विवेचन सारांश
अर्जुन को आत्मज्ञान की प्राप्ति

ID: 5759
हिन्दी
रविवार, 27 अक्टूबर 2024
अध्याय 2: सांख्ययोग
1/7 (श्लोक 1-10)
विवेचक: गीता विशारद डॉ आशू जी गोयल


सुमधुर गीत, दीप प्रज्वलन तथा गुरु वन्दना के साथ सत्र का आरम्भ हुआ। श्रीभगवान की अतिशय मङ्गलमय कृपा से हमारा ऐसा सद्भाग्य जागृत हुआ जो हम श्रीमद्भगवद्गीता सीखने में लग गए। पता नहीं, हमारे कोई इस जन्म के कर्म हैं, पूर्वजन्मों के कोई सुकृत हैं, हमारे पूर्वजों के कोई सुकृत हैं या फिर किसी जन्म में किसी महापुरुष की कृपा दृष्टि हम पर पड़ गई, जिसके कारण हम पर ऐसी कृपा हुई है कि हम श्रीमद्भगवद्गीता के स्वाध्याय में, चिन्तन-मनन में तथा उसे जीवन में अपनाने में लग गए हैं।   

सभी अध्यायों का चिन्तन करते-करते हम दूसरे अध्याय पर पहुँच रहे हैं। बात तो विनोद की है कि चिन्तन करते-करते आगे बढ़ते हैं कि पीछे आते हैं, किन्तु हम दूसरे अध्याय पर पहुँच रहे हैं। सङ्ख्या की दृष्टि से दूसरे स्थान पर होने पर भी, यह अध्याय अत्यन्त गूढ़ है। इस अध्याय का विवेचन यदि आपने पहले नहीं सुना है तो आप समझेंगे कि यदि इस अध्याय का विवेचन आपको श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन आरम्भ करते समय सुनाया गया होता तो आप सम्भवतः इतना कठिन और गूढ़ विषय जानकर आगे का अध्ययन छोड़ देते इसलिए आरम्भिक साधक को कभी भी दूसरा अध्याय पढ़ाने की परम्परा नहीं है।

यह अध्याय बहुत महत्त्वपूर्ण और गूढ़ है। इसका नाम साङ्ख्ययोग है। हमारी भारतीय परम्परा में छह शास्त्रों का विधान है। हम आरती में भी गाते हैं-

छहों शास्त्र सब ग्रन्थन को रस

भारतीय धर्म के दो मूल अङ्ग हैं। एक है दर्शन और दूसरा है साधन

दर्शन के छः अङ्ग हैं। यह जो षष्ठ-दर्शन हैं, इनको ही शास्त्र कहा गया है। ये छः दर्शन हमारी  संस्कृति के मूल हैं। पहला न्याय शास्त्र है जिसके प्रणेता महर्षि गौतम हैं। दूसरा शास्त्र वैशेषिक है। उस के प्रणेता महर्षि कणाद हैं। तीसरा योगशास्त्र है जिसके प्रणेता महर्षि पतञ्जलि हैं। चौथा साङ्ख्य है जिसके प्रणेता कपिल मुनि हैं। पाँचवें शास्त्र को पूर्व-मीमांसा या मीमांसा कहा गया है जिसके प्रणेता महर्षि जैमिनि और अन्तिम शास्त्र उत्तर-मीमांसा या वेदान्त है जिसके प्रणेता महर्षि बादरायण हैं।

वैसे तो इन सभी छः शास्त्रों के सूत्र हमारे जीवन में पूरे व्यवहार में हैं, फिर भी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जितनी भी सही-गलत धारणाएँ प्रचलित हैं, जो भी करना है या नहीं करना है (do's and don'ts), वे सारे विचार इन्हीं छह दर्शन-शास्त्रों से प्राप्त होते हैं। रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृति या श्रीमद्भगवद्गीता, ये सभी साङ्ख्य दर्शन से मानी जाती हैं। यह छह दर्शन हमारे मानसिक विचारों को चलाने में मूल स्रोत हैं, यही हमारी सहायता करते हैं। 

धर्म का दूसरा अङ्ग साधन है। साधन पद्धतियाँ मूल रूप से चार प्रकार की हैं- ज्ञान, कर्म, योग और भक्ति। यहाँ योग को अष्टाङ्गयोग वाला योग नहीं समझेंगे, वह इसका एक भाग है। श्रीमद्भगवद्गीता के सभी अध्याय योग हैं, जैसे अर्जुनविषादयोग, साङ्ख्ययोग, कर्मयोग, कर्मसंन्यासयोग, मोक्षसंन्यासयोग, भक्तियोग आदि। महर्षि पतञ्जलि द्वारा रचित अष्टाङ्गयोग, योग का एक भाग है। श्रीभगवान ने श्रीमद्भगवद्गीता में जिस योग की बात की है वह अष्टाङ्गयोग से भिन्न है। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीभगवान कहते हैं

"समत्वं योग उच्यते"

अर्थात् समता ही मूल योग है। Balancing is the best thing. छठे अध्याय के छियालीसवें श्लोक में श्रीभगवान अर्जुन से कहते हैं- ”तस्मात् योगी भवार्जुन।”

यह हमारी लर्नगीता का ध्येय वाक्य भी है।

यहाँ हमें यह समझना चाहिए कि श्रीभगवान अर्जुन से योगी बनने के लिए कह रहे हैं तो इसका यह तात्पर्य नहीं है कि वे अर्जुन को एक पैर पर खड़े होने को कह रहे हैं।

सभी साधन पद्धतियाँ मूल में समत्व की ओर जाने को कहती हैं। पहला साधन ज्ञानमार्ग कहता है- एको ब्रह्म द्वितीयोनास्ति‌ अर्थात् एक पर सम हो जाओ। एक ही परब्रह्म है, दूसरा कोई नहीं है। दूसरा मार्ग भक्तिमार्ग है जो कहता है- मैं श्रीभगवान का, सब कुछ श्रीभगवान का। तीसरा मार्ग कर्मयोग है, जो कहता है- यह शरीर संसार का है तथा संसार की सेवा करने के लिए है। इस दृष्टि से अपनी बुद्धि को सम कर देना है। चौथा मार्ग ध्यानमार्ग है। महर्षि पतञ्जलि ने अष्टाङ्गयोग से भगवत् प्राप्ति बतलाई है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। अन्तिम स्थिति समाधि को कहा गया है। समाधि का सन्धि-विच्छेद करेंगे तो होगा- (सम+धी) अर्थात बुद्धि की समता। जहाँ बुद्धि निर्विकल्प हो जाए, जहाँ कोई सङ्कल्प-विकल्प न उठे (The state of blank)। दो का समागम होकर एक हो जाए- इसी को योग कहते हैं। मैं किसी भी माध्यम से श्रीभगवान से जुड़ जाऊँ” उसे ही योग कहते हैं।

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं
प्रेम गली अति साँकरी, जामें दो न समाहिं।।

श्रीभगवान के असङ्ख्य अवतार हैं और हमने श्रीभगवान की कल्पना अनेक रूपों में की है। एकमात्र श्रीकृष्ण अवतार को योगेश्वर कहा गया है योगेश्वर अर्थात् सभी योगों के ईश्वर क्योंकि वह हमेशा समता में रहे। कुछ भी घटित हुआ, श्रीकृष्ण कभी भी अधीर होते नहीं दिखाई दिए।

जरासन्ध ने मथुरा पर तेरह बार आक्रमण किया। उन्हें जरासन्ध को इस समय मारना नहीं है, इसलिए मथुरा छोड़ कर द्वारका चले गये और रणछोड़ कहलाये।

अभिमन्यु का विवाह करवाया, तब भी उतने ही सम हैं। अभिमन्यु की मृत्यु हो गयी, तब भी श्रीभगवान रोते-चिल्लाते नहीं हैं।

महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला है और दोनों सेनाएँ सामने एकत्र हो गयीं। ऐसे में अर्जुन उनसे कहते हैं कि मैं युद्ध नहीं करूँगा। उस समय भी श्रीभगवान के चेहरे पर कोई अधीरता नहीं दिखाई देती है। वे मुस्कुरा रहे हैं। कल्पना कीजिये, यदि उनके स्थान पर हम जैसा कोई साधारण व्यक्ति हो तो उसका यह सुनकर क्या हाल होगा? यह उसी प्रकार है जैसे मैच शुरू होने वाला है और कप्तान विराट कोहली बोलते हैं कि मैं तो नहीं खेलूँगा। उस समय सब चिन्ताग्रस्त हो जाएँगे किन्तु श्रीभगवान उस समय भी खड़े होकर मुस्कुरा रहे हैं।

श्रीभगवान योगेश्वर हैं। सभी योगों के ईश्वर हैं। उनकी बुद्धि सदैव समता में रहती है।

साङ्ख्ययोग के प्रणेता कपिलमुनि हैं। श्रीभागवत् जी के अनुसार श्रीविष्णु भगवान के चौबीस अवतारों में से पाँचवें अवतार कपिलमुनि माने गए हैं।

आरम्भ में जब ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की तब सप्तऋषियों को रचा। सभी ऋषियों ने ब्रह्माजी से कहा कि हम तपस्या करेंगे, हमें गृहस्थ जीवन में नहीं जाना है। तब ब्रह्माजी ने कर्दम ऋषि को आदेश दिया कि मेरी आज्ञा से तुम्हें एक पुत्र होने तक ग्रहस्थ जीवन में ही रहना है। कर्दम ऋषि उनकी आज्ञा मानकर प्रणाम करके चले गये। मनु और शतरूपा को एक कन्या हुई जिसका नाम था देवहूति। वह कन्या बहुत ही सुन्दर और चरित्रवान थी। वह कन्या युवा हुई तो ब्रह्माजी ने मनु और शतरूपा को आज्ञा दी कि अपनी पुत्री का विवाह कर्दम ऋषि से करें। मनु और शतरूपा ने अपनी कन्या के विवाह के लिए अनेक स्वप्न सँजोये थे, परन्तु ब्रहमाजी की आज्ञा हो गयी तो वे मान गये। ब्रह्मा जी ने कर्दम ऋषि को भी आज्ञा दी कि वह देवहूति से विवाह करें। कर्दम ऋषि ने पूछा कि यदि वह कन्या मुझे पसन्द नहीं आई तो? ब्रह्माजी ने उन्हें आश्वासन दिया कि यदि पसन्द न आये तो विवाह मत करना। ऋषि ने वहाँ तीन आसन रखे और स्वयं वृक्ष के नीचे तपस्या करते रहे। जब मनु और शतरूपा देवहूति के साथ वहाँ आए तो कर्दम ऋषि ने उनका स्वागत किया तथा उन्हें आसन ग्रहण करने को कहा। मनु और शतरूपा आसन पर बैठ गए। देवहूति ने विचार किया कि कर्दम ऋषि तो बिना आसन के पेड़ के नीचे बैठे हुए हैं तो मैं आसन पर कैसे बैठ सकती हूँ? मैं उन्हें पति रूप में स्वीकार करने आयी हूँ, वे श्रेष्ठ ऋषि भी हैं। यदि मैं आसन पर बैठती हूँ और वे बिना आसान के बैठे हैं, तो यह उनकी अवहेलना होगी, किन्तु उन्होंने कहा है कि आसन ग्रहण करो। यदि आसन स्वीकार न करूँ तो भी उनकी आज्ञा की अवहेलना होगी। इस प्रकार विचार करके देवहूति ने अपना एक हाथ उस आसन पर रखा तथा स्वयं आसान के निकट भूमि पर बैठ गई। कर्दम ऋषि देवहूति के शीलाचार से बहुत प्रसन्न हो गए। देवहूति ऋषि की परीक्षा में सफल हुई। कर्दम ऋषि ने उनसे कहा कि मैं विवाह करने को तैयार हूँ किन्तु मेरी शर्त है कि मैं एक पुत्र होने तक ही गृहस्थाश्रम में रहूँगा। ऐसी शर्त सुनकर मनु और शतरूपा ने देवहूति की तरफ देखा। उसने कहा कि जब ब्रह्माजी की आज्ञा है तो मैं, जैसी इनकी शर्त है, उसी तरह से विवाह करने को तैयार हूँ। मनु और शतरूपा देवहूति का पाणिग्रहण करवा कर वापस लौट गए। अगले दिन से कर्दम ऋषि अपनी नित्य दिनचर्या में वैसे ही लग गए जैसे वह पहले रहते थे। प्रतिदिन सुबह उठना, ध्यान-पूजा में लग जाना, धर्म ग्रन्थों को पढ़ना, शास्त्रों को पढ़ना और रात्रि में सो जाना। इस प्रकार कई वर्ष बीत गए। देवहूति उनकी सारी व्यवस्था करती और वह अपने इसी आचरण में लगे रहते। इस सब में इतना समय बीत गया कि देवहूति के कुछ बाल भी सफेद हो गए, शरीर भी कृषकाय हो गया, वस्त्र भी मैले-कुचैले हो गये। एक दिन सायंकाल में कुछ लिखते समय दीपक में तेल समाप्त होने के कारण ऋषि ने और तेल डालने को कहा। जब देवहूति ने दीपक में तेल डाला तो दीपक की बढ़ी हुई लौ में ऋषि को एक कृषकाय और वृद्ध महिला दिखाई दी। ऋषि ने पूछा कि देवी! तुम कौन हो? देवहूति ने कहा कि मैं मनु और शतरूपा की पुत्री हूँ और आपकी पत्नी हूँ, ब्रह्माजी की आज्ञा से हमारा विवाह हुआ था। ऋषि ने कहा कि हाँ! याद आया। तुम कब से यहाँ हो? तुम इतने समय से यहाँ पर हो तुमने मुझसे कभी बताया क्यों नहीं? देवहूति ने कहा कि मैं तो तब से यहीं हूँ। आपके पास समय ही कहाँ है? आप अपनी दिनचर्या में हमेशा तल्लीन रहते हैं। ऋषि बहुत आश्चर्यचकित तथा प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रेमभाव से उसे देखा और कहा कि मैं तुम्हारी तपस्या से और जो तुमने मेरी सेवा की है, उससे बहुत प्रसन्न हूँ। ऋषि ने देवहूति से वरदान माँगने को कहा। देवहूति ने सोचा कि इनकी कुटिया में है ही क्या जो मुझसे वरदान माँगने को कह रहे हैं? ऋषि ने उसे बोला कि जाओ सरोवर में स्नान करके आओ। आश्रम के निकट जो सरोवर था, देवहूति वहाँ स्नान करने आई। जैसे ही डुबकी लगाकर बाहर निकली तो जिस प्रकार पहले नवयौवना थी, वैसी ही हो गयी। अपने शरीर को वापस पहले जैसा पाकर वह बहुत प्रसन्न हो गई। उसने आकर ऋषि को प्रणाम किया। ऋषि ने फिर पूछा, बताओ! तुम्हें क्या चाहिए? देवहूति सोचने लगी कि क्या माँगू? उसके मन की इच्छा जानकर जैसे ही ऋषि ने हाथ से इशारा किया, वहाँ स्वर्ण का एक महल प्रकट हो गया, जिसमें अनेक दास-दासियाँ उपलब्ध थीं। देवहूति ने कहा, “मैं इसका क्या करूँगी? आप तो इसमें चलकर रहेंगे नहीं! मुझे तो आपके साथ समय व्यतीत करना है। आप मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करें, ऐसी मेरी इच्छा है। कर्दम ऋषि ने कहा कि मुझे स्वीकार है। ऋषि ने जहाँ सङ्केत किया, वहाँ एक सुन्दर दिव्य विमान प्रकट हो गया। भागवत् जी में डेढ़ पृष्ठ में इस विमान की टेक्नोलॉजी का वर्णन मिलता है। उसके अन्दर अनेक प्रकार के कृत्रिम पेड़-पौधे, अनेक प्रकार के कृत्रिम रोबोटिक हिरण, मोर आदि पशु तथा सर्वकाले सुखिनः अर्थात् एसी आदि सुविधाओं का वर्णन वहाँ पर मिलता है। ऋषि ने विमान से देवहूति को नौ वर्षों में नौ लोकों की यात्रा करवाई। इस यात्रा में कर्दम ऋषि तथा देवहूति को नौ कन्याएँ हुईं। कला, अरुन्धति, अनुसूया, श्रद्धा, गति, क्रिया, ख्याति, शान्ति, तथा हविर्भू। नौ वर्ष के बाद जब कर्दम ऋषि वापस उस स्थान पर आए तो उन्होंने देवहूति से कहा कि अब तुम अपनी कन्याओं के साथ आराम से इस महल में निवास करो। देवहूति ने उन्हें पुत्र की बात याद दिलाई। ऋषि ने कहा, समय आने पर स्वयं श्रीभगवान नारायण तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। समय आने पर जब पुत्र का जन्म हुआ तो ऋषि ने कहा, अब शर्त पूरी हो गई। अब मुझे जाना होगा। देवहूति ने उनसे कहा कि कुछ समय तो अपने पुत्र का सुख ले लीजिए तो ऋषि ने कहा कि मुझे पुत्र का कोई सुख नहीं चाहिए। देवहूति रोने लगी और कहने लगी कि मुझे भी साथ लेकर जाइए, आप अपना उद्धार कर लेंगे किन्तु मेरा उद्धार किस प्रकार होगा? कर्दम ऋषि ने कहा यह जो पुत्र जन्मा है, वह स्वयं नारायण हैं। यह संसार में एक नए योग को देने के लिए आया हैं। जब यह पुत्र बड़ा होगा तो यह स्वयं तुम्हें उपदेश देगा जिससे तुम्हारा मोक्ष होगा। कपिल ऋषि जब बारह वर्ष के हो गए तो उन्होंने देवहूति को साङ्ख्ययोग का उपदेश दिया। यह संसार में साङ्ख्यदर्शन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अद्भुत है यह दर्शन और अद्भुत है यह योग।

हमारे सारे पुराण, सारे ग्रन्थ- रामायण, महाभारत, स्मृतियाँ, श्रीमद्भगवद्गीता, यह सभी साङ्ख्यदर्शन पर ही आधारित हैं। कपिल मुनि ऋषि भी हैं और श्रीभगवान के अवतार भी हैं। कपिल मुनि के श्राप से ही राजा सगर के सात हज़ार पुत्र भस्म हो गये थे। फिर बाद में राजा सगर की परम्परा में भगीरथजी ने गङ्गाजी को पृथ्वी पर लाकर उन पुत्रों को तारा था। जिस स्थान पर कपिल ऋषि ने देवहूति को उपदेश दिया था, उस स्थान को कपिलवस्तु के नाम से जाना जाता है। उसी कपिलवस्तु में बुद्धजी का भी जन्म हुआ।

साङ्ख्य का अर्थ है सङ्ख्या। इस योग में दो से लेकर अट्ठाईस तक की अलग-अलग सङ्ख्याएँ बतायी गयी हैं। इसे एक स्लाइड से समझने का प्रयास करेंगे-

 

सबसे पहले एक का विचार किया गया- एकोब्रह्म द्वितीयोनास्ति। यह एक सङ्ख्या हो गयी। लेकिन साङ्ख्य-योगियों ने कहा कि एक से काम नहीं चलेगा। कम से कम दो तो माननी पड़ेंगी- प्रकृति और पुरुष एक जड़-तत्त्व है और एक चेतन-तत्त्व है, तो दो तत्त्वों का विचार हुआ।

फिर सोचा गया कि जब तक महत् (बुद्धि) और समष्टि (अहङ्कार) इनसे नहीं मिलते, तब तक इस ब्रह्माण्ड का निर्माण नहीं होता। इस प्रकार तीन और चार की सङ्ख्या हुई। फिर किसी ने कहा कि इन चार से भी क्या का होगा? मन, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का क्या होता है? तो पाँचवाँ मन, छः से दस तक पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, ग्यारह से पन्द्रह तक पाँच कर्मेन्द्रियाँ शामिल की गईं। फिर किसी ने कहा कि इससे भी क्या होगा? मात्राएँ और महाभूत तो चाहिए। पाँच मात्राएँ, अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध तथा पाँच महाभूत, अर्थात् आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। इस प्रकार साङ्ख्य योगियों ने अपनी-अपनी दृष्टि से अलग-अलग, इन पच्चीस सङ्ख्याओं का विचार किया। कुछ ने अट्ठाईस का भी किया है क्योंकि इन पच्चीस में सत्त्व, रज और तम नहीं आए हैं।

इस प्रकार साङ्ख्ययोग के विचारकों ने दो से अट्ठाईस तक की सङ्ख्याओं की विवेचना की है।  

इस समष्टि अङ्ग का सत्त्व अंश मन, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय है, तमस अंश पाँच मात्राएँ और पाँच महाभूत हैं तथा रजस अंश से सारी प्रेरणा, सारा काम होता है। यह विषय बहुत विस्तार के हैं। यहाँ केवल सङ्केत रूप में समझाया गया है।

 
दूसरे अध्याय के आरम्भ से पूर्व अर्जुन ने श्रीभगवान से रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करने को कहा। यदि श्रीभगवान चाहते तो अर्जुन के रथ को दुर्योधन के सामने खड़ा कर सकते थे, तो यह श्रीमद्भगवद्गीता कही ही नहीं जाती। श्रीभगवान ने मोहग्रस्त अर्जुन को उत्तम वैद्य की तरह पितामह भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने खड़ा किया। जब अर्जुन ने दोनों को देखा तो युद्ध न करने के लिए श्रीभगवान को तर्क देने लगे तब श्रीभगवान मुस्कुरा रहे थे।



2.1

सञ्जय उवाच
तं(न्) तथा कृपयाविष्टम्, अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं(व्ँ) वाक्यम्, उवाच मधुसूदनः॥2.1॥

संजय बोले - वैसी कायरता से व्याप्त हुए उन अर्जुन के प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं (और) आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही है, भगवान् मधुसूदन यह (आगे कहे जाने वाले) वचन बोले।

विवेचन- सञ्जय बोले- “इस प्रकार करुणा से व्याप्त, आँसुओं से पूर्ण व्याकुल नेत्रों वाले, शोकयुक्त अर्जुन को भगवान मधुसूधन ने यह वचन बोले”-


2.2

श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं(व्ँ), विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम्, अकीर्तिकरमर्जुन॥2.2॥

श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन! इस विषम अवसर पर तुम्हें यह कायरता कहाँ से प्राप्त हुई, (जिसका कि) श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, (जो) स्वर्ग को देने वाली नहीं है और कीर्ति करने वाली भी नहीं है।

विवेचन- यहाँ श्रीभगवान ने पाँच बातों से अर्जुन को फटकार लगाई। कश्मल का अर्थ होता है कालिख या मैल। श्रीभगवान कहते हैं कि “इस असमय तुम्हें यह कश्मल किस हेतु प्राप्त हुआ? हे अर्जुन! तुम उत्तम पुरुषों के कुल में जन्मे हो, तुम्हारा आचरण भी उत्तम है। तुमने सदा देवताओं का सङ्ग पाया है। सदा उत्तम आचरण किया है। अभी तुम जो बात कर रहे हो, वह अनार्य बात है। तुम मध्यम पुरुषों जैसा भी आचरण नहीं कर रहे हो। जो तुम कर रहे हो, उससे स्वर्ग नहीं मिलेगा। तुम तो निम्न पुरुषों जैसी बात कर रहे हो, उससे न तो कल्याण मिलेगा, न ही उससे यश मिलेगा।”  

यहाँ अनार्य का अर्थ आर्य जाति से सम्बद्ध नहीं है। यहाँ आर्यता का अर्थ उत्तम है।


2.3

क्लैब्यं(म्) मा स्म गमः(फ्) पार्थ, नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं(म्) हृदयदौर्बल्यं(न्), त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥2.3॥

हे पृथानन्दन अर्जुन ! इस नपुंसकता को मत प्राप्त हो; (क्योंकि) तुम्हारे में यह उचित नहीं है। हे परन्तप ! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता का त्याग करके (युद्ध के लिये) खड़े हो जाओ।

विवेचन- अब श्रीभगवान ने अर्जुन को और भी कठोर बातें कहीं। अर्जुन जैसे वीर को, जिसने हर युद्ध जीता है, श्रीभगवान कहते हैं, “हे अर्जुन तुम नपुंसक हो।” अर्जुन, जिसने सभी देवी देवताओं को परास्त किया है, अकेले पूरी कौरव सेना को परास्त किया है, उसे श्रीभगवान कहते हैं, “अर्जुन! तुम नपुंसक मत बनो। यह तुम्हारे लिए ठीक नहीं है। तुम परम तपस्वी हो, तुमने तपस्या करके महादेव को प्रसन्न किया है। हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग करके युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।”


2.4

अर्जुन उवाच
कथं(म्) भीष्ममहं(म्) सङ्ख्ये, द्रोणं(ञ्) च मधुसूदन।
इषुभिः(फ्) प्रति योत्स्यामि, पूजार्हावरिसूदन॥2.4॥

अर्जुन बोले - हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध कैसे करूँ? (क्योंकि) हे अरिसूदन! (ये) दोनों ही पूजा के योग्य हैं।

विवेचन- अर्जुन को लगा कि श्रीभगवान उसकी बात को समझ नहीं पाए हैं तो वह दोबारा से अपनी बात उनके समक्ष रखते हैं और उन्हें दो सम्बोधन देते हैं। वह कहते हैं, “हे मधुसूदन! आपने मधु दैत्य का संहार किया है। हे अरिसूदन! मैं रणभूमि में भीष्म पितामह और आचार्य द्रोण के साथ बाणों के द्वारा कैसे युद्ध करूँ? ये दोनों ही पूजनीय हैं।” अर्जुन अपने बचपन के उन पलों को याद कर रहे हैं, जब वह खेलते हुए घर लौटते थे तथा भीष्म पितामह उन्हें देख लेते थे और कहते थे कि “अरे अर्जुन! तुम मेरे पास आओ”। वे अपने श्वेत वस्त्रों के मैले होने का भी ध्यान नहीं रखते थे। 

अर्जुन कहते थे, पितामह मेरे वस्त्र मैले हैं, आपके श्वेत वस्त्र खराब हो जाएँगे, लेकिन उन्हें अपने श्रेष्ठ वस्त्रों का कोई ध्यान नहीं होता था। वे अर्जुन को गले से लगा लेते थे। जिन गुरु ने मुझे अपने पुत्र से भी बढ़कर माना, अपने पुत्र से बढ़कर मुझे शिक्षा दी, जिन्होंने मुझे वचन दिया कि मैं तुम्हें सर्वश्रेष्ठ योद्धा बनाऊँगा और उस वचन को पूरा किया। अश्वत्थामा को केवल ब्रह्मास्त्र चलाना सिखाया, उसे लौटाने की विधि नहीं सिखायी, परन्तु उन्होंने अर्जुन को दोनों विद्याएँ सिखायी थीं। उन्होंने अपने पुत्र को वह विद्या नहीं दी जो अर्जुन को दी। अर्जुन मन में यही विचार कर रहे हैं कि मैं उन्हें कैसे मार सकता हूँ? गुरु द्रोण ने मेरे लिए एकलव्य का अङ्गूठा माँग लिया था। मेरे लिए इन्होंने कर्ण को विद्या देने से इनकार कर दिया। मेरे प्रेम में इन दोनों ने क्या-क्या नहीं किया है? इन दोनों पर मैं बाणों से कैसे वार कर सकता हूँ?


2.5

गुरूनहत्वा हि महानुभावान्,श्रेयो भोक्तुं(म्) भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव,
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥2.5॥

महानुभाव गुरुजनों को न मारकर इस लोक में (मैं) भिक्षा का अन्न खाना भी श्रेष्ठ (समझता हूँ); क्योंकि गुरुजनों को मारकर यहाँ रक्त से सने हुए (तथा) धन की कामना की मुख्यता वाले भोगों को ही तो भोगूँगा!

विवेचन- अर्जुन कहते हैं कि “गुरुजन को मारने की अपेक्षा मुझे इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना श्रेष्ठ लगता है। गुरुजनों को मारकर में इस लोक में रक्त से सने हुए अर्थ, काम आदि भोगों को ही तो भोगूँगा। इन भोगों के लिए मैं इन महापुरुषों का वध कर दूँ?” ऐसा नहीं है कि अर्जुन को भिक्षा माँग कर जीने का अर्थ पता नहीं है। लाक्षागृह की घटना के बाद एक वर्ष तक जब सब पाण्डव छिप कर रहते थे तो ब्राह्मण वेश में अर्जुन भिक्षा माँग कर ही जीवन व्यतीत कर रहे थे। उन्हें भिक्षा माँगने का अनुभव है।


2.6

न चैतद्विद्मः(ख्) कतरन्नो गरीयो,यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम:(स्),
तेऽवस्थिताः(फ्) प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥2.6॥

(हम) यह भी नहीं जानते (कि) हम लोगों के लिये (युद्ध करना और न करना, इन) दोनों में से कौन-सा अत्यन्त श्रेष्ठ है अथवा (हम उन्हें जीतेंगे) या (वे) हमें जीतेंगे। जिनको मारकर (हम) जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्रके सम्बन्धी (हमारे) सामने खड़े हैं।

विवेचन- अर्जुन कह रहे हैं कि हम तो यह भी नहीं जानते कि युद्ध करना और न करना, इन दोनों में से कौन सा श्रेष्ठ है? अगर आपकी आज्ञा के अनुसार युद्ध किया भी जाए तो हम उनको जीतेंगे या वे हमको जीतेंगे, इसका भी तो पता नहीं है? उनकी सेना में भी तो भीष्म पितामह, अश्वत्थामा, द्रोणाचार्य, दुर्योधन आदि बड़े-बड़े धनुर्धर हैं। युद्ध होगा तो कोई भी जीत सकता है। हो सकता है कि हम ही मारे जाएँ। जिन को मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे सम्बन्धी हमारे सामने खड़े हैं। युद्ध करना सही है या नहीं, वह भी नहीं पता और परिणाम सही है या नहीं, यह भी नहीं पता है।


2.7

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः(फ्),पृच्छामि त्वां(न्) धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः(स्) स्यान्निश्चितं(म्) ब्रूहि तन्मे,
शिष्यस्तेऽहं(म्) शाधि मां(न्) त्वां(म्) प्रपन्नम्॥2.7॥

कायरता रूप दोष से तिरस्कृत स्वभाव वाला (और) धर्म के विषय में मोहित अन्तःकरण वाला (मैं) आपसे पूछता हूँ (कि) जो निश्चित कल्याण करने वाली हो, वह (बात) मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये।

विवेचन- यह अद्भुत श्लोक है। इस एक श्लोक को गीता का आधारभूत श्लोक कहा गया है। शास्त्रकारों ने कहा है कि यदि अर्जुन ने यह श्लोक न कहा होता तो सम्भवत: श्रीभगवान ने श्रीमद्भगवद्गीता न कही होती। श्रीमद्भगवद्गीता का मूल आरम्भ इसी श्लोक को माना गया है। इसके पहले केवल कथानक है। यहाँ जो अर्जुन ने बीज डाला है,  उन्होंने श्रीभगवान को कारण दे दिया कि वे श्रीमद्भगवद्गीता कहें।  

अर्जुन के श्रीभगवान के साथ कई प्रकार के सम्बन्ध हैं- अर्जुन योद्धा हैं तो श्रीभगवान उनके सारथी हैं। अर्जुन श्रीभगवान के बहनोई हैं। उनकी बहन सुभद्रा के साथ अर्जुन का विवाह हुआ है। दोनों के मध्य मित्रता का सम्बन्ध भी है, लेकिन इन सभी सम्बन्धों को अर्जुन ने नकार कर श्रीभगवान से गुरु-शिष्य का सम्बन्ध बनाया। अर्जुन कहते हैं कि “मैं आपके द्वारा अपने लिए कायरता रूपी दोष को स्वीकार करते हुए यह मानता हूँ कि मेरे मन में कायरता आ गई है। मैं अपनी बुद्धि से इस विषय में कुछ निर्णय नहीं ले पा रहा हूँ।” 

महाभारत का युद्ध हुआ, अर्जुन की आयु उस समय लगभग तिरासी (83) वर्ष की थी तथा भगवान श्रीकृष्ण की सत्तासी (87) वर्ष के लगभग थी। इस समय युद्ध में तिरासी वर्ष के नीतिज्ञ, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, श्रीभगवान शिव का दर्शन करने वाले, देवताओं को युद्ध में परास्त करने वाले अर्जुन थे, वे कोई साधारण मनुष्य नहीं थे। उन्होंने जीवन में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, वे अन्य किसी के जीवन में ढूँढना भी मुश्किल है। जितने दिव्यास्त्र अर्जुन ने अपने जीवन में प्राप्त किए थे, उतने इतिहास में किसी ने भी कभी प्राप्त नहीं किए। अर्जुन के बाद यदि किसी के पास सबसे अधिक दिव्यास्त्र मिलते हैं तो वे परशुरामजी हैं। अर्जुन के पास लगभग सारे दिव्यास्त्र थे।

वह व्यक्ति, जिसने धर्म और नीति का इतना अधिक पालन किया, पूरे महाभारत ग्रन्थ में अर्जुन ने नीति तथा धर्म की भूल नहीं की। जब द्यूतक्रीड़ा में कौरवों ने पाण्डवों के ऊपर इतना अनाचार किया, अर्जुन ने एक शब्द भी नहीं बोला। अर्जुन के समक्ष उर्वशी जैसी अप्सरा खड़ी हो गयी। उन्होनें बोला कि मैं तुम्हें श्राप दे दूँगी तो अर्जुन ने कहा कि मुझे आपका श्राप स्वीकार है, लेकिन मैं आपको माता की दृष्टि से ही देख सकता हूँ। बिना अपराध के एक वर्ष तक नपुंसक बनने का श्राप स्वीकार कर लिया। अपने शील के कारण श्राप प्राप्त करने वाले भी सम्भवतः अर्जुन अकेले व्यक्ति होंगे।  

इतने धर्मज्ञ व्यक्ति श्रीभगवान से कह रहे हैं कि “इस समय मेरी बुद्धि धर्म के विषय में मोहित हो गयी है। मैं सही और गलत में भेद नहीं कर पा रहा हूँ। इसलिए आप मेरे कल्याण की बात कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ।” 

यदि हमारे समक्ष ऐसी स्थिति हो कि हम किसी समस्या के समाधान के लिए किसी बड़े की सलाह लेने जाते हैं तो हम चाहते हैं कि जो हमारे मन में चल रहा है, वही सुझाव हमें सामने वाले से मिल जाये। अर्जुन ने यह नहीं कहा कि मैं युद्ध न करूँ, इसका उपाय बताइये। उन्होंने कहा कि जिसमें मेरा सौ प्रतिशत कल्याण है, ऐसा उपाय बताइये। आप अपनी शरण देकर मुझे स्वीकार कीजिये।

अर्जुन की यह बात सुनकर श्रीभगवान गदगद हो गये। उन्होंने कहा कि अब तुम चिन्ता मत करो। मैं तुम्हें ऐसी-ऐसी कल्याण की बात बताऊँगा, जो विश्व में कभी नहीं कही गयी। फिर श्रीभगवान ने कल्याण का खजाना ही खोल दिया। समय कम था, इसलिए सूत्रात्मक कहा। सात सौ श्लोकों में ऐसी गीताजी को प्रकट कर दिया जो आज तिरपन सौ वर्षों बाद भी बिलकुल नयी सी लगती है। आज के काल में भी इतनी उपयोगी लगती है कि लगता ही नहीं कि यह तो उस काल की बात है, हमारे काम की नहीं है।  

यह श्लोक अद्भुत है। सन्त-महापुरुषों ने इस श्लोक की बहुत महिमा गायी है। यह बहुत मङ्गलकारी है। सन्तों ने कहा है कि जीवन में यदि किसी दुविधा में फँस जाएँ, मन अशान्त हो, जहाँ आपको किसी बात का कोई उत्तर न मिल रहा हो, इस श्लोक की एक सौ आठ माला का जाप करने से आपको आपका उत्तर अवश्य मिल जाएगा। ग्यारह बार इस श्लोक को लिखें, फिर उस पृष्ठ को श्रीमद्भगवद्गीता में रख लें और फिर इस ग्रन्थ को अपने हृदय से लगाकर इस श्लोक का स्मरण करते-करते सो जाएँ। श्रीभगवान किसी न किसी रूप में आकर आपकी शङ्का का समाधान करने के लिए आपको प्रेरणा प्रदान करेंगे, ऐसा शास्त्रकारों ने कहा है। अर्जुन ने श्रीभगवान को गुरु रूप में स्वीकार किया।  आइये एक गुरु-स्तुति करें और अपने-अपने गुरुदेव का स्मरण करें-

 


हमें भी अपने कल्याण की बात ज्ञात हो। गुरु के विषय में तो हम पूरे सम्मोहन में हैं और कार्पण्यदोषो, हमने तो कहा है कि जब भी जीवन में सही-गलत का निर्णय लेना होता है, हम सबसे आसान चुन लेते हैं। गुरुकृपा से हमारी बुद्धि भी धर्म में स्थित हो जाये।  

'जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा, करहु सो बेगि दास मैं तोरा'  

नारदजी का मोह नष्ट न हो पाता, अगर उन्होंने यह चौपाई न कही होती। श्रीभगवान ने बन्दर बनाकर भी उनका कल्याण कर दिया।

कई बार ऐसा भी होता है कि जब आप श्रीभगवान की शरण में जाते हैं तो परिस्थितियाँ और प्रतिकूल दिखने लगती हैं। ध्यान रखिएगा कि जब भी ऐसा हो रहा है, वह हमारे कल्याण का ही सङ्केत है।


2.8

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्,यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं(म्),
राज्यं(म्) सुराणामपि चाधिपत्यम्॥2.8॥

कारण कि पृथ्वी पर धन-धान्य समृद्ध (और) शत्रुरहित राज्य तथा (स्वर्ग में) देवताओं का आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियों को सुखाने वाला मेरा जो शोक है, (वह) दूर हो जाय (ऐसा मैं) नहीं देखता हूँ।

विवेचन- अर्जुन आगे कहते हैं कि भूमि में निष्कण्टक धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामी बनने को प्राप्त होकर भी मैं ऐसा कुछ नहीं देखता कि इन्द्रियों को सुखाने वाला मेरा जो शोक है, वह दूर हो जाए। यहाँ अर्जुन ने एक विशिष्ट बात कही है। महाभारत का युद्ध जीतने से कोई देवताओं का राजा अर्जुन नहीं बन जाता, परन्तु अर्जुन ने इसका अनुभव किया हुआ है। वे ऐसे ही नहीं कह रहे। हम लोग कभी-कभी कह देते हैं कि सारी धरती एक ओर हो जाए, परन्तु यहाँ पर हमारे लिए धरती एक ओर कहाँ होने वाली है? ऐसी कोई हमारी स्थिति भी नहीं है, परन्तु अर्जुन की ऐसी स्थिति है।  

जब अर्जुन अमरावती में इन्द्र के दरबार में पहुँचे तो देवताओं ने अर्जुन का स्वागत किया। इन्द्र की सभा में जब अर्जुन पहुँचे तो सारे देवता उठकर खड़े हो गए। अर्जुन अपने लिए बैठने का आसन देखने लगे कि मैं कहाँ बैठूँ? इन्द्र ने अर्जुन से कहा  कि तुम सीधे चले आओ। अर्जुन को कुछ आश्चर्य सा लगा, पर इन्द्र की आज्ञा थी इसलिए वे ऊपर चले गए। इन्द्र अर्जुन का हाथ पड़कर उन्हें अपने आसन तक ले गए और कहा- बैठ जाओ। इन्द्र ने कहा कि तुम मेरे बेटे जैसे हो, प्रिय हो और गुणी भी हो। आओ कुछ समय के लिए इन्द्रपद का आनन्द भी ले लो। अर्जुन ने वैसे ही किया, उन्होंने देखा कि सारे देवता पङ्क्तिबद्ध खड़े हैं। अर्जुन ने कुछ ही क्षणों के लिए क्यों न हो देवताओं के राजा का अनुभव लिया। सारे देवता उनके सामने खड़े हैं और अर्जुन सिंहासन पर बैठे हुए हैं।

अर्जुन फिर से शोकग्रस्त हो गये।


2.9

सञ्जय उवाच एवमुक्त्वा हृषीकेशं(ङ्), गुडाकेशः(फ्) परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दम्, उक्त्वा तूष्णीं(म्) बभूव ह॥2.9॥

संजय बोले - हे शत्रु तापन धृतराष्ट्र! ऐसा कहकर निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अन्तर्यामी भगवान् गोविन्द से 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' ऐसा साफ-साफ कहकर चुप हो गये।

2.9 writeup

2.10

तमुवाच हृषीकेशः(फ्), प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये, विषीदन्तमिदं(व्ँ) वचः॥2.10॥

हे भरतवंशोद्भव धृतराष्ट्र! दोनों सेनाओं के मध्य भाग में विषाद करते हुए उस अर्जुन के प्रति हँसते हुए से भगवान् हृषीकेश यह (आगे कहे जाने वाले) वचन बोले।

विवेचन- सञ्जय बोले, “निद्रा को जीतने वाले अर्जुन, अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण के प्रति इस प्रकार कहकर कि-

  "हे गोविन्द! मैं युद्ध नहीं रूँगा” अर्जुन चुप हो गये। अभी ये बातें सुनकर श्रीभगवान को तो दबाव में आ जाना चाहिए था परन्तु सञ्जय कहते हैं, “हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण दोनों सेनाओं के मध्य भाग में शोक करते हुए उस अर्जुन के प्रति हँसते हुए ये वचन बोले-” 

अब यहाँ यह बात बहुत ही कठिन है। यहाँ अर्जुन जिस स्थिति में हैं, श्रीभगवान को बहुत गम्भीरता से बोलना चाहिए था परन्तु वे ऐसा न करते हुए हँसते हुए कहने लगे। अर्जुन ऐसे भी इतने साधारण व्यक्तित्व नहीं हैं कि श्रीभगवान उन पर हँस कर बोलें, परन्तु उन्होंने ऐसा ही किया। तो वे क्या बोले? यह हम अगले सत्र में देखते हैं।

इसके उपरान्त हरिनाम सङ्कीर्तन के साथ आज का सत्र समाप्त हो गया तथा प्रश्नोत्तर सत्र आरम्भ हुआ।  

हरि शरणम्, हरि शरणम्, हरि शरणम्, हरि शरणम्,

हरि शरणम्, हरि शरणम्, हरि शरणम्, हरि शरणम्,


प्रश्नोत्तर-


प्रश्नकर्ता- भारती दीदी

प्रश्न- आठवें श्लोक का अर्थ क्या है?

उत्तर- भूमि में यदि कोई निष्कण्टक राज्य मिल गया तो भी ऐसा नहीं लगता कि हमें बहुत सुख मिल जायेगा। देवताओं के स्वामी बन कर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ। अर्जुन यह बात इसलिये कह रहे हैं कि अर्जुन ने यह अनुभव किया है। जब दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिये अर्जुन स्वर्ग में गये तो इन्द्र ने एक दिन प्रसन्न होकर अर्जुन को अपने साथ सिंहासन पर बैठाया। अर्जुन इन्द्र का सिंहासन प्राप्त होने पर भी अपने पितामह एवम् गुरुवर की हत्या नहीं करना चाहते।


प्रश्नकर्ता- बजरंग भैया

प्रश्न- कर्म का सिद्धान्त क्या है? इतिहास में हिन्दू राजा हों या मुग़लकालीन बादशाह, अपने पिता भाई या मन्त्री द्वारा राजा को मार कर राजा बन बैठे और कई सौ वर्षों तक राज्य किया। इसे कैसे कर्म का सिद्धान्त कहा जाय?

उत्तर- किसी के भाग्य में यदि राजा बनने का योग है तो वह राजा बन गया, वह हत्या नहीं करता तो वह राजा बनता किन्तु पाप करके उसने कर्म को भी भविष्य के लिये जोड़ लिया। उनकी आने वाली पीढ़ियाँ भी राजा बनीं क्योंकि उनके भाग्य में भी राजा बनना लिखा था, इसीलिये  सबने उनके घर में जन्म प्राप्त किया। आठ सौ वर्ष तक अत्याचार पूर्वक राज्य करना हमारे आपके लिये विशाल समय खण्ड है किन्तु प्रकृति के लिये यह कुछ भी नहीं है, हम अपनी आयु के अनुसार प्रकृति का चिन्तन करते हैं। हमारी हैसियत सूर्य चन्द्र तारे या ब्रह्माण्ड के समय कुछ भी नहीं है। हमारे तीन सौ साठ वर्ष के बराबर देवताओं का एक वर्ष होता है


प्रश्नकर्ता- विद्याधर भैया

प्रश्न- कपिल मुनि और श्रीकृष्ण दोनों ही विष्णु के अवतार थे। श्रीकृष्ण के अनुसार श्रीभगवान हैं, साङ्ख्य दर्शन ईश्वर को मानता नहीं है। दोनों अलग कैसे हो सकते है?

उत्तर- साङ्ख्य दर्शन ईश्वर को ईश्वर रूप में नहीं मानता है, प्रकृति पुरुष परमात्मा तो मानते ही हैं, एकोब्रह्म द्वितीयो नास्ति- यही साङ्ख्य का मूल है।


प्रश्नकर्ता- ओम प्रसाद भैया

प्रश्न- बहुत से लोग नरक को मानते ही नहीं हैं। वे कहते हैं कि यह सब संसार में भय फैलाने के कारण किया जाता है, क्या यह सत्य है?

उत्तर- ये वही पढ़े लिखे लोग हैं जिन्होंने शास्त्रों को पढ़ा नहीं है और अपने को पढ़ा लिखा मानते है। नरक है और कर्मानुसार उनका फल भी भोगना पड़ता है।