विवेचन सारांश
भक्तिमार्ग- सर्वश्रेष्ठ द्वार

ID: 4490
हिन्दी
शनिवार, 09 मार्च 2024
अध्याय 12: भक्तियोग
1/2 (श्लोक 1-10)
विवेचक: गीता विशारद डॉ आशू जी गोयल


दीप प्रज्वलन एवं गुरु वन्दना के साथ अत्यन्त ज्ञान एवं भक्ति युक्त अध्याय का प्रारम्भ हुआ। स्तर एक में कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो पहली बार गीता जी के श्लोक सीख रहे हैं किन्तु गुरु कृपा एवं भगवत् कृपा से सभी कार्य सम्भव हो जाते हैं।

अठ्ठारहवें अध्याय में श्रीभगवान ने कहा है कि जो भी गीता पढ़ता है वह मुझको प्राप्त हो जाता है। हम गीता जी के श्लोक पढ़ रहे हैं या सीख रहे हैं तो हमने भगवान या गीता जी को नहीं चुना है, बल्कि पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण एवं पूर्वजों के आशीर्वाद से हम गीता जी को सुन पा रहे हैं, समझ पा रहें हैं। यह हमारा भाग्योदय है और भगवान ने ही हमें चुना है। भगवान जिन पर कृपा करते हैं वही गीता जी को समझ पाते हैं।
 
छल से दुर्योधन ने पाण्डवों को वनवास भेज दिया। बारह वर्ष का वनवास एवं एक वर्ष का अज्ञातवास पाण्डवों ने पूरा किया किन्तु उसके बाद भी दुर्योधन ने कहा कि मैं राज्य नहीं दूॅंगा और न ही किसी तरह की बात करूॅंगा। भगवान ने कई बार शान्ति दूत भेजे और भगवान खुद भी शान्ति दूत बनकर गए और हस्तिनापुर जाकर कहा कि तुम्हारे यह पाॅंचो भाई तो बहुत ही संयमी है और युधिष्ठिर जी तो चक्रवर्ती सम्राट हैं। यह सारा राज्य उनका है, तुम्हें उन्ही को देना चाहिए। यदि तुम नहीं भी दोगे तो भाइयों पर कोई कलङ्क न आए इसलिए वे उसे भी त्याग देंगे किन्तु तुम पाॅंच भाइयों के पाॅंच गाॅंव दे दो जिसमें वह शान्ति से रह जाएँगे।

तब दुर्योधन ने कहा कि अरे ग्वाले! तुम पाॅंच गाॅंव की बात कर रहे हो, मैं सुई के नोक के बराबर भी भूमि नहीं दूॅंगा। मैं केवल इनको मारूॅंगा और तुम्हें भी गिरफ्तार कर लूॅंगा। श्रीभगवान कहते हैं कि तुम मुझे गिरफ्तार करोगे? मैं शान्ति दूत बन कर आया हूॅं और दूत को गिरफ्तार नहीं कर सकते। दुर्योधन कहता है कि मैं कोई नीति नहीं जानता। अतः भगवान ने अपना विराट रूप दिखाया और भगवान हस्तिनापुर के बाहर भी सेना खड़ी करके आए थे क्योंकि उन्हें अनुमान था कि ऐसा ही कुछ होगा। युधिष्ठिर तब भी युद्ध करना नहीं चाह रहे थे किन्तु कुन्ती ने बोला कि हे कृष्ण! तुम युधिष्ठिर को कहना कि क्षत्रिय युक्त कर्त्तव्य का समय आ गया है, जिसके लिए तुम्हें जन्म दिया गया था। अतः माता की आज्ञा थी तो युद्ध की तैयारी की गई।

पहले वह स्थान ढूॅंढा गया जहाॅं पर इतनी सङ्ख्या में लोग इकट्ठा हो सकें। वह पुण्य स्थल भी होना चाहिए ताकि सभी को सद्गति प्राप्त हो एवं यज्ञ शालाएँ या अशोक वाटिकाएँ बनाई जा सकें, ऐसा स्थान होना चाहिए। अतः कुरुक्षेत्र जहाॅं राजा कुरु ने  तपस्या की थी इस स्थान का चयन हुआ एवं श्रीभगवान ने अर्जुन के सारथी बनने के बाद रथ को गुरु द्रोणाचार्य एवं भीष्म पितामह  के रथ के पास ले जाकर खड़ा कर दिया। अतः गीता जी को उपन्यास जैसे नहीं पढ़ सकते। उन्हें एक श्रृङ्खला में ही पढ़ा जा सकता है। उन्नीस सौ तेरह (1913 ) में अङ्ग्रेजों ने मुम्बई में गेटवे ऑफ़ इण्डिया बनाया किन्तु उन्हें लगा कि दिल्ली से भारत में आना ज्यादा आसान है तब उन्होंने उन्नीस सौ इक्कीस (1921) में दिल्ली में इण्डिया गेट बनाया। अतः दिल्ली भारत का हृदय स्थान है और यदि गीता जी के हृदय स्थल को जानना है तो बारहवें अध्याय से ही प्रवेश करना पड़ता है।

बारहवाॅं अध्याय सबसे छोटा अध्याय है। यह भक्तियोग है और जीवन में भक्ति मिल गई तो मानो सब कुछ मिल गया। भक्तियोग से गीता जी का आरम्भ किया गया। इसके श्लोकों की सङ्ख्या एवं उसके अर्थो के अनुसार उनके क्रम बनाए गए। 

एक कहानी के अनुसार प्राचीन काल में नारायण स्वामी नाम के एक विद्वान हुए। उनकी जो भक्ति थी वह काफी गहन थी एवं उन्हें ईश्वर के दर्शन होते थे‌। उसी काल में एक श्रवण नाम के विद्वान भी थे। श्रवण ने भी ज्ञान मार्ग का अभ्यास किया था। एक बार उनके मन में जिज्ञासा उठी कि नारायण स्वामी से भक्ति का उपदेश लेकर आएँ। उन्होंने नारायण स्वामी के घर जाकर बड़े विनम्र भाव से कहा कि मैं आपसे भक्ति मार्ग का उपदेश लेने आया हूॅं, कृपया मुझे भक्ति का उपदेश दीजिए।

नारायणस्वामी ने कहा उपदेश तो करेंगे किन्तु पहले हाथ पैर धो लीजिए, जलपान कर लीजिए। वह हाथ-पैर धोकर आए। नारायण स्वामी ने एक गिलास में जल लाकर रख दिया। थोड़ा सा जल पीकर श्रवण ने गिलास रख दिया। उसके बाद नारायण स्वामी शरबत लेकर आए और उन्होंने इस भरे हुए जल में शरबत डालना शुरू किया। श्रवण आश्चर्यचकित हो गए कि जिस पात्र में पहले से ही जल था उसमें शरबत डाल रहे थे और वह रुके नहीं किन्तु शरबत डालते ही गए तो शरबत बाहर भी गिरने लगा। नारायण स्वामी ने कहा कि भरे हुए पात्र में और शरबत नहीं आ सकता और तुमने बहुत ज्यादा ज्ञान अर्जित किया हुआ है। अतः जो तुम्हारे मन में है और यदि तुम पहले से भरे हुए हो तो मेरा भक्ति का उपदेश तुम्हारे किसी काम का नहीं है। पहले अपने पूर्वाग्रहों को खाली करके आओ तभी हमसे उपदेश प्राप्त कर सकते हो। अतः जब हम गीता जी के विवेचन को सुनना प्रारम्भ कर रहे हैं तो पूर्वाग्रहों से एवं पुराने विचारों से अपने को खाली करें तभी नए विचार आ पाएँगे।

पुराना श्रृङ्गार उतारे बिना नया श्रृङ्गार कभी नहीं चढ़ता, अतः भगवान को भी जब तिलक लगाया जाता है तो पुराना हटाया जाता है‌। पार्लर में भी जब मेकअप किया जाता है तो पुराने मेकअप को हटाया जाता है‌। अतः नया ज्ञान प्राप्त करना है तो पूर्ण धारणा को  हटाना अति आवश्यक है।

सात सौ श्लोकों की यह गीता जी है। इसमें पाँच सौ चौहत्तर श्लोक  भगवान श्री कृष्ण जी के द्वारा कहे गए। सात सौ श्लोकों को महाभारत में वेदव्यास जी ने वैसा ही लिखा किन्तु वेद व्यासजी ने उन्हें अठ्ठारह अध्यायों में अथवा विषय अनुसार उन्हें अठ्ठारह योगो में बाॅंट दिया।

ज्ञानकर्मसन्यास योग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि। अतः ऐसे अठ्ठारह योग बनाए जिससे कि हम भगवान से जुड़ सकें। क्या हम सोच सकते हैं कि कृष्णजी और अर्जुन की आयु उस समय क्या थी। विद्वानों द्वारा बताई गई आयु के अनुसार चौरासी वर्ष के अर्जुन हैं एवं सत्तासी या उन्नासी वर्ष के कृष्ण हैं। अर्जुन कम पराक्रमी नहीं थे‌। बचपन में वह सबसे ज्यादा धन इकट्ठा करके लाए थे‌ इसलिए उन्हें धनञ्जय कहा गया था। उर्वशी के अनुरोध को भी अर्जुन ने ठुकरा दिया एवं मल्लिकार्जुन पर्वत भी उन्हीं के द्वारा जीता गया। ऐसे नीतिज्ञ अर्जुन जिन्होंने सेना को छोड़कर भगवान को चुना‌, वह भी युद्ध के मैदान में विचलित हो गए। भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर मानवजाति के कल्याण के लिए गीता का ज्ञान दिया है। इन श्लोकों के उच्चारण से ही आपके घर में शान्ति एवं प्रसन्नता आने लगेगी।

12.1

अर्जुन उवाच
एवं(म्) सततयुक्ता ये, भक्तास्त्वां(म्) पर्युपासते|
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं (न्), तेषां(ङ्) के योगवित्तमाः||1||

अर्जुन बोले - जो भक्त इस प्रकार (ग्यारवें अध्याय के पचपनवें श्लोक के अनुसार) निरन्तर आप में लगे रहकर आप (सगुण साकार) की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निर्गुण निराकार की ही (उपासना करते हैं), उन दोनों में से उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?

विवेचन- अर्जुन बोले -हे भगवन! एक भक्त आपकी निराकार भाव से उपासना करता है और दूसरा आपकी साकार रूप से उपासना करे तब कौन सा भक्त आपको अधिक प्रिय है? साकार रूप में हम भगवान के स्वरूप का चिन्तन करते हैं। उनका एक आकार होता है किन्तु निराकार का कोई रूप, कोई आकार नहीं होता है।

निराकार और साकार भक्ति में क्या अधिक श्रेष्ठ है? अर्जुन ने पूछा, उसी प्रकार ज्ञानयोग और भक्तियोग में आपके लिए कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है ।भगवान  ने उत्तम विधि बताई। उत्तम वक्ता पहले उत्तर देता है फिर उनका विस्तार करता है‌। भगवान विस्तृत तरीके से उत्तर देते हैं ।

12.2

श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां(न्), नित्ययुक्ता उपासते|
श्रद्धया परयोपेता:(स्), ते मे युक्ततमा मताः||2||

श्रीभगवान् बोले - मुझ में मन को लगाकर नित्य-निरन्तर मुझ में लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी (सगुण साकार की) उपासना करते हैं, वे मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।

विवेचन- जो अपने मन को मुझ में लगाकर नित्य, निरन्तर, मुझमें, मेरी भक्ति मे लगे हैं, ऐसे भक्त मेरे लिए श्रेष्ठ हैं। भक्ति वही है जो निरन्तर एवं नित्य हो।

एक बहुत सुन्दर प्रसङ्ग है। एक बार दो मित्र थे जिसमें से एक को अपनी शादी के कार्ड बाॅंटने जाना था। जब वह कार्ड बाॅंटने की सोच रहा था तभी उसका मित्र आ गया। वह उस मित्र को बोला कि तुम बहुत समय से आ गए, चलो कार्ड बाॅंटने चलें। तब दूसरा मित्र बोला कि मैं तो कार्ड बाॅंटने के लिए विशेष रूप से तैयार होकर नहीं आया। कार्ड कैसे बाटूॅंगा? तो पहला मित्र कहता है कि मेरे कपड़े पहन लो। दूसरा मित्र अन्दर गया और जो शादी के लिए पहले मित्र के मनपसन्द वस्त्र थे, उन्हें पहन कर आ गया। पहले मित्र को यह देखकर आश्चर्य और दु:ख हुआ लेकिन वह अपना मन मसोस कर रह‌ गया। कार्ड बाॅंटने जब पहले घर में गए तब घर वालों ने पूछा कि आपके साथ यह कौन हैं? उसने बोला यह मेरा मित्र है और यह वस्त्र भी मेरे ही हैें,अचानक मित्र के मुँह से निकल गया। दूसरे मित्र को अपमान महसूस हुआ एवं उसने बाहर आकर गुस्सा किया।

दूसरे घर में जब वह गए तो वहाँ फिर पूछा गया कि यह कौन है? तब वह बोला कि यह मेरा मित्र है और यह वस्त्र भी इसी के हैं। तीसरे घर में गए तो बोला कि यह मेरा मित्र है और इसके वस्त्रों के बारे में मैं कुछ नहीं जानता। चौथे घर में गए तब वह बोला कि यह मेरा मित्र है और इसके कपड़ों के बारे में तो मैं कुछ बोलूॅंगा ही नहीं।

इस सांसारिक बात को समझने से यह समझ आ जाता है कि जब व्यक्ति की वृत्ति किसी में अटक जाती है तो उसे हटाना बहुत मुश्किल होता है। पहले मित्र की वृत्ति उसके मनपसन्द वस्त्रों में ही उलझी हुई थी और न चाहते हुए भी उसकी बुद्धि बार-बार उसे वही दोहराने के लिए विवश कर रही थी। इसके विपरीत अगर इसी तरह वृत्ति भगवान में लगी हो कि संसार का सारा व्यवहार और कार्य करते हुए भी भगवान से ध्यान एक क्षण के लिए भी न छूटे तो भगवत् प्राप्ति का मार्ग अपने आप प्रशस्त होता जाता है। अपने मन को भगवान में लगाकर निरन्तर श्रद्धा युक्त होकर जो भगवान को भजते हैं वही योगी सबसे अधिक श्रीभगवान को प्रिय हैं। श्रीभगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि भक्तियोग एवं ज्ञानयोग में मुझे भक्तियोग अत्यन्त प्रिय है।

12.3

ये त्वक्षरमनिर्देश्यम्, अव्यक्तं(म्) पर्युपासते|
सर्वत्रगमचिन्त्यं(ञ्) च, कूटस्थमचलं(न्) ध्रुवम्||3||

और जो (अपने) इन्द्रिय समूह को वश में करके चिन्तन में न आने वाले, सब जगह परिपूर्ण, देखने में न आने वाले, निर्विकार, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की तत्परता से उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में प्रीति रखन् वाले (और) सब जगह समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।



 

12.4

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं(म्), सर्वत्र समबुद्धयः|
ते प्राप्नुवन्ति मामेव, सर्वभूतहिते रताः||4||

जो अपनी इन्द्रियों को वश में करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में रत और सब जगह समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

विवेचन- जो लोग श्रीभगवान को साकार रूप में न मान कर निराकार रूप से भजते हैं, वह भी एक प्रकार की भक्ति में ही लीन हैं।

श्रीभगवान बताते हैं कि निराकार प्रभु के आठ लक्षण हैं:-

1.अचिन्त्यम् : जिसका चिन्तन न हो सके।

2.अक्षरम् : जो घटता बढ़ता नहीं है।

3.अनिर्देश्यम् : जिसकी ओर इशारा न हो सके।

4.अव्यक्तम् : जिसे शब्दों में व्यक्त न किया जा सके।

5.अचलम् : अर्थात जो स्थिर है।

6.सर्वत्र : अर्थात जो सब जगह है।

7.कूटस्थ : जैसे लोहार के पास लोहे का पिण्ड होता है जिस पर रखकर वह लोहे के सभी सामान बनाता है लेकिन वह कूट कभी नहीं बदलता, उसके पास पीढ़ियों से चला आ रहा है। ऐसे ही ईश्वर कभी बदलते नहीं हैं, वे अचल हैं, एक ही जगह स्थिर हैं।

8.ध्रुवम् : अर्थात जो निश्चित है और हमेशा विद्यमान है।

श्रीभगवान कहते हैं कि ऐसा योगी जो निराकार की उपासना करता हुआ, समस्त भूत प्राणियों के हित में चिन्तन करता हुआ, सब में परमात्मा का भाव देखता है, वह योगी भी मुझको ही प्राप्त होता है।

12.5

क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्, अव्यक्तासक्तचेतसाम्|
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं(न्), देहवद्भिरवाप्यते||5||

अव्यक्त में आसक्त चित्त वाले उन साधकों को (अपने साधन में) कष्ट अधिक होता है; क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्त-विषयक गति कठिनता से प्राप्त की जाती है।

विवेचन- इस अव्यक्त की उपासना करना बहुत कठिन काम है। अपने को यह शरीर न मानना, इसके अतिरिक्त निराकार मार्ग के लिए कोई शर्त नहीं है। भजन करने के लिए कोई योग्यता या पात्रता नहीं चाहिए किन्तु निराकार की उपासना करने के लिए पहले मैं यह शरीर नहीं हूॅं, इस भावना के साथ जो पहुँच गया वही निराकार परब्रह्म की उपासना कर सकता है।

अपने को शरीर मानने वाला अव्यक्त, निराकार की उपासना के योग्य नहीं है। अर्जुन ने पूछा- यह बहुत कठिन है, यह कैसे हो पाएगा? भगवान ने कहा सब कुछ सम्भव है। नवधा भक्ति है, उसका आश्रय लो।

नवधा भक्ति अर्थात् -

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

श्रवण (परीक्षित जी ने सुनकर की), कीर्तन (शुकदेव जी ने कीर्तन करके की ), स्मरण (प्रह्लाद जी ने स्मरण करके की), पादसेवन (लक्ष्मी जी ने पैरों की सेवा करके की), अर्चन (पृथुराजा ने अर्चना करके की), वन्दन (अक्रूर ने वन्दना से की), दास्य (हनुमान जी ने दास बनकर की), सख्य (अर्जुन का दृष्टान्त सामने है) और आत्मनिवेदनम् (राजा बलि ने आत्मनिवेदन से की)।

तुम इनमें से किसी को भी अपना सकते हो। भक्ति के और भी मार्ग हैं जिसे भगवान आगे बताते हैं।

12.6

ये तु सर्वाणि कर्माणि, मयि सन्न्यस्य मत्पराः|
अनन्येनैव योगेन, मां(न्) ध्यायन्त उपासते||6||

परन्तु जो कर्मों को मेरे अर्पण करके (और) मेरे परायण होकर अनन्य योग (सम्बन्ध) से मेरा ही ध्यान करते हुए (मेरी) उपासना करते हैं।

विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पित कर जो यह मानते हैं कि जिस रूप में आपके द्वारा नियुक्त हूॅं, जो भी कर्म कर रहा हूॅं आपके कहने पर कर रहा हूॅं अतः मेरे सभी कर्म आपको अर्पण हैं। ऐसे भक्त निरन्तर मेरी ही उपासना करते हैं।

सब कुछ भगवानको ही अर्पण है, यदि यह भाव है तो भक्ति निश्चल है। मेरे मार्ग पर चलने वाले सम्पूर्ण कर्मों को मुझ में अर्पित कर देते हैं‌। आदि शङ्कराचार्य जी ने कहा है कि गृहस्थ को कम से कम पाॅंच देवों का पूजन रोज करना चाहिए। भगवान विष्णु की उपासना रोज करो, चाहे राम अथवा कृष्ण रूप में, दूसरी शिवजी की उपासना करनी चाहिए, तीसरी देवी की, चौथी गणेश जी की और सूर्य देव की उपासना रोज करना। पाॅंच देवताओं की उपासना अनिवार्य है।

गीता जी में सभी जगह श्रीभगवान उवाच  बोला गया क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीभगवान परम ब्रह्म परमात्मा का रूप है। यहाॅं श्रीभगवान से अभिप्राय केवल भगवान कृष्ण से नहीं। जिसके जो इष्ट हैं वह उन्हीं का रूप बन कर बोले हैं। राम की उपासना करने वालों के लिए राम, दुर्गा माता की उपासना करने वालों के लिए दुर्गा, जिसके मन का जैसा भाव श्रीभगवान उसके लिए वही रूप धारण कर सन्देश दे रहे हैं। परमपिता परमात्मा तो एक ही हैं लेकिन उनके अलग-अलग रूपों को हम मानते हैं। हम काशी विश्वनाथ चले जाएँ तब भी हम उनसे यही माँगे कि हे भगवान! हमारे इष्ट की भक्ति प्रबल हो। मथुरा-वृन्दावन चले जाएँ या देवी के धाम, हर जगह हम उन ईश्वर में अपने इष्ट के प्रति भक्ति के लिए ही प्रार्थना करें तो यह अत्यन्त श्रेष्ठ है। 

12.7

तेषामहं(म्) समुद्धर्ता, मृत्युसंसारसागरात्|
भवामि नचिरात्पार्थ, मय्यावेशितचेतसाम्||7||

हे पार्थ ! मुझ में आविष्ट चित्त वाले उन भक्तों का मैं मृत्युरूप संसार-समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।

 विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि ऐसे मुझ में चित्त लगाने वाले भक्तों को मैं मृत्यु रूपी संसार समुद्र से शीघ्र ही पार उतार देता हूँ।

अर्जुन कहते हैं कि क्या यही एक विकल्प है कि, मैं अनन्य भाव से, चित्त लगाकर और मन और बद्धि को आप में लगाकर आपकी भक्ति करूँ। क्या कोई और विकल्प नहीं हैं? श्रीभगवान कहते हैं कि आगे मैं वह भी बताता हूँ।

12.8

मय्येव मन आधत्स्व, मयि बुद्धिं(न्) निवेशय|
निवसिष्यसि मय्येव, अत ऊर्ध्वं(न्) न संशयः||8||

(तू) मुझ में मन को स्थापन कर (और) मुझ में ही बुद्धि को प्रविष्ट कर; इसके बाद (तू) मुझ में ही निवास करेगा (इसमें) संशय नहीं है।

विवेचन- श्रीभगवान अर्जुन को आगे बताते हैं कि भक्ति का एक मार्ग यह भी है कि तू मुझ में ही अपने मन और बुद्धि को लगा। तू अपने मन और बुद्धि को ईश्वर में समर्पित कर दे। उसके बाद तू जो कुछ भी करेगा वे सारे कर्म भी भगवान को ही अर्पण कर। मनुष्य का हर क्षण यही प्रयास रहे कि भगवान में ही मन और बुद्धि को समर्पित कर दूॅं।

श्रीभगवान अर्जुन को कहते हैं कि तुम मेरे बन्धु भी हो, सखा भी हो और भक्त भी हो इसलिए मैं तुम्हें और भी विकल्प देने जा रहा हूॅं।

12.9

अथ चित्तं(म्) समाधातुं(न्), न शक्नोषि मयि स्थिरम्|
अभ्यासयोगेन ततो, मामिच्छाप्तुं(न्) धनञ्जय||9||

अगर (तू) मन को मुझ में अचल भाव से स्थिर (अर्पण) करने में अपने को समर्थ नहीं मानता, तो हे धनञ्जय ! अभ्यास योग के द्वारा (तू) मेरी प्राप्ति की इच्छा कर।

विवेचन- श्रीभगवान आगे कहते हैं कि यदि तुम अपने मन और बुद्धि  को मुझको समर्पित नहीं कर सकते हो तो अभ्यास योग के द्वारा मुझको  प्राप्त करना ।

"करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान"

अभ्यास से करने से जड़मति भी सुजान हो जाता है अतः तुम जो भी अभ्यास करोगे वह कार्य हो जाएगा।

एक देवरानी और जेठानी थीं। उनकी आपस में बनती नहीं थी। वे अड़ोस-पड़ोस में रहती थीं। एक बार एक सन्त व्यक्ति ने जेठानी को बोला कि तुम शिवजी के मन्दिर में नियम से रोज दीपक जलाओ तुम्हारी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण होगी। यह बात देवरानी ने सुनी तो उसने सोचा कि यदि जेठानी ऐसा करेगी तो उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाएगी। अतः जब रोज जेठानी दीपक जलाने जाती तो वह वहाॅं पीछे से जाकर दीपक को बुझा देती। ऐसा रोज़ होता था किन्तु एक दिन भीषण बारिश हो रही थी तो जेठानी ने सोचा कि ऐसी बारिश में नहीं जा सकती, कल जाकर दो दीपक जला दूॅंगी। किन्तु देवरानी ने सोचा कि ऐसा तो नहीं हो सकता कि बारिश में जेठानी जी दीपक जलाने के लिए न गई हों अतः वह भीषण बारिश में भी दीपक बुझाने के लिए गई। वहाॅं पहले से ही कल वाला दीपक बुझा हुआ रखा था। देवरानी ने सोचा कि यह बारिश और हवा से बुझ गया है अतः उसने फिर से दीपक जलाया और उसको बुझा दिया। उसके ऐसा करते ही शिवजी प्रकट हो गए और बोले मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हूँ। अपनी जेठानी के प्रति तू अपने मन को पवित्र कर ले, भाव को निर्मल कर ले, इतना कह कर उसे आशीर्वाद दिया। देवरानी एवं जेठानी दोनों की भक्ति सफल हो गई। भक्ति सिद्ध होती है अभ्यास से, अतः भगवान को तो अभ्यास से भी प्राप्त किया जा सकता है लेकिन अभ्यास में निरन्तरता और नित्यता का बहुत महत्त्व होता है। अर्जुन श्रीभगवान से और भी विकल्पों की चाह रखे हुए हैं तो भगवान आगे उन्हें और भी विकल्प बताते हैं।

12.10

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि, मत्कर्मपरमो भव|
मदर्थमपि कर्माणि, कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि||10||

(अगर तू) अभ्यास (योग) में भी (अपने को) असमर्थ (पाता) है, (तो) मेरे लिये कर्म करने के परायण हो जा। मेरे लिये कर्मों को करता हुआ भी (तू) सिद्धि को प्राप्त हो जायगा।

विवेचन -श्रीभगवान आगे कहते हैं कि हे अर्जुन! यदि तुम उपरोक्त अभ्यास को भी असम्भव मानते हो तो जो भी कर्म करते हो वह भगवान की प्रसन्नता के लिए करो और जो भी कर्म करोगे उसका उद्देश्य भी मेरी प्राप्ति हो, तब तुम अपने मन, बुद्धि एवं सब कर्मों के फल का त्याग करो और सब कर्मों के फल को भी मुझे अर्पण कर दो।

जो होगा वह अच्छा ही होगा। भगवान अच्छा ही करते हैं, भगवान मङ्गल ही करते हैं, ऐसा भाव होना चाहिए।


भजन -

                

द्रौपदी ने सभा में सबको पुकारा लेकिन भगवान नहीं आए पर जिस पल द्रौपदी ने अपनी आस की डोरी भगवान पर छोड़ी और पुकारा कि आपके अतिरिक्त मुझे कोई नहीं बचा पाएगा तो कृष्ण प्रकट हो गए। अतः डोरी को छोड़ना बहुत ज्यादा जरूरी है।   

एक भी प्रार्थना ऐसी नहीं है जो सच्चे मन से करो और भगवान न सुनें। यदि हम सच्चे मन से और सच्चे भाव से प्रार्थना करते हैं तो भगवान जरूर सुनते हैं। जिस पल हम भगवान के सानिध्य में आ जाते हैं, भगवान हमको पार लगा देते हैं।

इसके बाद हरि शरणम् सङ्कीर्तन के साथ विवेचन सत्र का समापन हुआ और प्रश्नोत्तर सत्र आरम्भ हुआ।

प्रश्नोत्तर:

प्रश्नकर्ता: गायत्री जी
प्रश्न: कुछ लोग जीवन में इतने आलसी हो जाते हैं कि वे कहते हैं कि हमें कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं है, सब कुछ भगवान ही करेंगे। क्या उनके द्वारा ऐसा करना सही है?
उत्तर: मानस की एक बहुत सुन्दर चौपाई है:

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।

श्रीभगवान कर्म के आग्रही हैं। अपने कर्त्तव्य को छोड़ देने से कोई संन्यासी नहीं हो जाता और गीता जी में भगवान आलस्य के एकदम विद्रोही हैं। गीता जी में भगवान ने यही सन्देश दिया है कि अगर आपको भगवत् प्राप्ति हो भी जाए तो भी आपको अपने जीवन में यज्ञ, तप, दान की क्रियाएँ नहीं छोड़नी हैं।

प्रश्नकर्ता: ऊषा जी
प्रश्न:हम गीता जी को संस्कृत में ही क्यों पढ़ते हैं?
उत्तर: मन्त्रों का पाठ जब हम मौलिक भाषा में करते हैं तभी उसका अधिक से अधिक मन्त्रात्मक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। मन्त्रों के अर्थ जानने के लिए उनका मूल जानना आवश्यक होता है और मन्त्रों को मूल भाषा में पढ़ने से बिना अर्थ जाने भी मन्त्रों का लाभ ले सकते हैं।

प्रश्नकर्ता: किरण महेन्द्रू जी
प्रश्न: गीता जी में हर स्थान पर श्रीभगवान उवाच आया है, इसका अर्थ फिर से स्पष्ट करें?
उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का अंश है। महाभारत में जहाॅं भी भगवान कृष्ण बोले हैं वहाॅं भगवान वेदव्यास जी ने केशव उवाच, कृष्ण उवाच, वासुदेव उवाच ऐसा लिखा है लेकिन गीता जी में श्रीभगवान उवाच लिखा है क्योंकि यहाॅं पर भगवान परमपिता परमात्मा के रूप में बोले हैं। भगवान जब गीता जी में माम् शब्द बोलते हैं तो उसका अर्थ है आपके इष्ट आपको बता रहे हैं। अगर आपके इष्ट राम हैं तो राम जी, अगर शिव हैं तो शिव जी और इसी तरह से अन्य सभी।

प्रश्नकर्ता: प्रभाकर जी
प्रश्न: दसवें श्लोक में भगवान ने कहा है कि अपने सारे कर्मों को मुझे अर्पण कर दीजिए और ग्यारहवें में कहा है कि कर्मों के फलों को मुझे अर्पण कर दीजिए तो मुझे ये दोनों समान दिखाई देते हैं क्या इनमें कोई अन्तर है?
उत्तर: सूक्ष्म सा अन्तर है और वह यह है कि भगवान ने कर्मों के फलों को उन्हें अर्पण करने के लिए नहीं बोला बल्कि उन्होंने कहा है कि‌ आपको अपने कर्मों के फलों पर ध्यान केन्द्रित नहीं करना है।

प्रश्नकर्ता: मीरा जी 
प्रश्न:साकार और निराकार रूपों के बारे में आपने बताया लेकिन निराकार भगवान के अस्तित्व के बारे में मेरे मन में संशय है, कृपया उसे स्पष्ट कीजिए?
उत्तर: आप यह तो मानती हैं कि भगवान सर्व शक्तिमान हैं और कुछ भी कर सकते हैं तो निराकार परमात्मा साकार रूप में भी प्रकट हो सकते हैं। साकार और निराकार दोनों भगवान के ही रूप हैं‌। आप मुझे आशू भैया, गोयल भैया, चश्मे वाले भैया कहिए, मैं तो वही हूॅं। इसी तरह भगवान को भी किसी भी नाम और किसी भी रूप से जानिए, भगवान तो वही हैं।

प्रश्नकर्ता: सरोज जी
प्रश्न: कौन से पाॅंच देवताओं की उपासना गृहस्थ को नित्य करनी चाहिए? कृपया फिर से बताइए?
उत्तर: भगवान आदिशङ्कराचार्य ने पाॅंच देवताओं के पूजन का महत्त्व बताया है। पञ्चदेवों में विष्णु रूप, देवी रूप, शिव का रूप, गणेश रूप और पाॅंचवा सूर्य देव के पूजन का महत्त्व गृहस्थ के लिए बताया गया है।

प्रश्नकर्ता: स्वामी सच्चिदानन्द जी
प्रश्न: छठे श्लोक में " मयि सन्न्यस्य मत्पराः" और दसवें में "मत्कर्मपरमो भव" के अर्थ एक जैसे ही दिखाई देते हैं, क्या इनमें कुछ अन्तर है, कृपया स्पष्ट करें?
उत्तर: छठे श्लोक में श्रीभगवान समस्त कर्मों को भगवान को अर्पण करने के लिए कहते हैं और दसवें श्लोक में भगवान कर्तापन के भाव के त्याग की बात करते हैं। मैं कुछ नहीं कर रहा। सब कुछ भगवान ही करवा रहे हैं और भगवान ही कर रहे हैं, ऐसा जानना और मानना है।

प्रश्नकर्ता: नूतन शर्मा जी
प्रश्न: ऐसा कहा जाता है कि अपने सभी कर्मों को भगवान को अर्पण कर दीजिए तो क्या ग़लत कर्मों को भी भगवान के अर्पण कर सकते हैं और अपनी बुद्धि को किस तरह से ठीक रखें?
उत्तर: जब भी कर्मों को अर्पण करने की बात आती है तो विहित कर्मों की बात की जाती है न कि निषिद्ध कर्मों की। निषिद्ध अथवा अनुचित कर्मों को भगवान को अर्पण कर ही नहीं सकते। आपके प्रश्न के दूसरे चरण के उत्तर में अर्जुन ने भी भगवान को पूछा कि हमारे भीतर ऐसा कौन है जो हमें पाप में लगाता है? तो भगवान ने उत्तर दिया-

 "काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः" 

हमारी कामनाओं और क्रोध को नियन्त्रण में करके हम अपने रजोगुण को कम कर सकते हैं और पाप से बच सकते हैं।

प्रश्नकर्ता: सर्वेश जी
प्रश्न: श्लोकों को कण्ठस्थ कैसे करें?
उत्तर: अभी स्तर एक में आप श्लोकों को अच्छे से पढ़ना सीखें। अपनी ऑडियोज भेज कर अपने ट्रेनर दीदी, भैया से अपनी गलतियों में सुधार करवाइए और जब आपको शुद्धता से श्लोक पढ़ने आ जाएँ तब आप उनको कण्ठस्थ करना प्रारम्भ कीजिए।

प्रश्नकर्ता: गरिमा सोनी जी
प्रश्न: भक्तियोग, कर्मयोग, कर्मों के प्रकार ऐसे अनेकानेक प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए क्या करें?
उत्तर: गीता जी के चारों स्तरों की यात्रा को पूर्ण कीजिए और विवेचन सत्रों से जुड़िए। आपके सभी प्रश्नों के उत्तर आपको स्वयं ही प्राप्त होते रहेंगे।
इसके अतिरिक्त आप vivechan.learngeeta.com पर जाकर भी अपने बहुत से प्रश्नों के उत्तर जान सकते हैं।

प्रश्नकर्ता: प्रियङ्का जी
प्रश्न: निराकार परमात्मा की उपासना कैसे कर सकते हैं? क्या ऐसा सम्भव है क्योंकि वे तो हमें दिखाई ही नहीं देते?
उत्तर: श्रीभगवान ने स्वयं कहा है:-

"क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्, अव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं(न्), देहवद्भिरवाप्यते॥१२.५॥"

निराकार की उपासना करना कठिन है तो आप साकार ब्रह्म की उपासना कीजिए।

प्रश्नकर्ता: मञ्जु बाला जी
प्रश्न: हमने अपने जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर लिया है भक्ति मार्ग पर चलते हुए, हमें ऐसा कब प्रतीत होगा? 
उत्तर: यह तो जब आपके साथ घटित होगा तभी आपको प्रतीत भी होगा क्योंकि जब तक रसगुल्ले को मुॅंह में रखकर उसकी मिठास को जानेंगे नहीं तब तक रसगुल्ला मीठा है यह कैसे प्रतीत हो सकता है।

प्रश्नकर्ता: प्रिया पाण्डे जी
प्रश्न: कई बार हमारे आसपास का वातावरण दूषित होता है और नकारात्मकता से भरा रहता है। ऐसे में हमें क्या करना है?
उत्तर: ऐसे में आपको अपने ध्येय के प्रति केन्द्रित रहना है और आसपास की नकारात्मकता पर ध्यान केन्द्रित न करते हुए, किसी को भी विशेष दोष न देते हुए केवल अपने कर्म को अच्छे से करने पर ज़ोर देना चाहिए।

प्रश्नकर्ता: नीता जी
प्रश्न: भगवान ने कहा कि बुद्धि और मन भी मुझ में अर्पण करो इसको कृपया स्पष्ट कीजिए?
उत्तर: दैनिक व्यवहार और क्रियाएँ करते समय अपने मन और बुद्धि को परमात्मा में ही लगा कर रखें तो कभी भी जीवन में आहत नहीं होंगे। जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं। निश्चित केवल अवसर है और उस अवसर को हम अपने पुरुषार्थ से किस तरह सिद्ध करते हैं, ऐसा अधिकार भगवान ने मनुष्य को दिया है। अपने आप को देह न जानकर अपने अन्दर के आत्म तत्त्व को पहचानना ही मनुष्य का धर्म है।

प्रश्नकर्ता: हनुमन्त शिन्दे जी
प्रश्न: लखनऊ में प्रचार सामग्री कहाॅं से प्राप्त की जा सकती है?
उत्तर: इसके लिए आप मेरे दफ्तर में आ सकते हैं। आपको वहाॅॅं से आसानी से प्रचार सामग्री उपलब्ध हो जाएगी।

प्रश्नकर्ता: नीलम जी
प्रश्न: सगुण और निर्गुण में अन्तर बताइए?
उत्तर: जिन्हें आप किसी आकार में देख सकते हैं वह सगुण परमात्मा हैं और जिनको आप देख नहीं सकते वे निर्गुण परमात्मा हैं।

एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति'।

ब्रह्म एक है, उसके अतिरिक्त दूसरा कुछ और नहीं है, ऐसा मानने वाले वास्तव में धन्य हैं।

प्रश्नकर्ता: सीमा गुप्ता जी
प्रश्न: मानसिक शान्ति के लिए कौन से श्लोक पढ़ने चाहिएँ?
उत्तर: गीता जी का हर श्लोक मानसिक शान्ति के लिए लाभकारी है और उनके अर्थ जानने के लिए विवेचन सत्र से अवश्य जुड़ें तो वास्तव में आपको लाभ होगा। श्लोक जो भी कक्षा में सीखें, उसका उच्चारण शुद्धता से करें तो आपको मन्त्रात्मक लाभ भी मिलेगा।

प्रश्नकर्ता: नयन जी
प्रश्न: इस्कॉन से जुड़ा हूॅं और उनके चार नियम हैं जिनका पालन करना आवश्यक है और भोजन में भी कुछ पदार्थों की मनाही है। क्या इसे आप मान्य करते हैं?
उत्तर: बिल्कुल, प्रमाणित बातें हैं। आप जिस सम्प्रदाय से जुड़े हैं उनके नियमों का पालन करना ही आपका कर्त्तव्य है।

प्रश्नकर्ता: प्रभतिका पाण्डा जी
प्रश्न: भगवान कृष्ण का नाम लेने से पिछले जन्म के पाप कम होते हैं, ऐसा सुना है। क्या ऐसा सच में होता है?
उत्तर: दो तरह के प्रारब्ध होते हैं - मध्यम प्रारब्ध और तीव्र प्रारब्ध। मध्यम प्रारब्ध जप, दान तप और शुभ कर्मों से कटता है लेकिन तीव्र प्रारब्ध का कष्ट झेलना ही पड़ता है जो कि रामकृष्ण परमहंस जी जैसे सन्त को भी झेलना पड़ा जिन्हें अन्तिम समय में गले में कैंसर हो गया था। भगवान का नाम लेने से इस जन्म के और पिछले जन्म के पाप अवश्य ही कटते हैं। इस जन्म के पापों को काटने का सरल उपाय है:- प्रायश्चित और क्षमा माङ्ग लेना क्योंकि कलयुग में मानसिक पाप नहीं लगता, ऐसी भी एक सुविधा कलयुग की है।

प्रश्नकर्ता: विनिता जी
प्रश्न: माला जप करते समय साकार भगवान का चित्र दिमाग में रखते हुए जप करना प्रारम्भ तो करते हैं लेकिन बाद में दिमाग इधर-उधर भटकने लगता है तो इससे किसी तरह का पाप तो नहीं लगता?
उत्तर: कर्मों में भी उत्तम और मध्यम तरह के कर्म होते हैं। माला जप करते हुए सिर्फ भगवान को ध्यान में रखते हुए जप करते हैं तो उत्तम कर्म हुआ लेकिन दिमाग भटक गया तो कर्म मध्यम हो गया लेकिन पाप कुछ भी नहीं हुआ।

अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।

अभ्यास करने से परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं और अभ्यास कितना सात्त्विक है, इस बात का महत्त्व है।

प्रश्नकर्ता: मीनू जी
प्रश्न: श्रीभागवत और भगवद्गीता में क्या अन्तर है?
उत्तर: श्रीमद्भागवत पुराण अठ्ठारह पुराणों में से एक पुराण है और श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का एक छोटा सा भाग है। श्रीभागवत पुराण में भगवान कृष्ण की कथाएँ हैं और श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीभगवान और अर्जुन का संवाद है। सन्त लोग भागवत महापुराण की कथा करते हैं जो सात दिन तक चलती है और हम जो यहाॅं कक्षाओं में पढ़ रहे हैं, वह श्रीमद्भगवद्गीता है।

प्रश्नकर्ता: सरोज कुमार जी
प्रश्न: गीता जी के सात सौ श्लोक किस-किस ने बोले? एक बार फिर से बताइए।
उत्तर: इन श्लोकों में से चौरासी श्लोक अर्जुन ने, इकतालीस श्लोक सञ्जय ने, एक श्लोक धृतराष्ट्र ने और पाॅंच सौ चौहत्तर श्लोक श्रीभगवान ने बोले हैं।

प्रश्नकर्ता: मिश्रा जी
प्रश्न: मैं नॉनवेज हूॅं और गीता कक्षा कर रही हूॅं। क्या इस तरह से किसी तरह का पाप तो नहीं लगता?
उत्तर: आप अपनी कक्षाएँ निर्विघ्न रूप से जारी रखिए।

प्रश्नकर्ता: हेमावती जी
प्रश्न: मेरी बेटी में बहुत ही नकारात्मक ऊर्जा है तो उसके लिए क्या उपाय कर सकते हैं?
उत्तर: उनके लिए केवल और केवल एक ही उपाय है और वह है बिना किसी शर्त के उनको अधिक से अधिक प्रेम करना। जैसी वह हैं उनको स्वीकार करना और अपनी तरफ से किसी भी तरह की नकारात्मकता का कभी भी प्रदर्शन न करना।

प्रश्नकर्ता: मेनका जी
प्रश्न: क्या नकारात्मक लोगों को उनकी नकारात्मकता के बारे में बताना आवश्यक है?
उत्तर: बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है ऐसा कुछ भी करने की क्योंकि अगर आपको लग रहा है कि व्यक्ति नकारात्मक है तो क्या कोई ऐसी सम्भावना है कि आप उसको उसकी नकारात्मकता के बारे में बताएँ और वह उसे स्वीकार कर ले। आपको केवल अपने सकारात्मकता के द्वार उसके लिए हमेशा खुले रखने हैं और बिना किसी शर्त के उसका साथ निभाने का प्रयत्न करना है।