विवेचन सारांश
अनन्य भक्ति द्वारा परमात्मा की प्राप्ति
श्रीभगवान् की अतिशय मङ्गलमय कृपा से हम सब लोगों का ऐसा धन्य भाग्य जाग्रत हुआ है कि हम लोग अपने इस मानव जीवन को सफल करने के लिए, सार्थक करने के लिए, जीवन के हर क्षेत्र में विजय प्राप्त करने के लिए, जीवन में शान्ति, प्रसन्नता, उदारता प्राप्त करने के लिए, इस जीवन में भी और जीवन के बाद भी अपनी पारलौकिक उन्नति के लिए भगवद्गीता जी के मार्ग में प्रवृत्त हो गए हैं। भगवद्गीता जी के उच्चारण को सीखने, कण्ठस्थ करने, उसके प्रवचनों को सुनने और उसके सूत्रों को अपने जीवन में लाने का प्रयास कर रहे हैं। यह सब हमें कृपापूर्वक प्राप्त हुआ है।
पता नहीं हमारे कोई इस जन्म के पुण्यकर्म हैं, हमारे पूर्व जन्मों के पुण्य कर्म हैं, हमारे पूर्वजों के कोई सुकृत हैं या फिर इस जन्म में किसी सन्त-महापुरुष की कृपादृष्टि हम पर पड़ गई है, जिस कारण हमारा ऐसा भाग्योदय हो गया है कि हम भगवद्गीता को पढ़ने के इच्छुक हो गए। हम सबके मन में यह चिरस्थाई स्थापित हो जाना चाहिए कि हमने गीताजी को नहीं चुना अपितु हम गीताजी को पढ़ने के लिए चुने गए हैं। जितनी दृढता से यह भाव हमारे हृदय में भर जाएगा, उतनी दृढता से हम लोग भक्तिमार्ग पर, सेवामार्ग पर, साधनमार्ग पर ऊर्जा से प्रशस्त होंगे, क्योंकि हम इस सत्कार्य में लगे हैं। हमें श्रीभगवान् द्वारा इसमें लगाया गया है। हम नही पढ़ते हैं, श्रीभगवान् हमें पढ़वा रहे हैं। हमारी शक्ति अल्प है, लेकिन उनके पास अपरिमित शक्ति है। इसलिये अपनी शक्ति से हम कितना कर पायेंगे यह महत्त्वपूर्ण नहीं है।
यदि हमें दिल्ली जाना हो तो अपने पैरों से चल कर जाने में समय भी अधिक लगेगा और कष्ट भी होगा। यदि एक हेलीकॉप्टर मिल जाए तो आराम से, पूरी सुविधा से, आनन्द लेते हुए, बिना कष्ट के कम समय में दिल्ली पहुँचा जा सकता है। यह इसलिये सम्भव हो सका क्योंकि हमारी शक्ति कम थी लेकिन हेलीकॉप्टर की शक्ति बड़ी थी।
श्रीभगवान् की कृपा इस वायुयान के समान है। उस कृपा में जब हम बैठ जाते है और कृपा के अनुभव के साथ साधना करते हैं तो अपनी शक्ति महत्व नहीं रखती। श्रीभगवान् की शक्ति हम से जुड़ जाती है। हम कुछ नहीं करते। सब श्रीभगवान् ही करवा देते हैं। यह विचार करते ही हम सब करने के लिए उद्यत हो जाते हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि कण्ठस्थीकरण करना है, सेवा करनी है, लेकिन हम कर नहीं पाते। यह हमें नहीं करना है, श्रीभगवान् करवाते हैं-
हम तो निमित्त मात्र हैं। करने वाले भी श्रीभगवान् और करवाने वाले भी श्रीभगवान् हैं। जब वह विचार मन में जुड़ता है तो सब सम्भव हो जाता है। श्रीभगवान् की कृपा से सब कार्य हो जाते हैं। श्रीभगवान् ही करने वाले हैं और श्रीभगवान् ही करवाने वाले हैं।
नवम् अध्याय में श्रीभगवान् कहते हैं स्वर्ग भोगना, पुण्य प्राप्त करना जैसा शास्त्रों में है वैसा सम्भव है और वैसा ही होता है। किन्तु अर्जुन तुम इस फेर में न फँसो। जब कोई ऐसा करेगा अर्थात् जब कोई पुण्यों को अर्जित करेगा तो उसको स्वर्ग की प्राप्ति होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है। लेकिन स्वर्ग जाकर क्या होगा?
ते तं(म्) भुक्त्वा स्वर्गलोकं(व्ँ) विशालं(ङ्),
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं(व्ँ) विशन्ति।
एवं(न्) त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना,
गतागतं(ङ्) कामकामा लभन्ते॥
9.21
श्रीभगवान् कहते हैं कि उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर पुनः मृत्युलोक में आना पड़ता है। सदैव वहाँ नहीं रह सकते। अन्ततः आना ही पड़ता है। बार-बार पुण्य अर्जित करके स्वर्गलोक में जाना और पुण्य क्षीण होने पर पुनः मृत्युलोक में आना पड़ता है। कभी-कभी ग़लती होने पर पुण्य अधिक क्षीण होने पर और नीचे के लोकों नरकों में भी जाना पड़ता है। इस प्रकार भोगों की कामना करने वाले मनुष्य बारम्बार आवागमन के चक्र को प्राप्त होते हैं।
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां(य्ँ), ये जनाः(फ्) पर्युपासते।
तेषां(न्) नित्याभियुक्तानां(य्ँ), योगक्षेमं(व्ँ) वहाम्यहम्॥
9.22
श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं कि अर्जुन जो भक्त मुझको समर्पित होकर अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हैं, मुझे निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य निरन्तर मेरा चिन्तन करने हैं, मैं उनका योगक्षेम वहन करता हूँ।
श्रीभगवान ने कहा अनन्या न अन्यः सामान्य रूप से हम इसे मानते हैं- एक इष्ट की उपासना।
किन्तु इसका बड़ा ग़लत अर्थ समझा जाता है। लोग प्रायः ऐसा समझते हैं -
मेरे तो इष्ट श्रीराम जी हैं तो मैं श्रीकृष्ण जी की पूजा क्यों करूँ?
मैं तो शिवजी का भक्त हूँ तो मैं श्रीरामजी की पूजा क्यों करूँ?
मैं तो देवीजी का भक्त हूँ तो मैं गीता जी क्यों पढूँ?
इष्ट को समझते हैं कि इष्ट कौन हैं?
इष्ट और अनिष्ट दो शब्द हैं।
विवाह की पत्रिका पर लिखा होता है अपने इष्ट मित्रों के साथ पधारें। इसका अर्थ यहीं यह नहीं है कि अपने इष्ट भगवान् श्रीराम जी या भगवान् शिवजी के साथ पधारें।
इष्ट का साधारण अर्थ है - जो मुझे अच्छा लगता है, जो मुझे चाहिए। WHATEVER IS DESIRABLE TO ME.
अनिष्ट का साधारण अर्थ है - जो बुरा है, मुझे नहीं चाहिए।
मुझे अनिष्ट की आशंका है, कुछ हो न जाए, कुछ ग़लत न हो जाए। कोई ग़लत बात हो जाए तो प्रायः कहते हैं अरे! बड़ा भारी अनिष्ट हो गया। जो नहीं होना चाहिए था, वह हो गया।
साधारण अर्थ में जो चाहिए वह इष्ट, जो नहीं चाहिए वह अनिष्ट।
मैं भगवान् शिवजी के मन्दिर गया। रुद्राभिषेक का आयोजन किया। पण्डित जी से कहा कि ऐसा रुद्राभिषेक करवाइए, जिससे व्यापार अच्छा चले, घर में सब बच्चों का स्वास्थ्य अच्छा हो जाए। ऐसा रुद्राभिषेक करवाइए कि मेरा प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जाए। अब पूजा तो भगवान् शिवजी की, रुद्राभिषेक भी भगवान् शिवजी का बहुत किया, किन्तु शिवजी मेरे इष्ट नहीं हैं। मेरा इष्ट तो वह धन, कीर्ति, स्वास्थ्य है जो मैं चाहता हूँ।
शिवजी की पूजा करके शिवजी चाहिए तो शिवजी मेरे इष्ट हैं। धन, सम्पत्ति, मान, स्वास्थ्य चाहिए तो शिवजी इष्ट नहीं हैं। इष्ट तो वे भोग हैं जिनकी कामना से शिवजी की पूजा करके कर रहे हैं।
इष्ट वो है जो मुझे चाहिए, जिससे चाहिए वह इष्ट नहीं है।
जिससे चाहिए वह इष्ट तब होगा जब हम कहते हैं कि भगवान् मुझे आपकी भक्ति चाहिए। मुझे आपके चरणों में प्रेम चाहिए, मुझे आप चाहिए, मुझे आप के धाम में स्थान चाहिए।
जब हम भगवान् से भगवान् को माँगते हैं तब इष्ट श्रीभगवान् हैं।
जब हम श्रीभगवान् से सांसारिक वस्तुएँ माँगते हैं तब इष्ट वे संसार की वस्तुएँ होती हैं, श्रीभगवान् नहीं। फलप्राप्ति की इच्छा से श्रीभगवान् की प्रार्थना करने पर, मेरे इष्ट श्रीभगवान् नहीं होते अपितु संसार की वे इच्छाएँ इष्ट होती हैं। इसी से अनन्य का अर्थ समझ आता है।
मेरे उपास्य भगवान् शिव हैं तो मैं गीता जी क्यों पढ़ूँ?
मेरे उपास्य भगवान् रामजी हैं तो मैं वृन्दावन क्यों जाऊँ?
मेरे इष्ट शिवजी है तो मैं रामजी की पूजा क्यों करूँ?
मेरे इष्ट भगवान् श्रीकृष्ण हैं तो मैं अयोध्या धाम क्यों जाऊँ?
मैं कहीं भी जाऊँ मेरा ध्यान मेरे इष्ट में ही रहेगा।
यदि मेरे इष्ट रामजी हैं तो वृन्दावन में बाँकेबिहारीजी के समक्ष जाकर कहूँगा कि हे बाँकेबिहारी मुझे श्रीरामजी की भक्ति दो।
यदि मैं बाँकेबिहारी के सामने जाकर भी रामजी की भक्ति माँगता हूँ और यदि मैं शिवजी के पास जाता हूँ और उनसे भी रामजी की भक्ति माँगता हूँ तो तो मेरे इष्ट भगवान् श्रीराम हैं। यदि मेरे इष्ट भगवान शिव हैं तो मैं अयोध्या जाकर श्री रामलता से शिवजी की भक्ति माँगता हूँ।
किसी भी परिस्थिति में, कहीं भी जाने से इष्ट नही बदलते।
न अन्यः का अर्थ यह नहीं है कि आप अलग-अलग देवताओं की उपासना मत करो, अपितु यह है कि आप अलग-अलग देवताओं के पास जाकर भी अपने इष्ट की ही भक्ति माँगो।
न अन्यः जिसको संसार नहीं चाहिए, श्रीभगवान् चाहिए। यह है अनन्यता।
मुझे package में भक्ति नहीं चाहिए। हम लोग चालाकी से भक्ति करते हैं। थोडा पूजा-पाठ कर लेते हैं, दीप-बत्ती दिखा देते हैं, थोड़ा जप भी कर लेते हैं, थोड़ा दान-वान भी कर लेते हैं। हमें लगता है कि हम भगतजी हो गए। सबको श्रीभगवान् चाहिएं लेकिन संसार के साथ चाहिए। शरीर भी योग्य हो, धन्य-धान्य उत्तम हो, बच्चे भी उत्तम प्रकार से रहते हों। खाने-पीने की मौज हो, पत्नी आज्ञाकारिणी हो। वच्चे, सब कुछ अपने अनुकूल हो।
WE WANT ALL THE WORLD WITH BHAGWANJI IN ONE PACKAGE BUT THIS NEVER HAPPENS.
श्रीभगवान् कहते हैं कि तुम बाकी बातों की चिन्ता छोड़कर मुझको मुझसे माँगो।
एक शिष्य गुरुजी को पास रहता था। सात-आठ वर्ष बीतने के बाद उसने गुरुजी से पूछा कि जब मैं नया-नया आया था तब आपने मुझसे कहा था कि तेरा भाव बड़ा अच्छा है। पर मुझे अभी तक श्रीभगवान् नहीं मिले। गुरुजी ने कहा कि सच कहूँ -
जैसी प्रीति आरम्भ में, वैसी अन्त तक होय।
चला जाए वैकुण्ठ को, पल्ला न पकड़े कोय।।
शिष्य बोला कि मुझे वचनों पर सन्देह नहीं है। मेरे पाप बहुत अधिक हैं। आपको पता नहीं है कि I have done too many sins. मैंने यहाँ आने से पहले कितने पाप किए हैं। आप तो मुझे बहुत अच्छा समझते हैं। गुरुजी बोले तुम इस जन्म के पाप की बात करते हो। श्रीभगवान् की कृपा हो तो एक जन्म के नहीं, अनेक जन्मों के पापों का अन्त हो जाता है। शिष्य ने पूछा अनेक जन्मों के? गुरुजी ने कहा-
बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु।
होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु॥
अरे! एक नहीं, अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। श्रीभगवान् के नाम में आस्था करो। यह प्रण करो कि अब आगे ग़लती नहीं करूँगा। लेकिन योगक्षेमं वहाम्यहम् का ध्यान रखना कि जो तुम्हारी आवश्यकता होगी श्रीभगवान् उन्हें पूरा करते हैं। श्रीभगवान् आवश्यकता की चिन्ता करते हैं, कामनाओं की नहीं।
भागवत में देवऋषि नारदजी ने भक्ति के लक्षण बताए हैं। प्रतिक्षण वर्धनं इति भक्ति जो प्रतिक्षण बढ़ती है वही भक्ति है। वह घटती नहीं है, बढ़ती ही जाती है।
श्रीभगवान् ने कहा जो नित्य, निरन्तर, स्थिर भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।
योग- जिस वस्तु की आवश्यकता है। जैसे वस्त्र, स्वास्थ्य आदि।
क्षेम- जो तुम्हें प्राप्त है उसकी रक्षा।
शरीर मिला है उसकी रक्षा करनी होगी।
धन मिला है उसकी रक्षा करनी होगी।
पुत्र मिला है उसकी रक्षा करनी होगी।
पति- परिवार मिला है उसकी रक्षा करनी होगी।
योग- अप्राप्य की प्राप्ति
क्षेम- प्राप्त की रक्षा
जो नहीं है वो मिल जाए और जो मिला है उसकी रक्षा हो जाए। शङ्का क्यों करते हो?
एक सुन्दर भजन है -
एक प्रसङ्ग महाभारत से-
द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को उलाहना दिया कि कान्हा इतना पुकारा तुम कितनी देर से आए, शीघ्र क्यों नहीं आए? जरा सी देरी होती मेरा चीर छूट जाता। मैं कितना पुकार रही थी। श्रीकृष्ण ने कहा कि तुमने मुझे नहीं पुकारा। द्रौपदी ने कहा मैं इतनी ज़ोर से पुकार रही थी। श्रीकृष्ण ने कहा जैसे ही तुमने मुझे पुकारा मैं तुरन्त चला आया। पहले तुमने मुझे छोड़कर युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, भीष्म पितामह, विदुर, धृतराष्ट्र और पूरी सभा को पुकारा। फिर जब तुमने देखा कोई नहीं बचा रहा, तब भी मुझे नहीं पुकारा। तुमने सोचा कि तुम क्षत्राणी हो, तुम स्वयं ही अपनी रक्षा कर लोगी और तुमने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। जब तुम्हें लगा कि तुम स्वयं की शक्ति से चीर नहीं बचा सकती हो, तब तुमने चीर छोड़कर मुझे पुकारा। मैंने तुरन्त आकर तुम्हारा चीर पकड़कर तुम्हें बचा लिया। जब तक तुम अन्य का सहारा माँगती थी मैं नहीं आया। जब तुमने अनन्य भाव से पुकारा, मैं चला आया।
हम श्रीभगवान् को पुकारते नहीं हैं, पुकारने का नाटक करते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं -
तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार, उदासी मन काहे को करे |
हम अनन्य भाव से श्रीभगवान की भक्ति नहीं करते, डोरी श्रीभगवान को सौंपते नहीं हैं। जो डोरी सौंप देता है, उसका रामजी बेड़ा पार करते हैं।
तू निर्दोष तुझे क्या डर है, पग पग पर साथी ईश्वर है।
सच्ची भावना से कर ले पुकार, उदासी मन काहे को करे ||
श्रीभगवान् बेड़ा पार करते हैं। हमारी भूल यह है कि हम अपनी नाव की पतवार उनके हाथ में देने को तैयार नहीं हैं। हम उनकी कृपा तो चाहते हैं, किन्तु डोरी नहीं सौंपते। जो डोरी सौंपता है, श्रीभगवान् उसकी नैया सम्भाल लेते हैं।
नरसिंह मेहता ने डोरी सौंप दी,
श्रीभगवान् उसका भात भरने आ गए।।
श्रीभगवान् योगक्षेम वहन करते हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि मेरी सभी इच्छाएँ पूरी होंगी, बल्कि जो आवश्यकताएं हैं, उनकी पूर्ति होगी।
एक बार एक सन्त एक गाँव में कथा कर रहे थे। कथा में गीताजी के नवम् अध्याय के श्लोक पर प्रवचन कर रहे थे–
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां(य्ँ), ये जनाः(फ्) पर्युपासते।
तेषां(न्) नित्याभियुक्तानां(य्ँ), योगक्षेमं(व्ँ) वहाम्यहम्॥
9.22
जो श्रीभगवान् की भक्ति करते हैं, श्रीभगवान् उनका योगक्षेम वहन करते हैं। एक अल्हड़ बालक ने सुना योगक्षेमं वहाम्यहम् तो लड़के ने पण्डित जी से पूछा कि ऐसा होता है क्या? श्रीभगवान् किसी का योगक्षेम वहन करते हैं क्या? गुरुजी ने कहा कि ऐसा अवश्य होता है। जो जैसा करेगा श्रीभगवान् उसे सम्भालेंगे। मैं कैसे यह सिद्ध कर सकता हूँ? लड़का बोला मेरा तो कोई तपोबल नहीं है, आपका तो है। आप ही दिखाइए। मैं आज खाना खाना बन्द करता हूँ। देखता हूँ श्रीभगवान् को मुझे भोजन कैसे खिलाएँगे। गुरुजी बोले ऐसा थोड़ा ही होता है। यह क्या पागलपन की बात करते हो? बालक ने कहा देखता हूँ आपके श्रीभगवान् को, वे मेरा योगक्षेम कैसे वहन करेंगे। वह कथा के पण्डाल में बैठ गया। वह अड़ गया और कहने लगा कि मैं भोजन नहीं करुँगा। गुरुजी ने कथा पूरी की। लड़के को सभी ने समझाया कि कथा में सन्त लोग ऐसी बातें बतलाते हैं। तुम हठ मत करो। सभी आस-पास के लोगों ने लड़के को बहुत समझाया, परन्तु उसने किसी की बात नहीं सुनी और वह अन्न-जल त्याग कर बैठ गया। गुरुजी कथा पूरी होने के बाद उसे समझाने आए परन्तु वह नहीं माना। शाम हो गई।
लड़का नहीं माना बोला कि मैं भोजन नहीं करुँगा। देखता हूँ कि श्रीभगवान् मुझे कैसे खिलाते हैं। ऐसा कहकर वह जङ्गल में भाग गया और पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। गुरुजी भी बहुत परेशान हुए। गुरुजी ने उसके परिवार वालों को कहा कि जो इसे पसन्द है, वही भोजन बनाना। खीर -पूड़ी बनाओ। सम्भवतः उसे देखकर उसका मन बदल जाए और भूख लगने पर वह खाना खा ले। गुरुजी के मन में पीड़ा हो रही थी कि वह श्रीभगवान् पर शङ्का कर इस प्रकार की बातें कर रहा है। श्रीभगवान् के सामने रोते हुए बोले कि मेरी बात जाए तो कोई बात नहीं परन्तु अब गीताजी के वचन की प्रतिष्ठा की बात है।
उसे भोजन करवाने के लिए लड़के के परिवार वाले थाली लेकर पेड़ के नीचे खड़े हो गए। बहुत देर तक मनाते रहे और अन्त में थाली के ऊपर कपड़ा ढककर घर चले गए। नीचे थाली से पकवानों की सुगन्ध आ रही थी, परन्तु वह हठ पर अड़ा रहा। आधी रात को बारह बजे के समय कुछ डाकू उस पेड़ के नीचे आ गए और दिनभर की लूट -पाट का हिसाब-किताब करने लगे। उनमें से किसी ने कहा कि आज यहाँ भोजन की बहुत अच्छी सुगन्ध आ रही है। उन्होंने पेड़ के नीचे रखे थाल पर कपड़ा देखकर उसे हटाया तो उसके नीचे बहुत अच्छा भोजन, पूड़ी, सब्जी, खीर पड़ी थी। उन्होंने कहा कि चलो खाते हैं। उनमें से एक ने कहा कि नहीं, यह अवश्य किसी का षड्यन्त्र है। किसी को पता है कि हम यहाँ आते हैं। हो सकता है इस थाली में विष हो ताकि हम सब यह खाकर मर जाएँ और वह हमारा सामान ले जाए। जिसने यह थाली रखी है वह यहीं छुपकर हमें देख रहा होगा।
डाकुओं की बात सुनकर वह लड़का डर से काँपने लगा। उसके काँपने से पत्तियाँ हिलने लगीं तो डाकुओं ने ऊपर देखा। वहाँ लड़का दिखाई दिया। डाकुओं ने उसे नीचे उतार लिया और कहा कि हमें मारने के लिए यह ज़हर मिला खाना लाए हो? उसने कहा नहीं यह मेरा खाना है। एक डाकू ने कहा कि यह ज़हर मिला हुआ भोजन इसी को खिलाओ। लड़का बोला मैं नहीं खाऊँगा। डाकू बोले झूठ बोलता है। वह बोला नहीं। वे बोले खाकर दिखा। लड़के ने कहा कि मैं खाना नहीं खाऊँगा। उन डाकुओं ने उसके हाथ पैर पकड़े और जबरन खाना खिलाया। उसे बहुत मारा। वह दौड़ते, भागते, लङ्गड़ाते हुए पण्डित जी के पास पहुँचा और बोला आपकी बात सही है। श्रीभगवान् जी ने ठूँस-ठूँस के खिलाया और आपकी बात नहीं मानी तो मार-मार कर भी खिलाया। श्रीभगवान् ने अपने भक्तों का योगक्षेम वहन किया।
यहाँ श्रीभगवान् ने लड़के को खाना ही नहीं खिलाया अपितु पण्डित जी की बात रखने के लिए उनका योगक्षेम वहन किया।
9.23
येऽप्यन्यदेवता भक्ता, यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेऽपि मामेव कौन्तेय, यजन्त्यविधिपूर्वकम्।।9.23।।
जितने भी देवता हैं वे मेरी शक्ति से ही अपना- अपना विभाग सम्भालते हैं। मैने सब देवताओं को अलग-अलग विभाग दिये हैं। सारे विभाग बाँटने पर सारे कार्य मेरे लिए ही सम्पन्न होते हैं। क्योकि कार्य सारे मेरे ही हैं। उनके पूजन में हवन में जो आहुति दी जाती है, जो पूजा की जाती है वो सभी मुझे ही प्राप्त होती हैं क्योंकि मैं सृष्टिकर्ता हूँ।
जैसे आयकर का पैसा बैंक में जमा होता है। बैंक में कैशियर पैसा गिनता है। प्रबन्धक उसका हिसाब रखता है। वो पैसा जा कर मिलता है प्रधानमन्त्री को। धन का स्वामित्व प्रधानमन्त्री का है। वे ही तय करते है कि पैसा कैसे खर्च करना है।
घर में चोरी होने पर पास के थाने में जा कर रिपोर्ट लिखवाई। थानेदार ने दो-तीन घण्टे में ही चोर को पकड़ लिया और सामान आपको लौटा दिया। मैंने कहा कि आपने मेरा काम किया, मैं किसी और को नहीं जानता अगली बार चुनाव में आप को ही मतदान करूँगा। थानेदार ने कहा कि मुझे अपना मत क्यों दोगे? तब मैंने कहा कि मेरे लिए तो आप ही प्रधानमन्त्री हो, आपने ही मेरा पैसा वापस करवाया है। मैं तो आप ही को सब कुछ मानूँगा। थानेदार ने कहा कि मैं तो नौकरी कर रहा हूँ। वोट तो उसको देना होगा जो मुझे नौकरी देता है। मैंने तुम्हारा काम किया, यह तो मेरा कर्त्तव्य है। मैंने तुम्हारा चोरी हुआ सामान लाकर दिया है। प्रबन्धक तो मुख्यमन्त्री या प्रधानमन्त्री हैं, जिन्होंने मुझे नौकरी पर रखा है। मैं मालिक नहीं हूँ।
श्रीभगवान् कहते हैं कि जिस देवता की उपासना करने पर तुम्हारा काम सिद्ध हो गया उसी को तुम भगवान् मानने लगे तो यह अविधिपूर्वक हो गया।
श्रीभगवान् और देवता में भेद जानते हैं।
श्रीभगवान् अलग हैं और देवता अलग हैं। देवता एक योनि है, जैसे मनुष्य योनि।
मनुष्य लोक में पैदा होने वाले मनुष्य।
दैवलोक पैदा होने वाले देवता।
अच्छे पुण्य करके हम देवलोक में जन्म ले सकते हैं। देवलोक जाकर दैव शरीर प्राप्त होगा और हम देवता कहलाते हैं। देवता कितने भी बड़े हों उनकी भी एक आयु है। इन्द्र, वरुण, सूर्य आदि प्रधान देवताओं का जन्म होता है और उनकी मृत्यु भी होती है। जैसे प्रधानमन्त्री पद का नाम है, वैसे ही इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि पद के नाम हैं। इन सभी देवताओं की एक आयु है। उस आयु पूर्ण होने पर शरीर का त्याग करना पड़ता है। उसके बाद एक नया इन्द्र आता है।
ब्रह्माजी की भी एक आयु है। उनके सौ वर्ष पूर्ण होने पर उनकी भी मृत्यु होती है। फिर नए ब्रह्मा जन्म लेते हैं जो नई सृष्टि, नये देवताादि बनाते हैं।
लेकिन श्रीभगवान् अजर हैं, अमर हैं। न उनका कभी जन्म हुआ, न मृत्यु। वे सदैव विद्यमान हैं, इनका प्रलयकाल में भी नाश नहीं होता है।
भगवान् शिव, भगवान् विष्णु और आदिशक्ति दुर्गा सदैव विद्यमान हैं, चिन्मय हैं और परब्रह्म परमात्मा के स्वरुप माने गए हैं। इसलिये भगवान् विष्णु के जितने भी अवतार हैं, भगवान् शिव के जितने भी अवतार हैं, देवी के जितने भी अवतार हैं, उन सबको परब्रह्म परमात्मा का स्वरुप माना जाता है। इसलिये तीन मूल सम्प्रदाय हुए हैं-
1. शाक्त- आदिशक्ति देवी की पूजा करते हैं।
2. वैष्णव- भगवान् श्रीविष्णु, भगवान् श्रीराम, भगवान् श्रीकृष्ण की पूजा
करते हैं।
3. शैव- भगवान् शिव और उनके अवतारों की पूजा करते हैं।
ये तीनों श्रीभगवान् के स्वरूप हैं।
इनके अतिरिक्त अन्य सभी देवता हैं।
देवताओं की भी पूजा करनी चाहिए क्योंकि देवताओं का भी अपना -अपना विभाग होता है। हर विभाग का कार्य उसी विभाग में होता है।
जैसे मेरी पहचान प्रधानमन्त्री से है। मेरे घर चोरी होने पर प्रधानमन्त्री चोरी की रिपोर्ट नहीं लिखेंगे, वह तो थाने जाकर ही लिखवानी पड़ेगी।
इसी प्रकार श्रीभगवान् इन्हीं देवताओं के माध्यम से कार्य करते हैं। इसलिये पञ्चायतन पूजा का प्रावधान है। सभी गृहस्थों को पाँच देवताओं की उपासना नित्य करनी चाहिए। ऐसी शास्त्रों की आज्ञा है। भगवान् आदिशङ्कराचार्य ने भी ऐसी आज्ञा दी है।
सुबह सबसे पहले उठ कर सूर्य भगवान् को अर्घ्य देना चाहिए ।
भगवान् विष्णु के एक स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।
भगवान् शिव जी के स्चरुप की पूजा करनी चाहिए।
भगवान् गणेशजी के स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।
देवी जी के स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।
सूर्य भगवान् को अर्घ्य और चार विग्रह मन्दिर में होने चाहिए। यह गृहस्थ के लिए अनिवार्य बताया गया है। उनमें इष्टदेव को मध्य में रखना और बाकी सबको उनके दायें-बायें रखना। मन्दिर में कम से कम चार विग्रह होने चाहिए और इन चारों की पूजा करके इनसे अपने इष्ट की भक्ति माँगनी चाहिए।
अहं(म्) हि सर्वयज्ञानां(म्), भोक्ता च प्रभुरेव च।
न तु मामभिजानन्ति, तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।।9.24।।
यान्ति देवव्रता देवान्, पितॄन्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या, यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।9.25।।
देवता को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं।
पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं।
भूत-प्रेतों का पूजन करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं।
कई लोग पितरों की ही पूजा करते रहते हैं। कई लोग यक्षों की, राक्षसों की पूजा करते रहते हैं और कई लोग भयङ्कर तान्त्रिक क्रियाओं में अपने को लगाये रखते हैं। श्रीभगवान् ने कहा कि इसका परिणाम ऐसा ही होगा।
अगर यदि तुम शुद्ध सात्त्विक देवों की पूजा करोगे तो देवलोक को प्राप्त होंगे।
मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता।
इसका अर्थ है कि जितने भी देवों की पूजा करनी हो, हम सब करेंगे। मन में इष्ट श्रीभगवान् की पूजा होनी चाहिए।
पत्रं(म्) पुष्पं(म्) फलं(न्) तोयं(य्ँ), यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं(म्) भक्त्युपहृतम्, अश्नामि प्रयतात्मनः॥9.26॥
श्रीभगवान् ने द्रौपदी के अक्षयपात्र का पत्र स्वीकार किया। उसमें से एक दाना चावल लेकर दुर्वासा ऋषि और उनके दस हजार शिष्यों की भूख मिटा दी।
गजेन्द्र का फूल स्वीकार किया।
शबरी के बेर स्वीकार किये।
रन्तिदेव का जल स्वीकार किया।
राजस्थान के टोंक जिले में धुआँ कला नाम का गाँव है। वहाँ पर धन्ना नाम का एक एक जाट रहता था। स्वभाव से भोला था और हृदय से निर्मल और बहुत पवित्र था। वह प्रेम, भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत प्रतीक बन गया।
समय आने पर भाइयों में सम्पत्ति का बँटवारा हुआ। धन्ना के हिस्से में गाय आई। गाँव में एक पण्डित जी थे, कुछ लालची थे। जैसे ही पता चला कि भाइयों में बँटवारा हुआ है और धन्ना के हिस्से में गाय आई है, पण्डित जी तुरन्त धन्ना के पास पहुँचे। धन्ना ने प्रणाम किया और कहा पण्डित जी पधारो, कैसे आना हुआ? पण्डित जी बोले- सुना है, बँटवारे में तुम्हारे हिस्से में गाय आई है। धन्ना ने कहा, जी हाँ। पण्डित जी बोले तुम्हें पता है कि तुम्हारी गाय का दूध श्रीभगवान् को बहुत प्रिय है। इस गाँव के मन्दिर के ठाकुरजी हैं, वे तुम्हारी गाय का ही दूध पीते हैं। धन्ना को बहुत आश्चर्य हुआ, वह बोला कि पण्डित जी आप सच कह रहे हो क्या? गाँव के ठाकुर जी मेरी गाय का दूध पीते हैं? पण्डित जी बोले हाँ, उनको इतना प्रिय है कि अगर मैं दूसरी गाय का दूध लाऊँ तो वह पीते ही नहीं हैं। दोनों आँखें बड़ी करके धन्ना बोला पण्डित जी आप सच कह रहे हो, ठाकुरजी मेरी गाय का दूध पीते हैं? मैं तो आज तक मन्दिर भी नहीं गया। पण्डित जी बोले इसीलिये तो मैं तुम्हारे पास आया हूँ कि गाय तुम्हारे हिस्से में आई है तो क्या तुम अब दूध दोगे? या मैं ठाकुरजी को बोल दूँ कि अब वह दूध नहीं देगा। धन्ना ने कहा कि पण्डित जी आप कैसी बात करते हो? यदि ठाकुरजी मेरी गाय का दूध पीते हैं तो मैं रोज ही आपको इस गाय का दूध दे दूँगा। आप जितना भी दूध ठाकुरजी माँगेंगे उतना ही ले जाना। ठाकुरजी मेरी गाय का दूध पीते हैं, इससे बड़ी मेरे लिए क्या बात हो सकती है? उसके मन में इतना आनन्द हुआ कि ठाकुरजी मेरी गाय का दूध पीते हैं। अब वह प्रतिदिन ही पण्डित जी के लिए दूध ले जाने लगा।
एक बार पण्डित जी को किसी के ब्याह में तीन-चार दिन के लिए दूसरे गाँव जाना पड़ा। उन्होंने धन्ना को तीन-चार दिन तक दूध देने के लिए मना कर दिया। धन्ना ने कहा कि आप तीन-चार दिन के लिए दूसरे गाँव जाओगे तो ठाकुरजी इतने दिन भूखे रहेंगे? उसका निर्मल भाव था कि ठाकुरजी मेरी ही गाय का दूध पीते हैं। पण्डित जी तो भूल गए थे कि उन्होंने ऐसा कहा था। धन्ना ने कहा- पण्डित जी आप जाओ, ठाकुर जी को दूध मैं पिला दिया करूँगा। पण्डित जी ने कहा कि तू जाट है, मन्दिर के गर्भगृह में मेरे अतिरिक्त कोई नहीं जा सकता। धन्ना बोला ऐसे तो ठाकुर जी भूखे रहेंगे। इसका कुछ उपाय तो करना पड़ेगा। धन्ना ने कहा कि मैं मन्दिर नहीं जा सकता तो तुम ठाकुर जी को मेरे पास ले आओ। पण्डित जी बोले, क्या तुम ठाकुर जी को सम्भाल पाओगे? क्या तुम्हें उसके नियम पता है? धन्ना बोला कि तुम सभी नियम मुझे बता दो। मैं सभी याद कर लूँगा, परन्तु यह बात पक्की समझो कि ठाकुर जी भूखे नहीं रहेंगे। उसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े। अब तो पण्डित जी चक्कर में पड़ गए, बोले ठीक है मैं अभी ठाकुर जी को लेकर आता हूँ।
रास्ते में जाते-जाते उन्हें काले रङ्ग का एक पत्थर मिल गया। पत्थर को लेकर मन्दिर में गए और उसे एक वस्त्र में रखकर चन्दन तिलक लगाया, थोड़े पुष्प रखकर इत्र लगाया, शालिग्राम का रूप बनाकर टोकरी में रखकर धन्ना को दे दिया। पण्डित जी ने कहा कि तुम हठ करते हो तो ठाकुर जी को तुम्हारे पास ले आया हूँ, लेकिन पहले उनके नियम सुन लो। ठाकुर जी को तभी अपने हाथ में लेना जब तुम वचन दो कि उन नियमों का पालन करोगे। धन्ना बोला कि पण्डित जी बताओ इसके क्या-क्या नियम हैं? पण्डित जी बोले की सुबह पॉंच बजे तुम्हें जागना होगा और तुरन्त स्नान करके भगवान को स्नान कराना होगा। फिर भगवान् को तिलक करना होगा, फिर उन्हें भोग लगाना होगा। भोग से पहले पर्दा लगाना होगा। पण्डित जी ने एक बहुत लम्बी चौड़ी सूची बनाकर धन्ना को बताई कि वह घबरा कर मना कर दे। जितने नियम पण्डित जी स्वयं भी नहीं करते थे, उनसे भी ज्यादा नियम उन्होंने धन्ना को बता दिए। परन्तु धन्ना तो निर्मल और पवित्र मन का था और जाट बुद्धि का था तो ठान लिया कि यह सब तो करना ही है।
पण्डित जी ने बोला कि सोच लो कि यह सब कर पाओगे। धन्ना ने कहा, हाँ पण्डित जी! आपने जितनी भी बातें बताई हैं, मैं सभी बातें पूरी करूँगा। पण्डित जी ने कहा तुम यह सब बोल कर बताओ कि मैंने क्या-क्या कहा? धन्ना ने आरम्भ से अन्त तक सभी बातें पण्डित जी को बता दीं। पण्डित जी परेशान हो गए। उन्हें लगा था कि वह ये बातें याद कर सकता है। पण्डितजी ने उन्हें ठाकुर जी दे दिए। जैसे ही धन्ना ने ठाकुरजी को हाथ में लिया तो उसकी पूर्व जन्म की भक्ति जाग्रत हो गई। ठाकुरजी को हाथ में लेते ही उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह बोला कि आज तक तो मैं मन्दिर दर्शन करने भी नहीं गया और आज ठाकुरजी मेरे घर में और मेरे हाथ में आ गए। वह माँ के पास गया और बोला कि देखो माँ ठाकुरजी हमारे घर आए हैं। उसने माँ को सारी बातें बताई। वह तो ठाकुर जी को लेकर नाचने लगा।
उसने एक मेज पर आसन लगाकर ठाकुरजी को उस पर रखा और उन्हें निहारने लगा और सोचने लगा कि इतने छोटे से ठाकुर जी एक लोटा दूध कैसे पीते होंगे और पण्डित जी ने यह भी बोला था कि दूध के साथ एक थाली भोजन भी खिलाना होगा। धन्ना ने माँ से कहा कि दूध तो मैंने निकाल रखा है। अब आप एक भोजन की थाली बना दो। मैं ठाकुरजी को भोग लगाऊँगा। माँ ने खाना बना दिया। धन्ना खाना लेकर ठाकुरजी के आगे बैठ गया और टकटकी लगाकर उन्हें देखने लगा। उसे लगा ठाकुरजी अभी खाना शुरू करेंगे और दूध पियेंगे। मन ही मन कह रहा है ठाकुर जी भोजन कर लीजिए और दूध पी लीजिए। पन्द्रह बीस मिनट तक जब कुछ भी नहीं हुआ तो एकदम ध्यान आया कि पण्डित जी ने कहा था कि पहले पर्दा लगाना पड़ेगा फिर उन्होंने माँ की साड़ी से पर्दा किया और पीठ घुमाकर बैठ गया क्योंकि पण्डित जी ने कहा था कि ठाकुरजी को भोग लगाते हुए देखते नहीं है। फिर बोला ठाकुर जी मैं आपको नहीं देख रहा हूँ अब आप भोजन कर लीजिए।
बहुत देर हो गई तो माँ ने पूछा कि क्या हुआ? उसने कहा मैंने भोग तो लगा दिया, परन्तु ठाकुरजी खा नहीं रहे हैं। माँ ने कहा ठीक है भोग लग गया, वह खाएँगे नहीं। उसने कहा कि माँ तुम्हें भी नहीं पता तुम कभी मन्दिर भी नहीं गई हो। माँ ने कहा बेटा ठाकुरजी को भोग दिखाना ही होता है, वे खाते नहीं हैं। धन्ना बोला माँ तुम्हे नहीं पता ठाकुरजी खाना खाएँगे। माँ ने कहा कि चलो कोई बात नहीं। अब तुम खाना खा लो। धन्ना बोला कि माँ ठाकुरजी ने तो अभी खाना नहीं खाया मैं कैसे खा लूँ? धन्ना ने ठाकुरजी को बहुत कहा परन्तु ठाकुरजी ने खाना नहीं खाया। उसने सोचा शायद आज ठाकुरजी को भूख नहीं होगी। वह प्रतीक्षा करता रहा और उसे वहीं नींद आ गई। जीवन में पहली बार ऐसा हुआ होगा कि पाँच बार खाने वाले धन्ना ने खाना ही नहीं खाया।
सुबह पाँच बजे उठा और कुएँ पर जाकर स्नान किया और एक बाल्टी पानी भर कर ठाकुरजी के लिए लाया और मखमल के वस्त्र को खोला और जैसा उसे समझ आया वैसे ठाकुरजी को स्नान कराया। उसे तिलक का पता नहीं था तो उसने मिट्टी का तिलक लगाया और फूल और अगरबत्ती चढ़ाई और माँ से बोला थाली लगा दो ठाकुरजी को भोग लगाना है। माँ ने कहा कि रात वाली थाली कहाँ है उसे ले आओ। उन्होंने धन्ना से पूछा कि तुमने भी रात को खाना नहीं खाया तो वह उदास हो गई। धन्ना फिर थाली लेकर भगवान को भोग लगाने के लिए बैठा। वह बहुत उदास था कि ठाकुरजी खाना नहीं खा रहे हैं। माँ ने फिर धन्ना से कहा कि बेटा खाना खा लो। धन्ना ने कहा कि जब तक ठाकुरजी नहीं खाएँगे तो मैं भी नहीं खाऊँगा। शाम को दूध निकाला फिर भोग लगाने के लिए आया। रात में फिर थाली लगाकर भोग लगाने के लिए आया। चौबीस घण्टे से भी ज्यादा हो गए। धन्ना ने भोजन तो छोड़ो जल का एक घूँट भी नहीं पिया। माँ को अच्छा नहीं लगा कि जिस व्यक्ति ने कभी एक घण्टा भी उपवास नहीं किया वह आज चौबीस घण्टे से भूखा बैठा है।
वह ठाकुरजी से कहता रहा किन्तु ठाकुरजी ने भोग नहीं लगाया। उसे भूख लगने लगी, पीड़ा भी होने लगी थी और रात को सोया भी नहीं था। वह ठाकुरजी को देखकर रोने लगा और कहा कि ठाकुरजी आप मेरे घर में हो और भूखे हो। आप कुछ तो खा लो या दूध पी लो। वह रोने लगा और रोते-रोते उसे नींद आ गई। जब सुबह उठा तो उससे चला नहीं जा रहा था बड़ी मुश्किल से उसने स्नान किया और ठाकुरजी को स्नान कराया और दूध निकालने चला गया। माँ ने भोजन बनाया और वह भोग लगाने के लिए श्रीभगवान् के लिए पर्दा लगाकर प्रतीक्षा करने लगा। पूरा दिन श्रीभगवान् को मनाते और बातें करते बीत गया। माँ ने बहुत समझाया परन्तु वह नहीं माना और फिर भगवान् के आगे रोते-रोते फिर सो गया। अगले दिन फिर उठकर स्नान करने गया तो उसमें इतनी भी शक्ति नहीं थी कि वह कुएँ से पानी निकाल सके। उसमें बाल्टी से पानी को खींचने की शक्ति भी नहीं बची थी। थोड़े से पानी से स्नान किया और बचा हुआ पानी अपने ठाकुरजी के स्नान के लिए लाया। फिर स्नान कराया, तिलक लगाकर पुष्प चढ़ाए और फिर भोग लेकर बैठ गया। उसे लगा उससे कुछ गलती हो गई है, जिस कारण ठाकुरजी भोग स्वीकार नहीं कर रहे। पण्डितजी ने कहा था कि मैं जाट हूँ पर ठाकुरजी तो जाति का विचार नहीं करते। माँ ने जब उसका चेहरा देखा तो वह भी रोने लगी कि बेटा मान जा। खाना खा ले। परन्तु उसने कहा कि यदि मैं मर भी जाऊँ तो कोई बात नहीं, परन्तु जब तक ठाकुरजी खाना नहीं खाएँगे, मैं भी नहीं खाऊँगा।
तीसरा दिन भी बीतने लगा। उसने तीन दिन से जल भी नहीं लिया था और उसने कहा ठाकुरजी मुझे पता है तुम मेरे हाथ से नहीं खाओगे! क्योंकि मैं पण्डित नहीं हूँ। परन्तु मैंने तो सुना था कि आपके घर में सब एक समान है। परन्तु मैं जाट हूँ इसलिये तीन दिन से आप भूखे हो और ज़िद करके खाना नहीं खा रहे हो। जब इस शरीर का छुआ तुम खा नहीं सकते तो इस शरीर का क्या काम है। क्या लाभ है इस शरीर का? जिसके घर में ठाकुरजी हों और वह खाना भी न खाएँ। आवेश में आकर उसने अपना माथा ठाकुरजी के पत्थर पर दे मारा और कहा कि यदि आज नहीं माने तो मैं यहीं अपने प्राणों को त्याग दूँगा और इतना कहकर उसने दोबारा अपने माथे को उस पत्थर पर मारा। उसमें से खून निकलने लगा और रोने लगा और जैसे ही उसने अगली बार फिर से माथा मारने का प्रयास किया तो साक्षात् भगवान् नारायण वहाँ प्रकट हो गए। उसके माथे को श्रीभगवान् ने सहलाया, जिससे उसका दर्द कम हो गया। वह जोर से रोने लगा कि ठाकुरजी ने तीन दिन से खाना नहीं खाया। आप किस बात का इन्तजार कर रहे थे? क्या तुम्हें पता है कि मैंने भी तीन दिन से कुछ नहीं खाया? श्रीभगवान् मुस्कुराते हुए धन्ना की ओर देखने लगे और कहा कि धन्ना तुम मेरी परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए। कहते हैं कि ठाकुरजी ने उसी थाली में भोजन किया और धन्ना को भी उसी थाली से भोजन करवाया।
कहते हैं कि श्रीभगवान् सात दिन तक धन्ना के घर में रहे। सातवें दिन जब पण्डित जी लौटकर आए और उन्हें पता चला कि इतनी सारी बातें हुई हैं तो वे भी रोने लगे। धन्ना से बोले कि मेरा ब्राह्मण जीवन ही बेकार है। मैं उस भगवान् में भी जीवन भर पत्थर ही देखता रहा। मैंने तो तुझे एक पत्थर ही दिया था और उसमें तुझे श्रीभगवान् मिल गए। धन्ना की भक्ति भाव से पण्डित जी को वैराग्य हो गया और तपस्या करने हिमालय चले गए। धन्ना ने श्रद्धा से स्वयं को समर्पित कर दिया और श्रीभगवान् को प्रकट कर दिया।
भक्त की प्रीति सच्ची हो तो श्रीभगवान् को प्रकट होने में देर नहीं लगती।
यत्करोषि यदश्नासि, यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय, तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।9.27।।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं- हे अर्जुन! जो कुछ भी तुम करते हो, खाते हो, यज्ञ करते हो, दान देते हो, तप करते हो, सब कुछ मुझे अर्पण कर दो।
भोजन बनाने के बाद, कार्यालय का कार्य भी सब श्रीभगवान् को अर्पण करो-
ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।
इसलिये गीता जी पढ़ने के बाद ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु कहने की परम्परा है। अपने इष्टदेव के चरणों में अपने कर्म को अर्पण कर देना।
हम कर्म तो अर्पित कर देते हैं, किन्तु हम फल का त्याग नहीं करते। जब हमने उस कर्म श्रीभगवान् को अर्पण कर दिया तो फल मेरा कैसे? अर्जुन ने आठवें अध्याय में प्रश्न किया-
शुभाशुभफलैरेवं(म्), मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।
सन्न्यासयोगयुक्तात्मा, विमुक्तो मामुपैष्यसि।।9.28।।
संन्यासयोग मूल में ज्ञानयोग का है, लेकिन श्रीभगवान् ने यहाँ पर भक्तियोग में कर्म को अर्पण करने को संन्यासयोग माना है। वास्तव में यह ज्ञान, कर्म और भक्तियोग का मिश्रण है। श्रीभगवान् को कर्म अर्पित का दिया तो वह ठाकुरजी का हो गया। वह घर में रहकर भी संन्यासी हो जाएगा। कर्म अर्पण कर दिया तो फल भी ठाकुर जी का है। मुझे मिल भी गया तो भी ठाकुर जी का है।
समोऽहं(म्) सर्वभूतेषु, न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां(म्) भक्त्या, मयि ते तेषु चाप्यहम्।।29।।
1. जो भक्त मुझको प्रेम भाव से भजते हैं, मैं उनमें और वे मुझमें प्रकट हो जाते हैं।
2. सन्तों में भगवान् प्रकट हो जाते हैं।
इसलिये हमारे यहाँ गुरु को भगवान् मानते हैं।
3. सातवें अध्याय में ज्ञानी के लिए श्रीभगवान् ने कहा कि वे मुझमें होते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-
श्रीभगवान् अद्भुत घोषणा करते हुए आगे कहते हैं-
अपि चेत्सुदुराचारो, भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः(स्), सम्यग्व्यवसितो हि सः।।9.30।।
श्रीभगवान् कहते हैं कि मैं उसको साधु घोषित कर दूँगा।
इसलिये यदि कोई ऐसा दिखे जिसने जीवन में पहले ग़लती की हो तो उसका विचार नहीं करना चाहिए। उसके वर्तमान जीवन को ही प्रमाण मानना चाहिए। श्रीभगवान् ने इन गुणों को महत्त्व दिया है-
बाइसवें श्लोक में अन्यन्यता, नित्यभियुक्ता।
सत्ताईसवें श्लोक में मद् अर्पणम्।
तीसवें श्लोक में सम्यक् दर्शन, व्यवसिता।
क्षिप्रं(म्) भवति धर्मात्मा, शश्वच्छान्तिं(न्) निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि, न मे भक्तः(फ्) प्रणश्यति।।9.31।।
श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैे कि तू निश्चयपूर्वक जान कि मेरे भक्त का पतन नहीं होता। वह सदा रहने वाली परम शान्ति को प्राप्त करता है।
मां(म्) हि पार्थ व्यपाश्रित्य, येऽपि स्युः(फ्) पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रा:(स्), तेऽपि यान्ति परां(ङ्) गतिम्।।9.32।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय को भगवद् प्राप्ति का अधिकार है, बाकियों को नहीं है। स्त्रियों को तो बिल्कुल नहीं है। ऐसा कहने वाले अज्ञानी हैं।
स्त्री, वैश्य, शूद्र, चाण्डाल, पशु योनि, पादप योनि वाले व सम्पूर्ण प्राणियों को मेरी भक्ति का अधिकार है। मेरी शरण होकर वे परमगति को प्राप्त होते हैं।
किं(म्) पुनर्ब्राह्मणाः(फ्) पुण्या, भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं(म्) लोकम्, इमं(म्) प्राप्य भजस्व माम्।।9.33।।
ब्राह्मणों और राजर्षियों को भक्ति करते सबने देखा है। परन्तु श्रीभगवान् कहते हैं कि सभी को मेरी भक्ति करने का अधिकार है।
इसलिये श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं कि इस क्षणभङ्गुर जीवन को प्राप्त कर और मेरा भजन कर।
मन्मना भव मद्भक्तो, मद्याजी मां(न्) नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवम्, आत्मानं(म्) मत्परायणः।।9.34।।
विवेचन- नवम् अध्याय के चौंतीसवें श्लोक और अट्ठारहवें अध्याय के पैंसठवें श्लोक की पहली पँक्ति समान है। नवम् अध्याय अर्थात् गीता का मध्य, अट्ठारह का आधा नौ होता है। यह चौंतीसवाँ श्लोक और वह पैंसठवाँ भी लगभग आधा है। कितनी अद्भुत बात है कि दोनों की पहली पँक्ति एक समान है। दूसरी पंक्ति भिन्न है पर भाव एक ही है।
मन्मना भव मद्भक्तो, मद्याजी मां(न्) नमस्कुरु।
श्रीभगवान् कहते हैं- हे अर्जुन! तू अपने मन को मुझ में लगा। मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो, मुझको प्रणाम करने वाला हो।
गीता में माम् का अर्थ यह नहीं है कि भगवान् श्रीकृष्ण कह रहे हैं मुझमें (कृष्ण में) मन लगाओ।
इसमें श्रीकृष्ण उवाच ऐसा नहीं कहा गया है, श्रीभगवानुवाच कहा गया है। एक लाख श्लोकों की महाभारत के भीष्मपर्व में अध्याय छब्बीस से अध्याय बयालीस तक भगवद्गीता है। इन अट्ठारह अध्यायों को छोड़कर श्रीकृष्ण ने कुछ कहा है तो उसे संज्ञा दी है- श्रीकृष्ण उवाच, वासुदेव उवाच, केशव उवाच। गीताजी के अट्ठारह अध्यायों में श्रीकृष्ण उवाच न कहकर श्रीभगवानुवाच कहा गया है, क्योंकि यहाँ भगवान् परमपिता परमात्मा के रूप में बोले हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे हैं कि मेरी शरण में आओ। यहाँ साक्षात् परमात्मा भगवान् बनकर कह रहे हैं कि मेरी पूजा करो, लेकिन अपने इष्ट के प्रति परायण हो जाओ। यदि आपके इष्ट श्रीराम हैं तो रामजी की शरण में, यदि आपके इष्ट शिवजी है तो शिवजी की शरण में, जो आपके इष्ट हैं, यहाँ पर वही नाम है, उनकी शरण में जाओ। भगवद्गीता भक्ति का ग्रन्थ है। आत्मा को मुझ में लगाओ। श्रीभगवान् प्रतिज्ञा करते हैं कि मेरे पारायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा। मैं तुमको सब पापों से मुक्त करके अपने धाम में ले जाऊँगा। जहाँ पर जाकर तुम्हें वापस नहीं आना पड़ेगा।
इसके साथ गीताजी के नवम् अध्याय राजविद्याराजगुह्ययोग के विवेचन सत्र का समापन हुआ।
हरि शरणं सङ्कीर्तन के पश्चात् प्रश्नोत्तर सत्र आरम्भ हुआ।
विचार-मन्थन (प्रश्नोत्तर)-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्याय:।।