विवेचन सारांश
ज्ञान की प्राप्ति से आनन्द की पराकाष्ठा

ID: 5076
हिन्दी
रविवार, 30 जून 2024
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग
2/2 (श्लोक 9-28)
विवेचक: गीता विशारद डॉ आशू जी गोयल


गुरु वन्दना एवं दीप प्रज्वलन के साथ अत्यन्त पावन अध्याय का विवेचन प्रारम्भ हुआ। पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण एवं पूर्वजों तथा महापुरुषों के आशीर्वाद से ही हम इस जन्म में श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ पा रहें है। गीता जी को पढ़ने और समझने से ज्यादा आनन्द की पराकाष्ठा कोई हो ही नहीं सकती। यह अध्याय ज्ञान का भण्डार है।  मानव जीवन के कल्याण के लिए तीन प्रकार की श्रद्धा बताई गई है। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा कि यदि कोई भक्त शास्त्रों की उपेक्षा करके कोई कार्य श्रद्धापूर्वक करता है तब उसका परिणाम क्या होता है? वही उत्तर इस अध्याय में दिया गया है।

भगवान तीन प्रकार के भोजन, तप, यज्ञ एवं दान के बारे में बताते हैं। सबसे पहले भोजन की बात करें तो सात्त्विक पुरुषों का भोजन कैसा होगा, तामसिक पुरुषों का भोजन कैसा होगा एवं राजसिक पुरुषों का भोजन कैसा होगा? यह बताया गया है। पुरुष शब्द एक संज्ञा है, जो जीवित है वह पुरुष है, इसका पुरुष एवं महिला वाला पुरुष नहीं है। यदि हम बात करें कि श्रद्धा क्या है? तो हम केवल सफेद या लाल रङ्ग की कल्पना नहीं कर सकते। हमें उसे देखना है तो किसी और का अधिक्षेपण करना पड़ेगा। इसी तरह श्रद्धा भी अकेले नहीं बताई जा सकती। पूजा में अधिक्षेपण की तुम्हारी श्रद्धा कैसी है?

किसी की मकान में किसी की कार में, किसी की मोबाइल में श्रद्धा अलग-अलग हो सकती है। पूजा में भी हम सोच सकते हैं कि मीराबाई या सन्त तुलसीदास जी कैसी पूजा करते थे? हमारी जैसी श्रद्धा होगी वैसा ही व्यक्तित्व बनेगा। यदि किसी के घर हम जाते हैं और देखते हैं कि उसका सत्रह साल का बच्चा मोबाइल देख रहा है, क्रिकेट खेल रहा है तो वह वैसा ही बनेगा यदि वह पापा के कार्यालय के काम सम्भाल रहा है या व्यापार सम्भाल रहा है तो वह थोड़ा समझदार है। कोई समाज के कार्य कर रहा है, अतः समाज के अलग-अलग कार्यों में अलग-अलग श्रद्धा आरोपित करके वह जो भी करेगा वैसा ही बनेगा। इस तरह जैसा खाए अन्न वैसा बने मन। पिछले अध्याय में भगवान ने सात प्रकार के भोजन के बारे में बताया-जिसमें आयु, शक्ति, सुख, कीर्ति बढ़ाने वाले, हृदय को शक्ति प्रदान करने वाला सात्त्विक भोजन, सात्त्विक मनुष्य को प्रिय होता है। आगे के श्लोक में राजसिक व तामसिक भोजन के बारे में भगवान ने बताया  है।

17.9

कट्वम्ललवणात्युष्ण, तीक्ष्णरूक्षविदाहिनः|
आहारा राजसस्येष्टा, दुःखशोकामयप्रदाः||17.9||

अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखे, अति रूखे और अति दाह कारक आहार अर्थात् भोजन के पदार्थ राजस मनुष्य को प्रिय होते हैं, (जो कि) दुःख, शोक और रोगों को देने वाले हैं।

विवेचन:- राजसिक पुरुष कड़वे खट्टे जिसमें तेज नमक डला हुआ हो तीखे एवं खट्टे फल खाना पसन्द करते हैं उसके प्रभावस्वरूप दु:ख आदि उत्पन्न होते हैं। राजसिक पुरुष को परिणाम तो पता है किन्तु फिर भी वह परिणाम की चिन्ता किए बिना कर्म करता हैं। जीवन एक बार मिला है मुझे, मौज में जिया जाए जो परिणाम होगा देखा जाएगा वह तो तात्कालिक सुख की प्राप्ति होती है।

17.10

यातयामं(ङ्) गतरसं(म्), पूति पर्युषितं(ञ्) च यत्|
उच्छिष्टमपि चामेध्यं(म्), भोजनं(न्) तामसप्रियम्||17.10||

जो भोजन सड़ा हुआ, रस रहित, दुर्गन्धित, बासी और जूठा है तथा (जो) महान अपवित्र (मांस आदि) भी है, (वह) तामस मनुष्य को प्रिय होता है।

विवेचन:- अधिक कच्चा या ज्यादा पका हुआ, डीप फ्रीजर में रखा हो जो कि ऋतु का फल न हो यह सब तामसिक भोजन के अन्तर्गत आते हैं। हमें ऋतु का फल और सब्जी खानी चाहिए जो अपने पचास किलोमीटर के क्षेत्र के अन्दर उगती है, वही खानी चाहिए। दूसरे देशों के फल या दूर से आए फल, सब्जी नहीं खानी चाहिए। जिस फल में दुर्गन्ध आए जो  बासी हो गया हो, वह नहीं खाना चाहिए। कुछ पदार्थ फलों को सड़ा कर बनाए जाते हैं जैसे कि मदिरा, रात का खाना सुबह खाना, वह भी बासी है। लड्डू ,जलेबी, गुलाब जामुन यह बासी नहीं होते हैं जब तक की इनको देख कर लगे न कि ये खराब हो गए हैं। किसी का झूठा खाना, बचा हुआ खाना नहीं खाना चाहिए। उस पर गाय, कुत्ते और कौवे का अधिकार होता है। माँस, मछली को नहीं खाना चाहिए एवं मुर्दे को स्पर्श करके नहीं खाना चाहिए। जैन लोग जमीन के नीचे उगने वाली वस्तुएँ नहीं खाते हैं। यह सब पदार्थ तामसिक होते हैं भगवान ने इसका कोई परिमाण नहीं बताया है। राजसिक को कम करें, तामसिक को एकदम त्याग दें और सात्त्विक को बढ़ा लें तो हमारा जीवन आनन्दमय, व सात्त्विक हो जाएगा एवं अध्यात्म की साधना की दृष्टि से उत्तम हो जाएगा।

17.11

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो, विधिदृष्टो य इज्यते|
यष्टव्यमेवेति मनः(स्), समाधाय स सात्त्विकः||17.11||

यज्ञ करना ही कर्तव्य है - इस तरह मन को समाधान (संतुष्ट) करके फलेच्छा रहित मनुष्यों द्वारा जो शास्त्रविधि से नियत यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक है।

विवेचन:- इस श्लोक में भगवान यज्ञ के विषय में बता रहे हैं। यदि हम कोई भी कार्य या कर्त्तव्य करें तो वह शास्त्रों के नियम अनुसार हो, परम्पराओं से युक्त हो नीति युक्त हो एवं फल की आकाङ्क्षा के बिना हो तो वह सात्त्विक माना जाता है। माँ अपने बच्चों को यह सोचकर बड़ा करे कि मेरा बेटा है और इसे बड़ा करना मेरा कर्त्तव्य है। मैं इसे अच्छे संस्कार दूँ एवं अच्छे से बड़ा करूँ और दूसरी तरफ यह सोचकर पालन किया कि बड़ा होकर मेरी सेवा करेगा। तब यह फल की आकाङ्क्षा है। माँ अपने बच्चों को बड़ा करती है, यह सोचकर कि वह बड़ा होकर मुझे प्यार से रखेगा एवं अपने कर्त्तव्य को पूरा करेगा किन्तु बेटा विवाह होने के बाद अपनी पत्नी के साथ अलग रहने लग जाता है, तब मन को बहुत ज्यादा दु:ख होता है किन्तु यदि आकाङ्क्षा ही न रखें कि बेटा अपने कर्त्तव्य कर्म को पूर्ण करेगा तो वह दु:खी नहीं होगी। अतः फल की आकाङ्क्षा से स्वयं को मुक्त रखने वाला सतोगुणी एवं दु:खों से मुक्त होता है। अतः फल की दृष्टि से किया गया कर्म सात्त्विक न होकर राजसिक हो जाता है किन्तु बिना फल की दृष्टि से किया गया कर्म सात्त्विक है।

17.12

अभिसन्धाय तु फलं(न्), दम्भार्थमपि चैव यत्|
इज्यते भरतश्रेष्ठ, तं(म्) यज्ञं(म्) विद्धि राजसम्||17.12||

परन्तु हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! जो यज्ञ फल की इच्छा को लेकर अथवा दम्भ (दिखावटीपन) के लिये भी (किया जाता है), उस यज्ञ को (तुम) राजस समझो।

विवेचन:- जो फल की इच्छा को ध्यान में रखकर या दम्भाचरण  के द्वारा कार्य करता है वह राजसिक प्रवृत्ति है। यदि मुझे कोई देख रहा है तो ही मैं अच्छा कार्य करुँ, हर जगह मेरी प्रशंसा हो यदि कोई मेरे कपड़े, मेरा घर देखे तब भी वह मेरी प्रशंसा करे। अतः दिखावे के दृष्टिकोण से किया गया कार्य राजसिक है। राजसिक व्यक्ति तभी अच्छा काम करता है किन्तु सात्त्विक व्यक्ति कोई देखे या न देखे वह हमेशा ही अच्छा कार्य करेगा।

कार्य किसी और ने किया और श्रेय मैंने ले लिया वह भी पाप है। बहू ने सब्जी बनाई और बिटिया ने लाकर परोस दी, खाने वाले ने प्रशंसा की एवं बिटिया को सौ रूपये दिए। सास ने यह नहीं बोला कि यह सब्जी बहू ने बनाई है। अतः दूसरों का श्रेय लेना भी पाप है। 

17.13

विधिहीनमसृष्टान्नं(म्), मन्त्रहीनमदक्षिणम्|
श्रद्धाविरहितं(म्) यज्ञं(न्), तामसं(म्) परिचक्षते||17.13||

शास्त्र विधि से हीन, अन्न-दान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के (और) बिना श्रद्धा के किये जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।

विवेचन:- व्रत रखा और वह भूल से टूट गया तो हम क्या करते हैं कि टूट गया तो पराठे बनाकर खा लेते हैं। पुण्य का क्षीण तो हो गया किन्तु पराठे बनाकर खाना गलत है। स्वामी जी के पिताजी भी बहुत अनुष्ठान करते थे। एक सज्जन के यहाँ विवाह था। वह कहते हैं कि लड़के वाले कहते हैं कि कुछ ऐसा कर दीजिए की विवाह एक घण्टे में पूरा हो जाए, मैं आपको दक्षिणा दे दूँगा। जब उन्होंने मना किया तो यजमान बोले कि मैं दोगुनी दक्षिणा दे दूँगा। तब भी पण्डित जी ने मना कर दिया। पण्डित जी के पुत्र ने पिताजी से पूछा कि जब आपको यजमान पूर्ण दक्षिणा दे रहे थे तो आपको पूजा कर देना था। पण्डित जी कहते हैं कि यदि मैं ऐसा कर देता तो मेरी आदत बिगड़ जाती ।

शास्त्र विहीन लोगों के द्वारा गणेश जी और दुर्गा जी के पण्डाल में फिल्मी गीतों पर नृत्य किया जाता है एवं मद्यपान करके व्यक्ति पूजा करते हैं। यह परम्पराओं के विरुद्ध है, यह तामसिक है।

17.14

देवद्विजगुरुप्राज्ञ, पूजनं(म्) शौचमार्जवम्|
ब्रह्मचर्यमहिंसा च, शारीरं(न्) तप उच्यते||17.14||

देवता, ब्राह्मण, गुरुजन और जीवन्मुक्त महापुरुष का यथायोग्य पूजन करना, शुद्धि रखना, सरलता, ब्रह्मचर्य का पालन करना और हिंसा न करना - (यह) शरीर-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

विवेचन:- आदि शङ्कराचार्य द्वारा गृहस्थ को पाँच तरह की पूजा बताई गई है- सूर्य भगवान को जल चढ़ाना, शिवजी, विष्णु जी, देवी, गणेश जी इन पाँच देवताओं की उपासना नित्य करनी चाहिए। ऐसे ब्राह्मण जो यज्ञ करते हैं, अग्निहोत्र करते हैं, वेदपाठ करते हैं, शुचिता में रहते हैं, पवित्रता का ध्यान रखते हैं, मेरे द्वारा किसी को कष्ट न हो, मैं किसी के दु:ख का कारण न बन जाऊँ, मेरी इन्द्रियों में संयमन हो इस तरह का व्यवहार करना सात्त्विक प्रवृत्ति है। 

सत्यनारायण राठी जी जो कि बीकानेर में रहते हैं, दोपहर में अपने घर खाना खाने जाते थे किन्तु एक दिन वह बाहर गए और वापस आ गए बोले दस मिनट बाद जाऊँगा। फिर आधे घण्टे बाद गए फिर वापस आ गए, बोले बाद में जाऊँगा, उसके बाद एक बार और गए फिर वापस आ गए उनके साथी ने पूछा आप इस तरह से क्यों कर रहे हैं? आज आप खाना खाने क्यों नहीं जा रहे हैं? उन्होंने बोला कि मेरे स्कूटर के नीचे कुत्ते का पिल्ला सो रहा यदि मैंने उसे जगा दिया तो उसकी नींद खराब हो जाएगी। अतः किसी को इतना सा भी कष्ट नहीं देना। दोपहर में मिस्त्री जी प्लास्टर कर रहे थे तब उन व्यक्ति के पिताजी जाकर कहते हैं कि धूप में काम क्यों करवा रहे हो? शाम को करवाना घर के अन्दर के कार्य करवा लो अतः दूसरों की सोचना एवं उनका ध्यान रखना भी तप है।

17.15

अनुद्वेगकरं(म्) वाक्यं(म्), सत्यं(म्) प्रियहितं(ञ्) च यत्|
स्वाध्यायाभ्यसनं(ञ्) चैव, वाङ्मयं(न्) तप उच्यते||17.15||

जो किसी को भी उद्विग्न न करने वाला, सत्य और प्रिय तथा हितकारक भाषण है (वह) तथा स्वाध्याय और अभ्यास (नाम जप आदि) भी - यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

विवेचन:- दूसरों को अपनी वाणी से आहत नहीं करना। उद्वेग नहीं देना, मैंने किसी को शब्द बोले और दूसरों को उद्वेग हो गया। ऐसा न बोलें, सत्य बोलें, प्रेम से बोलें, कड़वा न बोलें। मैं किसी को अशांत नहीं करुँ क्योंकि यदि मैंने बोला उसके मन में हलचल हो रही है तो वह पाप हो गया। प्रिय बोलें, अप्रिय सत्य न बोलें। किसी का दिल दु:खे, ऐसी बातें न बोलें। ऊपर वाले को जिह्वा में शक्ति पसन्द नहीं, जिह्वा में इसीलिए तो एक भी हड्डी नहीं दी।

एक दिन दाँत और जिह्वा में झगड़ा हो गया। दाँत बोला अगर मुझे गुस्सा आया तो मैं तुझे चबा जाऊँगा। किन्तु जिह्वा बोली कि यदि मुझे गुस्सा आ गया तो तुम तो बत्तीस के बत्तीस ही तोड़ दिए जाओगे। अतः जो भी बोलो सम्भाल कर बोलो। चीन में एक सन्त का देहान्त होने वाला था उनके शिष्य ने कहा कि गुरु जी अन्तिम सन्देश दे दीजिए। गुरु जी ने मुख खोल बोला बताओ अन्दर क्या दिखता हैं? एक सौ बीस वर्ष की उनकी आयु थी। अन्दर लार आदि थे शिष्यों ने कहा तो गुरू जी ने पूछा दाँत दिखते हैं क्या? उन्होंने कहा नहीं, तो गुरु जी ने कहा कि दाँत कड़क थे चले गए, जीभ मुलायम थी तो आज तक है।

तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर।
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर।

शब्द सम्हारे बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव।
एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव।।​
गोली का घाव कुछ दिन में भर जाता है किन्तु बोली का घाव कभी नहीं भरता। अतः वाणी का तप भी बताया गया है।

17.16

मनः(फ्) प्रसादः(स्) सौम्यत्वं(म्), मौनमात्मविनिग्रहः|
भावसंशुद्धिरित्येतत्, तपो मानसमुच्यते||17.16||

मन की प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मन का निग्रह (और) भावों की भली भाँति शुद्धि - इस तरह यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

विवेचन:- सदा प्रसन्न रहना, सौम्यता, हिंसा से दूर रहना, स्वयं पर सयंमन अपना मन मैला नहीं करना, शुद्धता पर ध्यान देना चाहिए। हम मन्दिर में जाते हैं तो हमें प्रसाद मिलता है। प्रसाद क्या है? हमने भगवान को कुछ प्रसन्नता से अर्पण किया और भगवान प्रसन्न हो गए। उन्होंने वापस हमें वह प्रसाद दे दिया। अतः बिना इच्छा के जो प्रसाद मिले उसे ग्रहण करना ही मन की प्रसन्नता है। अतः हमेशा खुश रहने का राज है कि दूसरे का कर्त्तव्य मेरा अधिकार नहीं है। यह मन की प्रसन्नता का मूल मन्त्र है। जो यह सूत्र पकड़ लेता है वह सदैव प्रसन्न रहता है। 

17.17

श्रद्धया परया तप्तं(न्), तपस्तत्त्रिविधं(न्) नरैः|
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः(स्), सात्त्विकं(म्) परिचक्षते||17.17||

परम श्रद्धा से युक्त फलेच्छा रहित मनुष्यों के द्वारा (जो) तीन प्रकार (शरीर, वाणी और मन) - का तप किया जाता है, उसको सात्त्विक कहते हैं।

विवेचन:- फल की इच्छा से रहित शरीर, मन और वचन से जो तीन प्रकार का तप किया जाता है, उसे सात्त्विक कहते हैं।

17.18

सत्कारमानपूजार्थं(न्), तपो दम्भेन चैव यत्|
क्रियते तदिह प्रोक्तं(म्), राजसं(ञ्) चलमध्रुवम्||17.18||

जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये तथा दिखाने के भाव से किया जाता है, वह इस लोक में अनिश्चित (और) नाशवान फल देने वाला (तप) राजस कहा गया है।

विवेचन:- सत्कार, मान और पूजा से दूसरों को दिखाने के लिए जो तप किया जाता है उसे राजसिक तप कहते हैं। यदि चन्दा देने कोई आए और हमने पैसे कम कर करके दिया एवं मेरा नाम होगा इसलिए दान दिया, दिखावे की दृष्टि से दान दिया। यदि वहाँ मन्दिर में पूजा करने मिलेगी इस दृष्टिकोण से दान दिया तो वह राजसिक दान है।

17.19

मूढग्राहेणात्मनो यत्, पीडया क्रियते तपः|
परस्योत्सादनार्थं(म्) वा, तत्तामसमुदाहृतम्||17.19||

जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से अपने को पीड़ा देकर अथवा दूसरों को कष्ट देने के लिये किया जाता है, वह (तप) तामस कहा गया है।

विवेचन:- जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से अपने को पीड़ा देकर अथवा दूसरों को कष्ट देने के लिये किया जाता है, वह तप तामसिक कहा गया है।

17.20

दातव्यमिति यद्दानं(न्), दीयतेऽनुपकारिणे|
देशे काले च पात्रे च, तद्दानं(म्) सात्त्विकं(म्) स्मृतम्||17.20||

दान देना कर्तव्य है - ऐसे भाव से जो दान देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर अनुपकारी को अर्थात् निष्काम भाव से दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।

विवेचन:- देश, काल, पात्र को समझकर दिया गया दान राजसिक दान कहलाता है। भगवान ने जो कुछ भी दिया उसको देना मेरा कर्त्तव्य है। भगवान ने दान के निम्नानुसार लक्षण बताए हैं-

पहला दान देना ही चाहिए देना हमारा कर्त्तव्य है। 

दूसरा बदले में हमें कुछ नहीं चाहिए न धन्यवाद या न फोटो, कुछ नहीं।

तीसरा हम कहाँ दे रहे हैं, हम किसको दे रहे हैं और किस परिस्थिति में दे रहे हैं इसका विचार करके ही दान देना चाहिए। वैष्णव में दसवाँ हिस्सा दान देने को कहा गया है और दस प्रतिशत दान रिश्तेदारों को अलग से देने को कहा गया। इस तरह पच्चीस तरह के दान बताए गए हैं।

धन का दान, अन्न, अर्थ, सोने का दान, भूमि का दान, भोजन, प्राण, यश, प्रसन्नता का दान, अधिकार का दान, ध्यान, मंत्र, ज्ञान, संतोष का दान कन्यादान, पुत्र का दान, सुख का दान, सत्कार, ब्रह्म विद्या का दान, कर्ज माफ करना आदि दान हैं। जिसकी मृत्यु निकट हो, उसको भगवद्गीता सुनाना एवं भजन सुनाना। यह बड़ा दान कहा गया है। बिना अपेक्षा से किया गया दान ही सात्त्विक दान है।

17.21

यत्तु प्रत्युपकारार्थं(म्), फलमुद्दिश्य वा पुनः|
दीयते च परिक्लिष्टं(न्), तद्दानं(म्) राजसं(म्) स्मृतम्||17.21||

किन्तु जो (दान) क्लेशपूर्वक और प्रत्युपकार के लिये अथवा फल-प्राप्ति का उद्देश्य बनाकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है।

विवेचन:- क्लेश करके या फिर प्रत्युपकार की भावना से दिया गया दान, दान नहीं कहलाता। जैसे कि कोई माँगने वाले आए और हमने क्लेश करके दान दिया या फिर किसी का तिरस्कार करके दान दिया या फिर मन्दिर में इसलिए दान दिया कि मुझे भगवान के दर्शन अच्छे से हो जाएँ, यह दान, राजसिक दान कहलाता है।

17.22

अदेशकाले यद्दानम्, अपात्रेभ्यश्च दीयते|
असत्कृतमवज्ञातं(न्), तत्तामसमुदाहृतम्||17.22||

जो दान बिना सत्कार के तथा अवज्ञापूर्वक अयोग्य देश और काल में कुपात्र को दिया जाता है, वह (दान) तामस कहा गया है।

विवेचन:- बिना सत्कार के अपात्र को दिया गया दान, तिरस्कार की भावना से दिया गया दान, दान नहीं कहलाता। यदि कोई मद्यपान करता है और हम यह सोचकर उसे दान दें कि यह मेरा कार्य कर देता है इसलिए दान दे दूँ तो वह भी तामसिक दान है। तिरस्कार करके दिया गया दान भी तामसिक दान ही कहलाता है।

17.23

ॐ तत्सदिति निर्देशो, ब्रह्मणस्त्रिविधः(स्) स्मृतः|
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च, यज्ञाश्च विहिताः(फ्) पुरा||17.23||

ऊँ, तत् और सत् - इन तीन प्रकार के नामों से (जिस) परमात्मा का निर्देश (संकेत) किया गया है, उसी परमात्मा से सृष्टि के आदि में वेदों तथा ब्राह्मणों और यज्ञों की रचना हुई है।

17.23 writeup

17.24

तस्मादोमित्युदाहृत्य, यज्ञदानतपः(ख्) क्रियाः|
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः(स्), सततं(म्) ब्रह्मवादिनाम्||17.24||

इसलिये वैदिक सिद्धान्तों को मानने वाले पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत यज्ञ, दान और तप रूप क्रियाएँ सदा 'ॐ’ इस परमात्मा के नाम का उच्चारण करके (ही) आरम्भ होती हैं।

17.24 writeup

17.25

तदित्यनभिसन्धाय, फलं(म्) यज्ञतपः(ख्) क्रियाः|
दानक्रियाश्च विविधाः(ख्), क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभि:||17.25||

तत्' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा के लिये ही सब कुछ है - ऐसा मान कर मुक्ति चाहने वाले मनुष्यों द्वारा फल की इच्छा से रहित होकर अनेक प्रकार की यज्ञ और तप रूप क्रियाएँ तथा दान रूप क्रियाएँ की जाती हैं।

17.25 writeup

17.26

सद्भावे साधुभावे च, सदित्येतत्प्रयुज्यते|
प्रशस्ते कर्मणि तथा, सच्छब्दः(फ्) पार्थ युज्यते||17.26||

हे पार्थ ! सत्- ऐसा यह परमात्मा का नाम सत्ता मात्र में और श्रेष्ठ भाव में प्रयोग किया जाता है तथा प्रशंसनीय कर्म के साथ 'सत्' शब्द जोड़ा जाता है।

17.26 writeup

17.27

यज्ञे तपसि दाने च, स्थितिः(स्) सदिति चोच्यते|
कर्म चैव तदर्थीयं(म्), सदित्येवाभिधीयते||17.27||

यज्ञ तथा तप और दान रूप क्रिया में (जो) स्थिति (निष्ठा) है, (वह) भी 'सत्' - ऐसे कही जाती है और उस परमात्मा के निमित्त किया जाने वाला कर्म भी 'सत्' - ऐसा ही कहा जाता है।

विवेचन:- श्रीभगवान ने इन चार श्लोकों में ॐ की महिमा बताई है।
 
 


सभी उपनिषदों में, वेदों में जो प्रथम मन्त्र माना जाता है वह ॐ है। ॐ को व्यक्त करने के लिए हम ओ उम, आ उम ऐसा लिख देते हैं। अङ्ग्रेजी में Oam या OM लिखकर भी हम उसको व्यक्त करते हैं। सबसे पहले जब प्रकृति का निर्माण हुआ तब जो पहला भूत तत्त्व बना वह आकाश है। आकाश में जो पहला प्राकट्य हुआ वह है शब्द। इसीलिए उसे कहा गया शब्द ब्रह्म।

आकाश ईश्वर के सबसे निकट है, जिसे हम लोग अन्तराल, अन्तरिक्ष, स्पेस आदि भी कहते हैं। इसे प्रणव कहा गया, ब्रह्म कहा गया, निर्गुण कहा गया, सगुण, साकार, निराकार, शब्द, ईश्वर, माया, और ओंकार कहा गया। यह एक अनन्त यात्रा है प्रभव-प्रलय-प्रभव...। यह एक अनन्त यात्रा है!

ब्रह्माण्ड का निर्माण शब्द से होता है। ब्रह्माण्ड के निर्माण में सबसे पहले और सबसे अन्त में जो होता है वह है शब्द। अब, इस ॐ को थोड़ा विस्तार से देखते हैं। इसके चार विभाग हैं 'अ' 'उ' 'म' '्' , अ से अकार, उ से उकार, म से मकार और ्-हलन्त। शब्द, स्थान देखते हैं तो अ आता है बैखरी जो वाणी बोली जाती है और सुनी जाती है। इसका स्थान है कण्ठ। इसका रूप है स्थूल। इसके देवता हैं ब्रह्मा। इसकी स्थिति है जाग्रत। इसका कार्य है उत्पत्ति करना। करण अर्थात् इसकी कर्मेन्द्रियाँ इसके साधन हैं और रजोगुण इसकी स्थिति है।

उकार इसकी स्थिति है मध्यमा। यह हृदय से है। आँखों के स्पर्श से इसकी अभिव्यक्ति करना। जो कहना है वह हाव-भाव से कहना। प्रेम और क्रोध की अभिव्यक्ति आँखों से होती है। यह सब कुछ सूक्ष्म है, इसलिए इसका रूप सूक्ष्म है। इसके देवता विष्णु हैं और इसकी स्थिति स्वप्न है। पुष्टि इसका कार्य है, ज्ञानेन्द्रियाँ इसके करण हैं। सतोगुण इसकी स्थिति है।

मकार, पश्यन्ति, नाभि से सङ्कल्प मात्र से कोई बात घटने लग जाती है, ऐसी स्थिति इसकी आती है। कारण इसका रूप है। शङ्कर इसके देवता हैं। सुषुप्ति इसकी स्थिति है। संहार इसका कार्य है। अन्तःकरण इसका कारण है। तमोगुण इसकी स्थिति है।

हलन्त एक परा है। परा वो है जो हम समझ न सके। जिसने रसगुल्ला खाया ही नहीं है, उसको हम यह समझा ही नहीं सकते कि रसगुल्ले का स्वाद कैसा है, यही परा है। इसका स्थान व्यापक है। शून्य इसका रूप है। भगवान शङ्कर इसके देवता हैं। तुरीय इसकी स्थिति है। सत्ता इसका कार्य है। अस्तित्व इसका करण है गुणातीत इसका गुण है।

कोई पूछ सकते हैं कि यह तुरीय क्या है? जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे स्थिति है तुरीय। न जागृत है, न स्वप्न है, न सुषुप्ति है, यह सिद्धि अवस्था है। सिद्ध पुरुष इसको जान सकते हैं।

ज्ञानेश्वर महाराज एक दीवार पर बैठे हुए थे। सिंह पर बैठकर चाङ्गदेव महाराज उनके सामने आए। चाङ्गदेव महाराज केवल चौदह वर्ष के थे और वे सिंह पर बैठकर आए। सोलह वर्ष की आयु के ज्ञानेश्वर महाराज जो दीवार पर बैठे थे। दीवार से कहते हैं चल दीवार चाङ्गदेव का स्वागत करते हैं।

मुक्तिका सजी रसी‌ चल दे|

इतना कहते ही दीवार चल देती है। इतरा विद्या है, जो प्रकृति से इसका सामञ्जस्य हो गया और ये सिद्ध को प्राप्त होते हैं। ॐ एक पूर्ण है। A से Z तक सबकुछ पूर्ण कर लें तभी अङ्ग्रेजी का अल्फाबेट बैठेगा। A, H, Z इन सभी को नियम से बैठा देंगे, तभी अल्फाबेट सही होगा। इस तरह से ॐ पूरी भाषा को पूर्ण कर देता है।

कुछ लोग फँस गए। वैष्णव कहते हैं, हम विष्णु को मानेंगे। शैव कहते, हम तो शिवजी को मानेंगे। आद्य कहते हैं हम शक्ति को मानेंगे। तब भगवान कहते हैं तत्, ॐ तत्। उपनिषद में तत् को परिभाषित किया गया है।

ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदम् ......

जब सब कुछ पूर्ण नहीं है तो उपनिषद् पूर्णता की बात करता है। तत् अर्थात् वह ईश्वर जिसकी मैं आराधना करना चाहता हूँ। कोई कहता है मैं राम जी की आराधना करना चाहता हूँ। कोई कहता है मैं शिवजी की आराधना करना चाहता हूँ। कोई कहता है मैं कृष्ण की आराधना करना चाहता हूँ। कोई कहता है मैं शक्ति की आराधना करना चाहता हूँ तो कोई निर्गुण उपासक है। तत् अर्थात् ईश्वर को मैं किस रूप में देखना चाहता हूँ और किसी भी रूप में देखूँ, वह है सत्। वह सत्य का स्वरूप होना चाहिए। इतने ही प्रकार से सच्चिदानन्द ब्रह्म का नाम कहा गया है। उसी सृष्टि के आधार पर ब्राह्मण और वेद रचे गए। इसीलिए वेद और मन्त्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की दान तप क्रिया सदा ॐ इस परमात्मा के नाम स्मरण से शुरू होती है और सत्य, इस प्रकार से परमात्मा का नाम सत्य भाव में, श्रेष्ठ भावना से रखा जाता है।

श्रीभगवान कहते हैं हे पार्थ! उत्तम कर्मों में सत्य शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसलिए अच्छे सङ्ग को सत्सङ्ग कहा जाता है। अच्छे गुण होंगे तो सतोगुण। अच्छी वाणी हो तो सत्वाणी। जो भी अच्छा है उसे हम सत् से जोड़ देते हैं और वह सत्य हो जाता है।

हमारे यहाँ दीर्घकाल की परम्परा है, जब ज्ञानी, साधु-सन्त अपने सत्सङ्ग को पूर्ण करते थे तब वे कहते थे ॐ तत् सत्, आज इतना ही। इसीलिए वेदव्यास भगवान ने जब गीता जी को अट्ठारह अध्यायों में विभाजित किया तो उनको नाम दिया और प्रत्येक अध्याय के साथ में एक पुष्पिका जोड़ दी। जब हम कोई पूजा विधि करते हैं, तब हमारा मन कहीं पर भटक गया, हम कुछ दोष कर बैठे तो ॐ तत् सत् कह दिया तो सब-कुछ ठीक हो जाता है। जो भी भूल हो गई वह ॐ तत् सत् में पूर्ण हो जाती है। किसी भी पाठक से अध्याय का पाठ करते समय कोई दोष हो जाता है तो, अन्त में पुष्पपिका कह देने पर सब कुछ पूर्ण हो जाता है।

17.28

अश्रद्धया हुतं(न्) दत्तं(न्), तपस्तप्तं(ङ्) कृतं(ञ्) च यत्|
असदित्युच्यते पार्थ, न च तत्प्रेत्य नो इह||17.28||

हे पार्थ ! अश्रद्धा से किया हुआ हवन, दिया हुआ दान (और) तपा हुआ तप तथा (और भी) जो कुछ किया जाय, (वह सब) 'असत्' - ऐसा कहा जाता है। उसका (फल) न तो यहाँ होता है और न मरने के बाद ही होता है अर्थात् उसका कहीं भी सत् फल नहीं होता।

विवेचन:- श्रीभगवान कहते हैं हे अर्जुन! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दान, तप और जो कुछ भी शुभ कर्म किया जाता है वह असत् हो जाता है। इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है, न परलोक में ही लाभदायक है। इसलिए जो भी कार्य करना चाहे दान, तप, हवन उन सभी को श्रद्धा के साथ ही करने से पूर्ण हो जाता है और श्रद्धा के बिना किया हुआ कार्य असत् हो जाता है।

इस प्रकार श्रद्धात्रयविभागयोग नाम का सप्तदशोऽध्याय: पूर्ण हुआ।

प्रश्नोत्तर सत्र:-

प्रश्नकर्ता:- मंजू दीदी
प्रश्न:- हमारे अन्दर दैवीय और आसुरी दोनों प्रवृत्तियों का वास है। हम किस प्रकार पता करें कि हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर:- इसके लिए हमें श्रेय और प्रेय का विचार करना होगा। जो हमारे लिए अच्छा है वह श्रेय है और जो हमें अच्छा लगता है वह प्रेय है। सदैव प्रेय से श्रेय की ओर जाने का प्रयास करना चाहिए। जैसे - जैसे सात्त्विकता और भक्ति बढ़ती जाती है, श्रेय ही प्रेय बनता जाता है।

प्रश्नकर्ता:- मंजू दीदी
प्रश्न:- क्या शाकाहारी भोजन से पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन नहीं मिलता है?
उत्तर:- यह सब भ्रामक बातें हैं। दालें, दूध आदि में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन होता है।

प्रश्नकर्ता:- डॉ राजकुमार भैया
प्रश्न:- क्या यज्ञ, तप, दान आदि शास्त्र विधि से ही करने चाहिए? पहले और ग्यारहवें श्लोक में कुछ विरोधाभास लग रहा है।
उत्तर:- भगवान ने सोलहवें अध्याय में ही कह दिया था कि सब कुछ शास्त्र विधि से ही करना चाहिए। अर्जुन ने पूछा कि यदि कोई कार्य शास्त्र विधि से न हो किन्तु श्रद्धा से किया जाए तो क्या वह उचित होगा? तब भगवान ने उत्तर दिया है कि शास्त्र विधि से किया गया कार्य ही श्रेष्ठ है।

प्रश्नकर्ता:- मुरली भैया
प्रश्न:- पुत्र दान किस प्रकार से बताया गया है?
उत्तर:- जैसे राजा दशरथ ने विश्मामित्र जी को अपने पुत्रों का कुछ समय के लिए दान किया था। कई लोग अपने पुत्रों को साधुओं को धर्म कार्य के लिए दान दे देते हैं।

प्रश्नकर्ता:- रेणु दीदी
प्रश्न:- यदि हम किसी को कोई दान देते हैं अथवा किसी पशु को कुछ खिलाते हैं तो हमारे मन में यह आता है कि हमने पुण्य कर्म किया, ईश्वर है हमारी सहायता करेंगे, तो क्या यह भाव मन में आना उचित नहीं है?
उत्तर:- उस व्यक्ति विशेष से कोई आशा नहीं रखनी चाहिए किन्तु पुण्य कर्म का भाव आना गलत नहीं है।

प्रश्नकर्ता:- कबिता दास दीदी
प्रश्न:- हम जो कर्म करते हैं वो हमारे मन के अनुसार होते हैं या भगवान की इच्छा से हम करते हैं?
उत्तर:- हम भगवान की शक्ति से कर्म करते हैं किन्तु वह कर्म हमारी इच्छा के अनुरूप होते हैं।            

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्याय:।।

इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘श्रद्धात्रयविभागयोग’ नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।