजसाः|
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये, यजन्ते तामसा जनाः||17.4||
सात्त्विक मनुष्य देवताओं का पूजन करते हैं, राजस मनुष्य यक्षों और राक्षसों का और दूसरे (जो) तामस मनुष्य हैं, (वे) प्रेतों (और) भूतगणों का पूजन करते हैं।
विवेचन: यह अध्याय स्वयं के आंकलन का अध्याय है। मिर्जा गालिब की खूबसूरत पंक्तियां हैं-
जिंदगी भर गालिब एक गलती करता रहा,
धूल चेहरे पर थी, आईना पोंछता रहा।
अपने जीवन का उन्नयन करने के लिए हमें अध्यात्म को जानना चाहिए, दूसरे पर उंगली उठाने के लिए नहीं। हमारी जैसी श्रद्धा है वैसी अन्य लोगों की भी होनी चाहिए यह सोच ग़लत है। इसी के कारण सांप्रदायिकता बढ़ती है। श्रीभगवान ने कहा कि सात्विक व्यक्ति वह होते हैं जो देवताओं का पूजन करते हैं। राजसी लोग राक्षसों की पूजा, अर्चना करते हैं और तामसी वृत्ति के लोग तमोगुण की अधिकता के कारण भूत प्रेतों की पूजा करते हैं। इसे लौकिक अर्थ में भी देखें तो महानुभावों का, श्रेष्ठ व्यक्तियों का, महात्माओं का पूजन करने वाले लोग सात्विक वृत्ति के होते हैं। नेताओं का, गणमान्य व्यक्तियों का पूजन अर्थात चापलूसी किसी फल की कामना के अधीन होकर करने वाले लोग राजसी वृत्ति के होते हैं। जबकि अपराधिक गतिविधियों में संलग्न व्यक्ति का पूजन करने वाले लोग तामसी वृत्ति के माने जाते हैं। इस संदर्भ में एक रोचक उदाहरण है कि पाण्डवों ने जब द्रोपदी के स्वयंवर में भाग लिया तो वह ब्राह्मणों की वेशभूषा में थे। जब अर्जुन ने लक्ष्य भेद कर द्रौपदी का वरण किया तो राजा द्रुपद बड़े असमंजस में थे क्योंकि वह द्रोपदी का विवाह अर्जुन के साथ करना चाहते थे। तब उनके पुत्र धृष्टद्युम्न ने उनकी शंका निवारण के लिए एक प्रदर्शनी का आयोजन किया जिसमें पुस्तकों, शस्त्रों, आभूषणों, दलहनों आदि की प्रदर्शनी लगाई गई लेकिन जब प्रदर्शनी देखने के लिए पाण्डवों को बुलाया गया तो वे सबसे पहले शस्त्रों वाले कक्ष की आकर्षित हुए। जिसे जानकर धृष्टद्युम्न और राजा द्रुपद को उनके क्षत्रिय होने का ज्ञान हुआ। इस प्रकार पांडवों की प्रतिक्रिया देखने के बाद राजा द्रुपद को उनके अंतःकरण की वृत्ति का अनुमान आसानी से लग गया उसी प्रकार हर व्यक्ति अपनी वृत्ति के अनुसार व्यवहार करता है।
जिंदगी भर गालिब एक गलती करता रहा,
धूल चेहरे पर थी, आईना पोंछता रहा।
अपने जीवन का उन्नयन करने के लिए हमें अध्यात्म को जानना चाहिए, दूसरे पर उंगली उठाने के लिए नहीं। हमारी जैसी श्रद्धा है वैसी अन्य लोगों की भी होनी चाहिए यह सोच ग़लत है। इसी के कारण सांप्रदायिकता बढ़ती है। श्रीभगवान ने कहा कि सात्विक व्यक्ति वह होते हैं जो देवताओं का पूजन करते हैं। राजसी लोग राक्षसों की पूजा, अर्चना करते हैं और तामसी वृत्ति के लोग तमोगुण की अधिकता के कारण भूत प्रेतों की पूजा करते हैं। इसे लौकिक अर्थ में भी देखें तो महानुभावों का, श्रेष्ठ व्यक्तियों का, महात्माओं का पूजन करने वाले लोग सात्विक वृत्ति के होते हैं। नेताओं का, गणमान्य व्यक्तियों का पूजन अर्थात चापलूसी किसी फल की कामना के अधीन होकर करने वाले लोग राजसी वृत्ति के होते हैं। जबकि अपराधिक गतिविधियों में संलग्न व्यक्ति का पूजन करने वाले लोग तामसी वृत्ति के माने जाते हैं। इस संदर्भ में एक रोचक उदाहरण है कि पाण्डवों ने जब द्रोपदी के स्वयंवर में भाग लिया तो वह ब्राह्मणों की वेशभूषा में थे। जब अर्जुन ने लक्ष्य भेद कर द्रौपदी का वरण किया तो राजा द्रुपद बड़े असमंजस में थे क्योंकि वह द्रोपदी का विवाह अर्जुन के साथ करना चाहते थे। तब उनके पुत्र धृष्टद्युम्न ने उनकी शंका निवारण के लिए एक प्रदर्शनी का आयोजन किया जिसमें पुस्तकों, शस्त्रों, आभूषणों, दलहनों आदि की प्रदर्शनी लगाई गई लेकिन जब प्रदर्शनी देखने के लिए पाण्डवों को बुलाया गया तो वे सबसे पहले शस्त्रों वाले कक्ष की आकर्षित हुए। जिसे जानकर धृष्टद्युम्न और राजा द्रुपद को उनके क्षत्रिय होने का ज्ञान हुआ। इस प्रकार पांडवों की प्रतिक्रिया देखने के बाद राजा द्रुपद को उनके अंतःकरण की वृत्ति का अनुमान आसानी से लग गया उसी प्रकार हर व्यक्ति अपनी वृत्ति के अनुसार व्यवहार करता है।
अशास्त्रविहितं(ङ्) घोरं(न्), तप्यन्ते ये तपो जनाः|
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः(ख्), कामरागबलान्विताः||17.5||
जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित घोर तप करते हैं; (जो) दम्भ और अहंकार से अच्छी तरह युक्त हैं; (जो) भोग- पदार्थ, आसक्ति और हठ से युक्त हैं; (जो) शरीर में स्थित पाँच भूतों को अर्थात् पांच भौतिक शरीर को तथा अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं उन अज्ञानियों को (तू) आसुर निष्ठा वाले (आसुरी सम्पदा वाले) समझ। ( 17.5-17.6)
विवेचन: श्रीभगवान ने कहा कि हे अर्जुन! जो व्यक्ति शास्त्र विधि से विमुख होकर तप करते हैं वे व्यक्ति अहंकार और दम्भ से युक्त होते हैं। वे आत्म प्रसिद्धि के लिए, आत्म शांति के लिए और अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए ही तप करते हैं। सृष्टि को इससे क्या लाभ या हानि होने वाली है इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे व्यक्ति आपने शरीर को कष्ट देने के साथ-साथ अंतःकरण में स्थित परमात्मा को भी कष्ट देने वाले होते हैं। ऐसे अज्ञानी व्यक्तियों को तू आसुरी वृत्ति वाला ही समझ।
कर्शयन्तः(श्) शरीरस्थं(म्), भूतग्राममचेतसः|
मां(ञ्) चैवान्तः(श्) शरीरस्थं(न्), तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्||17.6||
विवेचन: श्रीभगवान ने कहा कि हे अर्जुन! ऐसा तप दैवीय तप नहीं है। ऐसे तप से भगवत् प्राप्ति नहीं होगी। रावण ने भी घोर तप किया परंतु वह भगवान को प्राप्त नहीं कर पाया। ऐसे तप से शरीर बलवान होता है। लेकिन ऐसी शक्ति का प्रयोग अगर दूसरों को कष्ट देने के लिए करते हैं तो यह शक्ति किसी महत्व की नहीं रहती। ऐसा तप शरीर को कष्ट देकर किया जाता है। ऐसा तप करते समय व्यक्ति यह भी नहीं समझ पाता कि भगवान कहां है? भग्वद्गीता में भगवान ने जगह-जगह पर अपने निवास स्थान का पता दिया है। जैसे दसवें अध्याय में वे कहते हैं -
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
पंद्रहवें अध्याय में कहते हैं -
सर्वस्य चाहं ह्रदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
और अठहारवें अध्याय में भगवान कहते हैं -
ईश्वरः सर्वभूतानां ह्रदेशेर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया।।
श्रीभगवान ने कहा कि वे सभी के अंदर आत्म रूप में विद्यमान हैं। कोई जाति भेद , ऊंच-नीच का भेद, समाजिक भेद, देश काल का भेद नहीं करते हैं। सभी प्राणियों, सभी देशों के हर एक व्यक्ति के शरीर के अंदर परमात्मा का वास होता है। देह को भी पोषण की आवश्यकता होती है क्योंकि इसके माध्यम से ही हम समस्त कार्यों का संपादन करते हैं।
शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम्।
शरीर को कष्ट देकर तप करने से सिद्धि तो प्राप्त होती है, लेकिन देह क्षीण होती है और व्यक्ति का आत्म बल भी क्षीण होता है। ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं कि केवल दंभ से तप करने वाले मनुष्यों से ईश्वर दूर रहते हैं इसलिए ऐसे तप से दूर रहना चाहिए और इस बात का अहंकार भी नहीं करना चाहिए कि मैं इन सबसे मुक्त हूं।
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
पंद्रहवें अध्याय में कहते हैं -
सर्वस्य चाहं ह्रदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
और अठहारवें अध्याय में भगवान कहते हैं -
ईश्वरः सर्वभूतानां ह्रदेशेर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया।।
श्रीभगवान ने कहा कि वे सभी के अंदर आत्म रूप में विद्यमान हैं। कोई जाति भेद , ऊंच-नीच का भेद, समाजिक भेद, देश काल का भेद नहीं करते हैं। सभी प्राणियों, सभी देशों के हर एक व्यक्ति के शरीर के अंदर परमात्मा का वास होता है। देह को भी पोषण की आवश्यकता होती है क्योंकि इसके माध्यम से ही हम समस्त कार्यों का संपादन करते हैं।
शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम्।
शरीर को कष्ट देकर तप करने से सिद्धि तो प्राप्त होती है, लेकिन देह क्षीण होती है और व्यक्ति का आत्म बल भी क्षीण होता है। ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं कि केवल दंभ से तप करने वाले मनुष्यों से ईश्वर दूर रहते हैं इसलिए ऐसे तप से दूर रहना चाहिए और इस बात का अहंकार भी नहीं करना चाहिए कि मैं इन सबसे मुक्त हूं।
आहारस्त्वपि सर्वस्य, त्रिविधो भवति प्रियः|
यज्ञस्तपस्तथा दानं(न्), तेषां(म्) भेदमिमं(म्) शृणु||17.7||
आहार भी सबको तीन प्रकार का प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, तप (और) दान (भी तीन प्रकार के होते हैं अर्थात् शास्त्रीय कर्मों में भी गुणों को लेकर तीन प्रकार की रुचि होती है,) (तू) उनके इस भेद को सुन।
विवेचन: श्रीमद्भगवद्गीता एक परिपूर्ण योगशास्त्र और ग्रंथ है। ऐसा ग्रंथ जहां भगवान समाधि का ज्ञान बताते हैं, आत्म ज्ञान की बात करते हैंऔर अर्जुन को इस आत्मज्ञान की ओर ले जाना चाहते हैं। दूसरी ओर व्यवहारिक स्तर पर जीवन जीने का संपूर्ण ज्ञान भी बताते हैं। समाधि ज्ञान के साथ आहार का विज्ञान भी बताते हैं। जिन जिन स्तरों पर हम जीवन जीते हैं- आहार, यज्ञ, दान, तप- इन सबको इस तरह सत्व, रज् और तम् तीन विभागों में विभाजित किया जा सकता है। यह सारी बातें भगवान यहां पर बता रहे हैं और इसका पहला तत्व है आहार। कहा गया है, "जैसा अन्न वैसा मन।"आहार, यज्ञ, दान और तप कैसा हो इन सबसे व्यक्ति की वृत्ति का ज्ञान होता है। जीवन का उन्नयन करने के लिये इनका ज्ञान आवश्यक है। आहार भी तीन प्रकार के होते हैं। उनके बारे में भगवान ने आगे बता रहे हैं।
आयुः(स्) सत्त्वबलारोग्य, सुखप्रीतिविवर्धनाः|
रस्याः(स्) स्निग्धाः(स्) स्थिरा हृद्या, आहाराः(स्) सात्त्विकप्रियाः||17.8||
आयु, सत्त्वगुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता बढ़ाने वाले, स्थिर रहने वाले, हृदय को शक्ति देने वाले, रसयुक्त (तथा) चिकने - (ऐसे) आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक मनुष्य को प्रिय होते हैं।
विवेचन: इस ज्ञान को पाने के लिए स्वयं को समझना है, स्वयं का उन्नयन करना है। भगवान ने सबसे पहले आहार में सात्विक आहार की बात की, जो सर्वोपरि है। संत श्री गुलाब राव महाराज ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि रज् और तम् को दबाकर सत्व को बढ़ाना ही धर्म है। जीवन की पहली कसौटी आहार है। उत्तम आहार वह है जो रस युक्त है जैसे दूध फलों का रस आदि। स्निग्ध है जैसे देसी घी आदि, हृदय की क्षमता को बढ़ाने वाला, देह और मन को स्थिरता देने वाला ताजा भोजन- सात्विक कहा गया है। जिस भोजन की सुगंध से ही भोजन ग्रहण करने की लालसा हो, वह सात्विक भोजन है। सात्विक भोजन सात्विक व्यक्ति को प्रिय है। ऐसा भोजन शांति एवं उर्जा प्रदान करने वाला होता है।
कट्वम्ललवणात्युष्ण, तीक्ष्णरूक्षविदाहिनः|
आहारा राजसस्येष्टा, दुःखशोकामयप्रदाः||17.9||
अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखे, अति रूखे और अति दाह कारक आहार अर्थात् भोजन के पदार्थ राजस मनुष्य को प्रिय होते हैं, (जो कि) दुःख, शोक और रोगों को देने वाले हैं।
विवेचन: दूसरी तरह का भोजन कड़वा, तीखा, बहुत मीठा, बहुत नमकीन, बहुत गर्म, उग्र, रुखा-सूखा, दाह कारक, पित्त को बढ़ाने वाला होता है। ऐसा भोजन पहले तो अच्छा लगता है पर बाद में रोग और दुख को बढ़ाता है। ऐसा भोजन राजसी लोगों को बड़ा प्रिय होता है। हमारे भोजन में चौरस का संयोजन होना चाहिए परन्तु किस पदार्थ को किस मात्रा में लेना है इसका संतुलन आवश्यक है। हेमंत ऋतु में आहार पचाने की क्षमता बढ़ जाती है तो इस तरह का भोजन हम कभी-कभी ग्रहण कर सकते हैं। लेकिन वर्षा ऋतु मेंऔर ग्रीष्म ऋतु में ऐसा भोजन नहीं करना चाहिए। इसके बाद भगवान तीसरी तरह के भोजन अर्थात तामसी भोजन का वर्णन करते हैं, जो हमें कभी भी नहीं करना चाहिए।
यातयामं(ङ्) गतरसं(म्), पूति पर्युषितं(ञ्) च यत्|
उच्छिष्टमपि चामेध्यं(म्), भोजनं(न्) तामसप्रियम्||17.10||
जो भोजन सड़ा हुआ, रस रहित, दुर्गन्धित, बासी और जूठा है तथा (जो) महान अपवित्र (मांस आदि) भी है, (वह) तामस मनुष्य को प्रिय होता है।
विवेचन: आधा पका, बासी और दुर्गंध युक्त भोजन तामसी भोजन माना गया है। आयुर्वेद में माना गया है कि तीन घंटे के बाद पका हुआ भोजन बासी हो जाता है। आजकल हम रेफ्रिजरेटर में रखा हुआ भोजन खाते हैं। यह सब हमारी जीवन शैली बदलने के कारण हुआ है क्योंकि रोज - रोज भोजन बनाने की हमारी इच्छा नहीं होती। हमारे पास उसका समय नहीं है। लेकिन ऐसे भोजन से हमारा बल कैसे कम हो रहा है यह साफ नजर आत है। पहली पीढ़ी की महिलाएं जितना काम करती थीं, हम उतना नहीं कर पाते और हम जितना काम करते हैं, उतना हमारी अगली पीढ़ी नहीं कर पाएगी। विज्ञान ने प्रगति की है परंतु मनुष्य अधोगति की ओर जा रहा है। मनुष्य का शारीरिक बल, मानसिक बल और आत्मिक बल कम हो रहा है। हम अपने बच्चों को भी किसी ग़लत कार्य को करने से रोकने में असमर्थ हो जाते हैं। इस प्रकार का झूठा, अपवित्र भोजन तामसी लोगों की पसंद होता है।
इसको विस्तार से जानने के लिए ज्ञानेश्वर महाराज जी कहते हैं कि जैसे गुरुदेव अपने शिष्य को शिक्षा देने के लिए एक छोटा सा मंत्र देते हैं परन्तु वह छोटा सा मंत्र ही कल्याणकारी होता है। इसी तरह से जो भोजन थोड़ा सा सेवन करने पर भी रस, तृप्ति और बल देता है वह सात्विक भोजन है। ऐसा भोजन जो पहले ही बहुत तीखा हो, मसालेदार हो और उसमें और तीखा बढ़ाएं तो ऐसा भोजन राजसी हो जाता है। तामसी भोजन किसी भी हालत में करना ही नहीं चाहिए। ऐसा भोजन करने से अज्ञान बढ़ता है।
ठाकुर रामकृष्ण ने जब स्वामी विवेकानंद को अनुग्रह दिया तो उन्होंने उनसे कहा कि नरेंद्र! अब तुम्हें किसी और के हाथ का नहीं खाना चाहिए। स्वयं पकाओ और स्वयं खाओ। इसके अलावा तुम्हें स्पर्श और अस्पर्श के आहार का भी ध्यान रखना होगा क्योंकि आहार सिर्फ वही नहीं है जो हम मुख से ग्रहण करते हैं और हमारे पेट में चला जाता है। आहार कई तरह का होता है। आंखों से रूप का आहार, कानों से शब्द का आहार, नासिका से गंध का आहार और त्वचा से स्पर्श का आहार। हमें सभी आहारों का ध्यान रखना है क्योंकि इनसे हमारा व्यवहार, हमारी वृत्ति प्रभावित होगी। श्रीभगवान फिर यज्ञ की बात करते हैं और फिर तप की बात करते हुए बताते हैं कि किस प्रकार हम अपने जीवन को पूर्णता दे सकते हैं। ऐसा क्या उपाय है जिससे हम परिपूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं। जिसका विवेचन आगामी सत्रों में किया जायेगा।
इसको विस्तार से जानने के लिए ज्ञानेश्वर महाराज जी कहते हैं कि जैसे गुरुदेव अपने शिष्य को शिक्षा देने के लिए एक छोटा सा मंत्र देते हैं परन्तु वह छोटा सा मंत्र ही कल्याणकारी होता है। इसी तरह से जो भोजन थोड़ा सा सेवन करने पर भी रस, तृप्ति और बल देता है वह सात्विक भोजन है। ऐसा भोजन जो पहले ही बहुत तीखा हो, मसालेदार हो और उसमें और तीखा बढ़ाएं तो ऐसा भोजन राजसी हो जाता है। तामसी भोजन किसी भी हालत में करना ही नहीं चाहिए। ऐसा भोजन करने से अज्ञान बढ़ता है।
ठाकुर रामकृष्ण ने जब स्वामी विवेकानंद को अनुग्रह दिया तो उन्होंने उनसे कहा कि नरेंद्र! अब तुम्हें किसी और के हाथ का नहीं खाना चाहिए। स्वयं पकाओ और स्वयं खाओ। इसके अलावा तुम्हें स्पर्श और अस्पर्श के आहार का भी ध्यान रखना होगा क्योंकि आहार सिर्फ वही नहीं है जो हम मुख से ग्रहण करते हैं और हमारे पेट में चला जाता है। आहार कई तरह का होता है। आंखों से रूप का आहार, कानों से शब्द का आहार, नासिका से गंध का आहार और त्वचा से स्पर्श का आहार। हमें सभी आहारों का ध्यान रखना है क्योंकि इनसे हमारा व्यवहार, हमारी वृत्ति प्रभावित होगी। श्रीभगवान फिर यज्ञ की बात करते हैं और फिर तप की बात करते हुए बताते हैं कि किस प्रकार हम अपने जीवन को पूर्णता दे सकते हैं। ऐसा क्या उपाय है जिससे हम परिपूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं। जिसका विवेचन आगामी सत्रों में किया जायेगा।
प्रश्नोत्तर:
प्रश्नकर्ता: पूनम गर्ग जी
प्रश्न: जब हम ईश्वर की पूजा करते हैं तो हमेशा कुछ मांगते हैं यह भी तो हमारा स्वार्थ ही है। कृपया प्रकाश डालिए?
उत्तर: बेटा अगर पिता से अपनी समस्या, आवश्यकताएं ना कह कर बाहर के लोगों से ऐसा कहेगा तो पिता को बुरा लगेगा इसलिए परमपिता भगवान से मांगते हो तो इसमें कोई बुराई नहीं पर मांगते ही नहीं रहना है। मांगते मांगते एक दिन भगवान को भी मांगना क्योंकि ऐसी निष्काम भक्ति जहां हम भगवान को उन्हीं से मांग लेते हैं, हमारे जीवन का उन्नयन कर देती है।
प्रश्नकर्ता: नीलम गुलाटी जी
प्रश्न: साधक के रूप में हम गीता जी का अभ्यास कर रहे हैं। श्लोकों को कंठस्थ करने का प्रयास कर रहे हैं। अगर अपवित्र स्थान पर भी श्लोक हमारे दिमाग में चलते रहें तो इसमें कोई बुराई तो नहीं?
उत्तर: ऐसा नित्य अनुसंधान बिना प्रभु कृपा के संभव ही नहीं है। बारहवें अध्याय में भगवान ने कहा है कि जो मन और बुद्धि मुझको दे देता है वह भक्त मुझे प्रिय है। अगर चिंतन, बुद्धि, तर्क, गीता जी पर एकाग्र हो रहा है तो यह अवश्य ही बहुत ही अच्छा संदेश है।
प्रश्नकर्ता: शैलजा कुमार जी
प्रश्न: आने वाले मौसम में ना पाई जाने वाली सब्जियों, फलों आदि का आचार या सॉस बना के रखें तो क्या ऐसा भोजन तामसी माना जाएगा?
उत्तर: भोजन का अर्थ है - मुख्य भोजन जैसे दाल, चावल, रोटी आदि। जो भोजन हम ज्यादा मात्रा में ग्रहण करते हैं वह बासी नहीं होना चाहिए। आचार या सॉस को हम किसी भी भोजन के साथ बहुत थोड़ी मात्रा में लेते हैं।
प्रश्नकर्ता:माया जी
प्रश्नकर्ता: पूनम गर्ग जी
प्रश्न: जब हम ईश्वर की पूजा करते हैं तो हमेशा कुछ मांगते हैं यह भी तो हमारा स्वार्थ ही है। कृपया प्रकाश डालिए?
उत्तर: बेटा अगर पिता से अपनी समस्या, आवश्यकताएं ना कह कर बाहर के लोगों से ऐसा कहेगा तो पिता को बुरा लगेगा इसलिए परमपिता भगवान से मांगते हो तो इसमें कोई बुराई नहीं पर मांगते ही नहीं रहना है। मांगते मांगते एक दिन भगवान को भी मांगना क्योंकि ऐसी निष्काम भक्ति जहां हम भगवान को उन्हीं से मांग लेते हैं, हमारे जीवन का उन्नयन कर देती है।
प्रश्नकर्ता: नीलम गुलाटी जी
प्रश्न: साधक के रूप में हम गीता जी का अभ्यास कर रहे हैं। श्लोकों को कंठस्थ करने का प्रयास कर रहे हैं। अगर अपवित्र स्थान पर भी श्लोक हमारे दिमाग में चलते रहें तो इसमें कोई बुराई तो नहीं?
उत्तर: ऐसा नित्य अनुसंधान बिना प्रभु कृपा के संभव ही नहीं है। बारहवें अध्याय में भगवान ने कहा है कि जो मन और बुद्धि मुझको दे देता है वह भक्त मुझे प्रिय है। अगर चिंतन, बुद्धि, तर्क, गीता जी पर एकाग्र हो रहा है तो यह अवश्य ही बहुत ही अच्छा संदेश है।
प्रश्नकर्ता: शैलजा कुमार जी
प्रश्न: आने वाले मौसम में ना पाई जाने वाली सब्जियों, फलों आदि का आचार या सॉस बना के रखें तो क्या ऐसा भोजन तामसी माना जाएगा?
उत्तर: भोजन का अर्थ है - मुख्य भोजन जैसे दाल, चावल, रोटी आदि। जो भोजन हम ज्यादा मात्रा में ग्रहण करते हैं वह बासी नहीं होना चाहिए। आचार या सॉस को हम किसी भी भोजन के साथ बहुत थोड़ी मात्रा में लेते हैं।
प्रश्नकर्ता:माया जी
प्रश्न: पूजा करने पर आंखों से अश्रु बहते हैं। यह कोई बुरी बात तो नहीं?
उत्तर: यह एक भाव है और भगवान ने कहा है कि मैं भावरूप हूं। भगवान भाव से ही मिलते हैं।
उत्तर: यह एक भाव है और भगवान ने कहा है कि मैं भावरूप हूं। भगवान भाव से ही मिलते हैं।