विवेचन सारांश
चार वर्णों के स्वाभाविक कर्म

ID: 5589
हिन्दी
रविवार, 29 सितंबर 2024
अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग
5/6 (श्लोक 36-50)
विवेचक: गीता विशारद डॉ आशू जी गोयल


पारम्परिक दीप प्रज्वलन, प्रार्थना, गुरु वन्दना, आरती और हनुमान चालीसा पाठ, योगेश्वर सच्चिदानन्द श्रीभगवान् श्रीकृष्ण की वन्दना, गुरु चरणों में प्रणाम करके अध्याय अट्ठारह के मध्यांश सत्र का  विवेचन आरम्भ हुआ।

श्रीभगवान् की अतिशय मङ्गलमयी कृपा से हमारा मङ्गलमय भाग्य उदय हो गया। हमारे जीवन में, हमारे जीवन को सार्थक करने के लिए ऐसा परम उत्थान का मार्ग स्वत: ही प्रशस्त हो गया कि हम भगवद्गीता के स्वाध्याय में, उसको पढ़ने में, उसको जानने में, उसको सीखने में, उसे जीवन में अपनाने के लिए प्रवृत्त हो गए हैं। पता नहीं हमारे पूर्व जन्मों के पुण्य कर्म हैं, हमारे पूर्वजों के सुकृत हैं या फिर किसी जन्म में किसी सन्त पुरुष की कृपादृष्टि हम पर पड़ गई जिसके कारण हमें भगवद्गीता जी का सानिध्य मिला है, हम भगवद्गीता जी को पढ़ने के लिए चुन लिए गए हैं। तिरपन(53) सौ वर्षों में बारम्बार महापुरुषों ने यही घोषणा की है कि मानव जाति के लिए इस लोक और परलोक में विजय के लिए गीताजी के समान दूसरा कोई कल्याणकारी ग्रन्थ नहीं है। हम लोगों को सौभाग्य से चार धाम की यह यात्रा मिली है और चलते-चलते इस यात्रा के चतुर्थ धाम पर हम आ पहुँचे हैं। अट्ठारहवाँ अध्याय गूढ़ अध्याय है, बड़ा है, इसमें अठहत्तर श्लोक हैं जिनमें भगवान ने ज्ञान का भण्डार भर दिया है। ज्ञानेश्वर महाराज जी ने इसे सार गीता या एकाध्यायी गीता कहा है

इसके सारे श्लोक गूढ़ हैं, महत्वपूर्ण हैं। गूढ़ बातों को समझने का प्रयास करना पड़ेगा। गहरी बात समझ आ जाए तो बड़ा आनन्द आता है।

भगवान ने सात्विक, तामसिक और राजसिक बुद्धि और धृति बताए हैं। पिछले सत्र में बुद्धि और पाँच प्रकार की धृति - धैर्यता, धारणा, दृढ़ता, वैचारिक परिपक्वता और अविकम्पन के विषय में चिन्तन किया।

दुर्गा सप्तशती में माँ की स्तुति चौबीस गुणों में की गई है -
या देवी सर्वभूतेषु भक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु ज्ञान-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु भाव-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु धृति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

देवी की बारम्बार प्रार्थना की गई है कि देवी आप प्रसन्न होकर आप हमारी भक्ति को जाग्रत करें। देवी की स्तुति धृति के रूप में आकाङ्क्षा से की गई है। धृति को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। साधन की दृष्टि से धृति का अत्यन्त महत्व है। श्रीभगवान् ने तीन प्रकार की धृति का वर्णन किया है।

श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं- 
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी।।18.33।।

जिस अव्यभिचारिणी धारणा शक्ति से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है वह धृति सात्विक है।

सात्विक धृति में श्रीभगवान् ने बाह्य कर्म की दो बातें कहीं - शम और दम

श्रीभगवान् ने प्राणों की बात कही मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः प्राणायाम से प्राणों पर नियन्त्रण करके धारणा का उद्भव होता है। हमारे प्राणों की गति प्राणायाम से नियन्त्रित होती है।

एक दिन में सामान्य मनुष्य चौबीस हजार छह सौ (24600) श्वास लेता है। औसतन श्वास की गति पन्द्रह (15) प्रति मिनट है। 

यदि किसी की औसत श्वास गति पन्द्रह (15) है तो इसका अर्थ है कि वह पूर्ण स्वस्थ है।
यदि किसी की औसत श्वास गति सोलह (16) है तो इसका अर्थ है कि वह किसी बीमारी से ग्रस्त है।
यदि किसी की औसत श्वास गति सतरह (17) है तो इसका अर्थ है कि उसे दवाई की आवश्यकता है।
यदि किसी की औसत श्वास गति अट्ठारह (18) है तो इसका अर्थ है कि उसे भविष्य में बार-बार चिकित्सक के पास जाना पड़ेगा। श्वास गति जितनी अधिक होगी मनुष्य उतना अधिक रोगी हो जाता है, आयु क्षीण हो जाती है। ब्रह्मा जी ने हमारी आयु वर्षों में नहीं अपितु श्वासों में दी है इसलिये योगी मनुष्य अपनी श्वास गति को नियन्त्रित करके अपनी आयु बढ़ा लेते हैं।

श्वास गति को यदि चौदह (14) कर लिया जाता है तो इसका अर्थ है कि प्राणायाम का गहन अभ्यास हुआ है।
यदि श्वास गति तेरह (13) है तो इसका अर्थ है वह योगी है।
यदि किसी की श्वास गति बारह (12) आ गई तो उसका कवित्त सिद्ध हो जाता है। प्राचीन काल में सभी सन्त कवि हैं जैसे सूरदास, मीराबाई, तुलसीदास, कबीर।
श्वास गति ग्यारह (11) होने पर अनेक सिद्धियाँ आ जाती हैँ।

प्राणायाम से प्राणों की गति को नियन्त्रित करके सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है साथ ही प्राणायाम से धृति का जागरण भी हो जाता है।

महर्षि पतञ्जलि ने योग सूत्र का वर्णन करते हुए कहा कि योग क्या है कि चित्त वृत्ति निरोधः सयोगः - चित्त की वृत्ति का निरोध ही योग है। चित्त की वृत्तियों को रोकना सीख लिया तो हमारा मन सङ्कल्प-विकल्प से रहित हो जाएगा। ऐसा अभ्यास अष्टाङ्ग योग - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि ध्यान से होगा। ध्यान से पहले धारणा (धृति) और उससे पहले प्राणायाम आवश्यक है। स्वास्थ्य के लिए प्राणायाम का उपयोग सामान्य बात है। सुबह उठकर स्वास्थ्य के लिए प्राणायाम प्रायः लोग करते हैं लेकिन प्राणायाम का स्वास्थ्य से भी अधिक महत्त्व है। सन्ध्या वन्दन में प्राणायाम आवश्यक है। यहाँ पर स्वास्थ्य की दृष्टि से नहीं अपितु प्राणों को नियन्त्रित करने के लिए प्राणायाम की आवश्यकता है। प्राणों का नियन्त्रण करने से मन की गति पर नियन्त्रण होता है। जिसकी श्वास गति जितनी तेज होगी मन में उतनी तीव्रता से अनेक विचार आएँगे। मन में कभी तेजी से विचार आते हैं तो श्वासों की गति बढ़ जाती है। मन की गति प्राणों की गति पर निर्भर है।

श्रीभगवान् ने  दूसरा सात्त्विक लक्षण बताया है - अव्यभिचारिणी। 
मैं एक ही देवता की उपासना करता हूँ अन्य किसी की उपासना नहीं करता यह व्यभिचार है लेकिन सभी देवताओं की उपासना करते हुए यदि मैं अपने इष्ट का ध्यान नहीं भूलता तो यह अव्यभिचार है।

सात्त्विक लोग अपने इष्ट को कभी नहीं भूलते। शिवालय में जाकर कहते हैं कि शिवजी मेरी राम जी की भक्ति बढ़ा दो, गणेश जी से कहते हैं कि हे गणपति महाराज मेरी बुद्धि राम जी में स्थापित कर दो या देवी के मन्दिर में जाकर कहते हैं मुझे राम जी की भक्ति का आशीष दो। उनका एक ही इष्ट होता है किन्तु अन्य देवी-देवताओं के मन्दिर में जाने, पूजा से उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती है। वे अपने इष्ट कभी नहीं बदलते, गुरु नहीं बदलते गुरु मन्त्र नहीं बदलते। मन को एक स्थान पर टिकना है। अव्यभिचारी मन एकदम स्थिर है।

कभी यह करते हैं, कभी वह करते हैं, कभी गीता पढ़ते हैं, योगाभ्यास करते हैं, प्राणायाम करते हैं, आश्रमों में इधर-उधर भटकते हैं, मन को स्थिर नहीं रखते यह व्यभिचार है।

यदि किसी को पानी के लिए कुएँ को चालीस फुट खोदने की आवश्यकता है तो एक ही स्थान पर खोदना पड़ता है। चार-चार फीट के दस गड्ढे खोदने से पानी कभी नहीं मिलेगा। इसी प्रकार इधर-उधर भटकने से बचना चाहिए। भक्ति मार्ग में व्यभिचार नहीं होना चाहिए।

सतोगुणी धारणा का बड़ा प्रभाव है। इसे निम्न प्रसङ्ग से समझते हैं -

स्वामी रामतीर्थ जी की शताब्दी के श्रेष्ठतम सन्तों में गणना होती है। वे अत्यन्त मेधावी थे और स्वामी विवेकानन्द जी के समकालीन थे।
जब वह मैट्रिक की परीक्षा दे रहे थे तो उसे समय अङ्ग्रेजों का नियम था कि परीक्षा में पूरे नम्बर (100/100) नहीं दिए जाते थे। स्वामी जी ने भी प्रण किया कि उन्हें 100/100 नम्बर लाने ही हैं। परीक्षा पत्र में दस प्रश्न में से पाँच प्रश्न करने थे। स्वामी जी दसों प्रश्न हल करके आए और उत्तर पुस्तिका में लिख दिया, Check any five, कोई भी पाँच जाँच लें। परीक्षक भौंचक्का रह गए क्योकि दसों प्रश्न एकदम पूर्ण रूप से सही थे उन्हें समझ नहीं आया कि इन्हें 100 नंबर दिया जाए या नहीं।असमञ्जस में आकर उन्होंने परीक्षा पत्र को लन्दन भेज दिया गया। लन्दन में जब उनकी कॉपी जाँच गई तो वहाँ पर से भी यही परिणाम रहा। अन्ततः आदेश आया इन्हें पूरे के पूरे नम्बर मिलने चाहिए।

स्वामी रामतीर्थ से जुड़ा एक और प्रसङ्ग है।
वे लाहौर के कॉलेज में पढ़ते थे। अङ्ग्रेजी सरकार ने उस वर्ष परीक्षा का शुल्क अचानक बढ़ा कर पाँच रुपये (₹5/-) कर दिया। परीक्षा में शुल्क भरने के लिए उनके पास कुल मिलाकर एक रुपया (₹1/-) की जमा-पूँजी भी नहीं थी। वे पढ़ाई में बहुत मेधावी थे। बढ़ा हुआ परीक्षा शुल्क जानकर उन्हें बहुत कष्ट हुआ कि सारी पढ़ाई-लिखाई पैसे के अभाव में व्यर्थ हो जाएगी। वे रात को एक हलवाई की दुकान में दूध पीने के लिए जाते थे। उन्होंने दूध पीना बन्द करने का सोचा। हलवाई को उनसे बड़ा प्रेम था। जैसे ही वे हलवाई की दुकान के सामने से निकल रहे थे हलवाई ने दूध पीने के लिए कहा। रामतीर्थ जी ने कहा कि नहीं पिऊँगा क्योंकि सरकार ने परीक्षा के लिए पाँच रुपये की फीस लगा दी है और मेरे पास पैसे नहीं है। ऐसा कहकर वे रोने लगे। हलवाई ने कहा कि चिन्ता मत करो, मैं तुम्हारे लिए पैसों का प्रबन्ध करता हूँ। उसने अपना गल्ला खोल कर देखा उसमें कुल मिलाकर एक दिन की आय एक रुपया पिचहत्तर पैसा (₹1.75/-) थी। स्वामी रामतीर्थ को दूध का कुल्हड़ पकड़ा कर हलवाई बाहर निकल गये। कुछ समय बाद हलवाई ने उनको पाँच रुपये देकर कहा कि लाहौर में यदि तू नहीं पढ़ेगा तो कैसे होगा? स्वामी रामतीर्थ ने पैसे लेने से मना किया तो हलवाई बोले कि तुम मुझे चाचा कहते हो और मैं तुझे बेटा कहता हूँ, पैसे रख लो। उसी समय स्वामीजी ने सङ्कल्प लिया कि जब मैं काम करने लगूंगा तो हर माह पाँच रूपये हलवाई को दूँगा। परीक्षा के पश्चात् लाहौर विश्वविद्यालय में रामतीर्थ जी गणित के प्राध्यापक बन गए। वहीं पर उनके आवास और भोजन की व्यवस्था भी हो गई। वे पढ़ाई-लिखाई में व्यस्त रहते थे इसलिये हलवाई से मिलने नहीं जा सके। सात महीने बाद अपने कुछ साथियों के साथ हलवाई के पास गए और उनको कहा कि मैं मिलने आया हूँ। हलवाई ने उलाहना देते हुए कहा कि तुमने अब आना बन्द कर दिया है। पिछले सात महीने से तुम्हारे विद्यालय का एक चपरासी मुझे आकर हर महीने पाँच रुपये दे जाता है। मेरे पास तुम्हारे पैंतीस रुपये जमा हो गए हैं। तब रामतीर्थ जी ने कहा कि आपने मेरे ऊपर जो उपकार किया है उसे मैं जीवन भर स्मरण रखूँगा और जीवन भर आपके उपकार को चुकाया नहीं जा सकता। मैंने उसी समय सङ्कल्प लिया था कि मैं हर महीने आपको पाँच रुपये दूँगा क्योंकि मैंने देख लिया था कि आपने अपनी कोई कीमती वस्तु के बदले मुझे पाँच रुपये लाकर दिए थे। तब हलवाई ने बताया कि उसने अपना एक सोने का सिक्का गिरवी रखवाया था।

दोनों की सात्विक वृत्ति बहुत प्रबल थी। दोनों में इस पर झगड़ा होने लगा कि मैं पैसे दूँगा और मैं पैसे नहीं रखूँगा। यह झगड़ा देखकर सभी लोग दङ्ग रह गए। हलवाई भाव प्रधान था और स्वामी जी तत्त्व प्रधान थे। अन्ततः निर्णय यह हुआ कि जो पैंतीस रुपये स्वामी जी ने दे दिए वह तो हलवाई रख लेंगे और आगे से रामतीर्थ जी उन्हें और रुपया नहीं देगें।

सात्त्विक वृत्ति वाला यह भाव रखता है कि किसी ने एक बार उपकार किया तो वह उसे जीवन भर याद रखना है। यह सोचता है कि उपकार का उतना नहीं चुकाना जितना लिया अपितु कैसे भी करके उसका अधिक से अधिक चुकता कर सकूँ वह अच्छा है। आवश्यकता के समय जो कोई भी आपके लिए कुछ भी करता है उसका कोई मूल्य नहीं होता। जैसे स्वामी जी को पाँच रुपये की आवश्यकता थी हलवाई ने पाँच रुपये ही नहीं दिए अपितु उन्हें उनका पूरा जीवन दे दिया। 

यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी।।18.34।।
 
श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं कि हे पार्थ! फल की इच्छा करने वाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यन्त आसक्ति से धर्म, अर्थ, काम को धारण करता है वह वृत्ति राजसिक है।

यह कभी पैसा लगाने की इच्छा करती है, कभी शरीर को सम्भालने में रहती है, कभी कथा, सत्सङ्ग में लग जाती है, कभी इस काम में लगती है, कभी उस काम में लगती है। यह बुद्धि स्थिर नहीं है धर्म, अर्थ, काम में घूमती रहती है। यह बुद्धि मोक्ष में नहीं चलती। सदैव ध्यान रखती है कि अच्छे से अच्छा करूँ, समाज में प्रतिष्ठा हो, लोग मुझे अच्छा बुलाएँ, अच्छे से अच्छा क्या खा लूँ, क्या अच्छा पहन लूँ, मेरा मित्र मण्डल कैसे बने ये सारी धारणाएँ राजसी हैं।

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।।18.35।।

श्रीभगवान कहते हैं जिसकी दुर्मेधा है, बुद्धि दुष्टता से भरी है वह अपनी धारणा शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख को नहीं छोड़ता यहाँ तक कि उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता। इसके पास मद बहुत होता है। हमसे अमुक कार्य नहीं होता, हम नहीं कर पाएँगे। चरम सीमा पर पहुँच जाए तो ऐसा व्यक्ति कहता है कि मैं तो अपने बाप की भी नहीं सुनता। उसकी बुद्धि तामसी होगी उसके मन में दूसरे के लिए क्लेश और द्वेष भरा रहेगा और अपने लिए हीन भावनाएँ भरी होंगी। मैं बहुत बुरा हूँ, मुझे कुछ नहीं होता।

चिन्ता इसका स्वाभाविक गुण होता है। बस पड़े रहो, कोई कुछ करने को कहता है तो नहीं करता। निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख इन चारों में इसकी धृति रहती है। सारा समय सोते रहना, बिना बात चिन्ता करना। यह काम कैसे होगा? वह अरे! मैं अगर यह करूँगा तो वह तो नहीं हो जाएगा? दुःखी होता ही रहता है, कभी मौसम को लेकर, कभी बच्चों को, कभी पत्नी, कभी परिवार, कभी कारोबार, तो कभी मोदी जी को लेकर रोने लगता है।

हमारी  भी वृत्ति राजसिक, सात्विक, तामसिक होती है पर एक की प्रधानता होती है।

जब कभी वृत्ति सात्विक होगी तो गीताजी में मन लग रहा है, विवेचन में, पारायण में मन लग रहा है, सकारात्मक भाव होंगे।

जब वृत्ति तामसिक होगी तब भय, चिन्ता, आलस्य, दुःख में रुचि होती है।
जब यह तामसिक भाव बने तो गाइये -

हमारे साथ श्रीरघुनाथ तो किस बात की चिन्ता
शरण में रख दिया जब माथ तो किस बात की चिन्ता

जब तक यह धारणा स्थाई भाव में नहीं आती तब तक सात्विक भाव नहीं आता।

अपनी चिन्ता, अपनी नहीं तो पड़ोसी की चिन्ता, नहीं तो सीरियल की चिन्ता कि अब क्या होगा? चिन्ता उसका स्वभाव बन जाता है। चिन्ता का स्वभाव, भय का स्वभाव, दुःख का स्वभाव हमारी वृत्ति को तामसिक करता है।

एक बार भगवान शिवजी के मन में आया कि माता सती आज रामजी की परीक्षा लेने गई हैं। अब क्या होगा? इसका कल्याण नहीं हो सकता। जैसे ही उनके मन में चिन्ता का भाव आया उन्होंने कहा -

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

अपने लिए, अपने प्रिय जनों के लिए चिन्ता का मत करो क्योंकि चिन्ता, भय और दुख आपकी भावना को तामसिक बनाते हैं।

18.36

सुखं(न्) त्विदानीं(न्) त्रिविधं(म्), शृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र, दुःखान्तं(ञ्) च निगच्छति॥18.36॥

हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! अब तीन प्रकार के सुख को भी (तुम) मुझसे सुनो। जिसमें अभ्यास से रमण होता है और (जिससे) दुःखों का अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्म-विषयक बुद्धि की प्रसन्नता से पैदा होने वाला जो सुख (सांसारिक आसक्ति के कारण) आरम्भ में विष की तरह (और) परिणाम में अमृत की तरह होता है, वह (सुख) सात्त्विक कहा गया है। (18.36-18.37)

18.36 writeup

18.37

यत्तदग्रे विषमिव, परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं(म्) सात्त्विकं(म्) प्रोक्तम्, आत्मबुद्धिप्रसादजम्॥18.37॥

विवेचन -सात्विक सुख की बात नहीं करते हुए श्रीभगवान् कहते हैं कि अर्जुन अब तीन प्रकार के सुखों की बातों को सुनो।

श्रीभगवान् ने तीन सात्विक सुख बताये हैं किन्तु सन्तों ने सात सुख माने हैं 

पहला सुख निरोगी काया
दूजा सुख घर में हो माया

तीजा सुख कुलवन्ती नारी

चौथा सुख पुत्र हो आज्ञाकारी

पञ्चम सुख स्वदेश में वासा

छठवाँ सुख राज हो पासा

सातवाँ सुख सन्तोषी जीवन

ऐसा हो तो धन्य हो जीवन।

साधारणत: मनुष्य पहले छह में ही फँसा हुआ रहता है, सन्तोष धन पर विचार नहीं कर पाता।


स्वस्थ शरीर सबसे बड़ा सुख है। बीमार शरीर से सब मामला ख़राब हो जाता है। डायबीटीज हो गई तो धन क्या करेगा। राज्य मेरे पास है तो सब लोग मेरी बात मानेंगे। 

सन्तों का कहना है कि सातवाँ सुख आ गया, सन्तोष आ गया तो वृत्ति सात्विक हो जाती है।

गो-धन, गज-धन, वाजि-धन और रतन-धन खान,
जब आ जावे संतोष-धन, सब धन धूरि समान।

सारे धन संतोष धन के सामने छोटे हैं। 

यक्ष ने युधिष्ठिर महाराज से सौ प्रश्न पूछे। एक प्रश्न था - को दरिद्रः? 
हम होते तो उत्तर देते कि जिसके पास पैसा नहीं है, वस्त्र नहीं है, अच्छा घर कारोबार नहीं है वह दरिद्र है। जिसके पास धन है वह और अधिक धन की कामना करता है और असन्तुष्ट रहता है।

युधिष्ठिर महाराज ने उत्तर दिया असन्तुष्टः सः दरिद्रः। जो असन्तुष्ट है वह दरिद्र है।

पैसा होने से दारिद्र्य नहीं जाता, याचना का स्वभाव जाने से दारिद्रय जाता है।

बारहवें अध्याय में श्रीभगवान् ने कहा-
सन्तुष्टो येन केनचित् ॥12.19॥

सन्तुष्ट भक्त भगवान का प्रिय है। वह भक्त भगवान से कहता है कि आपने जो दिया मैं उसी में प्रसन्न हूँ, मुझे वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति को बदलना नहीं है, आपने जैसा भी दिया है मैं उसी में प्रसन्न हूँ। जो सोचता है कि यह बदल जाए, वह बदल जाए तो मैं सुखी हो जाऊँगा। वह सुख की आशा तो करता है पर सुखी नहीं होता। जो असन्तुष्ट है वही दरिद्र है। पैसा आने से दारिद्र्य नहीं जाता याचना का स्वभाव जाने से दारिद्र्य जाता है।

श्रीभगवान् ने एक महत्त्वपूर्ण सूत्र दिया -

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् |
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् || 18.37||

सात्त्विक सुख आरम्भ में विष के समान लगता है लेकिन परिणाम में अमृत के समान लगता है।

किसी ने कहा कि इस नवरात्रि में मैं रामचरितमानस का नवाह्न पारायण करूँगा। पाठ करने के लिए आरम्भ में कठिन लगता है। प्रतिदिन छ: घण्टे का पाठ करना पड़ता है, एक ही आसन में बैठना पड़ता है। आरम्भ में कष्ट होता है, कठिन लगता है लेकिन धीरे-धीरे अभ्यास से सम्भव हो जाता है। कष्ट दूसरे को दिखता है किन्तु आनन्द करने वाले को मिलता है।

किसी भी तप की पूर्णता आनन्द का बोध कराती है। अभ्यास से सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है।

18.38

विषयेन्द्रियसंयोगाद्, यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव, तत्सुखं (म्) राजसं (म्) स्मृतम्॥18.38॥

जो सुख इन्द्रियों और विषयों के संयोग से (होता है), वह आरम्भ में अमृत की तरह (और) परिणाम में विष की तरह प्रतीत होता है, वह (सुख) राजस कहा गया है।

विवेचन -श्रीभगवान् अर्जुन को कहते हैं कि जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है वह भोगकाल के आरम्भ में अमृत की तरह और परिणाम में विष की तरह प्रतीत होता है उसे राजस कहा गया है।

किसी ने सोचा जीवन में एक बार

आईफोन लेना है। जिस दिन उनसे आईफोन ले लिया फिर उसको पाने के बाद उसकी खुशी उतनी नहीं रही।

एक सुन्दर कविता है-                                                                              क्यों होता है ऐसा-
क्यों कल्पना खुशी की, खुशी से ज्यादा खुशी देती है।
क्यों सामने की खुशी मुट्ठी से रेत की तरह निकल जाती है।।

हम सब जीवन में जिन खुशियों की कल्पना करते आए हैं, वे प्राप्त होने पर उतनी बड़ी नहीं लगती।

जैसे जिनके पास घर नहीं है उन्हें घर चाहिए। जिनके पास घर है उन्हें बड़ा घर चाहिए। जिनके पास बड़ा घर है उन्हें और सुख-सुविधा सम्पन्न घर चाहिए।

एक सुन्दर भजन है -  



संसार के सारे सुख बुलबुलों की भाँति हैं। प्राप्त होने के बाद होने वाला सुख स्थाई नहीं होता। सारे सुख मिल जाए तो क्या, वे तो क्षणिक हैं।

उदाहरण से समझते हैं-
कर्ज़ा लेकर आईफोन आ गया। कुछ समय तक वह आनन्दित करेगा। कुछ समय के पश्चात नया वर्जन आ जाएगा, नए एप्लीकेशंस और नए सॉफ्टवेयर आ जाएँगे। एक साल के बाद फोन पुराना लगने लगेगा और विष के समान लगने लगेगा। उसके बाद में उसे दुःख होगा कि अभी तो फोन का कर्ज भी पूरा नहीं हुआ और यह फोन पुराना हो गया।

इस प्रकार भौतिक सुविधाएँ आरम्भ में तो अच्छी लगती हैं लेकिन सांसारिक सुख बाद में कष्ट देते हैं।

तुलसीदास जी विनय पत्रिका में लिखते हैं क्या माँगू कुछ थिर ना रहे।

प्राथमिक सुख अमृत के समान होता है, मन उसमें फँसता है।

चिकित्सक ने मना किया गोलगप्पे नहीं खाना, लेकिन गोलगप्पे देखकर दिल नहीं मानता।

परीक्षा के समय किसी बच्चे को कहो टीवी नहीं देखना, मोबाइल नहीं लेना, मोबाइल में खेल नहीं खेलना तो उसे अच्छा नहीं लगता।

आजकल का जीवन EMI और Fast food का जीवन है। जितनी आमदनी उससे अधिक खर्च है तो वह राजसिक जीवन है। इसका परिणाम दुःख ही देगा।

एक सज्जन व्यक्ति थे उन्हें कुछ सामान लेना था जो कीमती था। मित्र ने कहा ले लो बाकी के पैसे मैं दे दूँगा। उन्होंने मित्र को मना कर दिया कि मैं नहीं लूँगा क्योंकि मैं अपनी आदत नहीं बिगाड़ना चाहता।

आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया के चक्कर में जो फँस गया वह दु:खी हो जाएगा।

सुखी जीवन जीना है तो जिस वक्त वस्तु की आवश्यकता नहीं उसे खरीदना नहीं। पैसा आसानी से मिलता होगा तो भी उसे नहीं लेना चाहिए।

18.39

यदग्रे चानुबन्धे च, सुखं(म्) मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं(न्), तत्तामसमुदाहृतम्॥18.39॥

निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होने वाला जो सुख आरम्भ में और परिणाम में अपने को मोहित करने वाला है, वह (सुख) तामस कहा गया है।

विवेचन - श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं कि जो सुख भोगकाल के आरम्भ में मन को मोहित करने वाला है, जो निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होने वाला है उसे तामस कहा गया है। तमोगुण न पहले सुख देता है और न ही बाद में सुख देता है।

सतोगुणी सुख आरम्भ में दुःख देता है और अन्त में सुख देता है।
रजोगुणी सुख आरम्भ में सुख देता है अन्त में दुःख देता है।
तमोगुण सुख न आरम्भ में सुख देता है न अन्त में सुख देता है, केवल दुःख ही देता है।

कुछ लोगों को झगड़ा करने की आदत हो जाती है। झगड़ा करने के बाद उन्हें सुख मिलता है।
सड़क पर इसी बात पर झगड़ा करते हैं कि यदि गाड़ी छू जाती तो क्या होता।

तमोगुणी अहङ्कार के कारण, मूढ़ता के कारण सभी स्थानों पर दुःख उठाते हैं। शिकायती होगा। सब स्थानों पर केवल दोष ढूँढते हैं। सब लोगों के अप्रिय हो जाते हैं।

एक बार एक गाँव में एक महात्मा आए। एक स्त्री ने सातों दिन महाराज को दोपहर का भोजन कराया और भिक्षा दी। महाराज ने सातवें दिन कहा कि बेटी मैं तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हूँ। तुम मुझे दु:खी प्रतीत होती हो। वह रोने लगी उसने कहा कि मैं अच्छा खाना पकाती हूँ लेकिन मेरे पति को अच्छा नहीं लगता, फिर भी वो लड़ते हैं, मारते हैं। वे मेरी रसोई में दोष निकालते हैं। महाराज जी ने कहा कल से तेरी रसोई अन्नपूर्णा की रसोई हो जाएगी। पति प्रसन्न होगा। उस स्त्री ने छप्पन प्रकार के भोजन पकाये। महाराज ने उसे फिर उदास देखकर पूछा उदास क्यों है? उसने कहा मेरे पति ने आज तो मुझे मारा भी कहा इतना पैसा भोजन बनाने में क्यों व्यय किया? ऐसा भोजन क्या कोई पकाता है? ऐसा व्यक्ति कभी प्रसन्न नहीं होता।

18.40

न तदस्ति पृथिव्यां(म्) वा, दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं(म्) प्रकृतिजैर्मुक्तं(म्), यदेभिः(स्) स्यात्त्रिभिर्गुणै:॥18.40॥

पृथ्वी में या स्वर्ग में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह (ऐसी कोई) वस्तु नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो।

विवेचन - श्रीभगवान् कहते हैं कि इस प्रकृति में, पृथ्वी में या स्वर्ग में अथवा देवताओं में, मनुष्यों में कोई भी इन तीन गुणों - सत, रज और तम से रहित नहीं है। सबमें भिन्न अनुपात में इन तीन गुणों का सम्मिश्रण है।

18.41

ब्राह्मणक्षत्रियविशां(म्), शूद्राणां(ञ्) च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि, स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥18.41॥

हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न हुए तीनों गुणों के द्वारा विभक्त किये गये हैं।

विवेचन - श्रीभगवान् वर्णों के विषय में बताते हैं।
प्रश्न आता है कि सब कुछ रज, तम, सत से व्याप्त है तो हम कैसे जाने की हम क्या करें? कैसे कार्य करें? कैसे पता करें?
पूर्व जन्म में हमारे द्वारा किए गए कर्मों के सञ्चित संस्कारों के कारण जो सत, रज, तम की मात्रा हमें प्राप्त होती है उसके अनुसार वैसे ही कुल परिवार में, लक्षणों के साथ हमारा जन्म होता है, रुचि- अरुचि होती है।

उसके दो कारण होते हैं
मैंने वैसे ही कर्म किए थे तो मुझे यह जन्म मिलता है।
कर्मों के फल को भोगने के लिए मेरी वृत्ति भी वैसी होनी चाहिए।

चोरी करते मर गए तो चोर के घर में पैदा हुआ और बचपन से ही चोरी करना सीख लिया।

वर्ण आश्रम धर्म वैज्ञानिक हैं। किसी संयोग से अथवा ऐसे ही हम पूर्वजन्मों के कर्मों के अनुसार इस योनि को, कुल को, वर्ण को प्राप्त नहीं करते अपितु अपने कर्मों से इन्हें बदल सकते हैं।

देवगुरु बृहस्पति जी और अन्य देवताओं से ज्ञान प्राप्त करके भीष्म पितामह युवावस्था में गङ्गा माता के साथ महाराज शान्तनु के पास गए तो उन्होंने अपने पिता को बहुत प्रसन्न कर दिया। कुछ समय के बाद महाराज शान्तनु के पास एक वणिक आया। शान्तनु को कहीं जाना था। वणिक ने अधीर होकर महाराज से समय माँगा। शान्तनु ने कहा कि यदि तुम्हारे पास कोई बहुत महत्वपूर्ण बात है तो तुरन्त बताइए अन्यथा आपको प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। वणिक ने बड़े अहङ्कार से कहा कि मैं पूरे संसार में अश्वों का उत्तम जानकार हूँ। मेरे पास ऐसे अद्भुत घोड़े हैं जो वायु के समान चलते हैं, कमल के पत्तों पर चलकर सरोवर पार कर लेते हैं और उनकी कोई हानि नहीं होती। अश्वों की परीक्षा के लिए मैं आपके पास आया हूँ। देवव्रत(युवास्था में भीष्म पितामह का नाम) ने वणिक की बात सुनकर कहा कि जिस प्रकार की चुनौतीपूर्ण भाषा का तुम प्रयोग कर रहे हो वह वणिक को राजा के सामने नहीं बोलनी चाहिए। राजा के सामने ऐसी अहङ्कार युक्त भाषा का प्रयोग करना उचित नहीं है। देवव्रत्त ने कहा कि यदि तुम्हारी बात सच हुई तो मैं तुम्हें क्षत्रिय बना दूँगा और यदि तुम्हारी बात असत्य हुई तो मैं तुम्हें शूद्र बना दूँगा। महाराज शान्तनु ने देवव्रत्त की बात का अनुमोदन किया। देवव्रत ने परीक्षा के बाद उसे क्षत्रिय घोषित कर दिया।

महाभारत में कर्ण का एक प्रसङ्ग आता है। दुर्योधन ने कर्ण को सूतपुत्र से अङ्ग देश का नरेश बनाकर क्षत्रिय घोषित कर दिया।
उसने झूठ बोलकर भगवान् परशुराम से शिक्षा प्राप्त की कि वह एक ब्राह्मण बालक है। एक बार दोनों जङ्गल में जा रहे थे। परशुराम भगवान् को नींद आ गई। वे कर्ण की जङ्घा पर सिर रखकर सो गए। कुछ देर पश्चात् कर्ण की जङ्घा पर किसी बिच्छु ने काट लिया। कर्ण दर्द सहता रहा। कुछ समय के बाद खून निकल कर परशुराम भगवान् के कान तक आ गया जिससे उनकी नींद खुल गई। उन्होंने देखा कि कर्ण की जङ्घा पर बिच्छू चिपका है। परशुराम जी  ने क्रोधित होकर कहा कि एक ब्राह्मण बालक में सहनशक्ति नहीं हो सकती। तूने झूठ बोलकर विद्या प्राप्त की है जब तुझे इस विद्या की सबसे अधिक आवश्यकता होगी तुम उसे भूल जाओगे।

इसी प्रकार एक और उदाहरण आता है कौशिक नरेश विश्वामित्र ने तपोबल से क्षत्रिय से ब्राह्मण, ब्राह्मण से  ऋषि, ऋषि से महर्षि और ब्रह्म ऋषि की उपाधि को अपना लिया।

वर्ण की आवश्यकता आज भी देखते हैं और इस व्यवस्था को कोई काट नहीं सकता। आज भी कार्यालय में प्रथम श्रेणी, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणियाँ मिलती हैं। मुगल काल में दुराग्रह उत्पन्न हुआ और उसका बिगड़ा रूप देखते हैं। हमारे शास्त्रों में कहीं भी अस्पृश्यता, अश्रद्धा नहीं मिलती। राम जी ने निषाद राज का आह्वान स्वीकार किया। शबरी के झूठे बेर स्वीकारे थे। मुगल काल में आई विसङ्गतियों को दूर करने का प्रयास समय-समय पर करना चाहिए।जो वञ्चित हैं, अस्पृश्य हैं उन्हें वापस बुलाकर मुख्य धारा में जोड़ना है।

देश हमें देता है सब कुछ, 
हम भी तो कुछ देना सीखें।
जो अनपढ़ हैं उन्हें पढ़ाएँ,
पिछड़े हैं जो उन्हें बढ़ाएँ।
हम मेहनत के दीप जलाकर, 
नया उजाला करना सीखें।
देश हमें देता है सब कुछ,
हम भी तो कुछ देना सीखें।


जाति-पाँति के नाम पर भेदभाव किया गया जो अपराध हमसे हुआ है वह हमें ही सुधारना है। उसके शमन के लिए हमें ही आगे आना है।

18.42

शमो दमस्तपः(श्) शौचं(ङ्), क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानंविज्ञानमास्तिक्यं(म्), ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥18.42॥

मन का निग्रह करना, इन्द्रियों को वश में करना; धर्मपालन के लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतर से शुद्ध रहना; दूसरों के अपराध को क्षमा करना; शरीर, मन आदि में सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदि का ज्ञान होना; यज्ञविधि को अनुभव में लाना; और परमात्मा, वेद आदि में आस्तिक भाव रखना - (ये सबके सब ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।

विवेचन -श्रीभगवान् ने अर्जुन को ब्राह्मणों के नौ लक्षण बताए -
1 क्षमा।
2 अपने अन्तःकरण पर नियन्त्रण करना  मन का निग्रह करना।
3 दम- बाहर से इन्द्रियों का शमन करना।
4 तप- धर्म पालन के लिये कष्ट सहना।
5 शौच - बाहर-भीतर से शुद्ध रहना।
6 क्षमाशील -  दूसरों के अपराधों को क्षमा करना।
7 आर्जव - शरीर, मन, इन्द्रियों से  सादगीपूर्वक जीवन व्यतीत करना।
8 वेद, शास्त्र आदि का ज्ञान प्राप्त करना, पढ़ना और विज्ञान से पढ़ाना, यज्ञविधि को अनुभव में लाना।
9 परमात्मा, वेद आदि में आस्तिक भाव रखना।

ये सभी ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।

18.43

शौर्यं(न्) तेजो धृतिर्दाक्ष्यं(म्), युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च, क्षात्रं(ङ्) कर्म स्वभावजम्॥18.43॥

शूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजा के संचालन आदि की विशेष चतुरता, युद्ध में कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करने का भाव - (ये सबके सब) क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म है

विवेचन - श्रीभगवान् ने क्षत्रियों के सात गुण अर्जुन को बताए -
1 शौर्य - शूरता
2 तेज
3 धैर्य
4 चातुर्य
5 युद्ध में पलायन नहीं करने वाला।
6 दान देना।
7 ईश्वर भाव या स्वामी भाव।

ये सभी गुण क्षत्रियों के स्वाभाविक कर्म हैं।

18.44

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं(म्), वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं(ङ्) कर्म, शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥18.44॥

खेती करना, गायों की रक्षा करना और व्यापार करना - (ये सबके सब) वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं (तथा) चारों वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है।

विवेचन - श्रीभगवान् ने वैश्यों के तीन गुण बताए -
1 खेती
2 गोपालन
3 वाणिज्य - क्रय-विक्रय रूपी सत्य व्यवहार। ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं

शूद्रों के लिए श्रीभगवान् ने एक ही गुण बताया है- सब वर्णों की सेवा, नौकरी करना।

नौकरी - एक कर काम करे और नौ  खाएँ।
चाकरी - एक कमाता है, चार खाते हैं।
तनख्वाह - एक ही तन का गुजारा हो।
वेतन - एक तन का गुजारा भी नहीं होता।
किसी भी प्रकार की नौकरी करना शूद्र का स्वाभाविक गुण है।

18.45

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः(स्), संसिद्धिं(म्) लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः(स्) सिद्धिं(म्), यथा विन्दति तच्छृणु॥18.45॥

अपने-अपने कर्म में प्रीतिपूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि (परमात्मा)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को प्राप्त होता है? उस प्रकार को (तू मुझसे) सुन।

18.45 writeup

18.46

यतः(फ्) प्रवृत्तिर्भूतानां(म्), येन सर्वमिदं(न्) ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य, सिद्धिं(म्) विन्दति मानवः॥18.46॥

जिस परमात्मा से सम्पूर्ण प्राणियों की प्रवृत्ति (उत्पत्ति) होती है (और) जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्मा का अपने कर्म के द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।

विवेचन - श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं कि अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में प्रीतिपूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि (परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को प्राप्त होता है? उस प्रकार को (तू मुझसे) सुन। जिस परमात्मा से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्मा का स्वभाविक कर्म के द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।

18.47

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः(फ्), परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं(ङ्) कर्म, कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥18.47॥

अच्छी तरह अनुष्ठान किये हुए परधर्म से गुणरहित (भी) अपना धर्म श्रेष्ठ है। (कारण कि) स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ (मनुष्य) पाप को प्राप्त नहीं होता।

विवेचन - श्रीभगवान् कहते हैं कि अच्छी तरह अनुष्ठान किये हुए परधर्म की अपेक्षा, गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ (मनुष्य) पाप को प्राप्त नहीं होता।

18.48

सहजं(ङ्) कर्म कौन्तेय, सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण, धूमेनाग्निरिवावृताः॥18.48॥

हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म का त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँ से अग्नि की तरह (किसी न किसी) दोष से युक्त हैं।

विवेचन - श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं कि हे कुन्तीनन्दन! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म का त्याग नहीं करना चाहिये क्योंकि सारे कर्म धुएँ से अग्नि की तरह (किसी न किसी) दोष से युक्त हैं।

निष्ठापूर्वक अपने वर्ण आश्रम का पालन करने से भी भगवद् प्राप्ति होती है।

महाभारत में चार कथाएँ आती है -
1 तुलाधार वैश्य
2 पतिव्रता स्त्री
3 सदना कसाई
4 गणिका 

जिन्होंने अपने कार्य से, अपने इस भाव से (कि अपना कार्य श्रीभगवान् के लिए करना है) भगवद् प्राप्ति कर ली।
अपने कर्म को, निष्ठापूर्वक भगवान के लिए कर रहा हूँ, यह भाव रखने से भगवद् प्राप्ति हो जाती है। जिसका जो कर्म है उसे श्रीभगवान् की प्रसन्नता के लिए करें। 

अपने कर्म को श्रेष्ठ मानें। धर्म का अर्थ पूजा पद्धति नहीं है। तुमको कुछ स्वाभाविक कर्म प्राप्त हुआ है, उसका पालन करना ही धर्म है।

पति धर्म
स्त्री धर्म
पुत्र धर्म
राज धर्म
मित्र धर्म

जैसे धुएँ से अधिक अग्नि प्रज्वलित करते हैं। प्रत्येक कर्म किसी न किसी दोष से युक्त है। मैं जो करूँगा उससे कुछ नहीं बदलेगा लेकिन कुछ तो बदलेगा।

एक बच्चा समुद्र के किनारे खड़ा था। ज्वार के साथ कुछ जेलीफिश लहरों के साथ तट पर आ गई। वह जेलीफिश को वापस समुद्र में डालने लगा। किसी ने उससे पूछा तुम जेलीफिश को समुद्र में डाल रहे हो इससे क्या अन्तर होगा। उसने एक जेलीफिश को पकड़ कर पानी में डाल कर कहा कि इस मछली को अवश्य अन्तर होगा।

हमारे कर्म से जो बदलने की क्षमता भगवान ने हमें दी है उसे हमें करना ही है। मानव कल्याण गीता जी का मूल है।

18.49

असक्तबुद्धिः(स्) सर्वत्र, जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं(म्) परमां(म्), सन्न्यासेनाधिगच्छति॥18.49॥

जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीर को वश में कर रखा है, जो स्पृहारहित है (वह मनुष्य) सांख्ययोग के द्वारा सर्वश्रेष्ठ नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।

18.49 writeup

18.50

सिद्धिं(म्) प्राप्तो यथा ब्रह्म, तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय, निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥18.50॥

हे कौन्तेय ! सिद्धि (अन्तःकरण की शुद्धि) को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्म को, जो कि ज्ञान की परा निष्ठा है, जिस प्रकार से प्राप्त होता है, उस प्रकार को (तुम) मुझसे संक्षेप में ही समझो।

विवेचन - श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीर को वश में कर रखा है, जो स्पृहारहित है वह मनुष्य सांख्ययोग के द्वारा सर्वश्रेष्ठ नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त हो जाता है। सिद्धि अन्तःकरण की शुद्धि को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्म को जिस प्रकार से प्राप्त होता है, उसे मुझसे संक्षेप में ही समझो। प्राणी मात्र का कल्याण करना श्रीभगवान् का उद्देश्य है। श्रीभगवान् ज्ञान मार्ग की भूमिका बताते हुए कहते हैं-
नैष्कर्म्यता का अर्थ कर्म न करना नहीं, निष्काम कर्म को करना है। कर्मों से अपनी वासना, कामना, फल बुद्धि को हटाना है।

कार के इञ्जन को स्टार्ट किया जब तक गीयर नहीं लगाया तब गाड़ी नहीं चलती। गाड़ी का इञ्जन कामना है, गीयर कामना से जुड़ाव और गाड़ी का चलना कर्म है, लेकिन इसी गाड़ी को यदि ढलान पर ले जाकर छोड़ दे तो वह इञ्जन बन्द होने पर भी गाड़ी अपने आप नीचे आ जाती है।

आश्रय की ढाल पर कर्म जब बिना कार्य के हो रहे हैं, बिना कर्म, बिना कामना के हो रहे हैं, बिना फल की इच्छा के हो रहे हैं, वह नैष्कर्म्यता है।

भोजन करने के बाद यह कभी नहीं कहते कि आज मैंने बहुत अच्छा भोजन पचाया है क्योंकि हमें पता है भोजन तो अपने आप पच रहा है। जैसे भोजन पचने का कार्य स्वतः हो रहा है ऐसे ही प्रकृति में सारे कार्य स्वतः हो रहे हैं, हम अपने को कर्ता मान लेते हैं।

श्रीभगवान् ने तीन बातें बताईं-
बुद्धि को  आसक्तिरहित रखना 
स्पृहारहित होना
जितात्मा-  मन, बुद्धि पर नियन्त्रण करना

हमारी स्पृहा बहुत मज़बूत होती है। कपूर की डिब्बी में कपूर रखकर निकाल दें। उसे एक वर्ष के पश्चात् खोलें तो भी कपूर की सुगन्ध कुछ समय तक आती रहती है। यदि एक रूह अफजा की बोतल खाली होने पर उसे पानी की बोतल में बदल दें, तो बोतल के अनेक बार धोने के बाद भी उसमें सुगन्ध रह जाती है इसी प्रकार करोड़ों जन्मों की वासनाएँ हमसे चिपकी रहती हैं।

यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई॥

हरिशरणं नाम सङ्कीर्तन के साथ विवेचन सत्र समाप्त हुआ। 
 

विचार - मंथन(प्रश्नोत्तरी):-

प्रश्नकर्ता - मयुरी दीदी

प्रश्न -वेदव्यास जी और श्री कृष्ण जी का एक काल नहीं था, फिर भी उन्होंने महाभारत कैसे लिखी?

उत्तर - वेदव्यास जी त्रिकालदर्शी थे। उन्हें भूत,वर्तमान और भविष्य का ज्ञान था। इसलिये उन्होंने सञ्जय को भी दिव्य दृष्टि प्रदान की थी, जिससे वे सारे घटनाक्रम को देख सकते थे।

प्रश्नकर्ता -पुष्पलता दीदी

प्रश्न- गीता परिवार से जुड़ने के बाद इस बात का आभास तो होने लगा कि कभी - कभी अनजाने में सहायकों से काम लेते समय राजसी व तामसी गुणों के प्रभाव में मेरा व्यवहार बुरा हो जाता है। इससे बचने का मार्ग बताइए।

उत्तर - जब आपको अपने व्यवहार के दोष का आभास हो जाए। तब आप उसे बदलने का सङ्कल्प ले कर एक अभ्यास कर सकते हैं। उसके लिए स्वयं के लिए एक छोटा सा दण्ड निर्धारित कर लीजिए। जैसे उस दिन एक समय की चाय/कॉफी जो भी आपकी दिनचर्या का भाग हो, का त्याग कर दीजिए। इसका अभ्यास करिए। इससे आपको अपनी भूल का स्मरण रहेगा। निरन्तर अभ्यास करने से ये तामसिक, राजासिक बुराई दूर हो जायेगी।

                         ।। ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।