विवेचन सारांश
ईश्वर प्रेम है श्रेयस
भारतीय सनातन परम्परा का पालन करते हुए सुमधुर प्रार्थना, शिरोमणि भक्त हनुमान जी की स्तुति, हनुमान चालीसा पाठ, दीप प्रज्वलन, श्रीकृष्ण वन्दना एवम् गुरू चरणों में वन्दना के साथ आज के सत्र का शुभारम्भ हुआ।
ज्ञात नहीं कि हमारे इस जन्म के कोई पुण्य कर्म है अथवा हमारे पूर्वजों के कोई सुकृत हैं या फिर किसी जन्म में किसी सन्त महापुरुष की कृपा दृष्टि हम पर पड़ गई जिस कारण ऐसा भाग्योदय हो गया, जिससे हम श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने के लिए चुन लिए गए।
विशेषतः अब जब हम लर्न गीता के पाठयक्रमानुसार तीन स्तर पार कर चौथे स्तर पर पहुँच गए तो अपेक्षा यह है कि श्रीमद्भगवद्गीता को केवल पढ़ना ही नहीं अपितु जीवन में ईश्वर प्रदत्त ज्ञान को सम्माहित करना भी अनिवार्य है। यह चिन्तन भी आवश्यक है कि किस प्रकार निजी जीवन में भी श्रीमद्भगवद्गीता सम्मिलित हो जाये। प्रत्येक विवेचन में कई बातें हमें स्वभाविक रूप से भाती हैं। उनमें से कितनी बातें हम अपने जीवन को श्रेयस्कर बनाने के लिए आत्मसात कर पाते हैं, यह ध्यान देने योग्य है।
यदि प्रत्येक विवेचन से हम कुछ नए विषयों का ज्ञान प्राप्त कर उन्हें अपने जीवन में उतार लें तो यह उसकी सार्थकता होगी। अपने स्वभाव का विश्लेषण कर यदि हम कुछ अच्छी आदतों को अपनाते हैं और कई नकारात्मक आदतों को छोड़ पाते हैं तो निश्चय ही हम अपने जीवन का उद्धार कर पायेंगे। यदि हम एक माला का जाप आरम्भ कर दें या प्रतिदिन पूजा करना आरम्भ करें या स्वस्थ रहने के लिए योगासन का अभ्यास करें या अत्यधिक मिष्ठान ग्रहण करना छोड़ दें। अपने स्वभाव की कुछ त्रुटियों पर ध्यान दें जैसे अत्यधिक क्रोध करना या व्यर्थ की बातों में समय नष्ट करना इत्यादि तो निश्चय ही हम अपना कल्याण कर पायेंगे। यह परिवर्तन सरल नहीं होता। इसकी सफलता हेतु कुछ नियम बना लेना बहुत आवश्यक है।
नित्य कर्म जैसे, माला जाप, पूजा, योगासन इत्यादि। यदि हम एक सप्ताह तक उनका पालन नहीं कर पाए तो आगामी सप्ताह तीन गुणा करने पड़ेंगे।
स्वभावगत परिवर्तन जैसे, क्रोध नहीं करना, ऊँचा नहीं बोलना, देर तक नहीं सोना इत्यादि, इनकी असफलता पर कुछ निर्धारित दण्ड का पालन करना। आध्यात्मिक रूप से यदि हम अपने जीवन को उत्कृष्ट बनाना चाहते हैं तो नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
ईश्वर निर्मित प्रकृति की दो मुख्य विशेषताएँ हैं-
विविधता एवम् परिवर्तनशीलता।
श्रीभगवान् की समस्त प्रकृति विविधता से परिपूर्ण है। एक वृक्ष पर करोड़ों पत्तियाँ हैं परन्तु कोई भी दो पत्तियाँ एक जैसी नहीं हैं। करोड़ों मनुष्य इस धरती पर हैं परन्तु सभी के अँगुलियों के निशान और नेत्रों के रेटिना एक दूसरे से भिन्न हैं। एक ही परिवार में जन्मे भाई-बहनों का चेहरा एक जैसा हो सकता है, परन्तु स्वभाव भिन्न होगा।
सड़क के चौराहों पर सफ़ेद और काली धारियों से रङ्गा भाग होता है जो पैदल चलने वालों के लिए सुनिश्चित होता है जिसे ज़ीब्रा क्रॉसिङ्ग कहते हैं। आश्चर्यजनक है कि विश्व भर में करोड़ों ज़ीब्रा हैं पर किसी के शरीर की रेखायें समान नहीं। ईश्वर की प्रकृत्ति अद्वितीय है और उनकी शक्ति का दर्शन कराती है। ब्रह्माजी द्वारा निर्मित इस भूलोक की हर रचना विशेष है। हम जैसे साधारण प्राणी तो कई वस्तुओं और मिष्ठानों को बनाने के लिए साँचों का उपयोग करते हैं परन्तु ब्रह्माजी की दिव्य शक्ति द्वारा प्रकृति की प्रत्येक रचना अद्वितीय है। भौतिक पदार्थों और भौतिक प्राणियों में अविश्वसनीय विविधता है। कोई भी दो पहाड़, नदियाँ, ग्रह और सूर्य तक एक जैसे नहीं है।
प्रकृति की दूसरी विशेषता है- परिवर्तनशीलता।
इस संसार में सब कुछ क्षणिक है। हम सबने गङ्गाजी में डुबकी लगाई है लेकिन क्या कोई एक ही जल में दो बार डुबकी लगा सकता है? जब तक हम डुबकी लगाकर बाहर निकलेंगे, तब तक जल की धारा आगे बढ़ जाती है। एक क्षण पहले जैसे संसार था, दूसरे ही क्षण परिवर्तित हो जायेगा, यह ईश्वर की रचना की विशिष्टता है।
हमारे शरीर की कोशिकाएँ भी निरन्तर परिवर्तनशील हैं। नित नई कोशिकाएँ बनती हैं और नष्ट हो जाती हैं। एक आश्चर्यजनक सत्य है कि साढ़े तीन वर्ष में हमारे शरीर की अरबों कोशिकाएँ नवीन हो जाती हैं और एक नया शरीर निर्मित हो जाता है। परमात्मा की अप्रतिम शक्ति का एक और विस्मयपूर्ण उदाहरण है कि तितली जैसा छोटा प्राणी जिसकी सङ्ख्या समस्त विश्व में आँकना सम्भव नहीं है, वे भी अपने रङ्गरूप में एक दूसरे से मेल नहीं रखते।
अपनी बुद्धि, क्षमता, रुचि, संस्कार, स्वभाव, कुल, परम्परा, देश, भाषा, धर्म, समुदाय, लिङ्ग इत्यादि के अनुसार प्रत्येक मनुष्य भिन्न है। इसी कारण हमारी सनातन परम्परा में ऐसा आग्रह नहीं रखा गया कि केवल एक ही श्रीभगवान् होंगे या एक ही पुस्तक होगी। परिवर्तनशील सृष्टि में देवताओं के स्वरुप भी बदलते हैं। सत्तर के दशक में 'जय सन्तोषी माँ' नामक चलचित्र आया था। सन्तोषी माता के उस स्वरूप को जन मानस ने इतनी श्रद्धा से अपनाया कि सिनेमा घर में लोग चप्पल उतार के जाते थे। यकायक ही पूरे देश में सन्तोषी माता के अनेकों मन्दिरों का निर्माण हो गया। वर्तमान काल में उनकी प्रसिद्धि इतनी प्रगाढ़ नहीं रह गयी।
आज के सन्दर्भ में खाटू श्याम जी, नारसिंह जी, दादा रामदेवराजी के उपासक अधिक हैं। प्रत्येक पच्चीस, पचास, सौ वर्ष में नए-नए देवता प्रकट हो जाते हैं। मनुष्य के स्वभाव के अनुसार देवताओं के स्वरूप भी बदलते हैं। जिन देवताओं का वर्णन हम वेदों में पढ़ते हैं, उनमें से किसी भी देवता का मन्दिर हमने नहीं देखा। वैदिक काल के मुख्य देवता जैसे पूषा, इन्द्र, अग्नि, वरुण, अर्यमा के मन्दिर नहीं हैं। हम यज्ञ हवन में इनकी आहुति देते हैं लेकिन मन्दिर में मूर्ति प्रतिष्ठित करके उनकी पूजा का विधान नहीं है।
भाव की भिन्नता और परिवर्तनशीलता सृष्टि का नियम है। कबीर दास जी कहते हैं-
राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट।
अन्त समय पछताएगा, जब प्राण जाएँगे छूट।।
अन्त समय पछताएगा, जब प्राण जाएँगे छूट।।
किसी ने उनसे प्रश्न किया कि आप कौन से राम का वर्णन कर रहे हैं तो कबीर जी ने चार राम की व्याख्या की जो वास्तविकता में भक्ति की चार धाराएँ हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भी वर्णित हैं।
कबीर दास जी कहते हैं-
एक राम दशरथ का बेटा।
एक राम घट-घट में लेटा।
एक राम का जगत पसारा।
एक राम इन सबसे न्यारा।
श्रीमद्भगवद्गीता के नौवें अध्याय के छब्बीसवें श्लोक में सगुण साकार परमात्मा की उपासना का वर्णन है। एक राम घट-घट में लेटा।
एक राम का जगत पसारा।
एक राम इन सबसे न्यारा।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
सातवें अध्याय में श्रीभगवान् निर्गुण निराकार की उपासना बताते हैं। हमारे यहाँ प्रकृति की पूजा का विधान है। पारसी धर्म के अनुयायी अग्नि को ही देवता मानकर उनकी पूजा करते हैं। हम प्रकृति के भिन्न रूपों जैसे वट वृक्ष, नदियाँ, गोवर्धन पर्वत, सूर्य देवता, अन्तरिक्ष में ग्रह इत्यादि की पूजा करते हैं। कई लोग प्रकाश की पूजा, कई मन्त्रों की पूजा, कई "ॐ" और अन्य किसी ध्वनि की पूजा करते हैं।तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
ये सभी विधान घटघट में लेटा राम के द्योतक हैं।
दसवें अध्याय विभूतियोग में, एक राम का जगत पसारा के दर्शन करेंगे ।
गोस्वामी जी ने कहा-
"सिया राममय सब जग जानी,
करहु प्रणाम जोरी जुग पानी।"
सारा जगत सियाराम (एक राम का जगत पसारा) का द्योतक है।
फिर कबीर दास जी ने अन्त में कहा-
एक राम इन सबसे न्यारा।
पन्द्रहवें अध्याय में श्रीभगवान् ने कहा-
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
श्रीभगवान् अपने पुरुषोत्तम अक्षर रूप के दर्शन कराते हैं जो सबसे न्यारा है। दसवें अध्याय, विभूतियोग में तीसरे राम-
"एक राम का जगत पसारा", किस प्रकार से श्रीभगवान् संसार के कण-कण में विद्यमान हैं, अर्थात् जगत में पसारे का विस्तृत वर्णन है।
इस अध्याय को जानने से पूर्व सर्वप्रथम भूत शब्द के अर्थ का ज्ञान होना अनिवार्य है। इसका अर्थ अङ्ग्रेज़ी भाषा का घोस्ट (ghost) नहीं है।
भूत अर्थात 'जो हुआ'। इसमें भूत पदार्थ एवं भूत प्राणी सभी सम्मिलित हैं। उन भूतों में जो विशिष्ट गुणों से अलङ्कृत हैं, वे विभूति कहलाते हैं।
अर्जुन ने श्रीभगवान् से कई बार आग्रह किया कि मैं शिष्य के रूप में आपके समक्ष हूँ। आप कृपा करके मुझे उस ज्ञान से अभिभूत करें जो मेरे लिए श्रेयस्कर हो, जिसमें मेरा कल्याण निहित है।
दूसरे अध्याय के सातवें श्लोक में अर्जुन कहते हैं-
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे,
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥2.7॥
तीसरे अध्याय के दूसरे श्लोक में अर्जुन कहते हैं-
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥3.2॥
पाँचवें अध्याय के पहले श्लोक में अर्जुन कहते हैं-
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ||5.1||
अर्जुन के इस विशेष आग्रह पर श्रीभगवान् ने इस अध्याय के प्रथम श्लोक का आरम्भ किया।
10.1
श्रीभगवानुवाच
भूय एव महाबाहो,शृणु मे परमं(म्) वचः।
यत्तेऽहं(म्) प्रीयमाणाय, वक्ष्यामि हितकाम्यया॥10.1॥
श्रीभगवान् बोले -- हे महाबाहो अर्जुन ! मेरे परम वचन को (तुम) फिर भी सुनो, जिसे मैं मुझमें अत्यन्त प्रेम रखने तुम्हारे लिए हित की कामना से कहूँगा।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, 'भूय एव' अर्थात् मैं तुम्हें पुनः बताता हूँ।
श्रीभगवान् पुनरावृत्ति के तीन मुख्य कारण बतलाते हैं। प्रथम कारण है कि यह 'परमं वच:' अर्थात, परम सत्य, परम धर्म, परमात्मा हैं, परम सेवा, परम लक्ष्य, परम भजन है। जो विषय सर्वोत्कृष्ट एवम् अति उत्तम हो, वह ही परम बात है। यह अनिवार्य है कि पुनः-पुनः कही जाये ताकि सुनने वाले के मन-मस्तिष्क में बस जाये।
श्रीभगवान् ने दूसरा कारण दिया प्रीयमाणाय। श्रीभगवान् अर्जुन से अतिशय प्रेम करते थे और जिससे इतना घनिष्ट लगाव हो, स्वाभाविक है कि उसके लिए हम कुछ भी कर सकते हैं। गोपियों ने जितना प्रेम श्रीभगवान् से किया वैसा किसी और ने नहीं किया और श्रीभगवान् ने जितना प्रेम अर्जुन से किया, वैसा किसी और से नहीं किया। यह विशेष जानने योग्य सत्य है कि श्रीभगवान् के प्रेम की वर्षा में अर्जुन के प्रति झुकाव अधिक रहा।
खाण्डव वन प्रसङ्ग में अग्नि देव और वरुण देव ने श्रीभगवान् से खाण्डव वन को जलाने के लिए प्रार्थना की। भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन के सङ्ग खड़े होकर पूरे खाण्डव वन को जलाया। इन्द्र देवता भी देवताओं की सेना लेकर आ गए। अर्जुन और कृष्ण ने मिलकर पूरी देवताओं की सेना को इन्द्र सहित परास्त किया। युद्ध में सफलता से प्रसन्न देवताओं ने अर्जुन को वरदान में रथ, देवदत्त नामक शङ्ख, गाण्डीव धनुष और अनेकों दिव्यास्त्र दिये।
उन्होंने कहा कि हम प्रेम को ही जगत का सार मानते हैं। उनके कथन में वास्तविकता है क्योंकि अन्य सभी साधनों की सीमितता है। एक सीमा के बाद आप उससे ज्यादा पूजा, उससे ज्यादा जप, उससे ज्यादा ध्यान नहीं कर सकते। प्रेम का ही एकमात्र ऐसा भाव है जो संसार में कितना भी बढ़ जाए तो भी आप यह नहीं कह सकते कि अब इससे ज्यादा प्रेम मैं नहीं कर सकता।
श्रीभगवान् ने गोपियों के प्रेम को विशिष्ट श्रेणी का बतलाया- 'प्रतिक्षण वर्धनम', जो प्रतिक्षण बढ़ता रहे। सूरदास जी ने कहा, 'सबसे ऊँची प्रेम सगाई' और गोपियों की भक्ति को इसलिए सबसे उत्कृष्ट भक्ति कहा गया क्योंकि गोपियों की भक्ति प्रेम भक्ति का प्रतीक है।

उद्धव जी ने गोकुल से लौटते हुए गोपियों से अपने साथ आने का आग्रह किया कि वे मथुरा में श्रीकृष्ण से भेंट कर लें तो गोपियों ने मना कर दिया और कहा कि जब तक कान्हा स्वयं उन्हें नहीं बुलाएँगे, वे नहीं आयेंगी। श्रीकृष्ण ने ग्यारह वर्ष की आयु में गोकुल छोड़ा था और छियत्तर वर्ष के दीर्घ अन्तराल के पश्चात् नन्द बाबा, यशोदा मैया, राधा जी और सभी गोप -गोपियों को कुरुक्षेत्र बुलवाया। इतनी लम्बी अवधि के उपरान्त भी गोपियों की भक्ति उतनी ही प्रगाढ़ थी।
सन्त कबीर ने गोपियों के अथाह प्रेम का वर्णन करते हुए अपने शिष्यों से कहा-
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श्रीभगवान् की भक्ति में सबसे महत्वपूर्ण भाव प्रेम है। माला, जप, उपासना, श्रीमद्भगवद्गीता या अन्य किसी उपाय में भी वह शक्ति नहीं जो प्रेम से की गयी भक्ति में है, अतः केवल श्रीभगवान् को प्रेम करना सीखना है इससे बड़ी भक्ति है ही नहीं।
श्रीभगवान् पुनरावृत्ति के तीन मुख्य कारण बतलाते हैं। प्रथम कारण है कि यह 'परमं वच:' अर्थात, परम सत्य, परम धर्म, परमात्मा हैं, परम सेवा, परम लक्ष्य, परम भजन है। जो विषय सर्वोत्कृष्ट एवम् अति उत्तम हो, वह ही परम बात है। यह अनिवार्य है कि पुनः-पुनः कही जाये ताकि सुनने वाले के मन-मस्तिष्क में बस जाये।
श्रीभगवान् ने दूसरा कारण दिया प्रीयमाणाय। श्रीभगवान् अर्जुन से अतिशय प्रेम करते थे और जिससे इतना घनिष्ट लगाव हो, स्वाभाविक है कि उसके लिए हम कुछ भी कर सकते हैं। गोपियों ने जितना प्रेम श्रीभगवान् से किया वैसा किसी और ने नहीं किया और श्रीभगवान् ने जितना प्रेम अर्जुन से किया, वैसा किसी और से नहीं किया। यह विशेष जानने योग्य सत्य है कि श्रीभगवान् के प्रेम की वर्षा में अर्जुन के प्रति झुकाव अधिक रहा।
खाण्डव वन प्रसङ्ग में अग्नि देव और वरुण देव ने श्रीभगवान् से खाण्डव वन को जलाने के लिए प्रार्थना की। भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन के सङ्ग खड़े होकर पूरे खाण्डव वन को जलाया। इन्द्र देवता भी देवताओं की सेना लेकर आ गए। अर्जुन और कृष्ण ने मिलकर पूरी देवताओं की सेना को इन्द्र सहित परास्त किया। युद्ध में सफलता से प्रसन्न देवताओं ने अर्जुन को वरदान में रथ, देवदत्त नामक शङ्ख, गाण्डीव धनुष और अनेकों दिव्यास्त्र दिये।
इसके उपरान्त अग्निदेव ने श्रीकृष्ण से भी कुछ मााँगने के लिए आग्रह किया। उन्हें ज्ञात था कि उस सर्वशक्तिमान को देने के लिए उनके पास सम्भवतः कुछ भी नहीं था, परन्तु वे श्रीभगवान् द्वारा बनाये गए नियम, कि "देवता जब किसी को दर्शन दें तो बिना कुछ दिए नहीं जा सकते" का पालन कर रहे थे। श्रीकृष्ण ने तब मुस्कुरा कर कहा-
"यदि आप देना ही चाहते हैं तो यह वरदान दीजिए कि मेरी और अर्जुन की प्रीति अखण्ड रहे।"
"यदि आप देना ही चाहते हैं तो यह वरदान दीजिए कि मेरी और अर्जुन की प्रीति अखण्ड रहे।"
इतिहास में ऐसे विलक्षण प्रेम का एकमात्र उदाहरण यही है जहाँ श्रीभगवान् ने भक्त का प्रेम मॉंगा हो।
श्रीभगवान् का तीसरा कारण है हितकाम्यया। सांसारिक व्यवहार में हम जिससे बहुत प्रेम करते हैं, उसके हित की कामना निरन्तर मन में रहती है। सांसारिक सम्बन्धों में यदि कभी ऐसा लगे कि कोई मेरे हित की कामना नहीं कर रहा है तो इसका अर्थ यह जानना चाहिए कि मेरे मन में उसके प्रति प्रेम की कमी है। सम्बन्धों को सुदृढ़ बनाने हेतु यह एक महत्त्वपूर्ण सीख है।
श्रीमद्भगवत् में वर्णन है-
एक बार मथुरा में यमुना नदी के किनारे बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने एक कमल के पुष्प को जब यमुना नदी में बहते हुए देखा तो उन्होंने उस पुष्प को अपने हाथों से उठाकर सूँघा और हृदय से लगा लिया। इससे श्रीभगवान् की आँखें भर आईं और वे भाव विभोर हो गए। उद्धवजी उनके पास खड़े थे। श्रीभगवान् को उद्धव जी भी बड़े प्रिय थे। उस काल में विष्णुजी, पितामह, महात्मा विदुर और उद्धवजी संसार के सर्वोत्कृष्ट ज्ञानी माने गए। उद्धवजी महाज्ञानी थे और सम्भवतः इसी कारण मानवीय संवेदनाओं को प्रमुखता नहीं देते थे। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा कि वे उस पुष्प को देखकर इतने व्याकुल क्यों हो रहे हैं? इस पर श्रीभगवान् ने उत्तर दिया कि यह पुष्प कोई साधारण पुष्प नहीं है। यह कमल गोकुल से आया है। वहाँ मेरे विरह में गोपियाँ और राधा मुझे बहुत याद करती हैं। मुझे इस कमल पुष्प में राधा के अङ्ग की गन्ध आती है। मेरा स्मरण करते हुए यमुना के तट पर बैठकर राधाजी रो रही हैं और मुझे याद करते-करते यह पुष्प उन्होंने अपने वक्षस्थल से लगाया और उनके आँसुओं की बूँदे इस कमल में पड़ गई।
यह सुनकर उद्धवजी हतप्रभ रह गए। उद्धवजी ज्ञानमार्गी हैं अतः उन्हें तर्क की बात ही समझ आती है। भाव की बातें उन्हें निरर्थक लगती हैं। वे श्रीभगवान् को उपदेश देना आरम्भ करते हैं। उद्धव जी कहते हैं कि आप तो बहुत ज्ञानी हैं। इस प्रकार की बातें आपको शोभा नहीं देती। श्रीभगवान् प्रेम से उनकी बात सुनते रहे और विचार किया कि अब उद्धवजी को ज्ञान देने का तथा प्रेम के सागर में गोते लगवाने का समय आ गया है। उन्होंने उद्धव जी से कहा कि आपका कहना सही है। गोकुल में सैकड़ों गोपियाँ हैं। कल सुबह आप उनके पास जाइए और वहाँ जाकर उनको अपना ब्रह्म ज्ञान देकर, उनके हृदय से मेरे विरह के भाव को समाप्त करके वापस आइए। आप समझा देंगे तो वे मुझे स्मरण नहीं करेंगी, फिर मुझे भी कठिनाई नहीं होगी और दोनों ओर की समस्या ठीक हो जाएगी।
श्रीमद्भगवत् में वर्णन है-
एक बार मथुरा में यमुना नदी के किनारे बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने एक कमल के पुष्प को जब यमुना नदी में बहते हुए देखा तो उन्होंने उस पुष्प को अपने हाथों से उठाकर सूँघा और हृदय से लगा लिया। इससे श्रीभगवान् की आँखें भर आईं और वे भाव विभोर हो गए। उद्धवजी उनके पास खड़े थे। श्रीभगवान् को उद्धव जी भी बड़े प्रिय थे। उस काल में विष्णुजी, पितामह, महात्मा विदुर और उद्धवजी संसार के सर्वोत्कृष्ट ज्ञानी माने गए। उद्धवजी महाज्ञानी थे और सम्भवतः इसी कारण मानवीय संवेदनाओं को प्रमुखता नहीं देते थे। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा कि वे उस पुष्प को देखकर इतने व्याकुल क्यों हो रहे हैं? इस पर श्रीभगवान् ने उत्तर दिया कि यह पुष्प कोई साधारण पुष्प नहीं है। यह कमल गोकुल से आया है। वहाँ मेरे विरह में गोपियाँ और राधा मुझे बहुत याद करती हैं। मुझे इस कमल पुष्प में राधा के अङ्ग की गन्ध आती है। मेरा स्मरण करते हुए यमुना के तट पर बैठकर राधाजी रो रही हैं और मुझे याद करते-करते यह पुष्प उन्होंने अपने वक्षस्थल से लगाया और उनके आँसुओं की बूँदे इस कमल में पड़ गई।
यह सुनकर उद्धवजी हतप्रभ रह गए। उद्धवजी ज्ञानमार्गी हैं अतः उन्हें तर्क की बात ही समझ आती है। भाव की बातें उन्हें निरर्थक लगती हैं। वे श्रीभगवान् को उपदेश देना आरम्भ करते हैं। उद्धव जी कहते हैं कि आप तो बहुत ज्ञानी हैं। इस प्रकार की बातें आपको शोभा नहीं देती। श्रीभगवान् प्रेम से उनकी बात सुनते रहे और विचार किया कि अब उद्धवजी को ज्ञान देने का तथा प्रेम के सागर में गोते लगवाने का समय आ गया है। उन्होंने उद्धव जी से कहा कि आपका कहना सही है। गोकुल में सैकड़ों गोपियाँ हैं। कल सुबह आप उनके पास जाइए और वहाँ जाकर उनको अपना ब्रह्म ज्ञान देकर, उनके हृदय से मेरे विरह के भाव को समाप्त करके वापस आइए। आप समझा देंगे तो वे मुझे स्मरण नहीं करेंगी, फिर मुझे भी कठिनाई नहीं होगी और दोनों ओर की समस्या ठीक हो जाएगी।
श्रीभगवान् ने कहा कि आप कल प्रातः दारुक के साथ मेरे रथ पर बैठकर, मेरे ही वस्त्र धारण करके गोकुल जाइए। मेरे वस्त्र पहनकर जाएँगे तो गोपियाँ आपकी बात अच्छे से सुन लेंगी। रात भर उद्धवजी को नींद नहीं आई। वे यही विचार करते रहे कि कौन-कौन से उपनिषद, वेद, शास्त्र, श्लोकों का ज्ञान उन सभी को बताऊॅंगा। प्रातः श्रीकृष्णजी ने उद्धवजी को अपने रथ में दारुक के साथ अपनी दिव्य वेशभूषा में ब्रज भेज दिया। रथ ने जब आधा मार्ग पार किया तो उद्धवजी को गोकुल की हवा का स्पर्श होने लगा। उनके हृदय में भावों की लहरें उमड़ने लगी। उद्धवजी ने इससे पूर्व ऐसा अनुभव नहीं किया था। वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि उनके साथ यह क्या घट रहा है। जैसे-जैसे वे मथुरा से दूर जाते जा रहे थे और ब्रज के निकट आ रहे थे, उन्होंने अनुभव किया कि उनकी आँखों से अश्रु बहने लगे। ब्रज से आने वाले प्रेम के स्पन्दन, उनके शरीर तथा मन-मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव डाल रहे थे कि उनकी आँखों से अश्रु बहते जा रहे थे।
ब्रज के निकट पहुँचते ही गोपिकाओं ने दूर से उस रथ को पहचान लिया, उस पर सवार होकर ही श्रीकृष्ण गोकुल से मथुरा गए थे। दूर से ही बालकों और गोकुल वासियों ने श्रीभगवान् का रथ देखा तो वहाँ खुशी की लहर दौड़ गई कि भगवान् श्रीकृष्ण का रथ आ रहा है। रथ थोड़ा और निकट आया तो सब को विश्वास हो गया कि ये तो श्रीकृष्ण ही हैं। वही वस्त्र और मोर मुकुट भी लगा हुआ है। गोकुल में त्यौहार का वातावरण छा गया।
रथ जब एकदम समीप आया तब उन्हें ज्ञात हो गया कि ये तो हमारे कन्हैया नहीं है। गोकुल वासियों ने उनका स्वागत तक नहीं किया और मुड़कर वापस लौट गए। उद्धवजी का किसी ने अभिवादन नहीं किया क्योंकि उन्हें तो उनके भगवान् श्रीकृष्ण की प्रतीक्षा थी।
रथ जब एकदम समीप आया तब उन्हें ज्ञात हो गया कि ये तो हमारे कन्हैया नहीं है। गोकुल वासियों ने उनका स्वागत तक नहीं किया और मुड़कर वापस लौट गए। उद्धवजी का किसी ने अभिवादन नहीं किया क्योंकि उन्हें तो उनके भगवान् श्रीकृष्ण की प्रतीक्षा थी।
स्वयं ही रथ से उतरकर उद्धव जी ने गोकुल वासियों से कहा कि श्रीकृष्ण ने ही मुझे भेजा है। यह सुनते ही गोकुल वासी दौड़ कर वापस आए और उद्धवजी से प्रश्न करने लगे, आदर पूर्वक उन्हें भोजन करवाया। गोकुलवासी अत्यन्त उत्साहित होकर श्रीकृष्ण की कहानियाँ सुनाते गए और वे सुनते गए। पूरी रात्रि इसी प्रकार बीत गई। उद्धवजी एक भी अक्षर उच्चरित नहीं कर पाए। वे गोकुलवासियों के व्यवहार से आश्चर्यचकित थे। तीन मास तक गोपियाँ उद्धव जी को प्रतिदिन साथ में लेकर उस हर स्थान पर गईं जहाँ भगवान् कृष्ण के साथ कुछ न कुछ घटना हुई थी। छोटी-छोटी बातें जैसे- यहाँ पर कन्हैया बैठा करता था, यहाँ पर लकड़ी रखते थे और भी ढेर सारे प्रसङ्ग। वे उन्हें कहानियाँ सुनाती गईं और वे सुनते गए। तीन मास बीत जाने पर उद्धव जी ने सोचा कि श्रीकृष्ण ने जिस कार्य के लिए मुझे भेजा है वह नहीं किया तो कान्हा मुझ पर हँसेगा।
उद्धव जी ने गोपियों को थोड़ा ज्ञान देने का प्रयास किया और गोपियों ने ध्यानपूर्वक सुना। उन्होंने उद्धव के उपदेशों को सुना और अन्त में एक बात कही-
उद्धव मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, कौ अवराधै ईस।।
आप जिस मन को परमात्मा में लगाने को कह रहे हैं, वह मन तो हमारे पास है ही नहीं। एक मन था, वह तो श्याम के साथ ही चला गया।
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, कौ अवराधै ईस।।
आप जिस मन को परमात्मा में लगाने को कह रहे हैं, वह मन तो हमारे पास है ही नहीं। एक मन था, वह तो श्याम के साथ ही चला गया।
उन्होंने कहा कि हम प्रेम को ही जगत का सार मानते हैं। उनके कथन में वास्तविकता है क्योंकि अन्य सभी साधनों की सीमितता है। एक सीमा के बाद आप उससे ज्यादा पूजा, उससे ज्यादा जप, उससे ज्यादा ध्यान नहीं कर सकते। प्रेम का ही एकमात्र ऐसा भाव है जो संसार में कितना भी बढ़ जाए तो भी आप यह नहीं कह सकते कि अब इससे ज्यादा प्रेम मैं नहीं कर सकता।
श्रीभगवान् ने गोपियों के प्रेम को विशिष्ट श्रेणी का बतलाया- 'प्रतिक्षण वर्धनम', जो प्रतिक्षण बढ़ता रहे। सूरदास जी ने कहा, 'सबसे ऊँची प्रेम सगाई' और गोपियों की भक्ति को इसलिए सबसे उत्कृष्ट भक्ति कहा गया क्योंकि गोपियों की भक्ति प्रेम भक्ति का प्रतीक है।
सूरदास जी ने एक सुन्दर भजन लिखा है -
उद्धव जी ने गोकुल से लौटते हुए गोपियों से अपने साथ आने का आग्रह किया कि वे मथुरा में श्रीकृष्ण से भेंट कर लें तो गोपियों ने मना कर दिया और कहा कि जब तक कान्हा स्वयं उन्हें नहीं बुलाएँगे, वे नहीं आयेंगी। श्रीकृष्ण ने ग्यारह वर्ष की आयु में गोकुल छोड़ा था और छियत्तर वर्ष के दीर्घ अन्तराल के पश्चात् नन्द बाबा, यशोदा मैया, राधा जी और सभी गोप -गोपियों को कुरुक्षेत्र बुलवाया। इतनी लम्बी अवधि के उपरान्त भी गोपियों की भक्ति उतनी ही प्रगाढ़ थी।
सन्त कबीर ने गोपियों के अथाह प्रेम का वर्णन करते हुए अपने शिष्यों से कहा-
कबिरा-कबिरा क्यूं कहे, जा जमुना के तीर।
एक गोपी के प्रेम में बह गये कोटि कबीर॥
एक गोपी के प्रेम में बह गये कोटि कबीर॥
श्रीभगवान् की भक्ति में सबसे महत्वपूर्ण भाव प्रेम है। माला, जप, उपासना, श्रीमद्भगवद्गीता या अन्य किसी उपाय में भी वह शक्ति नहीं जो प्रेम से की गयी भक्ति में है, अतः केवल श्रीभगवान् को प्रेम करना सीखना है इससे बड़ी भक्ति है ही नहीं।
न मे विदुः(स्) सुरगणाः(फ्), प्रभवं(न्) न महर्षयः।
अहमादिर्हि देवानां(म्), महर्षीणां(ञ्) च सर्वशः॥10.2॥
यह (विज्ञान सहित ज्ञान अर्थात् समग्र रूप) सम्पूर्ण विद्याओं का राजा (और) सम्पूर्ण गोपनीयों का राजा है। यह अति पवित्र (तथा) अतिश्रेष्ठ है (और) इसका फल भी प्रत्यक्ष है। यह धर्ममय है, अविनाशी है (और) करने में बहुत सुगम है अर्थात् इसको प्राप्त करना बहुत सुगम है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, हे अर्जुन! मेरी उत्पत्ति को न देवतागण जानते हैं न ही कोई महान ऋषिगण और न विद्वत् जन जानते हैं क्योंकि मैं ही सब प्रकार से सब देवों तथा महर्षियों का आदि कारण हूँ। श्रीभगवान् ने चौथे अध्याय के नौवें श्लोक में कहा, मैं तो पैदा ही नहीं हुआ।
जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवं यो वेत्ति तत्त्वतः।।
हम सबके साथ भी कभी ऐसा अनुभव हुआ होगा कि अपनी शादी का एल्बम (album) खोला तो हमारी अबोध सन्तान पूछती है कि उस चित्र सङ्ग्रह में उसका चित्र क्यों नहीं है? अन्य सभी रिश्ते-नाते तो उपस्थित हैं और सबके चित्र भी हैं। उन्हें यह समझाना कठिन होता है कि उनकी उत्पत्ति तो शादी के बाद हुई।
इसी प्रकार श्रीभगवान् यहाँ समझाते हैं कि जिन महर्षियों को, मुनियों को अथवा देवताओं को उन्होंने उत्पन्न किया, वे परमात्मा को कैसे जान सकते हैं ?
जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवं यो वेत्ति तत्त्वतः।।
हम सबके साथ भी कभी ऐसा अनुभव हुआ होगा कि अपनी शादी का एल्बम (album) खोला तो हमारी अबोध सन्तान पूछती है कि उस चित्र सङ्ग्रह में उसका चित्र क्यों नहीं है? अन्य सभी रिश्ते-नाते तो उपस्थित हैं और सबके चित्र भी हैं। उन्हें यह समझाना कठिन होता है कि उनकी उत्पत्ति तो शादी के बाद हुई।
इसी प्रकार श्रीभगवान् यहाँ समझाते हैं कि जिन महर्षियों को, मुनियों को अथवा देवताओं को उन्होंने उत्पन्न किया, वे परमात्मा को कैसे जान सकते हैं ?
यो मामजमनादिं(ञ्) च,वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढः(स्) स मर्त्येषु, सर्वपापैः(फ्) प्रमुच्यते॥10.3॥
जो (मनुष्य) मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकों का महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़ता से (संदेह रहित) स्वीकार कर लेता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान है (और) (वह) सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।
विवेचन- श्रीराम ने शबरी को उपदेश दिया-
"मम दरसन फल परम अनूपा।
जीव पावहि निज सहज सरूपा॥
तुलसी रामायण में वाल्मीकि जी ने कहा- जिस पल मनुष्य तुम्हें जानता है वह "तुम" ही हो जाता है।
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
श्रीभगवान् ने यहाँ "लोकमहेश्वरम" कहा। हमने चौदह लोकों की बात सुनी है।
सात ऊपर के लोक, सात नीचे के लोक, बीच में पृथ्वी लोक।
स्थूल लोक चौदह हैं। श्रीभगवान् यहाँ अन्दर के बीस लोक बता रहे हैं।
पूर्व के विवेचन में चिदाकाश, महाकाश, घटाकाश का वर्णन किया गया है।
"मम दरसन फल परम अनूपा।
जीव पावहि निज सहज सरूपा॥
अर्थात् मेरे दर्शन का प्रभाव यही है कि जीव अपने सहज स्वरूप को पा जाता है और उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
तुलसी रामायण में वाल्मीकि जी ने कहा- जिस पल मनुष्य तुम्हें जानता है वह "तुम" ही हो जाता है।
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
श्रीभगवान् ने यहाँ "लोकमहेश्वरम" कहा। हमने चौदह लोकों की बात सुनी है।
सात ऊपर के लोक, सात नीचे के लोक, बीच में पृथ्वी लोक।
स्थूल लोक चौदह हैं। श्रीभगवान् यहाँ अन्दर के बीस लोक बता रहे हैं।
पूर्व के विवेचन में चिदाकाश, महाकाश, घटाकाश का वर्णन किया गया है।
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः, क्षमा सत्यं(न्) दमः(श्) शमः।
सुखं(न्) दुःखं(म्) भवोऽभावो, भयं(ञ्) चाभयमेव च॥10.4॥
बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम तथा सुख, दुःख, उत्पत्ति, विनाश, भय, अभय और
10.4 writeup
अहिंसा समता तुष्टि:(स्), तपो दानं(म्) यशोऽयशः।
भवन्ति भावा भूतानां(म्),मत्त एव पृथग्विधाः॥10.5॥
अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, यश और अपयश - प्राणियों के (ये) अनेक प्रकार के और अलग-अलग (बीस) भाव मुझसे ही होते हैं।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! बुद्धि, ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों को वश में करना, मन का निग्रह, सुख-दुःख की उत्पत्ति, प्रलय, अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान, कीर्ति, अपकीर्ति प्राणियों के ये नाना प्रकार के भाव मुझसे ही हैं।
श्रीभगवान् प्राणियों के चित्ताकाश के ये बीस भाव बताते हैं-
प्रश्नकर्ता- राजेन्द्र भैया।
प्रश्नकर्ता- वरूण भैया
श्रीभगवान् प्राणियों के चित्ताकाश के ये बीस भाव बताते हैं-
बुद्धि- अर्थात् निर्णयशक्ति। "क्या ठीक रहेगा और क्या ठीक नहीं है" की पहचान कर सटीक निर्णय ले पाना ईश्वरीय वरदान है।
ज्ञान- सार-असार, ग्राह्य-अग्राह्य, नित्य-अनित्य, सत्य-असत्य, उचित-अनुचित, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य, प्रकृति-पुरुष का ज्ञान।
असम्मोह- सम्मोह अर्थात् मोह में हम सबको अपना मानना। हम शरीर को अपना मानते हैं, इसलिए शरीर से जुड़े हुए रिश्तों को अपना मानते हैं। यह मोह है।
श्रीभगवान् कहते हैं कि जब यह शरीर ही तुम्हारा नहीं है तो शरीर से जुड़े हुए रिश्ते भी नहीं हैं। यह ज्ञान जब विकसित होता है तो असम्मोह की स्थिति आती है। आपने सम्मोहन विद्या के बारे में सुना है। कोई पेण्डुलम घुमाता है और आपको कुछ निर्देश देता रहता है। आप घूमते हुए पेण्डुलम को देखते जाते हैं और उस व्यक्ति के निर्देशानुसार सोचते जाते हैं। धीरे-धीरे वह व्यक्ति आपको सम्मोहित करने में सफल हो जाता है। आपको वही दिखने लगता है जो वह कह रहा होता है। इस प्रकार हम सम्मोह के कारण वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति में अपनी प्रीति के कारण जकड़े जाते हैं।
सभी पाण्डव धर्मावतार थे। अन्तिम समय में श्रीभगवान् ने केवल मोह की परीक्षा ली। धर्मराज युधिष्ठिर स्वर्गारोहण के लिए निकले तो द्रौपदी सहित चारों पाण्डवों ने कहा वे भी साथ में जाएँगे। युधिष्ठिर महाराज ने उनका प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया, परन्तु यह भी स्पष्ट किया कि अब उनका किसी से कोई सम्बन्ध नहीं है। सभी मार्ग में अपने कर्मानुसार सफल या विफल होंगे। वे किसी की सहायता करने के लिए बाध्य नहीं हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि जब यह शरीर ही तुम्हारा नहीं है तो शरीर से जुड़े हुए रिश्ते भी नहीं हैं। यह ज्ञान जब विकसित होता है तो असम्मोह की स्थिति आती है। आपने सम्मोहन विद्या के बारे में सुना है। कोई पेण्डुलम घुमाता है और आपको कुछ निर्देश देता रहता है। आप घूमते हुए पेण्डुलम को देखते जाते हैं और उस व्यक्ति के निर्देशानुसार सोचते जाते हैं। धीरे-धीरे वह व्यक्ति आपको सम्मोहित करने में सफल हो जाता है। आपको वही दिखने लगता है जो वह कह रहा होता है। इस प्रकार हम सम्मोह के कारण वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति में अपनी प्रीति के कारण जकड़े जाते हैं।
सभी पाण्डव धर्मावतार थे। अन्तिम समय में श्रीभगवान् ने केवल मोह की परीक्षा ली। धर्मराज युधिष्ठिर स्वर्गारोहण के लिए निकले तो द्रौपदी सहित चारों पाण्डवों ने कहा वे भी साथ में जाएँगे। युधिष्ठिर महाराज ने उनका प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया, परन्तु यह भी स्पष्ट किया कि अब उनका किसी से कोई सम्बन्ध नहीं है। सभी मार्ग में अपने कर्मानुसार सफल या विफल होंगे। वे किसी की सहायता करने के लिए बाध्य नहीं हैं।
सफलता की शर्त थी कि कोई भी पीछे मुड़कर नहीं देखेगा। जिसने इस शर्त का उल्लङ्घन किया वह सशरीर स्वर्ग नहीं जायेगा। सभी मार्ग पर चलने लगे। सबसे पहले द्रौपदी गिरी तो द्रौपदी को देखने हेतु नकुल मुड़े। नकुल भी वहीं गिर गए। नकुल को देखने के लिए सहदेव मुड़े तो सहदेव भी गिर गए। सहदेव को देखने के लिए अर्जुन मुड़े तो अर्जुन भी गिर गए। अर्जुन को देखने के लिए भीम मुड़े तो भीम भी गिर गए। युधिष्ठिर महाराज अन्त तक नहीं मुड़े। उन्होंने सबको त्याग कर असम्मोह की स्थिति प्राप्त की और वे स्वर्ग के द्वार तक पहुँचे।
देवदूत उन्हें देव विमान में लेने आए परन्तु एक कुत्ता युधिष्ठिर महाराज के साथ स्वर्ग द्वार तक पहुँच गया था। देवदूत ने युधिष्ठिर महाराज को कुत्ते को छोड़ कर स्वर्ग द्वार में प्रविष्ट होने की अनुमति दी। युधिष्ठिर महाराज ने उनका आदेश अस्वीकार कर दिया और कहा कि कुत्ता उनके शरणागत है। परीक्षा मोह त्याग की थी, धर्म त्याग की नहीं। महाराज युधिष्ठिर अपने निर्णय पर अटल थे। उन्होंने कहा, मैं स्वर्ग का त्याग कर सकता हूँ परन्तु धर्म का कदापि नहीं, "या तो यह शरणागत कुत्ता मेरे साथ जाएगा, अन्यथा मैं भी नहीं जाऊँगा"।
देवदूत उनकी प्रतिक्रिया से असमञ्जस में पड़ गया। ऐसा दुर्लभ अवसर कोई एक जानवर के लिए क्यों गँवाना चाहेगा? उसी समय उस श्वान के रूप में साक्षात धर्मराज प्रकट हुए। वे युधिष्ठिर महाराज की परीक्षा लेने आए थे। वे युधिष्ठिर महाराज की धर्म निष्ठता से अति प्रभावित हुए। युधिष्ठिर महाराज में न मोह का लेश है और न ही विपरीत स्थिति में उन्होंने धर्म को त्यागा। युधिष्ठिर महाराज सशरीर स्वर्ग गए। बाकी सब पाण्डव भी स्वर्ग को गए।
क्षमा- 'क्षमा वीरस्य भूषणम्'। गाँधी जी कहते थे कि क्षमा शक्तिशालियों का गुण है। दण्ड देने का अधिकार होने पर भी जो क्षमा कर सकता है, वही क्षमा है। यह अत्यन्त दैवीय सद्गुण है।
सत्य- जीवन सत्य का पाठ है। हमारी वाणी, व्यवहार और भावना में सत्य का वास होना चाहिए। यदि हम सोचते कुछ हैं, बोलते कुछ और हैं और करते कुछ और ही हैं तो वह असत् है। जीवन में सत्य का पालन करने से ही आध्यात्मिक उन्नति होती है।
दम और शम- इन्द्रियों और मन का निग्रह। मैं कैसा विचार करता हूँ, मैं क्या देखूँगा, मैं क्या खाऊँगा, मैं क्या स्पर्श करूँगा, यह सब मेरे ही नियन्त्रण में है।
सुख-दुःख- अनुकूलता का मिलन और प्रतिकूलता का वियोग सुख की अनुभूति है और अनुकूलता का वियोग और प्रतिकूलता का मिलन दु:ख प्रदान करता है अर्थात् अनुकूलता और प्रतिकूलता के प्रति हमारा दृष्टिकोण ही हमें सुख और दुख की अनुभूति देता है।
भय- जितना श्रीभगवान् पर आश्रय पक्का होगा। सद्गुरु पर आश्रय भी पक्का होगा। जीवन में किसी बात का भय नहीं होगा। जीवन में जितना अधिक भय है इसका अर्थ यह है कि श्रीभगवान् पर उतना ही विश्वास कम है।
अहिंसा- किसी को मेरे द्वारा कष्ट नहीं पहुँचे, यही अहिंसा है। हम लोग अपने साथ बहुत हिंसा करते हैं क्योंकि जितनी अपेक्षाएँ हम दूसरों से करते हैं वे अपने को कष्ट देने के लिए करते हैं। कोई दूसरा हमें दुःख नहीं देता, अपनी अपेक्षाओं के कारण हम दु:खी होते हैं।
समता- दूसरे अध्याय के अड़तालीसवें श्लोक में श्रीभगवान् ने कहा है-
हरिनाम सङ्कीर्तन के साथ आज का विस्तृत, ज्ञानपूर्ण विवेचन सम्पन्न हुआ।
अहिंसा- किसी को मेरे द्वारा कष्ट नहीं पहुँचे, यही अहिंसा है। हम लोग अपने साथ बहुत हिंसा करते हैं क्योंकि जितनी अपेक्षाएँ हम दूसरों से करते हैं वे अपने को कष्ट देने के लिए करते हैं। कोई दूसरा हमें दुःख नहीं देता, अपनी अपेक्षाओं के कारण हम दु:खी होते हैं।
समता- दूसरे अध्याय के अड़तालीसवें श्लोक में श्रीभगवान् ने कहा है-
समत्वं योग उच्यते।
जीवन में सन्तुलन बनाकर चलना ही समता है।
तुष्टि- सन्तोष। महाभारत के यक्ष प्रसङ्ग में यक्ष ने युधिष्ठिर महाराज से पूछा-
को दरिद्रः?
युधिष्ठिर महाराज ने कहा-
असन्तुष्टः स दरिद्रः।
अर्थात् जो असन्तुष्ट है, वह दरिद्र है। चाहे वह कितना ही धनवान हो, कितना ही प्रसिद्ध हो, यदि वह सन्तुष्ट नहीं है तो वह दरिद्र है।
को दरिद्रः?
युधिष्ठिर महाराज ने कहा-
असन्तुष्टः स दरिद्रः।
अर्थात् जो असन्तुष्ट है, वह दरिद्र है। चाहे वह कितना ही धनवान हो, कितना ही प्रसिद्ध हो, यदि वह सन्तुष्ट नहीं है तो वह दरिद्र है।
तप- प्रसन्नतापूर्वक अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए कष्टों को सहना ही तप है। एकादशी के व्रत का पालन प्रसन्नता पूर्वक करना तप है।
इस प्रकार श्रीभगवान् ने हमारे अन्तर्मन के बीस भाव बताए हैं।
हरिनाम सङ्कीर्तन के साथ आज का विस्तृत, ज्ञानपूर्ण विवेचन सम्पन्न हुआ।
इसके पश्चात प्रश्नोत्तर सत्र आरम्भ हुआ।
प्रश्नकर्ता- राजेन्द्र भैया।
प्रश्न- सतयुग में धर्म शत-प्रतिशत अच्छा चल रहा था। द्वापर युग में थोड़ा कम हो गया फिर त्रेता युग में थोड़ा और कम हो गया। अब कलयुग में आपको पता ही है कि कैसा चल रहा है? हर युग में श्रीभगवान् अवतार लेकर आते हैं और दुष्टों का दमन कर रहे हैं फिर भी पाप बढ़ता जा रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है?
उत्तर- श्रीभगवान् के अवतार समय-समय पर हुए हैं परन्तु फिर भी सतयुग से धर्म घटता हुआ क्यों दिखता है यह आपका प्रश्न है।
धर्म के चार पग हैं- सत्य, तप, दया और दान। इसमें तप का ह्रास तो सतयुग में हो गया। सतयुग में मनुष्य झूठ नहीं बोलता था। फिर द्वापर युग आया उसमें सत्य चला गया। फिर त्रेता में दया भी चला गया। अब केवल धर्म का एक पग है दान। उस दान पर यह कलयुग टिका हुआ है। अब कोई भी मनुष्य न तो सम्पूर्ण सत्यवादी होता है और न ही कोई हिमालय में जाकर तपस्या करता है और न ही अब दधीचि मुनि की तरह अपनी हड्डियों का दान दूसरों के लिए कर सकता है। इतनी दया अब किसी में भी नहीं है और इस कारण धर्म का स्वभाव मनुष्य में घटता हुआ दिख रहा है।
वास्तव में धर्म घटता या बढ़ता नहीं है। इसके पालन की रीतियाँ बदलती रहती हैं। अच्छे लोग सतयुग में ज्यादा थे या फिर आज ज्यादा हैं। बुरे लोग सतयुग में कम थे या आज कम हैं। यह फैसला हम नहीं कर सकते। सतयुग में धर्म के चारों पग थे तो भी हिरण्यकश्यपु सतयुग में पैदा हुआ था। सतयुग में बड़े-बड़े राक्षस भी पैदा हुए थे। इसी प्रकार त्रेता और द्वापर में भी दुर्योधन, कंस और रावण जैसे राक्षस मिलते हैं और आजकल भी ऐसे राक्षस प्रजाति के लोग मिलते हैं, जैसे आतङ्कवादी,
जो कश्मीर में घुसकर, धर्म पूँछकर गोली मार देते हैं। ये सब राक्षस प्रजाति में ही आते हैं। अच्छे और बुरे लोग हर काल में मिलते हैं। श्रीभगवान् की जो प्रवृत्ति है वह सत, रज और तम से मिलती है।
न कभी तमोगुण समाप्त होता है, न रजोगुण समाप्त होता है और न ही सत्त्व गुण कभी समाप्त हो सकता है। सत्त्व, रज और तम इन तीनों का स्थान हमेशा ही प्रकृति में रहने वाला है। यदि तम नहीं होगा तो सत्त्व का अनुभव कैसे कर सकते हैं। यदि बुराई नहीं होगी तो अच्छाई किसको कहेंगे, इसलिए तमस के बिना सत्त्व नहीं हो सकता। सत, रज और तम बढ़ने या घटने से ही मनुष्य का जीवन अलग-अलग प्रकार से बनता जाता है।
वास्तव में धर्म घटता या बढ़ता नहीं है। इसके पालन की रीतियाँ बदलती रहती हैं। अच्छे लोग सतयुग में ज्यादा थे या फिर आज ज्यादा हैं। बुरे लोग सतयुग में कम थे या आज कम हैं। यह फैसला हम नहीं कर सकते। सतयुग में धर्म के चारों पग थे तो भी हिरण्यकश्यपु सतयुग में पैदा हुआ था। सतयुग में बड़े-बड़े राक्षस भी पैदा हुए थे। इसी प्रकार त्रेता और द्वापर में भी दुर्योधन, कंस और रावण जैसे राक्षस मिलते हैं और आजकल भी ऐसे राक्षस प्रजाति के लोग मिलते हैं, जैसे आतङ्कवादी,
जो कश्मीर में घुसकर, धर्म पूँछकर गोली मार देते हैं। ये सब राक्षस प्रजाति में ही आते हैं। अच्छे और बुरे लोग हर काल में मिलते हैं। श्रीभगवान् की जो प्रवृत्ति है वह सत, रज और तम से मिलती है।
न कभी तमोगुण समाप्त होता है, न रजोगुण समाप्त होता है और न ही सत्त्व गुण कभी समाप्त हो सकता है। सत्त्व, रज और तम इन तीनों का स्थान हमेशा ही प्रकृति में रहने वाला है। यदि तम नहीं होगा तो सत्त्व का अनुभव कैसे कर सकते हैं। यदि बुराई नहीं होगी तो अच्छाई किसको कहेंगे, इसलिए तमस के बिना सत्त्व नहीं हो सकता। सत, रज और तम बढ़ने या घटने से ही मनुष्य का जीवन अलग-अलग प्रकार से बनता जाता है।
प्रश्न- श्रेष्ठ भक्ति, प्रेम भक्ति है। उसको हम कैसे बढ़ा सकते हैं और उसके क्या लक्षण हैं?
उत्तर- श्रीभगवान् से प्रेम करना और श्रीभगवान् के सब मनुष्यों से प्रेम करना श्रेष्ठ भक्ति है। किसी के प्रति हमारे हृदय में कोई द्वेष नहीं होना चाहिए, कोई दुर्भाव नहीं होना चाहिए और हमारा जीवन सबके साथ प्रेम से बीते। इस प्रकार का जीवन बनाने से श्रीभगवान् के प्रति प्रेम आ जाता है।
प्रश्न- जो गृहस्थ लोग होते हैं वे व्यस्त रहते हैं और उनके मन में कभी भी कुछ न कुछ चलता रहता है। कार्यालय में भी अलग-अलग परिस्थितियों में रहना पड़ता है। ऐसे में हम इसको व्यवहारिक रूप में कैसे जीवन में समाहित कर सकते हैं?
उत्तर- व्यवहारिक रूप से हमें कभी-कभी सबके साथ कड़ी बात करनी पड़ती है, तो भी हमारे मन में राग-द्वेष नहीं होना चाहिए। सारी बातें मन: स्थिति की है, क्रिया की नहीं। हमारे मन में किसी के लिए गलत भावना नहीं होनी चाहिए। जिस प्रकार माँ अपने बच्चों से इतना प्रेम करती है। उसे गीले में नहीं सुलाती है बल्कि खुद सो जाती है और वही बच्चा कुछ शरारत करता है तो उसे थप्पड़ भी मार देती है। बाद में खुद भी रो देती है कि मैंने थप्पड़ क्यों मारा? इसी प्रकार का प्रेम हमारे मन में भी रहना चाहिए।
प्रश्नकर्ता- राजपाल भैया
प्रश्न- मैं हनुमान चालीसा रोज करता था, जो आपने बताया था। आजकल उसमें कुछ परेशानी क्यों आ रही है?
उत्तर- हाँ, उस के सर्वर में कुछ परेशानी आ रही है। हमारी टीम उस पर कार्य कर रही है। एक-दो दिन में ठीक हो जाएगा फिर आपको उस एप को अपडेट करना पड़ेगा।
प्रश्नकर्ता- रजनीश भैया
प्रश्न- भगवान् श्रीकृष्ण ग्यारह वर्ष की आयु में गोकुल छोड़ कर चले गए थे, तो उसका क्या कारण था?
उत्तर- कंस का वध करने के लिए ही ग्यारह वर्ष की आयु में भगवान् श्रीकृष्ण ने गोकुल को छोड़ दिया था।