विवेचन सारांश
श्रीभगवान् की विभूतियाँ
पता नहीं, हमारे इस जन्म के कोई पुण्य कर्म हैं, हमारे पूर्व जन्म के सुकृत हैं, हमारे पूर्वजों के सुकृत हैं या फिर किसी जन्म में किसी महापुरुष की कृपा दृष्टि हम पर पड़ गयी, जिस कारण हमारा ऐसा भाग्योदय हो गया जो हम श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़ने के लिए चुन लिए गए। यह साधारण बात नहीं है कि हम श्रीमद्भगवद्गीता के लिए चुने गए हैं।
अतः बारम्बार अपने भाग्य की सराहना कर, यह विचार करते रहना चाहिए कि हमने गीताजी को नहीं चुना है वरन् हम गीताजी द्वारा चुने गए हैं। अब यह छूटनी नहीं चाहिए।
दसवें अध्याय का विवेचन हम देख रहे हैं। इसका नाम विभूतियोग है।
10.6
महर्षयः(स्) सप्त पूर्वे,चत्वारो मनवस्तथा।
मद्भावा मानसा जाता, येषां(म्) लोक इमाः(फ्) प्रजाः॥10.6॥
ब्रह्मा जी सोचने लगे कि अब संसार की सन्तति विस्तार का क्या होगा?
सनत, सनन्दन, सनातन और सनत कुमार आज भी वैसे ही हैं। आज तक भी उनकी वही प्रवृत्ति है। यदि कथा सुनने वाला मिल गया तो वक्ता बनकर उसको कथा सुनाते हैं और यदि कथा सुनाने वाला मिल जाए तो श्रोता बनकर कथा सुनने बैठ जाते हैं। श्रीभगवान् की कथा सुनने में उन्हें अति आनन्द की अनुभूति होती है। यदि वक्ता और श्रोता दोनों ही नहीं मिलते तो चारों भाई आपस में ही एक वक्ता और शेष तीन श्रोता बन जाते हैं। कभी कोई वक्ता बन जाता है तो कभी कोई। श्रीभगवान् की कथा कहना और सुनना, यही उनकी नित्य प्रवृत्ति रहती है। इसके अतिरिक्त उनका किसी बात में मन नहीं लगता।
इधर ब्रह्मा जी ने जब देखा कि इन चारों सनकादियों से उनका संसार सन्तति का विचार पूर्ण नहीं हो रहा तो उन्होंने सात और ऋषियों को उत्पन्न किया। इन सातों के भिन्न-भिन्न कल्पों में भिन्न-भिन्न नाम मिलते हैं। हमारे कल्प में महर्षि वशिष्ठ, महर्षि कश्यप, महर्षि अत्रि, महर्षि जमदाग्नि, महर्षि गौतम, महर्षि विश्वामित्र और महर्षि भारद्वाज हैं। ब्रह्मा जी ने इन महर्षियों को आज्ञा दी कि अब तुम संसार की उत्पत्ति करने हेतु धर्म का पालन करो और प्रजा की उत्पत्ति करो।
ब्रह्मा जी के एक दिन में चौदह मनु होते हैं। मनु का अर्थ है, मानस पुत्र। एक मनु के पास बहत्तर चतुर्युगी का जीवन होता है। एक चतुर्युगी की आयु तैंतालीस लाख बीस सहस्त्र वर्ष की होती है। अभी सातवें मनु का दिन चल रहा है अर्थात ब्रह्मा जी का आधा दिन ही हुआ है। इनका नाम वैवस्वत मनु है। पहले स्वयम्भू मनु हुए फिर मनु-शतरूपा हुए। मनु से ही मनुष्य शब्द बना। मनुष्यों के विधान के लिए मनु से ही मनुस्मृति हुई।
एतां(म्) विभूतिं(म्) योगं(ञ्) च, मम यो वेत्ति तत्त्वतः।
सोऽविकम्पेन योगेन,युज्यते नात्र संशयः॥10.7॥
अविकम्पन्न अर्थात् जो परिस्थितियों के वश से कम्पित नहीं होते।
बुरी परिस्थितियों से उदास या दु:खी नहीं होते। थोड़ी सी भी असुविधा से विचलित नहीं होते हैं। जीवन में सब कुछ मेरे मन का नहीं होगा, यह तो निश्चित बात है। हम सभी जानते हैं कि सारी बातें हमारे अनुसार नहीं होंगी तो हमें मन को दु:खी करने का तो प्रश्न ही नहीं होना चाहिए। यही कम्पन्न है।
श्रीभगवान् ने कहा कि यही करना सीख गए तो हम योगी हो जाएँगे। यह भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है कि ऐसा हो भी जाए तो हम स्वयं को कितना शीघ्र उस परिस्थिति से बाहर ले आते हैं। किसी भी परिस्थिति में हमारा मन न बिगड़े, उसके लिए वर्षों का अभ्यास चाहिए।
जैसे हमारा फ़ोन जब कभी धीमा चलने लगता है अथवा अटक जाता है तो उसे रिसेट (reset) करना पड़ता है। उससे यह पुराना सब कुछ भूल जाता है और ठीक हो जाता है। उसी भाँति हमें अपने मन को भी रिसेट (reset) करना है। ये गुस्से वाले या दु:खी चेहरे श्रीभगवान् को भी पसन्द नहीं हैं। हमारे मुखारविन्द की स्वभाविक प्रवृत्ति प्रसन्न मुद्रा वाली होनी चाहिए। यदि हमारे मुख की प्रसन्नता चली गयी है तो दर्पण में देखकर उसे रिसेट (reset) करें। यह करना सीख गए तो जीवन में अविकम्पन्न योग आ जाएगा।
यदि किसी का मन दु:खी है और पूछने पर भी नहीं बता रहा है, ऐसे में दूसरा व्यक्ति उससे अलग चला जाए तो दु:खी व्यक्ति सोचेगा कि देखो चले गए और पूछा भी नहीं।
एक शायर ने कहा है कि-
तो किस बात का गम है जो पूछ लें मुझसे?
अहं(म्) सर्वस्य प्रभवो, मत्तः(स्) सर्वं(म्) प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां(म्), बुधा भावसमन्विताः॥10.8॥
किसी के इष्ट रामजी हैं, किसी के कृष्णजी हैं। किसी के इष्ट शिवजी हैं तो किसी की इष्ट मातारानी हैं। अब जो जिसे चाहे उसे देख ले।
श्रीभगवान् कहते हैं कि मैं ही समस्त जगत की उत्पत्ति का कारण हूँ। मुझसे ही सब जगत चेष्टा करता है। इस प्रकार समझकर और श्रद्धा, भक्ति से युक्त होकर बुद्धिमान जन मेरी उपासना करते हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि संसार में जो कुछ होता है वह सब मेरी शक्ति से होता है। यदि हम हाथ भी हिला रहे हैं तो उसे हिलाने की शक्ति परमात्मा से ही प्राप्त होती है। हम चाहे अच्छा करें अथवा बुरा कार्य करें वह,
श्रीभगवान् की इच्छा से नहीं वरन् उनकी शक्ति से होता है।
मच्चित्ता मद्गतप्राणा,बोधयन्तः(फ्) परस्परम्।
कथयन्तश्च मां(न्) नित्यं(न्), तुष्यन्ति च रमन्ति च॥10.9॥
प्रथम चरण है-
मच्चित्ता मद्गतप्राणा- यह साधना का भाग है। इसमें बताया गया है कि अपने चित्त को श्रीभगवान् में लगाना है और चर्चा भी श्रीभगवान् की ही करनी है। ऐसा करने वाले मनुष्य के मन में निरन्तर सन्तुष्टि रहती है और वह परमात्मा में ही रमण करता है। जो लोग इस मार्ग में लगे हुए हैं, ऐसे लोगों का सान्निध्य अति लाभकारी सिद्ध होता है।
लर्न गीता की कक्षा में देखें कि उसमें उपस्थित सभी साधक, प्रशिक्षक तथा अन्य सभी तकनीकी सहायकों की सात्त्विकता कितनी अधिक है। ऐसे लोगों के साथ बैठने से हमारी सात्त्विकता भी बढ़ जाती है और अच्छी बातों में मन लगने लगता है तथा बुरी बातों से हम दूर होने लगते हैं। सत्सङ्ग आध्यात्मिक उन्नति का सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय है।
बिनु सत्सङ्ग बिबेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
हमारे आस-पास भी सात्त्विक ऊर्जा वाले, सत्यवादी, धर्मशील लोग मिल जाएँगे। ऐसे लोगों के साथ हमें अपना समय बिताना चाहिए। उनके सान्निध्य में बैठना चाहिए जिनके जीवन में सत्य है, धर्म है, उदारता है। जिनका जीवन अपने स्वार्थ के लिए नहीं है। ऐसे लोगों का सङ्ग करने से अपने जीवन में उत्थान होता है, परन्तु हम इसके विपरीत ही कार्य करते हैं। जहाँ लोगों की चर्चा होती है, हमारा मन तो वहीं लगता है। विचार कर के देखें तो ऐसे व्यक्ति सात्त्विक नहीं, राजसिक प्रवृत्ति के होते हैं। ऐसे व्यक्ति मात्र समय व्यतीत करते हैं और हमारे जीवन को अधम की ओर ले जाते हैं।
जो अपने जीवन में श्रीभगवान् का कथन करते हैं और जो भगवद् चिन्तन करते हैं, ऐसे महापुरुषों का सङ्ग करने से ही जीवन में उन्नति होती है।
तेषां(म्) सततयुक्तानां(म्), भजतां(म्) प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं(न्) तं(म्), येन मामुपयान्ति ते॥10.10॥
तेषामेवानुकम्पार्थम्,अहमज्ञानजं(न्) तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो, ज्ञानदीपेन भास्वता॥10.11॥
यह गुन साधन तें नहिं होई।
तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई॥
नारद जी के उपदेश से ध्रुव जी पाँच वर्ष की अवस्था से ही श्रीभगवान् की तपस्या में लग गए। उन्हें मात्र श्रीविष्णु भगवान् के दर्शन करने थे। कोई भी देवता आते और पूछते कि बताओ तुम्हें क्या चाहिए तो वे कहते कि मुझे बस श्रीविष्णु भगवान् ही चाहिए।
उन्होंने दीर्घकाल तक अत्यन्त कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णुजी को आना पड़ा। छोटे से बालक ने विचार तो किया था कि जब श्रीभगवान् आएँगे तो मैं क्या-क्या कहूँगा परन्तु जब श्रीभगवान् सामने आये तो वे कुछ भी बोल ही नहीं पा रहे हैं और रोने लगे। यह देखकर विष्णुजी ने अपने शङ्ख से ध्रुवजी के गाल को स्पर्श किया। स्पर्श करते ही ध्रुवजी को वाणी प्राप्त हुयी और उन्होंने श्रीभगवान् की अद्भुत स्तुति की।
शबरी ने कहा,
तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥
प्रथम भगति सन्तन कर सङ्गा |
दूसरि रति मम कथा प्रसङ्गा ||
गुर पद पङ्कज सेवा तीसरि भगति अमान |
चौथी भगति मम गुन गन करइ कपट तज गान ||
मन्त्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा |
पञ्चम भजन सो बेद प्रकासा ||
छठ दम सील बिरति बहु करमा |
निरत निरन्तर सज्जन धर्मा ||
सातव सम मोहि मय जग देखा |
मोते सन्त अधिक करि लेखा ||
आठव जथा लाभ सन्तोषा |
सपनेहु नहिं देखहि परदोषा ||
नवम सरल सब सन छनहीना |
मम भरोस हिय हरष न दीना ||
नव महुं एकउ जिन्ह कें होई ।
नारि पुरूष सचराचर कोई ॥
मम दरसन फल परम अनूपा |
जीव पाइ निज सहज सरूपा ||
नौ प्रकार की भक्ति का उपदेश देकर श्रीभगवान् ने कहा कि कोई मनुष्य इनमें से एक भी प्रकार की भक्ति करता है तो मैं उसे प्राप्त हो जाता हूँ, तुम्हारे पास तो समस्त नौ प्रकार की भक्ति है।
तो प्रह्लाद जी ने कहा कि हाँ, हैं।
हिरण्यकश्यप ने उस खम्बे में आग लगा दी और फिर पूछा कि बता क्या अब भी इसमें भगवान् हैं? अब प्रह्लाद जी ने सोचा कि जिस खम्बे को जला दिया, उसमें भगवान् हैं या नहीं? मैं कैसे कहूँ? इस प्रश्न का क्या उत्तर दूँ? उसी समय श्रीभगवान् ने तुरन्त कृपा की। प्रह्लाद जी को उस खम्बे पर एक चींटी चलती हुई दिखाई दी। प्रह्लाद जी की सारी शङ्का का निवारण हो गया और उन्होंने कह दिया कि इसमें भी परमात्मा हैं।
क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने उस खम्बे पर अपनी गदा से प्रहार किया और नरसिंह भगवान् प्रकट हो गए। जो व्यक्ति श्रीभगवान् के भजन में सतत् प्रीति पूर्वक लगा रहता है, वह यदि कहीं फिसलता भी है तो श्रीभगवान् तुरन्त कृपा करते हैं और अपने भक्त को गिरने से बचा लेते हैं।
अर्जुन उवाच
परं(म्) ब्रह्म परं(न्) धाम, पवित्रं(म्) परमं(म्) भवान्।
पुरुषं(म्) शाश्वतं(न्) दिव्यम्, आदिदेवमजं(म्) विभुम्॥10.12॥
आहुस्त्वामृषयः(स्) सर्वे, देवर्षिर्नारदस्तथा।
असितो देवलो व्यासः(स्), स्वयं(ञ्) चैव ब्रवीषि मे॥10.13॥
कभी-कभी छोटा बच्चा भी अपने पिताजी से कहता है कि हाँ, आप सही कह रहे हैं। यही बात मेरे अध्यापक ने भी कही थी। पिताजी को लगता है कि मेरे कहने से इसे सही नहीं लगा, अध्यापक ने कहा है इसलिए बात को सही मान रहा है। नहीं तो मेरी बात पर शङ्का करता।
इसी प्रकार श्रीभगवान् ने भी कहा कि असित देवल नारद जी ने कह दिया तो तुम मेरी बात को सही मान रहे हो, नहीं तो शङ्का करते क्या?
परन्तु अर्जुन के मन में उनके प्रति श्रद्धा है और श्रीभगवान् को श्रद्धा ही प्रिय है।
सर्वमेतदृतं(म्) मन्ये, यन्मां(म्) वदसि केशव।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं(म्), विदुर्देवा न दानवाः॥10.14॥
सामान्य लोगों की तो क्या बात करें? दुर्योधन ने कहा कि इस ग्वाले को पकड़ लो। वह भगवान् श्रीकृष्ण को ग्वाला कहता है। श्रीभगवान् ने हस्तिनापुर की सभा में अपना विराट स्वरूप प्रकट कर दिया। दुर्योधन, शकुनि, कर्ण आदि सभी की आँखें चकाचौंध हो गयीं। सभी को अपने हाथों से अपनी आँखों को ढँकना पड़ा। पूरी सभा में मात्र विदुर जी और भीष्म पितामह ने ही श्रीभगवान् के विराट स्वरुप के दर्शन किये। श्रीकृष्ण के वहाँ से जाने के पश्चात् दुर्योधन ने कहा कि यह तो बड़ा मायावी है। कैसे-कैसे चमत्कार करता है! उसे तो तब भी यह समझ नहीं आया कि वे ही श्रीभगवान् हैं।
दुर्योधन जैसे लोग तो सामान्य लोग हैं परन्तु श्रीभगवान् के साथ रहने वाले, उनके प्रभाव को जानने वाले ब्रह्मा जी भी श्रीभगवान् की लीला से मोहित हो गए। कृष्ण जी की परीक्षा लेने के लिए ब्रह्मा जी और इन्द्र आये।
भगवान् श्रीराम की परीक्षा लेने आया इन्द्र का पुत्र जयन्त, माता सीता के पैर में प्रहार करता है। कंस, रावण, दुर्योधन तो सामान्य व्यक्ति हैं। नारद जी भी श्रीभगवान् की लीला से चकित हो गए।
पहले तो वे कहते हैं,
करहु सो वेगि दास मैं तोरा।।
श्रीभगवान् ने उन्हें वानर बना दिया तो नारद जी ने श्रीभगवान् को भयङ्कर श्राप दे दिया। इस श्राप के कारण श्रीभगवान् को मनुष्य देह में आना पड़ा।
श्रीभगवान् की लीलाओं को समझने के लिए सन्तों का साथ होना आवश्यक है। उनके सान्निध्य के बिना श्रीभगवान् की लीलाओं में भी शङ्का हो जाती है कि पता नहीं, सच हैं कि नहीं।
इसी प्रकार अर्जुन कह रहे हैं कि न देवता जानते हैं, न ही दानव जानते हैं। यदि जानते होते तो इन्द्र, नारद आदि क्यों फँसते?
स्वयमेवात्मनात्मानं(म्), वेत्थ त्वं(म्) पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश,देवदेव जगत्पते॥10.15॥
वक्तुमर्हस्यशेषेण,दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
याभिर्विभूतिभिर्लोकान्, इमांस्त्वं(म्) व्याप्य तिष्ठसि॥10.16॥
श्रीभगवान् ने पूछा कि हे अर्जुन! तुम क्या कहना चाहते हो?
अर्जुन ने कहा कि-
जिन विभूतियों के द्वारा आप इन लोकों में स्वयं को व्याप्त करके स्थित हैं, अपनी उन दिव्य विभूतियों को सम्पूर्णता से कहने में आप ही समर्थ हैं।
कथं(म्) विद्यामहं(म्) योगिंस्, त्वां(म्) सदा परिचिन्तयन्।
केषु केषु च भावेषु,चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥10.17॥
जैसे हम बड़े अध्यापक के पास जाते हैं तो उनसे कहते हैं कि वे हमें इस प्रकार समझाएँ कि हमें सब समझ आ जाए।
इसी प्रकार गीताजी को समझने के लिए यदि किसी संस्कृत के महाविद्वान के पास जाएँ और वह संस्कृत में ही अर्थ समझाएँ तो हमें कुछ भी समझ नहीं आएगा। वह बड़े-बड़े सिद्धान्त कहेंगे और हमें वे समझ ही नहीं आएँगे। हम तो सरल भाषा में ही समझ सकते हैं।
विस्तरेणात्मनो योगं(म्), विभूतिं(ञ्) च जनार्दन।
भूयः(ख्) कथय तृप्तिर्हि, शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥10.18॥
श्रीभगवान् ने कहा कि यदि मैं अपनी विभूतियों को विस्तार से कहूँगा तो बहुत दिन लग जायेंगे।
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि, दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
प्राधान्यतः(ख्) कुरुश्रेष्ठ, नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥10.19॥
अहमात्मा गुडाकेश, सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं(ञ्) च, भूतानामन्त एव च॥10.20॥
आदित्यानामहं(म्) विष्णु:(र्), ज्योतिषां(म्) रविरंशुमान्।
मरीचिर्मरुतामस्मि, नक्षत्राणामहं(म्) शशी॥10.21॥
बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु और दो अश्विनी कुमार हैं।
ये कुल तैंतीस हैं।
वेदानां(म्) सामवेदोऽस्मि, देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां(म्) मनश्चास्मि, भूतानामस्मि चेतना॥10.22॥
वेदों में ऋचाएँ, छन्द बद्ध गायी जा सकती हैं।
वेदों में सामवेद विभूति है।
इन्द्र देवताओं का राजा है।
क्योंकि इन्द्रियों का स्वामी मन है। यदि मन कहीं और हो तो आँखें देखकर भी देख नहीं सकती, कान सुनकर भी सुन नहीं सकते।
जिस इन्द्री से मन जुड़ता है, उसी विषय को हम ग्रहण कर सकते हैं।
रुद्राणां(म्) शङ्करश्चास्मि,वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां(म्) पावकश्चास्मि, मेरुः(श्) शिखरिणामहम्॥10.23॥
एकादश सूत्रों में शङ्कर मैं हूँ।
यक्ष और राक्षसों में धन, वित्त का स्वामी कुबेर मैं हूँ।
शिखर वाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत मैं हूँ।
बारहवें सूत्र में हनुमान जी का भी नाम आया है।
ध्रुव, सोम, धर (धरा), अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास हैं।
इनमें प्रभास ही देवदत्त हुए जिन्हें बाद में गङ्गा पुत्र भीष्म भी कहा गया।
हरि नाम सङ्कीर्तन के साथ ही आज के विवेचन सत्र का समापन होता है। इसके पश्चात प्रश्नोत्तर सत्र का प्रारम्भ होता है।
प्रश्नोत्तरी सत्र
यदि आपके स्वभाव में परहित करने के लिए चिन्तन है तो यह नहीं देखना चाहिए कि किसी को क्या लग रहा है? हमें अपनी ओर से सबका हित करते रहना चाहिए। हमें यह सोचना चाहिए कि हमें किसी से कुछ नहीं चाहिए परन्तु हम सबके काम आते रहें। यही हमारे जीवन की सबसे उत्कृष्ट अवस्था होती है।
प्रश्नकर्ता- सन्दीप भैया।
प्रश्नकर्ता- विनोद भैया।
प्रश्नकर्ता- दिव्यंती दीदी।
इसी प्रकार कुछ बातें दिखती नहीं हैैं, अलग-अलग प्रकार से उस समय उत्पन्न हुई किरणे और जो आकाशीय तरङ्गें हैं वे भोजन को दूषित कर देती हैं तो उसका कुप्रभाव हो सकता है। ऐसे समय में भोजन न बनाएँ और न खाना ही अच्छी बात है।
प्रश्नकर्ता- दिव्यन्ती दीदी।
प्रश्न- भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा कि "इन्द्रियों में मन" तो मैं ही हूँ। हमारे मन में जो विचार उत्पन्न होते हैं तो उसके जिम्मेदार हम कैसे हैं?
"ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु"