विवेचन सारांश
कर्मफल इच्छा का त्याग
गीता-गीत, भजन, हनुमान चालीसा पाठ, दीप प्रज्वलन और परमपूज्य परम श्रद्धेय स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरि जी महाराज के चरणों में सादर नमन एवं वन्दन करते हुए विवेचन सत्र आरम्भ किया गया।
श्रीभगवान की अत्यन्त मङ्गलमय कृपा से हम सभी का ऐसा सद्भाग्य जागृत हुआ है कि हम लोग अपने इस मानव जीवन को सुफल करने के लिए, सार्थक करने के लिए एवं इसके परमोच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भगवद्गीता से जुड़ गए हैं। इस लोक में एवं परलोक में अपने जीवन को सफल बनाने के लिए भगवद्गीता के अध्ययन, उसके पारायण, उसके सीखने और उच्चारण के लिए प्रवृत्त हुए हैं। हमारी यह प्रवृत्ति, हो सकता है हमारे पूर्व जन्म के पुण्यों के कारण हुई हो या फिर इस जन्म के कुछ पुण्यों के कारण हुई हो। हमारे पूर्वजों के कुछ सुकृत्य हैं या किसी सन्त की हम पर कृपा दृष्टि हो गई हो, जिसके कारण हमारा भाग्योदय हुआ है कि हम भगवद्गीता में लग गए हैं।
श्रीभगवान की कृपा के बिना कोई भगवद्गीता नहीं पढ़ सकता। हमें यह परम विश्वास होना चाहिए कि हमने भगवद्गीता को नहीं चुना है अपितु भगवद्गीता के लिए हमारा चयन हुआ है। यह संसार का सबसे महानतम ग्रन्थ है। यह सर्व सुलभ है। यह एकमात्र ग्रन्थ है जिसकी जयन्ती मनाई जाती है। ग्यारह दिसम्बर, मोक्षदाायिनी एकादशी के अवसर पर हम भगवद्गीता की जयन्ती मनाएँगे। यह एकमात्र ग्रन्थ है जिसे युद्ध भूमि में कहा गया। यह एकमात्र ग्रन्थ है जिसे श्रीभगवान के मुखारविन्द से समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए कहा गया।
यह एकमात्र ग्रन्थ है जो मूल ग्रन्थ नहीं, अपितु किसी ग्रन्थ का भाग है। महाभारत में एक लाख श्लोक हैं,अट्ठारह पर्व हैं, हजारों अध्याय हैं। इन अट्ठारह पर्वों में से एक है भीष्म पर्व-
भीष्म पर्व के पच्चीसवें अध्याय से बयालीसवें
अध्याय का सार है श्रीमद्भगवद्गीता।
अध्याय का सार है श्रीमद्भगवद्गीता।
श्रीमद्भगवद्गीता -
श्री से युक्त श्रीभगवान द्वारा गाया गया।
श्री से युक्त श्रीभगवान द्वारा गाया गया।
केवल इतना ही अर्थ है श्रीमद्भगवद्गीता का। अनेक प्रकार की गीताएँ प्रचलित हैं। उनमें श्रीमद्भगवद्गीता सबसे अधिक सर्वमान्य, सर्वसुलभ एवं सर्व कल्याणकारी है। सात सौ श्लोकों की श्रीमद्भगवद्गीता में अट्ठारह अध्याय हैं। एक श्लोक धृतराष्ट्र ने कहा, इकतालीस श्लोक सञ्जय ने कहे, चौरासी श्लोक अर्जुन ने कहे और पाँच सौ चोहत्तर श्लोक श्रीभगवान के मुखारविन्द से निकले हैं।
श्रीभगवान के मुखारविन्द से सम्पूर्ण भगवद्गीता का प्राकट्य हुआ, इसलिए भगवद्गीता मन्त्रमयी है। अब मन्त्रमयी का क्या अर्थ हुआ? हम सभी को यह लगता है कि कक्षा में श्लोक के साथ-साथ उसका अर्थ भी पढ़ाया जाता। अच्छी बात है, अर्थ तो जानना भी चाहिए। एक बहुत ही विशेष बात को हमें जानना होगा। अर्थ जानने की प्रक्रिया बड़ी है। इसके लिए एक जन्म नहीं कई जन्म लग जाएँगे। एक बार गीता के श्लोकों का शुद्ध उच्चारण सीख लिया, उनके पारायण की ललक लग गई तो इसका जो मन्त्रमयी प्रभाव है वह बहुत अद्भुत है।
हम इतने सारे लोग कक्षा में जाते हैं, मिलकर श्लोकों का उच्चारण करते हैं। श्लोक समझ में आए या न आए, लेकिन उनका प्रभाव हम पर दिखने लगता है। वे हमारे मानस की स्थिति को प्रभावित करते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे हमने वाईफाई का पासवर्ड डाल दिया और इन्टरनेट कनेक्ट हो गया। इन्टरनेट की तकनीकी जानकारी हमें पता है या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता पर उसका प्रभाव हमें दिखता है। गीता कक्षाओं से जुड़े रहने के दो-तीन महीने में ही हमें यह अनुभव होने लगेगा कि हम कुछ बदल से गए हैं। हमारी वाणी में अब कठोरता नहीं रहती, अपितु हमारी वाणी में कोमलता आ गई होती है।
परम पूज्य स्वामी जी ने मन्त्र दिया-
गीता पढ़े, पढ़ायें और जीवन में लायें।
हम इतने सारे लोग कक्षा में जाते हैं, मिलकर श्लोकों का उच्चारण करते हैं। श्लोक समझ में आए या न आए, लेकिन उनका प्रभाव हम पर दिखने लगता है। वे हमारे मानस की स्थिति को प्रभावित करते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे हमने वाईफाई का पासवर्ड डाल दिया और इन्टरनेट कनेक्ट हो गया। इन्टरनेट की तकनीकी जानकारी हमें पता है या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता पर उसका प्रभाव हमें दिखता है। गीता कक्षाओं से जुड़े रहने के दो-तीन महीने में ही हमें यह अनुभव होने लगेगा कि हम कुछ बदल से गए हैं। हमारी वाणी में अब कठोरता नहीं रहती, अपितु हमारी वाणी में कोमलता आ गई होती है।
परम पूज्य स्वामी जी ने मन्त्र दिया-
गीता पढ़े, पढ़ायें और जीवन में लायें।
हमें यह हर सम्भव प्रयास करना है कि हर विवेचन सत्र में हम कुछ सीखें और औरों को भी कुछ तो सिखा सकें।
पिछले सत्र में हमने दस श्लोकों को समझा और सीखा था। इसमें अर्जुन ने श्रीभगवान से एक प्रश्न किया था जिसके साथ ही बारहवें अध्याय का आरम्भ होता है। अर्जुन ने पूछा था-
पिछले सत्र में हमने दस श्लोकों को समझा और सीखा था। इसमें अर्जुन ने श्रीभगवान से एक प्रश्न किया था जिसके साथ ही बारहवें अध्याय का आरम्भ होता है। अर्जुन ने पूछा था-
के योग वित्तमाहा:।
मुझे सामने खड़ा करके सारे विश्व की बातें तो बता रहे हो, किन्तु उसमें मेरे काम की क्या चीज है? अर्थात् दवाइयों की दुकान में तो बहुत सारी दवाइयाँ हैं, लेकिन मेरे काम की कौन सी है? तब श्रीभगवान उत्तर देते हुए कहते हैं-
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां(न्), नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेताः(स्), ते मे युक्ततमा मताः॥12.2॥
मय्यावेश्य मनो ये मां(न्), नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेताः(स्), ते मे युक्ततमा मताः॥12.2॥
हे अर्जुन, जो अपने मन और बुद्धि को अर्पण करके, मेरी भक्ति करता है, वह मुझे अधिक प्रिय होता है। जो ज्ञानमार्ग से मेरी भक्ति करेगा मैं उसे मानता हूँ। भगवद्गीता की यह विशेषता है कि इसमें यह कहीं भी नहीं बताया गया की भक्ति कैसे करें? भक्ति चाहे कैसे भी करो लेकिन यह पता तो करो कि कहाँ पहुॅंचे हो और तुम्हारी भक्ति का स्तर क्या है, इसलिए श्रीभगवान ने पूरी भगवद्गीता में यह चेकलिस्ट दी है, ताकि हम पता कर सकें कि हमारी भक्ति का स्तर क्या है।
अर्जुन ने प्रश्न किया कि उन्हें भक्तियोग में जाना है या ज्ञानयोग में। मूलत: अर्जुन का मानना है कि वे यदि ज्ञानमार्ग पर चलते हैं तो श्रीभगवान उन्हें संसार से वैराग्य लेने के लिए कह देंगे और उन्हें युद्ध भूमि से वैराग्य का चोला पहनकर भाग जाना पड़ेगा। श्रीभगवान का कहना है कि संन्यास लेने के लिए किसी को कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। जहाँ रह रहे हो वहीं पर विषयों से वैराग्य कर सकते हो, परिवार से वैराग्य कर सकते हो, तब वैराग्य का गुण आता है।
अर्जुन ने प्रश्न किया कि उन्हें भक्तियोग में जाना है या ज्ञानयोग में। मूलत: अर्जुन का मानना है कि वे यदि ज्ञानमार्ग पर चलते हैं तो श्रीभगवान उन्हें संसार से वैराग्य लेने के लिए कह देंगे और उन्हें युद्ध भूमि से वैराग्य का चोला पहनकर भाग जाना पड़ेगा। श्रीभगवान का कहना है कि संन्यास लेने के लिए किसी को कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। जहाँ रह रहे हो वहीं पर विषयों से वैराग्य कर सकते हो, परिवार से वैराग्य कर सकते हो, तब वैराग्य का गुण आता है।
जो जग में रहे तो ऐसे रहो
ज्यों जल में कमल का फूल रहे|
ज्यों जल में कमल का फूल रहे|
कमल का फूल जल में उत्पन्न होता है। कमल के फूल का जीवन ही पानी में है पर वह कभी भी पानी को नहीं छूता।
सन्तों का कहना है कि संसार में रहो, पर संसार से वैराग्य लेकर रहो। अर्जुन श्रीभगवान से अन्य विकल्पों के बारे में पूछते हैं। ऐसे ही श्रीभगवान ने अर्जुन को दसवें श्लोक तक कई विकल्प दिए। ग्यारहवें
सन्तों का कहना है कि संसार में रहो, पर संसार से वैराग्य लेकर रहो। अर्जुन श्रीभगवान से अन्य विकल्पों के बारे में पूछते हैं। ऐसे ही श्रीभगवान ने अर्जुन को दसवें श्लोक तक कई विकल्प दिए। ग्यारहवें
श्लोक में भी अर्जुन को अन्तिम विकल्प देते हैं।
12.11
अथैतदप्यशक्तोऽसि, कर्तुं(म्) मद्योगमाश्रितः|
सर्वकर्मफलत्यागं(न्), ततः(ख्) कुरु यतात्मवान्||11||
अगर मेरे योग (समता) के आश्रित हुआ (तू) इस (पूर्व श्लोक में कहे गये साधन) को भी करने में (अपने को) असमर्थ (पाता) है, तो मन इन्द्रियों को वश में करके सम्पूर्ण कर्मों के फल की इच्छा का त्याग कर।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं, हे अर्जुन! यदि तुम्हें लगता है कि अब तक मैंने जितने भी उपाय तुम्हें बताए हैं, वे सभी बहुत कठिन हैं तो कोई बात नहीं, मैं एक और अन्तिम उपाय तुम्हें बताता हूँ, जो बहुत ही रोचक है। अब अर्जुन श्रीभगवान की ओर आश्चर्य से देखते हैं तो श्रीभगवान फिर कहने लगते हैं कि तुम अपने मन और बुद्धि पर नियन्त्रण पा कर सभी कर्म फलों को त्याग दो। ऐसा क्यों? तो श्रीभगवान इसका महत्त्व बताते हैं।
ग्यारहवें श्लोक में श्रीभगवान एक बहुत ही सूक्ष्म सूत्र को बताते हैं। सामान्य रूप से देखा जाए तो इसका अर्थ समझ में नहीं आता, पर महापुरुषों के चिन्तन से इस विषय में जब सोचते हैं तो एक अलग ही बात सामने आती है।
ग्यारहवें श्लोक में श्रीभगवान एक बहुत ही सूक्ष्म सूत्र को बताते हैं। सामान्य रूप से देखा जाए तो इसका अर्थ समझ में नहीं आता, पर महापुरुषों के चिन्तन से इस विषय में जब सोचते हैं तो एक अलग ही बात सामने आती है।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्, ज्ञानाद्ध्यानं(व्ँ) विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्याग:(स्),त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥12.12॥
अभ्यास से शास्त्रज्ञान श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है (और) ध्यान से (भी) सब कर्मों के फल की इच्छा का त्याग (श्रेष्ठ है)। क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति प्राप्त हो जाती है।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं- हे अर्जुन! मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है। ज्ञान से भी मुझ परमेश्वर स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है। ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है क्योंकि त्याग से तत्काल शान्ति मिल जाती है।
सामान्य रूप से ऐसा लगता है कि श्रीभगवान एक साधन से दूसरे साधन की श्रेष्ठता बता रहे हैं। श्रीभगवान साधन की श्रेष्ठता नहीं बता रहे हैं, क्योंकि सभी साधन श्रेष्ठ ही हैं। वे यहाँ इन्द्रियों में सूक्ष्मता का अन्तर बता रहे हैं क्योंकि अभ्यास किया जाता है इन्द्रियों से। पाँच कर्मेन्द्रियॉं और पाँच ज्ञानेन्द्रियॉं हैं। हाथ, पैर, मुख, लिङ्ग और गुदा ये पाँच कर्मेन्द्रियॉं हो गईं। सभी कर्म इन्हीं से होते हैं। श्रीभगवान कहते हैं सबसे सरल बात जो होती है वह पाँच कर्मेन्द्रियों और पाँच ज्ञानेन्द्रियों से होती है। अभ्यास से भी ज्ञान श्रेष्ठ है, क्योंकि अभ्यास से मन काबू में आता है। जितना सूक्ष्म उतना बलवान।
बताओ तो हमारी आँखें अधिक बलवान हैं या हमारा मन? आँखों ने देखा जलेबी को और मन में आया इतनी करारी और गरमा गरम! यह तो अभी खानी चाहिए। ऐसे विचार मन में आते ही बुद्धि ने कहा अरे रुक जा, सवेरे शुगर दो सौ के पार गई थी, जलेबी नहीं खानी है। फिर मन उपाय बताता है कि चलो कोई बात नहीं दो किलोमीटर और चल लेते हैं, परन्तु ऐसी करारी जलेबी और कहाँ मिलनी है? मन समझा-बुझा कर पैरों को जलेबी तक ले ही जाता है और हाथ जलेबी की ओर बढ़ भी जाता है और शुरू हो जाता है मुखारविन्द से बड़ी मजेदार जलेबी का सेवन। मन सबसे बलवान और शक्तिमान इन्द्रिय है। शरीर की शेष जो इन्द्रियाँ हैं उनको नियन्त्रित करने वाला, उनको वश में करने वाला मन ही है और मन को वश में करने का एक ही उपाय है। अर्जुन ने चौथे अध्याय में श्रीभगवान से जो बात पूछी थी, उसी को वे फिर से यहाँ बताते हैं। अर्जुन ने चौथे अध्याय में श्रीभगवान से पूछा था कि मन को वश में करना तो बहुत कठिन है, जैसे वायु को वश में नहीं किया जा सकता। श्रीभगवान कहते हैं, हॉं! तुम्हारा कहना पूर्णतः सही है पर इसको वश में करने का एक उपाय अवश्य है।
जो प्रयत्न ही नहीं करता वह मन को वश में नहीं कर पाता। जो प्रयत्न करता रहता है, करता रहता है, करता रहता है वह मन को वश में कर लेता है। जैसे, जितना तय किया है उतना ही मीठा खाऊँगा उससे अधिक कभी नहीं, चाहे कुछ भी हो जाए। अब ऐसी स्थिति कब आएगी? जब बार-बार, बार-बार प्रयत्न करके कुछ किया जाता है तो ऐसी स्थिति आ जाती है। अभ्यास से मन काबू में आ जाता है।
श्रीभगवान ने कहा, अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञान से बुद्धि जागृत होती है। मन से ऊपर होती है बुद्धि। इन्द्रियों से ऊपर मन और मन से ऊपर बुद्धि। बुद्धि की सूक्ष्मता मन से अधिक होती है। जिसकी बुद्धि, प्रज्ञा जागृत हो गई उसके लिए मन को वश में करना बहुत सरल है। हम कहते हैं न कि दिल की सुनें या दिमाग की। बुद्धि की सुनते हैं तो सभी बातें तर्क पूर्ण होती हैं, गलत निर्णय सही हो जाता है। जब मन की सुनते हैं तो बहुत कुछ गड़बड़ हो जाती है। मन से बुद्धि श्रेष्ठ है इसलिए ज्ञान को श्रेष्ठ कहा गया।
फिर श्रीभगवान कहते हैं कि ज्ञान से भी ध्यान श्रेष्ठ है, क्योंकि ध्यान से चित्त एकाग्र होता है। सबसे नीचे कर्मेन्द्रियाँ, उसके ऊपर ज्ञानेन्द्रियाॅं, उसके ऊपर मन, उसके ऊपर बुद्धि और उसके ऊपर चित्त। ध्यान करने से चित्त एकाग्र हो जाता है। पतञ्जलि ऋषि ने कहा, सारा योग क्या है?
योग क्या है? चित्त की वृत्ति को निरोध कर लिया तो योग हो गया और अब श्रीभगवान अन्तिम सूत्र देते हैं। इस ध्यान से भी ऊपर कुछ है क्या? इस चित्त को वश में करने के ऊपर भी कुछ साधन है क्या? तो श्रीभगवान कहते हैं, हाँ है। इससे भी सूक्ष्म एक बात है उसको जानते हैं।
सभी बातों में अहङ्कार। मैं करता हूँ, यह भावना जो है यह प्रगाढ़ता है। ध्यान करने वाला भी मैं, ज्ञान प्राप्त करने वाला भी मैं, अभ्यास करने वाला भी मैं। श्रीभगवान कहते हैं सबसे पहले इस 'मैं' पने का त्याग करो। तो इस 'मैं' पन का त्याग कैसे होगा?
मैं तो कुछ कर ही नहीं रहा, बस वो जैसे करवाते हैं, मैं करता हूँ। श्रीभगवान कहते हैं, ध्यान से भी कर्म फल का त्याग सबसे श्रेष्ठ है। इससे अहम् का नाश होता है। मैं कुछ नहीं कर रहा, बस राम जी करवाते हैं।
अर्जुन के मन में यह बात नहीं आई कि इससे पहले जो बताया वही श्रेष्ठ है इसलिए श्रीभगवान ने कर्म फल के त्याग की श्रेष्ठता की बात की। कोई भी साधन ऊॅंचा या नीचा नहीं होता। वृत्ति के अनुसार किसे क्या भाता है? यह उस पर निर्भर होता है। किसी को कीर्तन करने में आनन्द मिलता है तो किसी को जप करने में। किसी को सेवा करने में आनन्द आता है तो किसी को श्रीभगवान के दर्शन करने में ही बड़ा आनन्द मिलता है। किसी को वृन्दावन की यात्रा करने में आनन्द आता है तो किसी को प्रति माह गोवर्धन की परिक्रमा करने में आनन्द आता है।
जिसकी जैसी वृत्ति उसका वैसा ही कल्याण हो जाएगा। साधनों में नहीं लक्षणों में कल्याण ढूँढो, इसलिए श्रीभगवान ने तेरहवें श्लोक से उन्नीसवें श्लोक तक भक्त के उनतालीस लक्षण बतलाए हैं, बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। हम सोचते हैं, बढ़िया सा तिलक लगा लिया, चोटी रख ली, जनेऊ पहन लिया, कीर्तन में ताली बजा ली तो हम बड़े भक्त हुए। जानकर आश्चर्य होगा कि श्रीभगवान के बताए गये उनतालीस भक्तों के लक्षणों में ऐसा कुछ भी नहीं आता। श्रीभगवान कहते हैं कि हम लोग भक्ति कैसे करते हैं, उससे उनका कोई सरोकार नहीं। भक्ति करने पर हमारे भीतर किस तरह के भाव जागृत होते हैं, किस तरह के लक्षण उजागर होते हैं, वह महत्त्वपूर्ण है। ऐसा होना सही है और दर्शाता है कि हम सही मार्ग पर हैं। हम स्वयं को भक्त घोषित कर सकते हैं, कहने लगते हैं कि मैं तो भगत हूँ । श्रीभगवान कहते हैं कि स्वयं को भक्त घोषित कर लो पर मैं नहीं मानता। मैं तो तुम्हें तब भक्त मानूॅंगा, तब भक्त जानूॅंगा जब वैसे लक्षण तुम्हारे भीतर जागृत होंगे।
डॉक्टर के पास जाकर यह कहने पर कि मुझे कोरोना हुआ है, डॉक्टर नहीं मानेंगे। वे तो कहेंगे, तुम्हें कोरोना हुआ है या निमोनिया, वह तो मैं बताऊॅंगा, पहले तुम अपने लक्षण बताओ। डॉक्टर तो बीमारी के लक्षण पूछते हैं बीमारी का नाम नहीं। वैसे ही श्रीभगवान कहते हैं, भक्त के लक्षण दिखाई देते हैं। इन लक्षणों को पता करने की जब बात आती है तो हमें एक महत्त्वपूर्ण बात को ध्यान में रखना है। यहाँ दूसरों के अवलोकन की बात नहीं आती, हमें स्वयं का अवलोकन करना होता है।
स्वामी रामतीर्थ एक उच्च कोटि के सन्त हुए हैं, वे स्वामी विवेकानन्द जी के समकालीन हैं। वे लाहौर यूनिवर्सिटी के गणित शास्त्र के प्राचार्य थे। उन्होंने अपने उस काल के एक अङ्ग्रेजी के वृत्तपत्र में विज्ञापन दिया।
सामान्य रूप से ऐसा लगता है कि श्रीभगवान एक साधन से दूसरे साधन की श्रेष्ठता बता रहे हैं। श्रीभगवान साधन की श्रेष्ठता नहीं बता रहे हैं, क्योंकि सभी साधन श्रेष्ठ ही हैं। वे यहाँ इन्द्रियों में सूक्ष्मता का अन्तर बता रहे हैं क्योंकि अभ्यास किया जाता है इन्द्रियों से। पाँच कर्मेन्द्रियॉं और पाँच ज्ञानेन्द्रियॉं हैं। हाथ, पैर, मुख, लिङ्ग और गुदा ये पाँच कर्मेन्द्रियॉं हो गईं। सभी कर्म इन्हीं से होते हैं। श्रीभगवान कहते हैं सबसे सरल बात जो होती है वह पाँच कर्मेन्द्रियों और पाँच ज्ञानेन्द्रियों से होती है। अभ्यास से भी ज्ञान श्रेष्ठ है, क्योंकि अभ्यास से मन काबू में आता है। जितना सूक्ष्म उतना बलवान।
बताओ तो हमारी आँखें अधिक बलवान हैं या हमारा मन? आँखों ने देखा जलेबी को और मन में आया इतनी करारी और गरमा गरम! यह तो अभी खानी चाहिए। ऐसे विचार मन में आते ही बुद्धि ने कहा अरे रुक जा, सवेरे शुगर दो सौ के पार गई थी, जलेबी नहीं खानी है। फिर मन उपाय बताता है कि चलो कोई बात नहीं दो किलोमीटर और चल लेते हैं, परन्तु ऐसी करारी जलेबी और कहाँ मिलनी है? मन समझा-बुझा कर पैरों को जलेबी तक ले ही जाता है और हाथ जलेबी की ओर बढ़ भी जाता है और शुरू हो जाता है मुखारविन्द से बड़ी मजेदार जलेबी का सेवन। मन सबसे बलवान और शक्तिमान इन्द्रिय है। शरीर की शेष जो इन्द्रियाँ हैं उनको नियन्त्रित करने वाला, उनको वश में करने वाला मन ही है और मन को वश में करने का एक ही उपाय है। अर्जुन ने चौथे अध्याय में श्रीभगवान से जो बात पूछी थी, उसी को वे फिर से यहाँ बताते हैं। अर्जुन ने चौथे अध्याय में श्रीभगवान से पूछा था कि मन को वश में करना तो बहुत कठिन है, जैसे वायु को वश में नहीं किया जा सकता। श्रीभगवान कहते हैं, हॉं! तुम्हारा कहना पूर्णतः सही है पर इसको वश में करने का एक उपाय अवश्य है।
श्रीभगवानुवाच
असंशयं(म्) महाबाहो, मनो दुर्निग्रहं(ञ्) चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय, वैराग्येण च गृह्यते॥6.35॥
असंशयं(म्) महाबाहो, मनो दुर्निग्रहं(ञ्) चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय, वैराग्येण च गृह्यते॥6.35॥
हे अर्जुन अभ्यास और वैराग्य से इस मन को वश में किया जा सकता है। जो व्यक्ति इन्द्रियों को वश में करने का अभ्यास कर लेता है, वह मन को वश में कर लेता है। मैं देखूॅंगा ही नहीं उधर, मैं जाऊॅंगा ही नहीं उधर, जिसने ऐसे अपने आप को वश में कर लिया, उसने इन्द्रियों पर वश प्राप्त कर लिया।
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान|
जो प्रयत्न ही नहीं करता वह मन को वश में नहीं कर पाता। जो प्रयत्न करता रहता है, करता रहता है, करता रहता है वह मन को वश में कर लेता है। जैसे, जितना तय किया है उतना ही मीठा खाऊँगा उससे अधिक कभी नहीं, चाहे कुछ भी हो जाए। अब ऐसी स्थिति कब आएगी? जब बार-बार, बार-बार प्रयत्न करके कुछ किया जाता है तो ऐसी स्थिति आ जाती है। अभ्यास से मन काबू में आ जाता है।
श्रीभगवान ने कहा, अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञान से बुद्धि जागृत होती है। मन से ऊपर होती है बुद्धि। इन्द्रियों से ऊपर मन और मन से ऊपर बुद्धि। बुद्धि की सूक्ष्मता मन से अधिक होती है। जिसकी बुद्धि, प्रज्ञा जागृत हो गई उसके लिए मन को वश में करना बहुत सरल है। हम कहते हैं न कि दिल की सुनें या दिमाग की। बुद्धि की सुनते हैं तो सभी बातें तर्क पूर्ण होती हैं, गलत निर्णय सही हो जाता है। जब मन की सुनते हैं तो बहुत कुछ गड़बड़ हो जाती है। मन से बुद्धि श्रेष्ठ है इसलिए ज्ञान को श्रेष्ठ कहा गया।
फिर श्रीभगवान कहते हैं कि ज्ञान से भी ध्यान श्रेष्ठ है, क्योंकि ध्यान से चित्त एकाग्र होता है। सबसे नीचे कर्मेन्द्रियाँ, उसके ऊपर ज्ञानेन्द्रियाॅं, उसके ऊपर मन, उसके ऊपर बुद्धि और उसके ऊपर चित्त। ध्यान करने से चित्त एकाग्र हो जाता है। पतञ्जलि ऋषि ने कहा, सारा योग क्या है?
चित्तवृत्ति निरोधा सयोग:|
योग क्या है? चित्त की वृत्ति को निरोध कर लिया तो योग हो गया और अब श्रीभगवान अन्तिम सूत्र देते हैं। इस ध्यान से भी ऊपर कुछ है क्या? इस चित्त को वश में करने के ऊपर भी कुछ साधन है क्या? तो श्रीभगवान कहते हैं, हाँ है। इससे भी सूक्ष्म एक बात है उसको जानते हैं।
सभी बातों में अहङ्कार। मैं करता हूँ, यह भावना जो है यह प्रगाढ़ता है। ध्यान करने वाला भी मैं, ज्ञान प्राप्त करने वाला भी मैं, अभ्यास करने वाला भी मैं। श्रीभगवान कहते हैं सबसे पहले इस 'मैं' पने का त्याग करो। तो इस 'मैं' पन का त्याग कैसे होगा?
सर्व कर्म फल त्यागम्|
सभी तरह के कर्म फलों की आसक्ति का त्याग करना। इस बात को ध्यान में रखना कि मैं नहीं करता, यह सब कुछ तो श्रीभगवान करवाते हैं।
सीताराम सीताराम सीताराम कहिए
जाहीं विधी राखे राम ताही विधी रहिए|
जाहीं विधी राखे राम ताही विधी रहिए|
मैं तो कुछ कर ही नहीं रहा, बस वो जैसे करवाते हैं, मैं करता हूँ। श्रीभगवान कहते हैं, ध्यान से भी कर्म फल का त्याग सबसे श्रेष्ठ है। इससे अहम् का नाश होता है। मैं कुछ नहीं कर रहा, बस राम जी करवाते हैं।
अर्जुन के मन में यह बात नहीं आई कि इससे पहले जो बताया वही श्रेष्ठ है इसलिए श्रीभगवान ने कर्म फल के त्याग की श्रेष्ठता की बात की। कोई भी साधन ऊॅंचा या नीचा नहीं होता। वृत्ति के अनुसार किसे क्या भाता है? यह उस पर निर्भर होता है। किसी को कीर्तन करने में आनन्द मिलता है तो किसी को जप करने में। किसी को सेवा करने में आनन्द आता है तो किसी को श्रीभगवान के दर्शन करने में ही बड़ा आनन्द मिलता है। किसी को वृन्दावन की यात्रा करने में आनन्द आता है तो किसी को प्रति माह गोवर्धन की परिक्रमा करने में आनन्द आता है।
जिसकी जैसी वृत्ति उसका वैसा ही कल्याण हो जाएगा। साधनों में नहीं लक्षणों में कल्याण ढूँढो, इसलिए श्रीभगवान ने तेरहवें श्लोक से उन्नीसवें श्लोक तक भक्त के उनतालीस लक्षण बतलाए हैं, बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। हम सोचते हैं, बढ़िया सा तिलक लगा लिया, चोटी रख ली, जनेऊ पहन लिया, कीर्तन में ताली बजा ली तो हम बड़े भक्त हुए। जानकर आश्चर्य होगा कि श्रीभगवान के बताए गये उनतालीस भक्तों के लक्षणों में ऐसा कुछ भी नहीं आता। श्रीभगवान कहते हैं कि हम लोग भक्ति कैसे करते हैं, उससे उनका कोई सरोकार नहीं। भक्ति करने पर हमारे भीतर किस तरह के भाव जागृत होते हैं, किस तरह के लक्षण उजागर होते हैं, वह महत्त्वपूर्ण है। ऐसा होना सही है और दर्शाता है कि हम सही मार्ग पर हैं। हम स्वयं को भक्त घोषित कर सकते हैं, कहने लगते हैं कि मैं तो भगत हूँ । श्रीभगवान कहते हैं कि स्वयं को भक्त घोषित कर लो पर मैं नहीं मानता। मैं तो तुम्हें तब भक्त मानूॅंगा, तब भक्त जानूॅंगा जब वैसे लक्षण तुम्हारे भीतर जागृत होंगे।
डॉक्टर के पास जाकर यह कहने पर कि मुझे कोरोना हुआ है, डॉक्टर नहीं मानेंगे। वे तो कहेंगे, तुम्हें कोरोना हुआ है या निमोनिया, वह तो मैं बताऊॅंगा, पहले तुम अपने लक्षण बताओ। डॉक्टर तो बीमारी के लक्षण पूछते हैं बीमारी का नाम नहीं। वैसे ही श्रीभगवान कहते हैं, भक्त के लक्षण दिखाई देते हैं। इन लक्षणों को पता करने की जब बात आती है तो हमें एक महत्त्वपूर्ण बात को ध्यान में रखना है। यहाँ दूसरों के अवलोकन की बात नहीं आती, हमें स्वयं का अवलोकन करना होता है।
स्वामी रामतीर्थ एक उच्च कोटि के सन्त हुए हैं, वे स्वामी विवेकानन्द जी के समकालीन हैं। वे लाहौर यूनिवर्सिटी के गणित शास्त्र के प्राचार्य थे। उन्होंने अपने उस काल के एक अङ्ग्रेजी के वृत्तपत्र में विज्ञापन दिया।
मुझे ऐसे सुधारकों की आवश्यकता है
जो स्वयं का सुधार कर सकें, औरों का नहीं।
जो स्वयं का सुधार कर सकें, औरों का नहीं।
देखिए! ध्यान दीजिए स्वयं का सुधार करने पर, औरों का नहीं। हम सभी को सुधार तो करना है पर औरों में, स्वयं अपने में नहीं। श्रीभगवान कहते हैं कि मैंने तुम्हें रिमोट तो अपना दिया है पर उसे तुम चलाते कहीं और हो। रिमोट तो है एसी का टीवी में कैसे चलेगा? तो चलते हैं तेरहवें श्लोक से उन्नीसवें श्लोक तक और जानते है भक्त के उनतालीस लक्षणों को।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां(म्), मैत्रः(ख्) करुण एव च|
निर्ममो निरहङ्कारः(स्), समदुःखसुखः क्षमी||13||
सब प्राणियों में द्वेषभाव से रहित और मित्र भाव वाला (तथा) दयालु भी (और) ममता रहित, अहंकार रहित, सुख दुःख की प्राप्ति में सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीर को वश में किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला, मुझ में अर्पित मन बुद्धि वाला जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है। (12.13-12.14)
विवेचन- हे अर्जुन! जो पहली बात भक्त में होनी चाहिए वह है अद्वेष्टा। मैं किसी से द्वेष नहीं करता। मुझे किसी से द्वेष हो ऐसा कोई नहीं। मैं उसके पास खड़ा ही नहीं हो सकता, मैं उससे बात ही नहीं कर सकता, उसकी कोई प्रगति मुझे अच्छी नहीं लगती, उसकी कोई प्रशंसा कर दे मुझे अच्छा नहीं लगता। हम बताने लग जाते हैं कि अरे! उसके बारे में तुम्हें क्या पता है? मैं बताता हूँ। अर्थात् हम उसकी आलोचना करने लग जाते हैं। कोई अपनी रेखा लम्बी करना चाहता है तो उसके लिए कोई आपत्ति नहीं, परन्तु दूसरों की रेखा को छोटा करने की सोच अच्छी बात नहीं है। कोई किसी की प्रशंसा कर रहा है, किसी के विषय में अच्छी बातें कह रहा है तो उसको बिगाड़ो मत। कभी किसी की कोई बुरी बात पता चल भी जाती है तो उसे किसी दूसरे को नहीं बताना है। ऐसा करने से श्रीभगवान के प्रति भक्ति कम हो जाती है।
कभी ऐसे प्रसङ्ग भी सामने आ जाते हैं कि अच्छे-अच्छे सत्सङ्गी, अच्छे कार्यकर्ता भी आपस में द्वेष करने लग जाते हैं। कोई भी व्यक्ति पूर्णतः परफेक्ट नहीं होता। कोई यह कह ही नहीं सकता कि मैं सौ प्रतिशत हूँ या फिर मेरे भीतर कोई त्रुटि है ही नहीं। हमें स्वयं को इस विषय में अपना आङ्कलन करना चाहिए। यदि हमारे भीतर द्वेष की भावना अधिक है तो उसे कम करने का प्रयास करना चाहिए। एक से सौ के बीच हमें अपने गुणों को बढ़ाना है और अवगुणों को कम करना है। श्रीभगवान यहाँ बात करते हैं, सभी से मैत्री, सभी से करुणा की। कभी किसी को यह कहते हुए सुना भी होगा कि मैं चाहता तो हूँ कि मेरे सभी के साथ अच्छे सम्बन्ध हो, अच्छी मित्रता हो पर कुछ लोग हैं वे मानते ही नहीं।
रहीम जी के एक सुन्दर दोहे का उद्धरण लेते हैं।
कभी ऐसे प्रसङ्ग भी सामने आ जाते हैं कि अच्छे-अच्छे सत्सङ्गी, अच्छे कार्यकर्ता भी आपस में द्वेष करने लग जाते हैं। कोई भी व्यक्ति पूर्णतः परफेक्ट नहीं होता। कोई यह कह ही नहीं सकता कि मैं सौ प्रतिशत हूँ या फिर मेरे भीतर कोई त्रुटि है ही नहीं। हमें स्वयं को इस विषय में अपना आङ्कलन करना चाहिए। यदि हमारे भीतर द्वेष की भावना अधिक है तो उसे कम करने का प्रयास करना चाहिए। एक से सौ के बीच हमें अपने गुणों को बढ़ाना है और अवगुणों को कम करना है। श्रीभगवान यहाँ बात करते हैं, सभी से मैत्री, सभी से करुणा की। कभी किसी को यह कहते हुए सुना भी होगा कि मैं चाहता तो हूँ कि मेरे सभी के साथ अच्छे सम्बन्ध हो, अच्छी मित्रता हो पर कुछ लोग हैं वे मानते ही नहीं।
रहीम जी के एक सुन्दर दोहे का उद्धरण लेते हैं।
रूठे सुजन मनाइए जो रूठे सौ बार।
रहिमन फिर फिर पोइए टूटे मुक्ताहार।।
रहिमन फिर फिर पोइए टूटे मुक्ताहार।।
देखो तो कितनी सच्चाई है, मोतियों का हार टूट गया है तो क्या करेंगे? उसको पिरो लेंगे। यदि फिर टूट जाता है तब क्या करेंगे? उसे फिर से पिरो लेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि मोतियों का हार जितनी बार भी टूटेगा उसको पिरोना ही है, उसे फेङ्क नहीं सकते। जब सुजन रूठ जाते हैं तो उन्हें सौ बार भी मनाना ही पड़ता है।
ये सुजन कितने प्रकार के होते हैं
ये सुजन कितने प्रकार के होते हैं
सुजन तीन प्रकार के होते हैं। एक प्रकार के सुजन वे हैं जो अपने स्वजन हैं। अपने लोग, अपने परिवार के लोग, अपने कुल के लोग, अपने मित्र लोग जिन्हें हम अपना कह सकें। दूसरे हैं सज्जन लोग, जो अच्छे हैं, जो सात्त्विक हैं, किसी कारणवश वे रूठ जाते हैं तो उन्हें मनाना है।
तीसरे सुजन हैं पति-पत्नी। इनमें से एक को, दूजे सुजन को मनाना ही है। कई बार तो ऐसी स्थिति आती है कि कहने लगते हैं, नहीं! अब तो बहुत हो गया, बहुत मना लिया अब नहीं, परन्तु ऐसा कर भी नहीं सकते। मनाना तो पड़ेगा ही। बार-बार मनाना है, सम्बन्धों को सुधारने के प्रयास करते रहना है।
पतञ्जलि योगदर्शन में चित्तशुद्धी के चार कारण बतलाए हैं। सुखियों से मैत्री, दुःखियों पर करुणा, पुण्यात्माओं के प्रति मुदिता और पापात्माओं की अपेक्षा। पतञ्जलि ऋषि कहते हैं, जो सुखी हैं उनसे मैत्री करो। जो बेचारे दुःखी हैं उनके प्रति करुणा का भाव होना चाहिए। जो पुण्यात्मा है उनके प्रति मुदिता रखनी है। उनको हाथ जोड़कर नमन करना ही है। जो बुरे हैं, जो पापी हैं उनकी उपेक्षा करनी है, बस उन्हें छोड़ ही देना है।
श्रीभगवान बुद्ध और श्रीकृष्ण ने इनको दो भागों में विभाजित किया। जो सुखी और पुण्यात्मा हैं उनसे मैत्री करो, वे हमारे मित्र हैं। ये जो सुखी और पुण्यात्मा है, वे हमारे घेरे में अधिक से अधिक होने चाहियें और जो दुःखी हैं और पापात्माएँ हैं उनके प्रति करुणा का भाव होना चाहिए।
तीसरे सुजन हैं पति-पत्नी। इनमें से एक को, दूजे सुजन को मनाना ही है। कई बार तो ऐसी स्थिति आती है कि कहने लगते हैं, नहीं! अब तो बहुत हो गया, बहुत मना लिया अब नहीं, परन्तु ऐसा कर भी नहीं सकते। मनाना तो पड़ेगा ही। बार-बार मनाना है, सम्बन्धों को सुधारने के प्रयास करते रहना है।
पतञ्जलि योगदर्शन में चित्तशुद्धी के चार कारण बतलाए हैं। सुखियों से मैत्री, दुःखियों पर करुणा, पुण्यात्माओं के प्रति मुदिता और पापात्माओं की अपेक्षा। पतञ्जलि ऋषि कहते हैं, जो सुखी हैं उनसे मैत्री करो। जो बेचारे दुःखी हैं उनके प्रति करुणा का भाव होना चाहिए। जो पुण्यात्मा है उनके प्रति मुदिता रखनी है। उनको हाथ जोड़कर नमन करना ही है। जो बुरे हैं, जो पापी हैं उनकी उपेक्षा करनी है, बस उन्हें छोड़ ही देना है।
श्रीभगवान बुद्ध और श्रीकृष्ण ने इनको दो भागों में विभाजित किया। जो सुखी और पुण्यात्मा हैं उनसे मैत्री करो, वे हमारे मित्र हैं। ये जो सुखी और पुण्यात्मा है, वे हमारे घेरे में अधिक से अधिक होने चाहियें और जो दुःखी हैं और पापात्माएँ हैं उनके प्रति करुणा का भाव होना चाहिए।
दया और करुणा दो शब्द हैं। दया परिस्थितिगत है, कोई परिस्थिति देखी और उस पर दया आ गई। करुणा में विशालता है। मैं दूसरे के प्रति दया करता हूँ और करुणा में उसके पीड़ा को अनुभव करता हूँ। किसी का दुःख देखकर हमें रोना आना यह वह स्थिति है। दया में अपनी श्रेष्ठता का भाव है। करुणा में हम उसके जैसे ही हो जाते हैं। करुणा दया का विस्तृत भाव है। साधन सम्पन्न लोग दया करते हैं, जैसे राजा, थानेदार और सेठजी दया करते हैं परन्तु करुणा कोई भी कर सकता है। जीवन में करुणा होनी चाहिए।
दयावान बनो, करुणावान बनो।
केदारनाथ में जब आपदा आई थी तो किसी को यह कहते हुए सुना था, चलो ये तो ऐसे ही हैं। गङ्गा किनारे बैठकर ये तो दारू पिया करते थे, इनको तो छोड़ ही दो। ऐसा कभी हमको भी लगता है। आपदा किस कारण आई यह सोचने की बात नहीं है। श्रीभगवान ने हमें कुछ तो समर्थता दी है। हम किसी के किस काम आ सकते हैं? यह देखना आवश्यक होता है। यह आपदा में है, यह दुःखी है, यह सोचना आवश्यक है। इनके लिए हम कुछ और न सही प्रार्थना तो कर ही सकते हैं। श्रीभगवान कहते हैं ऐसा जो करते हैं, वे मेरे भक्त हैं।
मैं और मेरा अर्थात् I & my का त्याग करना।
वस्तु में और व्यक्ति में जो अपना ममत्व होता है वह है ममता। ममता का छूट जाना होता है निर्ममता।
एक बार एक पति-पत्नी फ्रिज लेने गए। बहुत सारे मॉडल वहाँ पर रखे हुए थे। बहुत सारे मॉडल देखने के बाद उन्होंने एक मॉडल पसन्द कर लिया। विक्रेता कहता है कि जब तक इसका बिल वगैरह न बन जाए इसके ऊपर आपका नाम चिपकाए देता हूॅं, ताकि इसको कोई दूसरा व्यक्ति पसन्द न करे। इतने में दूसरे कुछ दूसरे विक्रेता एक दूसरे फ्रिज को उठाकर लेकर आ रहे होते हैं तो श्री एण्ड श्रीमती गुप्ता जी चिन्ता से कहने लगते हैं, अरे! धीरे से, कहीं हमारी फ्रिज पर कोई खरोञ्च न आ जाए। अब किसी चीज पर अपना नाम लग गया तो वह अपनी हो गयी। दूसरे की किसी चीज की हमें कोई चिन्ता नहीं। यूक्रेन में कितने लोग मर रहे हैं उनकी किसी को कोई चिन्ता नहीं। सोचो, यदि वहाँ पर अपना कोई परिजन होता तो चिन्ता कितनी बढ़ जाती।
मैं और मेरा कहना छोड़ दो। जितना हम इसमें फसेङ्गे उतना ही अधिक दु:ख होगा। अहङ्कार की अपनी ही अलग बात है। मेरा स्वाभिमान, मैं बड़ा पैसे वाला हूँ, मैं बड़ा बलशाली हूँ, मेरे जैसा कोई नहीं, मैं बड़ा बुद्धिमान हूँ। यह सारा मेरा होने का जो अहङ्कार है, यह भक्ति में बाधक है। जो सुख और दुःख में सम रहना सीख जाए। ऐसा तो सम्भव ही नहीं है कि सुख में सुख ही रहे और दुःख में दुःख नहीं रहे। जो सुख में जितना नाचता है वह दुःख में उतना ही रोता है। जो व्यक्ति सुख में जितना अधिक सुख का अनुभव करेगा वह दुःख में भी उतना ही अधिक दुःखी होगा।
सुख और दुःख में कोई उसे कितना अनुभव करेगा, इसका कोई मानक नहीं है। इस अनुभव की कितनी गहराई और लम्बाई है, उसकी उस तीव्रता को कम किया जा सकता है। कभी तो हम ऐसा समाचार भी सुनते हैं कि खुशी के कारण ही किसी का हृदयाघात हो गया। दुःख और खुशी की तीव्रता जब अत्यधिक बढ़ जाती है तो ऐसा होना सम्भव हो जाता है। सुख-दु:ख सभी को होता है। इसकी तीव्रता, इसकी मात्रा को कम करना है। दोनों ही स्थितियों में सम रहना है।
क्षमा का गुण सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। लेना तो सभी चाहते हैं पर देना कोई नहीं। क्षमा एक बहुत ही महत्वपूर्ण गुण है। अङ्ग्रेजी के कुछ शब्दों से इसको समझाते हैं।
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सुख और दुःख में कोई उसे कितना अनुभव करेगा, इसका कोई मानक नहीं है। इस अनुभव की कितनी गहराई और लम्बाई है, उसकी उस तीव्रता को कम किया जा सकता है। कभी तो हम ऐसा समाचार भी सुनते हैं कि खुशी के कारण ही किसी का हृदयाघात हो गया। दुःख और खुशी की तीव्रता जब अत्यधिक बढ़ जाती है तो ऐसा होना सम्भव हो जाता है। सुख-दु:ख सभी को होता है। इसकी तीव्रता, इसकी मात्रा को कम करना है। दोनों ही स्थितियों में सम रहना है।
क्षमा का गुण सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। लेना तो सभी चाहते हैं पर देना कोई नहीं। क्षमा एक बहुत ही महत्वपूर्ण गुण है। अङ्ग्रेजी के कुछ शब्दों से इसको समझाते हैं।
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Forgive & forget
क्षमा तभी हो सकती है,
जब क्षमा करके भूल गए।
क्षमा तभी हो सकती है,
जब क्षमा करके भूल गए।
छोटे बच्चों से जब गलती हो जाती है तो मॉं को कहते हुए सुना होगा। देखो, मैंने तुम्हें उस दिन भी कुछ नहीं कहा था। बच्चा सोचेगा कि उस दिन नहीं कहा था, इस बात को दस बार कहने से तो अच्छा था कि उस दिन एक बार कह लेते। क्षमा करना, यह किसी घटना को अपेक्षित करना है। किसी से कोई अपराध हो गया तो कह सकते हैं कि ठीक है, हो गया होगा, कोई बात नहीं। क्षमा किया इस बात को दोहराकर क्षमा करना, क्षमा नहीं होता। यह स्वयं को बड़ा दिखाने की बात हो जाती है।
मनुज गलती का पुतला है, जो अक्सर हो ही जाती है।
यह तो सदैव सत्य है कि मनुष्य गलती का पुतला है। चाहे कुछ भी हो जाए, यह तो हो ही जाती है। हमसे हो जाती है, किसी और से भी हो जाती है, पर हो ही जाती है।
We should learn to ignore.
ॐ इग्नोराय नमः| यह एक नया मन्त्र है और बहुत अर्थयुक्त है, बड़ा शक्तिशाली है।
सन्तुष्टः(स्) सततं(य्ँ) योगी, यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धि:(र्), यो मद्भक्तः(स्) स मे प्रियः॥12.14॥
विवेचन- जो सन्तुष्ट रहता है। आजकल उसकी बहुत कमी हो गई है। मेरे पास यह-यह नहीं है, बतलाने वाले बहुत सारे लोग हैं, परन्तु मेरे पास यह-यह है, ऐसा बतलाने वाले बहुत कम हैं। सन्तोष जो होता है वह जीवन का बहुत बड़ा धन है।
गौ धन गज धन बाज धन और रतन धन खान
जब आवे सन्तोष धन सब धन धूरी समान|
जब आवे सन्तोष धन सब धन धूरी समान|
किसी के पास कितने करोड़ रुपए इकट्ठा हो गए हैं, इससे वह कितना धनी है यह बात सिद्ध नहीं हो जाती है। महाभारत में यक्ष-प्रश्न आते हैं, यक्ष ने युधिष्ठिर से सौ प्रश्न पूछे थे। उसमें एक बहुत ही सुन्दर प्रश्न भी था।
यक्ष ने पूछा, युधिष्ठिर यह बताओ कौन दरिद्र है?
यहाँ हम होते तो कह देते, जिसके पास पैसा नहीं है, जिसके पास घर नहीं है, जिसके पास अपनी कुछ सम्पत्ति नहीं है वह दरिद्र है। युधिष्ठिर महाराज ने ऐसा उत्तर नहीं दिया। उन्होंने कहा-
जिसके पास सन्तोष नहीं है वह दरिद्र है।
जिसके जीवन में सन्तोष नहीं वह दरिद्र ही रहता है, उसे मॉंगना ही पड़ता है। एक लाख हैं तो उसकी आवश्यकता समाप्त नहीं होती। एक करोड़ आ गए तब भी उसकी आवश्यकता पूर्ण नहीं होती। सौ करोड़ आते हैं, तब भी उसकी आवश्यकताएँ पूरी नहीं होती। वह बैंक के सामने खड़ा होकर माँगता ही रहता है। नया इन्वेस्टर ढूंढता रहेगा, माँगता ही रहेगा कि मुझे नई कम्पनी खोलनी है, उसके लिए पैसा चाहिए, दे दो। ऐसे व्यक्ति सदैव असन्तुष्ट ही रहते हैं। कहते रहते हैं कि मुझे यह नहीं मिला, मुझे वह नहीं मिला। कभी यह नहीं कहते कि उनके पास क्या है? दूसरे के पास क्या कुछ है? वही गिनते रहते हैं। अपने पास क्या है? उसके बारे में सोचते नहीं और बताना भी नहीं चाहते। हम में से ऐसा कोई नहीं है जिसके पास जो है वह औरों के पास नहीं है। हम सब के पास कुछ तो अलग होता ही है। हमारे पास जो नहीं है उसका हम या तो गम मनाते हैं या सन्तोष। अपने ऊपर नियन्त्रण रखने वाला (जिसका अपने मन पर नियन्त्रण ही नहीं वह भक्ति नहीं कर सकता) अपने मन, चित्त, बुद्धि को, अपनी इन्द्रियों को, उसकी चञ्चलता को वश में करना सीखता है। अपनी देह पर नियन्त्रण करने वाला ही दृढ़निश्चयी हो सकता है। जो सङ्कल्प करते हैं उसको पूर्ण करना है। बड़े सङ्कल्प मत करो, छोटे-छोटे सङ्कल्प करो, लेकिन जब सङ्कल्प किया तो उसको पूरा भी करना है।
पार्वती जी का जब सती प्रसङ्ग हो गया, तो उन्होंने हिमालय की कन्या के रूप में जन्म लिया। नारद जी ने पार्वती जी को उपदेश किया कि शिवजी की प्राप्ति के लिए उनका जन्म हुआ है। पर यह ऐसे ही नहीं होगा, बहुत ही कठिन तपस्या करनी पड़ेगी। पार्वती जी ने भी बहुत कठोर तपस्या की। तपस्या के अन्त में पार्वती जी ने तो सूखा पत्ता खाना भी छोड़ दिया इसलिए उनका नाम अपर्णा हो गया। साँस भी कई दिनों में एक बार लेतीं थीं। ऐसी कठोर तपस्या! ऐसी तपस्या करते हुए सैकड़ों वर्ष हो गए। परीक्षा लेने के लिए सप्तऋषि आ गए। उन्होंने पार्वती जी से कहा कि आप भी बहुत गड़बड़ करती हैं, कोई शिवजी के लिए ऐसी कठोर तपस्या करता है क्या? इतनी कठोर तपस्या में तो विष्णु जैसे भगवान पति के रूप में मिलें। शिवजी की तपस्या क्यों करती हो? न तो उनके पास घर है न ही कपड़े पहनने का शिष्टाचार। ध्यान में बैठ गए तो कई वर्षों तक ध्यान में बैठे रहते हैं। समाधि में चले जाते हैं किसी को पता ही नहीं, ऐसे पति को लेकर क्या करोगी?
पार्वती जी का जब सती प्रसङ्ग हो गया, तो उन्होंने हिमालय की कन्या के रूप में जन्म लिया। नारद जी ने पार्वती जी को उपदेश किया कि शिवजी की प्राप्ति के लिए उनका जन्म हुआ है। पर यह ऐसे ही नहीं होगा, बहुत ही कठिन तपस्या करनी पड़ेगी। पार्वती जी ने भी बहुत कठोर तपस्या की। तपस्या के अन्त में पार्वती जी ने तो सूखा पत्ता खाना भी छोड़ दिया इसलिए उनका नाम अपर्णा हो गया। साँस भी कई दिनों में एक बार लेतीं थीं। ऐसी कठोर तपस्या! ऐसी तपस्या करते हुए सैकड़ों वर्ष हो गए। परीक्षा लेने के लिए सप्तऋषि आ गए। उन्होंने पार्वती जी से कहा कि आप भी बहुत गड़बड़ करती हैं, कोई शिवजी के लिए ऐसी कठोर तपस्या करता है क्या? इतनी कठोर तपस्या में तो विष्णु जैसे भगवान पति के रूप में मिलें। शिवजी की तपस्या क्यों करती हो? न तो उनके पास घर है न ही कपड़े पहनने का शिष्टाचार। ध्यान में बैठ गए तो कई वर्षों तक ध्यान में बैठे रहते हैं। समाधि में चले जाते हैं किसी को पता ही नहीं, ऐसे पति को लेकर क्या करोगी?
अजहु मानहू काहा हमारे
हम तुम कहूं बरूनी कबीचारे
अति सुन्दर सुचि सुखद सुशीला
गांवही वेद जासु जस लीला|
बालकाण्ड
हम तुम कहूं बरूनी कबीचारे
अति सुन्दर सुचि सुखद सुशीला
गांवही वेद जासु जस लीला|
बालकाण्ड
बहुत रूप से सप्तऋर्षियों ने समझाया, पार्वती जी हाथ जोड़कर सब कुछ सुनती रही। उन्होंने कहा, जो कुछ कहते हो अच्छी बात है लेकिन मैं आपको सच ही बतलाती हूँ । मैंने जो गुरु जी का वचन सुना है, उसमें मेरे दो राय होने का प्रश्न ही नहीं।
गुरु के वचन प्रतीति न जेही
सपने हुन सुगमन सुख सरितेही|
सपने हुन सुगमन सुख सरितेही|
इसीलिए ऋषिगण आप जो भी कहते हैं, होगा। मैंने जो सङ्कल्प ठान लिया है, गुरु के वचन से ठान लिया है, अब मैं उसे छोडूँगी नहीं।
जन्म कोटि लगी लगर हमारी
बरहू सम्बुना रहहूं कुंवारी|
बरहू सम्बुना रहहूं कुंवारी|
अरे आप तो सौ जन्म कह रहे हो, चाहे तो हजार जन्म लगने दो। विवाह करूॅंगी तो शिवजी से ही करूॅंगी, नहीं तो कुँवारी रह जाऊॅंगी। यह तो मेरा प्रण है। सप्तऋषि प्रसन्न हो गए, कहने लगे हम तो तुम्हारी परीक्षा लेने आए थे। सङ्कल्प जब दृढ़ होते हैं तो उस पर सन्तों की कृपा होती है। उसी पर देवों की कृपा होती है। उसी पर श्रीभगवान की कृपा होती है, जो अपने मन बुद्धि को मुझ में अर्पण कर देता है।
सुतीक्ष्ण जी का एक प्रसङ्ग आता है। सुतीक्ष्ण मुनि भगवान राम के अद्भुत भक्त हैं। श्रीभगवान स्वयं दर्शन देने आए हैं, लेकिन वे अपनी आँखें नहीं खोलते। सुतीक्ष्ण जी मन में राम जी का जाप कर रहे हैं। श्रीभगवान जी की भी कुछ अजीब स्थिति हो गई। सामने खड़े हैं पर सुतीक्ष्ण जी आँखें नहीं खोलते। अब ऐसे ही लौट जाते हैं तो उनकी तपस्या का क्या होगा। श्रीभगवान जी कुछ शोर करके उनको जगाने का प्रयत्न करते हैं, पर वे आँखें नहीं खोलते। श्रीभगवान ने अन्तर्मन में जाकर सुतीक्ष्ण जी के सामने से अपनी छवि हटा दी तब वे आँखें खोलकर उन्हें देखते हैं। सुतीक्ष्ण जी कहते हैं कि हे भगवान! मेरे भीतर तो कोई तप नहीं।
सुतीक्ष्ण जी का एक प्रसङ्ग आता है। सुतीक्ष्ण मुनि भगवान राम के अद्भुत भक्त हैं। श्रीभगवान स्वयं दर्शन देने आए हैं, लेकिन वे अपनी आँखें नहीं खोलते। सुतीक्ष्ण जी मन में राम जी का जाप कर रहे हैं। श्रीभगवान जी की भी कुछ अजीब स्थिति हो गई। सामने खड़े हैं पर सुतीक्ष्ण जी आँखें नहीं खोलते। अब ऐसे ही लौट जाते हैं तो उनकी तपस्या का क्या होगा। श्रीभगवान जी कुछ शोर करके उनको जगाने का प्रयत्न करते हैं, पर वे आँखें नहीं खोलते। श्रीभगवान ने अन्तर्मन में जाकर सुतीक्ष्ण जी के सामने से अपनी छवि हटा दी तब वे आँखें खोलकर उन्हें देखते हैं। सुतीक्ष्ण जी कहते हैं कि हे भगवान! मेरे भीतर तो कोई तप नहीं।
चौपाई
नहिं सतसंग जोग जप जागा।
नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥
नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥
एक बानि करुनानिधान की।
सो प्रिय जाकें गति न आन की॥4॥
अरण्यकाण्ड
सो प्रिय जाकें गति न आन की॥4॥
अरण्यकाण्ड
मैं तो न जप जानता हूँ, न योग जानता हूँ, बस आपके चरणों में मेरी गति है, मैं यही जानता हूँ।
यस्मान्नोद्विजते लोको, लोकान्नोद्विजते च यः|
हर्षामर्षभयोद्वेगै:(र्), मुक्तो यः(स्) स च मे प्रियः||15||
जिससे कोई भी प्राणी उद्विग्न (क्षुब्ध) नहीं होता और जो स्वयं भी किसी प्राणी से उद्विग्न नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या), भय और उद्वेग (हलचल) से रहित है, वह मुझे प्रिय है।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं- हे अर्जुन! जिसके कारण कोई जीव उद्विग्नता न प्राप्त करे। तुम किसी को कष्ट नहीं दो और किसी के द्वारा कष्ट लो भी नहीं। जो किसी के द्वारा न उद्वेग को प्राप्त हो और न ही किसी को उद्वेगित करे। हम यह तो मान लेते हैं कि हम किसी को तङ्ग नहीं करेंगे लेकिन यह कैसे मान लें कि कोई हमें तङ्ग न करे।
श्रीभगवान कहते हैं कि दोनों एक ही साथ होते हैं।
मृगमीनसज्जनानां तृण-जल-संतोष विहितवृत्तीनाम्।
लुब्धक-धीवर-पिशुना निष्कारणमेव वैरिणो जगति।।
भर्तृहरि-नीतिशतकम् 61
हिरण, मछली और सज्जन तृण पर, जल पर और सन्तोष पर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। फिर भी शिकारी, मछुआरा और दुष्ट बिना कारण इनसे बैर रखते हैं। बिना कारण मेरे से कोई बैर रखता है तो यह उसकी समस्या है मेरी नहीं। इस विषय में मुझे चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। मैं किसी के साथ अच्छा हूँ तो उसे भी मेरे साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए, श्रीभगवान कहते हैं यह आपका अधिकार नहीं। तुम अच्छा करो यह तुम्हारा कर्त्तव्य है। दूसरा कोई तुमसे अच्छा व्यवहार करे या नहीं यह तुम्हारा अधिकार नहीं।
दूसरे का कर्त्तव्य, तुम्हारा अधिकार नहीं।
इसलिए जब तक मैं अपेक्षा नहीं करूॅंगा कोई मुझे तङ्ग नहीं करेगा। वास्तव में कोई दूसरा मुझे तङ्ग नहीं करता, अपितु उससे जो अपेक्षा करता हूँ उसके कारण मैं तङ्ग हो जाता हूँ इसलिए जीवन में एक सूत्र बनाना, हम श्रीभगवान के, श्रीभगवान हमारे हैं। वे हमें सम्भालते हैं।
एक सुन्दर भजन है।

एक सुन्दर भजन है।
चिन्ता तभी तक है, जब तक श्रीभगवान का आश्रय नहीं। जो श्रीभगवान का आश्रय करता है, उसको चिन्ता की कोई आवश्यकता नहीं। जितना श्रीभगवान की शरण में जाते जाएँगे उतना ही संसार से होने वाला कष्ट कम होता जाएगा।
कुछ लोग हैं जिनको अपने स्वभाव के प्रतिकूल कुछ भी सहन नहीं होता, अर्थात् जिनमें सहनशीलता नहीं। जरा सी सर्दी सहन नहीं होती, जरा सी गर्मी भी सहन नहीं होती। कई बार तो लोगों का ऐसा स्वभाव होता है कि बिजली गई और पङ्खा अभी रुका भी नहीं, पर बहुत ही असहज होकर कहने लगते हैं कि अरे! इतनी गर्मी है, बिजली चली गई अब क्या होगा? दूसरों का स्वभाव अपने अनुकूल नहीं हो तो भी चिड़चिड़े हो जाते हैं। श्रीभगवान कहते हैं ऐसे व्यक्ति मेरे भक्त नहीं हो सकते। जिसमें सहनशक्ति नहीं, वह मेरा भक्त नहीं हो सकता।
अनपेक्षः(श्) शुचिर्दक्ष, उदासीनो गतव्यथः|
सर्वारम्भपरित्यागी, यो मद्भक्तः(स्) स मे प्रियः||16||
जो अपेक्षा (आवश्यकता) से रहित, (बाहर-भीतर से) पवित्र, चतुर, उदासीन, व्यथा से रहित (औरः सभी आरम्भों का अर्थात् नये-नये कर्मों के आरम्भ का सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
विवेचन- अनपेक्षः का अर्थ है किसी भी प्रकार की आकाङ्क्षा न रखना। परिवार में सारे दुःखों का मूल कारण दूसरे का स्वभाव नहीं होता बल्कि हमारी अपेक्षा होती है। जब हम अपेक्षा रखते हैं तो ही हम दुःखी होते हैं और जब हम कोई अपेक्षा नहीं रखते तो हमें किसी भी प्रकार का दुःख नहीं होता। अधिक या कम अपेक्षा के कारण ही अधिक या कम दुःख होता है। हमें ज्वर का कष्ट उतना नहीं होता, जितना कष्ट इस बात से होता है कि हमारा हाल-चाल पूछने कोई नहीं आया। परिवार के सारे झगड़े, सारे क्लेश इस अपेक्षा के कारण होते हैं। जैसे ही हमने अपेक्षा बन्द की, सारे झगड़े, क्लेश, दुःख समाप्त हो जाते हैं। मेरे पुत्र को मेरा ध्यान रखना चाहिए, मेरे माता-पिता को मेरा ध्यान रखना चाहिए, इसी प्रकार पति से आशा, पत्नी से आशा, पुत्र से आशा, ऐसी आशाओं से ही हम जीवन भर दुःखी होते रहते हैं। दूसरा मनुष्य वही करता है जो उसे करना है। अपेक्षाएँ सदैव मनुष्य को दुःख देती हैं।
शुचिर्दक्ष- शुचि का अर्थ है शुद्धता। भक्त का लक्षण है कि जीवन में शुद्धता आनी चाहिए। अनेक व्यक्ति कहते हैं -
शुचिर्दक्ष- शुचि का अर्थ है शुद्धता। भक्त का लक्षण है कि जीवन में शुद्धता आनी चाहिए। अनेक व्यक्ति कहते हैं -
मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा।
ऐसा कह कर स्नान भी नहीं करते, भोजन से पहले अपने हाथ साफ करना भी नहीं चाहते। आजकल तो हम भोजन के बाद टिशू पेपर से हाथ साफ कर लेते हैं। शरीर की शुद्धता, मन की शुद्धता, विचारों की शुद्धता आदि, ये सब हमारे लिए अनिवार्य होनी चाहिए। दूसरों के प्रति हमारे विचार कितने शुद्ध हैं? हमारे जीवन का उद्देश्य कितना शुद्ध है? इस पर हमें ध्यान देना चाहिए। शुचिता एक अद्भुत शब्द है। अङ्ग्रेज़ी के hygiene और cleanliness शब्दों को मिला देंगे, तब भी वह शुचिता नहीं बनेगा।
दक्षता का अर्थ है सावधानी या सतर्कता।
जब आदरणीय विवेचक बचपन में गीता भवन जाते थे तो वहाँ हर द्वार पर सावधान लिखा होता था। तब वह नहीं समझ पाते थे कि हर द्वार पर सावधान क्यों लिखा है? अनेक वर्षों बाद एक ब्रह्मचारी ने कहा कि यह सेठ जी का सिद्धान्त है, इसलिए समस्त कमरों के बाहर यह लिखा गया है, क्योंकि सदैव सावधान रहना साधक के लिए आवश्यक है। उसे सदैव सावधान रहना चाहिए कि मेरी किसी बात से श्रीभगवान कुपित न हो जाएँ। मैं ऐसी कोई बात न करूँ जो श्रीभगवान को अच्छी न लगे।
दक्षता का दूसरा अर्थ है सतर्कता
और तीसरा अर्थ है कार्य कुशलता।
और तीसरा अर्थ है कार्य कुशलता।
अत्यन्त विद्वान, अत्यन्त श्रेष्ठ तथा महापुरुषों की बुद्धि की दक्षता सामान्य व्यक्तियों की भाँति नहीं होती, बल्कि उनसे अनेक गुना अधिक होती है।
पुराने समय में व्यापारी व्यापार करने दूसरे गाँवों में जाते थे। वहाँ ठहरने के लिए सराय होती थी। एक बार एक सराय में आकर तीन व्यापारी ठहरे। रात को भोजन करते वक्त दो व्यापारी अपना-अपना भोजन लेकर बैठ गए और तीसरा व्यापारी जल पीकर सोने की तैयारी करने लगा। वह दोनों समझ गए कि शायद वह घर से भोजन लेकर नहीं आया, इसलिए वह जल पीकर ही सोना चाहता है। भाईचारे के उद्देश्य से उन दोनों ने उसके पास जाकर पूछा कि क्या बात है? तुम भोजन नहीं लाए हो क्या? उसने कहा कि भोजन बना तो था किन्तु मैं लाना भूल गया। उन दोनों ने उससे खाने का आग्रह किया कि जो भी खाना लेकर आए हैं आपस में मिल बाँटकर खा लेंगे, ऐसा कहकर वे उसे अपने साथ खाने के लिए ले आए। एक व्यक्ति के पास तीन रोटी थी और दूसरे व्यक्ति के पास पॉंच रोटी थी। उन दोनों ने हर रोटी के तीन टुकड़े कर तीनों में बॉंट दिए। इस तरह से लगभग ढाई-ढाई रोटी खाकर तीनों चैन से सो गए। सुबह उठे तो तीसरा व्यापारी, जो भोजन नहीं लेकर आया था, वह अपने बिस्तर पर नहीं था। उन्होंने देखा तो उसके बिस्तर पर सोने की आठ गिन्नियाँ पड़ी थीं। दोनों व्यापारियों ने सोचा कि खाने के बदले में ये गिन्नियॉं छोड़ गया है, बहुत अमीर व्यापारी होगा।
दोनों का स्वभाव गिन्नी लेने का नहीं था, किन्तु वह छोड़ गया तो दोनों ने आपस में चार-चार गिन्नी बाँटने का सोचा पर बाँटने के विषय में दोनों में विवाद हो गया। जो पॉंच रोटी लेकर आया था, उसे लगा कि उसे ज्यादा मिलनी चाहिए, दूसरे को, जो तीन रोटी लेकर आया था, उसे तीन गिन्नी ही मिलनी चाहिए। विवाद बढ़ा तो सराय के मालिक उनके पास आ गए। उनकी बात सुन कर सराय के मालिक ने कहा कि मैं तो इसका निर्णय नहीं कर पाऊॅंगा। हम पञ्च के पास चलते हैं। हमारे पञ्च बहुत ही कुशल और दक्ष हैं। पच्चीस गॉंवों तक भी जब किसी का मामला फँस जाता है तो लोग उनके पास फैसला करने के लिए आते हैं। पञ्च के पास पहुँचे तो उन्होंने निर्णय करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि तुम मेरे गाँव के नहीं हो। अगर तुमने मेरा निर्णय नहीं माना तो मेरी नाक नीची हो जाएगी। दोनों ने विनती की, कि हम आपको वचन देते हैं कि हम आपका निर्णय मानेंगे। आपका निर्णय हम दोनों को स्वीकार होगा। पञ्च ने कहा कि एक व्यक्ति एक और दूसरा व्यक्ति सात गिन्नियाँ बाँट लो। वह दोनों आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि एक और सात का तो उन्होंने सोचा ही नहीं था। सराय के मालिक ने पञ्च से पूछा कि बताइए तो सही, यह फैसला आपने किया कैसे? आखिर इस निर्णय पर आप कैसे पहुँचे कि एक व्यक्ति को एक और दूसरे को सात गिन्नियाँ मिलनी चाहिए। सरपञ्च ने कहा कि एक व्यक्ति तीन रोटी लेकर आया। एक रोटी के तीन टुकड़े हुए। इसका मतलब नौ टुकड़े और उसने उसमें से अपने लिए आठ टुकड़े खा लिये। सहयोग तो उसने केवल एक ही टुकड़े का दिया। दूसरा व्यक्ति पाँच रोटी लेकर आया, हर रोटी के तीन टुकड़े हुए। पन्द्रह टुकड़ों में से उसने केवल आठ टुकड़े खाए और सात का सहयोग दिया, इसलिए उसे सात गिन्नियाँ मिलनी चाहिए। निर्णय बहुत ही स्पष्ट था।
पुराने समय में व्यापारी व्यापार करने दूसरे गाँवों में जाते थे। वहाँ ठहरने के लिए सराय होती थी। एक बार एक सराय में आकर तीन व्यापारी ठहरे। रात को भोजन करते वक्त दो व्यापारी अपना-अपना भोजन लेकर बैठ गए और तीसरा व्यापारी जल पीकर सोने की तैयारी करने लगा। वह दोनों समझ गए कि शायद वह घर से भोजन लेकर नहीं आया, इसलिए वह जल पीकर ही सोना चाहता है। भाईचारे के उद्देश्य से उन दोनों ने उसके पास जाकर पूछा कि क्या बात है? तुम भोजन नहीं लाए हो क्या? उसने कहा कि भोजन बना तो था किन्तु मैं लाना भूल गया। उन दोनों ने उससे खाने का आग्रह किया कि जो भी खाना लेकर आए हैं आपस में मिल बाँटकर खा लेंगे, ऐसा कहकर वे उसे अपने साथ खाने के लिए ले आए। एक व्यक्ति के पास तीन रोटी थी और दूसरे व्यक्ति के पास पॉंच रोटी थी। उन दोनों ने हर रोटी के तीन टुकड़े कर तीनों में बॉंट दिए। इस तरह से लगभग ढाई-ढाई रोटी खाकर तीनों चैन से सो गए। सुबह उठे तो तीसरा व्यापारी, जो भोजन नहीं लेकर आया था, वह अपने बिस्तर पर नहीं था। उन्होंने देखा तो उसके बिस्तर पर सोने की आठ गिन्नियाँ पड़ी थीं। दोनों व्यापारियों ने सोचा कि खाने के बदले में ये गिन्नियॉं छोड़ गया है, बहुत अमीर व्यापारी होगा।
दोनों का स्वभाव गिन्नी लेने का नहीं था, किन्तु वह छोड़ गया तो दोनों ने आपस में चार-चार गिन्नी बाँटने का सोचा पर बाँटने के विषय में दोनों में विवाद हो गया। जो पॉंच रोटी लेकर आया था, उसे लगा कि उसे ज्यादा मिलनी चाहिए, दूसरे को, जो तीन रोटी लेकर आया था, उसे तीन गिन्नी ही मिलनी चाहिए। विवाद बढ़ा तो सराय के मालिक उनके पास आ गए। उनकी बात सुन कर सराय के मालिक ने कहा कि मैं तो इसका निर्णय नहीं कर पाऊॅंगा। हम पञ्च के पास चलते हैं। हमारे पञ्च बहुत ही कुशल और दक्ष हैं। पच्चीस गॉंवों तक भी जब किसी का मामला फँस जाता है तो लोग उनके पास फैसला करने के लिए आते हैं। पञ्च के पास पहुँचे तो उन्होंने निर्णय करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि तुम मेरे गाँव के नहीं हो। अगर तुमने मेरा निर्णय नहीं माना तो मेरी नाक नीची हो जाएगी। दोनों ने विनती की, कि हम आपको वचन देते हैं कि हम आपका निर्णय मानेंगे। आपका निर्णय हम दोनों को स्वीकार होगा। पञ्च ने कहा कि एक व्यक्ति एक और दूसरा व्यक्ति सात गिन्नियाँ बाँट लो। वह दोनों आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि एक और सात का तो उन्होंने सोचा ही नहीं था। सराय के मालिक ने पञ्च से पूछा कि बताइए तो सही, यह फैसला आपने किया कैसे? आखिर इस निर्णय पर आप कैसे पहुँचे कि एक व्यक्ति को एक और दूसरे को सात गिन्नियाँ मिलनी चाहिए। सरपञ्च ने कहा कि एक व्यक्ति तीन रोटी लेकर आया। एक रोटी के तीन टुकड़े हुए। इसका मतलब नौ टुकड़े और उसने उसमें से अपने लिए आठ टुकड़े खा लिये। सहयोग तो उसने केवल एक ही टुकड़े का दिया। दूसरा व्यक्ति पाँच रोटी लेकर आया, हर रोटी के तीन टुकड़े हुए। पन्द्रह टुकड़ों में से उसने केवल आठ टुकड़े खाए और सात का सहयोग दिया, इसलिए उसे सात गिन्नियाँ मिलनी चाहिए। निर्णय बहुत ही स्पष्ट था।
महापुरुषों के निर्णय अनेक बार हम जैसे सामान्य व्यक्तियों को गलत प्रतीत होते हैं। दक्ष व्यक्ति की प्रज्ञा अलग तरह से चलती है और अपनी प्रज्ञा से उसे पकड़ना बहुत कठिन होता है। उनकी कार्य कुशलता पर प्रश्न नहीं किया जा सकता। हम आम व्यक्ति अनेक बार श्रीराम और श्रीकृष्ण तक के ऊपर प्रश्न कर देते हैं, कभी यह नहीं सोचते कि उनकी बुद्धि दक्ष है और वह किसी अलग सोच से चल रही है। भक्ति करते-करते स्वाभाविक रूप से भक्त के जीवन में दक्षता का निर्माण होता है। यह केवल उन्हें ही प्राप्त होती है जिन्होंने अपनी प्रज्ञा का जागरण किया होता है।
उदासीन का अर्थ अनेक बार समझ लिया जाता है- उदास रहना, प्रसन्न नहीं रहना। जो उदास रहता है, प्रसन्न नहीं रहता है, उसे तो श्रीभगवान बिलकुल पसन्द नहीं करते। अतः भक्त को हमेशा प्रसन्नचित रहना चाहिए। श्रीभगवान हमें सदैव प्रसन्न ही देखना चाहते हैं।
उदासीन का अर्थ अनेक बार समझ लिया जाता है- उदास रहना, प्रसन्न नहीं रहना। जो उदास रहता है, प्रसन्न नहीं रहता है, उसे तो श्रीभगवान बिलकुल पसन्द नहीं करते। अतः भक्त को हमेशा प्रसन्नचित रहना चाहिए। श्रीभगवान हमें सदैव प्रसन्न ही देखना चाहते हैं।
उदासीन का अर्थ है उत् आसीन।
हमने फिल्मों में देखा है कि न्यायाधीश हमेशा ऊपर बैठते हैं। वह दोनों पक्षों से थोड़ा ऊपर इसलिए बैठते हैं कि किसी के साथ भी वह अन्याय न कर दें। दोनों पक्षों से ऊपर बैठने का मतलब कि किसी भी पक्ष के साथ पक्षपात नहीं हो सकता। इसी तरह से भक्त हर दृश्य का साक्षी तो बनता है, पर निर्लिप्त भाव से संसार को देखता है और पक्षपात नहीं करता।
अव्यथित- भक्त का मन कभी व्यथित नहीं होता। मैं कभी भी किसी बात से विचलित नहीं होता। गाँधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दे दिया पर श्रीकृष्ण उस श्राप से व्यथित नहीं हुए।
गोस्वामीजी ने अयोध्याकाण्ड में श्रीभगवान की स्तुति की है। अद्भुत श्लोक है! वे श्रीराम की स्तुति करते हुये लिखते हैं-
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंजुलमंगलप्रदा॥2॥
वे कहते हैं कि मैं श्रीभगवान राम के उस स्वरूप का चिन्तन करना चाहता हूँ, जिनके मुख पर राज्याभिषेक की बात सुनकर कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ और वनवास की बात सुनकर जिनका मुख मलिन नहीं हुआ। ऐसा नहीं कि राज्याभिषेक का समाचार सुनकर गुलाबी हो गए और वनवास का समाचार मिला तो पीले पड़ गए।
जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियाँ आने पर भी जो व्यक्ति परेशान नहीं होता, बल्कि सोचता है कि यह भी व्यतीत हो जाएगा, उसे गतव्यथ: कहते हैं।
जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियाँ आने पर भी जो व्यक्ति परेशान नहीं होता, बल्कि सोचता है कि यह भी व्यतीत हो जाएगा, उसे गतव्यथ: कहते हैं।
एक बार कबीरदास जी की गाय चोरी हो गयी। पड़ोसी दुःख व्यक्त करने आए कि बहुत अच्छी गाय थी, इतना दूध देती थी, आपका इतना नुकसान हो गया। कबीरदास जी ने कहा, अच्छा हुआ! अब गोबर उठाने से छुट्टी मिली। अब गोबर नहीं रहेगा तो मच्छर भी नहीं आएँगे। कुछ दिन बाद गाय वापस मिल गयी। फिर से पड़ोसी आए और बोले कि बहुत अच्छा हुआ! आप तो बड़े भाग्यशाली हैं कि आपकी खोयी हुयी गाय वापस मिल गयी। कबीरदास जी ने कहा- कोई बात नहीं, अब दूध पी लिया करेंगे। वे व्यथित नहीं हुये। हमें जीवन में सुख-दुःख की परिस्थिति से व्यथित नहीं होना है।
भक्ति की अन्तिम अवस्था में यह स्थिति आती है। अब भक्त नए-नए उपक्रम नहीं करता। जिसे भक्ति की पूर्णता का रस आ गया, वह अब कर्त्तव्य कर्मों का निष्पादन करता है, नए कर्मों को अपने ऊपर नहीं लेता है।
महावीर स्वामी जी का एक प्रसङ्ग है। एक बार चलते-चलते बहुत तेज ऑंधी आई तो उन्होंने अपनी दिशा बदल कर दूसरी ओर चलना शुरू कर दिया। किसी शिष्य ने पूछा कि आपको तो दूसरी तरफ जाना था तो स्वामी जी ने कहा, कोई बात नहीं, हवा ने कहा कि इधर चलो, तो मैं इधर चल पड़ा। यह भक्ति की पराकाष्ठा है, जो सामान्य व्यक्ति में नहीं होती।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि, न शोचति न काङ्क्षति|
शुभाशुभपरित्यागी, भक्तिमान्यः(स्) स मे प्रियः||17||
जो न (कभी) हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है (और) जो शुभ-अशुभ कर्मों से ऊँचा उठा हुआ (राग-द्वेष रहित) है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि अर्जुन! जो व्यक्ति थोड़ा सा कुछ अच्छा होने पर हर्षित नहीं होता है, थोड़ा कुछ खराब होने पर द्वेष नहीं करता है, न शोक करता है, वह मनुष्य मुझे प्रिय है। श्रीभगवान को कभी भी दूसरों से द्वेष करने वाले व्यक्ति प्रिय नहीं होते हैं। अपने परिवार का हो, पड़ोस का हो, कार्यस्थल का हो, वह चाहे कुछ गलत कर रहा हो, हमें किसी से कोई द्वेष नहीं रखना चाहिए। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो हमेशा शोक में ही रहते हैं, कोई भी उन्हें मिलने जाता है तो यह किसी न किसी बात से निराश ही रहते हैं और रोते ही रहते हैं।
शुभाशुभ परित्यागी
यह भी अन्तिम अवस्था है। आरम्भ में शुभ का त्याग नहीं है। इसके लिए उपनिषदों में एक बड़ा सुन्दर उदाहरण है- कहते हैं कि पैर में काँटा चुभ जाए तो उसे निकालने के लिए एक दूसरा काँटा ढूँढते हैं। उससे पहले काँटे को निकालते हैं, फिर दोनों को फेङक् देते हैं। शुभ कर्मों से अशुभ कर्मों को समाप्त करना पड़ता है। जब तक जीवन में शुभ कर्म नहीं आएँगे, अशुभ कर्म समाप्त नहीं होंगे। अन्तिम अवस्था तक पहुँचने के बाद शुभ कर्मों का भी त्याग करना पड़ता है।
समः(श्) शत्रौ च मित्रे च, तथा मानापमानयोः|
शीतोष्णसुखदुःखेषु, समः(स्) सङ्गविवर्जितः||18||
(जो) शत्रु और मित्र में तथा मान-अपमान में सम है (और) शीत-उष्ण (शरीर की अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःख (मन बुद्धि की अनुकूलता-प्रतिकूलता) में सम है एवं आसक्ति रहित है (और) जो निन्दा स्तुति को समान समझने वाला, मननशील, जिस किसी प्रकार से भी (शरीर का निर्वाह होने न होने में) संतुष्ट, रहने के स्थान तथा शरीर में ममता आसक्ति से रहित (और) स्थिर बुद्धिवाला है, (वह) भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है। (12.18-12.19)
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि अर्जुन! श्रेष्ठ भक्त शत्रु और मित्र में समान दृष्टि रखता है। यहाँ यह बात बहुत मुश्किल लगती है कि शत्रु और मित्र में समान दृष्टि कैसे रखी जा सकती है? यहाँ यह समझना आवश्यक है कि समदृष्टि और समवर्तन अलग-अलग बातें हैं। सबके लिए सद्भावना को समदृष्टि कहते हैं और जो जैसा है, उसके साथ वैसा व्यवहार समवर्तन है। हम पिताजी का भी आदर करेंगे, भाई का भी आदर करेंगे, गुरुजी का भी आदर करेंगे, सन्त का भी आदर करेंगे किन्तु सबके साथ व्यवहार एक जैसा नहीं होगा। किसी को आसान पर बैठा कर, माला पहना कर दण्डवत् प्रणाम करेंगे, किसी को केवल झुक कर नमस्कार कर लेंगे। सबका अभिवादन करने का तरीका एक जैसा नहीं हो सकता। घर पर साधु आएँगे तो उन्हें आसन पर बैठा कर भोजन करवाएँगे और दक्षिणा भी देंगे। द्वार पर आए एक कुत्ते को भी भोजन करवाएँगे किन्तु उसे अपने घर के अन्दर नहीं बुलाएँगे।
हमारे मन में मित्रों और शत्रुओं, किसी के लिए भी द्वेष नहीं होना चाहिए। हमें किसी को शत्रु मानना ही नहीं चाहिए। यदि कोई व्यक्ति मुझे पसन्द नहीं करता तो वह उसकी समस्या है, मेरी नहीं। दूसरा व्यक्ति मुझे शत्रु मानता है, यह उसका विचार है, मेरा नहीं। मैं किसी को शत्रु नहीं मानता।
मान-अपमान में, शीत-उष्ण तथा सुख-दुःख में शरीर और मन के स्तर पर सम रहना। इसका अर्थ यह नहीं है कि शरीर को कष्ट नहीं होगा, किन्तु वह कष्ट सबका अलग-अलग होता है। कोई सौ ज्वर होने पर लेट जाता है और कोई एक सौ दो ज्वर में कार्य पर चला जाता है। कष्ट तो होता है किन्तु उस कष्ट की उपेक्षा करें, उसे बड़ा न बनाएँ। शरीर के कष्ट में समता नहीं हो सकती। मन के कष्ट में समता हो सकती है। शरीर का कष्ट तो झेलना ही पड़ता है।
हमारे मन में मित्रों और शत्रुओं, किसी के लिए भी द्वेष नहीं होना चाहिए। हमें किसी को शत्रु मानना ही नहीं चाहिए। यदि कोई व्यक्ति मुझे पसन्द नहीं करता तो वह उसकी समस्या है, मेरी नहीं। दूसरा व्यक्ति मुझे शत्रु मानता है, यह उसका विचार है, मेरा नहीं। मैं किसी को शत्रु नहीं मानता।
मान-अपमान में, शीत-उष्ण तथा सुख-दुःख में शरीर और मन के स्तर पर सम रहना। इसका अर्थ यह नहीं है कि शरीर को कष्ट नहीं होगा, किन्तु वह कष्ट सबका अलग-अलग होता है। कोई सौ ज्वर होने पर लेट जाता है और कोई एक सौ दो ज्वर में कार्य पर चला जाता है। कष्ट तो होता है किन्तु उस कष्ट की उपेक्षा करें, उसे बड़ा न बनाएँ। शरीर के कष्ट में समता नहीं हो सकती। मन के कष्ट में समता हो सकती है। शरीर का कष्ट तो झेलना ही पड़ता है।
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी, सन्तुष्टो येन केनचित्|
अनिकेतः(स्) स्थिरमति:(र्), भक्तिमान्मे प्रियो नरः||19||
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि साधारण व्यक्ति को किसी ने माला पहना दी तो वे खुशी से फूल जाते हैं और यदि किसी ने चाय के लिए नहीं पूछा उनके मुँह फूल जाते हैं। श्रीभगवान कहते हैं-
चाहे करे निन्दा कोई, चाहे कोई सत्कार करे |
फूलों की चिन्ता न करें, काँटों को सिर पर न धरे |
मान और अपमान दोनो ही, जिसके लिये समान रे |
वह सच्चा इन्सान रे, वह सच्चा इंसान रे |
फूलों की चिन्ता न करें, काँटों को सिर पर न धरे |
मान और अपमान दोनो ही, जिसके लिये समान रे |
वह सच्चा इन्सान रे, वह सच्चा इंसान रे |
साधारण मनुष्य छोटी-छोटी बातों, जैसे मुझे किसी ने चाय के लिए नहीं पूछा, मुझे बैठने के लिए नहीं कहा, मुझे मञ्च पर नहीं बुलाया, मुझे यह पद नहीं दिया, मुझे प्रतिष्ठा नहीं मिली आदि की जितनी चिन्ता करता है, वह जीवन में उतना अधिक दुःखी रहता है। अधिक चिन्ता करने से अधिक की प्राप्ति नहीं होती, बल्कि मिलता वही है जो हमें मिलना होता है।
जीवन में अनेक बार अपमान भी होता है और मान भी होता है। कभी हमने कुछ अच्छा नहीं किया, फिर भी हमारा सम्मान हुआ था तो यदि कभी हमने कुछ बुरा नहीं किया हो, तब हमारा अपमान भी हो सकता है। यहाँ श्रीभगवान कह रहे हैं-
सन्तुष्टो येन केनचित्।
इससे पूर्व श्रीभगवान ने कहा था-
संतुष्ट: सततं योगी।
श्रीभगवान इस गुण पर बड़ा ज़ोर देना चाहते हैं। साधारण व्यक्ति हर समय श्रीभगवान से कहते हैं कि यह मिल जाए, फिर मैं कभी कुछ नहीं माँगूँगा। अक्सर बच्चे कहते हैं कि बस यह खिलौना दिला दीजिये या यह कपड़ा दिला दीजिये, फिर हम कुछ नहीं माँगेंगे। फिर जैसे ही वह खिलौना या कपड़ा मिला, उनकी अगली सूची तैयार हो जाती है। हम भी ऐसा ही करते हैं। एक इच्छा पूर्ण हो जाए तो दूसरी माङ्ग रखने लगते हैं, इसलिए श्रीभगवान कहते हैं कि जो है, जैसा है, उसमें सन्तुष्ट रहो। हमें जो भी प्राप्त हुआ है, हमें उसमें ही सन्तुष्ट और प्रसन्न रहना चाहिए।
सीताराम सीताराम सीताराम कहिए,
जाहि बिधि राखे राम ताहि बिधि रहिए |
जाहि बिधि राखे राम ताहि बिधि रहिए |
भक्ति का सर्वोत्तम लक्षण है, सन्तुष्टो येन केनचित्। जैसी भी परिस्थिति हो, उसमें सन्तुष्ट रहने वाला ही सर्वोत्तम भक्त है। वह किसी भी प्रकार की शिकायत नहीं करता।
नवधा भक्ति में आठवीं भक्ति के विषय में श्रीभगवान ने कहा है-
यथा लाभ संतोषा अर्थात् जो मिला उसमें सन्तुष्ट रहें।
अनिकेतः का सामान्य रूप से अर्थ होता है बिना घर का। हमारी हर वस्तु पर कब्जा करने की आदत होती है। घर में सोफ़े पर इस स्थान पर मैं ही बैठूँगा, सत्सङ्ग में, मैं यहीं पर बैठूँगा, मेरा आसान यहीं पर लगेगा आदि। हम स्थान का आग्रह करते हैं। विस्तार से समझें तो हम जहाँ-जहाँ जिन बातों का आग्रह करते हैं, उस आग्रह से मुक्त होना है।
श्रीभगवान भक्त के उनतालीस लक्षण बताते हैं। उनमें अन्तिम लक्षण है-
श्रीभगवान भक्त के उनतालीस लक्षण बताते हैं। उनमें अन्तिम लक्षण है-
स्थिरमति:
यह लक्षण हममें से किसी में नहीं है। कभी-कभी हमारे अन्दर ये लक्षण आते हैं, हम वैराग्य अपनाते हैं, अपमान को भी सह लेते हैं, कभी उदार और करुणावान हो जाते हैं। श्रीभगवान कहते हैं कि तुम कभी-कभी होते हो, सदैव नहीं होते हो। श्रेष्ठ भक्त की बुद्धि स्थिर हो जाती है। इन उनतालीस लक्षणों में जिसकी बुद्धि डिगती नहीं है, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।
ये तु धर्म्यामृतमिदं(य्ँ), यथोक्तं(म्) पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा, भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥12.20॥
परन्तु जो (मुझ में) श्रद्धा रखने वाले (और) मेरे परायण हुए भक्त इस धर्ममय अमृत का जैसा कहा कहा है, (वैसा ही) भली भांति सेवन करते हैं, वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं- हे अर्जुन! जो पुरुष मेरे परायण होकर इस धर्ममय अमृत का निष्काम भाव से सेवन करते हैं, वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं। श्रीभगवान कहते हैं कि दो बातें अत्यन्त आवश्यक हैं। एक श्रद्धावान होना और एक मेरे परायण होना। जिसका गुरु-वचनों तथा शास्त्र-वचनों पर परम विश्वास है, जिसे श्रीभगवान पर अतिशय विश्वास है-
मेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार।
वही उसका बेड़ा पार करते हैं। श्रद्धा कैसी हो? हनुमान जी का गुण देखिये-
ज्ञानिनामग्रगण्यं, अर्थात् ज्ञानियों में अग्र, इतने बुद्धिमान हैं कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता, किन्तु श्रद्धा कैसी है?
रावण का वध करके जब श्रीराम वापस आए तो उनके साथ सभी आए थे। श्रीराम ने सबको विदा करना शुरू किया। अङ्गद को विदा किया। सुग्रीव को विदा किया, विभीषण को विदा किया, निषादराज को विदा किया, परन्तु हनुमान जी छिप गए। जब श्रीराम ने उन्हें विदा करने के लिए बुलाया तो उन्होंने कहा, मैं तो यहीं पर रहूँगा, कृपया मुझे विदा न करें। मैं आपके चरणों को छोड़कर नहीं जाऊॅंगा। हनुमान जी श्रीराम के साथ राजमहल में ही रहने लगे। रोज सुबह उठकर जानकी जी स्नान के बाद सिन्दूर लगातीं। उनको देखकर एक दिन हनुमान जी ने पूछा- माता! आप यह सिन्दूर क्यों लगाती हैं? जानकी जी ने सोचा कि यह वानर है, इसे कैसे समझाया जाए? पहले तो उन्होंने काफी टाला किन्तु जब हनुमान जी पीछे ही पड़ गए, तब जानकी जी ने कहा कि इससे श्री रामजी को अच्छा लगता है। हनुमान जी ने जैसे ही यह सुना, वे वहाँ से गायब हो गए। हनुमान जी अयोध्या के भण्डार-घर में पहुँचे, जहाँ सिन्दूर की बोरियाँ थीं। उन्होंने पूरी एक बोरी अपने ऊपर पलट ली और तुरन्त जानकी जी के पास आए। जानकी जी ने पूछा- यह क्या किया तुमने? हनुमान जी कहा कि देखिये मैं कितना सारा सिन्दूर लगा कर आ गया। लेकिन यहॉं तक आते-आते रास्ते में सारा सिन्दूर झड़ गया। माता ने कहा कि ऐसे नहीं लगाते, पहले इसमें घी मिलाते हैं, फिर सिन्दूर लगाते हैं। हनुमान जी महल के भण्डार में दोबारा गये और वहाँ से घी लिया और अपने ऊपर उड़ेल लिया और फिर सिन्दूर पलट लिया और सोचा कि अब पक्का हो गया। फिर माता के पास आए और बोले कि “अब श्रीराम को अच्छा लगूँगा न? और वे बन गए सिन्दूरी हनुमान जी।
श्रद्धा में प्रश्न नहीं है।
श्रद्धा में तर्क नहीं है।
श्रद्धा में तर्क नहीं है।
हनुमान जी बुद्धिमानों में शिरोमणि हैं, किन्तु श्रद्धा में बुद्धि और तर्क नहीं है। जब श्रद्धापूर्वक ज्ञान प्राप्त किया जाता है, तब हनुमान जी जैसी भक्ति प्रस्फुटित होती है। श्रीभगवान कहते हैं कि जो इसका आनन्दपूर्वक सेवन करता है, वह मुझे प्रिय है। जिसे भक्ति कष्टप्रद लगती है, जैसे आज पितृपक्ष की इन्दिरा एकादशी है। बहुत बड़ी एकादशी है। किसी के लिए यह बड़ी सेवनीय है और किसी ने सुबह से पाँच बार सबको बताया है कि आज एकादशी का उपवास है। आज तो कुछ खाना नहीं है। यह कह-कह कर पाँच बार चाय पी चुके हैं, अनेक उपवासी वस्तुएँ खाने की तैयारी भी चल रही है। यह सेवन नहीं है। माताएँ करवा चौध का व्रत करती हैं और सात बजते ही बालकों को छत पर भेजना शुरू कर देती हैं कि जाओ देख कर आओ चाँद निकला कि नहीं। वह भी कह देता है कि मैंने गूगल पर देख लिया, अभी नहीं निकला। सेवन श्रद्धापूर्वक और प्रसन्नतापूर्वक होना चाहिए।
अर्जुन ने आरम्भ में प्रश्न किया था- के वित्तमाः? पूरे अध्याय का यह निष्कर्ष निकला कि श्रीभगवान की प्रसन्नता के लिए कोई भी कुछ भी करता है, वही उत्तम है।
अर्जुन ने आरम्भ में प्रश्न किया था- के वित्तमाः? पूरे अध्याय का यह निष्कर्ष निकला कि श्रीभगवान की प्रसन्नता के लिए कोई भी कुछ भी करता है, वही उत्तम है।
गुरु नानकदेव जी ने कहा-
झुट्ठल खेले सच्चा होये,
सच्चा खेले विरला कोये |
सच्चा खेले विरला कोये |
आरम्भ में भक्ति का नाटक करते-करते भी एक दिन भक्ति सच्ची हो जाएगी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं ठीक से समझा नहीं, श्रद्धा सब बातों को पूरा कर देती है।
हरि शरणं! हरि शरणं! हरि शरणं! हरि शरणं! हरि शरणं!
प्रश्नोत्तर
प्रश्नकर्ता- संजय गाँधी भैया
प्रश्न- असन्तोष का भाव रखने से जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है, जबकि श्रीमद्भगवद्गीता में सन्तुष्ट रहने की शिक्षा दी है। ऐसा क्यों?
उत्तर- जब स्वयं अपने व्यक्तिगत हित का कार्य मानकर करते हैं तो जैसे आप कहते हैं वैसे होता है। जब कार्य को श्रीभगवान के लिए किया जाता है, तब सफलता बढ़ जाती है।
भरत जी श्रीराम को मिलने चित्रकूट को चले तो नगरवासियों के साथ-साथ सेना और मन्त्रीगण भी चलने को तैयार हो गये। भरत जी ने उन्हें रोका और राजकोष और राज्य व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा। भरत जी द्वारा सुरक्षा और जनहित की सुन्दर व्यवस्था का वाल्मीकि रामायण में वर्णन किया गया है। किसी ने कहा कि आपको तो राज्य की इच्छा नहीं है, फिर आप यह व्यवस्थाएँ क्यों कर रहे हैं? भरत जी ने कहा -
सम्पति सब रघुपति कै आही |
जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही ||
तौ परिनाम न मोरि भलाई |
पाप सिरोमनि साइँ दोहाई ||
अयोध्या काण्ड
सभी सम्पत्ति रघुनाथ जी की है, इसे यथावत सुरक्षित रखना मेरा कर्त्तव्य है। यह सुरक्षित प्रकार से उन्हें ही लौटानी है।
हमें जो पद, पैसा या प्रतिष्ठा मिली है, वह सब श्रीभगवान की है। हमें श्रीभगवान की सम्पत्ति को ही आगे बढ़ाना है। हमारा स्वयं का कुछ नहीं है। इसका विस्तार करना है। बढ़ेगा या नहीं बढ़ेगा? कितना बढ़ेगा? यह भी पता नहीं, श्रीभगवान ही जानें। हम अपनी योग्यता और बुद्धि के अनुसार प्रयास करते रहें।
प्रश्नकर्ता- शशि कुमारी तिवाड़ी दीदी
प्रश्न- गीता का ज्ञान व सांसारिक ज्ञान एक दूसरे के विरोधी क्यों हैं?
उत्तर- श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान सांसारिक कर्त्तव्यों का विरोधी नहीं है। सांसारिक ज्ञान वाला व्यक्ति केवल अपने लाभ-हानि की दृष्टि से कार्य करता है इसलिए वह सुख दुःख से अधिक प्रभावित रहता है।
श्रीमद्भगवद्गीता उच्च स्तरीय ज्ञान है। ऐसे ज्ञान वाला भी उन्हीं सांसारिक कर्त्तव्यों का निर्वहन श्रीभगवान के निमित्त समझकर करता है, इसलिए वह व्यक्तिगत लाभ-हानि, सुख दुःख से ऊपर उठ जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता उच्च स्तरीय ज्ञान है। ऐसे ज्ञान वाला भी उन्हीं सांसारिक कर्त्तव्यों का निर्वहन श्रीभगवान के निमित्त समझकर करता है, इसलिए वह व्यक्तिगत लाभ-हानि, सुख दुःख से ऊपर उठ जाता है।
ये बच्चे श्रीभगवान के हैं, उन्हीं के निमित्त इनका पालन-पोषण करना है। ऐसा विचार हो जाने पर, वे बच्चे बड़े होकर हमारी सेवा करें या न करें, ऐसी आशाएँ मन से मिट जाती हैं, इसलिए उन बच्चों के व्यवहार से हमें दुःख भी नहीं होगा। स्वयं की सेवा करवाने की आशा से बच्चों का पालन करेंगे, सेवा प्राप्त न होने पर दुःख होगा। हमने बच्चों को पालकर, श्रीभगवान के निमित्त अपने कर्त्तव्य का पालन किया है। बच्चे बड़े होकर माता-पिता की सेवा का कर्त्तव्य पालन करें या न करें, यह हमारे अधिकार में नहीं है।
दूसरों का कर्त्तव्य हमारा अधिकार नहीं है। हमने तुम्हारे लिए इतना कुछ किया, तुम हमारे लिए इतना सा भी नहीं कर सकते? ऐसा सोचने से दुःख होगा। कर्म वही होते हैं, श्रीमद्भगवद्गीता के आने से दृष्टि बदल जाती है। इस ज्ञान से सांसारिक कर्त्तव्य और सामाजिक व पारिवारिक सम्बन्ध या सांसारिक ज्ञान छूटते नहीं हैं, अपितु इनमें आसक्ति नहीं रहती। यह मेरा है, वह पराया है, यह आसक्ति समाप्त हो जाती है। अनासक्त भाव से कर्त्तव्य पालन करते हैं। जिनके लिए भोजन बना रहे हैं, वे श्रीभगवान का स्वरूप हैं, इस भावना से बनाया भोजन श्रीभगवान का ही भजन है।
जो-जो करे, सोई मेरी पूजा श्रीमद्भगवद्गीता हमें यही सिखाती है। यदि हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो इसका अर्थ है कि अभी हमारे मन में भटकाव है। हम श्रीमद्भगवद्गीता का विवेचन सुनते रहें। अर्जुन को श्रीभगवान ने कहा कि कर्त्तव्य नहीं छोड़ने हैं। कर्त्तव्य पालन करते हुए ही मेरा स्मरण करो। मेरा स्मरण करने हेतु, तुम्हें युद्ध छोड़कर जाने की आवश्यकता नहीं है, बस मेरा स्मरण करते रहो। श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने के लिये खाना बनाना छोड़ना नहीं है। खाना बनाते हुए ही, श्रीमद्भगवद्गीता पढ़नी है।
प्रश्नकर्ता- श्री इन्द्र दीक्षित
प्रश्न- कर्म मनुष्य की प्रसन्नता हेतु करना है या श्रीभगवान की प्रसन्नता के लिए?
उत्तर- आपकी दोनों बातें एक ही हैं। मनुष्य के भीतर बैठे श्रीभगवान को प्रसन्न रखने से श्रीभगवान प्रसन्न होते हैं। हमारी दृष्टि व्यक्ति पर न होकर, परमात्मा पर होनी चाहिए। व्यक्ति को प्रसन्न करने से मन में अपेक्षा का निर्माण होता है, कि मैंने इसके लिए यह किया, इसने मेरे लिए नहीं किया। मन में दुःख उत्पन्न होगा। मनुष्य के भीतर बैठे परमात्मा के लिए किया तो मन में अपेक्षा का निर्माण नहीं होगा और स्वयं का मन प्रसन्न रहेगा।
प्रश्नकर्ता- प्रेम बंसल भैया
प्रश्न- उन्तालीस लक्षण बताए हैं, हमें रिश्वत देकर काम करवाना पड़ता है। क्या करें?
उत्तर- श्रीमद्भगवद्गीता में परमात्मा ने सभी प्रकार के प्रभार मनुष्य को दे दिये हैं। स्वयं अपने व्यक्तिगत लक्षणों का पर्यवेक्षण करें। स्वयं के गुणों में जो-जो, जैसी-जैसी त्रुटियॉं दृष्टिगत हों, उनका यथोचित निराकरण स्वयं करें।
आपने अपनी त्रुटि को छुपाने के लिए किसी दूसरे को रिश्वत दी है तो यह अपने स्वभाव का दोष मानना चाहिए। हम कार्य को सही प्रकार से करना नहीं चाहते, कार्य की महत्ता के अनुरूप श्रम और समर्पण नहीं करना चाहते। कभी-कभी हो सकता है कि आपने अपनी ओर से सभी त्रुटियों का निवारण कर दिया, तब भी रिश्वत के बिना काम रुक गया है तो लेने वाले को पाप लगेगा। आप पूर्णतः सही हैं तो ऐसी स्थिति में आवश्यकतानुसार कुछ प्रतिकार भी करना चाहिए। बात को बिगड़ने नहीं देना चाहिए। यदि प्रतिकार नहीं करेंगे तो रिश्वत लेने वाले का उत्साहवर्धन होता है। कभी-कभी कोई प्रतिकार करते हैं तो ऐसे लोग हतोत्साहित होते हैं।
यदि आपने अपनी श्रमसाध्यता बचाने के लिए या नियमों की अवहेलना के लिए, रिश्वत देकर अवैध रूप से काम निकलवाया है तो इसका पाप आपको भी लगेगा और लेने वाले को भी लगेगा।
प्रश्नकर्ता- विकास भैया
प्रश्न- भक्ति मार्ग हेतु गुरु का चयन कैसे करें?
उत्तर- सामान्यतः जिन पर श्रद्धा हो उनके विषय में चार बातों का पता लगाना चाहिए। गुरु परम्परा कब से और कैसे चली आ रही है? या कोई स्वयंभू गुरु परम्परा आरम्भ कर ली गयी है? हमारी प्राचीन सनातन गुरु परम्परा होनी चाहिए, या किसी सम्प्रदाय या मठ से चली आ रही प्राचीन गुरु परम्परा होनी आवश्यक है। वे शास्त्र पठन-पाठन में पारङ्गत होने चाहिएँ। यह भी जानना चाहिए कि वे शिष्य को ईश्वर पूजा में लगाते हैं या स्वयं की पूजा में लगाते हैं?
स्वयंभू गुरु न हों, किसी प्राचीन गुरु परम्परा से अधिकृत होने चाहिए, शास्त्रों में प्रवीण होने चाहिए, श्रीभगवान के प्रति समर्पित होने चाहिए।
भारत देवभूमि है, अनेक श्रेष्ठ गुरु उपलब्ध हैं, जिनमें यह चारों गुण उपस्थित हों। ढोंगी से बचने हेतु, यह चारों परख कर देख लें तो नीर क्षीर का निर्णय हो जाता है। यह शास्त्राज्ञा है कि गुरु की व्यवहारिक और सैद्धान्तिक जॉंच कर लेनी चाहिए। परमात्मा के दर्शन करने वाला व्यक्ति अपने लाभ की या सांसारिक बात नहीं करता।
प्रश्नकर्ता- डॉ मधुबाला सिंह दीदी
प्रश्न- आतॅंकवादियों के प्रति करुणा कैसे की जा सकती है?
उत्तर- हमारे मन में उनके प्रति करुणा होनी चाहिए कि श्रीभगवान उन्हें सद्बुद्धि दे और उनका कल्याण हो। सरकार को राजधर्म के अनुसार कार्यप्रणाली निश्चित करनी है। राजधर्म वाले को राजधर्म का ही पालन करना चाहिए। राजा को दुष्ट व्यक्ति पर करुणा करने की अनुमति नहीं है, किन्तु सामान्य व्यक्ति को उस पर करुणा करनी चाहिए। ये दोनों बातें अलग-अलग हैं। मैं राजा नहीं हूॅं तो मुझपर राजधर्म लागू नहीं होता है। मेरे भाई ने मेरी एक बीघा जमीन हड़प ली, तो कोई बात नहीं, मैं उसे छोड़ दूॅंगा, भाई को भाई से युद्ध नहीं करना चाहिए। कोई अन्य देश हमारी सीमा की ओर बढ़े तो राजधर्म के अनुसार युद्ध होगा। इससे हम सन्तुष्ट भी रहेंगे और अपना कर्त्तव्य पालन भी करते रहेंगे।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः॥
इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘भक्तियोग’ नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।