विवेचन सारांश
भक्तियोग का रहस्य
श्रीहनुमान चालीसा पाठ, सुमधुर प्रभु-वन्दना, गुरु-वन्दना, परमपूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज के चरणों में नमन व दीप प्रज्वलन के साथ माँ गीता का ध्यान करते हुए, श्रीमद्भगवद्गीता के बाहरवें अध्याय भक्तियोग के विवेचन हेतु सत्र आरम्भ हुआ।
सर्वप्रथम यह बताया गया कि सबसे पहले बाहरवें अध्याय का पठन क्यों किया जाता है। एक तो यह केवल बीस श्लोकों का अध्याय है, जो सरल श्लोकों का होने के कारण पढ़ने और समझने में भी सरल है। यह महाभारत के युद्ध में श्रीभगवान् और अर्जुन के मध्य गाया गीत है, गीतमय संवाद है, इसलिए इसको श्रीमद्भगवद्गीता कहा गया है। भगवत् अर्थात् श्रीभगवान्, गीता अर्थात् गीत। श्रीभगवान् द्वारा गाया गया गीत, इसलिए श्रीमद्भगवद्गीता। इस तरह इसे श्रीमद्भगवद्भगीता कहा गया।
यह गीत कब गाया गया?
महाभारत में कौरवों और पाण्डवों के युद्ध में जब महारथी अर्जुन अपने विरुद्ध में अपने ही स्वजन देखकर युद्ध न करने की सोच रहे होते हैं, विचलित हो रहे होते हैं, तो श्रीभगवान् अर्जुन को उत्साहित ( motivate) करने के लिए यह गीता उपदेश देते हुए कहते हैं कि यह धर्मयुद्ध है और युद्ध अब अवश्यम्भावी है।
यह भी बताया गया कि श्रीमद्भगवद्गीता में अट्ठारह अध्याय हैं और सात सौ श्लोक हैं। गीता को एकाग्रता से सुना और समझा जाए तो शीघ्र समझ में आएगी।
सर्वप्रथम यह बताया गया कि सबसे पहले बाहरवें अध्याय का पठन क्यों किया जाता है। एक तो यह केवल बीस श्लोकों का अध्याय है, जो सरल श्लोकों का होने के कारण पढ़ने और समझने में भी सरल है। यह महाभारत के युद्ध में श्रीभगवान् और अर्जुन के मध्य गाया गीत है, गीतमय संवाद है, इसलिए इसको श्रीमद्भगवद्गीता कहा गया है। भगवत् अर्थात् श्रीभगवान्, गीता अर्थात् गीत। श्रीभगवान् द्वारा गाया गया गीत, इसलिए श्रीमद्भगवद्गीता। इस तरह इसे श्रीमद्भगवद्भगीता कहा गया।
यह गीत कब गाया गया?
महाभारत में कौरवों और पाण्डवों के युद्ध में जब महारथी अर्जुन अपने विरुद्ध में अपने ही स्वजन देखकर युद्ध न करने की सोच रहे होते हैं, विचलित हो रहे होते हैं, तो श्रीभगवान् अर्जुन को उत्साहित ( motivate) करने के लिए यह गीता उपदेश देते हुए कहते हैं कि यह धर्मयुद्ध है और युद्ध अब अवश्यम्भावी है।
यह भी बताया गया कि श्रीमद्भगवद्गीता में अट्ठारह अध्याय हैं और सात सौ श्लोक हैं। गीता को एकाग्रता से सुना और समझा जाए तो शीघ्र समझ में आएगी।
12.1
अर्जुन उवाच
एवं(म्) सततयुक्ता ये, भक्तास्त्वां(म्) पर्युपासते|
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं (न्), तेषां(ङ्) के योगवित्तमाः||1||
अर्जुन बोले - जो भक्त इस प्रकार (ग्यारवें अध्याय के पचपनवें श्लोक के अनुसार) निरन्तर आप में लगे रहकर आप (सगुण साकार) की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निर्गुण निराकार की ही (उपासना करते हैं), उन दोनों में से उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, जो भक्त अपना कर्म मुझे ध्यान में रखकर करते हैं और अपना कर्म मुझे अर्पण करते हैं, मेरा स्मरण करते है, मेरे सगुण स्वरूप का ध्यान कर चित्रादि लगाकर, प्रसाद लगाकर, फूल चढ़ाकर, दीपक आदि जलाकर मेरा ध्यान करते है, वे मुझे प्रिय हैं।
अगले श्लोक में श्रीभगवान कहते हैं।
अगले श्लोक में श्रीभगवान कहते हैं।
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां(न्), नित्ययुक्ता उपासते|
श्रद्धया परयोपेता:(स्), ते मे युक्ततमा मताः||2||
श्रीभगवान् बोले - मुझ में मन को लगाकर नित्य-निरन्तर मुझ में लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी (सगुण साकार की) उपासना करते हैं, वे मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।
विवेचन- इस श्लोक में श्रीभगवान् बताते हैं कि ऐसे भक्त भी होते हैं जो निर्गुण निराकार स्वरूप का अथवा बिना मूर्ति, चित्र आदि के ध्यान करते हैं और निरन्तर मेरा ही स्मरण करते रहते हैं, वे भी मुझे प्रिय है ।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यम्, अव्यक्तं(म्) पर्युपासते|
सर्वत्रगमचिन्त्यं(ञ्) च, कूटस्थमचलं(न्) ध्रुवम्||3||
और जो (अपने) इन्द्रिय समूह को वश में करके चिन्तन में न आने वाले, सब जगह परिपूर्ण, देखने में न आने वाले, निर्विकार, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की तत्परता से उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में प्रीति रखन् वाले (और) सब जगह समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।
विवेचन- श्रीभगवान् इस श्लोक में बता रहे हैं कि निर्गुण रूप में वे कैसे दिखते हैं?
- निर्गुण भगवान् का कोई आकार नहीं होता है।
- अक्षर अर्थात् जिसका नाश नहीं हो सकता।
- अव्यक्तं अर्थात् जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
एक उदाहरण के द्वारा यह समझाया गया कि एक बार एक बालक ने अपनी माँ से कहा कि मैं कैसे मानूँ कि श्रीभगवान् होते हैं? बालक को समझाने के लिए माँ ने बालक के गाल पर थप्पड़ लगा दी। इस पर बालक रोने लगा और कहने लगा कि मुझे जहाँ थप्पड़ लगी है, वहाँ दर्द हो रहा है।
बालक की माँ ने कहा, यह दर्द मुझे तो दिखाई नहीं दे रहा। बालक ने कहा मगर मुझे दर्द हो रहा है, तब माँ ने बालक को समझाया कि जिस तरह तुम्हें दर्द हो रहा है, मगर दिखाई नहीं दे रहा है, परन्तु तुम्हें उसका अनुभव हो रहा है, वैसे ही श्रीभगवान् भी होते हैं, किन्तु दिखाई नहीं देते।
बालक की माँ ने कहा, यह दर्द मुझे तो दिखाई नहीं दे रहा। बालक ने कहा मगर मुझे दर्द हो रहा है, तब माँ ने बालक को समझाया कि जिस तरह तुम्हें दर्द हो रहा है, मगर दिखाई नहीं दे रहा है, परन्तु तुम्हें उसका अनुभव हो रहा है, वैसे ही श्रीभगवान् भी होते हैं, किन्तु दिखाई नहीं देते।
- पर्युपासते- अर्थात् उनकी हम उपासना करते हैं।
- सर्वत्र- सब जगह हैं।
- चिन्तिय(ञ्)- जिनके स्वरूप के बारे में सोचा नहीं जा सकता।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं(म्), सर्वत्र समबुद्धयः|
ते प्राप्नुवन्ति मामेव, सर्वभूतहिते रताः||4||
जो अपनी इन्द्रियों को वश में करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में रत और सब जगह समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।
विवेचन- बच्चों से ये प्रश्न पूछे गये-
प्रश्न- हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ कितनी होती है?
उत्तर- नाक, कान, जीभ, आँखें और त्वचा, ये हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि इन पर संयम-पूर्वक, नियन्त्रण करके, जो मेरी पूजा करता है, मेरा ध्यान करता है, वह मेरा हो जाता है, वह मुझे प्रिय लगता है।
इन्द्रियों पर संयम केवल और केवल श्रीभगवान् का ध्यान करके ही किया जा सकता है। एक वक्त में एक ही काम एकाग्रता से किया जाना चाहिए।
सर्वभूतहिते रताः
इसका अर्थ है कि हम सबके लिए अच्छा सोचें। हमें कभी भी स्वार्थी नहीं होना चाहिए। हमें कभी भी किसी को परेशान नहीं करना चाहिए, चाहे वह मानव हो या जीव हो। जीव के प्रति सदा दया का भाव रखना चाहिए।
प्रश्न- श्रीभगवान् ने पहले श्लोक में कितने तरह के भक्त बताए हैं? जिसका अधिकांश बच्चों ने सही जवाब दिया कि
प्रश्न- हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ कितनी होती है?
उत्तर- नाक, कान, जीभ, आँखें और त्वचा, ये हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि इन पर संयम-पूर्वक, नियन्त्रण करके, जो मेरी पूजा करता है, मेरा ध्यान करता है, वह मेरा हो जाता है, वह मुझे प्रिय लगता है।
इन्द्रियों पर संयम केवल और केवल श्रीभगवान् का ध्यान करके ही किया जा सकता है। एक वक्त में एक ही काम एकाग्रता से किया जाना चाहिए।
सर्वभूतहिते रताः
इसका अर्थ है कि हम सबके लिए अच्छा सोचें। हमें कभी भी स्वार्थी नहीं होना चाहिए। हमें कभी भी किसी को परेशान नहीं करना चाहिए, चाहे वह मानव हो या जीव हो। जीव के प्रति सदा दया का भाव रखना चाहिए।
प्रश्न- श्रीभगवान् ने पहले श्लोक में कितने तरह के भक्त बताए हैं? जिसका अधिकांश बच्चों ने सही जवाब दिया कि
श्रीभगवान् ने दो तरह के भक्त बताए हैं।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्, अव्यक्तासक्तचेतसाम्|
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं(न्), देहवद्भिरवाप्यते||5||
अव्यक्त में आसक्त चित्त वाले उन साधकों को (अपने साधन में) कष्ट अधिक होता है; क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्त-विषयक गति कठिनता से प्राप्त की जाती है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, निर्गुण उपासना कठिन होती है।
ये तु सर्वाणि कर्माणि, मयि सन्न्यस्य मत्पराः|
अनन्येनैव योगेन, मां(न्) ध्यायन्त उपासते||6||
परन्तु जो कर्मों को मेरे अर्पण करके (और) मेरे परायण होकर अनन्य योग (सम्बन्ध) से मेरा ही ध्यान करते हुए (मेरी) उपासना करते हैं।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, हम जो भी काम कर रहे हैं, उनको करते हुए अपना ध्यान श्रीभगवान् में रखना है। हम जो भी काम करेंगे, उसमें हमारा समर्पण तो होगा, पर उसके फल में हम लिप्त नहीं होंगे। उसके फल को हम श्रीभगवान् पर छोड़ देंगे। जैसे कि परीक्षा देना हमारा काम है, मगर अङ्क हमारे हाथ में नहीं हैं।
नम्बर कम या अधिक आने पर न दुःखी होना है और न ही हर्षित होना है। हमें बिना फल की इच्छा किए केवल अपने काम पर ध्यान देना है।
नम्बर कम या अधिक आने पर न दुःखी होना है और न ही हर्षित होना है। हमें बिना फल की इच्छा किए केवल अपने काम पर ध्यान देना है।
तेषामहं(म्) समुद्धर्ता, मृत्युसंसारसागरात्|
भवामि नचिरात्पार्थ, मय्यावेशितचेतसाम्||7||
हे पार्थ ! मुझ में आविष्ट चित्त वाले उन भक्तों का मैं मृत्युरूप संसार-समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि जो पूरे भाव और समर्पण से मेरी भक्ति करता है, मैं उसे दैवीय शक्तियाँ (devine powers) प्रदान करता हूँ, उसका दुःखों से छुटकारा करा देता हूँ, उसका उद्धार करता हूँ।
मय्येव मन आधत्स्व, मयि बुद्धिं(न्) निवेशय|
निवसिष्यसि मय्येव, अत ऊर्ध्वं(न्) न संशयः||8||
(तू) मुझ में मन को स्थापन कर (और) मुझ में ही बुद्धि को प्रविष्ट कर; इसके बाद (तू) मुझ में ही निवास करेगा (इसमें) संशय नहीं है।
विवेचन- यहाँ श्रीभगवान् कहते हैं कि मन और बुद्धि दोनों को मुझे समर्पित कर दो और फिर एकदम निश्चिन्त हो जाओ। मन और बुद्धि एकाग्र रहेगी तो मन, बुद्धि भटकेंगे नहीं। इसके लिए हमें ध्यान करना है, जिससे मन की एकाग्रता बढ़ेगी।
अथ चित्तं(म्) समाधातुं(न्), न शक्नोषि मयि स्थिरम्|
अभ्यासयोगेन ततो, मामिच्छाप्तुं(न्) धनञ्जय||9||
अगर (तू) मन को मुझ में अचल भाव से स्थिर (अर्पण) करने में अपने को समर्थ नहीं मानता, तो हे धनञ्जय ! अभ्यास योग के द्वारा (तू) मेरी प्राप्ति की इच्छा कर।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि है अर्जुन! यदि तुमसे ध्यान नहीं होता है तो इसका निरन्तर अभ्यास करो, निरन्तर इसका प्रयास करो।
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि, मत्कर्मपरमो भव|
मदर्थमपि कर्माणि, कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि||10||
(अगर तू) अभ्यास (योग) में भी (अपने को) असमर्थ (पाता) है, (तो) मेरे लिये कर्म करने के परायण हो जा। मेरे लिये कर्मों को करता हुआ भी (तू) सिद्धि को प्राप्त हो जायगा।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि यदि तुमसे यह सब भी नहीं हो सकता तो तुम जो भी कर्म करो वह मुझे समर्पित कर दो और उसका फल मुझ पर छोड़ दो।
अथैतदप्यशक्तोऽसि, कर्तुं(म्) मद्योगमाश्रितः|
सर्वकर्मफलत्यागं(न्), ततः(ख्) कुरु यतात्मवान्||11||
अगर मेरे योग (समता) के आश्रित हुआ (तू) इस (पूर्व श्लोक में कहे गये साधन) को भी करने में (अपने को) असमर्थ (पाता) है, तो मन इन्द्रियों को वश में करके सम्पूर्ण कर्मों के फल की इच्छा का त्याग कर।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, यदि यह सब भी तुम नहीं कर सकते तो अपनी इच्छाओं को त्याग दो। इसका मतलब यह नहीं है कि हम कर्म करना बन्द कर दें, हम पढ़ाई बन्द कर दें।
नहीं, श्रीभगवान् का अर्थ यह कदापि नहीं है। श्रीभगवान् का कहने का अर्थ यह है कि हम अपना कर्म करें, किन्तु फल की चिन्ता श्रीभगवान् पर ही छोड़ दें। हमें पढ़ाई तो करनी है पर परिणाम की चिन्ता नहीं करनी है, फल श्रीभगवान् पर छोड़ दें।
नहीं, श्रीभगवान् का अर्थ यह कदापि नहीं है। श्रीभगवान् का कहने का अर्थ यह है कि हम अपना कर्म करें, किन्तु फल की चिन्ता श्रीभगवान् पर ही छोड़ दें। हमें पढ़ाई तो करनी है पर परिणाम की चिन्ता नहीं करनी है, फल श्रीभगवान् पर छोड़ दें।
इसी के साथ आज के विवेचन सत्र का समापन हुआ और प्रश्नोत्तर सत्र का आरम्भ हुआ।
प्रश्नोत्तर सत्र
प्रश्नकर्ता- प्रसिद्धि दीदी
प्रश्न- गीता जी पढ़ कर हमें क्या लाभ होगा?
उत्तर- गीताजी पढ़ने से हमें अनेक लाभ होते हैं-
1) हम और अधिक बुद्धिमान हो जाते हैं।
2) हमारा मन एकाग्रचित्त हो जाता है।
3) वाणी और अधिक स्पष्ट हो जाती है।
4) मन शान्त होता है।
5) अच्छे विचारों का आगमन होता है।
6) श्रीभगवान् के प्रिय बन जाते हैं।
प्रश्नकर्ता- नमो भैया
प्रश्न- गीताजी में कितने अध्याय हैं?
उत्तर- गीताजी में अट्ठारह अध्याय हैं।
प्रश्नकर्ता- दुआ दीदी
प्रश्न- गीता जी किसने लिखी है?
उत्तर- गीता जी वेदव्यास जी ने लिखी है।
प्रश्नकर्ता- रुही दीदी
प्रश्नकर्ता- रुही दीदी
प्रश्न- जब हम किसी समस्या में होते हैं तो क्या श्रीभगवान् हमारी सहायता करते हैं?
उत्तर- जी हाँ! श्रीभगवान् हमारी सहायता करते हैं। वे स्वयं नहीं आते पर किसी न किसी को आपकी सहायता के लिए भेज देते हैं।
प्रश्नकर्ता- मुस्कान दीदी
प्रश्न- श्रीभगवान् ने गीताजी संस्कृत में ही क्यों कही?
उत्तर- उस समय की वही भाषा थी इसलिए श्रीभगवान् ने गीता जी संस्कृत में कही।
प्रश्नकर्ता- अंश भैया
प्रश्न- क्या पूजा करने से, नाम जप करने से और गीताजी पढ़ने से हम श्रीभगवान् को प्राप्त कर सकते हैं?
उत्तर- ये छोटे-छोटे तरीके होते हैं जिनसे श्रीभगवान् में हमारा मन लगने लगता है और हम भगवद् प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हैं।
।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।