विवेचन सारांश
भगवत्प्राप्ति के उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण
पारम्परिक दीप प्रज्वलन, हनुमान चालीसा पाठ, श्री गुरु वन्दना एवं भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में वन्दन करते हुए आज के विवेचन सत्र का आरम्भ हुआ।
भगवान की अतिशय मङ्गलमय कृपा से हमारे जीवन में ऐसा भाग्योदय हुआ है कि हम अपने जीवन का उद्धार करने, सुफल सार्थक करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के चिन्तन, मनन, उसका श्रवण करने में, उसको पढ़ना सीखने और उसका पाठ करने, स्वाध्याय में और उसके सूत्रों को समझ कर अपने जीवन में लाने में प्रवृत्त हो गए हैं।
निश्चित रूप से हमारे कोई इस जन्म के सुकृत, पूर्व जन्मों के सुकृत या फिर किसी जन्म में किसी सन्त महापुरुष की कृपादृष्टि हम पर होने के कारण हमारा भाग्योदय हुआ है कि हम लोग भगवद्गीता सीखने में लग गए।
संसार में हजारों वर्षों में अनगिनत आचार्यों विद्वानों ने इस बात को प्रतिपादित किया है कि भगवद्गीता के समान अन्य कोई सहज और सुगम ग्रन्थ नहीं है। ऐसा नहीं है कि यह मात्र हिंदू धर्म का ग्रन्थ है। मानव मात्र के कल्याण के लिए गीताजी के समान कोई अन्य ग्रन्थ नहीं है। भारतीय और पाश्चात्य दर्शन में गीता जी के समान ऐसा कोई ग्रन्थ नहीं पाया जाता जिसमे इहलोक और परलोक के कल्याण की बात कही गई हो। भागवत में परलोक की बात कही गई है। विदुर नीति और चाणक्य नीति में इस जीवन के कल्याण की बात कही गई है। इस जीवन को कैसे सफल बनाएँ और आने वाले जीवन में कैसे सफल हों इसका मैनेजमेंट इस छोटे से ग्रन्थ में दिया गया है। भगवानजी की कृपा से हम गीता जी को सीखने में प्रवृत हो गए हैं।
वेदों को भगवान का उच्छ:वास कहा गया है। जब भगवान शयन करते हैं तब उनकी नासिका से निकलने वाली वायु के स्वरों से वेदों की ऋचाएँ प्रकट होती है और वेदों को गीता जी का सार माना जाता है।
भगवद्गीता तो भगवान की वाणी है।
गीताजी की अट्ठारह सौ से भी अधिक प्रामाणिक टीकाएँ है जिन्हें आचार्य - महापुरुषों ने मान्यता दी है। अन्य टीकाओं की गिनती नहीं है। सभी भाषाओं में अलग-अलग अर्थ हैं। जिसने जिस दृष्टि से देखा, गीताजी में गोता लगाया उसने वैसा ही अर्थ लिख दिया। शङ्कर भाषा में भगवद्गीता के अद्वैत सिद्धान्त का अद्भुत निरूपण मिलता है। अनेक सम्प्रदायों में जैसे रामानुजाचार्य जी ने सुन्दर भाष्य लिखा। स्वामी रामसुखदास जी ने ज्ञानयोग, तिलक जी ने कर्मयोग और ज्ञानेश्वर जी ने भक्ति का सुन्दर भाष्य लिखा है।
यह अध्याय अत्यन्त गहन है, ज्ञानियों का अध्याय है। सत्त्व, रज, तम इन्हीं तीन गुणों से सारी सृष्टि का निर्माण हुआ है। नाम, रूप और आकर्षण की भिन्नता का एकमात्र कारण सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण ही हैं।
यदि एक हजार महिलाओं को बराबर मात्रा में आलू, मसाले, आटा, घी इत्यादि देकर कहा जाए कि खाना बनाकर खिलाओ। सभी के पास बराबर मात्रा के सामान से बने खाने का स्वाद सभी महिलाओं का अलग-अलग होगा। सबके स्वाद में भिन्नता होगी। सबको एक-सा सामान दिया, परन्तु सामान कौन कितनी मात्रा में और कितना डालता है और उसे किस प्रकार से पकाएगा, उससे सबके भोजन का स्वाद अलग-अलग होगा। कुछ बहनों का तो इतना भिन्न होगा कि लगेगा ही नहीं इन पदार्थ से बना है। किसी का बहुत तीखा होगा और किसी का बिल्कुल सादा होगा। यह बिल्कुल साधारण सी बात है कि छोटे से पदार्थ से भी इतना बड़ा अन्तर आ सकता है। उनमें स्वाद तो अलग होगा ही परन्तु देखने में भी बिल्कुल अलग होंगे। रोटी भी अलग दिखेगी, सब्जी भी अलग दिखेगी और परोसने का तरीका भी बिल्कुल अलग होगा। मूल पदार्थ तो एक ही है, परन्तु सामने आने पर उनमें कितनी भिन्नता दिखेगी।
इसी प्रकार प्रकृति में सत्त्व, रज और तम तीनों गुण विद्यमान हैं, इन्हीं से सारी प्रकृति का, जैसे नदी, पहाड़, ग्रह, सभी योनियों का निर्माण हुआ है। सब के स्वभाव, सब के रूप रङ्ग, सब की पसन्द और नापसन्द, सब कुछ इन तीनों की मात्रा के अन्तर से ही होता है। किसी में भी केवल एक गुण नहीं हो सकता। सभी में तीनों गुण विद्यमान होते हैं, पर एक गुण की प्रधानता होती है। जिसमें जिस गुण की प्रधानता होगी वह वैसा ही होगा। अपने स्वभाव का विचार करें तो हम पाते हैं कि दिन में हम सत्त्व की अधिकता होने से कभी देवता बन जाते हैं तो कभी तम बढ़ने पर राक्षस बन जाते हैं।
इन तीनों के कम होने या बढ़ने से क्या-क्या हो सकता है यह भगवान हमें अगले श्लोक में बताते हैं।
14.11
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्, प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं(म्) यदा तदा विद्याद्, विवृद्धं(म्) सत्त्वमित्युत॥14.11॥
विवेचन :- जिस समय देह, इन्द्रियों और अन्तःकरण मे चेतनता और विवेकशीलता उत्पन्न होती है उस समय समझना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है।
सर्वद्वारेषु- भगवान ने पहले नवद्वारे पुरे देहि की बात कही थी। पुरञ्जन की कथा से नवद्वार के विषय में जाना भी था। चेतनता की दृष्टि से पाँच इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण चतुष्टय समझ सकते हैं।
पाँच तन्मात्राएँ – शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध हैं।
भगवान कहते हैं कि विवेक शक्ति से जान सकते हैं कि
- क्या सुनना है?
- क्या देखना है?
- क्या खाना है, कितना और कब खाना है?
- क्या पीना है?
- सभी इन्द्रियों से क्या-क्या करना है?
भगवान कहते हैं कि प्रकाश उपजायते – इसकी स्पष्टता रहती है, कोई असमञ्जस नहीं होता कि क्या करना है? मुझे कैसा जीवन जीना है, क्या खाना है, क्या पीना है, क्या करना है। इस विषय में जिसके मन में कोई ऊहापोह नहीं है। वह इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट है कि मुझे क्या करना है।
जिस समय इस देह के अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है उस समय ऐसा जानना चाहिए कि मैं एकदम स्पष्टता से जान सकता हूँ कि मुझे क्या करना है।
जिस प्रकार अर्जुन ने दूसरे अध्याय के सातवें श्लोक में पूछा -
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥2.7॥
अर्जुन में सात्त्विकता की अधिकता है, उनका विवेक जाग्रत है। मोह काल में भी उन्हें दिख रहा है कि वह कायरता से भर गये हैं। वह भगवान से कहते हैं कि उन्हें पता है कि वह उस कार्य को करने के लिए प्रवृत्त हो रहे हैं जो नहीं करने चाहिए। वह भगवान से कहते हैं कि भगवान उन्हें बताएँ कि उनका कल्याण किसमें हैं। विवेक की जाग्रति, सत्त्वगुण के कारण ही वह यह कह पाये। यदि राजसी प्रवृत्ति या तामसिक प्रवृत्ति होती तो वह इसे जान भी नहीं सकते थे, परन्तु अर्जुन स्वयं कह रहे हैं कि मेरे अन्दर कायरता आ गई है।
हम में से भी कई लोग यह कहते हैं कि मुझे समझ तो आ रहा था कि यह ग़लत है, परन्तु अपने आप पर नियन्त्रण नहीं कर पाया। मन में आ रहा था कि अनुचित है, पर नियन्त्रण नहीं कर पाया। चाहता तो रोक सकता था, पर मोहवश रोक नहीं सका।
लोभः(फ्) प्रवृत्तिरारम्भः(ख्), कर्मणामशमः(स्) स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे भरतर्षभ॥14.12॥
विवेचन :- श्रीभगवान कहते हैं कि अर्जुन, रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति और भोगों की लालसा बढ़ जाती है। रजोगुण के बढ़ने पर स्वार्थ बुद्धि होगी, लोभ होगा, उसे विषय भोगों की लालसा होगी, उसमें अशान्ति होगी एवं लोभ का चिन्तन होगा तो वह कभी भी शान्ति से नहीं रह पाता। सदा सोचता है कि मैं अमुक काम कर लूँ। उसके मन में असन्तुष्टता रहती है। सभी गुणों में लोभ बहुत तङ्ग करता है।
भगवान कहते हैं जब रजोगुण बढ़ता है तो ये पाँच विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहङ्कार आ जाते हैं। इसमें चार विकार तो सीमित हैं। कामनाएँ असीमित होती हैं। अहङ्कार में भी हम हर समय नहीं रह सकते, परन्तु यह लोभ सदा ही रहता है, अनन्त है।
लोभ और मोह में अन्तर होता है
लोभ -
वस्तु से होता है, अपने को चाहिए, मुझे पैसा या उत्तम पदार्थ मिल जाए, मेरा घर बड़ा हो जाए।
मोह -
व्यक्ति से होता है, अपनों को चाहिए। मेरे बेटे का कारोबार बड़ा हो जाए, मेरी बेटी की शादी अच्छे घर में हो जाए, मेरे पोते का एडमिशन अच्छे स्कूल में हो जाए, यह कामना मोह है। अपने बच्चों के प्रति यह मोह बढ़ता ही जाता है।
जैसे- जैसे लोभ बढ़ता है रजोगुण बढ़ता है और ऱजोगुण की अधिकता होने से लोभ बढ़ता है। व्यक्ति को जितना ज्यादा लाभ होता जाता है उसका लोभ उतना ही बढ़ता रहता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं - जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥
गरीब व्यक्ति को धन का लोभ नहीं होता लेकिन धनवान व्यक्ति को धन का लोभ होता है। जब हमारे पास कम धन होता है तो हम दूसरों पर सरलता से व्यय कर देते हैं लेकिन धन बढ़ने पर सौ रुपए देने में भी उसे कष्ट होता है। जैसे – जैसे हमारी हैसियत बढ़ता जाती है हमारी कृपणता बढ़ती जाती है, उदारता घटती जाती है। एक गरीब व्यक्ति अपनी आय का जितना हिस्सा बाँट सकता है, एक धनवान व्यक्ति नहीं कर सकता।
लाभ से लोभ बढ़ता है, अतिलाभ से अतिलोभ बढ़ता है।
एक राजा के पास सोने का बड़ा भण्डार था। उसने तपस्या करके देवताओं से वरदान ले लिया कि जिसको छू लूँ वह सोना हो जाए। अन्त में उसने अपनी बेटी को ही छू दिया और वह सोने की हो गई।
परिवार के हर व्यक्ति के साथ हम ऐसा ही कर रहे हैं। लोभवश सम्बन्ध समाप्त कर रहे हैं।
लोभ के निम्न प्रकार हैं -
यश का लोभ - यह साधारण रूप में बुरा नहीं है परऩ्तु जब इस यश का लोभ बढ़ता है तो यह हानिकारक होता है। हम जो कुछ करते हैं उसकी प्रवृत्ति कार्य की नीयत से नहीं होती है, मुझे यश मिलेगा या नहीं, इस नीयत से होती है।
राज्य/सत्ता का लोभ - अपनी सीमाओं को बढ़ाने का लोभ। जिस प्रकार अमरीका विश्व में अपनी सेना बैठाकर दूसरों को लड़वा रहा है। यह राज्य को बढ़ाने का लोभ है।
ज़मीन/जायदाद बढ़ाने का लोभ - जिसके पास खाने-पीने की व्यवस्था हो गई, उसे प्रॉपर्टी का लोभ होने लगता है। स्त्रियों को गहनों का लोभ होता है, परन्तु प्रॉपर्टी बढ़ने से उसका क्या करोगे वह सिर्फ गिनती के लिए ही होती है, ऐसे ही आभूषणों के लिए भी है। चोरी के डर से पहन नहीं पाते हैं। जो लोभ में पड़ता है वह कभी भी सुख नहीं पा सकता, हमेशा दु:खी ही रहता है।
पद का लोभ - सामाजिक संस्थाओं में, ट्रस्टों में, अपनी लर्न गीता में भी बहुत से कार्यकर्ता हैं जो निष्काम काम करते हैं, परन्तु मैं अनेक संस्थाओं में कोई पद प्राप्त करूँ, यह लोभ बहुत परेशान करता है।
यदि कहीं आग लग जाए तो उसमें जल डालना पड़ता है, इसी प्रकार लोभ की आग में सन्तोष का जल डाल दिया जाए तो यह ठण्डा हो सकता है। हमारे अन्दर अगर लोभ है तो उसका एक ही उपाय है कि हम लोभ की अग्नि का शमन करने के लिए अपने जीवन में सन्तोष लाएँ। लोभ कभी भी शान्त नहीं होता। यदि लोभ को नहीं रोका जाए तो मनुष्य का पतन हो जाता है।
सीताराम सीताराम सीताराम कहिए।
जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए।।
भगवान कहते हैं कि रजोगुण बढ़ने पर लोभ उत्पन्न होता है। लोभ से वृत्ति बनती है, जिन बातों से मन में लोभ होता है हम उनको करने का प्रयास करते हैं। यदि एक बार वृत्ति बन गई तो उसे हर बार करने से वह वृत्ति प्रवृत्ति बन जाती है। फिर यह प्रवृत्ति हमारा आचरण बन जाता है। लोभपूर्ण आचरण जीवन में अशान्ति उत्पन्न करता है। जिसका जीवन जितना लोभग्रस्त होगा उसका जीवन उतना ही अशान्त होता है। जो व्यक्ति किसी बीमारी के लिए दवा खा रहे हैं जैसे – उच्च रक्तचाप। यदि वे अशान्ति चञ्चलता त्याग दें तो उनकी दवा बन्द हो सकती है।
सबसे अधिक चञ्चलता आँखों में होती है। किसी व्यक्ति का जीवन कितना अशान्त है वह उसकी आँखों से प्रकट होता है।
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च, प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे कुरुनन्दन॥14.13॥
विवेचन :- हे अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर अन्तः करण और इन्द्रियों में अप्रकाश, कर्त्तव्य कार्य के कर्मों में अप्रवृत्ति, प्रमाद, निद्रा की वृद्धि होती है।
भगवान ने कहा कि तमोगुण सत्त्वगुण का विपरीत है।
अप्रकाश - तमोगुणी व्यक्ति को समझ नहीं आता कि क्या उचित है। बताने पर भी कि क्या सही है, वह उससे विपरीत ही चलता है। दुनिया कहती है कि तुम्हारा भला इसमें है, परन्तु उसे वह नहीं करता वरन् वह जो उसके भले की बात करता है, उसी से झगड़ा करता है। जो उसका हित चाहता है वह उसी का नुकसान करता है। जो करना है वह नहीं करेंगे, करने योग्य कार्यों को नहीं करेंगे।
अप्रवृत्ति - हर काम को टालता रहता है। वह हर काम कल पर टालता है, परन्तु उसका कल कभी नहीं आता है। कर्त्तव्य कर्म को न करना।
प्रमाद - सारा समय उन कार्यों में लगाना जिनकी आवश्यकता नहीं। जिससे कुछ उत्पादन हो वह नहीं करता, सारा समय फालतू के काम में, फालतू की बातों में लगा रहता है। समय को फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि पर रील्स देखने में नष्ट करना।
मोह - अपने हानि-लाभ का भी विवेक नहीं होता। अपनी ही हानि करने को वह अपना हित मानता है।
जिस प्रकार पञ्चतन्त्र की कहानियों में एक मगरमच्छ और बन्दर की कहानी है। एक बन्दर रोज मगरमच्छ को एक मीठा बेर देता है। मगरमच्छ बेर अपनी स्त्री को दे देता है। बाद में वह कहती है कि मैं तो बन्दर का कलेजा ही खाऊँगी, वह कितना मीठा होगा। हानि-लाभ का विवेक नहीं किया और सदा के लिए बेर भी गँवा दिए।
प्रकृति का अर्थ है पदार्थ और क्रिया-
प्रत्येक पदार्थ व क्रिया इन तीनों गुणों से आच्छादित होती है, बात केवल प्रधानता की है।
हम अपने को सत्त्वगुणी मानते हैं तो क्या हम में वैसे लक्षण हैं? यदि लक्षण नहीं है तो इसका अर्थ नहीं कि हम सत्त्वगुणी नहीं हैं। ऐसे में अपने को रजोगुणी माने या तमोगुणी? हम पूरे दिन में कभी सतोगुणी होते हैं, तो कभी रजोगुणी और कभी तमोगुणी होते हैं।
व्यक्ति तदनुसार लक्षणम्, लक्षणमं तदनुसार व्यक्ति:।
जैसा व्यक्ति होता है उसके अनुसार उसके लक्षण होते हैं या जैसे लक्षण होते हैं उसके अनुसार उसका व्यक्तित्व होता है।
गुणत्रय - सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के निम्न लक्षण होते हैं:
https://drive.google.com/open?id=1KGrIHuHaZ_FB1I1wT6eGBmMKn3CcpVax&usp=drive_fs
1. व्यवहार :-
सत्त्वगुण- सन्तुष्ट
सत्त्वगुणी किसी भी प्रकार की परिस्थिति में सन्तुष्ट रहता है, वह हमेशा भगवान को धन्यवाद करता है।
भगवान राम ने माता शबरी को नवधा भक्ति का ज्ञान देते समय आठवीं भक्ति के विषय में कहा – आठव जथा लाभ संतोषा
गीताजी के बारहवें अध्याय में भगवान कृष्ण कहते हैं – सन्तुष्टः येन केन चित्त्।।
रजोगुणी - असन्तुष्ट
रजोगुणी यही कहता है कि यदि मेरा अमुक काम हो जाए तो मैं सन्तुष्ट हो जाऊँ। सारा दिन इसी काम में माथा पच्ची करता है। होना तो सन्तोषी चाहता है पर कामनाएँ समाप्त नहीं होतीँ।
तमोगुणी – आलस्य से सन्तुष्ट
देखने में सतोगुणी के जैसा ही लगता है। आलस में वह सन्तुष्ट है। काम करने की प्रवृत्ति नहीं है। दूसरों की प्रगति से असन्तोष होता है।
2. वाणी :-
सतोगुणी - सत्य बोलता है और सबसे प्रिय बात करता है। जिसकी वाणी धीमी है।
रहीमदास जी ने लिखा है-
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।।
रजोगुणी - दम्भी और जोर से बोलने वाले होते हैं। वह अपनी वाणी से सबको नीचा दिखाते हैं।
ऐसी वाणी बोलिए, सबसे झगड़ा होए।
लेकिन उससे झगड़ा न करें, जो तुमसे तगड़ा होए।।
तमोगुणी - विवेकहीन
तमोगुणी हर किसी से झगड़ा कर लेता है। बिना कारण अपशब्द बोलते हैं। ऐसे लोगों को चुप कराना पड़ता है।
3. भोजन - जैसा अन्न वैसा मन।
सत्त्वगुणी - ऐसा व्यक्ति अपनी भूख मिटाने के लिए कुछ भी सात्त्विक भोजन खाकर सन्तुष्ट हो जाता है।
रजोगुणी - इनके जीवन में भूख का महत्त्व कम अपितु स्वाद का महत्त्व अधिक होता है। इन्हें भूख तो है लेकिन मनपसन्द खाना नहीं है तो वह छोड़ देता है। भूख नहीं है लेकिन मनपसन्द खाना सामने है तो खा लेगा।
तमोगुणी – व्यक्ति भक्ष्य-अभक्ष्य, शुद्ध- अशुद्ध, बासी- ताजा भोजन का विचार नहीं करते। समय, काल, स्थान, शौच –अशौच का भी विचार नहीं करते। जो भी पसन्द आया खा लेते हैं, चाहे वह शरीर को हानि करे।
4. वस्त्र :-
सतोगुणी - सफेद, हल्के रङ्ग के और सुविधाजनक वस्त्र होते हैं।
रजोगुणी - चटक वस्त्र पहनना पसन्द है, चाहे यह असुविधाजनक हो, परन्तु फैशन का ध्यान रखता है।
तमोगुणी - मैले, असुविधाजनक और असभ्य वस्त्र पहनता है। फटे हुए कपड़े भी पहन लेता है।
5. आवास :
सत्त्वगुणी- घर एकदम साफ और शुद्ध होगा, जिसमें से खुली हवा आती रहती है।
रजोगुणी - घर थोड़ा विलासिता पूर्ण होता है। उसमें महङ्गे टाइल लगे होते हैं और महङ्गा-महङ्गा सामान लगा रहता है।
तमोगुणी - घर अव्यवस्थित और अशुद्ध होता है। उसके घर में न तो सफाई होती है और बर्तन भी जूठे पड़े रहते हैं।
6. निवेश :-
सत्त्वगुणी - व्यक्ति दान-पुण्य में पैसा लगता है, जिससे उसका आगे का जन्म सफल हो। वह किसान विकास पत्र, एफ डी, पी पी.एफ और एल.आई.सी में भी पैसा लगाता है।
रजोगुणी - अपना पैसा शेयर या सट्टे में लगाता है।
तमोगुणी - अपना पैसा जुए में उड़ाता है। काम एक बार में हो जाए। दस रूपये के सौ रूपये बन जाएँ।
7. कार्य करने की प्रणाली :-
सत्त्वगुणी - कर्त्तव्य के रूप में कार्य करता है। उसका क्या कर्त्तव्य है, वह अपने श्रेय का ध्यान रखता है।
रजोगुणी – मान के लिए करता है। वह श्रेय को जानता है, परन्तु उसकी दृष्टि प्रेय पर होती है। वह वही करता है जो उसका मन करता है।
तमोगुणी व्यक्ति – जबरदस्ती कुछ करवा लिया जाए तो मजबूरीवश वह कुछ काम कर देता है।
एक व्यक्ति बहुत शराब पीता था। उसकी पत्नी दूसरों के घर का काम करती थी। एक दिन कथा चल रही थी तो पत्नी पति को लेकर गुरु जी के पास गई। गुरु जी से बोली कि आप मेरे पति को समझाओ। गुरु जी ने उस व्यक्ति से कहा कि तुम अपने पैसे घर में दिया करो, दारू में क्यों उड़ाते हो? व्यक्ति ने सन्त को प्रणाम किया और पूछा कि क्या आप भगवान को मानते हो? सन्त ने कहा हम तो मानते हैं। दिन भर भजन करते हैं। व्यक्ति ने कहा कि यदि मानते होते तो ऐसी बात न करते? व्यक्ति बोला- आप कहते हो, 'सबके दाता राम'। मैं भी मानता हूँ तभी मैंने एक भी पैसा घर में नहीं दिया फिर भी मेरा बच्चा भूखा नहीं रहा? रोटी तो सबको भगवान देता है, परन्तु दारू नहीं देता, इसलिए मैं दारू के लिए कमाता हूँ।
8. स्वभाव :-
सत्त्वगुणी व्यक्ति जो करता है वह दूसरों के हित के लिए करता है।
लङ्का काण्ड में जब सेना समुद्र पार पहुँच गई तो भगवान राम ने कहा कि अन्तिम प्रयास शान्ति का करेंगे। एक शान्ति दूत रावण को समझाने के लिए जाएगा। भगवान ने अङ्गद को भेजा तो अङ्गद ने रामजी से पूछा कि मुझे वहाँ क्या कहना है? इस पर श्रीराम जी ने कहा-
काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई॥
शत्रु से वो ही बातचीत करना, जिससे हमारा काम हो जाये और उसका भी कल्याण हो। हमारा काम भी बन जाए और उसका भी हित हो जाए। भगवान ऐसे हैं। रावण ने सीता माता का अपहरण किया फिर भी उसके मङ्गल की कामना करते हैं। सबके हित की कामना करते हैं, जिससे अपना भी अच्छा हो और दूसरे का भी हित हो।
सर्वे भवन्तु सुखिन, सर्वे सन्तु निरामया।
रजोगुणी - रजोगुणी के लिए अपना स्वार्थ साधना सर्वोपरि होता है।
कई बार तो सत्सङ्ग में जाने वाले भी कुछ ऐसे ही करते हैं एक बार सुन्दरकाण्ड का पाठ हो रहा था। वहाँ बहुत सारी चप्पलें पड़ी थीं। एक आदमी ने अपनी चप्पल की जगह बनाने के लिए सारी चप्पल पैर से उधर हटा कर ढेर कर दी और अपनी चप्पल उतार कर अन्दर चला गया। चाहे सत्सङ्ग के बाद अन्य लोगों को अपनी चप्पलें ढूँढने में कितनी ही कठिनाई क्यों न हो। रजोगुणी का तो यही ध्येय वाक्य रहता है- अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता।
तमोगुणी-
पर सम्पदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं।
वे दूसरों का धन बर्बाद करके खुद भी नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओला भी नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार ओले फसल को नुकसान पहुँचाते हैं और खुद भी नष्ट हो जाते हैं। तमोगुणी व्यक्ति भी अपने हित का विचार नहीं करता और दूसरों के भी हित का विचार नहीं करता है।
9. रुचि :-
सत्त्वगुणी - धर्म, कार्य और सेवा में रुचि रहती है।
रजोगुणी-
दम्भ और मान में रुचि रहती है। वह नाम, यश, लोभ बढ़ाने में सारा दिन काम करते हैं।
तमोगुणी - हमेशा अधर्म की बातें करता है और विपरीत काम करता है। धर्म में भी अधर्म को ढूँढ़ता है।
10. इच्छाएँ :-
सत्त्वगुणी - आवश्यकताओं को महत्त्व देता है।
रजोगुणी - इच्छाओं को आवश्यकता बना लेता है।
तमोगुणी - दूसरों की कामनाओं में बाधा बनता है।
11. संग :-
सत्त्वगुणी - सज्जनों का सङ्ग करता है, उसे अच्छे लोगों के साथ रहना पसन्द है।
रजोगुणी - सदैव धनी व बड़े लोगों का सङ्ग करता है।
तमोगुणी - अच्छे लोगों से दूर रहता है।
सङ्ग के महत्त्व को बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं -
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥
धूल यदि वायु का सङ्ग करती है तो आकाश में जाती है लेकिन जल के सङ्ग में कीचड़ बनकर जमीन पर फैल जाती है। हम वायु का सङ्ग करके अपने को ऊपर ले जाते हैं और कीचड़ का सङ्ग करके अपने जीवन को कीचड़ बना देते हैं।
एक बार गाँधी जी के पास एक व्यक्ति तीन पन्ने का पत्र लेकर गया। उसमें उनकी बड़ी आलोचनाएँ लिखी थी। गाँधी जी ने पत्र पढ़कर उस पत्र में लगी पिन को निकालकर अपने पास रख लिया और वह पत्र उसे वापस दे दिया। व्यक्ति ने पूछा तो गाँधी जी ने कहा कि जो मेरे काम का था वह मैंने अपने पास रख लिया और बिना काम का आपको दे दिया। हम में से कोई होता तो आलोचना पढ़कर चिढ़ जाता।
हमें भी अपने काम की बातें रख लेनी चाहिए और व्यर्थ बात छोड़ देनी चाहिए।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु, प्रलयं(म्) याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां(म्) लोकान्, अमलान्प्रतिपद्यते॥14.14॥
विवेचन :- श्रीभगवान जी कहते हैं, मनुष्य जिस वृत्ति के साथ मृत्यु को प्राप्त होता है उसके अनुसार सब योनियाँ भी अलग-अलग होती हैं। मनुष्य को उसके कर्मों का फल मिलता है।
जब मनुष्य सत्त्व गुण की वृत्ति में मृत्यु को प्राप्त होता है तो उत्तम कर्म करने वाले निर्मल, दिव्य, स्वर्गादि उत्तम लोक को प्राप्त होता है।
रजसि प्रलयं(ङ्) गत्वा, कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि, मूढयोनिषु जायते॥14.15॥
रजोगुण के बढ़ने से मनुष्य वापस मनुष्य लोक में आता है।
तमोगुण बढ़ने से मनुष्य मूढ़ योनि में आता है।
कर्मणः(स्) सुकृतस्याहुः(स्), सात्त्विकं(न्) निर्मलं(म्) फलम्।
रजसस्तु फलं(न्) दुःखम्, अज्ञानं(न्) तमसः(फ्) फलम्॥14.16॥
विवेचन :- श्रेष्ठ कर्म का फल सात्त्विक सुख, ज्ञान, वैराग्य है। राजस कर्म का फल दुःख और तामस का फल अज्ञानता है।
श्रीभगवान अर्जुन से कहते हैं कि जब हम सुख, शान्ति सन्तोष का अनुभव करते हैं तो सत्त्वगुण होगा।
रजोगुण से लोभ होता है। रजोगुणी जल्दी परेशान हो जाते हैं, उन्हें दुःख भी जल्दी अनुभव होने लगता है।
तामसिक व्यक्ति हमेशा अज्ञान में रहता है, वह खुद की हानि कर लेता है। उसे विचार भी नहीं होता कि वह खुद की हानि कर रहा है। तमोगुणी हमेशा विपरीत चलते हैं, उनके सारे काम उल्टे होते हैं।
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं(म्), रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो, भवतोऽज्ञानमेव च॥14.17॥
विवेचन:- सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है। रजोगुण से लोभ तथा तमोगुण से मोह, प्रमाद और अज्ञानता उत्पन्न होती है।
ऊर्ध्वं(ङ्) गच्छन्ति सत्त्वस्था, मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था, अधो गच्छन्ति तामसाः॥14.18॥
विवेचन:- सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य स्वर्ग आदि उच्च लोकों को जाते हैं। रजोगुणी मनुष्य मृत्युलोक में जन्म लेते हैं और तमोगुण के कारण निद्रा, प्रमाद, आलस्य आदि में तामस पुरुष अधोगति को अर्थात् पशु-पक्षी, आदि नीची योनियों को तथा नर्क में भूत-पिशाच की योनियों को प्राप्त होते हैं।
नान्यं(ङ्) गुणेभ्यः(ख्) कर्तारं(म्), यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं(म्) वेत्ति, मद्भावं(म्) सोऽधिगच्छति॥14.19॥
विवेचन :- अर्जुन जिस समय दृष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से परे सच्चिदानन्द स्वरूप मुझ परमात्मा के तत्त्व को जानता है, उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त करता है।
गुणानेतानतीत्य त्रीन्, देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखै:(र्), विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥14.20॥
विवेचन:- विवेकी मनुष्य शरीर की उत्पत्ति के कारण इन तीनों गुणों का उल्लङ्घन करके, इनसे पार जाकर, जन्म मृत्यु, सब प्रकार के दुःखों से मुक्त होकर परमानन्द को प्राप्त होकर अमरता का अनुभव करते हैं और भगवान को प्राप्त कर लेते हैं।
अर्जुन उवाच
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतान्, अतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः(ख्) कथं(ञ्) चैतांस्, त्रीन्गुणानतिवर्तते॥14.21॥
श्रीभगवान ने कहा कि गुणातीत के लक्षण उत्तम सिद्धों की बात है। ये प्राप्त नहीं किये जाते। जब मनुष्य उस स्थिति में पहुँच जाता है तो स्वयं ही घटते हैं।
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं(ञ्) च प्रवृत्तिं(ञ्) च, मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि, न निवृत्तानि काङ्क्षति॥14.22॥
विवेचन :- इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण बोले, हे अर्जुन! ऐसा पुरुष सत्त्व गुण के कारण प्रकाश को, रजोगुण के कारण प्रवृत्ति को और तमोगुण के कारण मोह की प्रवृत्ति के लिए उत्सुक नहीं होता है और न निवृत होने पर उनकी आकाङ्क्षा करता है।
गुणातीत व्यक्ति न तो कर्मों में प्रवृत्त होता है और न ही उन्हें करने का भाव रखता है। वह सहज स्थिति में आ जाता है।
उदासीनवदासीनो, गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव, योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥14.23॥
विवेचन :- जो साक्षी के सदृश, ऊपर बैठकर बिल्कुल निरपेक्ष भाव से, साक्षी भाव से गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता और गुणों ही गुणों में लगा रहता है।
गुणातीत स्थिति में शरीर को भूख लग रही थी, भोजन मिल गया तो खा लिया। आँखों ने भोजन देखा, हाथों ने भोजन को उठाया और मुख ने भोजन को खा लिया और पेट ने भोजन को पचा लिया। मैंने कुछ नहीं किया। जबकि हम कहते हैं; मुझे भूख लगी, मैंने भोजन देखा, मैंने भोजन उठा कर खाया, लेकिन हम यह कभी नहीं कहते कि हमने भोजन पचाया। ऐसे ही भोजन पचाने के भाव में हम साक्षी हैं।
साक्षी भाव में गुणातीत बाकी बातों को भूल जाते हैं। कोई अन्तर नहीं पड़ता है क्योंकि भोजन भी शरीर करता है और पचाता भी शरीर ही है।
एक में कर्त्ता भाव है और एक में कर्त्ता भाव नहीं है। जहाँ कर्त्ता भाव नहीं है वहाँ गुणातीत है।
समदुःखसुखः(स्) स्वस्थः(स्), समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर:(स्), तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥14.24॥
विवेचन :- जो निरन्तर आत्म भाव में सुख और दुःख को समभाव से देखता है। वह सुख में प्रसन्न नहीं होता और दुःख में दुःखी नहीं होता है, सम रहता है। मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण के प्रति समान भाव रखता है। जो प्रिय और अप्रिय दोनों में ही में सम रहता है, निन्दा एवं प्रशंसा से प्रभावित नहीं होता। सबको समान भाव से देखता है। सब को समान मान-सम्मान देता है, समभावी होता है, समदर्शी होता है और सन्तुष्ट रहता है, ऐसा ही मनुष्य गुणातीत कहलाता है।
आजकल लोग घर में अलग-अलग प्रजाति के कुत्ते पालते हैं, उसे अपने साथ बिस्तर पर सुलाते हैं। कभी-कभी तो अपने साथ डाइनिङ्ग टेबल पर भी बिठा लेते हैं और कई बार तो वह उनकी प्लेट में से ही खाना खाता है। कुत्ते में भगवान देखने वाले गुणातीत जोगियों को हम प्रणाम करते हैं। ऐसा मानना कि उस कुत्ते में भगवान है, अच्छी बात है। उसको भोजन देना भी अच्छी बात है, लेकिन उसको अपने साथ अपनी प्लेट में भोजन कराना मूर्खता है। कुत्ते के साथ, माँ-बाप और गुरु के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करूँगा। ऐसे समवर्तन की आज्ञा शास्त्रों में कहीं नहीं है।
सबमें परमात्मा देखना परन्तु जो जैसी योग्यता रखता है वैसा व्यवहार करना अलग बात है। योगी भी मिट्टी, पत्थर और सोने में एक भाव रखता है, परन्तु व्यवहार अलग-अलग करता है।
हमारे यहाँ समदर्शन की बात कही गई है समवर्तन की नहीं।
मानापमानयोस्तुल्य:(स्), तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी, गुणातीतः(स्) स उच्यते॥14.25॥
विवेचन :- जो पुरुष मान और अपमान, मित्र और शत्रु सभी परिस्थितियों का परित्याग कर हर परिस्थिति में समान रहता है और अपने समस्त कर्त्तव्यों के निर्वहन में कर्तापन के अभिमान से रहित है, ऐसे ही पुरुष को गुणातीत कहा जाता है।
मां(ञ्) च योऽव्यभिचारेण, भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्, ब्रह्मभूयाय कल्पते॥14.26॥
विवेचन :- जो पुरुष अव्यभिचारिणी भक्ति के द्वारा मुझको निरन्तर भजता है वह भी इन तीन गुणों को लाँघकर भली-भाँति इस लोक को प्राप्त करने योग्य हो जाता है।
भगवान ने अव्यभिचारिणी भक्ति के बारे में बताया। इस भक्ति का कुछ लोग ग़लत अर्थ लगाते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि मैं तो रामजी का भक्त हूँ, मैं शिवजी की पूजा नहीं कर सकता। मैं श्रीकृष्ण का भक्त हूँ मैं गणेशजी, रामजी या शिवजी की पूजा नहीं कर सकता। यह अव्यभिचारिणी भक्ति नहीं है, यह अनाड़ीपन है।
अव्यभिचारिणी भक्ति का अर्थ है कि, कुल, जाति, संसार का आश्रय न लेकर भगवान पर निर्भर रहना। जो इस संसार का आश्रय छोड़कर परमात्मा का आश्रय करता है, उसकी भक्ति अव्यभिचारिणी है।
दस सम्बन्ध बताए गए हैं जहाँ मनुष्य की बुद्धि फँसती है।
श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी का एक बहुत सुन्दर दोहा है -
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
माता-पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, हित करने वाले मित्र और परिवार इन सबके ममत्वरूपी धागों को बटोरकर उन सबकी एक डोरी बटकर उससे अपने मन को मेरे चरणों में बाँध दो, अर्थात सारे सांसारिक सम्बन्धों को भगवान को अर्पित कर दो। मन में यह भाव रखो, भगवान यह सब तो आपका ही है और मैं भी आपका ही हूँ। जिस मनुष्य ने यह सब कर लिया, वही गुणातीत है।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्, अमृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य, सुखस्यैकान्तिकस्य च॥14.27॥
विवेचन :- श्रीभगवान कहते हैं - हे अर्जुन! उस अविनाशी परब्रह्म, अमृत का और नित्य धर्म के अखण्ड सुख का श्रेय मैं हूँ। एकमात्र आश्रय सिर्फ मैं ही हूँ। जो मेरे सिवाय कुछ नहीं जानता उसे मेरे सिवाय दूसरा कोई उपाय नहीं मिलता। जिसके कण-कण में ईश्वर समाए हैं, वही गुणातीत है।
एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास।
सुख की कामना है, तो एक ही सूत्र है – शरणागति
गीता जी के अट्ठारहवें अध्याय में श्रीभगवान कहते हैं मामेकं शरणं व्रज
परमात्मा को तुम कैसे भी साकार, निराकार या किसी भी भाव से याद करो। ईश्वर ही सारे आनन्द का आनन्दाश्रय है, जो इस बात को समझ गया, वह योगी योनि को प्राप्त करता है।
॥ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥
हरि ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘गुणत्रयविभागयोग’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
इस प्रकार इन तीन गुणों की विस्तृत व्याख्या के सङ्ग इस ज्ञानमय सत्र एवं अध्याय का समापन हरिनाम सङ्कीर्तन के साथ हुआ।
हरि शरणं हरि शरणं हरि शरणं हरि शरणं।
प्रश्नोत्तर:-
प्रश्नकर्ता:— शिवशंकर भैया
प्रश्न:- गुण ही गुण में बरत रहे हैं इसका मतलब क्या है?
उत्तर:- शरीर को भूख लगी है, हाथ भोजन को उठा रहा है, आँखें भोजन को देख रही हैं, मुँह खा रहा है
मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ। मैं साक्षी भाव से देख रहा हूँ। जिसका जो कार्य है वह कर रहा है, मैं अनिर्लिप्त साक्षी भाव से देख रहा हूँ। अपने कर्तापन के भाव को उसमें से हटा देना ही इसका तात्पर्य है।
प्रश्न कर्ता:- अनिता दीदी
प्रश्न:- पूजा के पश्चात् भगवान से कुछ माँगना रजोगुण है क्या?
उत्तर:- कुछ माँगना कोई आपत्ति की बात नहीं है। न कहने पर भी मन में वही भाव आयेंगे। यह रजोगुण तो है, किन्तु यदि बच्चा कुछ माँगता है तो यह दोष नहीं है।
प्रश्नकर्ता:- बजरंग भैया
प्रश्न:- वैश्य जाति में रजोगुण को प्रधानता दी गई है, हम अपने सतोगुण को कैसे बढायें?
उत्तर:- सभी जातियों में रजोगुण को प्रधानता दी गई है। इसी कारण से बार बार जन्म लेकर संसार में पड़े रहते हैं। सतोगुण को अभ्यास एवं ध्यान द्वारा बढ़ाया जा सकता है।
प्रश्नकर्ता:- श्यामा दीदी
प्रश्न:- तमोगुण कैसे बढ़ जाते हैं? क्या उपाय करें कि यह न बढ़ें?
उत्तर:- जब हर समय लेटे रहने का मन हो, किसी काम में मन न लगे तो समझना चाहिए कि तमोगुण बढ़ गया है। अपनी वृत्ति को जितना सतोगुण में लगा कर रखेंगे, तमोगुण को बढ़ने का अवकाश नहीं मिलेगा।
प्रश्नकर्ता:- रश्मि सिंह दीदी
प्रश्न:- क्या महिलायें शङ्ख बजा सकती है?
उत्तर:- हाँ महिलायें शङ्ख बजा सकती हैं। शास्त्रों में महिलाओं के शङ्ख बजाने का कोई निषेध नहीं है।
प्रश्नकर्ता:- राकेश भैया
प्रश्न:- यह समस्त सृष्टि सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण से बनी हुई है, तब आकाश, तारे, नदी, पहाड़, वृक्ष-लताओं में कैसे सतोगुण गुण विद्यमान हैं?
उत्तर:- सतोगुण सबमें ही विद्यमान है। एक पदार्थ है, एक क्रिया है। हम क्रिया में ही देख पाते हैं। न्यूट्रॉन, प्रोटान, इलेक्ट्रॉन सब में एक हैं, इसलिये सबमें सब गुण विद्यमान हैं।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय:।।