विवेचन सारांश
मोहग्रस्त अर्जुन का अत्यन्त शोकाकुल होना

ID: 5020
हिन्दी
शनिवार, 22 जून 2024
अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग
4/4 (श्लोक 32-47)
विवेचक: गीता विशारद डॉ. संजय जी मालपाणी


सुन्दर प्रार्थना एवं दीप प्रज्वलन के साथ आज के विवेचन सत्र का शुभारम्भ हुआ। परम पूज्य स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरि जी महाराज एवं सम्पूर्ण गुरु परम्परा को वन्दन किया गया।
पहले तीन सत्रों में बताया गया था कि क्यों अर्जुन विषादग्रस्त हुए और क्यों इसे विषादयोग कहा गया। साथ ही दोनों सेनाओं में कौन-कौन महारथी हैं इनका भी परिचय हुआ और दोनों सेनाओं में शड्खध्वनि हुई। अर्जुन ने सारथी बने श्रीकृष्ण को दोनों सेनाओं के बीच में अपना रथ खड़ा करने को कहा और श्रीभगवान् ने ऐसे स्थान पर रथ खड़ा किया जिससे कि पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन को सहज ही दृष्टिगोचर हो जाए। साथ ही साथ अर्जुन को दोनों सेनाओं के सेनानी एवं महारथियों का अवलोकन भी हो जाए। 

पाण्डवों की सेना में जो महारथी थे, वे तो अर्जुन को पता थे परन्तु फिर भी श्रीभगवान् ने ऐसा किया जिससे कि अर्जुन सबको देख कर विषाद में चला जाए एवं भगवान् अर्जुन के मन में उठे सभी प्रश्नों के उत्तर दे सकें और तभी यह युद्ध ठीक से हो पाएगा। वास्तव में जो एक किनारे पर खड़े होते हैं, उन्हीं की छलाँग लगाने की सम्भावना सबसे ज्यादा होती है। जो मझधार में होते हैं वह छलाँग लगाने की नहीं सोच सकते। इसलिये देखा गया है कि जो घोर नास्तिक होता है वह अचानक आस्तिक बन जाता है, घोर अधर्मी धार्मिक बन जाता है। यह एक छलाँग लगाने की प्रक्रिया है। लेकिन अगर सिर पर बोझ हो तो छलाँग नहीं लगाई जा सकती है।

एक बार अकबर और बीरबल शिकार करने गए थे और अचानक तेज वर्षा होने लगी। ऐसे में दोनों अपने-अपने घोड़ों के साथ एक पेड़ के नीचे खड़े हो गए। सामने एक बड़ी नहर सी थी और वर्षा अधिक देर तक होने से उसमें बाढ़ आ गई। 

दोनों ने अचम्भित करने वाला दृश्य देखा। एक युवा लकड़हारा सर पर लकड़ी की गठरी लिए दौड़ता हुआ आया और एक छलाँग में नहर पार कर गया। अकबर ने उसे अपने पास बुलाया और उससे कहा कि यह तुमने कैसे किया? लकड़हारा बोला यह तो बहुत सहज है, यह तो मैं प्रतिदिन ही करता हूँ। अकबर ने कहा कि तुम फिर से एक बार छलाँग लगा कर दिखाओ तो मैं तुम्हें एक स्वर्ण की मुद्रा दूँगा। बीरबल हँसने लगा। वर्षा बहुत हो रही थी, सब तरफ कीचड़ हो गया था। वह लकड़हारा दौड़ कर आया लेकिन इस बार फिसल गया छलाँग नहीं लगा पाया। बीरबल फिर हँसने लगा। अकबर ने कारण पूछा तो बीरबल ने बताया की पहली बार उसके सिर पर सिर्फ लकड़ी का सहज बोझ था और अब उसके सिर पर एक अपेक्षित स्वर्ण मुद्रा का भी भार है। अतः यह छलाँग नहीं लगा पाएगा यह मैं पहले से जानता था। बात बिल्कुल सत्य है माथे पर कुछ बोझ हो तो छलाँग लगाना कठिन है।

अतः श्रीभगवान् चाहते थे कि अर्जुन के माथे से सारा भार निकल जाए, जो भी विचारों का द्वंद्व अर्जुन के मन में चल रहा है वह समाप्त हो जाए। त्रिलोक के स्वामी, भूत और भविष्य के ज्ञाता भगवान् श्रीकृष्ण यह जानते थे कि अर्जुन के मन में मोह के बीज अङ्कुरित हो चुके हैं और यह बड़ा वृक्ष बने, उसके पहले इसे उखाड़ फेंकना आवश्यक है। इसलिये दोनों सेनाओं के बीच में इस तरह अर्जुन का रथ खड़ा किया गया कि अर्जुन को दोनों सेनाएँ स्पष्ट दिखे तब अर्जुन का विषाद आरम्भ हुआ। अर्जुन ने देखा कि दोनों ही तरफ मेरे अपने ही लोग हैं। मेरे गुरुजी, पितामह, दामाद, श्वसुर, सुह्रद व मित्र हैं। मैं इन सब को मार कर राज्यारोहण करना चाहता हूँ? अर्जुन का विषाद इतना बढ़ गया कि अर्जुन नीचे बैठ गये, गाण्डीव हाथ से छूटकर नीचे गिर गया, हाथ-पाँव काँपने लगे, शरीर में जलन होने लगी, कुछ भी विचार करने की क्षमता अर्जुन ने खो दी है, मन भ्रमित है।

ऐसी स्थिति में अर्जुन अपने मित्र, अपने सखा को अपने मन की बात बता रहे हैं।

1.32

न काङ्क्षे विजयं(ङ्) कृष्ण, न च राज्यं(म्) सुखानि च।
किं(न्) नो राज्येन गोविन्द, किं(म्) भोगैर्जीवितेन वा।।1.32।।

हे कृष्ण! (मैं) न तो विजय चाहता हूँ, न राज्य (चाहता हूँ) और न सुखों को (ही चाहता हूँ)। हे गोविन्द! हम लोगों को राज्य से क्या लाभ? भोगों से (क्या लाभ)? अथवा जीने से (भी) क्या लाभ?

 विवेचन : मुझे विजय नहीं चाहिए, न ही राज्य चाहिए और न ही मुझे सुखों के उपभोग की चाह है। ऐसा राज्य लेकर मैं क्या करूंगा? जीवित रहकर इसका उपभोग करने का भी क्या लाभ है? अर्जुन मरना चाहते हैं, आत्महत्या के लिए प्रेरित हो गये हैं। अर्जुन का सोचना है उसके कारण इतना बड़ा नरसंहार होगा, पूरा कुरुवंश हताहत हो जाएगा। यहाँ एक बात पर विचार किया जाना चाहिए। क्या अर्जुन को राज्य नहीं चाहिए था या अर्जुन को हत्या करके राज्य नहीं चाहिए था?

1.33

येषामर्थे काङ्क्षितं(न्) नो, राज्यं(म्) भोगाः(स्) सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे, प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।।1.33।।

जिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुख की इच्छा है, वे (ही) ये सब (अपने) प्राणों की और धन की आशा का त्याग करके युद्ध में खड़े हैं।

विवेचन : जिनके लिए राज्य, भोग और सुख की इच्छा है वह ही सब अपने प्राण और धन की आशा त्याग कर युद्ध के लिए खड़े हैं, ऐसे लोगों को मार कर राज्य मिले तो क्या अर्थ है? जैसे अगर कोई बंगला बनता है तो उसमें रहने वाले परिवारजन भी होने चाहिए।

अर्जुन को अब राज्य तो चाहिए परन्तु अपने लोगों को मार कर नहीं। इसके पूर्व अर्जुन के मन में यह बात नहीं थी। युद्ध के पहले भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों की ओर से दूत बनकर गए थे और गाँवों की माँग रखी थी। दुर्योधन के मना करने पर युद्ध अटल हो गया। उसी समय दुर्योधन और अर्जुन दोनों ही अपनी-अपनी सेनाओं का विस्तार करने में जुट गए। परन्तु अब अर्जुन के मन में दो प्रकार के विचार जाग्रत हो गए। आधुनिक भाषा में इसे split personality के नाम से जाना जाता है। यह एक मानसिक रोग है, इसके लक्षण अर्जुन में जाग्रत हो गए। अर्जुन का मुख सूखने लगा, गाण्डीव हाथ से छूटने लगा और अंततः नीचे बैठ गये। कुछ भी करने की इच्छाशक्ति खो बैठे हैं।

ऐसा नहीं है कि अर्जुन के मन में शुरू से ही राज्य की कामना नहीं है या अर्जुन को पता है कि राज्य का सुख क्षणिक है और हर सुख का अन्तिम छोर होता है। सुख है तो आगे दुःख है। जैसे मीठा खाना अच्छा तो लगता है लेकिन अधिक मीठा खाने से वज़न बढ़ जाता है और कई प्रकार के रोग शरीर को घेर लेते हैं। जैसे ज्यादा परिश्रम करने वाले, कष्ट करने वाले किसानों या श्रमिकों का कभी भी वज़न नहीं बढ़ता है वह खूब अच्छे से खा सकते हैं और स्वस्थ रहते हैं। परन्तु सुख में रहने वाले लोगों को भोजन कम करना पड़ता है। क्योंकि कोई शारीरिक श्रम नहीं है तो कई और प्रकार के कष्ट आ जाते हैं।

यह विचार राजकुमार सिद्धार्थ के मन में आए जब उन्होंने बाहर सब प्रकार के दुःख देखे, उन्होंने राज्य त्याग दिया और बुद्ध बन गए। यह घटना महावीर के जीवन में घटित होती है और वे महावीर स्वामी बन जाते हैं। 

अगर ऐसी ही घटना अर्जुन के साथ घटित होती तो भगवान् का उपदेश कुछ और होता और वे उसे युद्ध भूमि से ले जाते। परन्तु भगवान् जानते हैं कि अर्जुन का स्वभाव क्षत्रिय स्वभाव है। बाण चलाना, वार करना यह उसकी सहज वृत्ति है। सहज वृत्ति उसका धर्म बन जाता है। भगवान् ने यह बात अठारहवें अध्याय में कही है -

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः

अर्जुन क्षत्रिय हैं। भगवान् जानते हैं कि अगर वह जङ्गल में भी चला जाए, संन्यास ले ले और अगर शेर आ जाए तो वह अपने सहज धर्म से बाण चलाएगा ही। वह यह नहीं सोचेगा कि जीवन तो एक दिन जाना ही है शेर के ही काम आ जाए।

इतनी निर्भयता अगर आ जाती तो अर्जुन की छलाँग लग जाती। मृत्यु का डर नहीं रह जाता और अमरत्व का प्रवास प्रारम्भ हो जाता। हमारे ऋषि मुनियों के आश्रम के आस-पास शेर घूमते रहते थे, क्योंकि उनमें समत्व का भाव था, करुणा का भाव था अतः वे निर्भय थे।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। 
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

सारे जङ्गली श्वापदों के लिए भी अद्वेष्टा होते हैं। किसी के लिए उनके मन में द्वेष नहीं होता है।

उस समय जो घटना घटती है वह अर्जुन के साथ नहीं हो रही है। इसलिये भगवद्गीता का सारा उपदेश पराक्रम के लिए है। श्रीभगवान् कहते हैं जो सहज कर्म है, सदोष होते हुए भी उसका त्याग करने का कोई कारण नहीं है। सारे कर्म ही दोष के साथ है, ऐसा कोई कर्म नहीं है जिसका कोई दोष न हो।

रोटी बनाते समय अग्नि से उसके आसपास के कई कीटाणु मर जाते हैं। पवित्र यज्ञ करते समय भी उसकी अग्नि से आसपास के कई कीटाणु, जीवाणु मर जाते हैं। वहाँ भी हत्या हो रही है। अग्नि को भी धूएँ का दोष है। दोष होते हुए भी काम करने पड़ते हैं, इसीलिए क्षत्रिय को भी हत्या का दोष होते हुए भी लड़ना पड़ेगा।

सामने सारे आततायी है या उनके साथ देने वाले हैं, अतः इन सब का नाश करना होगा, यह श्रीभगवान् अर्जुन को बड़ी स्पष्टता के साथ समझाते हैं। अर्जुन इस समय शोकग्रस्त हैं और सोच रहे हैं, जिनके लिए राज्य की कामना है उन्हीं का नाश करना है। ऐसी स्वाभाविक प्रतिक्रिया किसी भी व्यक्ति की होगी कि मेरे अपने खड़े हैं उन्हें मैं कैसे मारूँ।  
सामने कौन खड़े हैं? यह अर्जुन अगले श्लोक में बता ही देते हैं।

1.34

आचार्याः(फ्) पितरः(फ्) पुत्रास्, तथैव च पितामहाः।
मातुलाः(श्) श्चशुराः(फ्) पौत्राः(श्), श्यालाः(स्) सम्बन्धिनस्तथा।।1.34।।

आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा (अन्य जितने भी) सम्बन्धी हैं,



1.35

एतान्न हन्तुमिच्छामि, घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य, हेतोः(ख्) किं(न्) नु महीकृते।।1.35।।

(मुझ पर) प्रहार करने पर भी (मैं) इनको मारना नहीं चाहता, (और) हे मधुसूदन! (मुझे) त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी (मैं इनको मारना नहीं चाहता), फिर पृथ्वी के लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या?

विवेचन : वे कहते हैं कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, मेरे पिता समान लोग, पितामह, मेरे मामा, श्वसुर, मेरे पौत्र,मेरे शालक अन्य कई सम्बन्धी खड़े हैं इन्हें मैं मारना नहीं चाहता, चाहे ये मेरे प्राण भी ले लें। वे मेरी हत्या कर दें, मैं अकेला ही मर जाऊँ यह अच्छा ही होगा। वे मुझ पर प्रहार करें तब भी मैं उन्हें मारना नहीं चाहता। हे मधुसूदन! अगर त्रैलोक्य का राज्य, (आकाश, पृथ्वी, पाताल) भी मुझे मिल जाए तो भी मैं उन्हें मारना नहीं चाहता फिर इस पृथ्वी की क्या बात है। स्वर्ग भी मुझे मिल जाए तब भी मैं अपनों को नहीं मार सकता। स्वजनों की हत्या करने के बिना अगर राज्य मिलता है तो अर्जुन को चाहिए यह अर्जुन का भाव है।
 Between the lines जिसे कहते हैं।

श्रीभगवान् यह जानते हैं कि अर्जुन का जब क्षत्रियत्व जागेगा तब अर्जुन युद्ध करके उन्हें मार देंगे। जो भाव अन्दर हैं वही बाहर निकलना चाहिए तभी काम ठीक से हो पाता है। इसे ही योग कहा गया है।

योगः कर्मसु कौशलं।

जो काम कुशलता से किया जाता है उसे ही योग कहते हैं।

आगे श्रीभगवान् यह भी बताते हैं
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।

 अन्दर की बात मैं करता हूँ तो सिद्धि प्राप्त हो जाती है। सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए हमें अपने अन्दर जो है उसी के अनुसार आचरण करना चाहिए, कर्म करना चाहिए।

अगर कोई अच्छी चित्रकारी करता है तो उसे चित्रकार बनना चाहिए, अगर अच्छा गाता है गायक बनना चाहिए, अगर भाषाविद् है तो भाषा का अच्छा ज्ञान लेकर नवीन साहित्य का निर्माण करना चाहिए। किसी बच्चे के दसवीं वर्ग में भाषा में अच्छे अङ्क आते हैं तब भी वह आस-पास के वातावरण से प्रभावित होकर इंजीनियर बनने का प्रयास करता है और उसके परिवार में माता-पिता भी उसे पर दबाव डालते हैं। ऐसे में विपरीत परिस्थितियांँ निर्माण हो जाती है और बालक मानसिक रूप से दुर्बल होकर ग़लत कदम उठा सकते हैं।

हमें अपने अन्दर झाँकने की आवश्यकता होती है, अन्दर क्या है यह पता लगाना आवश्यक है।

अर्जुन स्वभावत: क्षत्रिय हैं परन्तु अभी कुछ और सोच रहे हैं।

1.36

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः(ख्), का प्रीतिः(स्) स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्, हत्वैतानाततायिनः।।1.36।।

हे जनार्दन! (इन) धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को मारकर हम लोगों को क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने से तो हमें पाप ही लगेगा।

विवेचन : हे जनार्दन, धृतराष्ट्र के सारे लोगों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? ये सारे पाप का आश्रय लेने वाले हैं, आततायी हैं परन्तु इन को मार कर भी हत्या का पाप तो लगेगा ही। 

वसिष्ठ स्मृति में आततायी के लक्षण इस प्रकार बतलाये गये हैं-

अग्निदो गदरवैश्व शस्त्रपाणिर्धनापहः।

क्षेत्रदारापहर्ता च षडेते ह्याततायिन।।( 3 । 19)

आग लगाने वाला, विष देेने वाला, हाथ में शस्त्र लेकर मारने को उद्यत, धन हरण करने वाला, जमीन छीनने वाला और स्त्री का हरण करने वाला ये छहों ही आततायी हैं।’

दुर्योधनादि में आततायी के उपर्युक्त लक्षण पूरे पाये जाते हैं। लाक्षा-भवन में आग लगाकर उन्होंने पाण्डवों को जलाने की चेष्टा की थी, भीमसेन के भोजन में विष मिला दिया था, हाथ में शस्त्र लेकर मारने को तैयार थे ही। जूए में छल करके पाण्डवों का समस्त धन और सम्पूर्ण राज्य हर लिया था, अन्यायपूर्वक द्रौपदी को सभा में लाकर उसका घोर अपमान किया था और जयद्रथ उन्हें हर कर ले गया था।

इनसे बड़े आततायी कौन हो सकते हैं?
ऊपर बताएं छ: लक्षणों में से एक भी लक्षण हो तो वह आतंकी है यहाँ तो पूरे के पूरे लक्षण दिखाई देते हैं।
 
अहिंसा परमो धर्म। 

यह हमें पता है परन्तु हमें अधूरा ज्ञान दिया गया।
पूरा श्लोक है-
अहिंसा परमो धर्म धर्महिंसा तथैव च।
अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्म प्रवर्तते।।

अर्थात अहिंसा परम धर्म है परन्तु धर्म रक्षा हेतु की गयी हिंसा उससे भी श्रेष्ठ है।

महावीर स्वामी ने इस पर पूरा तत्व ज्ञान खड़ा किया है। 
परन्तु मूल तत्व यह है कि धर्म की रक्षा के लिए हिंसा की जाती है तो वह श्रेष्ठ है। धर्म की क्या व्याख्या है? भगवद्गीता में पहला श्लोक का पहला अक्षर धर् और सञ्जय ने गाया हुआ भगवद्गीता का अन्तिम अक्षर म है। इस तरह भगवद्गीता आरम्भ से अन्त तक धर्म को पिरोती है। धर्म की व्याख्या करती है। धर्म उसी को कहते हैं जो स्वभावगत तुम्हारा कर्म है। मानव धर्म को बचाने के लिए हत्या की जाती है तो वह भी धर्म कहलाती है।

तब केवल अहिंसा परमो धर्म मानकर नहीं चल सकते उसके आगे का वचन धर्महिंसा तथैव च को मानना पड़ता है।

जैसे सीमा पार से आए आतंकवादी को अगर कोई सैनिक मार देता है तो हमारे राष्ट्रपति उसका सम्मान करते हैं उसे मेडल देते हैं। क्योंकि वह आतंकवादी देश में घुसकर कई लोगों की हत्या कर देता।

याज्ञवल्क्य स्मृति में एक वचन है।
किसी भी स्वार्थ सहित क्रिया को अर्थशास्त्र कहा जाता है और अहैतुक क्रिया को धर्मशास्त्र कहते हैं। इसलिए अर्थशास्त्र से धर्मशास्त्र श्रेष्ठ है क्योंकि वहाँ पर मैं और मेरा यह भाव नहीं है।

अर्जुन के मन में अपने परिजनों को न मारने का विचार चल रहा है एक तरफ परिवार का धर्म है और दूसरी तरफ क्षत्रिय धर्म है। अर्जुन सोच रहे हैं कि जिन पितामह भीष्म ने मुझे अपने हाथों का झूला बनाकर झुलाया है, द्रोणाचार्य ने मुझे अपने हाथों से बाण चलाना सिखाया है आज मुझे उन्हीं पर बाण चलाना, मारना होगा। अर्जुन के मन और बुद्धि में द्वंद्व चल रहा है। परिवार धर्म और क्षत्रिय धर्म में युद्ध छिड़ गया है और अर्जुन इस अन्दर के युद्ध से निपट नहीं पा रहे हैं।

दो युद्धों में मम को हटाना पड़ता है। मेरे हित से अधिक मेरे परिवार का हित है।

कुलस्यार्थे त्यजेदेकम् ग्राम्स्यार्थे कुलंज्येत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥

कुटुम्ब के लिए स्वयं के स्वार्थ का त्याग करना चाहिए, गाँव के लिए कुटुम्ब का त्याग करना चाहिए, देश के लिए गाँव का त्याग करना चाहिए और आत्मा के लिए समस्त वस्तुओं का त्याग करना चाहिए।

अभी दुर्योधन और दु:शासन जैसे आततायियों से अधिक हस्तिनापुर के राज्य के हित की बात है। हस्तिनापुर को इनके आतंक से मुक्त कराना होगा। परिवार धर्म से क्षत्रिय धर्म श्रेष्ठ है यह बात श्रीभगवान् अर्जुन को बताना चाहते हैं।

1.37

तस्मान्नार्हा वयं(म्) हन्तुं(न्), धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं(म्) हि कथं(म्) हत्वा, सुखिनः(स्) स्याम माधव।।1.37।।

इसलिये अपने बान्धव (इन) धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को मारने के लिये हम योग्य नहीं हैं; क्योंकि हे माधव! अपने कुटुम्बियों को मारकर (हम) कैसे सुखी होंगे?

विवेचन : अर्जुन कह रहे हैं कि इन धृतराष्ट्र के सगे सम्बन्धियों को मारने के हम योग्य नहीं हैं, हम इन्हें कैसे मार सकते हैं। अपने स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं। यह बात जो अर्जुन के मन में आ रही है वह दुर्योधन के मन में क्यों नहीं आई? पाण्डवों ने तो पाँच गाँव ही माँगे थे। दुर्योधन दे सकता था परन्तु अर्जुन और दुर्योधन में यह मूलभूत अन्तर है।

1.38

यद्यप्येते न पश्यन्ति, लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं(न्) दोषं(म्), मित्रद्रोहे च पातकम्।।1.38।।

यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होने वाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होने वाले पाप को नहीं देखते,


1.39

कथं(न्) न ज्ञेयमस्माभिः(फ्), पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन।।1.39।।

(तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होने वाले दोष को ठीक-ठीक जानने वाले हम लोग इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों न करें?

विवेचन : अर्जुन कह रहे हैं कि मेरे लोभ के कारण मेरे कुल का नाश हो रहा है क्योंकि मुझे राज्य चाहिए। लोभ के कारण जिनका विवेक नष्ट हो गया है, कुल का नाश करने वाले दुर्योधन और अपने मित्रों के साथ द्रोह कर,उन्हें मार कर हम भी अपने कुल नाश के दोष के भागी होंगे। वह पापी है, अधर्मी है, परन्तु हम तो धर्म जानते हैं।
हे जनार्दन! इस धर्म का पालन मैं कैसे करूँ?

1.40

कुलक्षये प्रणश्यन्ति, कुलधर्माः(स्) सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं(ङ्) कृत्स्नम्, अधर्मोऽभिभवत्युत।।1.40।।

कुल का क्षय होने पर सदा से चलते आये कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं और धर्म का नाश होने पर (बचे हुए) सम्पूर्ण कुल को अधर्म दबा लेता हैं।

विवेचन : अर्जुन कह रहे हैं कुल के नष्ट होने से सदा से चलते आ रहे कुल धर्म भी नष्ट हो जाएँगे। धर्म का नाश होने से पूरे कुल को अधर्म दबोच लेगा। युद्ध के बाद केवल स्त्रियाँ एवं बच्चे बचेंगे और उनकी दुर्गति होगी।

1.41

अधर्माभिभवात्कृष्ण, प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय, जायते वर्णसङ्करः।।1.41।।

हे कृष्ण! अधर्म के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं; (और) हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर पैदा हो जाते हैं।

विवेचन : अधर्म के बढ़ने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाएँगी। हे वार्ष्णेय! अकेली स्त्रियाँ होने पर दुष्ट लोग दुराचार करेंगे एवं वर्णसङ्कर होगा और जो सन्तति होगी वह भी बहुत ही नकारात्मक होगी।

1.42

सङ्करो नरकायैव, कुलघ्नानां(ङ्) कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां(ल्ँ), लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥1.42॥

वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने वाला ही (होता है)। श्राद्ध और तर्पण न मिलने से इन (कुलघातियों) के पितर भी (अपने स्थान से) गिर जाते हैं।

विवेचन : अर्जुन का तर्क कहाँ तक पहुँच गया। अब अर्जुन कह रहे हैं-
स्त्रियों के साथ दुराचार होने पर वर्णसङ्कर से उत्पन्न होने वाली सन्तान भी पापी होगी, अधर्मी होगी और हमारे अगली पीढ़ी भी नहीं बचेगी। मृत्यु के पश्चात् पिण्डदान करने वाले भी नहीं बचेंगे और इस तरह हमारे पितर भी नीचे गिर जाएँगे। हे भगवान! इस कुल धर्म के नाश के दोष से मुझे बचाइए।

1.43

दोषैरेतैः(ख्) कुलघ्नानां(व्ँ), वर्णसङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः(ख्), कुलधर्माश्च शाश्वताः॥1.43॥

इन वर्णसंकर पैदा करने वाले दोषों से कुलघातियों के सदा से चलते आये कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं।

विवेचन : वर्णसङ्कर से सदा से चलते आ रहे कुल धर्म एवं जाति धर्म नष्ट हो जाएंगे। इन दोषों से अर्जुन अगली पीढ़ी को बचाना चाहते हैं।

1.44

उत्सन्नकुलधर्माणां(म्), मनुष्याणां(ञ्) जनार्दन।
नरकेऽनियतं(व्ँ) वासो, भवतीत्यनुशुश्रुम॥1.44॥

हे जनार्दन! जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, (उन) मनुष्यों का बहुत काल तक नरकों में वास होता है, ऐसा (हम) सुनते आये हैं।

विवेचन : अर्जुन कहते हैं - हे जनार्दन! जिनके कुल धर्म नष्ट हो जाते हैं उनका बहुत काल तक नर्क में वास होता है, यह हम सुनते आ रहे हैं। इस तरह हमारे कुल के पूर्वजों को नर्क में वास करना पड़ा, तो उसका कारण मैं बनूँगा। पूर्वजों को नर्क में वास करने के लिए, प्रतिबद्ध करने का पाप लगने पर मुझे भी नरक में रहना पड़ेगा।

1.45

अहो बत महत्पापं(ङ्), कर्तुं(व्ँ) व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन, हन्तुं(म्) स्वजनमुद्यताः॥1.45॥

यह बड़े आश्चर्य (और) खेद की बात है कि हम लोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं, जो कि राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के लिये तैयार हो गये हैं।

विवेचन : बड़े दु:ख और शोक की बात है कि हम अपने राज्य के सुख के लोभ में स्वजनों का वध करने का निश्चय कर चुके हैं।
यहाँ पर अर्जुन मोह से पूर्ण रूप से ग्रसित हैं। अर्जुन, जो एक महावीर हैं, अत्यन्त प्रतापी हैं, इस प्रकार के मोह के कारण अपनी क्षमता को भूलते जा रहे हैं और अन्यान्य प्रकार के तर्क देते जा रहे हैं। यह भी कह रहे हैं कि इससे अच्छा तो यही लोग मुझे मार दें, आत्महत्या की ओर प्रेरित हो रहे हैं।

1.46

यदि मामप्रतीकारम्, अशस्त्रं(म्) शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्, तन्मे क्षेमतरं(म्) भवेत्।।1.46।।

अगर (ये) हाथों में शस्त्र-अस्त्र लिये हुए धृतराष्ट्र के पक्षपाती लोग युद्धभूमि में सामना न करने वाले (तथा) शस्त्र रहित मुझ को मार भी दें (तो) वह मेरे लिये बड़ा ही हितकारक होगा।

विवेचन : अर्जुन कह रहे हैं कि मुझ शास्त्ररहित को धृतराष्ट्र के शस्त्रधारी लोग मार भी दें तो मेरे लिए अच्छा है। अर्जुन, मोह में पूरी तरह शोकग्रस्त होकर अत्यन्त निराशा में चले जाते हैं।

1.47

सञ्जय उवाच एवमुक्त्वार्जुनः(स्) संख्ये, रथोपस्थ उपाविशत्।विसृज्य सशरं(ञ्) चापं(म्), शोकसंविग्नमानसः।।1.47।।

संजय बोले - ऐसा कहकर शोकाकुल मन वाले अर्जुन बाण सहित धनुष का त्याग करके युद्धभूमि में रथ के पिछले भाग में बैठ गये।

विवेचन : सञ्जय कह रहे हैं अत्यन्त मोह से ग्रसित शोकाकुल अवस्था में अर्जुन के हाथ से गाण्डीव छूट जाता है और अर्जुन रथ के पीछे जाकर बैठ जाते हैं। तो क्या भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने के लिए उकसाया? 
नहीं! यहाँ समझने वाली बात यह है कि श्रीभगवान् ने युद्ध को रोकने का पूरा प्रयत्न किया। श्रीभगवान् स्वयं दूत बनकर गए थे, युद्ध को टालने की पूरी चेष्टा की थी परन्तु दुर्योधन इस युद्ध के लिए अडिग रहा। अतः श्रीभगवान् अर्जुन को यह बताना चाहते हैं कि इस तरह के दुष्ट आततायियों को मूल से नष्ट करना धर्म है।

इस प्रकार आज का यह विवेचन सम्पूर्ण हुआ एवं इसे भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पण किया गया। 

विचार मंथन (प्रश्नोत्तर):-
प्रश्नकर्ता : जयश्री दीदी 
प्रश्न : मृत्यु उपरान्त देहदान करें या न करें? देह संस्कार होना चाहिए क्या?
उत्तर : मृत्यु के पश्चात् यह शरीर नष्ट हो जाता है यह भौतिक शरीर जला दिया जाता है तो इसकी चिन्ता नहीं होनी चाहिए। बचता है वह सूक्ष्म शरीर है। जाते-जाते भी दान करते जाना अच्छी बात है। अन्त में होने वाला देह संस्कार नहीं है वह अंत्येष्टि संस्कार है। वह अवश्य होना चाहिए। यह संस्कार सूक्ष्म शरीर के लिए है।

प्रश्नकर्ता : निखिल भैया
प्रश्न : पूजा करते समय कोई भूल-चूक हो जाती है तो क्या करें, क्या इससे कोई नुकसान हो सकता है?
उत्तर : श्रीभगवान् हमारी भूल-चूक देखने के लिए नहीं बैठे हैं। परन्तु कुछ बातें सामान्य मनुष्य की समझ में आ सके इसलिये की जाती है। जैसे छोटे बच्चों को हम कहते हैं कि खाना नहीं खाएगा तो बीमार हो जाएगा ऐसा भय हम  दिखाते हैं जिससे कि बच्चा खाना खा ले।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।
 इसी तरह कुछ कारण भय के बना दिए गए। भगवान् कुछ नहीं चाहते भाव अर्पण करने से सन्तुष्ट हो जाते हैं। हमारी पूजा अगर भय के कारण हो रही है तो उसका कोई लाभ नहीं है। भाव के साथ होनी चाहिए।
यह सब करने के लिए हमें अन्दर की ओर जाना होता है और भगवान बाहर नहीं हैं वह अन्दर ही हैं। भाव अर्पण करने के लिए हमें उस भाव तक पहुँचना होगा। विचारहीन होना पड़ेगा जब तक विचारहीन नहीं होते तब तक विकारहीन नहीं होते।

 प्रश्नकर्ता : रवींद्रनाथ भैया
प्रश्न : कुलधर्म क्या होता है?
उत्तर : प्रत्येक परिवार के कुछ नियम होते हैं। उनका पालन करना कुलधर्म होता है। कुल की देवी होती है। बच्चा जन्म लेता है तब कुछ संस्कार होते हैं। देवी की पूजा की जाती है, इस तरह प्रत्येक कुल के कुछ नियम उपचार होते हैं।

बड़ों को देखकर छोटे जो व्यवहार करते हैं जो सीखते हैं उसे कुलधर्म कहते हैं। पिताजी अगर बड़ों के पैर छूते हैं तो छोटे बच्चे अपने आप सीख जाते हैं। परन्तु अगर पुरुष घर में न रहे तो बच्चे किससे सीखेंगे?
महिलाएं इस कार्य को करती आ रही है। इसलिए अगर पुत्र नहीं है तो पुत्री दोनों कुलों के धर्म को आगे बढ़ाती है।

प्रश्नकर्ता : अंजू दीदी
प्रश्न : इस प्रथम अध्याय का सार क्या होगा? गीता जी का अर्थ समझने के लिए कौन सी पुस्तक पढ़े? पूजा करने बैठते हैं तो मन में विचार आते रहते हैं उनको कैसे रोके?
उत्तर : भगवद्गीता की अग्नि को प्रज्वलित करने वाला यह प्रथम अध्याय है। इसलिये अर्जुन के विषाद को योग कहा गया क्योंकि वह ऐसी जगह जाकर खड़े हैं जहाँ  से छलाँग लगाई जा सकती है। इस युद्ध में गीताजी का प्राकट्य हुआ इसलिये इस युद्ध को याद किया जाता है अन्यथा और भी कई बड़े-बड़े युद्ध हुए हैं उनको याद नहीं रखा जाता। अर्जुन के मन में युद्ध के बाद भी ग्लानि रहती कि मैंने अपने लोगों को मार दिया।

श्रीभगवान् ने बहुत बड़ी शिक्षा हमें दी है कि कोई हमारे पास आता है तो हमें सुनना चाहिए।

गीता जी का अर्थ समझने के लिए नियमित रूप से विवेचन सुने। गीता प्रेस की साधक संजीवनी का नियमित पठन करें।
भगवद्गीता हमें योग के मार्ग पर ले जाती है, सिखाती है कि हम कैसे बैठे, कैसे साँस ले। हमें भगवद्गीता को कण्ठस्थ करके जीवन में लाने का प्रयास करना चाहिए।

प.पू. स्वामी जी कहते हैं गीता पढ़े, पढ़ायें, जीवन में लायें।

अर्जुन ने प्रश्न पूछा है
चञ्चलं हि मनः कृष्ण, प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये, वायोरिव सुदुष्करम् ॥
मन तो बहुत चञ्चल है भगवान्। 

तब श्रीभगवान् बताते हैं
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो, मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय, वैराग्येण च गृह्यते॥

मन तो चञ्चल है ही पर तू प्रयास करता रह। ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़।
यह भी नहीं कर सकते तो बारहवें अध्याय में बताया है कि फल की इच्छा त्याग दें।

प्रश्नकर्ता : पद्मिनी दीदी 
प्रश्न : अगर हम दो धर्म के बीच में पारिवारिक धर्म के बीच में फँसे हैं कोई बताने वाला नहीं है तो क्या करें?
उत्तर : गीता जी हमें समझा रही है बात को ध्यान से समझें। अधिक लोगों का हित जिसमें हो उसे करें। समष्टि का कल्याण जिसमें हो उसके पक्ष में होना चाहिए।

प्रार्थना एवं हनुमान चालीसा के साथ सत्र का समापन हुआ।

।। ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्याय:।।

इस प्रकार ॐ तत सत - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘अर्जुनविषादयोगनामक’ पहला अध्याय पूर्ण हुआ।