विवेचन सारांश
गुणों को पार करने का मार्ग

ID: 3923
हिन्दी
रविवार, 05 नवंबर 2023
अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग
2/2 (श्लोक 9-27)
विवेचक: गीता प्रवीण कविता जी वर्मा


पारम्परिक तरीके से दीप प्रज्वलन, प्रार्थना, गुरुवन्दना और व्यास स्तुति के पश्चात् विवेचन सत्र का आरम्भ हुआ। यह अध्याय    गुणत्रयविभागयोग नामक चौदहवॉं अध्याय है। इस अध्याय में भगवान तीन मूलभूत गुणों- सत्त्व, रज और तम के बारे मे बताते हैं।

सत्त्व के अन्तर्गत प्रकाश अर्थात ज्ञान, विवेक, बुद्धि और कौशल यह सभी सकारात्मक गुण आते हैं। रजोगुण राग, पाप और लोभ को दर्शाता है। तमोगुण आलस्य, निद्रा और प्रमाद को दर्शाता है। प्रश्न यह उठता है कि इन सब गुणों का अध्ययन हम क्यों करें? इससे हमें क्या लाभ होगा? हमारे जीवन पर इनका क्या प्रभाव पड़ेगा? साथ ही प्रश्न यह भी उठता है कि हम सतोगुणी कैसे बनें?

सोचिए कि हम जीवन में क्या बनना चाहते हैं? हमारे जीवन का ध्येय क्या है? हम पाएँगे कि हम अपने लिए नहीं बल्कि अपने परिवारजन के लिए या अन्य लोगों के लिए कुछ बनना चाहते हैं। उनकी दृष्टि में हम   Hero अर्थात नायक बनना चाहते हैं। हम में से कोई भी खलनायक बनना नहीं चाहता। अर्जुन स्वयं एक नायक हैं। वे भगवद्गीता के नायक, महाभारत के नायक हैं, तभी तो उनके अन्दर जो विशेषताऍं हैं, वे हमारे अन्दर भी आ जाऍं।  तब हम नायक बन सकते हैं। इन विशेषताओं के बारे में इस अध्याय के पहले भाग में और उससे पूर्व भी कई लक्षण बताए गए हैं। दैवासुरविभागयोग  में दैवी और आसुरी गुणों का वर्णन किया गया है। 

अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।। 

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।16.4।।

हमें यह पहचानना है कि हम में कौन से लक्षण हैं? उनका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? उदाहरण के लिए मनुष्य इच्छा न होते हुए भी पाप कर्म क्यों करता है?

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।।3.36।।

 तमोगुण के प्रभाव के कारण ही, पापकर्म होते हैं। हमारे अन्दर सत्त्व,  रज और तम इन गुणों का असन्तुलन होता है। इस असन्तुलन को समझने और उसे सन्तुलित करने के लिए गीताकार दार्शनिक की तरह मार्गदर्शन करते हैं। इन गुणों को कैसे सन्तुलित करना है? इसका उत्तर तो हमें सत्रहवें अध्याय में मिलता है, लेकिन यहाँ  हम उन गुणों के बारे में कुछ और विस्तार से जान सकते हैं।

14.9

सत्त्वं(म्) सुखे सञ्जयति, रजः(ख्) कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः(फ्), प्रमादे सञ्जयत्युत॥14.9॥

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में (और) रजोगुण कर्म में लगाकर (मनुष्य पर) विजय करता है। परन्तु तमोगुण ज्ञान को ढककर एवं प्रमाद में लगाकर (मनुष्य पर) विजय करता है।

विवेचन: गुण अर्थात रस्सी। ये तीनों गुण एक रस्सी की तरह हैं जो जीवात्मा को इस दुख रुपी संसार से बॉंधते हैं। सत्त्व गुण सुख के माध्यम से हमें बॉंधता है, विषयों का सुख बन्धन निर्माण करता है। रजोगुण कर्म के माध्यम से बाँधता है। तमोगुण बलवान होने पर ज्ञान और विवेक को पूर्णतया ढक देता है। जिस प्रकार हमारी आँखों  के सामने मेघ आ जाए तो वह सूर्य प्रकाश को ढक देता है। उसी तरह अज्ञान के माध्यम से तमोगुण भी ज्ञान को ढकता है। तमोगुण के प्रभाव में हमें विवेक का भान नहीं होता। क्या करें? क्या न करें? इसका निर्णय हम नहीं कर पाते और हमारे सोच विचार दिशाहीन हो जाते हैं। इस प्रकार ये तीन गुण प्रबल होकर मनुष्य पर विजय प्राप्त करते हैं।

14.10

रजस्तमश्चाभिभूय, सत्त्वं(म्) भवति भारत।
रजः(स्) सत्त्वं(न्) तमश्चैव, तमः(स्) सत्त्वं(म्) रजस्तथा॥14.10॥

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्व गुण बढ़ता है, सत्त्व गुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण (बढ़ता है) वैसे ही सत्त्वगुण (और) रजोगुण को दबाकर तमोगुण (बढ़ता है)।

विवेचन: भगवान अत्यन्त कुशल गुरु हैं। वे आपके मन में आ सकने वाले प्रश्नों का समाधान पहले ही करते हैं। इस श्लोक में भगवान बताते है कि इन गुणों को किस प्रकार विकसित किया जा सकता है। भगवान कहते हैं, कोई एक गुण अन्य दो गुणों को दबाकर प्रकट होता है। किसी एक गुण का प्रभाव अधिक होने पर अन्य दो गुण अभिभूत हो जाते हैं।

सत्व गुण को विकसित करने के लिए ध्यान - जप - तप में मन लगाने पर रज और तम का प्रभाव, अपने आप कम हो जाता है। यदि हम सुबह से रात तक की दिनचर्या में अन्त:करण को शुद्ध करने वाले सत्त्व गुण के प्रभाव में रहते हैं तो अपने आप ही अन्य गुण दब जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे दिन में चन्द्रमा और तारे होते तो हैं, लेकिन सूर्य के प्रकाश में दिखाई नहीं देते।

सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों के उत्तम प्रतीक हैं तीन भाई - विभीषण, कुम्भकर्ण और रावण। रावण में रजोगुण की प्रधानता होने के कारण ही वह इतना कर्मशील है। कुम्भकर्ण तमोगुण के प्रभाव से ही प्रमाद का शिकार है। विभीषण में सत्त्वगुण की प्रधानता है।  इन गुणों  के सन्तुलन असन्तुलन को किस प्रकार से नियन्त्रित किया जाए? यह बताने के लिए हनुमान जी की एक कथा का उदाहरण लेते हैं।

सीता जी समुद्र पार लङ्का में थीं। समुद्र किनारे तक पहुँचने हेतु, श्रीराम सेना के सामने प्रश्न यह उठा कि समुद्र को पार कर, सीता जी तक  सन्देश पहुॅंचाकर, वापस आने का काम कौन कर सकता है? तब जाम्बवन्त जी ने हनुमान जी को उनकी शक्ति की याद दिलाई -

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना।
का चुप साधि रहेहु बलवाना।।
 
पवन तनय बल पवन समाना,
बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ॥  किष्किन्धाकाण्ड।। 


हनुमान जी अपनी यात्रा पर निकल पड़े। उन्होंने तीन परीक्षाएँ दीं। इन्हें हम तीन गुणों की परीक्षा और उनके प्रति हनुमान जी की प्रतिक्रिया का प्रतीक समझ सकते हैं। सर्वप्रथम हनुमान जी मैनाक पर्वत पर पहुॅंचे (जो सतोगुण का प्रतीक है) मैनाक ने उनसे विनती की, कि वे विश्राम के लिए रुकें। यह एक प्रकार का प्रलोभन था, लेकिन हनुमान जी ने उन्हें जवाब दिया-

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रणाम। 
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहॉं बिश्राम।। सुन्दरकाण्ड।। 


मैनाक पर्वत ने अच्छे उद्देश्य से ही हनुमान जी को विश्राम का अनुरोध किया था। परन्तु उस प्रलोभन में न पडते हुए, हनुमानजी वहाँ  से चल दिए। आगे चलकर उन्हें राक्षसी सुरसा मिली, जो उन्हें खाना चाहती थी। कुछ देर तक बातचीत होने पर हनुमान जी को लगा, यह मुझे खाए बिना नहीं मानेगी। तब हनुमान जी ने अपने आकार में वृद्धि करना शुरू किया। राक्षसी बड़ी हो गयी, हनुमान जी और बड़े हुए। राक्षसी और बड़ी हुई, तब अचानक हनुमान जी छोटे होकर राक्षसी के मुॅंह से निकलकर बाहर आ गए ! यहाँ हनुमान जी ने चतुराई के साथ रजोगुण का सामना किया।

कुछ और आगे जाने पर उन्हें एक और राक्षसी मिली जो हवा में उड़ते पंछियों की परछाई को पकड़कर उन्हें नीचे फेंक देती थी। यहाँ हनुमान जी ने राक्षसी के बल का प्रभाव अनुभव किया। उन्होंने न तो राक्षसी से कोई निवेदन किया, न कोई चतुराई की, अपितु तुरन्त उसे मार कर आगे निकल गए।

इस प्रकार हनुमान जी ने सात्विक गुण का सामना विनम्रता से किया रजोगुण को चतुराई से परास्त किया और तमोगुण के सामने अविलम्ब कृति की। अर्थात् उस गुण को विकसित होने का अवसर ही नहीं दिया। इसी प्रकार से हमें सुख, कर्म और प्रमाद के माध्यम से दिखाई देने वाले इन तीन गुणों के प्रभाव को समझकर फिर उन पर विजय प्राप्त करनी है।

14.11

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्, प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं(म्) यदा तदा विद्याद्, विवृद्धं(म्) सत्त्वमित्युत॥14.11॥

जब इस मनुष्यशरीर में सब द्वारों (इन्द्रियों और अन्तःकरण) में प्रकाश (स्वच्छता) और ज्ञान (विवेक) प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।

विवेचन: इस श्लोक में भगवान यह बताते हैं कि सत्त्व गुण के बढ़ने पर, क्या-क्या लक्षण दिखाई देते हैं? भगवान कहते हैं कि जब सतोगुण बढ़ता है, तब सम्पूर्ण अन्त:करण और मन मस्तिष्क प्रकाशित हो जाते हैं, ऊर्जा से भर जाते हैं, विवेक शक्ति जागरूक हो जाती है और मन  स्वयं ही अच्छे कर्मों के प्रति प्रवृत्त होता है, ज्ञान बढ़ता है। इन लक्षणों से हम समझें कि सतोगुण का प्रभाव बढ़ गया है।

14.12

लोभः(फ्) प्रवृत्तिरारम्भः(ख्), कर्मणामशमः(स्) स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे भरतर्षभ॥14.12॥

हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।

विवेचन: रजोगुण का प्रभाव बढ़ने पर, दिखने वाले लक्षणों के बारे में भगवान कहते हैं कि; रजोगुण बढ़ने पर आरम्भ में लोभ बढ़ता है अर्थात कुछ पाने की प्रवृत्ति बढ़कर फिर कर्म का आरम्भ होता है। लेकिन यहाँ शम अर्थात नियन्त्रण का अभाव होता है। फल के प्रति आसक्ति होने के कारण और बढी  हुई इच्छा को तृप्त करने के प्रयत्नों में मोह विकसित हो जाता है। किसी न किसी प्रकार इच्छित वस्तु को प्राप्त करना, यह अशम स्थिति है जो रजोगुण का लक्षण है। यहाँ लोभ और मोह इन दो शब्दों में अन्तर समझना आवश्यक है। लोभ हमें किसी वस्तु के प्रति होता है, अर्थात भौतिक विषय वस्तु के प्रति जो आसक्ति होती है, वह लोभ है। मोह किसी व्यक्ति के लिए होता है। जैसे अर्जुन को अपने दादा, गुरु और भ्राता को देखकर मोह हो गया था।

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः।।1.30।।

लोभ हो या मोह, इनके कारण मन:स्थिति विचलित हो जाती है और विवेक ढक जाता है।

14.13

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च, प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे कुरुनन्दन॥14.13॥

हे कुरुनन्दन! तमोगुण के बढ़ने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति तथा प्रमाद और मोह – ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं।

विवेचन: तमोगुण के तीन मुख्य लक्षण हैं- अप्रकाश, अप्रवृत्ति और प्रमाद।
अप्रकाश 
-  अर्थात् प्रकाश का अभाव। जिसके होते विवेक पर अन्धकार छा कर वह नष्ट हो जाता है।
अप्रवृत्ति - अर्थात कुछ भी न करने की इच्छा। मान लीजिए दिवाली आ रही है और हम योजना बनाते हैं कि हमें यह काम करना है, वह काम करना है, लेकिन कोई व्यक्ति ऐसा होता है, जो इस प्रकार योजना बनाता है कि मैं तो पूरे दिन सोने का काम करूॅंगा। यह हुआ अप्रवृत्ति का उदाहरण। 
प्रमाद- अर्थात् करने योग्य बातों को न करना‌ लेकिन न करने योग्य बातों को करना। ये सभी लक्षण तमोगुण के परिचायक हैं।

14.14

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु, प्रलयं(म्) याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां(म्) लोकान्, अमलान्प्रतिपद्यते॥14.14॥

जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है (तो वह) उत्तमवेत्ताओं के निर्मल लोकों में जाता है।

विवेचन: इस श्लोक में भगवान ने एक नए विषय पर बात की है। वे मृत्यु और पुनर्जन्म की बात करते हैं। सामान्यत: हम यह समझते हैं कि एक बार मनुष्य योनि मिल जाने पर अन्य योनियाँ नहीं मिलतीं। भगवान इस धारणा का खण्डन करते हैं। वे कहते हैं कि मृत्यु के समय अन्त:कारण में जिस गुण की प्रबलता होती है, उसी के अनुसार पुनर्जन्म होता है।  किसी एक गुण की प्रबलता अचानक मृत्यु के समय नहीं हो सकती। उस गुण  का प्रभाव तो जीवन भर बनाए रखना होता है। जिस गुण के प्रभाव में हमारे जीवन के अधिकांश क्रियाकलाप या अधिकांश विचार होते हैं, वही गुण हमारे अंतःकरण में बढ़कर मृत्यु समय में प्रबल होता है।

सत्व गुण की प्रबलता होने पर मनुष्य स्वर्गादि उत्तम लोकों को प्राप्त होता है। अन्यथा निम्न लोकों में जाता है। वेदों की धारणा के अनुसार, मृत्यु लोक सुख और दुःख का सम्मिलित अनुभव है। जबकि उत्तम लोकों में केवल सुख और अधम लोक में केवल दुःख प्राप्ति होती है।  हमारा जितना पुण्य होता है उसके अनुपात में ही हम अन्य लोक में जाकर वापस मृत्यु लोक में आते हैं।

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एव त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते।।9.21।।
 
पुण्य क्षीण होने पर पुनः मनुष्य लोक में आना पड़ता है। हम कह सकते हैं कि स्वर्ग ही परम साध्य नहीं है। प्रश्न उठता है कि परम क्या है? इस प्रश्न का समाधान भगवान इस अध्याय में नहीं देते परन्तु आगे के अध्यायों में इसका उत्तर मिलता है।

14.15

रजसि प्रलयं(ङ्) गत्वा, कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि, मूढयोनिषु जायते॥14.15॥

रजोगुण के बढ़ने पर मरने वाला प्राणी कर्मसंगी मनुष्य योनि में जन्म लेता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरने वाला मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।

विवेचन: रजस् और तमस् गुणों का मृत्यु समय प्रबल होना, मनुष्य योनि में पुनर्जन्म दिलाता है। रजोगुण प्रबल होने पर उत्कृष्ट मनुष्य योनि मिलती है, जबकि तमोगुण के प्रभाव में, मृत्यु होने पर मूढ अर्थात् पशु योनि या अधम योनि मिलती है, जहॉं बुद्धि का कोई काम नहीं होता। कभी-कभी प्रश्न उठता है कि तमोगुण वाले व्यक्ति को मनुष्य योनि क्यों मिलती है? इसे इस तरह समझते हैं कि शराब पीने वाले के लिए तो मदिरालय ही स्वर्ग के समान है। बुरी बात को स्वर्ग समझने के कारण ही उसे निचले स्तर की मनुष्य योनि मिलती है। वही मदिरालय समझदार व्यक्ति के लिए नर्क होता है। 

14.16

कर्मणः(स्) सुकृतस्याहुः(स्), सात्त्विकं(न्) निर्मलं(म्) फलम्।
रजसस्तु फलं(न्) दुःखम्, अज्ञानं(न्) तमसः(फ्) फलम्॥14.16॥

विवेकी पुरुषों ने – शुभ कर्म का तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख (कहा है और) तामस कर्म का फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है।

विवेचन: इस श्लोक में भगवान तीनों गुणों का निष्कर्ष बताते हैं। वे कहते हैं, सतोगुण से निर्मलता बढ़ती है। अन्त:करण शुद्ध होकर काम, क्रोध, लोभ आदि अवगुणों पर, नियन्त्रण प्राप्त किया जा सकता है। रजोगुण के प्रभाव में लोभ आता है, जो दुःख को जन्म देता है। इच्छा पूर्ति हेतु किए जाने वाले कर्म भी दुःख को ही जन्म देते हैं। सुख यदि मिलता भी है तो क्षणिक ही मिलता है, जो फिर नई कामना को जन्म देकर, इस चक्र में फँसा देता है। तमोगुण का फल तो हमेशा अज्ञान ही होता है।

14.17

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं(म्), रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो, भवतोऽज्ञानमेव च॥14.17॥

सत्त्वगुण से ज्ञान और रजोगुण से लोभ (आदि) ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुण से प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होते हैं।

विवेचन - सतोगुण से ज्ञान की वृद्धि होती है। रजोगुण से लोभ और तमोगुण से तो प्रमाद, मोह और अज्ञान तीनों बढ़ते हैं। 

14.18

ऊर्ध्वं(ङ्) गच्छन्ति सत्त्वस्था, मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था, अधो गच्छन्ति तामसाः॥14.18॥

सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकों में जाते हैं, रजोगुण में स्थित मनुष्य मृत्युलोक में जन्म लेते हैं (और) निन्दनीय तमोगुण की वृत्ति में स्थित तामस मनुष्य अधोगति में जाते हैं।

विवेचन: सतोगुण से उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है। रजोगुण मध्य अर्थात सुख-दुःख युक्त मृत्यु लोक की प्राप्ति करवाता है। तमोगुण हमें अधोगति की ओर ले जाता है। अब तमोगुण वाले व्यक्ति को यदि सतोगुणी  बनना है तब वह क्या करें? इस बात के लिए भी भगवान प्रेरित करते हैं। तमोगुणी व्यक्ति के जीवन में अज्ञान की प्रधानता होती है, लेकिन जीवन के रास्ते पर चलते-चलते हो सकता है उसे कुछ अच्छा माध्यम मिल जाए, जैसे हमें गीता अध्ययन का अवसर मिला है। हो सकता है कोई अच्छा गुरु मिल जाए और धीरे-धीरे उसकी आध्यात्मिक उन्नति हो जाए। इसी बात के लिए भगवान प्रेरित करते हैं।

14.19

नान्यं(ङ्) गुणेभ्यः(ख्) कर्तारं(म्), यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं(म्) वेत्ति, मद्भावं(म्) सोऽधिगच्छति॥14.19॥

जब विवेकी (विचार कुशल) मनुष्य तीनों गुणों के (सिवाय) अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और (अपने को) गुणों से पर अनुभव करता है, (तब) वह मेरे सत्स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

विवेचन: इन सभी लक्षणों अर्थात ज्ञान, लोभ, सुख, दु:ख, राग, द्वेष  इन सब का कारक तीन गुणों के अलावा कोई अन्य नहीं है। इस बात को समझाने के बाद, अब भगवान कहते हैं कि इसीलिए इन गुणों से परे जाने की आवश्यकता है। इन्हे लाङ्घकर उनके पार जाने की आवश्यकता है, अर्थात् भगवान यहाँ  गुणातीत होने की बात करते हैं। 

14.20

गुणानेतानतीत्य त्रीन्, देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखै:(र्), विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥14.20॥

देहधारी (विवेकी मनुष्य) देह को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों का अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था रूप दुःखों से रहित हुआ अमरता का अनुभव करता है।

विवेचन: सत्व, रज और तम इन तीन गुणों  को पार करके, और शरीर के बन्धन से, जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल सकती है। इसी तरह अमरता को प्राप्त किया जा सकता है।

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी।।15.4।।

अर्थात् पुन: कभी भी इस संसार में वापस आने की जरूरत नहीं पड़ती।

14.21

अर्जुन उवाच
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतान्, अतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः(ख्) कथं(ञ्) चैतांस्, त्रीन्गुणानतिवर्तते॥14.21॥

अर्जुन बोले – हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणों से (युक्त) होता है? उसके आचरण कैसे होते हैं? और इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है?

विवेचन: यहाँ अर्जुन प्रश्न करते हैं कि इन तीन गुणों के पार हुआ मनुष्य अर्थात् गुणातीत मनुष्य किन लक्षणों से युक्त होता है? उसका आचार व्यवहार कैसा होता है? उसके विचार कैसे होते हैं?

14.22

श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं(ञ्) च प्रवृत्तिं(ञ्) च, मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि, न निवृत्तानि काङ्क्षति॥14.22॥

श्री भगवान बोले – हे पाण्डव! प्रकाश और प्रवृति तथा मोह – (ये सभी) अच्छी तरह से प्रवृत्त हो जायँ तो भी (गुणातीत मनुष्य) इनसे द्वेष नहीं करता और (ये सभी) निवृत्त हो जायँ तो (इनकी) इच्छा नहीं करता।

विवेचन: अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए, भगवान कहते हैं कि गुणातीत मनुष्य के मन में राग द्वेष कुछ नहीं होता। उसे ज्ञान का अभिमान नहीं होता, प्रवृत्ति का उसे लोभ नहीं होता और वह मोह में फँसता नहीं। यहाँ तक कि निवृत्ति की भी उसकी इच्छा नहीं रहती।  वह सभी गुण-अवगुण और इच्छा आकाङ्क्षाओं से परे चला जाता है।

14.23

उदासीनवदासीनो, गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव, योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥14.23॥

जो उदासीन की तरह स्थित है (और) (जो) गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता (तथा) गुण ही (गुणों में) बरत रहे हैं – इस भाव से जो (अपने स्वरूप में ही) स्थित रहता है (और स्वयं कोई भी) चेष्टा नहीं करता।

विवेचन: गुणातीत मनुष्य एक प्रकार से उदासीन हो जाता है। अच्छे या बुरे किसी भी गुण द्वारा विचलित नहीं होता। भगवान की ओर आकर्षित होता है। हम यह देखते हैं कि जब भी कुछ बुरा होता है तो वह हमें भगवान की ओर ले जाता है। सूली पर चढ़ते हुए, ईसा मसीह की आध्यात्मिक उन्नति हुई थी। उदासीनता को एक उदाहरण से समझते हैं। किसी दीवार या पर्दे पर जब कोई चलचित्र चलता है और उसमें अचानक एक सर्प आता है, तब हमें मालूम होता है कि वह सर्प नकली है, इसलिए हम उसके प्रति उदासीन बने रहते हैं।

14.24

समदुःखसुखः(स्) स्वस्थः(स्), समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर:(स्), तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥14.24॥

जो धीर मनुष्य सुख-दुःख में सम (तथा) अपने स्वरूप में स्थित रहता है; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने में सम रहता है, जो प्रिय-अप्रिय में सम रहता है। जो अपनी निन्दा-स्तुति में सम रहता है; जो मान-अपमान में सम रहता है; जो मित्र-शत्रु के पक्ष में सम रहता है (और) जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है। (14.24-14.25)

विवेचन: अपनी बात को आगे बढाते हुए भगवान कहते हैं कि गुणातीत मनुष्य मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण इन तीनों को समान भाव से देखा है। लोष्ट अर्थात् मिट्टी, अश्म अर्थात् पत्थर और कञ्चन अर्थात् सोना, उसे इन तीनों में अन्तर तो समझ में आता है, लेकिन तीनों के प्रति उसके भाव समान होते हैं। वह प्रिय-अप्रिय या स्तुति-निन्दा में अन्तर नहीं करता।

14.25

मानापमानयोस्तुल्य:(स्), तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी, गुणातीतः(स्) स उच्यते॥14.25॥

विवेचन: गुणातीत मनुष्य मान-अपमान में तुल्य भाव रखता है। मित्र और शत्रु में समानता रखता है। वह स्वयं काम करता तो है, लेकिन उनके फल के प्रति अलिप्त रहता है और फल प्राप्ति हेतु कर्म करने के लिए प्रवृत्त नहीं होता।

14.26

मां(ञ्) च योऽव्यभिचारेण, भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्, ब्रह्मभूयाय कल्पते॥14.26॥

और जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणों का अतिक्रमण करके ब्रह्म प्राप्ति का पात्र हो जाता है।

विवेचन: भगवान कहते हैं इस तरह सभी विचार और सभी भाव मन से निकाल कर मुझे ही सब कुछ मानकर जो मीरा की तरह निर्मल मन से भक्ति करता है, वही परम तत्व को प्राप्त होता है। 

मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।

14.27

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्, अमृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य, सुखस्यैकान्तिकस्य च॥14.27॥

क्योंकि ब्रह्म का और अविनाशी अमृत का तथा शाश्वत धर्म का और ऐकान्तिक सुख का आश्रय मैं (ही हूँ)।

विवेचन - जो ब्रह्म को ही अधिष्ठाता जानता है, वही शाश्वत धर्म को जानता है, इस प्रकार भगवान ने तीनों गुणों, उनके प्रभाव व गुणातीत होने का वर्णन किया है। 
हरि ॐ तत्सत्। हरि ॐ तत्सत्।। हरि ॐ तत्सत्।।। 
इसके पश्चात् प्रश्नोत्तर सत्र आरम्भ हुआ। 

: : प्रश्नोत्तर : : 
प्रश्नकर्ता- श्री गोपाल प्रसाद भैया 
प्रश्न- गीता साधना शिविर कब होगा? 
उत्तर- फरवरी में कार्यक्रम आएगा। 

प्रश्नकर्ता- अभिषेक ओम भैया 
प्रश्न- सतोगुण को कैसे बढ़ाएं? 
उत्तर- दिनभर की वृत्ति को सात्त्विक करना। खानपान, व्यवहार, क्रिया-प्रतिक्रिया, प्रातः जागरण से रात्रि शयन तक समस्त आचार विचार सात्त्विक होने का प्रयास होना चाहिए। हमारी कुछ प्रवृत्तियाँ राजसी तामसी आएँगी ही। करोड़ों जन्मों का लेखा है, इस कारण कभी कुविचार आ जाएँ, तत्काल उसका शमन करना है। भगवान ने कहा है- 

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।14.10।।
राजोगुण और तमोगुण को दबाकर सतोगुण को बढ़ाया जा सकता है। किसी गुण को समाप्त करने की बात भगवान ने नहीं कही। रात्रि में मोह निशा का काल है। रात्रि में तमोगुण अवश्य ही बढेगा, ऐसा नहीं है। 

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।2.69।।
 
जिस काल में रात्रि निद्रा में लीन रहते हैं, उस काल में योगीजन जाग्रत रहते हैं। हमारे यहॉं तन्त्र साधना और अध्यात्म साधना के लिए अर्ध रात्रि बारह बजे से दो तक का समय उपयोगी माना जाता है। 
हनुमान प्रसाद पोद्दार भाईजी रात्रि बारह बजे से तीन बजे साधना करते थे। 

रात्रि में तमोगुण बढेगा ही, ऐसा आवश्यक नहीं है। यह सही है कि सांसारिक प्रवृत्तियों में लगे हुए, मनुष्यों में रात्रिकाल में तामसिक वृत्तियॉं बढ़ने की सम्भावना होती है। 

प्रश्नकर्ता- दिनेश भैया 
प्रश्न- मन बुद्धि अहङ्कार में से श्रद्धा किसके साथ है? 
उत्तर- श्रद्धा विशेषण है। श्रद्धा सात्त्विक, राजसी, तामसी तीनों प्रकार की हो सकती है। जिसकी जिसमें श्रद्धा हो, वह उसी में लगाता है। श्रद्धा अस्थायी हो सकती है, स्थायी भी हो सकती है। जिसकी धन में श्रद्धा है, वह धन के लिए परिवार को दांव पर लगा देता है। सभी रिश्ते नाते दाँव पर लगा देता है। भगवान में श्रद्धा होती है, तो अध्यात्म की ओर मन लगने लगता है। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रद्धा का विशेष महत्व है -

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। 4:39। 

भगवान कहते हैं, श्रद्धावान को ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञान के लिए भी श्रद्धा आवश्यक है। 

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि।।9.3।।

बिना श्रद्धा वाला तो नष्ट हो जाता है। ज्ञान मार्ग हो, भक्ति मार्ग हो या कर्मयोग हो, सबके लिए श्रद्धा आवश्यक है। 


प्रश्नकर्ता- दिनेश भैया 
प्रश्न- विपरीत परिस्थितियों में विचलन क्यों होता है? 
उत्तर- हम यह धारणा बना लेते हैं, सब अच्छा होना चाहिए। विपरीत नहीं होना चाहिए। मैंने सबका अच्छा किया है, सब मेरा अच्छा करेंगे। मेरे साथ अच्छा ही होना चाहिए। बुरा कुछ नहीं होना चाहिए। इस धारणा के कारण ही गड़बड़ होती है। 
स्वामी रामकृष्ण परमहंस जिन्हें माता काली से साक्षात्कार होता है, उन्हें भी गले में कैंसर होता है। उन्होंने इस जन्म में तो कोई पाप नहीं किया था। फिर हम लोगों की तो बात ही क्या है, जो नित्य पाप करते हैं। हमें यह मानना होगा अच्छा और बुरा, अनुकूल और प्रतिकूल निरन्तर बदलने वाली घटनाएँ हैं। सदैव एक जैसा नहीं हो सकता। परिवर्तन संसार का अवश्यम्भावी व्यवहार है। कभी जो घटना हमें अच्छी लगती है, आने वाले समय में उसका प्रभाव खराब प्रतीत होने लगता है। आज जो प्रतिकूल है, वह बाद में मङ्गलमय लगने लगता है। हम इस मान्यता को दृढ़ करें, भगवान जो करते हैं, अच्छा करते हैं। कुछ भी नहीं है, तो भी मेरे पाप कट रहे हैं। मेरे पापों का नाश हो रहा है। पापों का क्षय होना भी कल्याणकारी है। इसी धारणा को मजबूत करते हैं, तो सब अच्छा लगने लगता है।
 
प्रश्नकर्ता- रतन भैया 
प्रश्न- शाम को घर लौटने में थकावट और विलम्ब के कारण क्रोध आता है। 
उत्तर- मान्यता के कारण क्रोध आता है। परिस्थिति के कारण क्रोध नहीं आता। हमें अपनी मान्यता बदलनी पड़ेगी। परिस्थिति को बदलना हमारे वश में नहीं है। मन: स्थिति को ही बदलना पड़ेगा। अपनी मान्यता को शिथिल कर देना। स्वीकार करना कि कोई बात नहीं, जो हो रहा है, ठीक है। हर पचड़े में मुझे क्यों चौधरी बनना है? दूसरा गलत नहीं कर सकता, ऐसा मैं क्यों सोचूं? प्रज्ञाचक्षु स्वामी शरणानन्द जी महाराज कहते हैं - 

दूसरे का कर्तव्य मेरा अधिकार नहीं है। 

दूसरे ने कर्तव्य पालन नहीं किया, तो भगवान देखेंगे। ऐसी सहजता कर लेंगे तो क्रोध नहीं आएगा। दूसरे को रास्ते में आठ घण्टे लगे, मुझे पन्द्रह क्यों लगे? ऐसी बातों से विचलित नहीं होना है। जितना सहज हो जाएंगे, जीवन उतना ही आनन्दमय होता जाएगा। 

प्रश्नकर्ता- रतन भैया 
प्रश्न- सनातन धर्म पर हो रहे अत्याचारों के लिए क्या करना चाहिए? 
उत्तर- विश्व हिन्दू सम्मेलन World Hindu Confrence 25, 26 व 27 नवम्बर को थाइलैण्ड में होने वाला है। उसमें सभी मिलकर इसी बात पर विचार करने वाले हैं। 
How we can educate the Hindu people about scriptures! 
अपने बच्चों को गीता, रामायण, महाभारत पढ़ाना आवश्यक है। ऐसा करने से आने वाले सङ्कटों से निपटने का रास्ता अपने आप बनने लगेगा। 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय:।।

इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘गुणत्रयविभागयोग’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।