विवेचन सारांश
भगवद् प्राप्ति ही एकमात्र ध्येय

ID: 7118
हिन्दी
रविवार, 01 जून 2025
अध्याय 7: ज्ञानविज्ञानयोग
2/2 (श्लोक 12-30)
विवेचक: गीता विशारद श्री श्रीनिवास जी वर्णेकर


पारम्परिक गीत श्रृङ्खला, नाम सङ्कीर्तन, श्रीहनुमान चालीसा पाठ, प्रार्थना, दीप प्रज्वलन, श्रीभगवान् के सुन्दर विग्रह के दर्शन, भगवान् श्रीकृष्णजी की प्रार्थना, श्रीसद्गुरु चरण वन्दना के साथ भगवान् श्रीवेदव्यासजी एवं परम पूज्य स्वामी श्रीगोविन्ददेव गिरि जी को नमन करके सातवें अध्याय ज्ञानविज्ञानयोग के उत्त्तरार्द्ध सत्र का विवेचन आरम्भ हुआ।

प्रारम्भ में ही श्रीभगवान् ने अर्जुन से कहा कि समग्र ज्ञान विज्ञान बताने वाले श्रीमद्भगवद्गीता के अत्यन्त सुन्दर सातवें अध्याय, ज्ञानविज्ञानयोग को जानने के पश्चात् तुम्हें और कुछ भी जानने की आवश्यकता नहीं रहेगी।

यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ।

अभी तक श्रीभगवान् ने अनासक्त कर्मयोग के विषय में बताया। किसी से आसक्ति नहीं रखना। आसक्ति त्यागकर अपने कर्त्तव्य कर्मों को करते रहना।

अचानक ही श्रीभगवान् आसक्ति की बात करने लगते हैं-

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।

श्रीभगवान् कहते हैं कि एकमात्र आसक्ति अपने ध्येय के प्रति होनी चाहिए। अपने जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने की आसक्ति  रखनी चाहिए। परमात्मा को प्राप्त करने की आसक्ति रखनी चाहिए। अपने चित्त को उसी में आसक्त करके जो परमात्मा से योग करता है वह असंशय ही, निश्चित ही परमात्मा को जैसा जानेगा मैं वह बताता हूँ।

मां यथा ज्ञास्यसि

 भगवान् श्रीकृष्ण  तो साक्षात् परमात्मा हैं जो अर्जुन को  उपदेश दे रहे हैं।

इस अध्याय में हम सीखेंगे कि हम परमात्मा को क्यों नहीं जान पाते? परमात्मा को पाने के लिए क्या करना चाहिए?

श्रीभगवान् ने अर्जुन से कहा कि मैं तुम्हें ज्ञान और विज्ञान के विषय में बताता हूँ।

ज्ञान अलग-अलग स्तर पर होता है -

1. सामान्य ज्ञान - जैसा आँखों ने देखा। जो वस्तु दिखी हमने देखकर जान लिया कि वस्तु सामने है, कैसी है?

कानों ने शब्द सुना। कठोर है अथवा मृदु।
त्वचा ने स्पर्श किया। गर्म है अथवा ठण्डा है। 
नाक से गन्ध ली। सुगन्ध है अथवा दुर्गन्ध।

यह सामान्य ज्ञान है जिसे हम अपनी इन्द्रियों के द्वारा जान सकते हैं।

2. विज्ञान - हमारे आस-पास जो प्रकृति है, सारा संसार है, उसे सूक्ष्म रूप से जानना ही विज्ञान है।

एक लैपटॉप कैसे काम करता है? इसके अन्दर क्या-क्या होता है?, इसका विश्व के साथ कैसे सम्पर्क हो जाता है? इन सभी बातों को अच्छे से जानना ही उस लैपटॉप का विज्ञान है।

प्रकृति को सूक्ष्म से सूक्ष्म तक और विराट से विराट तक जानना का प्रयास विज्ञान है।

3. आत्मज्ञान
- अर्थात् परिपूर्ण ज्ञान कि मैं कौन हूँ? स्वयं को जानना।

स्वामी समर्थ गुरु रामदास जी ने ज्ञान की सरल सुन्दर परिभाषा दी है

आणे आपणासि आपण या नाव ज्ञान

स्वयं में स्वयं को जानना, स्वयं में स्वयं को देखना ही आत्मज्ञान है।

आत्मज्ञान की अनुभूति अर्थात् आत्मज्ञान का विज्ञान। केवल शब्दों से जानना नहीं अपितु उसका अनुभव करना अर्थात् विज्ञान।

विज्ञान की दो परिभाषाएं हैं।
1. प्रकृति का ज्ञान
2. आत्मज्ञान का अनुभव

श्रीभगवान् ने अर्जुन से कहा कि मैं तुम्हें समग्र रूप से इसके विषय में बताऊँगा।

श्रीभगवान् ने बताया कि यह प्रकृति कैसी है -

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहङ्कार। यह अष्टधा प्रकृति है। 

इसके परे जीव रूप में सारे जगत् को धारण करने वाली परा प्रकृति है -

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।

यह शरीर पञ्चमहाभूतों का बना है। मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार अन्तःकरण चतुष्टय हैं।

इस शरीर के साथ जीव जुड़ा है। जीवात्मा के कारण हम स्वयं को जान पाते हैं, शरीर में हलचल है। 

जीव से जीवात्मा तक, परा और अपरा प्रकृति और सबके परे, सबसे सूक्ष्म, सर्वश्रेष्ठ जो परमात्मा हैं, वह कहाँ हैं -

अहं कृत्सनस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ।

सारे संसार का निर्माण अर्थात् उत्पत्ति, प्रभव अर्थात् स्थिति और प्रलय अर्थात् विलीन होना, सब परमात्मा से होता है। सारे संसार का निर्माण उन्हीं से हुआ हैं, वह उन्हीं में स्थित हैं और उन्हीं में विलीन हो जाता है। ऐसे परमात्मा को हमें जानना है -

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।

मुझे छोड़ कर इस संसार में कुछ नहीं है।

जैसे बहुत सारी मणियों या पुष्पों को एक माला में धारण करने वाला सूत्र या धागा है। वैसे ही सारे ग्रह-नक्षत्रों को जिसने पिरोकर रखा है, सबको धारण करने वाले वह परमात्मा हैं।  जिस प्रकार मणियों या पुष्पों को धारण करने वाला सूत्र दिखलाई नहीं देता उसी प्रकार परमात्मा दिखाई नहीं देते।

परमात्मा को ढूँढना कैसे है? श्रीभगवान् ने अलग-अलग अपनी विभूतियाँ बताई हैं।
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च

जो कुछ भी है और जो उसका सत्त्व, मूल तत्त्व जो भी है, वह परमात्मा हैं।

बलवान व्यक्ति का बल परमात्मा हैं। 
सुन्दर पुष्प से जो सुगन्ध आती है उसका वह गन्धकोष परमात्मा ही हैं।

किसी भी व्यक्ति, वस्तु की जो विशेषता है वह परमात्मा के कारण ही है।

चौदहवें अध्याय में प्रकृति के तीन गुणों का वर्णन है - तीन गुण सत, रज और तम। प्रकृति त्रिगुणात्सक है।

7.12

ये चैव सात्त्विका भावा, राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि, न त्वहं(न्) तेषु ते मयि॥12॥

और तो क्या कहूँ - जितने भी सात्त्विक भाव हैं (और) जितने भी राजस तथा तामस (भाव हैं, वे सब) मुझ से ही होते हैं - ऐसा उनको समझो। परन्तु मैं उनमें (और) वे मुझमें नहीं हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! जो भी सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भाव, गुण हैं, उन्हीं के कारण सारा संसार बना है, सारा संसार चल रहा है । यह प्रकृति मुझ से ही बनी है। इन गुणों का निर्माण मुझ से ही हुआ है। यह बात जान लो कि मैं उनमें नहीं हूँ और वे भी मुझमे नहीं हैं। वे मुझसे निर्मित हैं, परन्तु मैं उनसे परे हूँ।

इस भाव को सन्त ज्ञानेश्वर महाराज जी सुन्दर उदाहरण से कहते हैं -

वृक्ष का रसपूर्ण बीज बोने पर पौधा निकला फिर वृक्ष बना। वृक्ष के काष्ठ से कुर्सी-मेज बनी। बीज से काष्ठ बन गया पर उस काष्ठ में बीज जैसा कहीं नहीं है। वैसे ही परमात्मा से इन तीन गुणों की प्रकृति का निर्माण हुआ है किन्तु इन तीन गुणों में परमात्मा कहीं नहीं है।

7.13

त्रिभिर्गुणमयैर्भावै:(र्), एभिः(स्) सर्वमिदं(ञ्) जगत्।
मोहितं(न्) नाभिजानाति, मामेभ्यः(फ्) परमव्ययम्॥13॥

किन्तु - इन तीनों गुण रूप भावों से मोहित यह सम्पूर्ण जगत (प्राणिमात्र) इन गुणों से अतीत अविनाशी मुझे नहीं जानता।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि इन तीन गुणों के भाव के कारण यह संसार मोहित हो गया है। उसके माया जाल में अटक कर हम तीन गुणों से परे श्रेष्ठ परमात्मा को ठीक से जान नहीं पाते। संसार के आधार, प्रभवकर्ता को ठीक से नहीं जान पाते।

7.14

दैवी ह्येषा गुणमयी, मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते, मायामेतां(न्) तरन्ति ते॥14॥

क्योंकि मेरी यह गुणमयी दैवी माया दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है। जो केवल मेरे ही शरण होते हैं, वे इस माया को तर जाते हैं।

विवेचन-श्रीभगवान् कहते हैं कि यह माया-मोह, प्रकृति, संसार श्रीभगवान् की माया है जो सामान्य नहीं है, यह दैवीय है। इसको पार करके परे जाकर समझना अत्यन्त कठिन है।

श्रीभगवान् कहते हैं कि मेरी माया को समझना अत्यन्त कठिन है। जो परमात्मा की शरणागति में आ जाते हैं। अपने ध्येय की शरण में आते हैं। जो पूर्ण रूप से परमात्मा की शरण में आते हैं। जो यह भाव रखते हैं कि मैं आपकी शरण में आया हूँ, मुझे आप चाहिए और कुछ नहीं चाहिए। उन्हें यह माया, माया नहीं लगती। वे इस माया के जाल को पार कर करके तर जाते हैं।

एक सामान्य जादूगर की माया से हम भ्रमित हो जाते हैं। जब उसकी माया को हम समझ नहीं पाते तो परमात्मा की माया को सरलता से समझना अत्यन्त कठिन है। जादूगर की माया को जानना है तो जादूगर की शरण में जाकर उसकी माया को सीखना पड़ेगा। उसी प्रकार परमात्मा की माया को समझने के लिए पूर्ण रूप से परमात्मा की शरण में जाना ही पड़ेगा।

रेगिस्तान में बहुत अधिक धूप के कारण रेत में जल दिखाई देता है। वह मृगतृष्णा का आभास होता है। विज्ञान से हम समझ पाते हैं कि यह दृष्टि भ्रम है। सूर्य की गर्मी से तप्त होने के कारण धरती पर प्रकाश का पूर्ण परावर्तन और वायुमण्डलीय अपवर्तन के कारण दूर से मृगजल की प्रतीति होती है जबकि वहाँ पानी नहीं होता। 

अज्ञान के कारण माया जाल में हम फँस जाते हैं और भटकते रहते हैं। परमात्मा को जान नहीं पाते।

परमात्मा को जानने के लिए उसकी शरण में जाना है - पूर्ण शरणागति ।

7.15

न मां(न्) दुष्कृतिनो मूढाः(फ्), प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना, आसुरं(म्) भावमाश्रिताः॥15॥

परन्तु - माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा गया है, (वे) आसुर भाव का आश्रय लेने वाले (और) मनुष्यों में महान नीच (तथा) पाप-कर्म करने वाले मूढ़ मनुष्य मेरे शरण नहीं होते।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि दुष्कर्म करने वाले, पापकर्म करने वाले, कामी मूर्ख सरलता से मेरी शरण में नहीं आते। वे अपने ही जाल में फँसे रहते हैं। माया उनके ज्ञान का हरण कर लेती है जिसके कारण वे अनुचित पाप कर्मों को सही समझते हैं।

वे समझते हैं कि पर‌मात्मा कुछ नहीं है। सारा संसार अपने आप चलता है। इसे चलाने वाला कोई नहीं है। वे समझते हैं कि नर-मादा के संयोग से संसार बनता है। वे ऐसा इसलिए सोचते हैं क्योंकि आसुरी सम्पदा उनसे चिपक जाती है। वे आसुरी भाव में जीते हैं। मेरे शरीर को सुख तो सब सुख है बाकी सब झूठ है, ऐसा कहने वाले अधम हैं।

 
ऐसे मूढ़, अज्ञानी लोग, जिनकी बुद्धि का हरण हो गया हो, कभी मेरी शरण नहीं आते। वे मुझे जानने का प्रयास भी नहीं करते। कभी मेरा भजन नहीं करते। कभी मेरी शरण में नहीं आते।

7.16

चतुर्विधा भजन्ते मां(ञ्), जनाः(स्) सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी, ज्ञानी च भरतर्षभ॥16॥

हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! पवित्र कर्म करने वाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी - (ये) चार प्रकार के मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् मेरे शरण होते हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि पवित्र कर्म करने वाले, सत्कर्म करने वाले लोग, मेरे भक्त जो मेरी शरण में आते हैं, उनके अलग-अलग कारण होते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सभी लोग मुझे जान‌ने के लिए ही मेरी शरण में आते हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपने किसी प्रयोजन के कारण ही मेरी शरण में आते हैं।

श्रीभगवान् कहते हैं कि चार प्रकार के लोग मेरी शरण में आते हैं-

1. आर्त – मनुष्य जब बहुत बड़े सङ्कट में पड़ जाता है और उसे लगता है कि अब एकमात्र भगवान् ही हैं जो बचा सकते हैं, तब वह आर्त भाव से पुकारता हुआ श्रीभगवान् की शरण में आता है।
 
द्रौपदी का चीर हरण हुआ उसने अपने पतियों की तरफ देखा। जब उसे लगा कि वे कुछ नहीं कर रहे तब द्रौपदी को लगा कि अब एकमात्र श्रीभगवान् ही मुझे बचा सकते हैं। उसने आर्त भाव से श्रीभगवान् को पुकारा। 
जब मनुष्य सङ्कट में आता है तब उसको श्रीभगवान् का ही स्मरण होता है और वह श्रीभगवान् को पुकारता है।

2. जिज्ञासु – मन में श्रीभगवान् को जानने की इच्छा रखने वाला भक्त। परमात्मा को जानता नहीं है, किन्तु जानने की इच्छा है। क्या श्रीभगवान् सच में हैं? कैसे हैं? कैसे दिखाई देते हैं? अपनी जिज्ञासा का शान्त करने का प्रयास करते हैं। उन्हें जानने के लिए श्रीभगवान् की शरण आते हैं।

3. अर्थार्थी - वह श्रीभगवान् को मानता तो है किन्तु भगवान् से कुछ अपेक्षा का भाव लेकर श्रीभगवान् के पास जाता है। मुझे सुख मिलना चाहिए। पद- प्रतिष्ठा के लिए, परीक्षा में पास होने के लिए, किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिए भगवान् की शरण में जाता है। कुछ भी माँगने के लिए भगवान् की शरण में जाता है। इस भावना से श्रीभगवान् की भक्ति करता है कि भगवद् कृपा से ही धन-सम्पत्ति सब मिलती है।

4. ज्ञानी - जानता है कि परमात्मा कौन हैं, कैसे हैं? उन्हें जानकर वह उनकी भक्ति करता है, उनसे प्रेम करता है। उनकी शरण में रहता है। इसे ज्ञानोत्तर भक्ति कहा गया है। इसे परिपूर्ण कहा गया है, क्योंकि वह पूर्ण रूप से श्रीभगवान् को जानता है।

श्रीभगवान् कहते हैं कि इनमें ज्ञानी सर्वश्रेष्ठ हैं क्योंकि वह नित्ययुक्त हैं। बाकी तीन प्रकार के भक्त अपना कार्य सिद्ध होने तक श्रीभगवान् की शरण में रहते हैं। अपना कार्य पूर्ण होने पर वे भगवान् को भूल जाते हैं। लेकिन छोटे-छोटे सङ्कटों के लिए भी श्रीभगवान् को याद करते हैं पर काम बनने पर श्रीभगवान् को भूल जाते है।

7.17

तेषां(ञ्) ज्ञानी नित्ययुक्त, एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थम्, अहं (म्) स च मम प्रियः॥17॥

उन चार भक्तों में मुझ में निरन्तर लगा हुआ, अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है; क्योंकि ज्ञानी भक्त को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह भी मुझे (अत्यन्त) प्रिय है।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि इन चार प्रकार के भक्तों में जो ज्ञानी भक्त है वह नित्ययुक्त है।

पहले तीन प्रकार के लोग सङ्कट समाप्त होने पर/ समय आने पर भगवान् को पुकारते हैं पर काम बनने पर भगवान् को भूल जाते हैं।

पति-पत्नी दोनों बैठे थे। पत्नी ने कहा आज सिनेमा देखने चलते हैं। पति ने कहा कि वहाँ गाड़ी रखने की जगह नहीं मिलती है इसलिए जाने का मन नहीं है। पत्नी ने कहा कि चलते हैं। वे श्रीभगवान् से प्रार्थना करते हैं कि हे भगवान! पार्किग की जगह दिलवा दो। सिनेमाहॉल पहुँचते ही उन्हें पार्किंग की जगह मिल जाती है। पति श्रीभगवान् से कहता है कि मुझे पार्किंग की जगह मिल गयी, आप चिन्ता मत करो। वह भूल गया कि श्रीभगवान् ने ही दिया है।  

ज्ञानी नित्ययुक्त है। उसमें कोई अन्य विचार नहीं। वह परमात्मा से परिपूर्ण रहता है। उसकी भक्ति अनन्य है।

उसे परमात्मा के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहिए। इसीलिए ज्ञानी भक्त मेरा प्रिय है और वह भी मुझे प्रेम करता है। मेरे अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता। मैं भी उसे ही प्रेम करता हूँ। 

ऐसे ज्ञानी भक्त मुझे प्रिय है। ज्ञानी तो मेरी आत्मा है। वह मेरे साथ पूर्ण रूप से स्थित है। वह मुझसे जुड़ गया है। वह मुझमें ही रहता है।

श्रीभगवान् कहते हैं कि ज्ञानी मुझे प्रिय है क्योंकि वह मेरे साथ जुड़ गया है। वह मुझमें ही रहता है। मुझमें सञ्चार करता है। वह मेरे सन्निकट रहता है। मुझमें ही रहता है।

7.18

उदाराः(स्) सर्व एवैते, ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः(स्) स हि युक्तात्मा, मामेवानुत्तमां(ङ्) गतिम्॥18॥

पहले कहे हुए सबके सब (चारों) ही भक्त बड़े उदार (श्रेष्ठ भाव वाले) हैं। परन्तु ज्ञानी (प्रेमी) तो मेरा स्वरूप ही है - (ऐसा मेरा) मत है। कारण कि वह मुझसे अभिन्न है (और) जिससे श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है, (ऐसे) मुझ में ही दृढ़ स्थित है।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि ये सभी उदार हैं, अच्छे हैं लेकिन ज्ञानी भक्त तो मेरी आत्मा है क्योंकि वह मुझे जानकर मेरे साथ एकरूप हो गया है। वह पर‌मात्मा को जानकर उसके साथ एकरूप होकर प्रेम करता है।

आकाश कितना बडा है वह आकाश ही बता सकता है‌‌, वैज्ञानिक नहीं बता सकते। वैसे ही परमात्मा को परमात्मा ही बता सकते हैं।

ज्ञानी भक्त परमात्मा के साथ एकरूप हो गया है तभी वह परमात्मा को जानता है। इसीलिए ज्ञानी भक्त के लिए श्रीभगवान् कहते हैं कि वह मेरी आत्मा है। वह मेरा हृदय है। वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। उसे जीवन में परमात्मा मिल गए हैं और कुछ नहीं चाहिए। उसे जीवन में अपना ध्येय प्राप्त हो गया है। परमात्मा की प्राप्ति हो गई है। उसे अन्य कुछ नहीं चाहिए।

उसका कुछ कर्त्तव्य नहीं बचा। उसे कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। वह परमात्मा की ही भक्ति करता रहता है।

सन्त तुकाराम महाराज जी कहते हैं-

तुका झाला पांडुरङ्गा 
त्याजे भजन राहिना

मूळ स्वभाव जाईना

तुकाराम जी महाराज भगवान् पाण्डुरङ्ग के साथ एकरूप हो गए। तुकाराम जी भगवान् पाण्डुरङ्ग के साथ एकरूप होकर भगवान् पाण्डुरङ्ग का भजन करते रहते थे क्योंकि भगवान् पाण्डुरङ्ग के साथ एकरूप होकर भजन करना उनका मूल स्वभाव हो गया था।

घर के बेटे-बेटियों का विवाह हो गया। फिर भी कुछ लोगों की प्रवृत्ति होती है कि वे दूसरों के बेटे-बेटियों का विवाह करवाने के लिए प्रयत्नरत रहते हैं कि उनका भी कल्याण हो जाए। अपने लिए कुछ नहीं चाहिए फिर भी वे प्रयत्नशील रहते हैं।

सर्वभूतहिते रताः

उन्हें स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए वह सबके हित के लिए कार्यरत रहता है। उसको सबमें भगवान् के दर्शन होते हैं। वह सबके कल्याण के लिए प्रयत्नशील रहता है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।

वह कहता नहीं है, कार्यशील रहता है।

जब तक ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो जाती, वह भक्ति नहीं कहलाती। वह उपासना होती है। ज्ञान प्राप्त होने तक जो भक्ति है वह उपासना है।

ज्ञान प्राप्ति के बाद की भक्ति, सच्ची भक्ति होती है।

वेदों में भी कर्मकाण्ड है, उपासना काण्ड है, भक्ति काण्ड नहीं है।

श्रीभगवान् कहते हैं कि ऐसे ज्ञानी भक्त मुझे प्रिय हैं। ज्ञानी तो मेरी आत्मा हैं। वह मेरे साथ पूर्ण रूप से स्थित है। वह मुझसे जुड़ गया है। वह मुझमें ही रहता है। श्रीभगवान् कहते हैं कि ज्ञानी मुझे प्रिय है क्योंकि वह मेरे साथ जुड़ गया है। वह मुझमें ही रहता है। मुझमें सञ्चार करता है। वह मेरे सन्निकट रहता है। मुझमें ही रहता है।

घर में कुछ लोग आते हैं। कुछ लोग बरामदे तक आते हैं। कुछ ड्राइङ्ग रूम तक आते हैं, कुछ रसोईघर तक आते हैं। कुछ अतिप्रिय लोग पूरे घर में स्वतन्त्रतापूर्वक घूम सकते हैं।
ज्ञानी भक्त ऐसे ही होते हैं।

7.19

बहूनां(ञ्) जन्मनामन्ते, ज्ञानवान्मां(म्) प्रपद्यते।
वासुदेवः(स्) सर्वमिति, स महात्मा सुदुर्लभः॥19॥

बहुत जन्मों के अन्तिम जन्म में अर्थात् मनुष्य जन्म में सब कुछ परमात्मा ही है - इस प्रकार (जो) ज्ञानवान मेरे शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए अनेक जन्मों तक प्रयास करके, अनेक जन्मों के बाद जीब ज्ञान प्राप्त करके मेरी शरण में रहता है।  

परमात्मा की प्राप्ति के लिए अनेक जन्म लेकर ज्ञान प्राप्त करना पड़ता है। हमें ऐसा प्रयास करना है कि हमारे अनेक जन्म हो चुके हैं और हमे इसी जन्म में भगवद्‌प्राप्ति का प्रयास करना है। भगवद्गीता हमें प्राप्त हो गई है। यह हमें हमारे परम ध्येय तक ले जा सकती है। 

जयतु-जयति गीता वाङ्मयी कृष्णमूर्तिः 

भगवद्गीता में श्रीभगवान् प्रत्यक्ष रूप में प्रकट होकर अर्जुन को उपदेश देते हैं। 

हमें ये सोचते हैं हमे उपदेश कौन देगा। गीताजी के रूप में विद्यमान साक्षात् श्रीकृष्ण मूर्ति है। जब हमें भगवद्गीता प्राप्त हो गई है तो हमें अत्यन्त तीव्र गति से उस परमात्मा की प्राप्ति होगी।

जो कुछ है, वह वासुदेव हैं। वसुदेव के पुत्र - भगवान श्रीकृष्ण। जब सब कुछ वासुदेव है तो सर्वत्र वासुदेव ही हैं। सब परमात्मा के भिन्न-भिन्न रूप हैं। 

सारे रूप उसी परमात्मा के हैं -

तेरे नाम अनेक तू एक ही है,
तेरे रुप अनेक तू एक ही है।

मैं जिसको भी मानता हूँ, केवल वह ही परमात्मा है, यह मानना उचित नहीं है। उनके अनेक रूप हैं।

शिवजी, गणेशजी, दुर्गाजी सब परमात्मा के ही रूप हैं। 

यं वैदिका मन्त्रदृशः पुराणाः इन्द्रं यमं मातरिश्वानमाहुः।
वेदान्तिनोऽनिर्वचनीयमेकं यं ब्रह्मशब्देन विनिर्दिशन्ति।

कुछ लोग उसे ब्रह्म कहते हैं और कुछ इन्द्र कहते हैं।

शैवा यमीशं शिव इत्यवोचन् यं वैष्णवा विष्णुरिति स्तुवन्ति।
बुद्धस्तथाऽर्हन्निति बौद्धजैनाः सत् श्री अकालेति च सिक्ख संतः।

कुछ शैव हैं, कुछ वैष्णव हैं जो भगवान श्रीविष्णु, भगवान श्रीराम या भगवान श्रीकृष्ण को पूजते हैं। कुछ भगवान  बुद्ध और कुछ भगवान महावीर के स्वरूप को मानते हैं।  

यं प्रार्थयन्ते जगदीशितारं स एक एव प्रभुरद्वितीयः।

वह एक ही प्रभु है, उसके रूप अनेक हैं। इस बात को समझने वाला महात्मा दुर्लभ है। 

श्रीभगवान् ने कहा कि मैं सुलभ हूँ पर ज्ञानी भक्त मिलना दुर्लभ है। श्रीभगवान् हमें प्राप्त नहीं होते क्योंकि हमारी इच्छाएँ अलग-अलग होती हैं। हम अलग-अलग रूप में श्रीभगवान् की उपासना करते हैं। हम उनके बाहरी रूप में ही अटक जाते हैं और उन रूपों को अलग मान लेते हैं।

7.20

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः(फ्), प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।
तं(न्) तं(न्) नियममास्थाय, प्रकृत्या नियताः(स्) स्वया॥20॥

परन्तु - उन-उन कामनाओं से जिनका ज्ञान हरा गया है, (ऐसे मनुष्य) अपनी-अपनी प्रकृति अर्थात स्वभाव से नियन्त्रित होकर उस उस अर्थात देवताओं के उन-उन नियमों को धारण करते हुए उन-उन देवताओं के शरण हो जाते हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार, अपनी-अपनी इच्छाओं के अनुसार मनुष्य उस की कामना के लिए और उन इच्छाओं के अनुसार उस इच्छित फल को प्रदान करने वाले देवताओं की पूजा करते हैं। उनकी शरण में जाते हैं।

कार्य निर्विघ्न हो जाए – गणेशजी की शरण।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।

शक्ति प्राप्ति के लिए हनुमानजी, दुर्गा माँ की शरण।

कला -सङ्गीत के लिए माँ सरस्वती की शरण।

अपनी-अपनी इच्छा के कारण हमारे ज्ञान का अपहरण हो जाता है और हम सोचते हैं कि अमुक फल मिल जाए फिर कुछ नहीं चाहिए। इसके लिए अन्यान्य देवताओं की शरण में जाते हैं।

गणेशजी को लाल फूल, दूर्वा, मोदक और कृष्ण भगवान् को तुलसी अर्पित करते हैं।

उन देवताओं की पूजा के नियमों का पालन करते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं कि यह ग़लत नहीं है। ऐसा करके वे‌ अप्रत्यक्ष रूप में मेरी ही पूजा करते हैं पर इस बात को भूल जाते हैं कि वे भी परमात्मा का ही कार्य कर रहे हैं।

7.21

यो यो यां(म्) यां(न्) तनुं(म्) भक्तः(श्), श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां(म्) श्रद्धां(न्), तामेव विदधाम्यहम्॥21॥

जो-जो भक्त जिस-जिस देवता का श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उस-उस देवता में ही मैं उसी श्रद्धा को दृढ़ कर देता हूँ।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि जो जिस-जिस मूर्त रूप में श्रीभगवान् की उपासना करता है, श्रद्धापूर्वक पूजा करता है। मैं ही उसके मन में श्रद्धा का निर्माण करता हूँ।

मुझे सङ्कट से बचना है तो में गणेशजी की पूजा करता हूँ। 

अलग-अलग रूपों को जानकर हम उनके बाहरी रूप में अटक जाते हैं। भूल जाते हैं कि वे परमात्मा का ही कार्य कर रहे हैं।  

जिस प्रकार हमें कोई सरकारी काम है तो हम कहाँ जाएँगे? सरकार कौन है? राष्ट्रपति हैं, प्रधानमन्त्री हैं, कमिश्नर हैं, कलेक्टर हैं या कोई मन्त्री हैं? ये सभी सरकार के ही रूप है। सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं। सरकारी काम के लिए सरकार के पास जाना है तो राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री या मुख्यमन्त्री के पास सीधे नहीं जाते। सम्बन्धित अधिकारी के पास जाकर काम करवाना पड़ता है। हमारा काम जिस प्रकार का है, हम उसी कार्यालय में जाएँगे। हमारा भूमि से सम्बन्धित कुछ काम है तो हम जिलाधिकारी के कार्यालय में जाएँगे। वहाँ के कर्मचारी से प्रार्थना करेंगे। भूमि सम्बन्धित काम के लिए हम पुलिस कमिश्नर के कार्यालय में नहीं जाएँगे। प्रत्येक काम के लिए हम प्रधानमन्त्री के कार्यालय में भी नहीं जाएँगे। 

सभी देवता भी परमात्मा के ही रूप हैं। देवताओं के अलग-अलग रूपों में श्रीभगवान् प्रकट हुए हैं। हम जिस देवता की पूजा कर रहे हैं उसके साथ यह भी जानना चाहिए कि वे परमात्मा का कार्य कर रहे हैं। 

सभी देवताओं के प्रति समान आदर होना चाहिए। सभी धर्मो के प्रति समान आदर होना चाहिए।

सर्व धर्म समभाव नहीं अपितु सर्वधर्म समादर होना चाहिए।

सभी महिलाओं का आदर करना चाहिए। मेरी माँ तो मेरी माँ है। उसके समान अन्य महिलाओं का आदर हो सकता है, परन्तु वे मेरी माँ नहीं हो सकतीं। 

स्वामी विवेकानन्द जी ने शिकागो की धर्मसंसद के विख्यात् व्याख्यान में कहा -

रुचिनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।। 

सभी की रुचि अलग-अलग हैं जिसके कारण अलग-अलग सम्प्रदाय हो गए हैं। लेकिन सभी एक ही पर‌मात्मा में जाकर विलीन हो जाते हैं। यह बात हम भूल जाते हैं और सम्प्रदायों में झगड़े हो जाते हैं।

अपनी-अपनी रुचि के अनुसार अलग-अलग देवताओं की उपासना करना अनुचित नहीं है, परन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि वे परमात्मा एक ही हैं। मैं जिनकी उपासना कर रहा हूँ वह ही श्रेष्ठ हैं, ऐसा भाव नहीं होना चाहिए। वह भी उन्हीं परमात्मा का ही रूप हैं और यह भी परमात्मा का ही रूप हैं। 

हमारे घर में विद्युत बाहर लगे मीटर से आती है। मीटर तक विद्युत ट्रांसफार्मर से आती है परन्तु ट्रांसफार्मर में जेनरेटर से आती है जहाँ विद्युत उत्पादन हो रहा है।

परमात्मा जेनरेटर की भाँति हैं।

7.22

स तया श्रद्धया युक्त:(स्), तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः(ख्) कामान्, मयैव विहितान्हि तान्॥22॥

उस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई) श्रद्धा से युक्त होकर वह मनुष्य उस देवता की (सकाम भावपूर्वक) उपासना करता है और उसकी वह कामना पूरी भी होती है; परन्तु वह कामना-पूर्ति मेरे द्वारा ही विहित की हुई होती है।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि जो परमात्मा से प्राप्त श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की आराधना करता है जिससे उसकी कामना पूर्ण हो जाती है।

जिससे भगवान् ने उनको सिद्धि दी है कि वे अपने भक्तों की कामना पूर्ण करें। जो शास्त्र सम्मत विधि से उन देवताओं की पूजा करते हैं उन्हें उसका फल देना ही पड़ता है। देवता फल देने के लिए बाध्य हैं।

7.23

अन्तवत्तु फलं(न्) तेषां(न्), तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति, मद्भक्ता यान्ति मामपि॥23॥

परन्तु उन तुच्छ बुद्धि वाले मनुष्यों को उन देवताओं की आराधना का फल अन्त वाला (नाशवान्) ही मिलता है। देवताओं का पूजन करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं (और) मेरे भक्त मेरे ही प्राप्त होते हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि वहाँ से प्राप्त होने वाला फल तात्कालिक है, उसका नाश होता है क्योंकि उसकी आयु है।

हे भगवान!  मुझे पद मिल जाए, मुझे बड़ी गाड़ी मिल जाए, मेरा घर बन जाए। मुझे यह चाहिए। मेरा अमुक कार्य हो जाए। हम नाशवान वस्तु की कामना करते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं ले लो। इससे वे श्रीभगवान् से दूर हो जाते हैं और श्रीभगवान् भी उनसे दूर हो जाते हैं।

श्रीभगवान् कहते हैं जो मुझे चाहते हैं वे मुझे ही प्राप्त होते हैं। हमारे जीवन का अन्तिम लक्ष्य परमात्मा को प्राप्त करना है। भगवान् मुझे बस आप ही चाहिए और कुछ नहीं चाहिए ऐसा भाव होना चाहिए। 

पिता दूर कार्य करते हैं। प्रातःकाल घर से निकल जाते हैं और देर रात में घर आते हैं। जब जाते हैं और घर आते हैं बालक सोता मिलता है। रविवार को छुट्टी के दिन वे खिलौने लेकर आते हैं। सच्चा प्रेम करने वाला बालक कहता है कि मुझे खिलौना नहीं आप चाहिए।
श्रीभगवान् के समक्ष जो ऐसी पुकार करते हैं, श्रीभगवान् कहते हैं वे मुझे ही प्राप्त होते हैं।

श्रीभगवान् कहते हैं कि लोग मुझे जानते नहीं हैं कि मैं कौन हूँ?

7.24

अव्यक्तं(म्) व्यक्तिमापन्नं(म्), मन्यन्ते मामबुद्धयः।
परं(म्) भावमजानन्तो, ममाव्ययमनुत्तमम्॥24॥

बुद्धिहीन मनुष्य मेरे परम, अविनाशी (और) सर्वश्रेष्ठ भाव को न जानते हुए अव्यक्त (मन-इन्द्रियों से पर) मुझ (सच्चिदानन्दघन परमात्मा) को मनुष्य की तरह शरीर धारण करनेवाला मानते हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि मैं अव्यक्त, अविनाशी, परमात्मा हूँ। लोग मुझे कृष्ण, अर्जुन के रथ का सारथी के रूप में एक व्यक्ति समझते हैं। मैं गैय्या चराता हूँ। वे भगवान् श्रीकृष्ण को व्यक्ति के रूप में देखते हैं। वे मुझे देह के रूप में समझते हैं। वे मुझे और स्वयं को व्यक्ति समझते हैं। वे बुद्धिहीन हैं, अज्ञानी हैं। वे मेरे परम भाव को नहीं जानते। वे मेरे सर्वोत्तम, अव्यय, अविनाशी स्वरूप को नहीं जानते। वे स्वयं को भी नहीं जानते। वे नहीं जानते कि मेरा भी वही स्वरूप है। वे स्वयं को एक देह समझते हैं और मुझे भी।

श्रीभगवान् कहते हैं कि मैं तो वह शुद्ध आत्मस्वरूप हूँ।

मेरी देह के द्वारा जो कार्य हो रहा है वह प्रकृति के कारण हो रहा है, मेरी देह के कारण नहीं। यह मेरी प्रकृति का कार्य है। इसका कर्ता मैं नहीं हूँ अपितु मेरी प्रकृति के कारण हो रहा है। मेरी देह त्रिगुणात्मक प्रकृति से बनी है।

ऐसा क्यों होता है? इसका उत्तर श्रीभगवान् ने अर्जुन को आगे बतलाया।

7.25

नाहं(म्) प्रकाशः(स्) सर्वस्य, योगमायासमावृतः।
मूढोऽयं(न्) नाभिजानाति, लोको मामजमव्ययम्॥25॥

यह जो मूढ़ मनुष्य समुदाय मुझे अज (और) अविनाशी ठीक तरह से नहीं जानता (मानता), उन सबके (सामने) योगमाया से अच्छी तरह से ढका हुआ मैं प्रकट नहीं होता।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि मैं सबके लिए प्रकाशित नहीं होता, सबको दिखाई नहीं देता हूँ।

जैसे  Mercury coated reflective glass के अन्दर से बाहर का दृश्य तो देखा जा सकता है पर बाहर से अन्दर का दृश्य नहीं दिखाई देता। श्रीभगवान् कहते हैं कि मेरी प्रकृति योगमाया (Mercury coated reflective glass) के समान है जिसके कारण भगवान् दिखाई नहीं देते। हम समझते है कि वे अत्यन्त दूर हैं, पर हम भूल जाते हैं कि हैं वे तो हमारे ही भीतर हैं। प्रायः अत्यन्त निकट का भी दिखाई नहीं देता।

माया के कारण हम मूढ हो गए हैं, भूल गए हैं कि भगवान् अजन्मा हैं। आत्मा का भी जन्म नहीं होता। आत्मा अजर है, अमर है। केवल देह का निर्माण होता है। परमात्मा भी अजर-अमर हैं, उन्हें हम नहीं जानते। वह अव्यय हैं अविनाशी हैं। 

दो मित्र मोबाइल पर बातें कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि एक ही हॉल में थे परन्तु बीच में दीवार होने के कारण वे एक-दूसरे को देख नहीं पा रहे थे।

इसी प्रकार माया का पर्दा होने के कारण हम परमात्मा को देख नहीं पाते।

श्रीभगवान् दिखाई नहीं देते पर जब उनकी इच्छा होती है वे प्रकट हो जाते हैं। श्रीकृष्ण को यशोदा मैय्या को दर्शन कराना था तो श्रीभगवान् ने मिट्टी खाने का स्वांग किया। मैय्या के पूछने पर मिट्टी खाई क्या लाला? कान्हा ने अपना मुख खोलकर दिखा दिया और अपने मुँह में पूरा ब्रह्माण्ड दिखा दिया। फिर माया का पर्दा डालकर भुला दिया।

भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ग्यारहवें अध्याय में अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराया।

7.26

वेदाहं(म्) समतीतानि, वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि, मां(न्) तु वेद न कश्चन॥26॥

हे अर्जुन ! जो प्राणी भूतकाल में हो चुके हैं, तथा जो वर्तमान में हैं और जो भविष्य में होंगे, (उन सब प्राणियों को) तो मैं जानता हूँ; परन्तु मुझे (भक्त के सिवाय) कोई भी नहीं जानता।

विवेचन- वेदशब्द क्रिया पद के रूप में लिया गया है।
वेद का अर्थ है - जानना

श्रीभगवान् कहते हैं कि मैं उसे जानता हूँ जो अतीत हो चुका है। मैं उसे भी जानता हूँ जो वर्तमान में हो रहा है। मैं यह भी जानता हूँ कि भविष्य में क्या होगा? मैं सब कुछ ‌जानता हूँ लेकिन मुझे कोई नहीं जानता।

इसको आइंसटीन के उदाहरण से समझते हैं कि जो हुआ ही नहीं उसे कैसे जानें - 

एक लम्बी ट्रेन की कल्पना कीजिए कि ट्रेन के गार्ड ने हरा प्रकाश  दिखाया तो उस प्रकाश को गार्ड के डिब्बे से इंजन तक पहुँचने में दो महीने लगेंगे।

सूर्य भगवान् के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में आठ मिनट लगते हैं अर्थात् हम जो सूर्य का प्रकाश देखते हैं वह आठ मिनट पहले का है। 

जो व्यक्ति दूर से सब कुछ सब जान रहा है। उसे पता चलेगा कि गार्ड के डिब्बे से दिखाया हरा प्रकाश इञ्जन तक दो महीने में पहुँचेगा। जो सर्वत्र है अब वह गार्ड के पास भी है और इञ्जन के पास भी। जो होने वाला है वह इस बात को जानता है।

जो कालातीत है, परमात्मा इसी का स्वरूप हैं। वे जानते हैं कि भविष्य में क्या होने वाला है। 

ग्यारहवें अध्याय में श्रीभगवान् कहते हैं -

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥॥

श्रीभगवान् कहते हैं जब काल भी भगवान् हैं तो वे सब कुछ जान सकते हैं, इसलिए भूत, वर्तमान और भविष्य सब कुछ जान सकते हैं। 

रात में आकाश में तारे दिखाई देते हैं। उनमें से कई तारे लाखों प्रकाश वर्ष दूर हैं। हम जो देख रहे हैं वह अतीत है। लाखों वर्ष पूर्व का तारा दिखाई दे रहा है। यह हमारा भ्रम है कि हम नई सृष्टि देख रहे हैं। 

श्रीभगवान् कहते हैं मैं अतीत, वर्तमान, भविष्य सब कुछ देख सकता हूँ लेकिन मुझे कोई नहीं देख सकता।

7.27

इच्छाद्वेषसमुत्थेन, द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि सम्मोहं(म्), सर्गे यान्ति परन्तप॥27॥

कारण कि - हे भरतवंश में उत्पन्न शत्रु तापन परंतप ! इच्छा (राग) और द्वेष से उत्पन्न होने वाले द्वन्द्व-मोह से (मोहित) सम्पूर्ण प्राणी संसार में (अनादि काल से) मूढ़ता को अर्थात् जन्म-मरण को प्राप्त हो रहे हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं - हे अर्जुन! हम संसार में चक्रों में फँसे हैं, इसलिए हम परमात्मा को देख नहीं पाते।

हमारी इच्छा-द्वेष,
(likes-dislikes,)
शीत-उष्ण,
सुख-दु:ख,
लाभ-हानि
जय-पराजय
मान-अपमान
तेरा-मेरा
के कारण हमारे मन में द्वन्द्व उत्पन्न होते हैं। इन सारे द्वन्द्वों में फँसकर हम सम्मोहित हो जाते हैं और परमात्मा को जान नहीं पाते।

7.28

येषां(न्) त्वन्तगतं(म्) पापं(ञ्), जनानां(म्) पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता, भजन्ते मां(न्) दृढव्रताः॥28॥

परन्तु जिन पुण्यकर्मा मनुष्यों के पाप नष्ट गये हैं, वे द्वन्द्व मोह से रहित हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि जो द्वन्द्व रहित होकर पुण्य कर्म करते रहते हैं उनके अन्तरङ्ग में आने वाले अनावश्यक पाप विचार धुल जाते हैं। वे संसार के मायाजाल से मुक्त हो जाते है। वे जब तक यह दृढ़ व्रत नहीं धारण करते कि मुझे परम ध्येय परमात्मा की प्राप्ति करनी है। जब तक वह यह भाव नहीं होता कि मुझे आप चाहिए वे मुक्त नहीं होते।

दृढ़ भाव रखने की शक्ति तभी मिलती है, जब मन पापरहित हो।

मन पापरहित हो इसके लिए सत्कर्म करते रहना है। पुण्य कर्म करने से पाप धुलते जाते है। अन्त‌रङ्ग में आने वाले ग़लत विचार दूर हो जाते हैं।

चित्त को साफ करने के लिए पापों को धोने के लिए ही कर्मयोग है।

7.29

जरामरणमोक्षाय, मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः(ख्) कृत्स्नम्, अध्यात्मं(ङ्) कर्म चाखिलम्॥29॥

वृद्धावस्था और मृत्यु से मुक्ति पाने के लिये जो मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को भी जान जाते हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि वृद्धावस्था में होने वाले दुःख और मृत्यु के भय से मुक्त होने की इच्छा पहने मन में होनी चाहिए। जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त होने की इच्छा होनी चाहिए। मेरे अमरत्व, अजरत्व, अजन्मा स्वरूप को प्राप्त करना चाहिए। जो मेरा आश्रय लेकर यह प्रयास करते हैं, वे मुझे ही प्राप्त करते हैं।

यदि मुझे जीवन में प्राप्त करना है तो ज्ञात होना चाहिए कि वह परम ध्येय ही मेरा आश्रय स्थान है। जो मेरे अजन्मे स्वरूप को जानकर मुझमें आश्रय रखते हैं। जो मानते हैं कि परमात्मा ही मेरा ध्येय है वही मेरा आश्रय स्थल है। वे मुझे ही प्राप्त करते हैं। 

कामासक्ति नहीं ध्येयासक्ति होनी चाहिए।

मेरे ही आश्रय से मुझमें आसक्त होकर ध्येयासक्ति होनी चाहिए। 

जो मुझमें आश्रय रखते हैं -
वे उस परम ब्रह्म को जानते हैं।
वे परिपूर्ण रूप से परमात्मा को जानते हैं।
वे आध्यात्म को जानते हैं।
कर्ता को जानते हैं।
कर्म को जानते हैं।
वे जानते हैं कैसा हो रहा है?
वे जानते हैं कि क्या हो रहा है?
उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है।

7.30

साधिभूताधिदैवं(म्) मां(म्), साधियज्ञं(ञ्) च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां(न्), ते विदुर्युक्तचेतसः॥30॥

जो मनुष्य अधिभूत तथा अधिदैव के सहित और अधियज्ञ के सहित मुझे जानते हैं, वे मुझमें लगे हुए चित्त वाले मनुष्य अन्तकाल में भी मुझे ही जानते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं जो लोग अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ और अध्यात्म के साथ, परमात्मा को भी जानते हैं कि वे कहाँ हैं? कैसे हैं? वे मृत्युकाल आने पर विचलित नहीं होते क्योंकि वे अपने ध्येय के साथ आसक्त हैं। वे मुझे जानते हैं और मेरी ही शरण में रहते हैं।

मेरी भारत माता को स्वतन्त्र करना चाहता हूँ चाहे मेरे कितने भी टुक्ड़े हो जाएँ। ऐसी इच्छा रखने वाले क्रान्तिवीर मृत्यु आने पर भी विचलित नहीं हुए क्योंकि वे अपने ध्येय के प्रति आसक्त थे, दृढ़व्रती थे। मेरी भारत माता को स्वतन्त्र देवी के रूप में  देखना चाहता हूँ, उनको मृत्यु की बाधा नहीं होती, वे अपना ध्येय जानते हैं। 

आठवें अध्याय के प्रारम्भिक दो श्लोकों में यही प्रश्न अर्जुन के मन में उठे जो हमारे मन में भी है कि अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ क्या हैं?

भगवद्गीता सिखाती है कि जीवन कैसे जीना है, मृत्यु को कैसे अपनाना है
How to live happily and how to leave happily.
इस संसार को आनन्द के साथ छोड़कर कैसे जाना है ?

हमारा ध्येय पहले निश्चित होना चाहिए। परमात्मा की प्राप्ति का ध्येय दृढ़ता से धारण करके, मायाजाल से छुड़ाकर उन परमात्मा को जानकर, अत्यधिक सुख आनन्द, सच्चिदानन्द की प्राप्ति कर सकेंगे।

परमात्मा के श्रीचरणों में अर्पण करके सातवें अध्याय ज्ञानविज्ञानयोग के विवेचन सत्र का समापन हुआ।

विचार-मन्थन (प्रश्नोत्तर)-

प्रश्नकर्ता- राधेश्याम जी 
प्रश्न - श्रीभगवान् की शरण में किस प्रकार जा सकते हैं? हम बार- बार स्मरण करते हैं, भगवान् मैं आपकी शरण में हूँ।
उत्तर - श्रीभगवान् की शरण में एक ही बार जाना पर्याप्त है। हमें बार- बार इसलिये जाना पड़ता है क्योंकि हम पूर्ण समर्पण से उनकी शरण में नहीं जाते हैं। हम कुछ सांसारिक वस्तुओं की इच्छा लेकर जाते हैं। यह भी शरणागति है पर तात्कालिक शरणागति है।इच्छा पूरी होते ही भगवान् को भूल जाते हैं।
जब हम शरणागति में श्रीभगवान् की प्राप्ति के लिए जाते हैं तो वो सम्पूर्ण शरणागति होती है। उसके बाद बार- बार नहीं जाना पड़ता।
उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति बोलता है कि मैं सिगरेट पीना छोड़ सकता हूँ। मैंने कई बार छोड़ी है। वास्तव में उसने दृढ़ संकल्प से सिगरेट पीना नहीं छोड़ा। तात्कालिक रूप से छोड़ा है। क्योंकि यदि एक बार पूर्ण रूप से सङ्कल्प लेकर छोड़ दी, तो बार-बार छोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। उसी भाँति यदि यदि पूर्ण समर्पण से श्रीभगवान् की प्राप्ति के लिए शरणागति जाते हैं तो हमें बार-बार शरणागत होने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

प्रश्नकर्ता- दीनू निषाद जी 
प्रश्न - इसी अध्याय के सोलहवें (16th) श्लोक में आर्तो का अर्थ थोड़ा समझा दीजिए।
उत्तर - सङ्कट के समय श्रीभगवान् को आर्त भाव से स्मरण करना, आतुरता से पुकारने को आर्त भक्त कहा गया है। जैसे मगर द्वारा पकड़े जाने पर गजेन्द्र हाथी का रक्षा हेतु पुकारना। जैसे कौरवों की द्यूत सभा में चीर हरण के समय द्रौपदी का आर्त स्वर मे भगवान् श्रीकृष्ण को पुकारना।

   ।। ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां (म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः॥

इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘ज्ञानविज्ञानयोग’ नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।