विवेचन सारांश
गुणों को पार करने का मार्ग
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
14.9
सत्त्वं(म्) सुखे सञ्जयति, रजः(ख्) कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः(फ्), प्रमादे सञ्जयत्युत॥14.9॥
रजस्तमश्चाभिभूय, सत्त्वं(म्) भवति भारत।
रजः(स्) सत्त्वं(न्) तमश्चैव, तमः(स्) सत्त्वं(म्) रजस्तथा॥14.10॥
सत्व गुण को विकसित करने के लिए ध्यान - जप - तप में मन लगाने पर रज और तम का प्रभाव, अपने आप कम हो जाता है। यदि हम सुबह से रात तक की दिनचर्या में अन्त:करण को शुद्ध करने वाले सत्त्व गुण के प्रभाव में रहते हैं तो अपने आप ही अन्य गुण दब जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे दिन में चन्द्रमा और तारे होते तो हैं, लेकिन सूर्य के प्रकाश में दिखाई नहीं देते।
का चुप साधि रहेहु बलवाना।।
पवन तनय बल पवन समाना,
बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ॥ किष्किन्धाकाण्ड।।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहॉं बिश्राम।। सुन्दरकाण्ड।।
कुछ और आगे जाने पर उन्हें एक और राक्षसी मिली जो हवा में उड़ते पंछियों की परछाई को पकड़कर उन्हें नीचे फेंक देती थी। यहाँ हनुमान जी ने राक्षसी के बल का प्रभाव अनुभव किया। उन्होंने न तो राक्षसी से कोई निवेदन किया, न कोई चतुराई की, अपितु तुरन्त उसे मार कर आगे निकल गए।
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्, प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं(म्) यदा तदा विद्याद्, विवृद्धं(म्) सत्त्वमित्युत॥14.11॥
लोभः(फ्) प्रवृत्तिरारम्भः(ख्), कर्मणामशमः(स्) स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे भरतर्षभ॥14.12॥
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः।।1.30।।
लोभ हो या मोह, इनके कारण मन:स्थिति विचलित हो जाती है और विवेक ढक जाता है।
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च, प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे कुरुनन्दन॥14.13॥
अप्रकाश - अर्थात् प्रकाश का अभाव। जिसके होते विवेक पर अन्धकार छा कर वह नष्ट हो जाता है।
अप्रवृत्ति - अर्थात कुछ भी न करने की इच्छा। मान लीजिए दिवाली आ रही है और हम योजना बनाते हैं कि हमें यह काम करना है, वह काम करना है, लेकिन कोई व्यक्ति ऐसा होता है, जो इस प्रकार योजना बनाता है कि मैं तो पूरे दिन सोने का काम करूॅंगा। यह हुआ अप्रवृत्ति का उदाहरण।
प्रमाद- अर्थात् करने योग्य बातों को न करना लेकिन न करने योग्य बातों को करना। ये सभी लक्षण तमोगुण के परिचायक हैं।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु, प्रलयं(म्) याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां(म्) लोकान्, अमलान्प्रतिपद्यते॥14.14॥
रजसि प्रलयं(ङ्) गत्वा, कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि, मूढयोनिषु जायते॥14.15॥
कर्मणः(स्) सुकृतस्याहुः(स्), सात्त्विकं(न्) निर्मलं(म्) फलम्।
रजसस्तु फलं(न्) दुःखम्, अज्ञानं(न्) तमसः(फ्) फलम्॥14.16॥
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं(म्), रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो, भवतोऽज्ञानमेव च॥14.17॥
ऊर्ध्वं(ङ्) गच्छन्ति सत्त्वस्था, मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था, अधो गच्छन्ति तामसाः॥14.18॥
नान्यं(ङ्) गुणेभ्यः(ख्) कर्तारं(म्), यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं(म्) वेत्ति, मद्भावं(म्) सोऽधिगच्छति॥14.19॥
गुणानेतानतीत्य त्रीन्, देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखै:(र्), विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥14.20॥
अर्जुन उवाच
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतान्, अतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः(ख्) कथं(ञ्) चैतांस्, त्रीन्गुणानतिवर्तते॥14.21॥
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं(ञ्) च प्रवृत्तिं(ञ्) च, मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि, न निवृत्तानि काङ्क्षति॥14.22॥
उदासीनवदासीनो, गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव, योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥14.23॥
समदुःखसुखः(स्) स्वस्थः(स्), समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर:(स्), तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥14.24॥
मानापमानयोस्तुल्य:(स्), तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी, गुणातीतः(स्) स उच्यते॥14.25॥
मां(ञ्) च योऽव्यभिचारेण, भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्, ब्रह्मभूयाय कल्पते॥14.26॥
मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्, अमृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य, सुखस्यैकान्तिकस्य च॥14.27॥
हरि ॐ तत्सत्। हरि ॐ तत्सत्।। हरि ॐ तत्सत्।।।
इसके पश्चात् प्रश्नोत्तर सत्र आरम्भ हुआ।
: : प्रश्नोत्तर : :
राजोगुण और तमोगुण को दबाकर सतोगुण को बढ़ाया जा सकता है। किसी गुण को समाप्त करने की बात भगवान ने नहीं कही। रात्रि में मोह निशा का काल है। रात्रि में तमोगुण अवश्य ही बढेगा, ऐसा नहीं है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय:।।