विवेचन सारांश
कर्मों की सिद्धि में पाँच हेतु
आज के सत्र का शुभारम्भ राष्ट्र वन्दना, गीता परिवार गीत, श्री मधुराष्टक तथा श्रीहनुमान चालीसा पाठ का सस्वर गायन करते हुये दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
श्रीभगवान् की अतिशय मङ्गलमयी कृपा से हम सब लोगों का ऐसा सद्भाग्य जाग्रत हुआ है जो हम अपने इस मानव जीवन को परम सफल करने के लिए, सार्थक करने के लिए, अपने इहलोक और परलोक का कल्याण करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता से जुड़ गए हैं। पता नहीं, हमारे कोई पूर्वजन्म के पुण्य हैं, हमारे कोई इस जन्म के सुकृत हैं, हमारे पूर्वजों के कोई सुकृत हैं या फिर किसी जन्म में किसी महापुरुष की कृपादृष्टि हम पर पड़ गयी, जिस कारण हमारा ऐसा भाग्योदय हो गया कि हम श्रीमद्भगवद्गीता के अध्ययन में लग गये, उसको सुनने लगे, समझने लगे, कण्ठस्थ भी करने लगे और अब जीवन में लाने का प्रयास भी करने लगे। हम लोग श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने के लिए चुने गए हैं, इसलिये इस परम सौभाग्य का लाभ अब हम लोगों को पूरी तत्परता से उठाना चाहिए।
हम अट्ठारहवें अध्याय का चिन्तन देख रहे हैं। गत सप्ताह हमने यह विचार किया था कि अगर छूटती हुई रेलगाड़ी का अन्तिम डिब्बा भी पकड़ में आ जाए तो वह पूरी रेलगाड़ी पकड़ में आ जाती है। इसी प्रकार यदि विवेचन सुनते समय कुछ अध्याय छूट भी गए होंगे, कुछ श्लोकों का चिन्तन नहीं भी हो पाया होगा तो भी यदि हमने अट्ठारहवें अध्याय का चिन्तन भली-भाँति कर लिया तो सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता का सार हमारे ध्यान में आ जाता है क्योंकि यह श्रीमद्भगवद्गीता का सारभूत अध्याय है। यह श्रीमद्भगवद्गीता का सारांश है। इस अध्याय का आरम्भ अर्जुन के प्रश्न से हुआ है कि,
“त्याग और संन्यास में क्या अन्तर है?”
श्रीभगवान् की अतिशय मङ्गलमयी कृपा से हम सब लोगों का ऐसा सद्भाग्य जाग्रत हुआ है जो हम अपने इस मानव जीवन को परम सफल करने के लिए, सार्थक करने के लिए, अपने इहलोक और परलोक का कल्याण करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता से जुड़ गए हैं। पता नहीं, हमारे कोई पूर्वजन्म के पुण्य हैं, हमारे कोई इस जन्म के सुकृत हैं, हमारे पूर्वजों के कोई सुकृत हैं या फिर किसी जन्म में किसी महापुरुष की कृपादृष्टि हम पर पड़ गयी, जिस कारण हमारा ऐसा भाग्योदय हो गया कि हम श्रीमद्भगवद्गीता के अध्ययन में लग गये, उसको सुनने लगे, समझने लगे, कण्ठस्थ भी करने लगे और अब जीवन में लाने का प्रयास भी करने लगे। हम लोग श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने के लिए चुने गए हैं, इसलिये इस परम सौभाग्य का लाभ अब हम लोगों को पूरी तत्परता से उठाना चाहिए।
हम अट्ठारहवें अध्याय का चिन्तन देख रहे हैं। गत सप्ताह हमने यह विचार किया था कि अगर छूटती हुई रेलगाड़ी का अन्तिम डिब्बा भी पकड़ में आ जाए तो वह पूरी रेलगाड़ी पकड़ में आ जाती है। इसी प्रकार यदि विवेचन सुनते समय कुछ अध्याय छूट भी गए होंगे, कुछ श्लोकों का चिन्तन नहीं भी हो पाया होगा तो भी यदि हमने अट्ठारहवें अध्याय का चिन्तन भली-भाँति कर लिया तो सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता का सार हमारे ध्यान में आ जाता है क्योंकि यह श्रीमद्भगवद्गीता का सारभूत अध्याय है। यह श्रीमद्भगवद्गीता का सारांश है। इस अध्याय का आरम्भ अर्जुन के प्रश्न से हुआ है कि,
“त्याग और संन्यास में क्या अन्तर है?”
इसके विषय में हमने गत सप्ताह विचार कर लिया था, फिर भी इन दोनों शब्दों में अधिक उलझना मुश्किल लगता है, क्योंकि त्याग और संन्यास, ये दोनों शब्द पर्याय की भाँति मिलते-जुलते ही हैं। ध्यान देने की बात यह है कि त्याग पदार्थ और क्रिया का होता है जबकि संन्यास मन से इच्छा का त्याग होता है। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीभगवान् ने त्याग और संन्यास, दोनों का प्रयोग क्रिया के लिए किया है। यहाँ श्रीभगवान् ने एक बात और जोड़ दी है कि-
“केवल क्रिया का त्याग मत करो, उसके फल का भी त्याग करो।"
“केवल क्रिया का त्याग मत करो, उसके फल का भी त्याग करो।"
“त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्”
आजकल सोशल मीडिया, जैसे व्हाट्सएप तथा फेसबुक आदि पर कुछ भी अनर्गल बातें पोस्ट कर दी जाती हैं, जिनसे मन भ्रमित होता है। आपने भी ऐसी अनेक पोस्ट देखी होंगी कि-
मन्दिर जाना आवश्यक है या किसी रुग्ण व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाना?
शिवजी पर दूध चढ़ाना आवश्यक है कि किसी निर्धन व्यक्ति को दूध पिलाना?
ब्राह्मण अथवा साधु को भोजन करवाना आवश्यक है या अनाथालय में बाँटना?
ऐसे अनेक अनर्गल प्रश्न पूछे जाते हैं। मुख्य बात यह है कि इस प्रकार के प्रश्न उठाने वाले व्यक्ति स्वयं न तो शिवजी पर दूध चढ़ाते हैं और न ही किसी निर्धन व्यक्ति को पिलाते हैं। वे न तो अनाथालय में जाते हैं, न ही किसी ब्राह्मण को भोजन खिलाते हैं। वे न ही किसी रुग्ण व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाते हैं, न ही मन्दिर जाते हैं। वास्तविक बात यह है कि जो व्यक्ति शिवालय में जाकर शिवजी पर दूध चढ़ाता है, उस व्यक्ति से अधिक निर्धन व्यक्ति की सहायता करने की सम्भावना बाकी अन्य व्यक्तियों में कम होती जाएगी, क्योंकि जिसने पत्थर में श्रीभगवान् को देखना सीख लिया, वह जीवित मनुष्य में भी श्रीभगवान् का दर्शन करना सीख जाता है इसलिये रोगी व्यक्ति को छोड़ने जाते समय ही मन्दिर क्यों जाना है? हम उस व्यक्ति को अस्पताल पहुँचा कर भी तो मन्दिर जा सकते हैं। निर्धन व्यक्ति का दूध और शिवजी का दूध एक ही क्यों है? हम शिवजी को भी दूध चढ़ाएँगे और निर्धन व्यक्ति को भी दूध पिलाएँगे। इस प्रकार का विचार हमारे मस्तिष्क में आना चाहिए, लेकिन कुछ व्यक्ति नियत-कर्म को छोड़ने की बात करते हैं। वे बहुत आसानी से बोल देते हैं, “अरे! क्या करना है नहाकर? नहाने में क्या रखा है? मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा, मन्दिर जाओ या नहीं जाओ, पूजा करो या नहीं करो, माला जपो या नहीं जपो, श्रीभगवान् सब देखते हैं।"
अब यह कहते समय वे बोल तो जाते हैं लेकिन वे यह विचार नहीं करते कि यह बात किसने, किस प्रसङ्ग में कही है।
मन्दिर जाना आवश्यक है या किसी रुग्ण व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाना?
शिवजी पर दूध चढ़ाना आवश्यक है कि किसी निर्धन व्यक्ति को दूध पिलाना?
ब्राह्मण अथवा साधु को भोजन करवाना आवश्यक है या अनाथालय में बाँटना?
ऐसे अनेक अनर्गल प्रश्न पूछे जाते हैं। मुख्य बात यह है कि इस प्रकार के प्रश्न उठाने वाले व्यक्ति स्वयं न तो शिवजी पर दूध चढ़ाते हैं और न ही किसी निर्धन व्यक्ति को पिलाते हैं। वे न तो अनाथालय में जाते हैं, न ही किसी ब्राह्मण को भोजन खिलाते हैं। वे न ही किसी रुग्ण व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाते हैं, न ही मन्दिर जाते हैं। वास्तविक बात यह है कि जो व्यक्ति शिवालय में जाकर शिवजी पर दूध चढ़ाता है, उस व्यक्ति से अधिक निर्धन व्यक्ति की सहायता करने की सम्भावना बाकी अन्य व्यक्तियों में कम होती जाएगी, क्योंकि जिसने पत्थर में श्रीभगवान् को देखना सीख लिया, वह जीवित मनुष्य में भी श्रीभगवान् का दर्शन करना सीख जाता है इसलिये रोगी व्यक्ति को छोड़ने जाते समय ही मन्दिर क्यों जाना है? हम उस व्यक्ति को अस्पताल पहुँचा कर भी तो मन्दिर जा सकते हैं। निर्धन व्यक्ति का दूध और शिवजी का दूध एक ही क्यों है? हम शिवजी को भी दूध चढ़ाएँगे और निर्धन व्यक्ति को भी दूध पिलाएँगे। इस प्रकार का विचार हमारे मस्तिष्क में आना चाहिए, लेकिन कुछ व्यक्ति नियत-कर्म को छोड़ने की बात करते हैं। वे बहुत आसानी से बोल देते हैं, “अरे! क्या करना है नहाकर? नहाने में क्या रखा है? मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा, मन्दिर जाओ या नहीं जाओ, पूजा करो या नहीं करो, माला जपो या नहीं जपो, श्रीभगवान् सब देखते हैं।"
अब यह कहते समय वे बोल तो जाते हैं लेकिन वे यह विचार नहीं करते कि यह बात किसने, किस प्रसङ्ग में कही है।
मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा
यह कोई साधारण वाक्य नहीं है। यह एक अत्यन्त उत्तम महापुरुष के मुख से निकला हुआ वाक्य है। आपने सन्त रविदास का नाम सुना है। वे जाति से चमार थे, मोची थे। वे जूते सिलने का काम करते थे। वे मीराबाई जी के गुरु थे। एक बार सन्त रविदास अपनी दुकान पर अपना नित्य-कर्म कर रहे थे, चमड़ा सुखा रहे थे। उसी समय एक व्यक्ति हड़बड़ा कर आया और बोला,
“मुझे गङ्गा-स्नान के लिए पहुँचना है और मेरे जूते का तलवा निकल गया है। क्या तुम मेरा जूता शीघ्रता से सिल दोगे?”
उन्होंने कहा, “मैं आपका गङ्गा-स्नान का कार्यक्रम स्थगित नहीं होने दूँगा और यथाशीघ्र आपका जूता सी दूँगा।”
उन्होंने कहा, “मैं आपका गङ्गा-स्नान का कार्यक्रम स्थगित नहीं होने दूँगा और यथाशीघ्र आपका जूता सी दूँगा।”
उन्होंने बहुत अच्छी तरह से उस जूते को ठीक करके उस व्यक्ति को जूता वापस किया। उस काल में एक धेला उसका मूल्य होता था। उस व्यक्ति ने एक धेला सन्त रविदास जी को दिया और कहा,
“आपने बहुत अच्छा काम किया है। यह आपकी मजदूरी है।"
“आपने बहुत अच्छा काम किया है। यह आपकी मजदूरी है।"
सन्त तो सन्त होते हैं, वे उत्तम सन्त थे। मीराबाई उनका प्रवचन सुनने के लिए उनके कार्यस्थल पर आकर बैठा करती थीं और वहाँ पर वे जूते बनाते-बनाते मीराबाई को उपदेश किया करते थे। जब उस व्यक्ति ने एक धेला सन्त रविदास के हाथ में दिया तो रविदास जी ने कहा-
“ऐसा है! मेरा तो गङ्गा जी जाना कम हो पाता है। आप जा ही रहे हैं तो ऐसा कीजिएगा, आज यह सिक्का मेरी ओर से गङ्गा जी को चढ़ा दीजिएगा और उनसे कहिएगा कि उनके एक नालायक पुत्र ने भेजा है, गङ्गा मैया को प्रणाम कीजिएगा और यह सिक्का चढ़ा दीजिएगा।"
“ऐसा है! मेरा तो गङ्गा जी जाना कम हो पाता है। आप जा ही रहे हैं तो ऐसा कीजिएगा, आज यह सिक्का मेरी ओर से गङ्गा जी को चढ़ा दीजिएगा और उनसे कहिएगा कि उनके एक नालायक पुत्र ने भेजा है, गङ्गा मैया को प्रणाम कीजिएगा और यह सिक्का चढ़ा दीजिएगा।"
उस यात्री ने कहा,
“ठीक है।"
“ठीक है।"
वह भी अच्छा व्यक्ति था। उस व्यक्ति ने जाकर स्वयं गङ्गा-स्नान किया। गङ्गा स्नान करके, आकर वस्त्र आदि पहने तो उसे याद आया कि वह धेला तो गङ्गा जी को चढ़ाना भूल गया। वह वहाँ गया तथा उसने गङ्गा मैया को प्रणाम किया और कहा-
“आपका एक भक्त, जिसका नाम रविदास है, वह एक मोची है। उसने यह धेला भेजा है।”
“आपका एक भक्त, जिसका नाम रविदास है, वह एक मोची है। उसने यह धेला भेजा है।”
यह कहकर उसने वह धेला गङ्गा जी में डालने के लिए उछाल दिया। जैसे ही उसने सिक्का उछाला, उस व्यक्ति के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उस स्थान से तत्काल जल में से एक हाथ प्रकट हो गया। वह व्यक्ति घबरा गया कि यह क्या हुआ! उसने ध्यान से देखा तो उस हाथ में एक स्वर्ण का रत्नजड़ित कङ्गन, जो स्वर्गलोक का एक दैवीय कङ्गन था, वहाँ प्रकट हुआ और उस कङ्गन को उछालकर उस व्यक्ति के हाथ में दिया और वहाँ से एक वाणी प्रकट हुई-
“मेरे भक्त रविदास को यह कङ्गन पहुँचा देना।"
“मेरे भक्त रविदास को यह कङ्गन पहुँचा देना।"
ऐसा अद्भुत, सुन्दर और विलक्षण कङ्गन देखकर वह व्यक्ति हतप्रभ हो गया। उसकी आँखें खुली रह गयीं, क्योंकि ऐसा कुछ उसने आज के पहले अपने जीवन में देखा ही नहीं था। अब उसके मन में लालच आ गया। इतना सुन्दर कङ्गन देखकर उसने सोचा,
“इसका बहुत अधिक मूल्य मिल जाएगा, उस चमार को इस कङ्गन का क्या काम! उसको तो पता भी नहीं है।”
वह दो-तीन स्वर्णकारों के पास गया परन्तु सभी स्वर्णकारों ने कहा कि हमारी तो ऐसी क्षमता भी नहीं है कि इसकी कोई बोली लगा पाएँ। तुम इसको राजा के पास लेकर जाओ। इस राज्य में तुमको राजा के अतिरिक्त कोई भी इसका सही मूल्य नहीं दे सकता। पूरे नगर में इतना धनवान कोई भी नहीं है जो इसका सही मूल्य दे सके। वह व्यक्ति लालच में आकर तुरन्त राजमहल पहुँचा और द्वारपाल से कहा कि राजा साहब को दिखाने के लिए कुछ अद्भुत वस्तु लाया हूँ। राजा ने जब वह कङ्गन देखा तो वह विस्मित रह गया। उसने कहा,
“वास्तव में यह कङ्गन तो बहुत अद्भुत है!”
“वास्तव में यह कङ्गन तो बहुत अद्भुत है!”
राजा ने वह कङ्गन अपनी रानी को दिखाया। रानी ने कहा,
“एक कङ्गन मेरे किस काम का है! यदि देना है तो दो कङ्गन मँगवाइए। मैं एक हाथ में कङ्गन नहीं पहनूँगी।”
“एक कङ्गन मेरे किस काम का है! यदि देना है तो दो कङ्गन मँगवाइए। मैं एक हाथ में कङ्गन नहीं पहनूँगी।”
राजा ने वापस आकर उस व्यक्ति से कहा,
“भैया! एक काम करो। तुम एक और कङ्गन इसी प्रकार का ले आओ। मैं तुम्हें इतना धन दूँगा कि तुम इस राज्य के आधे राज्य के स्वामी बन जाओगे।"
“भैया! एक काम करो। तुम एक और कङ्गन इसी प्रकार का ले आओ। मैं तुम्हें इतना धन दूँगा कि तुम इस राज्य के आधे राज्य के स्वामी बन जाओगे।"
अब व्यक्ति चिन्तित हो गया कि यह कैसे करूँ? राजा ने उस व्यक्ति के साथ अपने सैनिक भेज दिए कि अगर यह व्यक्ति कुछ भी गड़बड़ करे तो इसे मार देना और कङ्गन लेकर आना। वह व्यक्ति अत्यन्त दु:खी हुआ और रोने लगा। जब उसे कुछ भी नहीं सूझा तो वह वापस सन्त रविदास के पास पहुँचा और उनको सारी बात बतायी। सन्त रविदास ने पूछा,
“तुमने ऐसा क्यों किया?” यदि गङ्गा मैया ने वह कङ्गन मेरे लिए दिया था तो तुम्हें वह कङ्गन मुझे लाकर देना चाहिए था।"
“तुमने ऐसा क्यों किया?” यदि गङ्गा मैया ने वह कङ्गन मेरे लिए दिया था तो तुम्हें वह कङ्गन मुझे लाकर देना चाहिए था।"
उस व्यक्ति ने कहा,
"मेरे मन में लालच आ गया था। अब मुझे वह कङ्गन नहीं चाहिए। आप बस मेरे प्राण राजा जी से बचा लीजिए।"
सन्त रविदास ने कहा,
“तुमने बेईमानी तो की है, किन्तु तुमने यहाँ आकर अपना अपराध स्वीकार किया है, इसलिये मैं गङ्गा मैया से प्रार्थना करूँगा कि वे तुम्हें दूसरा कङ्गन दे दें। हालाँकि मुझे पता नहीं है कि वे तुम्हें दूसरा कङ्गन देंगी या नहीं। चलो, गङ्गा मैया के पास चलते हैं।”
"मेरे मन में लालच आ गया था। अब मुझे वह कङ्गन नहीं चाहिए। आप बस मेरे प्राण राजा जी से बचा लीजिए।"
सन्त रविदास ने कहा,
“तुमने बेईमानी तो की है, किन्तु तुमने यहाँ आकर अपना अपराध स्वीकार किया है, इसलिये मैं गङ्गा मैया से प्रार्थना करूँगा कि वे तुम्हें दूसरा कङ्गन दे दें। हालाँकि मुझे पता नहीं है कि वे तुम्हें दूसरा कङ्गन देंगी या नहीं। चलो, गङ्गा मैया के पास चलते हैं।”
फिर अचानक सन्त रविदास के मुख से निकल गया,
“अरे! जाना भी क्यों है? मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा।"
“अरे! जाना भी क्यों है? मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा।"
उन्होंने एक कठौते में जल डालकर उसमें एक सिक्का डाला और कहा,
“गङ्गा मैया! यह सिक्का स्वीकार कीजिए।"
“गङ्गा मैया! यह सिक्का स्वीकार कीजिए।"
जैसे ही सन्त रविदास ने एक सिक्का डाला, तुरन्त एक हाथ प्रकट हो गया और एक कङ्गन वहाँ पर प्रकट हो गया। रविदास ने वह कङ्गन उस व्यक्ति को दिया और उसने जाकर राजा को दे दिया। समझने की बात यह है कि “मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा"।
यह किसके साथ घटता है? यह सन्त रविदास जैसे सिद्ध सन्तों के साथ घटता है। सामान्य व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि मुझे आज नहाने में आलस्य आ रहा है, इसलिये मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा कह कर मैं नहाऊँगा नहीं, मैं पूजा नहीं करूँगा, दान नहीं करूँगा, मन्दिर नहीं जाऊँगा।
श्रीभगवान् ने भी कर्म में निश्चित काम्य कर्म और निषेध कर्म की बात कही है। श्रीभगवान् ने कहा,
यह किसके साथ घटता है? यह सन्त रविदास जैसे सिद्ध सन्तों के साथ घटता है। सामान्य व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि मुझे आज नहाने में आलस्य आ रहा है, इसलिये मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा कह कर मैं नहाऊँगा नहीं, मैं पूजा नहीं करूँगा, दान नहीं करूँगा, मन्दिर नहीं जाऊँगा।
श्रीभगवान् ने भी कर्म में निश्चित काम्य कर्म और निषेध कर्म की बात कही है। श्रीभगवान् ने कहा,
“आलस्य के कारण जो त्याग किया जाता है, वह तामस त्याग है।"
18.7
नियतस्य तु सन्न्यासः(ख्), कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्याग: (स्), तामसः(फ्) परिकीर्तितः॥18.7॥
नियत कर्म का तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं-
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः।।
अनेक व्यक्ति अपने नियत कर्म न करने के लिए अनेक बहाने करते हैं, जैसे, “आज मानसिक स्नान कर लेंगे, आज मानसिक पूजा कर लेंगे,” उनसे कभी पूछना चाहिए कि क्या आप कभी मानसिक भोजन करते हैं? मानसिक स्नान, मानसिक पूजा करने का अधिकार उसी को है जो मानसिक भोजन भी कर सकता है।
जो उपाय हम श्रम बचाने के लिए करते हैं, श्रीभगवान् उसे तामस त्याग मानते हैं। दूसरी बात उन्होंने कही-
जो उपाय हम श्रम बचाने के लिए करते हैं, श्रीभगवान् उसे तामस त्याग मानते हैं। दूसरी बात उन्होंने कही-
स्वार्थ बुद्धि से जो त्याग होता है, वह राजस त्याग होता है।
दुःखमित्येव यत्कर्म, कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं(न्) त्यागं(न्), नैव त्यागफलं(म्) लभेत् ॥18.8॥
जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है - ऐसा (समझकर) कोई शारीरिक परिश्रम के भय से (उसका) त्याग कर दे, (तो) वह राजस त्याग करके भी त्याग के फल को नहीं पाता।
विवेचन- यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य कर्मों का त्याग कर दे तो उसका यह त्याग राजस त्याग माना जाता है। उसका उसे कोई फल नहीं मिलता। आजकल बहुत से व्यक्ति हवन भी करते हैं तो पण्डित जी से कहते हैं,
“पण्डित जी! अधिक धुआँ नहीं आना चाहिए। आप ऐसा हवन करवा दीजिए कि अधिक धुआँ न आए।"
कई बार तो हवन में बैठना पड़ेगा तो पङ्खे या एसी के बिना बैठना पड़ेगा, इसलिये हम हवन में बैठें ही नहीं, भैया आप बैठ जाओ, पिताजी आप बैठ जाइए या किसी को भी अनुरोध करते हैं। इसका कारण यह है कि हमने अपने शरीर को कष्ट देना ही बन्द कर दिया है। हम सब सुख-बुद्धि के हो गए हैं, बिल्कुल आराम के आकाङ्क्षी हो गए हैं।
“पण्डित जी! अधिक धुआँ नहीं आना चाहिए। आप ऐसा हवन करवा दीजिए कि अधिक धुआँ न आए।"
कई बार तो हवन में बैठना पड़ेगा तो पङ्खे या एसी के बिना बैठना पड़ेगा, इसलिये हम हवन में बैठें ही नहीं, भैया आप बैठ जाओ, पिताजी आप बैठ जाइए या किसी को भी अनुरोध करते हैं। इसका कारण यह है कि हमने अपने शरीर को कष्ट देना ही बन्द कर दिया है। हम सब सुख-बुद्धि के हो गए हैं, बिल्कुल आराम के आकाङ्क्षी हो गए हैं।
महात्मा गाँधी जी ने अस्वादु भोजन का नियम लिया था। प्रयाग विश्वविद्यालय के एक शिक्षक थे। उनका नाम शिवनारायण गाँधी था। उनका उपनाम गाँधी नहीं था किन्तु महात्मा गाँधी जी में श्रद्धा के कारण उन्होंने अपना उपनाम गाँधी रखा था। उन्होंने भी अस्वादु भोजन का व्रत लिया था। जो खाद्य पदार्थ उन्हें एक बार सुस्वादु लगा, वे उसे दोबारा नहीं खाते थे। इस शरीर को थोड़ा कष्ट सहने की आदत होनी चाहिए। हमें कभी-कभी ऐसा भी करना चाहिए कि विद्युत आपूर्ति रहे फिर भी हम पङखे और एसी बन्द करके रह सकें। घर पर भोजन उपलब्ध होते हुए भी हम एक समय का भोजन न करें। मिष्ठान, चाय आदि स्वेच्छा से टाल देनी चाहिए। इस शरीर को बिल्कुल अनुकूलता नहीं देनी चाहिए। कभी भूमि पर शयन करना चाहिए। जिनके शरीर स्वस्थ हैं, कभी प्रयाग में जाकर चालीस दिन का कल्पवास करके आएँ। वहाँ शरीर को होने वाले कष्ट का अनुभव कीजिए। उस कष्ट के उपरान्त जो शरीर निखरता है, मन निखरता है और जो आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है, वह किसी और उपाय से प्राप्त नहीं होती है इसलिये शरीर को थोड़ा कसना चाहिए। इसे तितिक्षा देनी चाहिए। सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास, अनुकूलता-प्रतिकूलता, यह सब सहन करने योग्य अपने शरीर को बनाना चाहिए। यदि हमें कभी हल्का सर्दी-बुखार हो जाए तो यह कोई खराब चीज नहीं है, यह कोई बीमारी नहीं है अपितु यह शरीर को स्वच्छ करने की एक प्रक्रिया है। हम इसे रोक देते हैं, दवा खा लेते हैं।
श्रीभगवान् ने स्वार्थ-बुद्धि से किए गए त्याग को राजस त्याग कहा है। अब श्रीभगवान् आगे सात्त्विक त्याग के विषय में बताते हैं।
श्रीभगवान् ने स्वार्थ-बुद्धि से किए गए त्याग को राजस त्याग कहा है। अब श्रीभगवान् आगे सात्त्विक त्याग के विषय में बताते हैं।
कार्यमित्येव यत्कर्म, नियतं(ङ्) क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं(न्) त्यक्त्वा फलं(ञ्) चैव, स त्यागः(स्) सात्त्विको मतः॥18.9॥
हे अर्जुन ! 'केवल कर्तव्य मात्र करना है' -- ऐसा (समझकर) जो कर्म आसक्ति और फलेच्छा का त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।
विवेचन- शास्त्र विधि से किया गया कर्म कर्त्तव्य है। जो कर्म इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है, वह सात्त्विक त्याग माना जाता है। यह दृष्टि जब तक नहीं होती है, तब तक कर्त्तव्य कर्म में आनन्द नहीं आता।
महाभारत में युधिष्ठिर और द्रौपदी का संवाद है। द्रौपदी ने कुछ ऐसी बात कह दी कि,
“महाराज! यह करने से क्या लाभ? इससे क्या मिलने वाला है?”
“महाराज! यह करने से क्या लाभ? इससे क्या मिलने वाला है?”
युधिष्ठिर ने कहा,
“द्रौपदी! तुम कैसी बातें कर रही हो? हम कर्त्तव्य कर्म का पालन इसलिये नहीं करते कि हमें क्या मिलेगा, बल्कि कर्त्तव्य पालन का सुख हमें प्राप्त होता है कि मैंने सही काम किया। यह पर्याप्त सुख नहीं है क्या? इसके बदले में कुछ क्यों चाहिए?”
“द्रौपदी! तुम कैसी बातें कर रही हो? हम कर्त्तव्य कर्म का पालन इसलिये नहीं करते कि हमें क्या मिलेगा, बल्कि कर्त्तव्य पालन का सुख हमें प्राप्त होता है कि मैंने सही काम किया। यह पर्याप्त सुख नहीं है क्या? इसके बदले में कुछ क्यों चाहिए?”
एक बार ऋषिकेश में एक ब्रह्मचारी जी ने बाल-साधक से पूछा-
“बताओ ध्यान क्यों करना चाहिए? जप क्यों करना चाहिए? उपवास क्यों करना चाहिए?”
बाल-साधक ने उत्तर दिया,
“पुण्य मिलता है इसलिये करना चाहिए।"
उन्होंने पूछा,
“पुण्य मिलता है, इसलिये करते हो?”
उन्होंने उत्तर दिया,
“जी! इसीलिये करता हूँ।"
उन्होंने कहा,
“तुम बुद्धू हो। तुम यह बताओ कि जब तुम पूजा या उपवास करते हो तो तुम्हें अच्छा नहीं लगता क्या?"
उन्होंने कहा,
“बहुत आनन्द आता है।"
उन्होंने कहा,
“इसलिये, तुम यह सब अपने आनन्द के लिए करो, पुण्य के लिए मत करो।"
उन्होंने कहा,
“बहुत आनन्द आता है।"
उन्होंने कहा,
“इसलिये, तुम यह सब अपने आनन्द के लिए करो, पुण्य के लिए मत करो।"
कर्त्तव्य कर्म का पालन करने से आनन्द प्राप्त होता है। उस आनन्द के लिए कर्म करना चाहिए। “मुझे कर्त्तव्य कर्म करना चाहिए, यह सोचकर कर्म करें। “इसके बदले में मुझे क्या मिलेगा?” यह भावना नहीं होनी चाहिए। अनेक व्यक्ति कहते हैं कि हम सबके साथ बहुत अच्छा करते हैं किन्तु बदले में वे हमारे साथ अच्छा नहीं करते। क्या हम बदले में अच्छा मिले, इसलिये कर्म करते हैं? यह तो बहुत हल्की बात हो गई। “मैं अच्छा करता हूँ क्योंकि मैं अच्छा व्यक्ति हूँ। मुझे अच्छा करना चाहिए, इसलिये करता हूँ।
फल की अपेक्षा करने से वह अच्छा कर्त्तव्य कर्म नहीं रहा। कर्म का त्याग करने वाला तामसिक कर्म होता है। कर्म में फल की इच्छा का त्याग करने वाला सात्त्विक त्याग होता है। कर्म का त्याग तो करना ही नहीं है, फल की इच्छा का त्याग करना है। ऐसा कभी होता ही नहीं है कि कर्म किया है तो फल नहीं मिलेगा। जब बीज बोया गया है तो फसल तो आएगी ही। वह फसल कम आएगी या अधिक आएगी, यह फल उसमें शामिल होने से उसका कर्म सात्त्विक त्याग होता है। कर्मफल का त्याग है इसलिए सात्त्विक त्याग है।
कुछ सेवा का काम करें, नित्य गीताजी का पारायण करें, अपने आसपास के व्यक्तियों को नित्य प्रसन्नता का अनुभव कराएँ। जिससे मिलें, मुस्कुरा कर मिलें। सबकी मुस्कुराहट का कारण बन जाएँ। बदले में कुछ नहीं चाहिए।
फल की अपेक्षा करने से वह अच्छा कर्त्तव्य कर्म नहीं रहा। कर्म का त्याग करने वाला तामसिक कर्म होता है। कर्म में फल की इच्छा का त्याग करने वाला सात्त्विक त्याग होता है। कर्म का त्याग तो करना ही नहीं है, फल की इच्छा का त्याग करना है। ऐसा कभी होता ही नहीं है कि कर्म किया है तो फल नहीं मिलेगा। जब बीज बोया गया है तो फसल तो आएगी ही। वह फसल कम आएगी या अधिक आएगी, यह फल उसमें शामिल होने से उसका कर्म सात्त्विक त्याग होता है। कर्मफल का त्याग है इसलिए सात्त्विक त्याग है।
कुछ सेवा का काम करें, नित्य गीताजी का पारायण करें, अपने आसपास के व्यक्तियों को नित्य प्रसन्नता का अनुभव कराएँ। जिससे मिलें, मुस्कुरा कर मिलें। सबकी मुस्कुराहट का कारण बन जाएँ। बदले में कुछ नहीं चाहिए।
सात्त्विक कर्म की कसौटी यह है कि शुभ कार्य से, सेवा कार्य के बाद मुझे किसी भी कार्य से दु:ख प्राप्त नहीं होगा। अगर मैंने कुछ अच्छा कार्य किया और बदले में कुछ प्राप्ति की आकाङ्क्षा है तो यह कर्म सात्त्विक नहीं रह गया। “मैंने अच्छा कर दिया, अब जो होगा, वह होगा- यह कर्म सात्त्विक होगा। शुभ कर्मों में आसक्ति का त्याग करना होगा। अच्छे-अच्छे लोग भी अच्छा कार्य करते-करते भी ‘मेरी संस्था का नाम ज्यादा हो जाए, मुझे अपनी पहचान नहीं चाहिए, लेकिन मेरे गुरु जी का नाम अधिक हो जाए, उनकी पहचान अधिक हो जाए, लोग उनको अधिक मानें, अपने नाम का, संस्था के नाम का, गुरुजी के नाम का लोभ, इस आकर्षण में भी लोग फँस जाते हैं। यद्यपि वे काम अच्छा ही कर रहे हैं लेकिन वहाँ पर सात्त्विकता की भावना समाप्त हो गयी।
अच्छे कर्म की भी आसक्ति नहीं होनी चाहिए। ‘मैंने एक वर्ष कम्बल वितरित किये, अब मैं हर वर्ष कम्बल वितरित करूँगा, क्योंकि सबने मेरी बहुत प्रशंसा की थी।’ यह कर्म राजसिक हो गया।
अच्छे कर्म की भी आसक्ति नहीं होनी चाहिए। ‘मैंने एक वर्ष कम्बल वितरित किये, अब मैं हर वर्ष कम्बल वितरित करूँगा, क्योंकि सबने मेरी बहुत प्रशंसा की थी।’ यह कर्म राजसिक हो गया।
न द्वेष्ट्यकुशलं(ङ्) कर्म, कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो, मेधावी छिन्नसंशयः॥18.10॥
(जो) अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता (और) कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता, (वह) त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देह रहित (और) अपने स्वरूप में स्थित है।
विवेचन- कुशल अर्थात् करने योग्य तथा अकुशल अर्थात् न करने योग्य। श्रीभगवान् ने कहा कि जो अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता है और कुशल कर्म के प्रति आसक्त नहीं होता है।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो,
वह शुद्ध सत्त्व गुण से युक्त पुरुष।
छिन्नसंशयः।त्यागी सत्त्वसमाविष्टो,
वह शुद्ध सत्त्व गुण से युक्त पुरुष।
संशयरहित, मेधावी और सच्चा त्यागी है। मुझे यह करना है और मुझे यह नहीं करना है- जो दोनों में फँसता नहीं है। गीता परिवार में सब एकदम निष्काम सेवा करते हैं, बदले में कुछ नहीं चाहिये किन्तु उसमें भी एक अवरोध है कि मुझे इतनी सेवा तो मिलनी ही चाहिये। कई भैया-बहनों की तकरार होती है कि उन्हें पहले से कम सेवायें दी जा रही हैं। यह बुरी बात नहीं है। कोई इसे अन्यथा न ले किन्तु श्रीभगवान् जिस तरह के सात्त्विक भाव की बात यहाँ कर रहे हैं, इस भावना में उसका अभाव है।
कुशले नानुषज्जते।
मुझे कुशल कर्म की भी आसक्ति नहीं है। जो सेवा अपने आप से करने को मिलेगी, उसे करते चलो। किसी एक सेवा की आसक्ति नहीं करनी है। यदि ऐसा नहीं होता है तो आपकी सेवावृत्ति राजसिक है। जो सेवा मिले, करते चलो।
न हि देहभृता शक्यं(न्), त्यक्तुं(ङ्) कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी, स त्यागीत्यभिधीयते॥18.11॥
कारण कि देहधारी मनुष्य के द्वारा सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी है - ऐसा कहा जाता है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि शरीरधारी मनुष्य द्वारा सम्पूर्णता से सारे कर्मफलों का त्याग करते जाना सम्भव ही नहीं है इसलिये जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी है, ऐसा कहा जाता है।
श्रीभगवान् कह रहे हैं,
"हे अर्जुन! पूर्ण स्पष्टता से जिसे पता है कि कर्मों का त्याग तो सम्भव नहीं है, कर्म तो करने ही पड़ेंगे।"
श्रीभगवान् कह रहे हैं,
"हे अर्जुन! पूर्ण स्पष्टता से जिसे पता है कि कर्मों का त्याग तो सम्भव नहीं है, कर्म तो करने ही पड़ेंगे।"
हम समझते हैं कि हम कुछ कर रहे हैं वही कर्म है, किन्तु श्रीभगवान् के अनुसार आपने यदि कर्म न करने का निर्णय लिया है, वह भी कर्म है। मुझे ग्रहण के समय कुछ नहीं खाना चाहिये। यदि मैं उस समय कुछ खाऊॅंगा तो वह भी कर्म है। मुझे डाक्टर ने नित्य हरी सब्ज़ी खाने को कहा है किन्तु यदि मैं नहीं खाऊॅंगा तो भी मेरा कर्म है। कर्म न करने से भी कर्म होता है। आवश्यक अथवा नियत कर्म टालने का भी कर्म बनता है, इसलिये श्रीभगवान् कहते हैं कि सम्पूर्णता से तो कर्म का त्याग सम्भव ही नहीं है किन्तु सभी कर्मों में उसकी फल बुद्धि का त्याग किया जा सकता है।
मेधावी
जिसकी बुद्धि प्रज्ञा से ऊपर मेधा तक पहुँच गयी, जैसे पूज्य स्वामीजी जैसे महात्मा जिन्हें सब कुछ स्पष्ट है, उन्हें कोई भ्रम नहीं है।
बालपन में आपको पाँच और पाँच का जोड़ पूछने पर कॉपी व कलम की आवश्यकता पड़ती थी किन्तु अब आप ऐसे ही बता सकते हैं। अब आपको न कैलकुलेटर चाहिए, न कॉपी-कलम। जिस प्रकार हमें छोटी-छोटी सङ्ख्या जोड़नी नहीं पड़ती, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषों को विहित तथा निषिद्ध का विश्लेषण नहीं करना पड़ता है।
'कब क्या करना चाहिये, क्या नहीं करना चाहिये?'- यह सब कुछ पूर्णतया स्प्पष्ट होता है।
हमारे मस्तिष्क में जैसे छोटी-छोटी गणना स्पष्ट है, उसी प्रकार से पूज्य स्वामीजी जैसे व्यक्तियों की बुद्धि में करने योग्य तथा न करने योग्य बातें स्पष्ट हैं। इसी को मेधा कहते हैं।
जब भगवान् श्रीरामजी ने वनवास के समय अहिल्या को पत्थर बना देखा तो उन्हें विचार नहीं करना पड़ा कि उन्हें पैर लगायें अथवा नहीं। जब मारीच उनके समक्ष आया तो उसे बिना फल का (जो नुकीला न हो) बाण मारा क्योंकि उन्हें उसका वध नहीं करना था, किन्तु खर-दूषण को पूरा बाण मारा क्योंकि उन्हें सब पता है।
बालपन में आपको पाँच और पाँच का जोड़ पूछने पर कॉपी व कलम की आवश्यकता पड़ती थी किन्तु अब आप ऐसे ही बता सकते हैं। अब आपको न कैलकुलेटर चाहिए, न कॉपी-कलम। जिस प्रकार हमें छोटी-छोटी सङ्ख्या जोड़नी नहीं पड़ती, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषों को विहित तथा निषिद्ध का विश्लेषण नहीं करना पड़ता है।
'कब क्या करना चाहिये, क्या नहीं करना चाहिये?'- यह सब कुछ पूर्णतया स्प्पष्ट होता है।
हमारे मस्तिष्क में जैसे छोटी-छोटी गणना स्पष्ट है, उसी प्रकार से पूज्य स्वामीजी जैसे व्यक्तियों की बुद्धि में करने योग्य तथा न करने योग्य बातें स्पष्ट हैं। इसी को मेधा कहते हैं।
जब भगवान् श्रीरामजी ने वनवास के समय अहिल्या को पत्थर बना देखा तो उन्हें विचार नहीं करना पड़ा कि उन्हें पैर लगायें अथवा नहीं। जब मारीच उनके समक्ष आया तो उसे बिना फल का (जो नुकीला न हो) बाण मारा क्योंकि उन्हें उसका वध नहीं करना था, किन्तु खर-दूषण को पूरा बाण मारा क्योंकि उन्हें सब पता है।
सर्वारम्भपरित्यागी-
श्रीहनुमान जी के साथ सीताजी की खोज के समय दल भेजे गये थे जिसमें जाम्बवन्तजी, अङ्गदजी, नल-नील तथा अन्य वानर भी थे जिन्होंने बहुत सेवा की थी। साथ में हनुमानजी भी थे जोकि शान्त बैठे हए थे। लम्बे समय तक चर्चा चली कि सागर लाङ्घकर कौन कौन जा सकता है?
नल ने कहा मैं तो बीस योजन लाङ्घ सकता हूँ। नील ने कहा कि वो चालीस योजन लाङ्घ सकते हैं। जाम्बवन्तजी ने कहा कि वे जा तो सकते हैं किन्तु आयु अधिक हो जाने के कारण आत्मविश्वास कम हो रहा है। अङ्गद जी ने कहा कि वे जा तो सकते हैं, किन्तु वापस आने की शक्ति नहीं बचेगी। इस वार्ता में हनुमानजी शान्त बैठे हुए थे, एक शब्द भी नहीं बोले। जाम्बवन्त जी ने जब यह देखा तो वे हनुमानजी से बोले-
श्रीहनुमान जी के साथ सीताजी की खोज के समय दल भेजे गये थे जिसमें जाम्बवन्तजी, अङ्गदजी, नल-नील तथा अन्य वानर भी थे जिन्होंने बहुत सेवा की थी। साथ में हनुमानजी भी थे जोकि शान्त बैठे हए थे। लम्बे समय तक चर्चा चली कि सागर लाङ्घकर कौन कौन जा सकता है?
नल ने कहा मैं तो बीस योजन लाङ्घ सकता हूँ। नील ने कहा कि वो चालीस योजन लाङ्घ सकते हैं। जाम्बवन्तजी ने कहा कि वे जा तो सकते हैं किन्तु आयु अधिक हो जाने के कारण आत्मविश्वास कम हो रहा है। अङ्गद जी ने कहा कि वे जा तो सकते हैं, किन्तु वापस आने की शक्ति नहीं बचेगी। इस वार्ता में हनुमानजी शान्त बैठे हुए थे, एक शब्द भी नहीं बोले। जाम्बवन्त जी ने जब यह देखा तो वे हनुमानजी से बोले-
पवन तनय बल पवन समाना।
का चुप साधि रहेहु बलवाना।।
का चुप साधि रहेहु बलवाना।।
"आप पवनपुत्र हो, चुप क्यों बैठे हो।"
हनुमानजी बोले,
"मुझसे पूछा नहीं गया इसलिए मैं कुछ नहीं बोला।"
जाम्बवन्तजी ने कहा,
"चिन्ता मत करो, यह कार्य तुम्हीं कर सकते हो और तुम्हें ही करना है।"
हनुमानजी बोले,
"अच्छी बात है।"
इसके साथ ही उन्हें अपनी सारी विस्मृत शक्तियाँ स्मरण हो आयीं।
कनक भूधराकार सरीरा, समर भयंकर अतिबल बीरा।
वे अपने विशाल शरीर के साथ प्रगट हो गये और एक छलाङ्ग के साथ लङ्का पहुँच गये। विशिष्ट बात ऐसी है कि लौटकर आये तो रामजी के पास नहीं गये। सुग्रीवजी के पास गये और बोले कि कार्य हो गया है, आप श्रीराम जी को समाचार दे दें।
सुग्रीवजी ने जाकर श्रीराम जी को समाचार सुनाया तो वे भी प्रसन्न हो गये। उन्होंने हनुमानजी को बुलवाया तब वे तुरन्त आकर खड़े हो गये। जब रामजी ने उनसे पूछा कि तुम क्यों नहीं आये तो उन्होंने उत्तर दिया कि उन्हें बुलाया नहीं गया। जब तक बड़ों की आज्ञा नहीं मिलती, वे अपनी ओर से कोई कार्य नहीं करते हैं।
सुग्रीवजी ने जाकर श्रीराम जी को समाचार सुनाया तो वे भी प्रसन्न हो गये। उन्होंने हनुमानजी को बुलवाया तब वे तुरन्त आकर खड़े हो गये। जब रामजी ने उनसे पूछा कि तुम क्यों नहीं आये तो उन्होंने उत्तर दिया कि उन्हें बुलाया नहीं गया। जब तक बड़ों की आज्ञा नहीं मिलती, वे अपनी ओर से कोई कार्य नहीं करते हैं।
सम्पूर्ण रामायण में हनुमानजी ने अपने मुख से किसी को नहीं बताया कि मैंने सीता माता का पता लगाया अथवा मैंने सुग्रीव को रामजी से मिलवाया, मैंने विभीषण को रामजी से मिलवाया, मैं सञ्जीवनी का पर्वत लेकर आया। किसी भी रामायण के ग्रन्थ में आपको हनुमानजी के द्वारा स्वयं की प्रशंसा का एक शब्द नहीं मिलेगा। वे सबसे अधिक कार्य करते हैं किन्तु अपना बखान कभी नहीं करते हैं और न ही किसी के बताये बिना अपनी ओर से किसी कार्य की पहल करते हैं।
उत्तम व्यक्ति की गुण शक्ति की पहचान यह है कि जो कार्य सीधे उसके कर्त्तव्य में नहीं आता है, उसे वह बिना कहे नहीं करता है। किसी ने कह दिया तो वह उसका कर्त्तव्य हो गया। श्रीहनुमानजी का जीवन, सादा जीवन का अप्रतिम उदहारण है। उनके समान जीवन जीना चाहिये। वे हर कार्य करने को तत्पर हैं किन्तु अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण जीवन देखिये। आपको कहीं मलिनता नहीं मिलेगी। जन्म के समय से ही उन पर आक्रमण हुए। पूतना मारने आयी किन्तु हर परिस्थिति में वे सहज रहे। महाभारत का युद्ध हुआ और उनका सबसे बड़ा योद्धा अर्थात् अर्जुन युद्ध से पीछे हटने का प्रयास करने लगे। यदि श्रीभगवान् के स्थान पर हम होते तो तनाव में आ जाते। किन्तु श्रीभगवान् 'प्रसन्न इव भारत'। वे मुस्कुरा रहे हैं। प्रत्येक विपरीत परिस्थिति में भी सहज रहना चाहिये।
हनुमानजी सञ्जीवनी लाने गए तो सहज होकर गये। मेघनाद और लवकुश ने बाँधा तो बँध गये।
उत्तम व्यक्ति की गुण शक्ति की पहचान यह है कि जो कार्य सीधे उसके कर्त्तव्य में नहीं आता है, उसे वह बिना कहे नहीं करता है। किसी ने कह दिया तो वह उसका कर्त्तव्य हो गया। श्रीहनुमानजी का जीवन, सादा जीवन का अप्रतिम उदहारण है। उनके समान जीवन जीना चाहिये। वे हर कार्य करने को तत्पर हैं किन्तु अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण जीवन देखिये। आपको कहीं मलिनता नहीं मिलेगी। जन्म के समय से ही उन पर आक्रमण हुए। पूतना मारने आयी किन्तु हर परिस्थिति में वे सहज रहे। महाभारत का युद्ध हुआ और उनका सबसे बड़ा योद्धा अर्थात् अर्जुन युद्ध से पीछे हटने का प्रयास करने लगे। यदि श्रीभगवान् के स्थान पर हम होते तो तनाव में आ जाते। किन्तु श्रीभगवान् 'प्रसन्न इव भारत'। वे मुस्कुरा रहे हैं। प्रत्येक विपरीत परिस्थिति में भी सहज रहना चाहिये।
हनुमानजी सञ्जीवनी लाने गए तो सहज होकर गये। मेघनाद और लवकुश ने बाँधा तो बँध गये।
जौं न ब्रह्मसर मानऊँ महिमा मिटइ अपार।।
यदि मैं नहीं बॅंधा तो ब्रह्मास्त्र की महिमा मिट जायेगी इसलिये बँध जाता हूँ। लङ्का के छोटे-छोटे बच्चे उन्हें केला फेंककर मार रहे थे, वे उसका भी आनन्द ले रहे हैं और बाद में उसी लङ्का को जला डाला।
हनुमानजी के पास जितनी शक्ति है,
उससे कहीं अधिक सहनशक्ति है।
उससे कहीं अधिक सहनशक्ति है।
शक्ति आते-आते हमारी सहनशक्ति चली जाती है। हमारे जीवन में जितनी सफलता व धन बढ़ते जाते हैं, उतनी ही सहनशक्ति कम होती जाती है। शक्ति के साथ सहनशक्ति-
यह मूल बात है। हम शक्तिशाली बनते हैं तो हमारी सहनशक्ति चली जाती है। हमारे जीवन में जितनी-जितनी सफलता बढ़ती है, धन बढ़ता है, उनती-उतनी हमारी सहन शक्ति चली जाती है। फिर हम कुछ भी सहन नहीं कर पाते। हमारे मन की थोड़ी सी भी बात नहीं हो तो हम क्रोधित हो जाते हैं।
कबीरदास जी ने कहा है-

कैसा जीवन हो? “साधो सहज समाधि भली”
एक लालाजी नाम के बहुत विख्यात सन्त हुए। गत् वर्ष आदरणीय मोदी जी ने उनकी एक सौ पचासवीं (150वीं) जयन्ती पर दो सौ रुपये का सिक्का जारी किया था। वे बहुत उत्तम सन्त थे। लालाजी महाराज के जीवन का एक प्रसङ्ग है, बात पुराने समय की है। कानपुर के पास फतेहपुर में उनके गुरुजी रहा करते थे। पुराने समय में पैदल चलकर एक गाँव से दूसरे गाँव में पहुँचना होता था। गुरुजी का दर्शन करना होता था तो सप्ताह में एक बार लालाजी और उनके एक और सत्सङ्गी मित्र गुरुजी से मिलने जाया करते थे। एक बार वे घर से निकले तो मार्ग में भयङ्कर वर्षा आरम्भ हो गयी। वैसे तो पैदल का मार्ग केवल दो-ढाई घण्टे का ही था किन्तु उस दिन उन्हें छः-सात घण्टे लग गए। वर्षा आधे मार्ग पर आरम्भ हुई थी इसलिए वे न तो पीछे जा सकते थे, न ही आगे बढ़ सकते थे। वे आगे ही बढ़ते रहे। जब वे वहाँ पहुँचे तो लगभग तीन बज गए। सुबह दस बजे पहुँचना था और वे दोपहर के तीन बजे पहुँच पाए। उनके वस्त्र कीचड़ आदि में पूरी तरह से खराब हो गए थे। पहले उन्होंने विचार किया कि तालाब पर जाकर वस्त्र साफ करें, ऐसे गन्दे वस्त्रों में तो गुरुजी के पास नहीं जा सकते। तालाब पर जाकर उन्होंने अपने वस्त्र साफ किये, सुखाये तथा फिर गुरुजी से मिलने उनके पास पहुँचे। गुरुजी बहुत सिद्ध महापुरुष थे। घर के बाहर कच्ची दीवार पर एक पैर ऊपर रखकर और उस पर हाथ रखकर आकाश की ओर देखते हुए बैठे थे तथा आधी आँखें खुली-आधी बन्द थीं। लालाजी महाराज ने दूर से उन्हें देखा। लालाजी ने अपने मित्र से कहा,
“चलो, वापस चलते हैं।"
गुरुभाई ने कहा,
“आप कैसी बात कर रहे हैं? पूरा दिन आने में लग गया, पाँच बज गये। अब इस समय तो वापस जाना भी ठीक नहीं है। सुबह चलेंगे। आज गुरुजी से भेंट नहीं करेंगे?”
लालाजी ने कहा,
“अगले सप्ताह पुनः आएंगे। अगर तुम मेरी बात मानते हो तो हम आज नहीं मिलेंगे।"
गुरु भाई लालाजी का बहुत सम्मान करते थे। उन्हें भी पता था कि ये बहुत सिद्ध पुरुष हैं। यद्यपि उनका मन नहीं था, किन्तु लालाजी की बात मानते हुए वे वापस चले गये। उनके गुरुभाई ने उनसे बहुत बार वापस जाने का कारण पूछा किन्तु लालाजी ने कुछ नहीं बताया।
अगले सप्ताह वे फिर आए। जैसे ही लालाजी को देखा, गुरुजी तुरन्त भाग कर आए और लालाजी को अपने गले से लगा लिया। उनके गुरुभाई आश्चर्यचकित हो गये कि गुरुजी ने आज ऐसे जो व्यवहार किया है, प्रायः नहीं करते हैं। लालाजी ने गुरुजी को प्रणाम किया। गुरुजी ने कहा,
“लाला! मैं तुझे जहाँ पहुँचाना चाहता था, तू वहाँ पहुँच गया। उस दिन मैं उन्मनी में था।”
लालाजी ने कहा,
“जी, जानता हूँ।"
गुरुजी ने कहा, “यही तो मुझे अच्छा लगा कि तू जान गया। उस दिन अगर तू मिलने आता तो मुझे अच्छा नहीं लगता। तू चला गया तो मैं प्रसन्न हो गया।"
गुरु भाई और परेशान हो गये। वे गुरुजी से तो पूछ नहीं सकते थे किन्तु वापसी में उन्होंने लालाजी से पूछा,
“यह बताओ, यह उन्मनी क्या होता है? तुमने उस दिन मिलने के लिए मना कर दिया कि आज नहीं मिलेंगे, तो यह उन्मुनि होता क्या है?”
कैसा जीवन हो? “साधो सहज समाधि भली”
एक लालाजी नाम के बहुत विख्यात सन्त हुए। गत् वर्ष आदरणीय मोदी जी ने उनकी एक सौ पचासवीं (150वीं) जयन्ती पर दो सौ रुपये का सिक्का जारी किया था। वे बहुत उत्तम सन्त थे। लालाजी महाराज के जीवन का एक प्रसङ्ग है, बात पुराने समय की है। कानपुर के पास फतेहपुर में उनके गुरुजी रहा करते थे। पुराने समय में पैदल चलकर एक गाँव से दूसरे गाँव में पहुँचना होता था। गुरुजी का दर्शन करना होता था तो सप्ताह में एक बार लालाजी और उनके एक और सत्सङ्गी मित्र गुरुजी से मिलने जाया करते थे। एक बार वे घर से निकले तो मार्ग में भयङ्कर वर्षा आरम्भ हो गयी। वैसे तो पैदल का मार्ग केवल दो-ढाई घण्टे का ही था किन्तु उस दिन उन्हें छः-सात घण्टे लग गए। वर्षा आधे मार्ग पर आरम्भ हुई थी इसलिए वे न तो पीछे जा सकते थे, न ही आगे बढ़ सकते थे। वे आगे ही बढ़ते रहे। जब वे वहाँ पहुँचे तो लगभग तीन बज गए। सुबह दस बजे पहुँचना था और वे दोपहर के तीन बजे पहुँच पाए। उनके वस्त्र कीचड़ आदि में पूरी तरह से खराब हो गए थे। पहले उन्होंने विचार किया कि तालाब पर जाकर वस्त्र साफ करें, ऐसे गन्दे वस्त्रों में तो गुरुजी के पास नहीं जा सकते। तालाब पर जाकर उन्होंने अपने वस्त्र साफ किये, सुखाये तथा फिर गुरुजी से मिलने उनके पास पहुँचे। गुरुजी बहुत सिद्ध महापुरुष थे। घर के बाहर कच्ची दीवार पर एक पैर ऊपर रखकर और उस पर हाथ रखकर आकाश की ओर देखते हुए बैठे थे तथा आधी आँखें खुली-आधी बन्द थीं। लालाजी महाराज ने दूर से उन्हें देखा। लालाजी ने अपने मित्र से कहा,
“चलो, वापस चलते हैं।"
गुरुभाई ने कहा,
“आप कैसी बात कर रहे हैं? पूरा दिन आने में लग गया, पाँच बज गये। अब इस समय तो वापस जाना भी ठीक नहीं है। सुबह चलेंगे। आज गुरुजी से भेंट नहीं करेंगे?”
लालाजी ने कहा,
“अगले सप्ताह पुनः आएंगे। अगर तुम मेरी बात मानते हो तो हम आज नहीं मिलेंगे।"
गुरु भाई लालाजी का बहुत सम्मान करते थे। उन्हें भी पता था कि ये बहुत सिद्ध पुरुष हैं। यद्यपि उनका मन नहीं था, किन्तु लालाजी की बात मानते हुए वे वापस चले गये। उनके गुरुभाई ने उनसे बहुत बार वापस जाने का कारण पूछा किन्तु लालाजी ने कुछ नहीं बताया।
अगले सप्ताह वे फिर आए। जैसे ही लालाजी को देखा, गुरुजी तुरन्त भाग कर आए और लालाजी को अपने गले से लगा लिया। उनके गुरुभाई आश्चर्यचकित हो गये कि गुरुजी ने आज ऐसे जो व्यवहार किया है, प्रायः नहीं करते हैं। लालाजी ने गुरुजी को प्रणाम किया। गुरुजी ने कहा,
“लाला! मैं तुझे जहाँ पहुँचाना चाहता था, तू वहाँ पहुँच गया। उस दिन मैं उन्मनी में था।”
लालाजी ने कहा,
“जी, जानता हूँ।"
गुरुजी ने कहा, “यही तो मुझे अच्छा लगा कि तू जान गया। उस दिन अगर तू मिलने आता तो मुझे अच्छा नहीं लगता। तू चला गया तो मैं प्रसन्न हो गया।"
गुरु भाई और परेशान हो गये। वे गुरुजी से तो पूछ नहीं सकते थे किन्तु वापसी में उन्होंने लालाजी से पूछा,
“यह बताओ, यह उन्मनी क्या होता है? तुमने उस दिन मिलने के लिए मना कर दिया कि आज नहीं मिलेंगे, तो यह उन्मुनि होता क्या है?”
लालाजी ने कहा,
“तुमने गुरुजी का प्रवचन ठीक से सुना नहीं। एक बार प्रवचन में गुरुजी ने बताया था, जो मुझे याद है। उन्मुनि का अर्थ है- सोने से न सोना अच्छा लगे, खाने से न खाना अच्छा लगे, क्योंकि परमात्मा से उस समय सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। जब ऊपर वाले से सम्बन्ध जुड़ गया, तब खाने से अधिक प्रिय न खाना होता है, सोने से अधिक प्रिय न सोना होता है, बोलने से अधिक प्रिय न बोलना होता है, मिलने से अधिक प्रिय न मिलना होता है।
“तुमने गुरुजी का प्रवचन ठीक से सुना नहीं। एक बार प्रवचन में गुरुजी ने बताया था, जो मुझे याद है। उन्मुनि का अर्थ है- सोने से न सोना अच्छा लगे, खाने से न खाना अच्छा लगे, क्योंकि परमात्मा से उस समय सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। जब ऊपर वाले से सम्बन्ध जुड़ गया, तब खाने से अधिक प्रिय न खाना होता है, सोने से अधिक प्रिय न सोना होता है, बोलने से अधिक प्रिय न बोलना होता है, मिलने से अधिक प्रिय न मिलना होता है।
जब दिल को नींद आ जाती है और रूह भी गाफ़िल होती है
तब मैं ही अकेला होता हूँ और यार की महफिल होती है।
तब मैं ही अकेला होता हूँ और यार की महफिल होती है।
जब उसके साथ मेरी महफिल जमती है तब उन्मनी रहती है। यह सब अद्भुत बातें होती हैं, सन्तों की बातें होती हैं।
अनिष्टमिष्टं(म्) मिश्रं(ञ्) च, त्रिविधं(ङ्) कर्मणः(फ्) फलम्।
भवत्यत्यागिनां(म्) प्रेत्य, न तु सन्न्यासिनां(ङ्) क्वचित्॥18.12॥
कर्मफल का त्याग न करनेवाले मनुष्यों को कर्मों का इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित - (ऐसे) तीन प्रकार का फल मरने के बाद (भी) होता है; परन्तु कर्मफल का त्याग करने वालों को कहीं भी नहीं होता।
विवेचन-
श्रीभगवान् कहते हैं तीन प्रकार के कर्मफल होते हैं अनिष्ट, ईष्ट, मिश्रित। हमारे जन्मों के करोड़ों खाते हैं। जब जितनी बार जन्म लिए उतनी बार के, किसी और योनि में जन्म लेने पर उसका कोई खाता नहीं होता है। कर्म के फल का खाता तभी होता है जब हम मनुष्य बनते हैं। करोड़ों बार हम मनुष्य बन चुके हैं। अच्छे और बुरे दोनों ही कार्य किए हैं।
सञ्चित कर्म का जो हिस्सा इस जन्म में उपयोग में आएगा
उसे कहते हैं प्रारब्ध।
उसे कहते हैं प्रारब्ध।
एफ.डी.(F.D.) पाँच लाख की है लेकिन इस साल मेरे हाथ में पचास हजार ही आऍंगे। इसी जन्म में हमारे सारे प्रारब्ध चुकता नहीं हो सकते।
इष्ट जो अच्छा लगता है।
अनिष्ट जो अच्छा नहीं लगता।
खराब पड़ोसी मिल जाए, भाइयों में झगड़ा हो जाए तो यह है अनिष्ट।
वास्तव में जो अच्छा लगता है उसे कहते हैं इष्ट। जो चाहिए वह इष्ट जो नहीं चाहिए वह अनिष्ट।
प्रारब्ध- पुराने कर्मों का फल।
तीसरा है क्रियामान,
इस जीवन में जो कर्म कर रहे हैं। जो नए कर्म कर रहे हैं, वे हमारे अगले सञ्चित में जुड़ जाऐंगे।
इष्ट जो अच्छा लगता है।
अनिष्ट जो अच्छा नहीं लगता।
खराब पड़ोसी मिल जाए, भाइयों में झगड़ा हो जाए तो यह है अनिष्ट।
वास्तव में जो अच्छा लगता है उसे कहते हैं इष्ट। जो चाहिए वह इष्ट जो नहीं चाहिए वह अनिष्ट।
प्रारब्ध- पुराने कर्मों का फल।
तीसरा है क्रियामान,
इस जीवन में जो कर्म कर रहे हैं। जो नए कर्म कर रहे हैं, वे हमारे अगले सञ्चित में जुड़ जाऐंगे।
क्रियमाण के दो प्रकार होते हैं-
फल अंश और संस्कार अंश।
फल अंश और संस्कार अंश।
फल अंश के भी दो प्रकार होते हैं-
हमने ग्लूकोस पिया तुरन्त शक्ति आ गई यह हो गया- दृष्ट।
हमने घी पिया, सत्तर वर्ष की उम्र तक हमारे घुटनों में दर्द नहीं हो रहा है तो यह हो गया अदृष्ट। बचपन का पिया घी अदृष्ट।
अदृष्ट के भी दो प्रकार के फल होते हैं-
कालातीत और
तात्कालिक।
कालातीत और
तात्कालिक।
एक तुरन्त मिल जाए और एक कुछ समय पश्चात्। उसमें भी तीनों मिलेंगे- ईष्ट, अनिष्ट और मिश्रित। अच्छा फल, बुरा फल या मिला-जुला फल। इसी प्रकार उसका जो फल अंश है वह अदृष्ट फल है।
अदृष्ट फल लौकिक भी हो सकता है और अलौकिक भी हो सकता है।
अलौकिक में इष्ट अनिष्ट और मिश्रित कोई ग़लत कार्य किया था उसका फल- लौकिक फल प्राप्त हो गया।
एक होता है अलौकिक फल- पाप-पुण्य।
अदृष्ट फल लौकिक भी हो सकता है और अलौकिक भी हो सकता है।
अलौकिक में इष्ट अनिष्ट और मिश्रित कोई ग़लत कार्य किया था उसका फल- लौकिक फल प्राप्त हो गया।
एक होता है अलौकिक फल- पाप-पुण्य।
मोक्ष प्राप्त किया तो नानुवृति।
मोक्ष प्राप्त नहीं किया पुनर्जन्म लिया तो पुनरावृति।
मोक्ष प्राप्त नहीं किया पुनर्जन्म लिया तो पुनरावृति।
हर कर्म का एक संस्कार अंश होता है ।
शुद्ध और अशुद्ध संस्कार- हम जो भी कर्म करते हैं उसका पाप-पुण्य नाम का एक फल बनता है और शुद्ध-अशुद्ध नाम का संस्कार बनता है जिससे अपने जीवन का संस्कार निर्माण होता है।
जो बालक अभी पैदा हुआ है, उसने कोई कर्म करने शुरू नहीं किये। कोई बच्चा बड़ा झगड़ालू होता है, कोई बच्चा बड़ा शान्त होता है। कर्म अभी शुरू नहीं हुए, पर उसके पूर्व जन्म के संस्कार साथ आते हैं। स्वभाव से ही कोई बालक बड़ा चपल, चञ्चल है और कोई बड़ा शान्त स्वभाव का है। स्वभाव से कोई बालक बड़ा तेजस्वी है। ये बातें संस्कार के द्वारा उससे जुड़ती हैं और ये सब कर्मफल अनुसार चलते हैं।
जो पूर्ण खाता है। प्रारब्ध कर्म इस जीवन में हमें मिलेगा।
क्रियमाण जो मैं नया बना रहा हूँ, यह बात केवल मनुष्य पर लागू होगी। बाकी योनि में प्रारब्ध मिलता है- यक्ष, पितर्, पशु-पक्षियों तथा पेड़-पौधों की योनियों में प्रारब्ध कर्म होते हैं। उन्हें प्रारब्ध फल मिलते हैं, किन्तु वे नया कर्म नहीं कर सकते।
कुत्ता काट ले तो उसे पाप नहीं लगता, देवता वरदान दे दें तो उन्हें कोई फल नहीं मिलता किन्तु क्रियमाण कर्म नहीं होते।
कर्मफल केवल मनुष्य योनि में मिलता है इसीलिये मनुष्य नए कर्मो का निर्माण भी कर सकते हैं और पुराने कर्म फलों को नष्ट अथवा समाप्त भी कर सकते हैं। श्रीभगवान् यहाँ पर यही बात बताना चाहते हैं। परीक्षा का त्याग हो गया तो नए कर्मों का निर्माण नहीं होगा। कर्मफल त्याग नहीं करने वाले मनुष्य को अनिष्ट, इष्ट और मिश्रित फल प्राप्त होंगे। जो कर्मफल का त्याग कर देता है उसे किसी भी काल में उसका फल नहीं मिलता।
श्रीरामजी के जीवन का उदाहरण देखिए, युधिष्ठिरजी का जीवन देखिए, राजा हरिश्चन्द्रजी का जीवन देखिए। उनके जीवन में कितने अधिक कष्ट आए? हरिश्चन्द्रजी का राज्य चला गया, स्वयं को, पत्नी को, अपने बच्चे को बेचना पड़ा, बच्चे की मृत्यु हो गई, किन्तु उन्होंने धर्म नहीं छोड़ा।
युधिष्ठिर का राज्य छिन गया, पत्नी दाँव पर लग गई, बार-बार वन में मारने का प्रयास किया गया पर उन्होंने धर्म नहीं छोड़ा।
श्रीराम जी को वनवास का आदेश मिला, वल्कल वस्त्र पहन कर राज्य छोड़ने का आदेश हुआ। चौदह वर्ष तक नगर में प्रवेश नहीं करना, पका हुआ भोजन नहीं खाना, वन में ही निवास करना और वहीं कन्द-मूल खाना, भूमि पर शयन करना फिर भी रामजी प्रसन्न मुद्रा से वन की ओर जा रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी इसका वर्णन करते हैं-
"प्रसन्नात्मक वास"
इनके जीवन का संस्कार पक्ष शुद्ध है। जिनका संस्कार पक्ष जितना मजबूत होगा वे विपरीत परिस्थिति में विचलित नहीं, धैर्यवान होंगे। जिनका संस्कार पक्ष कमजोर होता है वे अनुकूल परिस्थिति में तो धार्मिक दिखेंगे, किन्तु प्रतिकूलता आते ही एकदम विचलित हो जाते हैं।
"धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥"
ये चार बातें- हमारा धैर्य कितना है, हमारी धर्म बुद्धि कितनी है, हमारे मित्र, पति या पत्नी कैसे हैं- आपातकाल में ही उनकी परीक्षा होती है। अनुकूलता में चारों ही अच्छे होते हैं। प्रतिकूलता में धैर्य भी छूटता है, धर्म भी बिगड़ता है, मित्र भी साथ छोड़ देते हैं और पति-पत्नी भी एक दूसरे को ताने देते हैं। जीवन में महान् वे ही बनते हैं जिनका संस्कार पक्ष मजबूत होता है, इसलिये संस्कारों का बहुत महत्त्व है।
पूज्य स्वामी जी महाराज के पिताजी भागवत् कथा करते थे। गाँव के विवाह, उत्सव, मङ्गल आदि कराया करते थे। एक बार कोई यजमान उनके पिताजी के पास आए। उनके पिताजी बड़ी विधि-विधान से कार्य करवाते थे। यजमान ने उनसे कहा- आप मेरे बेटे का विवाह करवायें, किन्तु आपसे एक विनती है कि आपका जो विधि-विधान है उसमें अधिक समय लगता है। पाँच घण्टे के स्थान पर दो घण्टे में कर दीजिएगा, मैं दक्षिणा दुगनी दे दूँगा। उनके पिताजी ने मना कर दिया तो यजमान ने कहा-
आपका क्या जाता है? धर्म बिगड़ेगा तो हमारा बिगड़ेगा।
पूज्य स्वामी जी महाराज के पिताजी भागवत् कथा करते थे। गाँव के विवाह, उत्सव, मङ्गल आदि कराया करते थे। एक बार कोई यजमान उनके पिताजी के पास आए। उनके पिताजी बड़ी विधि-विधान से कार्य करवाते थे। यजमान ने उनसे कहा- आप मेरे बेटे का विवाह करवायें, किन्तु आपसे एक विनती है कि आपका जो विधि-विधान है उसमें अधिक समय लगता है। पाँच घण्टे के स्थान पर दो घण्टे में कर दीजिएगा, मैं दक्षिणा दुगनी दे दूँगा। उनके पिताजी ने मना कर दिया तो यजमान ने कहा-
आपका क्या जाता है? धर्म बिगड़ेगा तो हमारा बिगड़ेगा।
स्वामी जी ने अपने पिताजी से पूछा,
"आपने मना क्यों कर दिया?"
पिताजी ने कहा,
"भले ही वह दुगनी दक्षिणा दे रहा हो, किन्तु उसके कारण मैं अपने संस्कार नहीं बिगाड़ूँगा।"
"आपने मना क्यों कर दिया?"
पिताजी ने कहा,
"भले ही वह दुगनी दक्षिणा दे रहा हो, किन्तु उसके कारण मैं अपने संस्कार नहीं बिगाड़ूँगा।"
बात बहुत छोटी लगती है लेकिन बहुत गहरी है। मेरा समय कम लगेगा पैसा अधिक मिलेगा।
ऐसे में हम लोग क्या करते हैं? सोचिए।
अपने संस्कारों का संरक्षण करना, यह बहुत आवश्यक है।
एक समय की बात है। एक गुरुजी के दो शिष्य थे। उनका अन्तिम समय आया। उन्होंने सोचा कि गद्दी किसे दूँ? उन्होंने सोचा कि कुछ परीक्षा लेते हैं कि मेरी शिक्षा को किसने कितनी गहराई से पकड़ा है। गुरुजी ने दोनों शिष्यों को बुलाया और दोनों को तीन-तीन रुपये दिये। कहा कि ज़्यादा पूछना नहीं, एक बार में जितना समझ में आ जाए उतना करके आ जाना। एक घण्टे में वापस आना है।
उस समय एक रुपया बहुत मूल्यवान होता था। उन्होंने दोनों से कहा-
“तुम दोनों जाओ और एक रुपया ऐसी जगह खर्च करके आना जो यहाँ काम आये, एक रुपया ऐसी जगह खर्च करना जो वहाँ काम आये और एक रुपया ऐसी जगह खर्च करना जो न यहाँ काम आये और न वहाँ काम आये।"
दोनों चले गये और कुछ समय बाद वापस आये। पहला शिष्य आया तो गुरुजी ने पूछा-
ऐसे में हम लोग क्या करते हैं? सोचिए।
अपने संस्कारों का संरक्षण करना, यह बहुत आवश्यक है।
एक समय की बात है। एक गुरुजी के दो शिष्य थे। उनका अन्तिम समय आया। उन्होंने सोचा कि गद्दी किसे दूँ? उन्होंने सोचा कि कुछ परीक्षा लेते हैं कि मेरी शिक्षा को किसने कितनी गहराई से पकड़ा है। गुरुजी ने दोनों शिष्यों को बुलाया और दोनों को तीन-तीन रुपये दिये। कहा कि ज़्यादा पूछना नहीं, एक बार में जितना समझ में आ जाए उतना करके आ जाना। एक घण्टे में वापस आना है।
उस समय एक रुपया बहुत मूल्यवान होता था। उन्होंने दोनों से कहा-
“तुम दोनों जाओ और एक रुपया ऐसी जगह खर्च करके आना जो यहाँ काम आये, एक रुपया ऐसी जगह खर्च करना जो वहाँ काम आये और एक रुपया ऐसी जगह खर्च करना जो न यहाँ काम आये और न वहाँ काम आये।"
दोनों चले गये और कुछ समय बाद वापस आये। पहला शिष्य आया तो गुरुजी ने पूछा-
“क्या किया?”
उसने कहा-
गुरुजी एक रुपये की भरपेट पूड़ी खा ली और पूरे महीने खाते रहने के लिए उस पैसे को जमा करके आ गया। एक रुपया साधुओं को दान दे दिया तथा एक रुपया मैं वापस ले आया। उसने कहा कि जो आपको दे रहा हूँ, वह यहाँ का, जो साधू को दिया, वह वहाँ का और जो पूड़ी में लगा दिया, वह न यहाँ का न वहाँ का।
दूसरा शिष्य आया और उसने कहा-
गुरुजी एक रुपये की पूड़ी का भण्डारा कर दिया और एक हज़ार साधुओं को भोजन करवा कर आ रहा हूँ, एक रुपया नदी में डाल आया और शेष एक रुपये का मैंने भी भोजन कर लिया और अपने दो महीने के भोजन का प्रबन्ध कर लिया। उसने आगे कहा कि जो मैंने एक रुपये की पूड़ी खायी और अपने दो महीने के भोजन का प्रबन्ध कर लिया, वह यहाँ का हो गया, एक रुपये का जो साधुओं का भण्डारा किया, वह वहाँ का और जो मैंने एक रुपया नदी में डाला, वह न यहाँ का रहा न वहाँ का रहा।
गुरुजी ने कहा-
तुमने ‘यहाँ' का अर्थ ठीक समझा।
गुरुजी एक रुपये की भरपेट पूड़ी खा ली और पूरे महीने खाते रहने के लिए उस पैसे को जमा करके आ गया। एक रुपया साधुओं को दान दे दिया तथा एक रुपया मैं वापस ले आया। उसने कहा कि जो आपको दे रहा हूँ, वह यहाँ का, जो साधू को दिया, वह वहाँ का और जो पूड़ी में लगा दिया, वह न यहाँ का न वहाँ का।
दूसरा शिष्य आया और उसने कहा-
गुरुजी एक रुपये की पूड़ी का भण्डारा कर दिया और एक हज़ार साधुओं को भोजन करवा कर आ रहा हूँ, एक रुपया नदी में डाल आया और शेष एक रुपये का मैंने भी भोजन कर लिया और अपने दो महीने के भोजन का प्रबन्ध कर लिया। उसने आगे कहा कि जो मैंने एक रुपये की पूड़ी खायी और अपने दो महीने के भोजन का प्रबन्ध कर लिया, वह यहाँ का हो गया, एक रुपये का जो साधुओं का भण्डारा किया, वह वहाँ का और जो मैंने एक रुपया नदी में डाला, वह न यहाँ का रहा न वहाँ का रहा।
गुरुजी ने कहा-
तुमने ‘यहाँ' का अर्थ ठीक समझा।
पहले वाले शिष्य ने यहाँ का अर्थ गुरुजी की गद्दी समझा। पहले शिष्य ने यहाँ शब्द का अर्थ सांसारिक जीवन में उसका उपयोग कैसे करना है, वह समझा। उन्होंने दूसरे शिष्य को गद्दी दे दी।
हम जीवन में यहाँ-वहाँ के अन्तर में बहुत जगह चूक जाते हैं। अपने मन की कर रहा हूँ- यह सोचकर अपने संस्कार बिगड़ते जाते हैं।
हम जीवन में यहाँ-वहाँ के अन्तर में बहुत जगह चूक जाते हैं। अपने मन की कर रहा हूँ- यह सोचकर अपने संस्कार बिगड़ते जाते हैं।
पञ्चैतानि महाबाहो, कारणानि निबोध मे।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि, सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥18.13॥
हे महाबाहो ! कर्मों का अन्त करने वाले सांख्य-सिद्धान्त में सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, (इनको तू) मुझसे समझ।
विवेचन- हे महाबाहो, साङ्ख्यशास्त्र में सम्पूर्ण कर्म करने के लिए पाँच हेतु निर्धारित हैं। उनको तुम भली-भाँति जान लो।
श्रीभगवान् कहते हैं कि कोई भी कर्म करना हो तो वह पाँच कारणों से किया जाता है। ये बहुत उपयोगी सूत्र हैं जिन्हें हमें अपने जीवन में अपनाना चाहिए।
ये सूत्र क्या हैं?
श्रीभगवान् कहते हैं कि कोई भी कर्म करना हो तो वह पाँच कारणों से किया जाता है। ये बहुत उपयोगी सूत्र हैं जिन्हें हमें अपने जीवन में अपनाना चाहिए।
ये सूत्र क्या हैं?
अधिष्ठानं(न्) तथा कर्ता, करणं(ञ्) च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा, दैवं (ञ्) चैवात्र पञ्चमम्॥18.14॥
इसमें (कर्मों की सिद्धि में) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकार के करण एवं विविध प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं,
"सुनो अर्जुन! पाँच सूत्र हैं। कई बातें काल के प्रभाव से बदल जाती हैं।"
अधिष्ठान
कर्ता
करण
चेष्टा
दैवम्
उदाहरणस्वरुप, आयुर्वेद में गर्म पानी के साथ शहद लेने का निषेध है, क्योंकि वह शरीर को काटता है, माँस को गलाता है। जो भी भोजन शरीर को गलाए वह अच्छा नहीं माना जाता। आयुर्वेद के अनुसार भोजन वही करना चाहिए जो शरीर को पुष्ट करे। आजकल हम ज्यादा शारीरिक व्यायाम नहीं करते हैं, मोटे होते जा रहे हैं इसलिये शरीर को घटाना है। आजकल बहुत लोग गर्म पानी के साथ शहद लेते हैं, वजन घटाने के लिए। दोनों बात ग़लत नहीं है। गर्म पानी के साथ शहद लेना विधेय बात हो गई।
श्रीभगवान् कहते हैं कोई भी कर्म करना है तो उसके पीछे उद्देश्य क्या है? उसका अधिष्ठान निश्चित करो। उद्देश्य तो बहुत अच्छा है, पर करने वाले लोग नहीं हैं तो क्या काम बनेगा।
पूरे विश्व को गीताजी पढ़नी चाहिए- बहुत अच्छा अधिष्ठान है। पढ़ाने वाले लोग ही नहीं हैं, इसके लिए पढ़ने वाले लोग भी चाहिए और पढ़ाने वाले भी।
तीसरा उद्देश्य भी है, करने वाले भी हैं पर साधन नहीं है। सिखाने वाले के पास मोबाइल न हो या सीखने वाले के पास न हो, तो क्या सीख सकेंगे? व्यापार करना है तो पूँजी चाहिए। नौकरी करनी है तो डिग्री चाहिए। जो भी कर्म करना है उसे करने के लिए साधन उपलब्ध होने चाहिए। यह हो गया कारण।
अब अनुष्ठान भी है, कर्ता भी है, कारण भी है लेकिन चेष्टा नहीं है। गीता कक्षा में नामाङ्कन तो करवा लिया, किन्तु कभी कक्षा में जुड़ते ही नहीं हैं। तीनों बातें होने से भी कर्म सिद्ध नहीं होंगे।
"सुनो अर्जुन! पाँच सूत्र हैं। कई बातें काल के प्रभाव से बदल जाती हैं।"
अधिष्ठान
कर्ता
करण
चेष्टा
दैवम्
उदाहरणस्वरुप, आयुर्वेद में गर्म पानी के साथ शहद लेने का निषेध है, क्योंकि वह शरीर को काटता है, माँस को गलाता है। जो भी भोजन शरीर को गलाए वह अच्छा नहीं माना जाता। आयुर्वेद के अनुसार भोजन वही करना चाहिए जो शरीर को पुष्ट करे। आजकल हम ज्यादा शारीरिक व्यायाम नहीं करते हैं, मोटे होते जा रहे हैं इसलिये शरीर को घटाना है। आजकल बहुत लोग गर्म पानी के साथ शहद लेते हैं, वजन घटाने के लिए। दोनों बात ग़लत नहीं है। गर्म पानी के साथ शहद लेना विधेय बात हो गई।
श्रीभगवान् कहते हैं कोई भी कर्म करना है तो उसके पीछे उद्देश्य क्या है? उसका अधिष्ठान निश्चित करो। उद्देश्य तो बहुत अच्छा है, पर करने वाले लोग नहीं हैं तो क्या काम बनेगा।
पूरे विश्व को गीताजी पढ़नी चाहिए- बहुत अच्छा अधिष्ठान है। पढ़ाने वाले लोग ही नहीं हैं, इसके लिए पढ़ने वाले लोग भी चाहिए और पढ़ाने वाले भी।
तीसरा उद्देश्य भी है, करने वाले भी हैं पर साधन नहीं है। सिखाने वाले के पास मोबाइल न हो या सीखने वाले के पास न हो, तो क्या सीख सकेंगे? व्यापार करना है तो पूँजी चाहिए। नौकरी करनी है तो डिग्री चाहिए। जो भी कर्म करना है उसे करने के लिए साधन उपलब्ध होने चाहिए। यह हो गया कारण।
अब अनुष्ठान भी है, कर्ता भी है, कारण भी है लेकिन चेष्टा नहीं है। गीता कक्षा में नामाङ्कन तो करवा लिया, किन्तु कभी कक्षा में जुड़ते ही नहीं हैं। तीनों बातें होने से भी कर्म सिद्ध नहीं होंगे।
अन्तिम बात है- दैव।
अधिष्ठान भी है, कर्ता भी है, करण भी है, चेष्टा भी है। कोरोना काल में कितने लोगों का व्यापार समाप्त हो गया। दैव अथवा भाग्य का केवल बीस प्रतिशत सहयोग रहता है।
सभी के पास पाँचों हेतु बीस-बीस प्रतिशत हैं ।
मान लो यदि भाग्य दस प्रतिशत ही है, तो चेष्टा को बीस प्रतिशत से तीस प्रतिशत कर दो, जैसे सती सावित्री यमराज से सत्यवान के प्राण वापस ले आती हैं, चेष्टा के बल पर। चेष्टा को बढ़ाकर दैव को प्रबल किया जा सकता है। साधन और चेष्टा यही मूल बात है।
अधिष्ठान भी है, कर्ता भी है, करण भी है, चेष्टा भी है। कोरोना काल में कितने लोगों का व्यापार समाप्त हो गया। दैव अथवा भाग्य का केवल बीस प्रतिशत सहयोग रहता है।
सभी के पास पाँचों हेतु बीस-बीस प्रतिशत हैं ।
मान लो यदि भाग्य दस प्रतिशत ही है, तो चेष्टा को बीस प्रतिशत से तीस प्रतिशत कर दो, जैसे सती सावित्री यमराज से सत्यवान के प्राण वापस ले आती हैं, चेष्टा के बल पर। चेष्टा को बढ़ाकर दैव को प्रबल किया जा सकता है। साधन और चेष्टा यही मूल बात है।
शिवजी कहते हैं,
"कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।
जो जस करहि सो तस फल चाखा।।"
जो जस करहि सो तस फल चाखा।।"
इस विश्व को कर्म प्रधान बनाया गया है। कर्म के द्वारा भाग्य को बदला जा सकता है।
जहाँ कर्म से भाग्य बदलते
श्रम निष्ठा कल्याणी है।
श्रम निष्ठा कल्याणी है।
मैं कार्य के योग्य हूँ, कारण है, प्रयास करता हूँ, फिर जो प्राप्त करना चाहते हैं, जो बनना चाहते हैं वह सब सम्भव है- इन पाँचों बातों के द्वारा।
हममें से कितने लोग गीताव्रती नहीं बन पाए, क्योंकि चेष्टा नहीं है। इन पाँच बातों के द्वारा कर्म की सिद्धि होती है।
हरि नाम कीर्तन के साथ सत्र का समापन हुआ।
हममें से कितने लोग गीताव्रती नहीं बन पाए, क्योंकि चेष्टा नहीं है। इन पाँच बातों के द्वारा कर्म की सिद्धि होती है।
हरि नाम कीर्तन के साथ सत्र का समापन हुआ।
विचार-मन्थन (प्रश्नोत्तर)-
प्रश्नकर्ता- मोनिका जी
प्रश्न- बच्चे के मन को कैसे अच्छा करें, कैसे नियन्त्रित करें? निरन्तर मोबाइल देखने में लगा रहता है।
उत्तर- सब लोग अपने-अपने मन के स्वामी हैं। बालकों को अच्छे संस्कार दिए जा सकते हैं पर उन्हें नियन्त्रित नहीं किया जा सकता। हम अपने बच्चों के पालक हैं, उनके स्वामी नहीं हैं। मैं जैसा चाहूँ मेरा बच्चा वैसा बनें, यह हर बार होता नहीं। ऐसा होता तो हिरण्यकश्यपु के घर प्रह्लाद नहीं होते। बच्चे वह नहीं करते जो हम कहते हैं, बल्कि बच्चे वह करते हैं जो वे देखते हैं (जो हम करते हैं)। यदि घर में माता-पिता दिन भर मोबाइल देखते हैं तो बच्चा मोबाइल न देखे, ऐसा होता नहीं है। ये तो ऐसा ही हो गया कि बच्चे को टॉफ़ी दी जाए और कहा जाए कि तुम इसे खाना मत। बालक़ों को मोबाइल दें पर उसका समय निश्चित कर दें। निश्चित समय के बाद उससे मोबाइल ले लें। अपना कहना मान लेने पर उसकी प्रशंसा भी करें, पुरस्कृत भी करें। हर बार डाँटते रहने से उसका प्रभाव उस पर नहीं पड़ता, उल्टा दुष्प्रभाव होता है। अपने आचरण से बच्चों को सिखाना अधिक प्रभावी होता है।
प्रश्नकर्ता-आराधना जी
प्रश्न- प.पूज्य स्वामी जी ने बताया है कि पहले अपनी सासुजी के चरण छूने के बाद श्रीभगवान् जी की पूजा करनी चाहिए। मैं तो सुबह चार बजे उठ कर पूजा करती हूँ और मेरी सासुजी छ: बजे उठती हैं तो कैसे करें?
उत्तर- यदि आप चार बजे उठकर श्रीभगवान् जी की पूजा करती हैं तो सासुजी के छ: बजे उठने के बाद उनको प्रणाम कर लीजिए।
प्रश्न- स्वामी जी के अगले कार्यक्रम के बारे में जानकारी चाहिए थी, कहाँ मिलेगी?
उत्तर -स्वामी जी के अगले कार्यक्रम की जानकारी
https://dharmashree.org/events/ इस वेबसाइट पर मिल जायेगी।
।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।।