विवेचन सारांश
ज्ञान की प्राप्ति से आनन्द की पराकाष्ठा
भगवान तीन प्रकार के भोजन, तप, यज्ञ एवं दान के बारे में बताते हैं। सबसे पहले भोजन की बात करें तो सात्त्विक पुरुषों का भोजन कैसा होगा, तामसिक पुरुषों का भोजन कैसा होगा एवं राजसिक पुरुषों का भोजन कैसा होगा? यह बताया गया है। पुरुष शब्द एक संज्ञा है, जो जीवित है वह पुरुष है, इसका पुरुष एवं महिला वाला पुरुष नहीं है। यदि हम बात करें कि श्रद्धा क्या है? तो हम केवल सफेद या लाल रङ्ग की कल्पना नहीं कर सकते। हमें उसे देखना है तो किसी और का अधिक्षेपण करना पड़ेगा। इसी तरह श्रद्धा भी अकेले नहीं बताई जा सकती। पूजा में अधिक्षेपण की तुम्हारी श्रद्धा कैसी है?
किसी की मकान में किसी की कार में, किसी की मोबाइल में श्रद्धा अलग-अलग हो सकती है। पूजा में भी हम सोच सकते हैं कि मीराबाई या सन्त तुलसीदास जी कैसी पूजा करते थे? हमारी जैसी श्रद्धा होगी वैसा ही व्यक्तित्व बनेगा। यदि किसी के घर हम जाते हैं और देखते हैं कि उसका सत्रह साल का बच्चा मोबाइल देख रहा है, क्रिकेट खेल रहा है तो वह वैसा ही बनेगा यदि वह पापा के कार्यालय के काम सम्भाल रहा है या व्यापार सम्भाल रहा है तो वह थोड़ा समझदार है। कोई समाज के कार्य कर रहा है, अतः समाज के अलग-अलग कार्यों में अलग-अलग श्रद्धा आरोपित करके वह जो भी करेगा वैसा ही बनेगा। इस तरह जैसा खाए अन्न वैसा बने मन। पिछले अध्याय में भगवान ने सात प्रकार के भोजन के बारे में बताया-जिसमें आयु, शक्ति, सुख, कीर्ति बढ़ाने वाले, हृदय को शक्ति प्रदान करने वाला सात्त्विक भोजन, सात्त्विक मनुष्य को प्रिय होता है। आगे के श्लोक में राजसिक व तामसिक भोजन के बारे में भगवान ने बताया है।
17.9
कट्वम्ललवणात्युष्ण, तीक्ष्णरूक्षविदाहिनः|
आहारा राजसस्येष्टा, दुःखशोकामयप्रदाः||17.9||
यातयामं(ङ्) गतरसं(म्), पूति पर्युषितं(ञ्) च यत्|
उच्छिष्टमपि चामेध्यं(म्), भोजनं(न्) तामसप्रियम्||17.10||
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो, विधिदृष्टो य इज्यते|
यष्टव्यमेवेति मनः(स्), समाधाय स सात्त्विकः||17.11||
अभिसन्धाय तु फलं(न्), दम्भार्थमपि चैव यत्|
इज्यते भरतश्रेष्ठ, तं(म्) यज्ञं(म्) विद्धि राजसम्||17.12||
कार्य किसी और ने किया और श्रेय मैंने ले लिया वह भी पाप है। बहू ने सब्जी बनाई और बिटिया ने लाकर परोस दी, खाने वाले ने प्रशंसा की एवं बिटिया को सौ रूपये दिए। सास ने यह नहीं बोला कि यह सब्जी बहू ने बनाई है। अतः दूसरों का श्रेय लेना भी पाप है।
विधिहीनमसृष्टान्नं(म्), मन्त्रहीनमदक्षिणम्|
श्रद्धाविरहितं(म्) यज्ञं(न्), तामसं(म्) परिचक्षते||17.13||
शास्त्र विहीन लोगों के द्वारा गणेश जी और दुर्गा जी के पण्डाल में फिल्मी गीतों पर नृत्य किया जाता है एवं मद्यपान करके व्यक्ति पूजा करते हैं। यह परम्पराओं के विरुद्ध है, यह तामसिक है।
देवद्विजगुरुप्राज्ञ, पूजनं(म्) शौचमार्जवम्|
ब्रह्मचर्यमहिंसा च, शारीरं(न्) तप उच्यते||17.14||
सत्यनारायण राठी जी जो कि बीकानेर में रहते हैं, दोपहर में अपने घर खाना खाने जाते थे किन्तु एक दिन वह बाहर गए और वापस आ गए बोले दस मिनट बाद जाऊँगा। फिर आधे घण्टे बाद गए फिर वापस आ गए, बोले बाद में जाऊँगा, उसके बाद एक बार और गए फिर वापस आ गए उनके साथी ने पूछा आप इस तरह से क्यों कर रहे हैं? आज आप खाना खाने क्यों नहीं जा रहे हैं? उन्होंने बोला कि मेरे स्कूटर के नीचे कुत्ते का पिल्ला सो रहा यदि मैंने उसे जगा दिया तो उसकी नींद खराब हो जाएगी। अतः किसी को इतना सा भी कष्ट नहीं देना। दोपहर में मिस्त्री जी प्लास्टर कर रहे थे तब उन व्यक्ति के पिताजी जाकर कहते हैं कि धूप में काम क्यों करवा रहे हो? शाम को करवाना घर के अन्दर के कार्य करवा लो अतः दूसरों की सोचना एवं उनका ध्यान रखना भी तप है।
अनुद्वेगकरं(म्) वाक्यं(म्), सत्यं(म्) प्रियहितं(ञ्) च यत्|
स्वाध्यायाभ्यसनं(ञ्) चैव, वाङ्मयं(न्) तप उच्यते||17.15||
एक दिन दाँत और जिह्वा में झगड़ा हो गया। दाँत बोला अगर मुझे गुस्सा आया तो मैं तुझे चबा जाऊँगा। किन्तु जिह्वा बोली कि यदि मुझे गुस्सा आ गया तो तुम तो बत्तीस के बत्तीस ही तोड़ दिए जाओगे। अतः जो भी बोलो सम्भाल कर बोलो। चीन में एक सन्त का देहान्त होने वाला था उनके शिष्य ने कहा कि गुरु जी अन्तिम सन्देश दे दीजिए। गुरु जी ने मुख खोल बोला बताओ अन्दर क्या दिखता हैं? एक सौ बीस वर्ष की उनकी आयु थी। अन्दर लार आदि थे शिष्यों ने कहा तो गुरू जी ने पूछा दाँत दिखते हैं क्या? उन्होंने कहा नहीं, तो गुरु जी ने कहा कि दाँत कड़क थे चले गए, जीभ मुलायम थी तो आज तक है।
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर।
शब्द सम्हारे बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव।
एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव।।
मनः(फ्) प्रसादः(स्) सौम्यत्वं(म्), मौनमात्मविनिग्रहः|
भावसंशुद्धिरित्येतत्, तपो मानसमुच्यते||17.16||
श्रद्धया परया तप्तं(न्), तपस्तत्त्रिविधं(न्) नरैः|
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः(स्), सात्त्विकं(म्) परिचक्षते||17.17||
सत्कारमानपूजार्थं(न्), तपो दम्भेन चैव यत्|
क्रियते तदिह प्रोक्तं(म्), राजसं(ञ्) चलमध्रुवम्||17.18||
मूढग्राहेणात्मनो यत्, पीडया क्रियते तपः|
परस्योत्सादनार्थं(म्) वा, तत्तामसमुदाहृतम्||17.19||
दातव्यमिति यद्दानं(न्), दीयतेऽनुपकारिणे|
देशे काले च पात्रे च, तद्दानं(म्) सात्त्विकं(म्) स्मृतम्||17.20||
पहला दान देना ही चाहिए देना हमारा कर्त्तव्य है।
दूसरा बदले में हमें कुछ नहीं चाहिए न धन्यवाद या न फोटो, कुछ नहीं।
तीसरा हम कहाँ दे रहे हैं, हम किसको दे रहे हैं और किस परिस्थिति में दे रहे हैं इसका विचार करके ही दान देना चाहिए। वैष्णव में दसवाँ हिस्सा दान देने को कहा गया है और दस प्रतिशत दान रिश्तेदारों को अलग से देने को कहा गया। इस तरह पच्चीस तरह के दान बताए गए हैं।
धन का दान, अन्न, अर्थ, सोने का दान, भूमि का दान, भोजन, प्राण, यश, प्रसन्नता का दान, अधिकार का दान, ध्यान, मंत्र, ज्ञान, संतोष का दान कन्यादान, पुत्र का दान, सुख का दान, सत्कार, ब्रह्म विद्या का दान, कर्ज माफ करना आदि दान हैं। जिसकी मृत्यु निकट हो, उसको भगवद्गीता सुनाना एवं भजन सुनाना। यह बड़ा दान कहा गया है। बिना अपेक्षा से किया गया दान ही सात्त्विक दान है।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं(म्), फलमुद्दिश्य वा पुनः|
दीयते च परिक्लिष्टं(न्), तद्दानं(म्) राजसं(म्) स्मृतम्||17.21||
अदेशकाले यद्दानम्, अपात्रेभ्यश्च दीयते|
असत्कृतमवज्ञातं(न्), तत्तामसमुदाहृतम्||17.22||
ॐ तत्सदिति निर्देशो, ब्रह्मणस्त्रिविधः(स्) स्मृतः|
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च, यज्ञाश्च विहिताः(फ्) पुरा||17.23||
तस्मादोमित्युदाहृत्य, यज्ञदानतपः(ख्) क्रियाः|
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः(स्), सततं(म्) ब्रह्मवादिनाम्||17.24||
तदित्यनभिसन्धाय, फलं(म्) यज्ञतपः(ख्) क्रियाः|
दानक्रियाश्च विविधाः(ख्), क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभि:||17.25||
सद्भावे साधुभावे च, सदित्येतत्प्रयुज्यते|
प्रशस्ते कर्मणि तथा, सच्छब्दः(फ्) पार्थ युज्यते||17.26||
यज्ञे तपसि दाने च, स्थितिः(स्) सदिति चोच्यते|
कर्म चैव तदर्थीयं(म्), सदित्येवाभिधीयते||17.27||
सभी उपनिषदों में, वेदों में जो प्रथम मन्त्र माना जाता है वह ॐ है। ॐ को व्यक्त करने के लिए हम ओ उम, आ उम ऐसा लिख देते हैं। अङ्ग्रेजी में Oam या OM लिखकर भी हम उसको व्यक्त करते हैं। सबसे पहले जब प्रकृति का निर्माण हुआ तब जो पहला भूत तत्त्व बना वह आकाश है। आकाश में जो पहला प्राकट्य हुआ वह है शब्द। इसीलिए उसे कहा गया शब्द ब्रह्म।
आकाश ईश्वर के सबसे निकट है, जिसे हम लोग अन्तराल, अन्तरिक्ष, स्पेस आदि भी कहते हैं। इसे प्रणव कहा गया, ब्रह्म कहा गया, निर्गुण कहा गया, सगुण, साकार, निराकार, शब्द, ईश्वर, माया, और ओंकार कहा गया। यह एक अनन्त यात्रा है प्रभव-प्रलय-प्रभव...। यह एक अनन्त यात्रा है!
ब्रह्माण्ड का निर्माण शब्द से होता है। ब्रह्माण्ड के निर्माण में सबसे पहले और सबसे अन्त में जो होता है वह है शब्द। अब, इस ॐ को थोड़ा विस्तार से देखते हैं। इसके चार विभाग हैं 'अ' 'उ' 'म' '्' , अ से अकार, उ से उकार, म से मकार और ्-हलन्त। शब्द, स्थान देखते हैं तो अ आता है बैखरी जो वाणी बोली जाती है और सुनी जाती है। इसका स्थान है कण्ठ। इसका रूप है स्थूल। इसके देवता हैं ब्रह्मा। इसकी स्थिति है जाग्रत। इसका कार्य है उत्पत्ति करना। करण अर्थात् इसकी कर्मेन्द्रियाँ इसके साधन हैं और रजोगुण इसकी स्थिति है।
उकार इसकी स्थिति है मध्यमा। यह हृदय से है। आँखों के स्पर्श से इसकी अभिव्यक्ति करना। जो कहना है वह हाव-भाव से कहना। प्रेम और क्रोध की अभिव्यक्ति आँखों से होती है। यह सब कुछ सूक्ष्म है, इसलिए इसका रूप सूक्ष्म है। इसके देवता विष्णु हैं और इसकी स्थिति स्वप्न है। पुष्टि इसका कार्य है, ज्ञानेन्द्रियाँ इसके करण हैं। सतोगुण इसकी स्थिति है।
मकार, पश्यन्ति, नाभि से सङ्कल्प मात्र से कोई बात घटने लग जाती है, ऐसी स्थिति इसकी आती है। कारण इसका रूप है। शङ्कर इसके देवता हैं। सुषुप्ति इसकी स्थिति है। संहार इसका कार्य है। अन्तःकरण इसका कारण है। तमोगुण इसकी स्थिति है।
हलन्त एक परा है। परा वो है जो हम समझ न सके। जिसने रसगुल्ला खाया ही नहीं है, उसको हम यह समझा ही नहीं सकते कि रसगुल्ले का स्वाद कैसा है, यही परा है। इसका स्थान व्यापक है। शून्य इसका रूप है। भगवान शङ्कर इसके देवता हैं। तुरीय इसकी स्थिति है। सत्ता इसका कार्य है। अस्तित्व इसका करण है गुणातीत इसका गुण है।
कोई पूछ सकते हैं कि यह तुरीय क्या है? जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे स्थिति है तुरीय। न जागृत है, न स्वप्न है, न सुषुप्ति है, यह सिद्धि अवस्था है। सिद्ध पुरुष इसको जान सकते हैं।
ज्ञानेश्वर महाराज एक दीवार पर बैठे हुए थे। सिंह पर बैठकर चाङ्गदेव महाराज उनके सामने आए। चाङ्गदेव महाराज केवल चौदह वर्ष के थे और वे सिंह पर बैठकर आए। सोलह वर्ष की आयु के ज्ञानेश्वर महाराज जो दीवार पर बैठे थे। दीवार से कहते हैं चल दीवार चाङ्गदेव का स्वागत करते हैं।
मुक्तिका सजी रसी चल दे|
इतना कहते ही दीवार चल देती है। इतरा विद्या है, जो प्रकृति से इसका सामञ्जस्य हो गया और ये सिद्ध को प्राप्त होते हैं। ॐ एक पूर्ण है। A से Z तक सबकुछ पूर्ण कर लें तभी अङ्ग्रेजी का अल्फाबेट बैठेगा। A, H, Z इन सभी को नियम से बैठा देंगे, तभी अल्फाबेट सही होगा। इस तरह से ॐ पूरी भाषा को पूर्ण कर देता है।
कुछ लोग फँस गए। वैष्णव कहते हैं, हम विष्णु को मानेंगे। शैव कहते, हम तो शिवजी को मानेंगे। आद्य कहते हैं हम शक्ति को मानेंगे। तब भगवान कहते हैं तत्, ॐ तत्। उपनिषद में तत् को परिभाषित किया गया है।
ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदम् ......
जब सब कुछ पूर्ण नहीं है तो उपनिषद् पूर्णता की बात करता है। तत् अर्थात् वह ईश्वर जिसकी मैं आराधना करना चाहता हूँ। कोई कहता है मैं राम जी की आराधना करना चाहता हूँ। कोई कहता है मैं शिवजी की आराधना करना चाहता हूँ। कोई कहता है मैं कृष्ण की आराधना करना चाहता हूँ। कोई कहता है मैं शक्ति की आराधना करना चाहता हूँ तो कोई निर्गुण उपासक है। तत् अर्थात् ईश्वर को मैं किस रूप में देखना चाहता हूँ और किसी भी रूप में देखूँ, वह है सत्। वह सत्य का स्वरूप होना चाहिए। इतने ही प्रकार से सच्चिदानन्द ब्रह्म का नाम कहा गया है। उसी सृष्टि के आधार पर ब्राह्मण और वेद रचे गए। इसीलिए वेद और मन्त्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की दान तप क्रिया सदा ॐ इस परमात्मा के नाम स्मरण से शुरू होती है और सत्य, इस प्रकार से परमात्मा का नाम सत्य भाव में, श्रेष्ठ भावना से रखा जाता है।
श्रीभगवान कहते हैं हे पार्थ! उत्तम कर्मों में सत्य शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसलिए अच्छे सङ्ग को सत्सङ्ग कहा जाता है। अच्छे गुण होंगे तो सतोगुण। अच्छी वाणी हो तो सत्वाणी। जो भी अच्छा है उसे हम सत् से जोड़ देते हैं और वह सत्य हो जाता है।
हमारे यहाँ दीर्घकाल की परम्परा है, जब ज्ञानी, साधु-सन्त अपने सत्सङ्ग को पूर्ण करते थे तब वे कहते थे ॐ तत् सत्, आज इतना ही। इसीलिए वेदव्यास भगवान ने जब गीता जी को अट्ठारह अध्यायों में विभाजित किया तो उनको नाम दिया और प्रत्येक अध्याय के साथ में एक पुष्पिका जोड़ दी। जब हम कोई पूजा विधि करते हैं, तब हमारा मन कहीं पर भटक गया, हम कुछ दोष कर बैठे तो ॐ तत् सत् कह दिया तो सब-कुछ ठीक हो जाता है। जो भी भूल हो गई वह ॐ तत् सत् में पूर्ण हो जाती है। किसी भी पाठक से अध्याय का पाठ करते समय कोई दोष हो जाता है तो, अन्त में पुष्पपिका कह देने पर सब कुछ पूर्ण हो जाता है।
अश्रद्धया हुतं(न्) दत्तं(न्), तपस्तप्तं(ङ्) कृतं(ञ्) च यत्|
असदित्युच्यते पार्थ, न च तत्प्रेत्य नो इह||17.28||
इस प्रकार श्रद्धात्रयविभागयोग नाम का सप्तदशोऽध्याय: पूर्ण हुआ।
प्रश्नोत्तर सत्र:-
प्रश्नकर्ता:- मंजू दीदी
प्रश्न:- हमारे अन्दर दैवीय और आसुरी दोनों प्रवृत्तियों का वास है। हम किस प्रकार पता करें कि हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर:- इसके लिए हमें श्रेय और प्रेय का विचार करना होगा। जो हमारे लिए अच्छा है वह श्रेय है और जो हमें अच्छा लगता है वह प्रेय है। सदैव प्रेय से श्रेय की ओर जाने का प्रयास करना चाहिए। जैसे - जैसे सात्त्विकता और भक्ति बढ़ती जाती है, श्रेय ही प्रेय बनता जाता है।
प्रश्नकर्ता:- मंजू दीदी
प्रश्न:- क्या शाकाहारी भोजन से पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन नहीं मिलता है?
उत्तर:- यह सब भ्रामक बातें हैं। दालें, दूध आदि में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन होता है।
प्रश्नकर्ता:- डॉ राजकुमार भैया
प्रश्न:- क्या यज्ञ, तप, दान आदि शास्त्र विधि से ही करने चाहिए? पहले और ग्यारहवें श्लोक में कुछ विरोधाभास लग रहा है।
उत्तर:- भगवान ने सोलहवें अध्याय में ही कह दिया था कि सब कुछ शास्त्र विधि से ही करना चाहिए। अर्जुन ने पूछा कि यदि कोई कार्य शास्त्र विधि से न हो किन्तु श्रद्धा से किया जाए तो क्या वह उचित होगा? तब भगवान ने उत्तर दिया है कि शास्त्र विधि से किया गया कार्य ही श्रेष्ठ है।
प्रश्नकर्ता:- मुरली भैया
प्रश्न:- पुत्र दान किस प्रकार से बताया गया है?
उत्तर:- जैसे राजा दशरथ ने विश्मामित्र जी को अपने पुत्रों का कुछ समय के लिए दान किया था। कई लोग अपने पुत्रों को साधुओं को धर्म कार्य के लिए दान दे देते हैं।
प्रश्नकर्ता:- रेणु दीदी
प्रश्न:- यदि हम किसी को कोई दान देते हैं अथवा किसी पशु को कुछ खिलाते हैं तो हमारे मन में यह आता है कि हमने पुण्य कर्म किया, ईश्वर है हमारी सहायता करेंगे, तो क्या यह भाव मन में आना उचित नहीं है?
उत्तर:- उस व्यक्ति विशेष से कोई आशा नहीं रखनी चाहिए किन्तु पुण्य कर्म का भाव आना गलत नहीं है।
प्रश्नकर्ता:- कबिता दास दीदी
प्रश्न:- हम जो कर्म करते हैं वो हमारे मन के अनुसार होते हैं या भगवान की इच्छा से हम करते हैं?
उत्तर:- हम भगवान की शक्ति से कर्म करते हैं किन्तु वह कर्म हमारी इच्छा के अनुरूप होते हैं।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्याय:।।