विवेचन सारांश
कर्म, अकर्म एवम् विकर्म का भेद
प्रार्थना, दीप प्रज्वलन और गुरु वन्दना से आज का विवेचन सत्र प्रारम्भ हुआ। भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के लिए कर्त्तव्य पथ की ओर अग्रसर होने के लिए जो गीत गया उसका नाम है-श्रीमद्भगवद्गीता। गीता जी की वीणा हमेशा हमारे अन्तरङ्ग में बजती रहेगी तो हमारा जीवन सङ्गीतमय हो जाएगा। इसके लिए हमें प्रतिदिन गीता जी का अध्ययन करना चाहिए और अपने अन्तरङ्ग को हमेशा गीता जी के इस सङ्गीत से जोड़ कर रखना चाहिए। जीवन में अपनी क्षमता अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता की सेवा में लगना चाहिए।
ज्ञानेश्वरजी महाराज ने नौ हज़ार ओवियों में अत्यन्त सुन्दर भावार्थ लिखा।
म्हणौनि मनें कायें वाचा, जो सेवकु होईल इयेचा,
तो स्वानंदासाम्राज्याचा, चक्रवर्ती करी ॥ १६६८ ॥
मनुष्य को श्रीमद्भगवद्गीता जी की सेवा से आनन्द का अनुभव होगा। यह आनन्द उसके भीतर ही है जिसको वह बाहर की दुनिया में ढूँढता रहता है। इस आनन्द को पाने के लिए कई तरह के उपाय करता है लेकिन यह आनन्द उसके भीतर ही है जिसके मिलने पर उसे इधर-उधर भागना नहीं पड़ेगा। मनुष्य अनेक बार उस आनन्द की प्राप्ति के लिए सुख की परिभाषा भौतिक वस्तुओं में ढूँढने लगता है ऐसे में श्रीमद्भगवद्गीता सही मार्ग पर ले जाती है और अन्तरङ्ग के आनन्द का अनुभव कराती है। हमारे जीवन की भ्रान्तियों को भी निकाल देती है। इसीलिए महानुभाव कहते हैं :-
मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने।
सकृद्गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनं।।
जैसे शरीर का मैल स्नान करने से दूर हो जाता है ऐसे ही संसार का मैल गीताजी के अध्ययन से नष्ट हो जाता है। संसार का मैल क्या होता है?
जो कर्म हम करते हैं उसको करते हुए हमारा मन कई तरह की भ्रान्तियों में घिर जाता है, जिससे हमारे अन्तरङ्ग मन पर उसका प्रभाव रहता है। उससे हमारा चित्त अशुद्ध हो जाता है। यह मन सङ्कल्प विकल्प करता है, जिससे कि हमारे चरित्र पर उसके परिणाम बैठ जाते हैं। बुद्धि निर्णय लेती है और चित्त अशुद्ध हो जाता है। इन अशुद्धियों के कारण हम जीवन का आनन्द नहीं ले पाते। चित्त की इन अशुद्धियों से हम अपने मार्ग से भटक जाते हैं। सन्तों के जीवन से हमें जो प्रेरणा मिलती है, वह चित्त की शुद्धियाँ प्रदान करती हैं। भगवान श्री कृष्ण ने कर्म के परिणामों से मुक्त करने के लिए चित्त का कर्मयोग बता दिया। श्रीभगवान ने अर्जुन को बताया कि यह मैंने सूर्य को बताया था, जो उसने अपने पुत्र मनु को और मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को बताया पर काल के साथ इसका प्रभाव कम हो गया। जिन जिन व्यक्तियों ने अपने चित्त को स्थिर करके अपने कर्म को उसे परमपिता परमात्मा को समर्पित कर दिया वह महान हो गए जैसे शिवाजी महाराज ने हमेशा अपने कर्म को महादेव शिव को समर्पित किया। वे इतने निमित्त मात्र बन गए कि आज भी हम उनकी जयन्ती मानते हैं। लोकमान्य तिलक जिन्होंने गीता रहस्य लिखा आज भी हम उनको याद करते हैं। उन्होंने अपने चित्त को ईश्वरीय स्तुति में लगा दिया।
ज्ञानेश्वर महाराज ने कहा है :-
भगवान आप ही करवाने वाले हो और मैं करने वाला हूँ। आप कारण हैं मैं कार्य हूँ । आप ही आप करवा रहे हो और मैं कर रहा हूँ।
इसलिए ईश्वर को समर्पित करने के लिए जो कार्य किया जाता है, कर्मयोग बन जाता है। कार्य कितना भी छोटा क्यों न हो बहुत दिव्य हो जाता है।
इसका कारण भी हमने देखा कि नो वेकेशन नो डिस्क्रिमिनेशन नो एक्सपेक्टेशंस
(no vacation, no discrimination, no expectation).
भगवान अपने पधारने के लिए दुनिया में व्यवस्था करते हैं जब भी दुनिया की व्यवस्था खराब हो जाती है तो वह इस पूरी व्यवस्था को सही करने के लिए दुनिया में आते हैं।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥4-7॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥4-8॥
दुनिया की व्यवस्था के खराब होने पर उसको पुनर्व्यवस्थित करने के लिए परमात्मा को वापस धरती पर आना पड़ता है।
दशम् श्लोक में श्रीभगवान ने अर्जुन को बताया कि जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये थे, जो अनन्य प्रेम पूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे आश्रित रहने वाले भक्त ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं।
ज्ञानेश्वरजी महाराज ने नौ हज़ार ओवियों में अत्यन्त सुन्दर भावार्थ लिखा।
म्हणौनि मनें कायें वाचा, जो सेवकु होईल इयेचा,
तो स्वानंदासाम्राज्याचा, चक्रवर्ती करी ॥ १६६८ ॥
मनुष्य को श्रीमद्भगवद्गीता जी की सेवा से आनन्द का अनुभव होगा। यह आनन्द उसके भीतर ही है जिसको वह बाहर की दुनिया में ढूँढता रहता है। इस आनन्द को पाने के लिए कई तरह के उपाय करता है लेकिन यह आनन्द उसके भीतर ही है जिसके मिलने पर उसे इधर-उधर भागना नहीं पड़ेगा। मनुष्य अनेक बार उस आनन्द की प्राप्ति के लिए सुख की परिभाषा भौतिक वस्तुओं में ढूँढने लगता है ऐसे में श्रीमद्भगवद्गीता सही मार्ग पर ले जाती है और अन्तरङ्ग के आनन्द का अनुभव कराती है। हमारे जीवन की भ्रान्तियों को भी निकाल देती है। इसीलिए महानुभाव कहते हैं :-
मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने।
सकृद्गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनं।।
जैसे शरीर का मैल स्नान करने से दूर हो जाता है ऐसे ही संसार का मैल गीताजी के अध्ययन से नष्ट हो जाता है। संसार का मैल क्या होता है?
जो कर्म हम करते हैं उसको करते हुए हमारा मन कई तरह की भ्रान्तियों में घिर जाता है, जिससे हमारे अन्तरङ्ग मन पर उसका प्रभाव रहता है। उससे हमारा चित्त अशुद्ध हो जाता है। यह मन सङ्कल्प विकल्प करता है, जिससे कि हमारे चरित्र पर उसके परिणाम बैठ जाते हैं। बुद्धि निर्णय लेती है और चित्त अशुद्ध हो जाता है। इन अशुद्धियों के कारण हम जीवन का आनन्द नहीं ले पाते। चित्त की इन अशुद्धियों से हम अपने मार्ग से भटक जाते हैं। सन्तों के जीवन से हमें जो प्रेरणा मिलती है, वह चित्त की शुद्धियाँ प्रदान करती हैं। भगवान श्री कृष्ण ने कर्म के परिणामों से मुक्त करने के लिए चित्त का कर्मयोग बता दिया। श्रीभगवान ने अर्जुन को बताया कि यह मैंने सूर्य को बताया था, जो उसने अपने पुत्र मनु को और मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को बताया पर काल के साथ इसका प्रभाव कम हो गया। जिन जिन व्यक्तियों ने अपने चित्त को स्थिर करके अपने कर्म को उसे परमपिता परमात्मा को समर्पित कर दिया वह महान हो गए जैसे शिवाजी महाराज ने हमेशा अपने कर्म को महादेव शिव को समर्पित किया। वे इतने निमित्त मात्र बन गए कि आज भी हम उनकी जयन्ती मानते हैं। लोकमान्य तिलक जिन्होंने गीता रहस्य लिखा आज भी हम उनको याद करते हैं। उन्होंने अपने चित्त को ईश्वरीय स्तुति में लगा दिया।
ज्ञानेश्वर महाराज ने कहा है :-
भगवान आप ही करवाने वाले हो और मैं करने वाला हूँ। आप कारण हैं मैं कार्य हूँ । आप ही आप करवा रहे हो और मैं कर रहा हूँ।
इसलिए ईश्वर को समर्पित करने के लिए जो कार्य किया जाता है, कर्मयोग बन जाता है। कार्य कितना भी छोटा क्यों न हो बहुत दिव्य हो जाता है।
इसका कारण भी हमने देखा कि नो वेकेशन नो डिस्क्रिमिनेशन नो एक्सपेक्टेशंस
(no vacation, no discrimination, no expectation).
भगवान अपने पधारने के लिए दुनिया में व्यवस्था करते हैं जब भी दुनिया की व्यवस्था खराब हो जाती है तो वह इस पूरी व्यवस्था को सही करने के लिए दुनिया में आते हैं।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥4-7॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥4-8॥
दुनिया की व्यवस्था के खराब होने पर उसको पुनर्व्यवस्थित करने के लिए परमात्मा को वापस धरती पर आना पड़ता है।
दशम् श्लोक में श्रीभगवान ने अर्जुन को बताया कि जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये थे, जो अनन्य प्रेम पूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे आश्रित रहने वाले भक्त ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं।
4.11
ये यथा मां(म्) प्रपद्यन्ते, तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते, मनुष्याः(फ्) पार्थ सर्वशः॥11॥
हे पृथानन्दन ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे मार्ग का अनुकरण करते हैं।
विवेचन:- भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति मेरे पास जिस भावना से आता है वह मेरे साथ इस प्रकार से जुड़ जाता है।
We are striving for him.
हम सभी मनुष्य सच्चिदानन्द को ही प्राप्त करना चाहते हैं उस असीम सुख की अनुभूति ही प्रत्येक व्यक्ति का मार्ग है चाहे हम मानें या नहीं मानें। हम भक्ति से, योग से, ज्ञान से या तप से भगवान को प्राप्त करना चाहें, श्रीभगवान हमेशा मनुष्य को उसके इच्छित भाव से मिलते हैं। जैसे अगर हनुमान जी ने दास्य से भक्ति की तो भगवान उसे स्वामी के रूप में मिले। अगर यशोदा मैया ने वात्सल्य भाव से भक्ति की तो भगवान उन्हें बालक के रूप में मिले। अगर अर्जुन ने सखा भाव से भक्ति की तो भगवान उन् मित्र के रूप में मिले। अगर गुलाब राय जी ने भगवान में प्रेम को देखा तो भगवान माधुर्य भक्ति में ही उन्हें मिले। भक्ति के भी तीन प्रकार हैं:-
1:- भक्त और भगवान की
2:- शिष्य और गुरु की
3:- भगवान की भक्त के प्रति की गई भक्ति।
इस सृष्टि के अधिष्ठाता अनेक देवी देवता हैं। ये देवता ही सृष्टि का सञ्चालन करते हैं। हमारी वैदिक संस्कृति है। वेदों में भी भिन्न भिन्न तरह की सकाम आराधना है। देवताओं को हम जीवन में अलग-अलग कार्य में अलग-अलग भाव से पूजते हैं, जैसे गृह पूजा में, नामकरण की पूजा में हर तरह की पूजा में एक आभार परिलक्षण का भाव होता है। देवता भी हमें वर प्रदान करते हैं। सब देवता भगवान के द्वारा ही उस कार्य में लगाए जाते हैं। जैसे किसी सरकारी दफ्तर में बहुत सारे विभाग होते हैं पर सबको धन (फण्ड) एक ही स्रोत से आता है, केन्द्रीय व्यवस्था के द्वारा ही धन की व्यवस्था की जाती है।
We are striving for him.
हम सभी मनुष्य सच्चिदानन्द को ही प्राप्त करना चाहते हैं उस असीम सुख की अनुभूति ही प्रत्येक व्यक्ति का मार्ग है चाहे हम मानें या नहीं मानें। हम भक्ति से, योग से, ज्ञान से या तप से भगवान को प्राप्त करना चाहें, श्रीभगवान हमेशा मनुष्य को उसके इच्छित भाव से मिलते हैं। जैसे अगर हनुमान जी ने दास्य से भक्ति की तो भगवान उसे स्वामी के रूप में मिले। अगर यशोदा मैया ने वात्सल्य भाव से भक्ति की तो भगवान उन्हें बालक के रूप में मिले। अगर अर्जुन ने सखा भाव से भक्ति की तो भगवान उन् मित्र के रूप में मिले। अगर गुलाब राय जी ने भगवान में प्रेम को देखा तो भगवान माधुर्य भक्ति में ही उन्हें मिले। भक्ति के भी तीन प्रकार हैं:-
1:- भक्त और भगवान की
2:- शिष्य और गुरु की
3:- भगवान की भक्त के प्रति की गई भक्ति।
इस सृष्टि के अधिष्ठाता अनेक देवी देवता हैं। ये देवता ही सृष्टि का सञ्चालन करते हैं। हमारी वैदिक संस्कृति है। वेदों में भी भिन्न भिन्न तरह की सकाम आराधना है। देवताओं को हम जीवन में अलग-अलग कार्य में अलग-अलग भाव से पूजते हैं, जैसे गृह पूजा में, नामकरण की पूजा में हर तरह की पूजा में एक आभार परिलक्षण का भाव होता है। देवता भी हमें वर प्रदान करते हैं। सब देवता भगवान के द्वारा ही उस कार्य में लगाए जाते हैं। जैसे किसी सरकारी दफ्तर में बहुत सारे विभाग होते हैं पर सबको धन (फण्ड) एक ही स्रोत से आता है, केन्द्रीय व्यवस्था के द्वारा ही धन की व्यवस्था की जाती है।
काङ्क्षन्तः(ख्) कर्मणां(म्) सिद्धिं(म्), यजन्त इह देवताः।
क्षिप्रं(म्) हि मानुषे लोके, सिद्धिर्भवति कर्मजा॥12॥
कर्मों की सिद्धि (फल) चाहने वाले मनुष्य देवताओं की उपासना किया करते हैं; क्योंकि इस मनुष्यलोक में कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि जल्दी मिल जाती है।
विवेचन:- अपने कर्म की सिद्धि के लिए हम अलग-अलग देवताओं की पूजा करते हैं। गृह प्रवेश के लिए लक्ष्मी जी, बुद्धि के लिए गणेश जी, वायु, जल इत्यादि के लिए विभिन्न देवता का आह्वान करते हैं क्योंकि देवता भक्त की प्रार्थना से और भक्ति से बाध्य हो जाते हैं। भगवान अविकारी है परन्तु देवताओं के कार्य सिद्धि के पीछे भी परमात्मा स्वयं होते हैं। शीघ्र फल प्राप्ति के लिये हम देवताओं की अर्चना करते हैं। ईश्वर कर्ता होकर भी अकर्ता हैं।
चातुर्वर्ण्यं(म्) मया सृष्टं(ङ्), गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां(म्), विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥13॥
मेरे द्वारा गुणों और कर्मों के विभागपूर्वक चारों वर्णों की रचना की गयी है। उस(सृष्टि रचना आदि) का कर्ता होने पर भी तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।
विवेचन:- सोलह खम्भों पर हमारी यह वैदिक सनातन संस्कृति स्थित है, चार पुरुषार्थ, चार आश्रम, चार वर्ण, चार साधन व तीन वृत्तियों के बारे में बताया गया है ।
ज्ञान के लिए ब्राह्मण वर्ण, साहस के लिए क्षत्रिय वर्ण, धन के लिए वैश्य वर्ण और श्रम के लिए शूद्र वर्ण इन चारों वर्णों की साधना से कोई भी व्यवस्था पूर्णतया चलती है। जैसा गुण होगा वैसा ही वर्ण प्राप्त होगा। लेकिन भगवान इन सब में कर्ता होकर भी अकर्ता है।
Energy can neither be created,
nor be destroyed.
It can only be transferred.
प्रत्येक व्यवस्था को चलाने के लिए इन चारों वर्णों की जरूरत होती है। जैसे ग्रीस ने अपनी अद्भुत संस्कृति को रोमन के हाथों में गवाँ दिया केवल पढ़ने में और पढ़ाने में समय खराब करने के स्थान पर, उसे संस्कृति को बचाने के लिए सेवा की भी आवश्यकता होती है जैसे किसी फैक्ट्री को चलाने के लिए अन्य विभागों के साथ-साथ धन और मजदूर दोनों ही चाहिए। बिजली विभाग में काम करते हुए हमने हमेशा तकनीकी और दूसरे विभागों को काम करते तो देखा है पर श्रमिक के बिना खम्भे पर चढ़ने के लिए और कोई भी गर्मियों में प्रयत्न नहीं कर सकता। इस में सबसे ज्यादा अगर कोई व्यक्ति आवश्यक है तो वह है श्रमिक।
ज्ञान के लिए ब्राह्मण वर्ण, साहस के लिए क्षत्रिय वर्ण, धन के लिए वैश्य वर्ण और श्रम के लिए शूद्र वर्ण इन चारों वर्णों की साधना से कोई भी व्यवस्था पूर्णतया चलती है। जैसा गुण होगा वैसा ही वर्ण प्राप्त होगा। लेकिन भगवान इन सब में कर्ता होकर भी अकर्ता है।
Energy can neither be created,
nor be destroyed.
It can only be transferred.
प्रत्येक व्यवस्था को चलाने के लिए इन चारों वर्णों की जरूरत होती है। जैसे ग्रीस ने अपनी अद्भुत संस्कृति को रोमन के हाथों में गवाँ दिया केवल पढ़ने में और पढ़ाने में समय खराब करने के स्थान पर, उसे संस्कृति को बचाने के लिए सेवा की भी आवश्यकता होती है जैसे किसी फैक्ट्री को चलाने के लिए अन्य विभागों के साथ-साथ धन और मजदूर दोनों ही चाहिए। बिजली विभाग में काम करते हुए हमने हमेशा तकनीकी और दूसरे विभागों को काम करते तो देखा है पर श्रमिक के बिना खम्भे पर चढ़ने के लिए और कोई भी गर्मियों में प्रयत्न नहीं कर सकता। इस में सबसे ज्यादा अगर कोई व्यक्ति आवश्यक है तो वह है श्रमिक।
न मां(ङ्) कर्माणि लिम्पन्ति, न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां(म्) योऽभिजानाति, कर्मभिर्न स बध्यते॥14॥
कारण कि कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।
विवेचन:- किसी भी व्यवस्था में कार्यरत हुए बच्चों के ऊपर उनके परिवार का असर होता है। बच्चों को आनुवंशिकी और वातावरण दोनों ही प्रभावित करते हैं। डॉक्टर के बेटे ने शुरू से ही अपने पिता को वैसा ही देखा है तो उस वातावरण का अभ्यस्त हो जाता है। गुणसूत्र से बच्चों पर प्रभाव पड़ता है। एक स्वस्थ व्यवस्था के लिए चारों ही वर्ण आवश्यक है इसलिए प्रत्येक वर्ण का आदर करना आवश्यक है। कर्म में लिप्त होना आवश्यक नहीं है अगर कोई व्यक्ति दोषी है और उसको न्यायाधीश ने फाँसी की सजा दी है तो न तो संविधान न ही न्यायाधीश और न ही जल्लाद जो उसको फाँसी पर चढ़ा रहा है वह उसके लिए उत्तरदायी नहीं हैं। उसके अपने कर्म ही उसके लिए जिम्मेदार है। वह अपने ही कर्म का भुगतान कर रहा है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि किसी भी कार्य में लिप्त नहीं होना चाहिए। जिसने जगत नियन्ता का यह रूप जान लिया कि हम जो भी कार्य करते हैं, वह ईश्वर हमसे करवा रहा है, अत: उस कर्म का फल हमें तभी लगेगा अगर हम उस कर्म में लिप्त हो जाते हैं इच्छा-शक्ति, ज्ञान -शक्ति और आसक्ति यह भिन्न है। आसक्ति से कर्म की बाध्यता होती है और उत्साह से कर्म करने पर तुम्हें कार्य में आसक्ति नहीं होती। अत: कार्य का फल कैसा भी हो व्यक्ति उससे अनभिज्ञ रहता है।
एवं(ञ्) ज्ञात्वा कृतं(ङ्) कर्म, पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं(म्), पूर्वैः(फ्) पूर्वतरं(ङ्) कृतम्॥15॥
पूर्वकाल के मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं, इसलिये तू भी पूर्वजों के द्वारा सदा से किये जाने वाले कर्मों को ही (उन्हीं की तरह) कर।
विवेचन- भगवान अर्जुन के माध्यम से हमें बताते हैं कि दुःख चाहे शारीरिक हो चाहे मानसिक, लोग उनसे ग्रसित होते हैं क्योंकि वे फल की इच्छा रखते हैं। इसको पाने का एक ही तरीका है वृद्ध सेवा। अपने घर के वृद्धों का तो हमारे ऊपर ऋण होता है इसलिए उनकी तो सेवा करनी आवश्यक है ही, लेकिन इसके अलावा वृद्धजन यानी ज्ञान में हमसे वृद्ध, ज्ञान अर्जित कर चुके लोग जो हमसे पहले इस कार्य को कर चुके हैं ऐसे लोगों से हमें शिक्षा लेनी चाहिए।
यह अध्याय सिद्धान्तों का अध्याय है और इसमें श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन को समझाते हैं कि अपने से पहले अगर कोई मोक्ष के लिए कार्यरत हुआ है तो उससे ज्ञान लेना चाहिए।
अगर किसी ने बेटी की शादी की है तो उसे हम पूछते हैं कि बेटी की शादी में क्या-क्या करना चाहिए और उससे उस कार्य को सफल बनाने के लिए हर तरह का सुझाव लेते हैं। इसी तरह से मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी कर्म, अकर्म और विकर्म में भेद करने वाले हमसे अधिक जानकारी रखने वाले ज्ञानियों से हमें जानकारी लेनी चाहिए।
महाजनों येन गत: स पन्था:।
श्रेष्ठ ज्ञानी लोग जिस मार्ग से जायें, उसी मार्ग का अनुसरण करना चाहिए ।
यह अध्याय सिद्धान्तों का अध्याय है और इसमें श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन को समझाते हैं कि अपने से पहले अगर कोई मोक्ष के लिए कार्यरत हुआ है तो उससे ज्ञान लेना चाहिए।
अगर किसी ने बेटी की शादी की है तो उसे हम पूछते हैं कि बेटी की शादी में क्या-क्या करना चाहिए और उससे उस कार्य को सफल बनाने के लिए हर तरह का सुझाव लेते हैं। इसी तरह से मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी कर्म, अकर्म और विकर्म में भेद करने वाले हमसे अधिक जानकारी रखने वाले ज्ञानियों से हमें जानकारी लेनी चाहिए।
महाजनों येन गत: स पन्था:।
श्रेष्ठ ज्ञानी लोग जिस मार्ग से जायें, उसी मार्ग का अनुसरण करना चाहिए ।
किं(ङ्) कर्म किमकर्मेति, कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि, यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥16॥
कर्म क्या है और अकर्म क्या है - इस प्रकार इस विषय में विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भली भाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ (संसार-बन्धन) से मुक्त हो जायगा।
विवेचन-भगवान अर्जुन को कहते हैं कि कर्म की गति अत्यन्त गहन है यह महत्वपूर्ण है कि कर्म से हमें कभी भी डरना नहीं चाहिए। जब हम साँस लेते हैं तो वह भी हम कर्म ही करते हैं। कई बार ज्ञानी व्यक्ति भी फल के मोह में फँस जाते हैं। आम का पेड़ लगाओ तो फल मिलेगा, चाहे वह कई साल के बाद मिले। परीक्षा दी है तो उसका भी फल मिलेगा ही, पर कुछ ऐसे फल होते हैं जो नित्य फल है। पानी पिया तो प्यास बुझ जाएगी। स्नान किया तो शरीर का मैल निकल जाएगा लेकिन इसके अलावा कुछ सञ्चित फल होते हैं। कोई व्यक्ति ओलम्पिक में दौड़ रहा है पर प्रथम नहीं आ सका उसका कर्म व्यर्थ नहीं जाता क्योंकि वह सञ्चित कर्म है उसका फल कभी न कभी तो उसे अवश्य मिलेगा। कर्म और अकर्म और विकर्म में अन्तर होता है।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं(म्), बोद्धव्यं(ञ्) च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं(ङ्), गहना कर्मणो गतिः॥17॥
कर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है।
विवेचन- अकर्म ऐसा कर्म होता है जिसके करने से कर्म करने वाला उस के फल की आसक्ति नहीं रखता। उस पर कर्म का कोई असर नहीं होता। जैसे जब कोई साइकिल चलाना सीखता है या कार चलाना सीखता है तो वह अपने अनुभव से धीरे-धीरे रेस, ब्रेक और एक्सीलेटर का अभ्यस्त हो जाता है। उसको वह काम कठिन नहीं लगता। तैरने से तैराक कभी नहीं घबराता, पहली बार तैरने पर उसे वह कर्म कठिन लगता है पर धीरे-धीरे उसी कर्म को करते हुए उसे कर्म करने की अनुभूति ही नहीं होती। अकर्म करने का अर्थ काम को छोड़ना नहीं है, बल्कि कर्म करते हुए उसके फल का ध्यान न देना ही अकर्म है। कर्म के प्रभाव से मुक्त हो जाना ही अकर्म है विकर्म का अर्थ विपरीत कर्म और जैसा कि ज्ञानेश्वर जी महाराज ने कहा विशेष कर्म भी होता है। कोई भी कार्य जब विशेष कार्य बन जाता है तो वह विकर्म हो जाता है।
कर्मण्यकर्म यः(फ्) पश्येद्, अकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु, स युक्तः(ख्) कृत्स्नकर्मकृत्॥18॥
जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है, योगी है और सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।
विवेचन:- वह मनुष्य योगी है जो कर्म करते हुए भी अकर्म करता है और फल की इच्छा नहीं करता। वह जीवन में एक अद्भुत सङ्गति में रहता है। वह कर्म कर भी रहा है और भगवान के existence अस्तित्व को भी समझता है। ऐसा व्यक्ति ज्ञानी है क्योंकि वह यह समझता है कि अगर वह आज अपने मुँह से बोल रहा है, कानों से सुन रहा है, आँखों से देख रहा है, तो यह सारी क्षमताएं उसको परमपिता परमात्मा ने दी है अगर आज उसका हृदय धड़क रहा है तो वह कर्म तो कर रहा है पर उस कर्म को करने वाला उसका परमात्मा है जैसे कि तुकाराम जी ने कहा :-
मैं मेरे बल से नहीं कर रहा। ईश्वर मुझसे करवा रहे हैं।
मातृभाषा बच्चों को माता के जरिए से आ जाती है। वह ऐसा सॉफ्टवेयर है जो व्यक्ति में बचपन से ही सेट हो जाता है। कोयल गाती है तो उसको वह गाने की क्षमता भगवान ने दी है। सचिन तेंदुलकर अपनी रिटायरमेंट पर बहुत सुन्दर भाषण देते हुए बोले कि मेरी इतनी उपलब्धियों के बहुत सारे लोग कारण है जैसे कि मेरे परिवार में मेरी चाची जो मुझे खाना बना कर देती थी लञ्च के लिए टिफिन पैक करती थी। मेरा भाई जो मुझे फील्ड तक छोड़ने जाता था। इस तरह प्रत्येक कर्म को करने में बहुत सारे लोग हमारे साथ जुड़ जाते हैं, पर यह ईश्वर की कृपा के बिना सम्भव नहीं है। कबीर जी कहते हैं यह दोहे मेरे नहीं है यह तो परमपिता परमात्मा की कृपा है। ज्ञानेश्वर जी भी कहते हैं कि जैसे सूर्य स्थिर रहता है, पर हमें ऐसा जान पड़ता है कि वह चलता है। सुबह और शाम की दूरी को तय करता है, परन्तु गैलीलियो ने सात सौ साल बाद इस बात को साबित किया कि सूर्य स्थिर है। धरती घूमती है तो हमें ऐसा जान पड़ता है कि सूर्य उदित होता है और फिर अस्त होता है, जबकि सूर्य स्थिर है। एक पोटेंशियल जेनरेटर होता है, जिसके उपलब्ध होने पर सारे कार्य स्वत: होते रहते हैं। स्वयं ही हो जाते हैं माँ-बाप के घर में होने पर बच्चे स्वयं ही पढ़ लेते हैं। सासू माता के घर में होने पर बहुत सारे कार्य स्वयं ही सही तरीके से होते हैं।
किसी कॉलोनी में नेता के आने से अपने-आप ही सफाई का कार्य हो जाता हैं। दफ्तर में सीनियर के हस्ताक्षर मात्र से ही कोई भी कार्य हो जाता है। ऐसे ही सन्तों के होने मात्र से ही कर्म की आसक्ति नही रहती।
मैं मेरे बल से नहीं कर रहा। ईश्वर मुझसे करवा रहे हैं।
मातृभाषा बच्चों को माता के जरिए से आ जाती है। वह ऐसा सॉफ्टवेयर है जो व्यक्ति में बचपन से ही सेट हो जाता है। कोयल गाती है तो उसको वह गाने की क्षमता भगवान ने दी है। सचिन तेंदुलकर अपनी रिटायरमेंट पर बहुत सुन्दर भाषण देते हुए बोले कि मेरी इतनी उपलब्धियों के बहुत सारे लोग कारण है जैसे कि मेरे परिवार में मेरी चाची जो मुझे खाना बना कर देती थी लञ्च के लिए टिफिन पैक करती थी। मेरा भाई जो मुझे फील्ड तक छोड़ने जाता था। इस तरह प्रत्येक कर्म को करने में बहुत सारे लोग हमारे साथ जुड़ जाते हैं, पर यह ईश्वर की कृपा के बिना सम्भव नहीं है। कबीर जी कहते हैं यह दोहे मेरे नहीं है यह तो परमपिता परमात्मा की कृपा है। ज्ञानेश्वर जी भी कहते हैं कि जैसे सूर्य स्थिर रहता है, पर हमें ऐसा जान पड़ता है कि वह चलता है। सुबह और शाम की दूरी को तय करता है, परन्तु गैलीलियो ने सात सौ साल बाद इस बात को साबित किया कि सूर्य स्थिर है। धरती घूमती है तो हमें ऐसा जान पड़ता है कि सूर्य उदित होता है और फिर अस्त होता है, जबकि सूर्य स्थिर है। एक पोटेंशियल जेनरेटर होता है, जिसके उपलब्ध होने पर सारे कार्य स्वत: होते रहते हैं। स्वयं ही हो जाते हैं माँ-बाप के घर में होने पर बच्चे स्वयं ही पढ़ लेते हैं। सासू माता के घर में होने पर बहुत सारे कार्य स्वयं ही सही तरीके से होते हैं।
किसी कॉलोनी में नेता के आने से अपने-आप ही सफाई का कार्य हो जाता हैं। दफ्तर में सीनियर के हस्ताक्षर मात्र से ही कोई भी कार्य हो जाता है। ऐसे ही सन्तों के होने मात्र से ही कर्म की आसक्ति नही रहती।
यस्य सर्वे समारम्भाः(ख्), कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं(न्), तमाहुः(फ्) पण्डितं(म्) बुधाः॥19॥
जिसके सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भ संकल्प और कामनासे रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं, उसको ज्ञानीजन भी पण्डित (बुद्धिमान्) कहते हैं।
विवेचन- अच्छाई की कल्पना ज्ञान की अग्नियज्ञ में भस्म हो जाती है। वह व्यक्ति बुद्धिमान है, ज्ञानी है, निवृत्त है जो फल के इच्छा त्याग कर कर्म करता है। माली खेत में काम करते हुए पौधों को जल देता है। पानी को बाहर एक तरफ नाली बनाकर निकाल देता है और आगे से उस नाली को बंद कर देता है, फिर दूसरी तरफ से पानी का बहाव शुरू कर देता है। पानी इस बात के लिए किसी तरह का विरोध नहीं करता। वह चुपचाप जो कर्म उसको दिया गया है, उसी कर्म को करता है। ज्ञानी व्यक्ति भी किसी काम को करते हुए उसके असर के बारे में चिन्ता नहीं करता। वह केवल उत्साह से अपने कर्म को पूरा करता है।
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं(न्), नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि, नैव किञ्चित्करोति सः॥20॥
जो कर्म और फल की आसक्ति का त्याग करके आश्रय से रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मों में अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता।
विवेचन- कर्म के फल से दृष्टि हटा लें तो जीवन आनन्दमय हो सकता है। अगर व्यक्ति भगवान पर आश्रित है तो उसे कोई और इच्छा नही होती।
With you, without you, inspite of you
भौतिक इच्छा का आश्रय न लेकर कर्म करने वाला व्यक्ति कर्म से निवृत्त रहता है। वह कर्म करते हुए दिखता अवश्य है, पर उस कर्म में लिप्त नहीं होता। सृष्टि का रचने वाला ही मुझ से यह कर्म करवा रहा है ऐसा जानता है।
मा किञ्चित करोति सा।
निरक्षर होने पर भी मराठी में बहुत सुन्दर पंक्तियाँ लिखने वाली महणा जी लिखती हैं -
भगवान ने प्रत्येक व्यक्ति को दो हाथ और दस उंगलियां दी हैं अगर पक्षी अपने छोटे से मुँह से दाना खा कर कर्म करते हुए उस ईश्वर का धन्यवाद कर सकता है तुम मनुष्य क्यों नहीं।
With you, without you, inspite of you
भौतिक इच्छा का आश्रय न लेकर कर्म करने वाला व्यक्ति कर्म से निवृत्त रहता है। वह कर्म करते हुए दिखता अवश्य है, पर उस कर्म में लिप्त नहीं होता। सृष्टि का रचने वाला ही मुझ से यह कर्म करवा रहा है ऐसा जानता है।
मा किञ्चित करोति सा।
निरक्षर होने पर भी मराठी में बहुत सुन्दर पंक्तियाँ लिखने वाली महणा जी लिखती हैं -
भगवान ने प्रत्येक व्यक्ति को दो हाथ और दस उंगलियां दी हैं अगर पक्षी अपने छोटे से मुँह से दाना खा कर कर्म करते हुए उस ईश्वर का धन्यवाद कर सकता है तुम मनुष्य क्यों नहीं।
प्रश्नोत्तर:-
प्रश्नकर्ता:- पूर्णिमा दीदी
प्रश्न:- गहना कर्मणा गति: - अभी इसके विषय में हमने विवेचन सुना, लोग कहते हैं कि यह मन्त्र जाप करने से, पूजादि करने से या यज्ञ आदि करने से पूर्व जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं, ऐसा होता है या कर्म फल हमें भोगना ही पड़ता है?
उत्तर:- गुरुदेव ने बताया कि हमारे सञ्चित कर्म ही प्रारब्ध बन कर आते हैं। किन्तु इसमें भी सभी प्रारब्ध नहीं होता, मन्द प्रारब्ध या अति मन्द प्रारब्ध होता है। बाण छूटने के लिये तैयार है, किन्तु अभी छूटा नहीं है तो उससे पूर्व हम उपाय कर सकते हैं। गुरुदेव का कहना है कि उस दिन अपने को धन्य समझना चाहिए जिस दिन हमारे ऋषियों द्वारा अपनी प्रग्या से जो भी हमारे लिये सृष्टि के सिद्धान्त ग्रहण करते हुए सार का वर्णन किया और हमारे लिये उपाय भी बताए उस पर श्रद्धा और विश्वास से अनुसरण करना सीख जायें। हमारे समाज में एक त्रुटि हो गई की श्रद्धा के साथ अन्ध-श्रद्धा भी जुड़ गई। हम यदि गुरुवों द्वारा बताये गये उपाय को श्रद्धा से करते हैं, तो हमारे कर्म कटते हैं। माता पार्वती ने शिव जी से बच्चों के कष्टों को दूर करने का उपाय पूछा था। नाम परमात्मा का रूप होता है, इसलिये नाप जप से भी कर्म कटते हैं। लेकिन उसी में उलझना नहीं चाहिए। अदृष्ट को दूर करने के लिये उपाय भी प्रभावी होते हैं।
प्रश्नकर्ता:- मीनाक्षी दीदी
प्रश्न:- कर्तृत्त्व और भोक्तृत्त्व क्या है?
उत्तर:- जो कर्म हम करते हैं, वह कर्तृत्त्व है, उसके परिणाम स्वरूप जो फल प्राप्त होता है वह भोक्तृत्त्व है। लेकिन इसकी एक भावना भी होती है। जैसे एक माता जब बच्चे का लालन पालन करती है तो उसके मन में एक भाव आता है कि बच्चा बड़ा होकर उसकी सेवा करें। श्रीभगवान इससे बचने की बात कहते हैं, क्योंकि इससे अहम् की भावना जागृत होती है। इसलिये कर्म करने के बाद अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए।
प्रश्नकर्ता:- संजू भैया
प्रश्न:- पन्द्रहवें श्लोक में मुमुक्षुभि: का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:- चार प्रकार के लोग होते हैं, एक अज्ञानी होते हैं जिन्हें पता ही नहीं होता है कि वे जीवन किसके लिये जी रहे हैं। दूसरे प्रकार के लोग बद्ध कहलाते हैं जो विषयों कामनाओं की पूर्ति के लिये भागते हैं। तीसरे को मुमुक्षु कहते हैं, उन्हें मोक्ष की इच्छा होती है, वे दूसरों के दु:खों को अनुभव करते हैं एवम् उन्हें दूर करना चाहते हैं। मुक्ति की इच्छा लौकिक एवम् अलौकिक दोनों रूपों में होती है।