विवेचन सारांश
मोहग्रस्त अर्जुन का अत्यन्त शोकाकुल होना
अतः श्रीभगवान् चाहते थे कि अर्जुन के माथे से सारा भार निकल जाए, जो भी विचारों का द्वंद्व अर्जुन के मन में चल रहा है वह समाप्त हो जाए। त्रिलोक के स्वामी, भूत और भविष्य के ज्ञाता भगवान् श्रीकृष्ण यह जानते थे कि अर्जुन के मन में मोह के बीज अङ्कुरित हो चुके हैं और यह बड़ा वृक्ष बने, उसके पहले इसे उखाड़ फेंकना आवश्यक है। इसलिये दोनों सेनाओं के बीच में इस तरह अर्जुन का रथ खड़ा किया गया कि अर्जुन को दोनों सेनाएँ स्पष्ट दिखे तब अर्जुन का विषाद आरम्भ हुआ। अर्जुन ने देखा कि दोनों ही तरफ मेरे अपने ही लोग हैं। मेरे गुरुजी, पितामह, दामाद, श्वसुर, सुह्रद व मित्र हैं। मैं इन सब को मार कर राज्यारोहण करना चाहता हूँ? अर्जुन का विषाद इतना बढ़ गया कि अर्जुन नीचे बैठ गये, गाण्डीव हाथ से छूटकर नीचे गिर गया, हाथ-पाँव काँपने लगे, शरीर में जलन होने लगी, कुछ भी विचार करने की क्षमता अर्जुन ने खो दी है, मन भ्रमित है।
1.32
न काङ्क्षे विजयं(ङ्) कृष्ण, न च राज्यं(म्) सुखानि च।
किं(न्) नो राज्येन गोविन्द, किं(म्) भोगैर्जीवितेन वा।।1.32।।
येषामर्थे काङ्क्षितं(न्) नो, राज्यं(म्) भोगाः(स्) सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे, प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।।1.33।।
आचार्याः(फ्) पितरः(फ्) पुत्रास्, तथैव च पितामहाः।
मातुलाः(श्) श्चशुराः(फ्) पौत्राः(श्), श्यालाः(स्) सम्बन्धिनस्तथा।।1.34।।
एतान्न हन्तुमिच्छामि, घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य, हेतोः(ख्) किं(न्) नु महीकृते।।1.35।।
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः(ख्), का प्रीतिः(स्) स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्, हत्वैतानाततायिनः।।1.36।।
वसिष्ठ स्मृति में आततायी के लक्षण इस प्रकार बतलाये गये हैं-
अग्निदो गदरवैश्व शस्त्रपाणिर्धनापहः।
क्षेत्रदारापहर्ता च षडेते ह्याततायिन।।( 3 । 19)
आग लगाने वाला, विष देेने वाला, हाथ में शस्त्र लेकर मारने को उद्यत, धन हरण करने वाला, जमीन छीनने वाला और स्त्री का हरण करने वाला ये छहों ही आततायी हैं।’
दुर्योधनादि में आततायी के उपर्युक्त लक्षण पूरे पाये जाते हैं। लाक्षा-भवन में आग लगाकर उन्होंने पाण्डवों को जलाने की चेष्टा की थी, भीमसेन के भोजन में विष मिला दिया था, हाथ में शस्त्र लेकर मारने को तैयार थे ही। जूए में छल करके पाण्डवों का समस्त धन और सम्पूर्ण राज्य हर लिया था, अन्यायपूर्वक द्रौपदी को सभा में लाकर उसका घोर अपमान किया था और जयद्रथ उन्हें हर कर ले गया था।
इनसे बड़े आततायी कौन हो सकते हैं?अर्थात अहिंसा परम धर्म है परन्तु धर्म रक्षा हेतु की गयी हिंसा उससे भी श्रेष्ठ है।
कुलस्यार्थे त्यजेदेकम् ग्राम्स्यार्थे कुलंज्येत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
कुटुम्ब के लिए स्वयं के स्वार्थ का त्याग करना चाहिए, गाँव के लिए कुटुम्ब का त्याग करना चाहिए, देश के लिए गाँव का त्याग करना चाहिए और आत्मा के लिए समस्त वस्तुओं का त्याग करना चाहिए।
तस्मान्नार्हा वयं(म्) हन्तुं(न्), धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं(म्) हि कथं(म्) हत्वा, सुखिनः(स्) स्याम माधव।।1.37।।
यद्यप्येते न पश्यन्ति, लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं(न्) दोषं(म्), मित्रद्रोहे च पातकम्।।1.38।।
कथं(न्) न ज्ञेयमस्माभिः(फ्), पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन।।1.39।।
कुलक्षये प्रणश्यन्ति, कुलधर्माः(स्) सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं(ङ्) कृत्स्नम्, अधर्मोऽभिभवत्युत।।1.40।।
अधर्माभिभवात्कृष्ण, प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय, जायते वर्णसङ्करः।।1.41।।
सङ्करो नरकायैव, कुलघ्नानां(ङ्) कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां(ल्ँ), लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥1.42॥
दोषैरेतैः(ख्) कुलघ्नानां(व्ँ), वर्णसङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः(ख्), कुलधर्माश्च शाश्वताः॥1.43॥
उत्सन्नकुलधर्माणां(म्), मनुष्याणां(ञ्) जनार्दन।
नरकेऽनियतं(व्ँ) वासो, भवतीत्यनुशुश्रुम॥1.44॥
अहो बत महत्पापं(ङ्), कर्तुं(व्ँ) व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन, हन्तुं(म्) स्वजनमुद्यताः॥1.45॥
यदि मामप्रतीकारम्, अशस्त्रं(म्) शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्, तन्मे क्षेमतरं(म्) भवेत्।।1.46।।
सञ्जय उवाच एवमुक्त्वार्जुनः(स्) संख्ये, रथोपस्थ उपाविशत्।विसृज्य सशरं(ञ्) चापं(म्), शोकसंविग्नमानसः।।1.47।।
प्रश्नकर्ता : रवींद्रनाथ भैया
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्याय:।।