विवेचन सारांश
दैवीय तथा आसुरी सम्पदाओं का मनन

ID: 6795
हिन्दी
रविवार, 20 अप्रैल 2025
अध्याय 16: दैवासुरसंपद्विभागयोग
2/2 (श्लोक 2-24)
विवेचक: गीता विशारद डॉ आशू जी गोयल


श्रीनारायण धुन, श्रीहरि तथा गुरु चरणों में वन्दन एवं गीता माँ की वन्दना के मधुर स्वरों के साथ आज के विवेचन सत्र का प्रारम्भ हुआ।

हमारे ऊपर ईश्वर की अतिशय मङ्गलमय कृपा के कारण ही हमारा परम सौभाग्य जागृत हुआ जिसके फलस्वरूप गीताजी का हमारे जीवन में आगमन हुआ। हम इसे अपने पितृजनों का आशीर्वाद, पूर्व जन्म के सुकृत या किसी महान सन्त के चरणों का प्रसाद मान सकते हैं, जिस कारण ईश्वर ने गीता पढ़ने के लिए हमें चुना।

पिछले तिरेपन सौ सालों से "गीता के समान दूसरा कोई ग्रन्थ नहीं है”, ऐसी घोषणा हमारे विद्वानों, आचार्यों एवं सन्त महात्माओं द्वारा की गयी है।

आदि शङ्कराचार्य जी भी गीता का महत्त्व बताते हुए कहते हैं कि-

गेयं गीता नाम सहस्रं ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्।
नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥२७॥

गीता गाओ। जो भी व्यक्ति भगवद्गीता गाएगा या थोड़ी सी भी धारण करेगा, यमराज उसकी ओर देखने का भी साहस नहीं करेंगे।

भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजललवकणिका पीता।
सकृदपि येन मुरारि समर्चा क्रियते तस्य यमेन न चर्चा ॥ २०॥ 

भगवद्गीता का स्वाध्याय करने वाला, इनके सूत्रों का पालन करने वाला सदैव विजयी एवम् प्रसन्न चित्त होगा। जीवन में यदि इसके अर्थ को समझें तो लाभ है ही, किन्तु यदि मात्र इसके श्लोकों का पठन करेंगे तो भी हमारा मस्तिष्क तीव्र और शान्त होता है। यह सहस्त्रों साधकों का अनुभव है। वे बताते हैं कि अभी-अभी हमने प्रवचन सुनने के लिए जाना प्रारम्भ किया है और अभी से ही हमें शान्ति का अनुभव होने लगा है।

इसका मुख्य कारण यह है कि यहाँ श्रीभगवान् ने किसी भी मार्ग का उल्लेख नहीं किया है। उदाहरण के लिए यदि आपको मुम्बई से दिल्ली जाना है तो आपके पास कई साधन हैं, जैसे पैदल, साइकिल से, रेलगाड़ी से अथवा हवाई जहाज से। अपने गन्तव्य पर पहुँचने पर आपको वही नगर मिलेगा जहाँ के लिए आप निकले थे। आप किस साधन से पहुँचे, यह महत्त्व नहीं रखता है इसीलिए श्रीकृष्ण मार्ग या साधन के आग्रही नहीं हैं।

आप कैसा तिलक लगाते हैं, यह महत्त्व नहीं रखता है। आप कैसी उपासना करते हैं इसके स्थान पर आपके जीवन में उस उपासना का क्या लाभ हो रहा है? यह अधिक महत्त्वपूर्ण है।

बारहवें अध्याय में श्रीभगवान् ने भक्त के उनतालीस लक्षण बताए हैं। यदि तुम स्वयं को भक्त समझते हो तो इन लक्षणों को अपने अन्दर पहचानो -

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।12.13।।

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.14।।

तुम कितना सुन्दर तिलक लगाते हो या कितनी सुन्दर आरती गाते हो, कितने घण्टे ध्यान में बैठते हो, इन बातों का उस परमात्मा के लिए कोई महत्त्व नहीं है। ये सब करने के साथ ही इनका परिणाम हमारे जीवन पर दिखाई देना चाहिए।

पन्द्रहवें अध्याय में श्रीभगवान् कहते हैं -
 
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः।।15.11।।

अनेक जन्मों तक यत्न करने के बाद भी अगर अन्तरात्मा की शुद्धि न की जाये तो कोई लाभ नहीं होता है। हमें अपने अन्तःकरण को शुद्ध करना होगा। हमें हमारे दृष्टिकोण को बदलना होगा। हमारे द्वारा किए गए स्वाध्याय से हमारे स्वभाव में अन्तर पड़ना चाहिए। यदि अभी भी हम वस्तुओं को उसी दृष्टिकोण से देखते हैं जैसे पहले देखते थे तो इसका अर्थ यह है कि हमारी साधना ऊपर-ऊपर ही चल रही है।

स्वास्थ्य लाभ के लिये जब हम जूस पीते हैं तब ही हमारे स्वास्थ्य में अन्तर आता है। प्रतिदिन जूस से भरे पात्र को देखने मात्र से हमारे स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसी प्रकार, भक्त के गुणों का आस्वादन करना पड़ता है, उन्हें धारण करना पड़ता है, इसलिए सोलहवें अध्याय में श्रीभगवान् ने छब्बीस दैवीय गुणों की सूची दी है। गत सप्ताह हमने पहले श्लोक में आठ दैवीय गुण देखे थे-

अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।।
 

अभय, सत्त्व की शुद्धि, ध्यान योग की स्थिति, दान, दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और आर्जव।

हे अर्जुन! तुम में दैवीय गुण हैं, तो देखो तुममें अभय है कि नहीं, दान करते हो कि नहीं। तुम इन्द्रियों का दमन करते हो कि नहीं। बिना किसी कामना के तुम कर्त्तव्यपालन करते हो या नहीं। थोड़ा तप करते हो या नहीं।

अब ग्रीष्म ऋतु में बहुत से लोग वातानुकूलित के बिना नहीं रह पाते हैं। इस पर से यदि विद्युत आपूर्ति रुक जाये तो पङ्खा बन्द होने से पहले ही उनके शरीर से स्वेद बहने लगता है। इस प्रकार के व्यक्ति तप नहीं कर सकते हैं। तप करना हो तो अधिकतम तापमान के समय एक से दो घण्टे तक विद्युत आपूर्ति होने के बाद भी पङ्खा बन्द करके बैठें। देखें हममें तप है या नहीं। एकाध समय भोजन न करके देखें।

हमारे द्वारा, मिली हुई अनुकूलता को त्यागना तप का परिचायक है। विभिन्न भोग विषयों में लगे हुए मन का व्यक्ति कभी तप नहीं कर सकता है। तप करने के लिए जीवन में थोड़ा सहन करने की प्रवृत्ति को अपनाना होगा।

“विवेक चूड़ामणि” में आदिशङ्कराचार्य जी ने छः साधनों में तितिक्षा को महत्त्व दिया है। यदि मन के अनुकूल कोई बात नहीं हो रही है तो सहन करो। हमारे घर में, समाज में, कार्यक्षेत्र में कहीं भी हमारे प्रतिकूल वातावरण हो सकता है, किन्तु उन परिस्थितियों में भी स्वयं को सहज बनाए रखना सहनशीलता का परिचायक है। यह सहनशीलता स्वाभाविक होनी चाहिए।

अब कुछ लोग सहन तो करते हैं किन्तु इस सहनशीलता का गुणगान वे स्वयं ही सबसे करते रहते हैं। हमें वस्तुओं को सरलता और प्रसन्नता से सहन करना है। अपने मस्तिष्क पर इसका भार नहीं रखना है कि मैं तो बहुत सहन कर रहा हूँ। कुछ व्यक्तियों को ऐसा स्वयं में ही प्रतीत होता है कि मैंने जितना सहन किया, दूसरा कोई नहीं कर सकता है। उसके आस-पास के लोगों को उसकी सहनशीलता का कोई आभास नहीं होता है किन्तु वह स्वयं ही अपने-आप को महान समझता है। कोई दूसरा आपको कभी भी महान नहीं कह सकता है। तप करने के लिए हिमालय अर्थात् एकान्त में जाने की आवश्यकता नहीं होती है। प्रतिकूल परिस्थिति में प्रसन्न रहना भी तप के समान ही है।

आर्जव तो माता शबरी की कथा के द्वारा ही दिखा सकते हैं। हम दम्भ में अपना जीवन जीते हैं। जिस व्यक्ति को खाने में अधिक रुचि होती है वह सबको बताता है कि हम भोजन नहीं कर पा रहे हैं, जबकि उसका सम्पूर्ण ध्यान भोजन पर ही लगा हुआ है। ऐसे व्यक्ति को देखकर समझ लेना चाहिए कि इसकी मात्र खाने में ही रुचि है। हम जो नहीं है, स्वयं को दूसरों के सामने वही प्रदर्शित करते में लगे रहते हैं। जीवन सरल होना चाहिए।

जितना धन हमारे पास है, उससे ज्यादा धनी हम स्वयं को दिखाना चाहते हैं। कोई व्यक्ति मूल्यवान गाड़ी के साथ अपना छायाचित्र खिञ्चवाता है और मोबाइल पर स्टेटस लगाता है। दूसरा व्यक्ति प्रभावित होकर उससे पूछता है कि कब ली तो उत्तर देने के स्थान पर वह हँसकर बात को टाल देता है।

जितना ज्ञान है उससे ज्यादा ज्ञानी स्वयं को प्रस्तुत करते हैं। बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने से क्या परिवर्तन आ जाएगा? प्रत्येक स्थान पर हम दम्भ ही करते हैं। जितना आपके पास है उससे द्विगुणित दिखा भी नहीं सकते। अधिक से अधिक बीस या पच्चीस प्रतिशत अधिक दिखा सकते हैं किन्तु इससे क्या परिवर्तन आ जाएगा? मूल्यवान वस्तुएँ जैसे पर्दे, सोफा, मोबाइल इत्यादि लेने से क्या हो जायेगा।

हम कितनी भी मूल्यवान वस्तुओं का क्रय करें, उनसे मूल्यवान वस्तुएँ भी संसार में उपलब्ध हैं। एक फोन से अधिक मूल्यवान दूसरा फोन। एक घर से बड़ा दूसरा घर। हम कितना भी बड़ा घर बना लें, उससे भी अच्छा और बड़ा कोई दूसरा घर हो सकता है।

हम जिस स्थान पर हैं उससे थोड़ा ऊपर वाला हमें और अधिक अच्छा लगता है। उन्नति की कोई सीमा नहीं होती है। उन्नत होने की बलवती इच्छा से हम अशान्त हो जाते हैं। जीवन में हमें उच्चतम की नहीं सरलतम की आवश्यकता है।

आर्जव अर्थात् जीवन सरल हो। हमें अत्यधिक उन्नति, प्रतियोगिता एवम् उच्चतम की आवश्यकता नहीं है। प्रत्येक वस्तु और परिस्थिति से उच्चतर वस्तु और परिस्थिति उपलब्ध है, किन्तु हमारी आवश्यकता हमें समझनी होगी।

16.2

अहिंसा सत्यमक्रोध:(स्), त्यागः(श्) शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं(म्), मार्दवं(म्) ह्रीरचापलम्।।16.2।।

अहिंसा, सत्य भाषण, क्रोध न करना, संसार की कामना का त्याग, अन्तःकरण में राग-द्वेष जनित हलचल का न होना, चुगली न करना, प्राणियों पर दया करना, सांसारिक विषयों में न ललचाना, अन्तःकरण की कोमलता, अकर्तव्य करने में लज्जा, चपलता का अभाव।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि अहिंसा का अर्थ मात्र माँसाहारी न होना ही नहीं है। मनसा, वाचा और कर्मणा अर्थात् मन से, वाणी से और कर्म से मेरे द्वारा किसी को कष्ट न पहुँचे, यह भी अहिंसा है। किसी को अप्रिय वचन बोलकर हम प्रसन्न होते हैं। यह हमारे द्वारा वाणी द्वारा की गई हिंसा है। हमारे शब्दों द्वारा अथवा व्यवहार के द्वारा यदि दूसरों को कष्ट हो रहा है तो यह हिंसा है।

कुछ व्यक्तियों का स्वभाव होता है कि वे अपने व्यवहार द्वारा दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयत्न करते हैं। उन्हें यह समझ में नहीं आता है कि उनके व्यवहार से लोगों को कष्ट पहुँच रहा है, उदाहरण के लिए आप मन्दिर जाते हैं। वहाँ अपनी चप्पलें रखने के लिए आप दूसरों की चप्पलों को एक ओर कर देते हैं। आपको अनुमान भी नहीं है कि यह भी एक प्रकार की हिंसा है- कर्म की हिंसा। यदि अपना कार्य सिद्ध करने हेतु हम दूसरों को कष्ट पहुँचाते हैं तो हम हिंसा करते हैं।

सत्य- सारे दैवीय गुणों की रीढ़ की हड्डी है- सत्य।
लोग प्रायः सत्य का दुरुपयोग करते हैं।
नीति शास्त्र कहता है -
सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात।
न ब्रूयात सत्यम् अप्रियम्॥

सत्य बोलो, प्रिय बोलो किन्तु अप्रिय सत्य कदापि मत बोलो। जिस सत्य से किसी को कष्ट पहुँचे ऐसा सत्य नहीं बोलना चाहिए।

सत्रहवें अध्याय में श्रीभगवान् कहते हैं कि सत्य बोलने के साथ उसके दो गुण साथ में लो -

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।1
7.15।।

एक तो सत्य सुनने में प्रिय हो और दूसरा हितकारी होना चाहिए अर्थात् सर्वदा वही सत्य बोलना चाहिए जो प्रिय और हितकारी हो।

प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः।

कुछ लोग प्रिय लगने वाला असत्य बोलते हैं, यह भी अनुचित है। प्रिय लगने वाला असत्य बोलकर दूसरों की चापलूसी करने के गुण से सदैव हानि होती है। ऐसे लोग मुख के सामने व पीठ के पीछे भिन्न-भिन्न होते हैं, इसलिए सदैव सत्य बोलने का अभ्यास करते रहना चाहिए। सत्य का मार्ग आरम्भ में तो कष्टदायक प्रतीत होता है परन्तु एक बार यदि कठिनाई पर विजय प्राप्त कर ली तो फिर आपका जीवन अत्यन्त सरल हो जाता है। सत्य के साथ जीवन जीने वाले व्यक्ति का जीवन उत्कृष्ट व आनन्ददायक हो जाता है। भले ही थोड़े समय के लिये वह कष्ट में दिखे किन्तु ईश्वर की प्राप्ति भी ऐसे ही व्यक्तियों को होती है।

अक्रोध- अभी यदि मैं हाथ खड़े करने के लिये कहूँ तो सबके हाथ खड़े हो जायेंगे कि क्रोध किसे-किसे आता है? क्रोध और अहङ्कार की विशेषता है कि आप जितना करेंगे ये दोनों उतने ही बढ़ते जाएँगे और जितना छोड़ेंगे उतने ही कम होते जाएँगे।

एक पति-पत्नी सदैव आपस में विवाद करते रहते थे। उनके पड़ोसी बहुत परेशान रहते थे। पति सवेरे नौ बजे अपने कार्यालय जाता था तो नित्य उनका विवाद समाप्त हो जाता था। एक दिन रविवार को अवकाश था तो उनका वाद विवाद चलता ही रहा। एक पड़ोसी ने अत्यधिक त्रस्त हो जाने के पश्चात् घरेलू हिंसा बचाने के लिये उनके घर की घण्टी बजायी। द्वार खुलने पर घर के स्वामी द्वारा आने का कारण पूछने पर पड़ोसी ने बताया कि वह उनकी कुशल-क्षेम पूछने आया है। उस व्यक्ति का क्रोध थोड़ा सा शान्त हुआ। उनकी चर्चा और आगे बढ़ने पर पड़ोसी ने कहा कि आपके घर से अत्यधिक ध्वनि सुनायी दे रही थी तो पति को पुनः क्रोध आ गया। वह व्यक्ति अपनी पत्नी को भला-बुरा कहने लगा। यह सुनकर उसकी पत्नी भी बाहर आ गयी। वह भी अपने पति के लिये अपशब्द बोलने लगी। पड़ोसी फिर से त्रस्त हो गया और बोला कि कि आप दोनों आज के विवाद का कारण बताइए। इस बात पर दोनों चुप हो गये। बार-बार पूछने पर वह व्यक्ति कहने लगा कि छः-आठ घण्टे हो गए, विवाद का कारण हमें अब स्मरण नहीं है कि विवाद किस कारण से उत्पन्न हुआ था?

ऐसा ही होता है कि कभी-कभी विवाद करते-करते हमें मूल कारण का विस्मरण हो जाता है और बाद में में कारण स्मरण आने पर लज्जा आती है। क्रोध को जितना बल देंगे वह बढ़‌ता ही जाता है। दियासलाई जलाने पर उसे जितना कपास देते जायेंगे सारा कपास स्वाहा होता जाएगा और आग बढ़ती ही जाएगी। ठीक उसी प्रकार क्रोध बढ़ाने से बढ़ेगा और दबाने से समाप्त होता जायेगा।
     
प्रश्न : क्रोध क्यों आता है?
उत्तर : क्रोध की विशेषता है कि क्रोध एक अवलम्बित भावना है। हमें बैठे-बैठे क्रोध नहीं आता है। क्रोध आने के पीछे एक कारण होता है। कामना, अहङ्कार, मोह या लोभ में विघ्न पड़ने पर ही क्रोध आता है। हम जैसा चाहते हैं वैसा नहीं होने पर क्रोध आता है। हमारे अहङ्कार को ठेस लगने पर हमें क्रोध आता है। हम जिसके मोहपाश में बॅंधे हैं उस व्यक्ति के दूर हो जाने पर भी हमें क्रोध आ जाता है। जो वस्तु हमें अत्यधिक प्रिय है उसके छिन जाने के बाद भी हमें क्रोध आएगा। सबसे बड़ी बात यह है कि सबकुछ हमारे अनुसार ही चलना चाहिए नहीं तो हमें क्रोध आ जाएगा।

प्रधानमन्त्री जी या राष्ट्रपति जी के अनुसार भी सबकुछ शत-प्रतिशत नहीं होता है, फिर हम तो अति साधारण लोग हैं। इस अव्यवहारिक कामना के कारण हमारा क्रोध बढ़ता है। सब कुछ हमारे अनुसार हो यह कामना हमें त्याग देनी चाहिये। एक मन्त्र है, उसे हमें गाॅंठ बाॅंध लेना चाहिये-

ॐ इग्नोराय नमः।

वस्तुओं और परिस्थितियों को अनदेखा करना चाहिये।

त्याग- हमारे पास जो वस्तुएँ हैं उनका हम सहजता पूर्वक त्याग कर सकें। उदाहरणार्थ मैंने इच्छापूर्वक चाय का त्याग कर दिया है। ध्यान दीजिए यह इच्छापूर्वक किया गया त्याग है, परन्तु यदि मैं कुछ लोगों के साथ बैठा हूँ और सबको चाय दी गयी और मुझे नहीं तो मुझे बुरा लगा, यह त्याग नहीं है। अब मान लिजिए उस व्यक्ति ने भूलवश मुझसे नहीं पूछा तब मैंने भी उस बात पर ध्यान नहीं दिया और चाय नहीं पी। इसे सहज त्याग कहते हैं।

कुछ मिलने वाला था, नहीं मिला तो भी मैं सहज हूॅं, यह त्याग है।
अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ध्वज लहराना ये वामपन्थी नीतियाॅं हैं। यह पश्चिमी सभ्यता और दर्शन है। भारतीय जीवन दर्शन में ऐसी प्रथा नहीं है। किसी भी पुराण या ग्रन्थ में इसका उल्लेख नहीं मिलता है। हमारे राष्ट्र में इसका विपरित दर्शन है। जिसमें श्रीरामजी वन को जाते हैं तो श्रीभरतजी उनके पीछे-पीछे आकर उन्हें मनाते हैं कि आपका राज्य आप ही सम्भालिये और फिर श्रीरामजी की चरण पादुका ले जाकर उनके आर्शीवाद से राज्य का सञ्चालन करते हैं। हम अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्कृति के लोग नहीं हैं अपितु दूसरों के अधिकार के लिए अपना अधिकार त्यागने वाले लोग हैं।

शान्ति- बारहवें अध्याय में हमने पढ़ा था-

"त्यागाछान्तिरनन्तरम् ।

अर्थात् त्याग से ही शान्ति आती है। जो व्यक्ति जितना त्याग करेगा उसके जीवन में उतनी ही शान्ति आयेगी। यदि आप त्याग करना नहीं जानते हैं तो आपके जीवन में कभी शान्ति नहीं आयेगी। आपका जीवन घोर अशान्ति से भर जायेगा। अपने अधिकारों की चिन्ता करने वाला व्यक्ति कभी शान्ति से नहीं सो सकता है।

प्रज्ञाचक्षु स्वामी शरणानन्दजी महाराज का सूत्र है-
'दूसरों का कर्त्तव्य मेरा अधिकार नहीं है।'

यह शान्ति का सूत्र है। 

यदि कोई अपना कर्त्तव्य नहीं करेगा तो इसकी चिन्ता मुझे नहीं करनी है। विधि सबको उनके कर्त्तव्यों का फल देगी। किसी को उसके कर्त्तव्यों का ज्ञान कराना हमारा कार्य नहीं है, क्योंकि यह आवश्यक नहीं है कि आपके समझाने से वह व्यक्ति समझ जाये। इसके विपरीत यदि वह आपकी बात नहीं मानेगा तो आपको अशान्ति मिलेगी।

अपैशुनम्- पैशुनम का अर्थ है चुगली करना। चुगली करना एक रसयुक्त दोष है अर्थात् यह वह दोष है जिसमें हमें अति आनन्द का आभास होता है। जैसे कभी हमें घाव हो जाने पर उसमें खुजली होती है। बार-बार मना करने पर भी हम उसे खुजलाये बिना नहीं रह पाते हैं, जबकि हमें ज्ञात होता है कि खुजलाने से हमारा धाव बिगड़ सकता है। फिर भी कुछ समय के लिये खुजलाने से हमें जो क्षणिक शान्ति मिलती है तो उससे हम स्वयं को नहीं रोक पाते हैं, ठीक इसी प्रकार, चुगली या निन्दा करने से बुरा ही होगा, यह जानते हुए भी हम स्वयं को रोक नहीं पाते हैं।

उदाहरण के लिये, कुछ व्यक्ति अपने घर में कार्य करने वाली स्त्री के आने पर सबसे पहले उसे बैठाकर चाय पिलाते हुए उससे आस-पास का समाचार लेते हैं। कुछ लोग तो अकारण ही फोन पर इधर-उधर के व्यक्तियों की निन्दा करते हैं। यह अनुचित है।

निन्दा न करने को अपैशुनम् कहते हैं। यह दैवीय गुण है।

दया- सभी जीवों पर दया करनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को किसी वस्तु की आवश्यकता हमसे अधिक है तथा हम उसे वह वस्तु दे देते हैं तो उसे दया कहते है। 

मान लीजिए दो भाई हैं। एक को किसी वस्तु की आवश्यकता है तथा दूसरे के पास वह वस्तु है और उसे उसकी आवश्यकता भी नहीं है, तो दूसरे ने उसे दे दी। अकारण ही आवश्यकता न होते हुए भी वह वस्तु दूसरे को इसलिये न देना कि वह आपके अधिकार की वस्तु है, यह अत्यन्त अनुचित है। दया में पात्र के दोष का विचार नहीं करना चाहिए।

दया करते समय उपदेश नहीं देना चाहिए। यह घाव पर नमक छिड़कने जैसा होता है। यदि कोई व्यक्ति कष्ट में है तो उस समय मात्र उसकी सहायता करनी चाहिये। सहायता करते समय उसे परामर्श देने से उसे और कष्ट पहुँचता है।

अलोलुप्त्वम्- अलोलुप्त्वम् का अर्थ है किसी दूसरे की वस्तु को देखकर लोभ न करना। कुछ व्यक्ति किसी के घर जाकर उनके परदे, सोफा, फोन यहाँ तक कि किसी के जामाता अथवा पुत्रवधू तक को देखकर यह कामना करते हैं कि काश ऐसा मुझे भी मिल जाये। कभी-कभी तो हमें आवश्यकता नहीं होती है फिर भी मात्र इसलिये कि वह वस्तु हमें अच्छी लगी हम उस वस्तु की इच्छा करने लगते हैं।

कुछ लोग बिना मूल्य बॅंटने वाली प्रचार पुस्तिका (Pamphlet) भी जाने किस लोभ में ले लेते हैं भले ही उन्हें उसका उपयोग न ज्ञात हो। मन्दिर में प्रसाद बॅंट रहा है तो एक के स्थान पर दो ले लेते हैं। यह लोलुपता है। अलोलुपता दैवीय गुण है। यह गुण व्यक्ति के नेत्रों से पता चल जाता है।

मार्दवम्- कोमलता एक दैवीय गुण है।

कुछ लोग हर कार्य को शीघ्रता से और तीक्ष्णता के साथ करते हैं, उनके व्यवहार और वाणी में कोमलता नहीं होती है। वे अपना मुख भी सदैव कठोर बनाकर रखते हैं। अपनी वाणी को सदैव औषधीय लेप के समान बनाकर रखना चाहिए, जिससे प्रत्येक व्यक्ति को प्रसन्नता का अनुभव हो। अपने आचरण, वाणी और व्यवहार में कोमलता लानी चाहिए। विचारों से कठोर और आचरण में मृदु होना चाहिए।

ह्रीर- मेरे द्वारा कोई न करने वाला कार्य हो गया हो अथवा मेरे द्वारा कोई अनुचित आचरण हो गया हो उसके लिये लज्जा।

अनुचित कार्य या व्यवहार हो जाना बहुत बड़ी बात नहीं है किन्तु उस व्यवहार पर हमें लज्जा आ रही है या हम बहाने बनाकर अपनी गलती को छुपा रहे हैं। यह बात अधिक महत्त्वपूर्ण है।

मनुज गलती का पुतला है
जो अक्सर हो ही जाती है।
मगर करले ठीक गलती को,
उसे इन्सान कहते हैं।
पराया दर्द अपनाए
उसे इन्सान कहते हैं।

अपने अपराध के लिये कारण देना अदैवीयता है। अपने अनुचित कृत्य पर लज्जित होना दैवीय गुण है।

जो व्यक्ति बहाने बनाता है, उसकी त्रुटियाॅं कभी ठीक नहीं होती है। इसके विपरीत जो लज्जित होता है, जिसे आत्मग्लानि होती है वही व्यक्ति स्वयं में सुधार ला सकता है।

अचापलम्- जीवन में चञ्चलता का अभाव। यह नेत्रों से पहचाना जाने वाला गुण है। कुछ व्यक्तियों के नेत्रों में चपलता बहुत अधिक होती है। 

एक बड़े उत्तम सन्त हैं- महन्त क्षमारामजी शास्त्री। क्षमारामजी सात-सात घण्टे बैठकर रामायण का पाठ करते हैं। यह उनकी विशिष्टता है कि वे एक ही आसन पर बैठे-बैठे पूरी रामायण अथवा महाभारत पुस्तक पर दृष्टि रखते हुए बिना हिले-डुले सम्पूर्ण पढ़ सकते हैं।

यह अचञ्चलता या अचपलता है। अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण है।

16.3

तेजः क्षमा धृतिः(श्) शौचम्, अद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं(न्) दैवीम्, अभिजातस्य भारत।।16.3।।

तेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीर की शुद्धि, वैर भाव का न होना (और) मान को न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! (ये सभी) दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए मनुष्य के (लक्षण) हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! हमारे जीवन में तेज आना चाहिए।

प्रश्न- तेज कैसे आएगा ?
उत्तर- भोजन से रस बनेगा। रस से रक्त बनेगा। रक्त से माँस बनेगा। माॅंस से मज्जा (bone marrow) बनेगी। मज्जा से अस्थि, अस्थि से वीर्य। वीर्य से ओज और ओज से तेज। यही सप्तधातु प्रकिया है। 

हमारा कितना प्रभाव है? यह हमारे तेज पर निर्भर करता है। हमारे परिवार या समाज में कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, उनका तथा उनकी बातों का सभी आदर करते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनमें तेज होता है। किसी-किसी व्यक्ति की बात कोई नहीं मानता है क्योंकि उनकी वाणी में तेज नहीं होता है। अपने जीवन को तेजस्वी बनाना चाहिए।

क्षमा- यह एक ऐसा गुण है जो माॅंगना सब चाहते हैं परन्तु देना कोई नहीं चाहता है। स्वयं से कोई त्रुटि होने पर हमें क्षमा की अपेक्षा रहती है किन्तु दूसरे के द्वारा त्रुटि होने पर हम न्यायाधीश बन जाते हैं। हमें इसका विपरीत करना है। अपनी त्रुटि के लिये न्यायाधीश और दूसरे की त्रुटि के लिये वकील बनना है।

कुछ लोग क्षमा तो कर देते हैं परन्तु जिस व्यक्ति को क्षमा किया था उसे बारम्बार यह अनुभव करवाते हैं कि मैंने तुम्हें एक बार क्षमा किया था। मान लीजिए कोई माता अपने शिशु को पुनः-पुनः कहे कि उस दिन मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया था तो वह शिशु भी सोचेगा कि इससे तो अच्छा था कि उसी दिन आप क्षमा करने के स्थान पर सबकुछ कह देतीं।

अङ्ग्रेजी में एक कहावत है-
क्षमा कीजिए और भूल जाइए (Forgive, forget)

क्षमा करो और भूल जाओ। सच्ची क्षमा वही है जहाँ क्षमा करके उसे विस्मृत कर दिया जाये। यदि क्षमा करने के बाद भी आपको पुनः-पुनः यह स्मरण होता हो कि मैंने किसी व्यक्ति को किसी दिन क्षमा किया था तो वह क्षमा व्यर्थ है। स्वयं को क्षमा मत करो किन्तु दूसरों को सदैव क्षमा करो।

धृति- धैर्य जीवन में अवश्य आना चाहिए। आज के समय में किसी के पास धैर्य नहीं है। मैं शीघ्रता से कुम्भ में पहुँच जाऊँ। शीघ्रता से स्नान करके शीघ्रता से दर्शन हो जाएँ। ऐसा व्यक्ति कुम्भ स्नान करके भी दुःखी रहता है। सारी घटनाओं को प्राकृतिक रूप से ही घटने देना चाहिए।

कुछ लोग थोड़ी सी गीताजी पढ़ते हैं और श्रीभगवान् को प्राप्त करना चाहते हैं।

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय॥

यदि हम पौधे में सौ घड़े जल भी डाल दें तब भी उसमें फल या फूल तभी आयेंगे जब उनका आना निश्चित है। किसी भी कार्य को प्राकृतिक रूप से होने में जितना समय लगता है वह लगेगा ही। जिस वृक्ष को फल आने में पाँच वर्ष लगने हैं, उसमें पाॅंच वर्ष के पश्चात् ही फल लगेंगे।

शुचिता अथवा शौच- इस शब्द का कोई एक अङ्ग्रेजी अर्थ नहीं है। (Hygine and sacrad) स्वच्छता और पवित्रता। इन दोनों को मिलाकर जो शब्द बनेगा वह है शुचिता।

कोविड काल में हमने सेनेटाइजर  (Sanitizer) का उपयोग सीखा। अभी भी कुछ व्यक्ति सेनेटाइजर (Sanitizer) से हाथ स्वच्छ करके भोजन करने लगते हैं। कीटाणु मारने हेतु तो सेनेटाइजर (Santizer) का उपयोग उचित है किन्तु मरने के बाद भी वे कीटाणु आपकी हथेलियों पर ही रह जाते हैं। जब आप उन्हीं हाथों से भोजन करते हैं तो वही कीटाणु आपके उदर में चले जाते हैं।

स्वच्छता एक बात है किन्तु पवित्रता एक अलग बात है। (Bisleri) बोतल बन्द जल स्वच्छ होता है और अभी यह बताया गया था कि सङ्गम का जल कम स्वच्छ है किन्तु मरने वाले के मुख में तो गङ्गाजल ही डाला जायेगा क्योंकि बन्द बोतल का जल स्वच्छ भले ही हो परन्तु पवित्र तो गङ्गाजल ही होगा।

हमारा आचरण पवित्र होना चाहिए। स्वच्छता के साथ-साथ पवित्रता भी आवश्यक है। बहते जल में हाथ धोने के स्थान पर टिशु पेपर से हाथ पोञ्छ लेने का आजकल का प्रचलन न तो स्वच्छता पूर्ण है और न ही पवित्रता पूर्ण। इस आचरण से हमें ईश्वर प्राप्ति नहीं होगी।

नातिमानिता - स्वयं को ही सबकुछ मानना। स्वयं पर अहङ्कार करना अर्थात् अपने पास उपलब्ध वस्तुओं पर अहङ्कार करना। ऐसा व्यक्ति स्वयं भी दुःखी रहता है और दूसरों को भी दुःखी करता है।

अपना मान रखना अच्छा गुण है किन्तु प्रत्येक स्थान पर अपना मान ही करवाने की अपेक्षा रखना तथा स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना अनुचित है। 
ऐसा व्यक्ति मात्र यही देखता रहता है कि उसका अपमान कब और कहाँ हुआ था? लोग समझाते भी हैं कि हमारा ध्यान नहीं था, क्षमा भी माँगते हैं किन्तु वह व्यक्ति किसी की बात नहीं सुनता है। जिसका स्वभाव ही नातिमानिता का हो जाता है, वह प्रत्येक स्थान पर अपने मान की ही अपेक्षा करता है। इससे वह दुःखी रहता है।

हे अर्जुन! ये सारे छब्बीस गुण दैवीय सम्पदा के साथ उत्पन्न हुए व्यक्ति के लक्षण है।

16.4

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च, क्रोधः(फ्) पारुष्यमेव च।
अज्ञानं(ञ्) चाभिजातस्य, पार्थ सम्पदमासुरीम्।।16.4।।

हे पृथानन्दन ! दम्भ करना, घमण्ड करना और अभिमान करना, क्रोध करना तथा कठोरता रखना और अविवेक का होना भी - (ये सभी) आसुरी सम्पदा को प्राप्त हुए मनुष्य के (लक्षण) हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् यहाँ दम्भ, दर्प और अभिमान - इन तीन शब्दों को कहते हैं।

अभिमान का अर्थ है स्वयं पर गर्वित होना। मैं अर्थात् अहम् होने का अर्थ है अभिमानी होना।

दर्प का अर्थ है अपनी वस्तुओं पर गर्व होना। अपनी पत्नी, अपने बच्चे, अपनी सम्पत्ति - इन सब पर गर्व होना दर्प कहलाता है।

दम्भ का अर्थ है  झूठा दिखावा करना अर्थात् हमारे पास कुछ भी नहीं है किन्तु उन वस्तुओं का मिथ्या अभिमान करना।

मान लीजिए नित्य हम अल्प समय की छोटी सी पूजा करते हैं, किन्तु किसी अतिथि के आने पर उसे दिखाने के लिये दीर्घ काल तक पूजा करते रहना, यह दम्भ है।

दम्भ, दर्प तथा अभिमान आसुरी प्रवृत्ति के लक्षण हैं।

क्रोध - क्रोध आसुरी सम्पदा का लक्षण है। कई बार हमें अपने क्रोध के क्षण में किये गये व्यवहार पर पश्चाताप होता है। हमें बाद में दुःख होता है। बहुत बार इससे हमारी हानि हो जाती है।

पारुष्य अथवा कठोरता- मार्दवम् का विलोम शब्द कठोरता है। 

कुछ व्यक्ति कठोर हृदय के होते हैं। केदारनाथ धाम में जब बाढ़ आयी थी तब एक सज्जन कहने लगे कि वहाँ के लोगों के साथ ऐसा ही होना चाहिए था। वे गङ्गा जी के तट पर मदिरापान करते थे। उन लोगों को सहायता नहीं मिलनी चाहिए। वहाँ के लोग कितने कष्ट में हैं, उनका घर-द्वार चला गया, बच्चे भूखे हैं। इस समय यह सोचना कितनी कठोरता का चिह्न है। लोग अपने परिजनों, सम्बन्धियों, पशुओं, वृक्षों के साथ भी कठोर व्यवहार करते हैं।

कुछ लोग अपने घर में कार्य करने वाले व्यक्ति के अस्वस्थ होने पर उन्हें औषधि खिलाकर भी उनसे कार्य करवाते हैं। उन्हें विश्राम नहीं करने देते हैं।

अज्ञान- किसी वस्तु का ज्ञान न होना अज्ञान नहीं है अपितु किस वस्तु का ज्ञान नहीं है, यह न जानना भी अज्ञान है। ज्ञान न होने पर व्यक्ति को लगता है कि उसके पास बहुत ज्ञान है।

सुकरात ने कहा, "मैं जितना पढ़ता गया, मैं उतना ही जानता गया कि मैं क्या नहीं जानता हूॅं।"

हमें जितना ज्ञान प्राप्त होता है उतना ही अपनी अज्ञानता का आभास भी होता जाता है। अज्ञानता आसुरी गुण है।

16.5

दैवी सम्पद्विमोक्षाय, निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः(स्) सम्पदं(न्) दैवीम्, अभिजातोऽसि पाण्डव।।16.5।।

दैवी सम्पत्ति मुक्ति के लिये (और) आसुरी सम्पत्ति बन्धन के लिये मानी गयी है। हे पाण्डव! (तुम) दैवी सम्पत्ति को प्राप्त हुए हो, (इसलिये तुम) शोक (चिन्ता) मत करो।

विवेचन- दैवीय सम्पदा सदैव मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा सदैव बाँधने के लिये मानी गयी है।

हे अर्जुन! तुम इन सभी दैवीय गुणों से युक्त हो।

ज्ञात हो कि अर्जुन को श्रीभगवान् ने गीता का उपदेश इसी पात्रता के कारण दिया था क्योंकि वे समस्त दैवीय सम्पदाओं से युक्त थे।

16.6

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्, दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः(फ्) प्रोक्त , आसुरं(म्) पार्थ मे शृणु।।16.6।।

इस लोक में दो तरह के ही प्राणियों की सृष्टि है -- दैवी और आसुरी। दैवी को तो (मैंने) विस्तार से कह दिया, (अब) हे पार्थ! (तुम) मुझसे आसुरी को (विस्तार) से सुनो।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! इस प्रकृति में कुल दो ही प्रकार के मनुष्य पाए जाते हैं।

एक वे जो दैवीय गुणों से युक्त हैं तथा दूसरे वे जो आसुरी गुणों से युक्त हैं।

दैवीय प्रकृति को मैंने विस्तार से बता दिया है, अब आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्यों के बारे में तुम विस्तार से सुनो।

16.7

प्रवृत्तिं(ञ्) च निवृत्तिं(ञ्) च, जना न विदुरासुराः।
न शौचं(न्) नापि चाचारो, न सत्यं(न्) तेषु विद्यते।।16.7।।

आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य किस में प्रवृत होना चाहिये और किससे निवृत्त होना चाहिये (इसको) नहीं जानते और उनमें न तो बाह्य शुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्य-पालन ही होता है।

विवेचन- आसुरी प्रवृत्ति के मनुष्य न अपनी प्रवृत्तियों को जानते हैं और न ही इनकी निवृत्ति के बारे में सोच पाते हैं। उन्हें पता ही नहीं है कि वे कुछ गलत कर रहे हैं तो उनका इससे बाहर निकलते का तो प्रश्न ही नहीं उठता। न तो उनका आचरण पवित्र एवं शुद्ध होता है और न ही उनकी वाणी में सत्यता होती है। 

16.8

असत्यमप्रतिष्ठं(न्) ते, जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसम्भूतं(ङ्), किमन्यत्कामहैतुकम्।।16.8।।

वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, बिना मर्यादा के (और) बिना ईश्वर के अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से पैदा हुआ है। (इसलिये) काम ही इसका कारण है, इसके सिवाय और क्या कारण है? (और कोई कारण हो ही नहीं सकता।)

विवेचन- आसुरी स्वभाव वाले व्यक्ति सदैव असत्य का साथ देते हैं, वे परमात्मा की सत्ता को नहीं मानते हैं। वे इस संसार को आश्रयहीन मानते हैं। उनके अनुसार यह संसार काम (भोग) पर आश्रित है तथा यह सृष्टि महाविस्फोट सिद्धान्त (Big Bang theory) के आधार पर बनी है।

इन लोगों का मानना है कि पहले हम सब मनुष्य वानर थे और अब मानव बन गए हैं। इन सभी से एक प्रश्न है कि जो अभी वानर हैं वे कब तक मानव बनेंगे?

इस प्रकार की बातें प्रायः वामपन्थी दल के व्यक्ति करते हैं। उनके प्रत्येक विचार में उनकी वाम (उल्टी) बुद्धि का परिचय प्राप्त होता है।
नवरात्रि में जब सम्पूर्ण संसार देवी माँ की उपासना करता है तब ये लोग महिषासुर की वन्दना करते हैं।

देश विदेश से साठ-पैंसठ करोड़ लोग महाकुम्भ में स्नान करने आए वहाँ भी इन लोगों की श्रद्धा के स्थान पर मृत्यु-कुम्भ ही दिखाई दिया। ऐसे लोग न तो कुछ भी शुभ देख पाते हैं और न ही समझ पाते हैं।

16.9

एतां(न्) दृष्टिमवष्टभ्य, नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः, क्षयाय जगतोऽहिताः।।16.9।।

इस (पूर्वोक्त) (नास्तिक) दृष्टि का आश्रय लेने वाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूप को नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्र कर्म करने वाले (और) संसार के शत्रु हैं, उन मनुष्यों की सामर्थ्य का उपयोग जगत का नाश करने के लिये ही होता है।

विवेचन- जिनका स्वभाव इस मिथ्या ज्ञान को मानकर नष्ट हो गया है, ऐसे लोग मन्दबुद्धि, क्रूरकर्मी और अपकार करने वाले बन जाते हैं तथा वे सदैव दूसरों का बुरा और विनाशकारी कार्य ही करते हैं।
 
स्मरण कीजिए कि वामपन्थियों ने आज तक कभी किसी के साथ भलाई का कार्य नहीं किया है। पिछले सौ वर्षों का इतिहास उठाकर देखें तो हमें यह ज्ञात होता है कि इन्होंने मात्र नाश ही किया, कभी कोई निर्माण नहीं करवाया। चाहे वह कोई भी देश क्यों न हो?

16.10

काममाश्रित्य दुष्पूरं(न्), दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्, प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः।।16.10।।

कभी पूरी न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर दम्भ, अभिमान और मद में चूर रहने वाले (तथा) अपवित्र व्रत धारण करने वाले मनुष्य मोह के कारण दुराग्रहों को धारण करके (संसार में) विचरते रहते हैं।

 विवेचन- ये व्यक्ति सदा दम्भ, मान और मद् से युक्त हो कर किसी भी प्रकार से पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेते हैं तथा अज्ञान के मिथ्या सिद्धान्तों को ग्रहण करते हैं। साथ ही भ्रष्ट आचरण करके इस संसार में विचरण करते हैं। इनके सिद्धान्त भी स्वयं बनाये हुए होते हैं जिनका अनुसरण भी ये स्वयं ही करते हैं। जैसा कि पहले भी बताया गया है कि ईश्वर के स्थान पर ये महिषासुर की पूजा करते हैं।

16.11

चिन्तामपरिमेयां(ञ्) च, प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा, एतावदिति निश्चिताः।।16.11।।

(वे) मृत्यु पर्यन्त रहने वाली अपार चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले, पदार्थों का संग्रह और उनका भोग करने में ही लगे रहने वाले और 'जो कुछ है, वह इतना ही है' - ऐसा निश्चय करने वाले होते हैं।

विवेचन- आसुरी प्रवृत्ति के लोग मृत्यु पर्यन्त रहने वाली असङ्ख्य चिन्ताओं के आश्रय में रहते हैं। ये सदा भोगों में फँसे रहते हैं और सांसारिकता को ही सुख मानते हैं। ऐसे लोग संसार के सारे व्यसन करते हैं तथा अनैतिक आचरण करते हुए अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

16.12

आशापाशशतैर्बद्धाः(ख्), कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थम्, अन्यायेनार्थसञ्चयान्।।16.12।।

(वे) आशा की सैकड़ों फाँसियों से बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर पदार्थों का भोग करने के लिये अन्याय पूर्वक धन-संचय करने की चेष्टा करते रहते हैं।

विवेचन- जो मनुष्य आशा की सैकड़ों फाँसियों से बँधे रहकर काम और क्रोध के अधीन रहते हैं तथा अपने विषय भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धन कमाने का जो भी पाप करते हैं, वह उनकी आशाओं के कारण ही होता है। ये आशाएँ हमें बीमार कर देती हैं। ये कभी समाप्त नहीं होतीं हैं।

ये इच्छाएँ किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति की हो सकती हैं। इनमें से व्यक्ति और परिस्थिति तो हमारे नियन्त्रण में नहीं हैं किन्तु वस्तुएँ खरीदना हमारे नियन्त्रण में है। हम जब छोटे थे तब हमारी अलग इच्छाएँ थीं और अब बड़े होने के बाद और बड़ी-बड़ी इच्छाएँ हैं।

जब तक घर नहीं होता है, तब तक हमें घर की कामना होती है। जब घर बन जाता है तब थोड़े बड़े घर की। एक मोबाइल के बाद दूसरा और दूसरे के बाद तीसरा। इस प्रकार एक आशा पूर्ण होने पर अगली आशा से हम बँधे हुए हैं।

एक बालक ने अपने पिताजी से चिड़ियाघर ले जाने का अनुरोध किया। यदि पिताजी उसे ले जाते हैं तो वह पुनः कोई और इच्छा लेकर उनसे हठ करेगा और यदि नहीं ले गए तो रोएगा।

सुख की आशा से कोई व्यक्ति कभी सुखी नहीं होता है। आशाओं को पूर्ण करने हेतु व्यक्ति कई अनैतिक कार्य करता है। आशा पूर्ण करने में निर्धन हो या धनवान दोनों की एक सी स्थिति बनी हुई है। जो निर्धन है वह धनवान होना चाहता है। जो धनवान है वह और अधिक धनवान होना चाहता है। सब अपनी परिस्थिति से ऊपर की ओर उठना चाहते हैं।

सन्तों का कहना है कि सुखी होना है तो आशा की रस्सी को बाँध दो।



16.13

इदमद्य मया लब्धम्, इमं(म्) प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे, भविष्यति पुनर्धनम्।।16.13।।

वे इस प्रकार के मनोरथ किया करते हैं कि - इतनी वस्तुएँ तो हमने आज प्राप्त कर लीं (और अब) इस मनोरथ को प्राप्त (पूरा) कर लेंगे। इतना धन तो हमारे पास है ही, इतना (धन) फिर भी हो जायगा।

विवेचन- आसुरी प्रवृत्ति के लोग यह सोचते हैं कि आज मैंने इस वस्तु की प्राप्ति की है और अब मैं अपने अगले मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास इतना धन है कि जो मैं प्राप्त करना चाहता हूॅं  वह बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाएगा। जिसके साथ ऐसा होता है वह मोहजाल में फँसता ही जाता है।

16.14

असौ मया हतः(श्) शत्रु:(र्), हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं(म्) भोगी, सिद्धोऽहं(म्) बलवान्सुखी।।16.14।।

वह शत्रु तो हमारे द्वारा मारा गया और (उन) दूसरे शत्रुओं को भी (हम) मार डालेंगे। हम ईश्वर (सर्व समर्थ) हैं। हम भोग भोगने वाले हैं।हम सिद्ध हैं, (हम) बड़े बलवान (और) सुखी हैं।

विवेचन- मैंने आज एक शत्रु का हनन किया है तो अब भविष्य में दूसरे शत्रुओं का भी नाश कर डालूँगा। मैं ही ईश्वर हूँ और ऐश्वर्य का भोक्ता हूँ। मैं सभी सिद्धियों से युक्त हूँ।

हिरण्यकश्यप की कथा को स्मरण कीजिए। उसने ईश्वर की उपासना बन्द करवाकर अपनी ही पूजा करवाना प्रारम्भ कर दिया था।

ऐसे व्यक्ति स्वयं को बलवान और सुखी समझते हैं। इनकी आशाएँ कदापि पूर्ण नहीं होनी चाहिए, नहीं तो इनकी राक्षसी प्रवृत्ति में वृद्धि होती जायेगी।

16.15

आढ्योऽभिजनवानस्मि, कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य, इत्यज्ञानविमोहिताः।।16.15।।

हम धनवान हैं, बहुत से मनुष्य हमारे पास हैं, हमारे समान दूसरा कौन है? (हम) खूब यज्ञ करेंगे, दान देंगे (और) मौज करेंगे - इस तरह (वे) अज्ञान से मोहित रहते हैं।

 विवेचन- ऐसे व्यक्ति सोचते हैं कि मैं बड़ा धनी हूॅं और विशाल कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान भाग्यवान् अन्य कोई नहीं है। 

दुर्योधन एवं कर्ण को स्मरण कीजिए। उन्हें भी यही लगता था कि वे बलशाली हैं और उनका कभी अन्त नहीं हो सकता है।

16.16

अनेकचित्तविभ्रान्ता, मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः(ख्) कामभोगेषु, पतन्ति नरकेऽशुचौ।।16.16।।

(कामनाओं के कारण) तरह-तरह से भ्रमित चित्त वाले, मोह-जाल में अच्छी तरह से फँसे हुए (तथा) पदार्थों और भोगों में अत्यन्त आसक्त रहने वाले मनुष्य भयंकर नरकों में गिरते हैं।

विवेचन- ऐसे व्यक्ति का विचार होता है कि मैं यज्ञ करूँगा, दान करूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार के अज्ञानी तथा आसुरी लोग सदैव मोह में रहते हैं। वे अनेक प्रकार से भ्रमित और विषय भोगों में आसक्त रहने वाले होते हैं। ये लोग अपवित्र होकर नरक में गिरते हैं।

16.17

आत्मसम्भाविताः(स्) स्तब्धा, धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते, दम्भेनाविधिपूर्वकम्।।16.17।।

अपने को सबसे अधिक पूज्य मानने वाले, अकड़ रखने वाले (तथा) धन और मान के मद में चूर रहने वाले वे मनुष्य दम्भ से अविधिपूर्वक नाममात्र के यज्ञों से यजन करते हैं।

विवेचन- ऐसे लोग स्वयं को ही श्रेष्ठ मानने वाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति अभिमानी तथा मान के मद में युक्त होकर नाम मात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्र विधि के बिना ही आचरण करते हैं।

आज के समय में ऐसे पाखण्डी बहुत हैं। उदाहरणार्थ कुछ लोग श्राद्ध कर्म नहीं करते हैं। पण्डितों को दक्षिणा देना उन्हें मिथ्या और व्यर्थ लगता है। उसके स्थान पर वे अनाथ आश्रम या वृद्ध आश्रम में भोजन बाॅंटने का सङ्कल्प करते हैं किन्तु वास्तविकता में करते कुछ भी नहीं हैं।

श्रीभगवान् की पूजा के पण्डाल बहुत लगने लगे हैं, जहाँ न पूजा शास्त्र विधि के अनुसार होती हैं न भजन। वहाँ न तो अन्न दान होता है, न ही कोई सेवा कार्य। आयोजक श्रीभगवान् जी का तो छोटा सा चित्र लगाते हैं और स्वयं का बहुत बड़ा चित्र लगवाकर स्वयं का प्रचार करते हैं। भक्ति गीतों के नाम पर फिल्मों के कर्णभेदी गाने बजाए जाते हैं।

इनका उद्देश्य धार्मिक आयोजन के पीछे स्वयं की प्रशंसा करवाने का होता है जो कि अनुचित है।

16.18

अहङ्कारं(म्) बलं(न्) दर्पं(ङ्), कामं(ङ्) क्रोधं(ञ्) च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु, प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।।16.18।।

(वे) अहंकार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोध का आश्रय लेने वाले मनुष्य अपने और दूसरों के शरीर में (रहने वाले) मुझ अन्तर्यामी के साथ द्वेष करते हैं (तथा) (मेरे और दूसरों के गुणों में) दोष दृष्टि रखते हैं।

विवेचन- ऐसे लोग सदैव बल, अहङ्कार और क्रोध में डूबे रहते हैं तथा सबकी निन्दा करते हैं। ऐसा व्यक्ति यह नहीं जानता है कि ऐसा करके वह अपने एवम् दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अन्तर्यामी से द्वेष करने वाला बन जाता है।

16.19

तानहं(न्) द्विषतः(ख्) क्रूरान् , संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभान्, आसुरीष्वेव योनिषु।।16.19।।

उन द्वेष करने वाले, क्रूर स्वभाव वाले (और) संसार में महानीच, अपवित्र मनुष्यों को मैं बार-बार आसुरी योनियों में ही गिराता ही रहता हूँ।

विवेचन- श्रीभगवान् बताते हैं कि ऐसे अधर्मी और पाखण्डियों को मैं बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ। उन्हें अगणित योनियों में जीवरूप में भिन्न-भिन्न यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं।

हमारे आसपास के देशों में हम देख ही रहे हैं कि ये वही आसुरी प्रवृत्ति के लोग हैं जो उत्पात मचा रहे हैं।

16.20

आसुरीं(य्ँ) योनिमापन्ना, मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय, ततो यान्त्यधमां(ङ्) गतिम्।।16.20।।

हे कुन्तीनन्दन ! (वे) मूढ मनुष्य मुझे प्राप्त न करके ही जन्म-जन्मान्तर में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं, (फिर) उससे भी अधिक अधम गति में अर्थात् भयंकर नरकों में चले जाते हैं।

विवेचन- हे अर्जुन! ऐसे मूर्ख व्यक्ति मुझको प्राप्त न होकर जन्म-जन्म तक आसुरी योनियों को ही प्राप्त होते हैं और उससे भी अति नीच गति को प्राप्त होते हैं, अर्थात् घोर नर्क में पड़ते हैं।

16.21

त्रिविधं(न्) नरकस्येदं(न्), द्वारं(न्) नाशनमात्मनः।
कामः(ख्) क्रोधस्तथा लोभ:(स्), तस्मादेतत्त्रयं(न्) त्यजेत्।।16.21।।

काम, क्रोध और लोभ - ये तीन प्रकार के नरक के दरवाजे जीवात्मा का पतन करने वाले हैं, इसलिये इन तीनों का त्याग कर देना चाहिये।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! अब मैं तुम्हें जिन तीन विषयों के बारे में बता रहा हूँ, उन्हें यदि नियन्त्रित कर लिया जाए तो यह अति उत्तम होता है, अन्यथा ये तीनों आत्मा को अधोगति की ओर ले जाते हैं।
काम, क्रोध और लोभ - इन तीनों के अधीन होकर मनुष्य का पतन सदैव सुनिश्चित है।

16.22

एतैर्विमुक्तः(ख्) कौन्तेय, तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः(श्) श्रेयस् , ततो याति परां(ङ्) गतिम्।।16.22।।

हे कुन्तीनन्दन ! इन नरक के तीनों दरवाजों से रहित हुआ (जो) मनुष्य अपने कल्याण का आचरण करता है, (वह) उससे परम गति को प्राप्त हो जाता है।

विवेचन- हे कौन्तेय! इन तीनों नर्कों के द्वारों से मुक्त पुरुष का सदा कल्याण होता है। इससे मनुष्य परमगति को प्राप्त करता है।

16.23

यः(श्) शास्त्रविधिमुत्सृज्य, वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति , न सुखं(न्) न परां(ङ्) गतिम् ।।16.23।।

जो मनुष्य शास्त्रविधि को छोड़कर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि (अन्तःकरण की शुद्धि) को, न सुख (शान्ति) को (और) न परमगति को (ही) प्राप्त होता है।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि जो मनुष्य शास्त्र विधि का त्याग करके अपनी इच्छानुसार आचरण करता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त करता है और न ही परमगति को। शास्त्र विधि की उपेक्षा करने वाले मनुष्य को न सुख मिलेगा, न परमगति और न सिद्धि।

ईश्वर के नाम की आड़ में अनुचित कार्य करने वाले को सिद्धि कभी प्राप्त नहीं होगी। आजकल लोग असत्य बोलकर धर्म के नाम पर दान लेकर उसका दुरुपयोग करते हैं। यदि आपको शास्त्र विधि ज्ञात नहीं हो तो उस परिस्थिति में अपने कुल एवम् परिवार की परम्पराओं का पालन करना चाहिए।

शास्त्र का अनुसरण करने वाले सन्तों के कहे अनुसार कार्य करने से भी शास्त्र का पालन होता है।

16.24

तस्माच्छास्त्रं(म्) प्रमाणं(न्) ते, कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं(ङ्), कर्म कर्तुमिहार्हसि।।16.24।।

अतः तेरे लिये कर्तव्य-अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र (ही) प्रमाण है - (ऐसा) जानकर (तू) इस लोक में शास्त्रविधि से नियत कर्तव्य-कर्म करने योग्य है अर्थात् तुझे शास्त्रविधि के अनुसार कर्तव्य-कर्म करने चाहिये।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! शास्त्रों में लिखी बातें ही अनुसरण करने योग्य हैं, इसलिये उनका ही अनुसरण करना चाहिए क्योंकि शास्त्रों में ही कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था का प्रमाण निहित है।

आपको लगेगा कि आप तो सारे शास्त्रों के बारे में जानते ही नहीं हैं फिर आप उनका पालन कैसे करेंगे? हम सन्तों के प्रवचन में जो बातें सुनते हैं, जो गीताजी में पढ़ते हैं, ये सारी बातें शास्त्र युक्त बातें हैं। हमारी कुल परम्परा में जो भी विधि-विधान की बातें बताई गई हैं, वे सब भी शास्त्रोक्त बातें हैं।

श्रीरामायण अथवा श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़कर आप शास्त्रों की बातों को जान सकते हैं। उनमें जो भी लिखा है, वह शत-प्रतिशत सत्य है।

श्रीमद्भगवद्गीता के सभी अध्यायों के अन्त में पुष्पिका दी गयी है। इन पुष्पिकाओं की रचना श्रीवेदव्यास भगवान के द्वारा हुई है। पुष्पिका का प्रयोजन है कि अध्यायों के पठन-पाठन के समय यदि हमारे द्वारा कोई त्रुटि हो गयी हो तो हम उसके लिए क्षमायाचना करते हैं।

'ऊँ तत्सदिति' बोलने के साथ ही हमें क्षमा की प्राप्ति हो जाती है।

हरिनाम सङ्कीर्तन के साथ ही आज का सारगर्भित अर्थ विवेचन सम्पन्न हुआ एवं प्रश्नोत्तर सत्र का आरम्भ हुआ।

प्रश्नोत्तर सत्र 

प्रश्नकर्ता- गायत्री दीदी
प्रश्न- यदि हमें शास्त्र विधि नहीं पता है तो हम किस प्रकार से शास्त्र विधि का अनुसरण करेंगे?
उत्तर- हमारे लिए शास्त्र विधि मात्र इतनी ही है कि हमारे घर के बड़े जो चली आ रही परम्पराओं से हमें अवगत करवाते हैं, हम उनका अनुसरण करें।

प्रश्नकर्ता- डॉ कमला गौतम
प्रश्न- आजकल के बच्चे अध्यात्म के विषय में बहुत कुतर्क करते हैं और बात नहीं मानते हैं। हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर- उन्हें थोड़ा समय देना चाहिए। जब सही समय आएगा तो उन्हें इस विषय की गहराई स्वयं ही ज्ञात हो जाएगी। बच्चे हमेशा नहीं करते हैं जो हम उन्हें कहते हैं। अपितु जो हम करते हैं बच्चे हमें देखकर उसका अनुसरण करने लगते हैं।

प्रश्नकर्ता- मुक्ता दीदी
प्रश्न- क्या कर्ण में दैवीय गुण नहीं थे?
उत्तर- कर्ण की बुद्धि विकृत थी। उसने सदैव धर्म का ही पक्ष लिया था। महाभारत में अनेकों ऐसे प्रसङ्ग आते हैं जहाँ पर हमें यह ज्ञात होता है कि कर्ण में सत्त्व गुण की प्रधानता का अभाव था। उसने मरते हुए अभिमन्यु को जल देने से भी मना कर दिया था।
 
प्रश्नकर्ता- मुक्ता दीदी 
प्रश्न- महाभारत की ये कथाएँ कौन सी पुस्तक में हैं?
उत्तर- सङ्क्षिप्त महाभारत के नाम से दो पुस्तकें आती हैं, उन्हें आप पढ़ सकते हैं। स्वामी जी तो यह भी कहते हैं कि हमें महाभारत का ग्रन्थ अपने घर में रखकर उसकी पूजा करनी चाहिए। उससे हमारे घर में सदैव विजयश्री आती है।

प्रश्नकर्ता- अर्पणा दीदी
प्रश्न- क्या सदैव सकारात्मक रहा जा सकता है? इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर- जी हाँ, सदैव सकारात्मक रहा जा सकता है। इसके लिए हमें निरन्तर नियमित अभ्यास की आवश्यकता है। गीता जी में भी नियमित अभ्यास की बात कही गई है।

।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्याय:।।

इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘देवासुरसम्पदविभाग योग’ नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।