विवेचन सारांश
कर्मज्ञान की विवेचना
सुमधुर प्रार्थना, श्रीहनुमान चालीसा पाठ, दीप प्रज्वलन और गुरु वन्दना के साथ आज के इस सत्र का आरम्भ हुआ। बड़े ही आनन्द का विषय है कि आज हम सब पुनः एक बार अपने इस मानव जीवन को सार्थक करने के लिए, अपने इस मनुष्य शरीर का सार्थक उपयोग करने के लिए और इस जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता में आरूढ़ हो गए। पता नहीं, हमारे इस जन्म के पुण्य हैं, हमारे पूर्वजन्मों के पुण्य हैं या किसी जन्म में किसी सन्त महापुरुष की कृपादृष्टि हमारे ऊपर हो गई, जिस कारण हमारा ऐसा भाग्य उदय हो गया, जो हमको श्रीमद्भगवद्गीता का सान्निध्य मिल गया।
बड़े भाग मानुष तनु पावा |
सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन्हिं गावा ||
बड़े सौभाग्य से मनुष्य शरीर मिला है। सुर दुर्लभ अर्थात् देवता भी मनुष्य योनि में आने के लिए आतुर रहते हैं, क्योंकि मनुष्य योनि ही एकमात्र कर्मयोनि है।
इस अवसर पर श्रीमद्भगवद्गीता के दैनिक पारायण के वार्षिकोत्सव के अवसर पर अखण्ड पारायणत्रय का आयोजन किया गया, जिसका प्रास्ताविक आशीर्वचन कहने के लिए परम पूज्य स्वामीजी पधारे। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता के समान मानव जीवन के कल्याण के लिए न तो कोई दूसरा ग्रन्थ सुलभ है, न इतना गम्य है और न ही इतना प्रभावशाली है। बहुत छोटा परन्तु बहुत शक्तिशाली ग्रन्थ है। श्रीभगवान ने सात सौ श्लोकों में खजाना भर दिया और तिरेपन सौ वर्षों से महापुरुष उस खजाने में गोते लगा कर नये-नये रत्न निकाल कर लाते हैं। यह इस प्रकार का अद्भुत ग्रन्थ है।
चलते-चलते हम इस मार्ग के पथिक बन कर चतुर्थ धाम के यात्री बन गए। पिछले दो सत्रों में हमने कुछ श्लोकों को विस्तार से देखा। आज भी हम एक-दो श्लोकों का विस्तार करेंगे, क्योंकि अब जब हम अट्ठारहवें अध्याय पर पहुँच गए हैं तो यह अपेक्षा है कि कुछ गहरी बात जानी जाए। केवल श्लोकों के अर्थ जान लेना तो ठीक है किन्तु थोड़ा गहरा चिन्तन करने का प्रयास करें, इसलिए यदि विषय थोड़ा कठिन लगे तो आप घबराईएगा नहीं, बल्कि थोड़ा ध्यान बढ़ा लीजिएगा।
पिछले सत्र में हमने अट्ठारहवें श्लोक तक समझा। अट्ठारहवें श्लोक में श्रीभगवान ने ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय तथा कर्ता, कर्म और कर्ण के अन्तर्गत तीन प्रकार के कर्म सङ्ग्रह और तीन प्रकार की कर्म प्रेरणा बतायी। फिर श्रीभगवान ने ज्ञाता और ज्ञेय को छोड़ दिया तथा आगे कर्ता और क्रिया को लिया तथा कर्म को छोड़ दिया। श्रीभगवान ने ऐसा करने के कारण का विस्तार भी किया। हम इसे समझेंगे।
18.19
ज्ञानं(ङ्) कर्म च कर्ता च, त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने, यथावच्छृणु तान्यपि॥18.19॥
विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं, हे अर्जुन! गुणों की सङ्ख्या करने वाले शास्त्र में ज्ञान, कर्म और कर्ता के तीन प्रकार के गुण पाए गए हैं, उन्हें भली प्रकार से सुनो।
श्रीभगवान कह रहे हैं कि जहाँ भी गुण की बात आती है, मूल रूप से तीन गुण ही होते हैं। इन तीन गुणों से ही समस्त ब्रह्माण्ड की रचना है और तीन गुणों के अनुपात के अन्तर होने से हमारे स्वभाव, हमारे रङ्ग-रूप, हमारी स्थितियाँ, हमारी बुद्धि, हमारी पसन्द-नापसन्द सब अलग होती है। सम्पूर्ण सृष्टि इन तीन गुणों से ही है। किन्हीं दो व्यक्तियों के रेटिना एक जैसे नहीं होते, किन्हीं दो व्यक्तियों की अँगुलियों के निशान एक जैसे नहीं होते, जेब्रा की दो लाइनें एक जैसी नहीं होती।
इतनी विविध प्रकृति और मूल तत्त्व केवल तीन-
सत्त्व, रज और तम।
इन तीनों के अनुपात का अन्तर होने से प्रकृति का इतना बड़ा अन्तर है। एक पत्थर भी इन तत्त्वों से ही बना है और एक घोड़ा भी इन तीन तत्त्वों से ही बना है। सूर्य भी इन तीन तत्त्वों से बना है और आकाशगङ्गा भी इन तीन तत्त्वों से ही बनी है। समस्त ग्रह, ग्रहों के प्राणी, वनस्पति, पेड़-पौधे, सब कुछ इन तीन तत्त्वों से ही बने हैं।
जिस प्रकार माताएँ घर में भोजन पकाती हैं, तो एक सब्जी खरीद कर ले आए आलू, आटे की रोटी बना ली और दूध का दही बना लिया। अब यदि यही तीन तत्त्व- आटा, आलू और मसाले एक हज़ार स्त्रियों को दे दिये जाएँ और कहा जाए कि भोजन बना कर लाओ, तो हम देखेंगे कि इन तीन तत्त्वों से ही वे महिलाएँ अनेक प्रकार के भोजन बना कर ला सकती हैं। एक-एक महिला सौ-सौ प्रकार के भोजन बना कर ला सकती है। सब देखने में भी अलग-अलग प्रकार के होंगे और सबका स्वाद भी अलग-अलग होगा। अब यदि यह कहा जाय कि केवल आलू की सब्जी और रोटी बनाएँ, तो भी सबकी आलू की सब्जी और रोटी अलग-अलग प्रकार की होगी। सबकी मात्राएँ और सबका भोजन पकाने का तरीका अलग होगा। उससे उस भोजन का स्वाद और स्वरूप बदल जाएगा।
इसी प्रकार जब परमात्मा सृष्टि की रचना करते हैं तो इन तीन तत्त्वों से ही पूरे ब्रह्माण्ड की रचना हो जाती है।
अगले तीन श्लोकों में श्रीभगवान सात्त्विक ज्ञान, तामस ज्ञान और राजस ज्ञान के विषय में बताते हैं।
श्रीभगवान कहते हैं कि ज्ञान भी तीन प्रकार का होता है। यह तीन गुण सबमें होते हैं, केवल प्रधानता सत्त्व गुण, रजोगुण या तमोगुण की अलग-अलग होती है। ऐसा कोई व्यक्ति या ऐसा कोई पदार्थ नहीं होता जो केवल गुण धारण करता हो।
पूज्य स्वामीजी महाराज, जो अत्यन्त दैवीय पुरुष हैं उन्हें भी रात्रि का विश्राम लेने के लिए निद्रा लेनी पड़ेगी अर्थात् उन्हें तमोगुण धारण करना पड़ेगा। ऐसी सम्भावना नहीं है कि उन्होंने सत्त्वगुण को बढ़ा लिया तो तमोगुण समाप्त हो गया। यह सम्भव ही नहीं है क्योंकि श्रीभगवान ने ऐसी व्यवस्था ही नहीं की है। सबको तमोगुण का आश्रय भी लेना पड़ेगा, रजोगुण का आश्रय भी लेना पड़ेगा और सत्त्वगुण का आश्रय भी लेना पड़ेगा।
आगे श्रीभगवान ज्ञान के विषय में बात कर रहे हैं-
सर्वभूतेषु येनैकं(म्), भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं(म्) विभक्तेषु, तज्ज्ञानं(म्) विद्धि सात्त्विकम्॥18.20॥
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं(न्), नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु, तज्ज्ञानं(म्) विद्धि राजसम्॥18.21॥
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्, कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं(ञ्) च, तत्तामसमुदाहृतम्॥18.22॥
विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं - हे अर्जुन! जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक भूतों में एक अविनाशी परमात्म भाव को विभाग रहित देखता है, उस ज्ञान को तुम सात्त्विक ज्ञान मानो। इस एक वाक्य से इसके गूढ़ अर्थ को समझना कठिन है। जब तक महापुरुषों से इनकी विवेचना नहीं सुनी जाती तब तक हमें इसका वास्तविक अर्थ समझ नहीं आता।
श्रीभगवान कहते हैं कि जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों के नाना प्रकार के भाव को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तुम राजसी ज्ञान मानो।
श्रीभगवान कहते हैं कि जो ज्ञान कार्यरूप शैली में शरीर में ही सम्पूर्ण की तरह आसक्त रहता है तथा जो बिना युक्ति वाला तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है, वह तामसिक ज्ञान है। श्रीभगवान यहाँ ज्ञान की बात कर रहे हैं। ज्ञान को हम नॉलेज कहते हैं।
ज्ञान भी दो प्रकार के होते हैं-
एक लौकिक विद्या का ज्ञान और
दूसरा अलौकिक विद्या का ज्ञान।
लौकिक विद्या का अर्थ है जो विद्या संसार के व्यवहार में काम आने वाली होती है।
अलौकिक ज्ञान, जिसे श्रीभगवान ने नौवें अध्याय में “राजविद्या राजगुह्य" कहा। दोनों को प्राप्त करने का तरीका लगभग एक जैसा ही है।
श्रीभगवान ने ज्ञान की तीन स्थितियाँ बतायी हैं-
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय।
मान लीजिये कोई बालक अपनी बारहवीं की कक्षा उत्तीर्ण करता है और उससे किसी ने पूछा कि तुम्हें क्या बनना है? उसने कहा कि उसे पायलट बनना है। उसे हवाई जहाज उड़ाने का ज्ञान प्राप्त करना है, तो वह ज्ञाता हो गया।
ज्ञाता का अर्थ है जानने वाला।
पायलट बनना है, तो वह ज्ञेय है।
कैसे बनना है? यह ज्ञान हो गया।
अर्थात् जिसने पायलट बनने की इच्छा की थी वह था ज्ञाता। ‘मैं क्या बनूँगा?’ जब यह सोचा था तो वह था ज्ञेय और बीच में उसका जितना प्रशिक्षण हुआ वह था ज्ञान। व्यक्ति ज्ञाता है। क्या करना है? वह ज्ञान है।
ज्ञान सामान्यतः चार प्रकार का होता है।
एक बालक ने एक संस्थान में प्रवेश लिया, फिर जाकर वहाँ थ्योरी अर्थात् सैद्धान्तिक ज्ञान की कक्षा में बैठा और वहाँ पर जो भी प्रशिक्षक आए, उन्होंने व्याख्यान देने आरम्भ किए। इस प्रकार ज्ञान का पहला स्तर आरम्भ हुआ- गुरु से श्रवण। लौकिक ज्ञान हो या अलौकिक ज्ञान- दोनों में ज्ञान प्राप्ति का पहला साधन श्रवण है। छोटा बालक सदैव सुन-सुन कर भाषा सीखता है। बालक हो या वृद्ध, सबका ज्ञान प्राप्ति का पहला साधन श्रवण ही है।
प्रशिक्षक ने कहा कि जो मैंने आज पढ़ाया है, वह कल पढ़ कर आना और पुस्तक से आगे का एक विषय और पढ़ कर आना, जो मैं कल पढ़ाऊँगा।
ज्ञान का अगला स्तर है स्वाध्याय।
केवल सुनने से हमें ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। सुनने के बाद हमें पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त करना पड़ेगा, इसे स्वाध्याय कहते हैं। विवेचन में आकार बैठने से केवल एक सीमित क्षेत्र तक ही ज्ञान आएगा। उसको और बढ़ाने के लिए स्वाध्याय बहुत आवश्यक है। जब तक आप गीता प्रैस की साधक सञ्जीवनी, ज्ञानेश्वरी नहीं पढ़ते, तब तक इन विवेचनों को गूढ़ता से समझना कठिन होगा। अब पहले छः महीने उसके व्याख्यान हुए, स्वाध्याय भी किया।
अब प्रशिक्षक उसे व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए कहेंगे। फिर उसे मुख्य पायलट के साथ बैठकर विमान उड़ाना सीखना पड़ेगा। पढ़ने और सुनने मात्र से वह विमान नहीं उड़ा सकता। अब मुख्य पायलट उसे को-पायलट की सीट पर बैठाकर कहता है कि देखो मैं कैसे विमान उड़ाता हूँ? लेकिन उसे कोई भी बटन छूने की अनुमति नहीं देता है। फिर धीरे-धीरे तीन-चार फ्लाइट होने के बाद पायलट उसे जहाज उड़ाने के लिए थोड़ा-थोड़ा समय देगा। जब पायलट को लगेगा कि अब यह कुछ-कुछ सीख गया है, तो कुछ फ्लाइट्स के बाद उस छात्र को मुख्य सीट पर बैठने को बोला जाएगा फिर प्रशिक्षक स्वयं छात्र की सीट पर बैठेगा। कुछ समय बाद ट्रेनर पायलट, लर्निंग पायलट को एक सर्टिफिकेट देता है कि इसने इतने घण्टों के लिए फ्लाइट उड़ाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर लिया है। उसके बाद डीजीसीए उस की परीक्षा लेते हैं और उसे पायलट की उपाधि प्रदान कर दी जाती है। अब जाकर उस छात्र को किसी भी कम्पनी में जहाज उड़ाने का काम मिल सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग पाँच वर्ष लग गए।
पाँच वर्ष पहले वह एक ज्ञाता था। उसका एक लक्ष्य था, वह ज्ञेय था। पाँच वर्षों में उसने जो प्राप्त किया वह ज्ञान था। पायलट बनने की इच्छा करने वाला ज्ञाता, पायलट बनना ज्ञेय, पायलट बनने की प्रक्रिया ज्ञान, परन्तु पाँच साल बाद जैसे ही उसको पायलट बनने की पोस्टिंग मिली और वह पायलट की टोपी लगाकर, वर्दी पहन कर एयरपोर्ट पर आता है, अब इसका नाम क्या है? इससे किसी को अन्तर नहीं पड़ता। उसे देखकर सब सिर्फ यही कहेंगे कि यह पायलट है। वह पायलट स्त्री है या पुरुष, इससे भी किसी को कोई मतलब नहीं है। उन्हें केवल इतना पता है कि विमान पायलट उड़ा रहा है। वह लड़का भी हो सकता है और लड़की भी हो सकती है।
विशिष्ट बात यह थी कि पाँच वर्ष पूर्व उसके मन में जो कल्पना थी ज्ञेय की, पाँच वर्ष बाद न ज्ञान बचा, न ज्ञाता बचा। अब यह ज्ञाता भी पायलट हो गया, ज्ञान भी पायलट हो गया और ज्ञेय तो पहले से पायलट था। लौकिक ज्ञान में समय अवधि निश्चित है।
भक्त, भक्ति, भगवान, ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान।
ये तब तक हैं जब तक लक्ष्य तक नहीं पहुँचते। एक बार लक्ष्य तक पहुँच गए, तब भक्त ज्ञाता है, भक्ति उसका ज्ञान है और ज्ञेय श्रीभगवान हैं। जैसे ही भक्त की भक्ति सिद्ध हुई और उसने श्रीभगवान को प्राप्त किया तो कुछ नहीं बचा-
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी हैं हम नाहिं |
प्रेम गली अति साकरी, या में दोऊ न समाय ||
अब भगवान और भक्त, दो नहीं बचे, अब वे एक हो गए अर्थात् पूर्णता की स्थिति में ज्ञाता और ज्ञान, ज्ञेय में लुप्त हो जाते हैं। भक्ति और भक्त भगवान में लुप्त हो जाते हैं। पाँच वर्ष तक जो ज्ञान क्रियावत था, पायलट बनते ही वह ज्ञान ज्ञेय हो गया। पाँच वर्ष तक जो ज्ञाता उस ज्ञेय को प्राप्त करने वाला था, पाँच वर्ष बाद वह भी ज्ञेय हो गया।
अलौकिक ज्ञान में समयावधि निश्चित नहीं होती है। हम सब अध्यात्म के मार्ग पर पिछले जीवनों में क्या-क्या कर चुके हैं? हमें यह नहीं पता होता है। कोई कक्षा में आता है और दो-तीन दिन के बाद ही अच्छे से श्लोक बोलने लग जाता है। इसके विपरीत कोई साधक स्तर चार में पहुँचने के बाद भी ग्लानि महसूस करते हैं कि सब इतना अच्छा श्लोक उच्चारण करते हैं पर हमसे नहीं हो पाता। अब हमें यह दिख रहा है कि सबने एक वर्ष की कक्षा ली है, किन्तु यह सत्य बात नहीं है। पूर्वजन्म की किसकी क्या कमाई है? वह किसी को ज्ञात नहीं है।
कहीं सात वर्ष के बालक ने पूरी भगवद्गीता याद कर रखी है और कहीं सत्तर वर्ष की आयु में यह ज्ञान आया कि गीताजी पढ़ लेनी चाहिए। कहीं सोलह वर्ष का बालक सेवा में लग गया और कहीं साठ वर्ष होने के बाद भी कई व्यक्ति सोचते हैं कि कर लेंगे, अभी तो घर के इतने काम पड़े हैं। इसमें ऐसी बात नहीं है कि कोई अच्छा है और कोई बुरा है। कौन अपनी यात्रा के किस स्तर पर है? इस पर निर्भर करता है। यदि हम पहली कक्षा के बच्चे को सातवीं कक्षा में भेजेंगे, तो वहाँ उसका मन नहीं लगेगा। इसी प्रकार सातवीं कक्षा के विद्यार्थी को पहली कक्षा में बैठा देंगे तो उसका भी वहाँ मन नहीं लगेगा। पहली कक्षा में अध्यापिका बच्चों के साथ खेलती हैं। खेल-खेल में वह बच्चे को सिखाती हैं तो बच्चे को भी बहुत आनन्द आता है। वह दिन भर वही बातें दोहराता रहता है तो उसका बड़ा भाई कहता है कि यह तो पागल हो गया है। तब उसकी माँ कहती है कि तुमने भी यही किया था। अब तुम्हें याद नहीं है। इसका अर्थ है कि जो जिस स्तर पर है, उसे उसी बात में आनन्द आ रहा है।
ज्ञान का आच्छादन भी अलग-अलग होता है।
आदि शङ्कराचार्य भगवान ने नौ वर्ष की आयु में ही संन्यास ले लिया था और बत्तीस वर्ष की आयु तक उन्होंने पूरे भारत में बौद्ध धर्म को सनातन धर्म के रूप में स्थापित कर दिया। वे इतने प्रज्ञावान थे कि सोलह वर्ष की आयु में ही उनके समान कोई ज्ञानी नहीं था परन्तु इसके विपरीत गौतम बुद्ध पैदा हुए, बड़े हुए, अट्ठारह वर्ष की आयु में शादी हो गई, बीस वर्ष की आयु में एक बालक भी हो गया किन्तु अभी तक उनमें चेतना नहीं आई। अज्ञान से आच्छादित रहे।
एक दिन अचानक उन्हें कुछ विचार आया और घर छोड़ कर बुद्धत्व प्राप्ति हेतु चल दिए। वह थे तो पूर्व जन्म के अभ्यासी परन्तु बीस-बाईस वर्ष तक उनका ज्ञान आच्छादित था। आदि शङ्कराचार्य भगवान को बुद्धत्त्व बचपन से प्राप्त था। सिद्धार्थ को वही बुद्धत्त्व बाईस वर्ष की आयु में प्राप्त हुआ। दोनों ने ही पूर्णता को प्राप्त किया। एक उसी पूर्णता को आरम्भ से लेकर चले तो दूसरे को वही पूर्णता बाईस वर्ष की आयु में प्राप्त हुयी। यह ज्ञान का आच्छादन है।
किसी की गीताजी में रुचि छोटी आयु में हो गयी और किसी को साठ वर्ष की आयु में अचानक रुचि जागृत हुई और इतनी अधिक रुचि हो गयी कि लगन ही लग गयी। लाखों लोग गीताजी सीख रहे हैं। बारह हज़ार गीतासेवी सोलह-सोलह घण्टे सेवा देते हैं। पूरे जीवन गीताजी का स्पर्श नहीं किया था और अभी गीताजी की अंताक्षरी खेलते हैं। सत्तर वर्ष की आयु में गीता विचक्षण की कक्षाएँ करते हैं।
ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, भक्त, भक्ति, भगवान, ध्याता, ध्यान, ध्येय।
यह तीनों स्थितियाँ पूर्णता आने तक बाकी हैं। जब तक ज्ञान भक्ति, ज्ञान क्रिया है, तब तक बाकी दो हैं। जिस समय वे ज्ञेय हुए, बाकी दो का समापन हो जाता है। जिसका ज्ञान पूरा हो गया, वही ज्ञानी हो गया। जिसकी भक्ति पूरी हो गयी, वही भगवान हो गया। जिसका ध्यान पूरा हो गया, वही ध्यानी हो गया। जब तक कोई अभ्यासी है, हम उसे भक्त कह देते हैं। वास्तव में तो वह विभक्त है। जो जुड़ गया वह भक्त है, जो अभी तक जुड़ नहीं सका, वह विभक्त है।
ज्ञान की सात अलग-अलग भूमिकाएँ होती है। जैसे किसी ने कहा- ’गीता एक धार्मिक पुस्तक है।’ यह ज्ञान का पहला स्तर है। दूसरे ने कहा- ‘गीता केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं है, यह महाभारत का एक अङ्ग है।' यह ज्ञान का एक और ऊपर का स्तर है। तीसरे ने कहा- 'यह केवल महाभारत का अङ्ग नहीं है, यह केवल श्रीकृष्ण ने अर्जुन को नहीं सुनाई है, महाभारत तो वैशम्पायन मुनि ने अर्जुन के पड़पोते जन्मेजय जी को सुनाई है, सूत जी ने शौनक जी को सुनाई है, सञ्जय ने धृतराष्ट्र जी को सुनाई है, वेदव्यास जी ने श्रीगणेश को सुनाई, भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सुनाई है।' यह ज्ञान की तीसरी स्थिति है।
चौथी स्थिति का व्यक्ति कहता है- ये सारी बातें तो ठीक हैं लेकिन महत्त्व की नहीं हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि गीताजी साक्षात् श्रीभगवान की वाणी है। यह भगवान के श्रीमुख से निकली है। यह बड़ी महत्त्वपूर्ण है। उसके ऊपर के ज्ञान का व्यक्ति कहता है - भगवान के श्रीमुख के निकली है, यह तो ठीक है किन्तु यह कोई खास बात नहीं है। गीताजी तो सारे उपनिषदों का सार है। सारे वेदों का सार है। इससे भी ऊपर के स्तर वाले ज्ञानी व्यक्ति कहते है कि यह सब ठीक है लेकिन गीताजी का मुख्य सार है कि आत्म-कल्याण करो, मोक्ष की इच्छा करो।
सातवाँ, कोई स्वामीजी महाराज जैसा विद्वान होता है, जिसने गीताजी को पचा लिया होता है। वे कहते हैं कि यह सब तो ठीक है लेकिन गीताजी तो धर्ममय अमृत वचन है। यह धर्ममय अमृत वचन हम लोगों को नहीं लगता क्योंकि हमें अभी तक उस अमृत की प्राप्ति नहीं हुई है। हम पढ़ लेते हैं, सुन लेते हैं, बोल लेते हैं, लेकिन उस अमृत को चखने का अनुभव अभी हमारा नहीं है। यह तो पूज्य स्वामीजी महाराज जैसे कोई सिद्ध पुरुष उस धर्ममय अमृत वचन को चखते हैं। उस धर्ममय अमृत वचन का सेवन करते हैं। यह सातवीं स्थिति है।
सातों व्यक्ति ज्ञानी हैं। सातों जानते हैं लेकिन जानने की स्थिति अलग-अलग है।
लौकिक ज्ञान के बाद अब हम अलौकिक ज्ञान को भी देखते हैं। जैसे श्रीमद्भगवद्गीता अर्जुन और श्रीकृष्ण का संवाद है, वैसे ही योग वाशिष्ठ ज्ञानमार्ग का सर्वोत्कृष्ट ग्रन्थ है। यह महात्मा वशिष्ठ और भगवान श्रीराम का संवाद है, अत्यन्त गूढ़ है। जिस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का भाग है, उसी प्रकार योग वाशिष्ठ, वाल्मीकि रामायण का भाग है। गीताजी के प्रश्नकर्ता अर्जुन हैं जो मोह में हैं और उत्तर देने वाले श्रीभगवान हैं। योग वाशिष्ठ में थोड़ा अन्तर है। उसमें प्रश्नकर्ता श्रीभगवान हैं और उत्तर देने वाले ऋषि वशिष्ठ हैं। श्रीभगवान जो प्रश्न पूछते हैं, उन प्रश्नों का स्तर क्या होगा? इसलिए श्रीमद्भगवद्गीता के उत्तर विशिष्ट हैं और योग वाशिष्ठ के प्रश्न विशिष्ट हैं क्योंकि वे प्रश्न श्रीभगवान ने पूछे हैं।
उर्दू में तीन शब्द होते हैं: आलिम, आमिल और कामिल।
आलिम: जिसको इल्म है, जो पढ़ा लिखा है, विद्वान है।
आमिल: जिसने अमल किया है। जिसने पढ़ाई नहीं की है, जैसे किसी ने कहीं ड्राइविङ्ग सीखी नहीं है लेकिन गाड़ी बहुत अच्छी चलाता है। वह सिखा नहीं सकता क्योंकि उसने इसका ज्ञान प्राप्त नहीं किया है लेकिन उसे काम आता है। मोबाइल बनाना आता है, उसकी विद्या नहीं पता है।
कामिल:- जो पढ़ा भी है, अमल भी कर सकता है और पढ़ा भी सकता है। भगवान श्रीराम में ये तीनों गुण हैं।
भगवान श्रीराम कामिल हैं, उन्हें सब ज्ञात भी है, वे करते भी हैं और सिखा भी सकते हैं।
यदि आपको कुछ गहरा ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा होगी तो यह ग्रन्थ पढ़िएगा। श्रीभगवान की बड़ी सीधी-सीधी बातचीत है। यह बहुत ही कठिन है। पूज्य स्वामीजी के योग वाशिष्ठ पर बहुत सुन्दर व्याख्यान हैं। इसमें श्रीराम ने दोषों की चर्चा की है।
आठ दोष बतलाए हैं।
धन के क्या दोष होते हैं? स्त्री के क्या दोष होते हैं? शरीर के क्या दोष होते हैं? बालक के क्या दोष होते हैं? आदि।
श्रोता-वक्ता की दृष्टि से श्रीमद्भगवद्गीता के समान जो दो ग्रन्थ सर्वाधिक मान्य हो गए वे हैं-
योग वाशिष्ठ और अष्टावक्र गीता।
जिसे ज्ञानमार्ग पर चलना है, उसे इन दो ग्रन्थों का अध्ययन करना ही पड़ेगा। दोनों अद्भुत हैं। योग वाशिष्ठ के एक प्रसङ्ग में वशिष्ठ ऋषि ने ज्ञान की सात भूमिकाएँ बताई हैं।
ज्ञान की सात भूमिकाएँ-
उन्होंने कहा कि किसी को भी ज्ञान प्राप्त करना हो तो इन सात भूमिकाओं से जाना पड़ता है।
पहली भूमिका है शुभेच्छा।
मन में इस इच्छा का उदय होना कि मैं गीताजी पढ़ूँ, ध्यान करूँ, जप करूँ। कोई चालीस साल से सोच रहा है कि यह करूँ, लेकिन अभी तक कर नहीं पाया। सबसे पहली स्थिति है शुभेच्छा मन में आना, लेकिन उसी में अटक नहीं जाना है।
दूसरी स्थिति है विचारणा।
जब इच्छा आती है तो मन में विचार आते हैं कि अब मैं क्या करूँ? अब शुभेच्छा भी हो गई, विचारणा भी हो गई। जैसे किसी गृहिणी को भोजन बनाने का बहुत शौक है। वह दिन भर रील भी देखती है तो भोजन बनाने की नयी-नयी विधियाँ देखती रहती है। किसी को प्लॉट खरीदना होता है तो वह जहाँ जाता है, उसी से सम्बन्धित प्रश्न पूछता रहता है। जब भगवत् कृपा से शुभेच्छा आती है तब किसी के मन में विचारणा उत्पन्न होती है कि, मैं कौन हूँ? यह जीवन किसलिए मिला है? मैं यह शरीर तो नहीं हूँ? क्या पढ़ूँ? क्या सुनूँ? जिससे ज्ञात हो कि मैं कौन हूँ? मुझे किसी शास्त्र का, किसी सन्त का, किसी गुरु का सान्निध्य चाहिए लेकिन यह अभी तक अन्दर ही है, बाहर नहीं निकला। जब यह विचार बाहर निकला तो-
तीसरी स्थिति आती है तनुमानसा।
इसमें शरीर और उससे जुड़े हुए विषयों से वैराग्य आरम्भ होता है। जिसे ज्ञान प्राप्त करना होता है, उसे खाने की चिन्ता नहीं होती। वह नींद की चिन्ता नहीं करता है। सब कहते हैं कि पागल हो गए हो, दिन भर गीता में लगे रहते हो। हम सब इस तनुमानसा की स्थिति में पहुँच गए हैं। फिर वह तन और मन की उपेक्षा करता है। इस शरीर को महत्त्व देने की उसकी बुद्धि कम हो जाती है।
अगली स्थिति होती है सत्त्वापत्ति।
अब हम स्तर चार में आ गए हैं तो अब हमारी चौथी स्थिति आनी चाहिए। इसका अर्थ है सत् और असत् की जागृति। सत् का आकर्षण निर्माण होने लगे और असत् से अरुचि होने लगे। जब हम इस स्थिति में पहुँचते हैं, तब पाँचवीं स्थिति आने लगती है।
पाँचवी आसक्ति है, असंसक्ति
जो श्रीभगवान ने कहा है, “जितसङ्गदोषा”। अब अगर फिल्म भी देखते हैं तो बच्चों के लिए देखते हैं। होटल जाते हैं तो बच्चों के लिए जाते हैं। हमें न वहाँ जा कर आनन्द आता है और न वहाँ जाने की इच्छा ही होती है। सांसारिक पदार्थों से अरुचि होने लगती है। यह बहुत उच्च अवस्था है। अच्छा भोजन बना तो ज्यादा खा लें, ऐसा नहीं लगता। भोजन ज्यादा अच्छा बने या कम अच्छा, हम अपनी निर्धारित मात्रा में ही खाते हैं। पहले यदि भोजन कम अच्छा बनता था तो एक रोटी कम खाते थे और ज्यादा अच्छा बना तो तीन रोटी ज्यादा खाते थे। अब यह विचार ही मन से जाने लगता है।
इससे ऊपर की स्थिति कठिन है। साधना मार्ग में असंसक्ति तक पहुँचना कठिन नहीं है। थोड़ा अभ्यास करने पर हम पाँचवीं स्थिति तक पहुँच जाते हैं।
छठी स्थिति दुर्लभ है- पदार्थ अभावनी।
अभी हम तीन-चार-पाँच में घूम रहे हैं। तीन का अधिक, चार का भी कुछ-कुछ और पाँचवीं स्थिति की भी थोड़ी झलक दिखाई देने लगी है। छठी स्थिति की अभी दूर-दूर तक सम्भावना नहीं है क्योंकि जब तक पाँचवीं स्थिति सुदृढ़ नहीं होगी, तब तक कोई छठी स्थिति पर नहीं जा सकते, पदार्थ अभावनी। जहाँ पर ज्ञेय और ध्येय केवल परमात्मा बचते हैं। जो संसार के पदार्थ हैं, उनका भान ही नहीं रहता है।
स्वामी रामतीर्थ बैठे हैं और अचानक काले बादल आ गए। उनके शिष्यों ने कहा कि अरे स्वामीजी! देखिये एकदम काले बादल आ गए। स्वामीजी ने ऊपर देखा और रोने लगे। किसी ने पूछा कि आप रोते क्यों हैं? उन्होने कहा कि देखो कितना सुन्दर कन्हैया है। अब उन्हें काले बादल ही नहीं दिखते। उनको काले बादलों में कन्हैया दिखता है। उन्हें संसार के हर पदार्थ में वासुदेव दिखने लगते हैं।
सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।
अब तो मुझे सारे जगत में केवल सियाराम ही दिखते हैं। वशिष्ठ मुनि कहते हैं कि जब ऐसा होने लगे, तब मनुष्य अन्तिम स्थिति में पहुँचता है।
रामजी ने वशिष्ठ मुनि से पूछा कि महाराज यह तुर्यगा क्या है? वशिष्ठ जी ने कहा, रामजी इसका वर्णन करना भी सम्भव नहीं है। यह शब्दातीत है। इसका अनुभव सम्भव है। रसगुल्ले का स्वाद बिना खाये नहीं बताया जा सकता। इसी प्रकार ज्ञान की अन्तिम स्थिति तुर्यगा को बोल कर नहीं बताया जा सकता।
जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति
शरीर की ये तीन अवस्थाएँ होती हैं। इन तीनों स्थितियों में जो जागृत है, उसका अनुभव है तुर्यगा। इसे इतना ही मान सकते हैं कि अन्तिम स्थिति अनुभव की है जहाँ पर यह ध्यान में आ जाता है।
गरुड़ जी ने काकभुशुण्डि से प्रश्न किया कि महाराज ज्ञान का दीपक कैसे जलाएँ? अद्भुत वर्णन है। गोस्वामी जी कहते हैं:
सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई | जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई ॥
जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा।।
यहाँ काकभुशुण्डि जी ने चार पदार्थों - गाय, मक्खन, घी और दूध का उदाहरण देकर ज्ञान प्राप्ति का उपाय बताया। उन्होंने कहा, सुनो गरुड़ जी! श्रद्धा रूपी सुन्दर गौ को जो भगवान की कृपा से प्राप्त करता है और इस गाय को फिर असङ्ख्य जप, तप, व्रत, नियम, शुभ कर्म, आचरण जो-जो सन्तों ने कहे हैं, खिलाना है।
तेइ तृन हरित चरै सब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई।।
नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा।
उन्हीं धर्माचार रूपी हरे तृणों को सात्त्विक श्रद्धा रूपी गाय जब चरती है और आस्तिक भाव रूपी छोटे ब्रह्मचर्य रूपी बछड़े को पाकर वह गौ जब पेन्हाती है (पेन्हाने का अर्थ होता है कि गाय बछड़े को देख कर स्वयं ही अपने स्तनों में दूध छोड़ देती है) तो सांसारिक विषयों से निवृत्ति हो जाती है। गाय को जब दुहते हैं तो एक छोटी सी रस्सी बना कर रखते हैं, जिसे नोई कहते हैं और उसे गाय के दोनों पिछले पैरों में अटका देते हैं। वह इसलिए कि कभी-कभी गाय दूध देते समय लात मार देती है तो गाय लात न मारे, इसलिए वह छोटी सी रस्सी अटका दी जाती है।
गोस्वामी जी कहते हैं कि अगर सात्त्विक श्रद्धा रूपी गाय को दुहना है तो विषयों में मन न भागे, इसकी रस्सी फँसानी पड़ती है। प्रपञ्च रूपी लात को हटाने के लिए विश्वास रूपी दूध का बर्तन और निर्मल, निष्पाप मन दास है और दुहने वाला अहीर है।
जब तक मन विषयों में फँसा रहता है तब तक न श्रद्धा फलित होगी, न ज्ञान फलित होगा और न कोई नियम फलित होगा, इसलिए श्रद्धा रूपी गाय को दुहने के लिए विश्वास का पात्र लाना पड़ेगा। जो मन अपना दास है, उसे वश में करें और दुहने वाला अहीर है।
परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई॥
तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै।।
सात्त्विक श्रद्धा रूपी गौ से भाव-निवृत्ति और वश में किए हुए निर्मल मन की सहायता से परम धर्म में दूध दुह कर उसे निष्काम भाव रुपी अग्निपर औटा दें। पहले दूध को गर्म करना पड़ेगा। फिर सन्तोष रूपी श्रद्धा से उसे ठण्डा करना पड़ेगा। ठण्डा करने के पश्चात धैर्य और मन को शमन करने का जामन डालेंगे। क्षमा और सन्तोष रूपी हवा से ठण्डा करना पड़ेगा। साधक जब खूब साधना करने लगते हैं तो उन्हें क्रोध आने लगता है।
मुदिताँ मथै बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी॥
तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता॥
फिर प्रसन्नता रूपी रस्सी से, दमन के आधार पर उसे मथना पड़ेगा। अनेक बार अध्यात्म मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति मुस्कुराना भूल जाते हैं। उन्हें लगता है कि अध्यात्म पर चलने वाला व्यक्ति हँस ही नहीं सकता। रस्सी भी सत्य और कोमल वाणी की लगाओ। कई बार आध्यात्मिक लोगों की वाणी बहुत कठोर होती है। दो-दो घण्टे पूजा करते हैं और घर के सब बच्चों को डाँट कर रखते हैं। हम पूजा करते हैं तो हमारी वाणी मधुर होनी चाहिए। हम दूसरों में दोष ढूँढते हैं। श्रीभगवान कहते हैं कि इस प्रकार उसे मथने से निर्मल सुन्दर वैराग्य रूपी मक्खन निकलता है। प्रसन्नता के अभाव में जीवन में वैराग्य नहीं आता।
गोस्वामी जी कहते हैं:
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।
बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ।।
फिर योग रूपी अग्नि को प्रकट करके समस्त शुभाशुभ कर्म रूपी ईंधन उसमें लगा दें और जब वैराग्य रुपी मक्खन से ममता रुपी मल, जल का भी त्याग हो जाए तो ज्ञान रूपी घी को निश्चयात्मिक बुद्धि से ठण्डा करें।
तब बिग्यानरूपिनी बुद्धि बिसद घृत पाइ ।
चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ ॥
विज्ञान रूपी बुद्धि, ज्ञान रूपी निर्मल घी को पाकर, उससे चित्त रूपी दिये को भरकर, समता की बाती बनाकर उसमें दृढ़ता रूपी घी को डालकर जलाएँ।
श्रीभगवान ने कहा कि अर्जुन! तमोगुणी ज्ञानी है, रजोगुणी ज्ञानी है और सत्त्वगुणी भी ज्ञानी है। इसे तीन कहानियों के माध्यम से समझेंगे।
सतोगुणी ज्ञान कैसा होता है?
गुरु नानक देव जी गाँव-गाँव घूमते थे। वे कभी भी कहीं भी एक रात से ज्यादा नहीं ठहरते थे, वे एक गाँव पहुँचे। वहाँ बैठे तो एक व्यक्ति आया और बोला महाराज जी! आप तो गाँव-गाँव घूमते हो। मुझे यह गाँव छोड़कर जाना है, कोई अच्छा सा गाँव बताओ। उन्होंने कहा- क्यों छोड़ कर जाना है? वह बोला इस गाँव में लोग बड़े झगड़ालू हैं इसलिए मुझे दूसरे गाँव में जाना है। गुरु नानक जी बोले, जिस गाँव से मैं आया हूँ वहाँ भी लोग बहुत झगड़ालू थे, तुम यहीं रहो। कभी कोई अच्छा गाँव मिलेगा तो बता दूँगा। उनके साथ बाला और मर्दाना नाम के दो शिष्य रहते थे। बाला ने पूछा कि महाराज! पीछे के जिस गाँव से आए थे उसके लोग तो बहुत अच्छे थे, भेज देते इसे पीछे वाले गाँव में।
गुरुनानक देव जी ने कुछ उत्तर नहीं दिया। गुरु जी आगे के गाँव में गए। यह चोरों और डाकुओं का गाँव था। जैसे ही उनके सरदार को सूचना मिली, उसने आकर कहा कि रात ही में यहाँ से निकल जाना। हम तो सभी जगह से चोरी करके लाते हैं और तुम हमें लूटने आए हो? गुरुजी ने चोरों से कहा, ऐसी कोई बात नहीं है। तुम लोग यहीं बस जाओ, खूब फलो-फूलो। शिष्यों को लगा कि वे तो हमारा तिरस्कार कर रहे हैं और गुरु जी उनको आशीर्वाद दे रहे हैं। तीसरे गाँव में पहुँचे। वहाँ के लोग बहुत सात्त्विक थे। उनका बहुत आदर सत्कार किया। उनका मन ही नहीं भर रहा था। वे कहने लगे एक दिन और रुक जाइए। नानक जी ने कहा नहीं, अब तो हम चलेंगे। जब गुरुनानक देव जी चलने लगे तो आशीर्वाद दिया।
तुम सब लोग बिखर जाओ, उजड़ जाओ और फैल जाओ।
शिष्य दुःखी हो गए कि यह क्या मामला है? चोरों को कहा खूब फूलो-फलो, कहीं जाना न पड़े और जहाँ इतने सज्जन लोग हैं उनको कह रहे हैं कि उजड़ जाओ, बिखर जाओ। शिष्य कहने लगा गुरु जी, तीन गाँवों में आपने तीन बातें की। हमें एक भी समझ नहीं आई।
पहले वाले गाँव में व्यक्ति ने कहा, यहाँ झगड़ालू लोग हैं आपने उसे जाने नहीं दिया। गुरुजी ने कहा- वह व्यक्ति बहुत झगड़ालू था। यहाँ के लोगों ने उसे सहन करना सीख लिया। वह खुद भी बड़ा झगड़ालू है इसलिए उसे सभी झगड़ालू लगते हैं। इसे जहाँ भेजूँगा, वहाँ जाकर झगड़ा ही करेगा। यहाँ के गाँव के लोगों को तो आदत पड़ गई है इसे झेलने की। दूसरे गाँव में यह नए लोगों को परेशान करेगा इसीलिए इसे यहीं रहने को कहा।
दूसरे गाँव के लोग चोरी करते थे। उनका तो यहीं रहना ठीक है। यदि ये दूसरी जगह जाएँगे तो चोरी ही करेंगे। शिष्य ने कहा कि अन्तिम वाली तो बात समझ ही नहीं आई। इतने अच्छे लोगों को आपने कहा बिखर जाओ। गुरुनानक जी ने कहा इतने अच्छे लोगों का एक जगह रहना ठीक नहीं है। ये तो जहाँ भी जाएँगे अच्छा ही करेंगे। वे जिस भी गाँव में जाएँगे, वहाँ का कल्याण ही करेंगे।
यही सात्त्विक दृष्टि है। सामान्य व्यक्ति इस प्रकार की कल्पना नहीं कर सकता। कई बार ज्ञानी पुरुषों द्वारा लिए गए निर्णय सामान्य लोगों को गलत दिखते हैं। उनकी दृष्टि अलग होती है।
दूसरा है राजस ज्ञान।
एक हीरे का व्यापारी था। माँ कहती थी कि मैं अपने बेटे को इनकी दुकान में नहीं बिठाऊँगी। ये तो बेकार हैं। मैं तो इससे नौकरी करवाऊँगी। अचानक व्यापारी को गम्भीर रोग हो गया। उन्हें लगा कि एक-दो महीने में तो मृत्यु ही हो जाएगी। उन्हें चिन्ता हो गई कि इतनी चलती हुई दुकान है और लड़के का बिल्कुल मन नहीं है। अब तो मुझे दुकान बन्द करनी पड़ेगी। पर वे बहुत बुद्धिमान थे। उन्होंने बेटे को बुलाया और कहा कि तुम तो काम सीख नहीं पाए। यह एक पोटली मेरे जीवन भर की कमाई है। जब तुम्हें किसी चीज की जरूरत पड़े तो इसे अपने चाचा के पास ले जाना। वह भी व्यापारी थे। दोनों में बड़ा प्रेम था। सेठ जी की मृत्यु हो गई। कुछ समय तक तो दोनों माँ - बेटे ने किसी तरह काम चला लिया। फिर जब परेशानी होने लगी तो वह हीरे की पोटली लेकर चाचा के पास गया। चाचा ने कहा बेटा, अभी तो पितृपक्ष चल रहे हैं तो अभी लोग खरीदारी नहीं करेंगे। अभी इन्हें बेचने में बहुत कम पैसे मिलेंगे। तुम कल से रोज दुकान आया करो। तुम काम भी सीख लेना और मैं तुम्हें पैसे भी दे दूँगा। लड़का रोज आकर चाचा की दुकान में बैठने लगा। लड़का होशियार था। उसने तीन महीने में ही सारा काम सीख लिया। उसने हीरे पहचानना भी सीख लिया और दूसरे शहर में जाकर खरीदना भी शुरू कर दिया। तीन -चार महीने में जब वह सब सीख गया तो चाचा ने कहा कि अब बाजार अच्छा है, भाव बढ़ गए हैं। कल तुम हीरे की पोटली लेकर आ जाना। उसने जैसे ही हीरे की पोटली निकाली और देखा तो वे सभी काँच के टुकड़े थे। उसे लगा उसके पिताजी ने उससे झूठ बोला। अगले दिन वह पोटली लेकर चाचा के पास पहुँचा और बोला ये तो काँच के टुकड़े हैं, हीरे तो नहीं हैं। आपने पहले क्यों नहीं बताया?
चाचा ने कहा यदि मैं तुम्हें उस समय कहता कि यह काँच है तो तुम कहते चाचा बेईमानी कर रहे हैं। तुम्हारे पिताजी ने तो यह हीरे कह कर दिए थे, यदि मैं काँच कह देता तो तुम्हें बुरा लगता इसलिए मैंने तुम्हें हीरे पहचानने के लिए दुकान पर बैठाया। पता था, तुम जल्दी सीख लोगे। आज से तुम इसी दुकान को सम्भाल लो। तुम इस दुकान के आधे हिस्सेदार हो। तुम कल से गद्दी पर आकर बैठ जाना। घर जाकर उसने माँ से कहा कि पिताजी का कुर्ता निकाल देना, मुझे गद्दी पर बैठना है। माँ ने कुर्ता निकाल कर दिया तो देखा कुर्ते में सभी बटन हीरे के थे। उसने कहा पिताजी के ऐसे कितने कुर्ते हैं तो माँ ने कहा कि तीस-चालीस हैं। जब उसने सारे कुर्ते देखें तो सभी के बटन हीरे के थे। तब उसको समझ आया कि पिताजी ने उसको समझाने के लिए ही पोटली में काँच रखे थे। यही रजोगुणी ज्ञान है। यह अपने कल्याण की बात है।
अब एक तमोगुणी ज्ञान की कथा सुनते हैं।
एक तोता था। वह जिस जङ्गल में रहता था, वहाँ बहुत शिकारी थे। वह दूसरे जङ्गल में गया। वहाँ उसे कबूतरों का झुण्ड मिला। उसने उनसे पूछा कि क्या यहाँ शिकारी नहीं आता? एक बूढ़ा बुद्धिमान कबूतर था। उसने कहा कि मैं तुम्हें एक सूत्र देकर जाऊँगा। उसे तुम याद रखना। उसने कहा, याद करो -
शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, फँसना मत।
कबूतर ने तोते से कहा सुनाओ तो तोते ने कबूतर की बात दोहरा दी। कबूतर चला गया। तोता अपने गाँव में लौटा और सबको यह मन्त्र सिखा दिया। अगले दिन एक शिकारी का बच्चा आया तो उसने जाल बिछाकर दाना डाला। सारे पक्षी कहने लगे, “शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, फँसना मत।” शिकारी का बच्चा सोचने लगा कि ये सब तो होशियार हो गए हैं। वह घर लौट गया। दूसरे दिन फिर आया। फिर सब ज़ोर से चिल्लाने लगे। वह फिर लौट गया। उसके पिताजी ने पूछा कि दो दिन से बिना पक्षी लिए आ रहे हो, क्या बात है? उसने सब सुनाया। पिताजी ने कहा कि चिन्ता मत करो, यह तोते का ज्ञान है। बच्चा समझा नहीं। पिता ने कहा कि कल तुम उन्हें बोलने देना और जाल बिछा देना। अगले दिन पक्षियों ने बोलना शुरू किया, लेकिन उसने जाल बिछाया और दाने डाले। जैसे ही दाने डाले, ऊपर से पक्षी वह मन्त्र बोलते रहे और वही गुरु तोता बोलते-बोलते उसमें फँस गया। तोता बोलता है, किन्तु वह समझता नहीं है। हम सब भी इसी तोते की तरह ही हैं। दिन भर तो पढ़ते रहते हैं और इसमें ही फँसते जाते हैं। हम अपने आप को ज्ञानी मानते हैं। हम हमेशा कहते हैं क्रोध नहीं करना चाहिए, परन्तु फिर भी करते हैं। मोह में नहीं फँसेंगे परन्तु फिर भी फँसते हैं। सुनते हैं, बोलते भी हैं परन्तु करते नहीं हैं, यही तमोगुण ज्ञान है, जो केवल शब्दों में रहता है, किन्तु जीवन में नहीं आता है।
पर उपदेस कुसल बहुतेरे | जे आचारहिं ते नर न घनेरे ||
नियतं(म्) सङ्गरहितम्, अरागद्वेषतः(ख्) कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म, यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥18.23॥
यत्तु कामेप्सुना कर्म, साहङ्कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं (न्), तद्राजसमुदाहृतम्॥18.24॥
अनुबन्धं(ङ्) क्षयं(म्) हिंसाम्, अनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म, यत्तत्तामसमुच्यते॥18.25॥
विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! जैसे ज्ञान तीन प्रकार के हैं, वैसे ही कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं।
जो कर्म शास्त्र विधि से नियत किया हुआ है। कर्त्तापन के अभिमान से रहित है। फल को न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष से किया गया हो, वह सात्त्विक है।
तीन बातें उसमें होनी चाहिए। पहली, वह नियत कर्म होना चाहिए, निषिद्ध कर्म नहीं होना चाहिए। हमने पिछले सत्र में कर्म का सिद्धान्त देखा। दूसरी-कर्त्तापन के अभिमान से रहित होना चाहिए। मैं कर रहा हूँ, यह भाव नहीं होना चाहिए। मैं श्रीभगवान द्वारा नियुक्त किया गया हूँ, वे मुझसे करवा रहे हैं।
I do nothing, I am not a doer.
तीसरा अफलप्रेप्सुना, फल की कामना न होना।
मैं अपना कर्त्तव्य करता हूँ फिर जो परिणाम होगा, मुझे इसकी कोई अपेक्षा ही नहीं है।
अरागद्वेषता - मुझे तो यह करना ही है। सात्त्विक कर्म का भी राग होता है। उत्तम स्थिति में सात्त्विक कर्म में से भी राग हट जाना चाहिए। कोई सेवा मिली तो कर ली, नहीं मिली तो कोई बात नहीं।
कई लोग सेवा न मिलने पर नाराज हो जाते हैं। यह भी राग के कारण होता है। उन्हें अपना अपेक्षित फल न मिले तो मन में विक्षिप्तता आती है।
श्रीभगवान कहते हैं कि कर्म में भी राग-द्वेष न हो। यह सात्त्विक बात है।
जो कर्म बड़े परिश्रम से युक्त हैं, अहङ्कार युक्त हैं, भोगो के चाहने वाले हैं, वे राजस कर्म कहे जाते हैं।
एक बार एक पति-पत्नी थे। उनके पास टू व्हीलर था। पत्नी हमेशा कहती रहती थी कि मुझे भी घर में गाड़ी चाहिए। व्यक्ति कहता था कि हमारे पास तो पैसे ही नहीं है। पत्नी कहती है कि चलो मैं बतलाती हूँ कि पैसे कहाँ से आएँगे। उस समय दो लाख दस हजार रुपए की ऑल्टो कार आती थी। शोरूम पर जाकर उसने पूछा कि सबसे सस्ती कार कौन सी है? बैंक वालों ने कहा कि एक लाख रुपए तुम्हें डाउन पेमेंट करना पड़ेगा, बाकी हम फाइनेंस कर देंगे। पूरा हिसाब-किताब लगाकर उसने देखा तो तीस-चालीस हजार ही इकट्ठा हुए थे। उसने पत्नी से कहा कि हमारे पास तो एक लाख रुपए नहीं है। पत्नी होशियार थी, पढ़ी-लिखी थी, उसने गूगल पर सर्च कर लिया। उसने कहा कि एलआईसी से लोन ले लेते हैं। चालीस हजार रुपए वहाँ से मिल गए। तीस हजार अपने पास थे, परन्तु फिर भी तीस हजार कम पड़ रहे थे। पत्नी बोली किसी से माँग लेते हैं या कुछ बेच देते हैं।
ऊपर वाली मञ्जिल किराए पर देकर छः महीने का अग्रिम किराया ले लेते हैं। वहाँ से उन्हें तीस हजार रुपए मिल गए। एक लाख रुपए लेकर वे बैंक गए परन्तु बैंक वालों ने कहा कि आप गारण्टी किसकी देंगे? दो महीने बाद गारण्टी के लिए दो व्यक्ति मिले और तीसरे महीने में फिर गाड़ी घर आ गई। गाड़ी के लिए उन्हें कितना परिश्रम करना पड़ा और कितनी प्रवृत्ति करनी पड़ी। अगले एक साल का जीवन बड़ा दु:खमय हो गया। वेतन का बड़ा भाग किस्तों में चला जाता था। मकान का जो किराया आता, वह पहले ही छ: माह का एडवाँस ले लिया था। कार तो आ गई पर उसे चलाने का न तो उत्साह बचा और न ही सुख। यही रजोगुण के लक्षण हैं। व्यक्ति एक भोग के लिए कितना परिश्रम कर सकता है। हम भी यही कर रहे हैं। बहुत मेहनत की, बहुत सुखों की आशा में बहुत दु:ख उठाए।
श्रीभगवान कहते हैं, जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है। लोगों को चाहने वाले अहङ्कारी पुरुष द्वारा किया गया हो, वह राजस है।
तीसरा, जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा, अज्ञान से किया जाता है, वह कर्म तामस है।
ऐसे लोग भी हैं जो ऋण लेकर आईपीएल में सट्टा खेलते हैं। दस हजार रुपए लेकर लॉटरी खेली। लॉटरी भी हार जाते हैं और कर्जा भी हो जाता है। बिना विचार के किया गया कर्म, जिसमें सुख की कोई आशा ही नहीं है, ऐसा कर्म तामस कर्म कहलाता है।
कई लोग सत्सङ्ग में आते हैं। उनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं कि बाहर देखा, चप्पलों का ढेर लगा है। अपनी चप्पल रखने का स्थान नहीं है। दूसरों की चप्पल हटाकर स्वयं की चप्पल वहाँ रख देते हैं। सौ चप्पलों का मिलाकर ढेर बना दिया। अपनी चप्पल रखने की जगह बना ली। यह तमोगुणी कर्म है। यह विचार ही नहीं किया कि जब दूसरे लोग सत्सङ्ग से आऍंगे तो अपनी चप्पल कैसे ढूंढेंगे?
मैं आता हूँ, अपनी गाड़ी कहीं भी खड़ी कर देता हूँ। दूसरे अपनी गाड़ी कैसे खड़ी करेंगे? कैसे निकालेंगे? उसका विचार नहीं करता। कई महिलाओं की आदत होती है कि ऊपर की मञ्जिल पर रहते हैं और वहीं से थैली में कचरा डालकर नीचे फेंक देते हैं। इतनी भी समझ नहीं है कि थैली फट जाती है और कचरा पूरी सड़क पर अपने ही घर के सामने फैल जाता है। सड़क पर आने-जाने वालों को असुविधा होती है। अशोभनीय वातावरण पैदा किया। यह तामस कर्म है।
तीन प्रकार के कर्ता भी श्रीभगवान हमें बताएँगे।
सात्विक कर्त्ता, अल्पकालिक कर्त्ता, दीर्घकालिक कर्त्ता।
किसी के कर्मों को देखकर उन्हें सतोगुणी, रजोगुणी नहीं समझ सकते। कोई भी व्यक्ति न तो पूरी तरह सतोगुणी होता है न ही रजोगुणी होता है और न ही तमोगुणी होता है। नेता लोग चुनाव में आते हैं, बढ़िया-बढ़िया भाषण करते हैं। जनता की समस्याएँ उनके हृदय में भरी होती हैं लेकिन चुनाव जीतने के बाद जनता की समस्याएँ कहाँ गईं? उसका कुछ अता-पता नहीं होता है। यदि कोई चुनाव के समय उस व्यक्ति का भाषण सुनकर उसे बड़ा सात्त्विक मान लेगा, उस समय तो उसके कर्म सात्त्विक प्रतीत होंगे। उसके हृदय के उद्गार सात्विक हैं। उसके विचार हैं कि कैसे मेरे देश के हाल हैं? मेरे देश के किसान, विद्यार्थी, महिलाएँ कैसी समस्याओं से जूझ रही हैं? उनकी वृत्ति कैसी है? क्या वे अच्छे लोग हैं? किसी का एक कर्म देखकर उसे अच्छा मान लेना और किसी का एक बुरा कर्म देखकर उसे बुरा मान लेना यह भूल होती है।
रावण ने बड़ा अच्छा शिव ताण्डव स्त्रोत लिखा, शिवजी का यज्ञ कर बड़ी पूजा कर दी और पण्डित हो गया, तो क्या हुआ? वह अच्छा इन्सान हो गया? किसी के द्वारा अल्पकाल में किए गए अच्छे कार्य, किसी के द्वारा दीर्घकाल में किए गए बुरे कार्य। उससे व्यक्ति अच्छा या बुरा नहीं होता। कर्त्ता की दृष्टि दीर्घकालीन होनी चाहिए। कर्म की दृष्टि अल्पकालीन होनी चाहिए। कभी-कभी अच्छे व्यक्ति के द्वारा भी ऐसे काम हो जाते हैं जो अच्छे न हो। अभी अच्छे न दिख रहे हों, हमारी समझ में न आए, ऐसा भी हो सकता है।
जैसे मोदी जी ने नोटबन्दी की तो बहुत लोग नाराज हो गए। वह कर्म अच्छा नहीं दिख रहा था। देश के लिए दीर्घकाल में अच्छा हो सकता है।
शिवजी के पास गरुड़ जी महाराज गए और बोले, मुझे बहुत बड़ी शङ्का हो गई। ये मेरे भगवान नारायण नागपाश से बँध गए। बन्धन काटने के लिए मुझ जैसे तुच्छ पक्षी को जाना पड़ा। ये कैसे परमब्रह्म परमात्मा हो सकते हैं? आप मुझे बतलाइए।
शिवजी ने कहा, यह समझने के लिए जाओ काकभुशुण्डी जी के पास। शीघ्र ही पूछ कर मत आ जाना। काकभुशुण्डी जी ने गरुड़ जी को कहा-
"तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा"
दीर्घकाल तक सत्सङ्ग करोगे, तब समझ में आएगा। थोड़ा सा समझ कर आओगे तो समझ नहीं आएगा। दीर्घकाल से अच्छे और बुरे का विस्तार होता है। जो अच्छा और बुरा कर्म, दोनों निरन्तर करता है, वह व्यक्ति बुरा है। ज्यादातर अच्छा किया और कभी बुरा हो गया है तो यह व्यक्ति अच्छा है। जिस व्यक्ति में अच्छाई और बुराई बराबर दिखती है, वह व्यक्ति बुरा है। अच्छाई ज्यादा दिखती है, बुराई कभी-कभी दिखती है तो वह व्यक्ति अच्छा है। हम क्या गड़बड़ करते हैं? व्यक्ति में एक बुराई से उसे बुरा मान लेते हैं। हमारे अनुकूल कोई काम कर दे तो हम उसे अच्छा मान लेते हैं। कर्त्ता और कर्म में, कर्त्ता को प्रधानता दें, कर्म को प्रधानता न दें।
छब्बीस, सत्ताईस और अट्ठाईस श्लोकों में श्रीभगवान ने इसे और अधिक विस्तार में कहा है। इसकी भूमिका आपके सामने रखी गई है।
एक ऐसे दुर्लभ सन्त थे, जिन्होंने अपना नाम किसी को बतलाया नहीं। मैं चलने वाला पथिक हूँ यह कहकर पथिक नाम से प्रसिद्ध हो गए। उनका नाम, गाँव किसी को भी पता नहीं। वे कैसे इस कर्त्ता भाव से छूटे? ऐसे पथिक जी महाराज के भजन का गायन किया गया:
भजन:
इसी भजन के साथ इस विवेचन सत्र का समापन करते हैं।
प्रश्नोत्तरी
प्रश्नकर्ता:- प्रीतम दीदी
प्रश्न :- ऊँ से शुरू होने वाले मन्त्र नहीं करने चाहिए?
जैसे ऊँ नमः शिवाय या विष्णु भगवान जी के मन्त्र का जाप करते हैं, क्या उसका जाप महिलाओं को नहीं करना चाहिए?
उत्तर :- स्त्रियों को यदि जाप करना हो तो ऊँ का शब्द टाल देना चाहिए। नमः शिवाय बोलिए, ऊँ नमः विष्णु का जाप कर सकते हैं। ओमकार शब्द बोलना है तो आपको तीन बार, पाँच बार या दस बार जो भी बोलते हैं उसमें कहीं भी कोई गड़बड़ नहीं है, परन्तु जब जाप करना होता है तो उसमें स्त्रियों के लिए यह मना है। यह बहुत पावरफुल शब्द है, इसका जाप करने का अधिकार केवल संन्यासी को होता है, गृहस्थ को नहीं।
ऊँ से आरम्भ होने वाले मन्त्रों को यदि ऊँ को छोड़कर स्त्री जपे तो कोई फर्क नहीं पड़ता, परन्तु जब गुरु जी ने कोई ऊँ का मन्त्र दिया है तो उसमें यह नियम लागू नहीं होता। आप यदि स्वयं चुनकर कर रहे हैं तो ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय में से आप नमो भगवते वासुदेवाय का मन्त्र जाप कर सकते हो, ऊँ नमः शिवाय है तो उसे नमः शिवाय करके करें तो अधिक हितकर होगा।
प्रश्न :- क्या घर में मूर्ति रख सकते हैं जी जैसे लड्डू गोपाल की रखते हैं?
उत्तर :- लगभग बारह इञ्च या उससे कम वाली मूर्ति रखनी चाहिए। उससे बड़ी होगी तो उसके नियम बहुत ज्यादा होते हैं। आप जितनी मूर्तियाँ रखोगे और जितने मन से सेवा करोगे, उतने ही उनके भाव जागृत हो जाएँगे। जितनी कम सेवा करेंगे या जितनी कम शुद्धता से करेंगे, उतनी ही उन मूर्तियों में जागृति कम होगी।
प्रश्नकर्ता :- दीपा दीदी
प्रश्न :- हमने सुना है कि मनुष्य के अन्तिम समय में गीता जी का अट्ठारहवाँ अध्याय ही पढ़ना चाहिए, वह क्यों पढ़ना चाहिए?
उत्तर :- अट्ठारहवाँ अध्याय गीता जी का सार है। कई बार ऐसा होता है कि पूरी गीताजी सुनने का समय या सुनाने का समय नहीं होता है तो यह अध्याय पढ़ लो। इसके अलावा पन्द्रहवाँ और सातवाँ भी पढ़ सकते हैं। अलग-अलग मान्यता है परन्तु गीताजी में कहीं ऐसा नहीं लिखा है कि केवल अट्ठारहवाँ ही पढ़ना है। सही बात तो यह है कि पूरी ही गीताजी पढ़नी चाहिए।
प्रश्न :- घर में गणेश जी की कितनी मूर्तियाँ रखनी चाहिए?
उत्तर :- एक मन्दिर में तीन मूर्तियाँ रखी जा सकती हैं। यदि घर में कोई गणेश जी का शो पीस है तो उसका कोई महत्त्व नहीं है। महत्त्व केवल जो आपकी पूजा घर में मूर्तियाँ हैं और जिनकी स्थापना है, सिर्फ उनका है।
हम क्या करते हैं कि कहीं से भी हमें कोई धार्मिक सामान्य मूर्ति मिली तो मन्दिर में लाकर रख देते हैं, जैसे स्टोर रूम में हम कोई भी सामान रख देते हैं। यदि हमारे सोने के कमरे में कोई ऐसे ही हर कोई सामान भर दे तो हम कहते हैं कि हमारा बेडरूम साफ होना चाहिए और जो श्रीभगवान का घर है उसे हम स्टोर रूम बना देते हैं। मन्दिर को कभी भी स्टोर रूम नहीं बनाना चाहिए और उसमें बहुत चुनकर ही मूर्तियाँ रखनी चाहिए। यदि कोई सन्त महात्माजी कोई मूर्ति देते हैं तो उसे मन्दिर में रख सकते हैं।
प्रश्नकर्ता :- अनीता दीदी
प्रश्न :- जब गणेश जी ने महाभारत लिखी थी तो कोई कहता है चतुर्थी के दिन लिखी थी और अनन्त चौदस के दिन पुरी की। इसे लिखने में कितना समय लगा था?
उत्तर :- इसे लिखने में साढ़े तीन वर्ष लगे हैं। साठ लाख श्लोक लिखे गए हैं तो इसमें इतना समय तो लगता ही है।
प्रश्न :- कुछ लोग पूजा करते हुए अगरबत्ती जलाते हैं तो हमने सुना है कि बाँस जलाने से पितृ दोष लगता है?
उत्तर :- यह सब परम्पराओं की बात है। शास्त्रों में ऐसा कुछ नहीं है। यदि आपको लगता है कि ऐसा नहीं करना है तो कर सकते हो परन्तु पूज्य स्वामीजी और हम इस बात को नहीं मानते हैं।
प्रश्नकर्ता :- भूपेन्द्र भैया
प्रश्न :- किसी कितने व्यक्तियों का मन कहीं बाहर होटल जाने में या कहीं घूमने में नहीं लगता है और अगर उन्हें कहीं थोड़ा सा मिल जाए तो वह सन्तुष्ट हो जाते हैं, ऐसे लोगों को हम किस कौन सी स्थिति में रखेंगे।
उत्तर :- संसार में अधिक प्रयास नहीं करते यह अधिक महत्त्व की बात नहीं है। वो प्रयास श्रीभगवान में लगा है या नहीं यह अधिक महत्त्व की बात है। उनका जप, ध्यान, पूजा, परायण ज्यादा है या नहीं, यह महत्त्व की बात है। वह आलसी की तरह पड़ा रहता है तो वह अच्छी स्थिति नहीं है। अच्छी स्थिति के लिए जो संसार में ऊर्जा लग रही है उसे श्रीभगवान में लगाना है। जो काम कर रहा है वह रजोगुणी है और जो पड़ा रहता है वह तमोगुणी है। यदि कोई व्यक्ति भय के कारण आगे नहीं बढ़ रहा है तो इसका मतलब उसके पास कोई गुरु या मार्गदर्शन नहीं है। गुरु के बिना भी कोई आध्यात्मिक प्रगति नहीं होती।
प्रश्नकर्ता :- गीता दीदी
प्रश्न :- गणेश जी की दो पत्नियाँ हैं रिद्धि और सिद्धि।
कहीं और पढ़ा तो वहाँ पर उनकी पाँच पत्नियाँ हैं :- रिद्धि-सिद्धि, तुष्टि - पुष्टि और श्री।
उत्तर :- हमारी जानकारी में भी अभी रिद्धि और सिद्धि ही है बाकी मैं अगली बार देख कर बताऊँगा।
प्रश्नकर्ता :- मीना दीदी
प्रश्न :- एकादशी को चावल क्यों नहीं खाते हैं?
उत्तर :- अभी मुझे स्मृति में नहीं है इसकी एक कथा है।
प्रश्न :- गायत्री माता का एक चित्र देखा था उसमें उनके पाँच मुख हैं। इसमें तीन अलग-अलग हैं और दो एक जैसे हैं? इसका मुझे समझ नहीं आया?
उत्तर :- देवताओं के आदि दैवी स्वरूप होते हैं। वह किसी-किसी कारण के कभी उत्पन्न होते हैं। पाँच में से तीन अलग और दो एक जैसे हैं यह कौन सी कथा के अनुसार है, हमें उस कथा को देखना पड़ेगा क्योंकि मैंने गायत्री माता का केवल एक ही मुख देखा है।
देवता किसी कारण से अपने आकार बदल देते हैंहैं, जिस प्रकार पञ्चमुखी हनुमान और पञ्चमुखी गणेश जी भी होते हैं परन्तु यह उन्होंने केवल समय विशेष के लिए ही धारण किया होता है।
प्रश्नकर्ता :- उदय चन्द्रिका जी
प्रश्न :- जब भी हम स्कूलों में प्रचार करने जाते हैं तो हमें परमिशन नहीं मिलती हैं तो क्या करें?
उत्तर :- यदि किसी में परमिशन मिल जाए तो प्रचार कर लेना चाहिए, यदि न मिले तो आगे बढ़ जाना चाहिए। सब की वृत्ति गीताजी को अपने स्कूल में लाने की होगी, ऐसी सम्भावना नहीं हो सकती। यह तो सतयुग में भी नहीं हो सकती थी अब तो कलयुग है।
इसमें भी दो बातें होती है कि हमारा कितना ज्ञान है और हम उनको कितना प्रभावित कर पाते हैं? और दूसरा है सामने वाले की वृत्ति कैसी है? यदि सामने वाले की वृत्ति धर्म की नहीं है तो हम कितना भी अच्छे से समझा दें तो भी वे मानने वाले नहीं होते और सामने वाले की वृत्ति अच्छी है और मेरी योग्यता नहीं है समझाने की तो भी वे मानने वाले नहीं। सब कुछ नहीं करना चाहिए। श्रीभगवान ने जितनी बुद्धि, योग्यता हमें दी है उसी के अनुसार जितना भी बन पड़े उतना कर लेना चाहिए। उसमें कोई चिन्ता करने वाली बात नहीं है।
प्रश्नकर्ता :- योगेश भैया
प्रश्न :- सरस्वती माता किसकी पुत्री और किसकी पत्नी है?
उत्तर :- उनका ब्रह्मा जी के पुत्री के रूप में ही वर्णन है। पत्नी के रूप में तो कहीं भी उनका वर्णन नहीं है।
प्रश्नकर्ता :- माधुरी दीदी
प्रश्न :- घर में छोटे से लड्डू गोपाल रखना चाहिए?
उत्तर :- जी, बिल्कुल रखना चाहिए।
प्रश्नकर्ता :- राशि दीदी
प्रश्न :- हम अपने किसी रिश्तेदार की बहुत मन से सेवा करते हैं परन्तु हमेशा उनका नकारात्मक प्रत्युत्तर आता है और हमें अच्छा नहीं लगता?
उत्तर :- आप इसलिए अच्छा करते हैं कि बदले में हमें अच्छा प्रत्युत्तर मिले या आप इसलिए अच्छा करती हो कि आप अच्छे हो। अगर आप इस अपेक्षा से करते हो तो यह सौदेबाजी है और सौदेबाजी में सामने वाले को अच्छा लगेगा तो वह करेगा, नहीं लगेगा तो वह नहीं करेगा। यदि आप खुद अच्छे हैं और सामने वाला कुछ करता है या नहीं करता है, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मेरा स्वभाव ही ऐसा है इसलिए मैं तो सबके साथ अच्छा ही करूँगा। दूसरे का कर्त्तव्य मेरा अधिकार नहीं है। मैं अच्छा करूँगी, यह तो मेरे हाथ में है। दूसरा मेरे साथ क्या करता है वह उसका अधिकार है। हम यह नहीं कह सकते कि मैं तुम्हारे साथ अच्छा कर रहा हूँ तो तुम भी मेरे साथ अच्छा करो। इसके बदले में हमें कहीं और से अच्छा मिल जाता है।
इसके उपरान्त हरीनाम सङ्कीर्तन के साथ सत्र का समापन हुआ।
हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणमि
हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् ||