विवेचन सारांश
नियत कर्म की श्रेष्ठता
देशभक्ति गीत, श्रीमधुराष्टकम्, श्रीहनुमान चालीसा पाठ, प्रार्थना, दीप प्रज्वलन, गुरु वन्दना एवं श्रीकृष्ण वन्दना से सत्र का शुभारम्भ हुआ।
श्रीभगवान् की अतिशय कृपा है, हमारे पूर्व जन्म के कोई सत्कर्म हैं अथवा किसी सन्त की कृपा दृष्टि हम पर पड़ी कि हम श्रीभगवान् की वाणीयुक्त मङ्गलमय ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता जी का अध्ययन करने के लिए, उसके सूत्रों को समझने के लिए चुन लिए गये हैं। हम में यह परम विश्वास भी होना चाहिये कि श्रीभगवान् ने ही हमें चुना है। अट्ठारहवें अध्याय में श्रीभगवान् ने कहा है-
श्रीभगवान् की अतिशय कृपा है, हमारे पूर्व जन्म के कोई सत्कर्म हैं अथवा किसी सन्त की कृपा दृष्टि हम पर पड़ी कि हम श्रीभगवान् की वाणीयुक्त मङ्गलमय ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता जी का अध्ययन करने के लिए, उसके सूत्रों को समझने के लिए चुन लिए गये हैं। हम में यह परम विश्वास भी होना चाहिये कि श्रीभगवान् ने ही हमें चुना है। अट्ठारहवें अध्याय में श्रीभगवान् ने कहा है-
मामेकं शरणं व्रज
श्रीमद्भगवद्गीता जी का अध्ययन करने वाले को श्रीभगवान् की प्राप्ति हो जायेगी। श्रीमद्भगवद्गीता जी से अधिक मङ्गलमय कोई अन्य ग्रन्थ नहीं है।
लर्नगीता के माध्यम से हम यहाँ श्रीमद्भगवद्गीता जी का दर्शन और अध्ययन करने आए हैं। श्रीमद्भगवद्गीता जी स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं है। इसकी पृष्ठभूमि समझने के लिए महाभारत की कथा को जानना होगा। महाभारत में अट्ठारह पर्व हैं।
भीष्म पर्व के पच्चीसवें अध्याय से बयालीसवें अध्याय
के मध्य श्रीमद्भगवद्गीता जी का प्रादुर्भाव हुआ है।
के मध्य श्रीमद्भगवद्गीता जी का प्रादुर्भाव हुआ है।
महाभारत के एक लाख श्लोकों में से श्रीमद्भगवद्गीता जी
मात्र सात सौ श्लोकों से युक्त हैं।
मात्र सात सौ श्लोकों से युक्त हैं।
महाभारत से बहुत से ग्रन्थ निकले हैं। महाभारत से ही विष्णुसहस्त्रनाम, गजेन्द्रमोक्ष, भीष्म स्वराज, श्रीमद्भगवद्गीता जी आदि ग्रन्थ निकले हैं।
महाभारत में आयी कथा के अनुसार दुर्योधन दुराचारी है। पाण्डवों को राज्य का उचित भाग नहीं देना चाहता है। दुर्योधन ने छल किया। पाण्डवों के सामने शर्त रखी कि बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास पूर्ण करने पर, हस्तिनापुर के राज्य का न्यायोचित भाग उन्हें दे देगा। दुर्योधन के कई तरह के अनाचार और कष्टों को झेल कर पाण्डवों ने तेरह वर्ष शर्त के अनुसार पूर्ण किए।
जिसमें बारह वर्ष का वनवास एवं
एक वर्ष का अज्ञातवास सम्मिलित है।
एक वर्ष का अज्ञातवास सम्मिलित है।
तेरह वर्ष पूर्ण करने के बाद भी दुर्योधन ने इन्द्रप्रस्थ का राज्य क्या, एक सुई की नोक के बराबर भूमि देना भी स्वीकार नहीं किया। कई तरह के प्रयास किये गये। ब्राह्मणों को, कई दूतों को दुर्योधन को समझाने के लिए भेजा गया। दुराचारी दुर्योधन नहीं माना।
श्रीकृष्ण का दूत बन कुरु सभा में जाना तथा
कुन्ती माता का पाण्डवों को युद्ध प्रारम्भ करने हेतु सन्देश।
कुन्ती माता का पाण्डवों को युद्ध प्रारम्भ करने हेतु सन्देश।
स्वयं श्रीकृष्ण दूत बन कर गए। सबने मना किया श्रीकृष्ण को कि वे दूत बन कर न जाएँ। दुर्योधन दूतों के साथ भी उचित व्यवहार नहीं करता है। श्रीकृष्ण ने सात्यकि और नारायणी सेना को हस्तिनापुर की सीमा पर खड़ा किया। अगर दुर्योधन थोड़ा भी दुर्व्यवहार करेगा तो सङ्केत पाते ही सात्यकि सेना सहित आक्रमण कर देगा।
दुर्योधन ने श्रीकृष्ण के किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया, उल्टे श्रीकृष्ण को बन्दी बनाने का आदेश दे दिया। ऐसे में श्रीभगवान् ने अपना विराट रूप प्रकट किया। इस स्वरूप को केवल भीष्म जी और विदुर जी ही देख पाये। दुर्योधन और अन्यों को कुछ भी नहीं दिखा। दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को छलिया कहा।
जब कोई भी बात नहीं बनी, तब माता कुन्ती जो हस्तिनापुर में ही रहती थीं, उन्होंने श्रीकृष्ण के साथ सन्देश भेजा, अब युद्ध करो।
दुर्योधन ने श्रीकृष्ण के किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया, उल्टे श्रीकृष्ण को बन्दी बनाने का आदेश दे दिया। ऐसे में श्रीभगवान् ने अपना विराट रूप प्रकट किया। इस स्वरूप को केवल भीष्म जी और विदुर जी ही देख पाये। दुर्योधन और अन्यों को कुछ भी नहीं दिखा। दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को छलिया कहा।
जब कोई भी बात नहीं बनी, तब माता कुन्ती जो हस्तिनापुर में ही रहती थीं, उन्होंने श्रीकृष्ण के साथ सन्देश भेजा, अब युद्ध करो।
राज धर्म और क्षत्रिय धर्म का पालन करो।
विराटनगर में पहली युद्ध की चर्चा में पाँचों पाण्डवों में से सहदेव को छोड़कर किसी ने भी युद्ध की स्वीकृति नहीं दी। जब युद्ध अपरिहार्य हो गया, तब युद्ध हुआ। सबको पता है, यह विश्व का सबसे बड़ा युद्ध होने वाला है। अट्ठारह अक्षौहिणी सेना एकत्रित होगी। दोनों पक्षों के मन्त्रियों ने भूमि का चयन किया।
महाराज कुरु की तपस्थली कुरुक्षेत्र का चयन किया गया। तपस्थली होने से, मरने वाले सैनिकों को स्वर्ग की प्राप्ति होगी। सेना के नदी पार करने के लिए पुल बनाये गए। यज्ञशाला, शस्त्रशाला, अश्वशाला, अन्न भण्डार बनाये गये। तैयारियों में ही एक वर्ष से अधिक का समय लग गया। युद्ध की तिथि निर्धारित हुई। मार्गशीर्ष मास की एकादशी के दिन, जब दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हुई, तब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से दोनों सेनाओं के मध्य में रथ को खड़ा करने को कहा-
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥
भीष्म पितामह व द्रोणाचार्य को देखकर अर्जुन के मन में मोह उत्पन्न हो गया। यद्यपि विराटनगर के युद्ध में अर्जुन उन्हें पराजित कर चुके हैं, परन्तु उस युद्ध में उनके प्राण नहीं लेने थे, इस युद्ध में प्राण लेने हैं। भीष्म पितामह से अर्जुन ने बाल्यकाल से ही बहुत कुछ सीखा है। द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या सीखी है। उन्होंने अर्जुन को विश्व का श्रेष्ठ धनुर्धर बनाया है। इन पर बाण कैसे चलाऊँ, यह सोच कर अर्जुन मोहग्रस्त हो गये।
श्रीभगवान् ने अपने दिव्य उपदेश से अर्जुन को इस मोह से निकाला। सन्तों और महापुरुषों ने इसको, श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का पैन्तालीस मिनट का संवाद माना है। हम भी श्रीमद्भगवद्गीता जी को कण्ठस्थ करके पैन्तालीस मिनिट में पाठ कर सकते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता जी सीधा-सीधा श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद है।
इस संवाद को अट्ठारह अध्यायों में बाँटने का कार्य तथा समस्त अध्यायों को अवतरणिका, पुष्पिका में व्यवस्थित करने का कार्य वेदव्यास जी ने हम साधकों को तत्त्व को समझाने के लिए किया है।
महाभारत में श्रीमद्भगवद्गीता जी का वर्णन युद्ध के प्रथम दिन में नहीं आया है। महाभारत के युद्ध को दस दिन बीत गये, भीष्म पितामह शरशय्या पर आ गये थे। इसकी सूचना देने, सञ्जय धृतराष्ट्र के पास पहुँचे। यह सुनकर धृतराष्ट्र रोने लगे। धृतराष्ट्र ने कहा, मुझे युद्ध के बारे में कैसे क्या हुआ? यह विस्तारपूर्वक बताओ-
युद्धभूमि में युद्ध की इच्छा वाले मेरे पुत्रों और पाण्डवों के बीच क्या हुआ?
दिव्य दृष्टि प्राप्त सञ्जय दस दिन पुराने घटनाक्रम को देखकर बताने लगे। तब उन्होंने श्रीमद्भगवतगीता जी का पूरा वर्णन किया।
श्रीभगवान् ने अपने दिव्य उपदेश से अर्जुन को इस मोह से निकाला। सन्तों और महापुरुषों ने इसको, श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का पैन्तालीस मिनट का संवाद माना है। हम भी श्रीमद्भगवद्गीता जी को कण्ठस्थ करके पैन्तालीस मिनिट में पाठ कर सकते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता जी सीधा-सीधा श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद है।
इस संवाद को अट्ठारह अध्यायों में बाँटने का कार्य तथा समस्त अध्यायों को अवतरणिका, पुष्पिका में व्यवस्थित करने का कार्य वेदव्यास जी ने हम साधकों को तत्त्व को समझाने के लिए किया है।
महाभारत में श्रीमद्भगवद्गीता जी का वर्णन युद्ध के प्रथम दिन में नहीं आया है। महाभारत के युद्ध को दस दिन बीत गये, भीष्म पितामह शरशय्या पर आ गये थे। इसकी सूचना देने, सञ्जय धृतराष्ट्र के पास पहुँचे। यह सुनकर धृतराष्ट्र रोने लगे। धृतराष्ट्र ने कहा, मुझे युद्ध के बारे में कैसे क्या हुआ? यह विस्तारपूर्वक बताओ-
युद्धभूमि में युद्ध की इच्छा वाले मेरे पुत्रों और पाण्डवों के बीच क्या हुआ?
दिव्य दृष्टि प्राप्त सञ्जय दस दिन पुराने घटनाक्रम को देखकर बताने लगे। तब उन्होंने श्रीमद्भगवतगीता जी का पूरा वर्णन किया।
भक्ति हेतु भक्त के अन्त:करण की
शुद्धता की अपरिहार्यता सम्बन्धित एक कथा।
नारायण स्वामी भक्तिमार्ग के श्रेष्ठ सन्त थे। उनके अभिन्न मित्र, श्रमण जी ज्ञानमार्ग के महान सन्त थे। एक दिन श्रमण जी नारायण स्वामी के पास आये। श्रमण जी ने नारायण स्वामी से कहा कि उनकी भक्ति देखकर उनका मन भक्ति की ओर आकृष्ट हो रहा है। नारायण स्वामी ने श्रमण जी को जल लाकर दिया। ऐसी औपचारिकता उन्होंने श्रमण जी के साथ पहले कभी नहीं की थी। श्रमण जी ने कहा, उन्हें जल की आवश्यकता नहीं है। नारायण स्वामी ने उनकी बात पर विशेष ध्यान दिए बिना जल का पात्र रख दिया। श्रमण जी अचम्भित थे पर स्वामी जी के बहुत कहने पर एक घूँट जल पी लिया।
स्वामी जी ने फिर कहा, जल अधिक मत पीना, मैं शरबत लेकर आता हूँ। अचानक नारायण स्वामी एक लोटे में मीठा जल ले आए। अन्य पात्र नहीं देखकर श्रमण जी ने सोचा, उन्हें पूरा लोटा मीठा जल पीना पड़ेगा, परन्तु नारायण स्वामी शरबत लाते ही उसे पानी के पात्र में डालना प्रारम्भ कर देते हैं। उन्होंने पात्र के भरने पर भी बन्द नहीं किया। पानी बाहर गिरने लगा। श्रमण जी ने कहा कि ये क्या कर रहे हैं? पूर्ण भरे पात्र में शरबत कैसे आयेगा। स्वामी जी ने कहा कि तुम्हारी पहली शिक्षा पूरी हुई। जैसे भरे हुए जल के पात्र में अधिक शरबत नहीं भरा जा सकता है, वैसे ही तुम्हारे मस्तिष्क में पहले से जो भरा हुआ है, उसको रिक्त कर के आओ।
हम सब श्रीमद्भगवद्गीता जी पढ़ने के लिए आये हैं। लगभग तीन से चार हजार भक्त श्रीमद्भगवद्गीता जी सुनते हैं। एक ही बात सबके लिए कहने पर भी, सभी अपने तरह से, अपने पूर्वाग्रहों के कारण, अपने मन की अलग-अलग वृत्ति के कारण, अलग-अलग भाव को मन पर बैठाते हैं।
स्वामी जी ने फिर कहा, जल अधिक मत पीना, मैं शरबत लेकर आता हूँ। अचानक नारायण स्वामी एक लोटे में मीठा जल ले आए। अन्य पात्र नहीं देखकर श्रमण जी ने सोचा, उन्हें पूरा लोटा मीठा जल पीना पड़ेगा, परन्तु नारायण स्वामी शरबत लाते ही उसे पानी के पात्र में डालना प्रारम्भ कर देते हैं। उन्होंने पात्र के भरने पर भी बन्द नहीं किया। पानी बाहर गिरने लगा। श्रमण जी ने कहा कि ये क्या कर रहे हैं? पूर्ण भरे पात्र में शरबत कैसे आयेगा। स्वामी जी ने कहा कि तुम्हारी पहली शिक्षा पूरी हुई। जैसे भरे हुए जल के पात्र में अधिक शरबत नहीं भरा जा सकता है, वैसे ही तुम्हारे मस्तिष्क में पहले से जो भरा हुआ है, उसको रिक्त कर के आओ।
हम सब श्रीमद्भगवद्गीता जी पढ़ने के लिए आये हैं। लगभग तीन से चार हजार भक्त श्रीमद्भगवद्गीता जी सुनते हैं। एक ही बात सबके लिए कहने पर भी, सभी अपने तरह से, अपने पूर्वाग्रहों के कारण, अपने मन की अलग-अलग वृत्ति के कारण, अलग-अलग भाव को मन पर बैठाते हैं।
शास्त्र श्रवण करने से पहले जो जानते हो,
उसका खण्डन करना होगा।
उसका खण्डन करना होगा।
श्रीभगवान् में श्रद्धा रखनी होगी।
मन्दिरों में भी ठाकुर जी के श्रङ्गार करने से पहले पुराने श्रङ्गार को उतार दिया जाता है। महिलायें भी नवीन श्रङ्गार के पहले पुराने श्रङ्गार को हटाती हैं। उसी तरह श्रीमद्भगवद्गीता जी के सम्बन्ध में बहुत कुछ सुना और जाना है, पर पूर्वाग्रहों से मस्तिष्क के बाधित रहने से श्रीमद्भगवद्गीता जी की बात उतनी ही कम समझ में आयेगी ।
नवीन भक्तों के मन में यह प्रश्न भी आ सकता है कि लर्नगीता में हम पढ़ने, सीखने तो आये हैं, परन्तु प्रारम्भ ही बारहवें अध्याय से हो रहा है। क्या हमने सही कक्षा में पञ्जीकरण करवाया है या नहीं? शिक्षा का आरम्भ तो प्रथम अध्याय से ही होता है।
इस बात को एक उदाहरण से समझाने का प्रयास किया गया। सन उन्नीस सौ तेरह में अङ्ग्रेजों ने गेट वे ऑफ़ इण्डिया मुम्बई में बनवाया। पानी के जहाज़ से आकर, वहाँ उतर कर वे लोग उस बने हुए द्वार से भारत में प्रवेश करते थे। उस गेट का औचित्य भी समझ में आता था।
तत्पश्चात् सन उन्नीस सौ इक्कीस में अङ्ग्रेजों ने दिल्ली में इण्डिया गेट बनवाया। दिल्ली में इस गेट से प्रवेश कर के कौन कहाँ जायेगा? यह प्रासङ्गिक भी नहीं लगता था। प्रतीकात्मक रूप से इसका नाम इण्डिया गेट रखा गया। दिल्ली भारत का हृदय है। एक बार दिल्ली में आ गये तो भारत में आ गये, यह स्वीकृति मन में आ जाती है।
पहले अध्याय से जब श्रीमद्भगवद्गीता जी पढ़ते हैं तो यह गेट वे ऑफ़ इण्डिया से बम्बई से प्रवेश करने जैसा है। बारहवाँ अध्याय छोटा, श्रीमद्भगवद्गीता जी का हृदय, इण्डिया गेट जैसा है। भक्तियोग है व सरल है। पहला अध्याय है, अर्जुनविषादयोग। उसमें अर्जुन का दुःख है, जो एक साधारण मनुष्य के सदृश्य रोना और दुःखी होना दृष्टिगोचर होता है।
बारहवें अध्याय से प्रारम्भ करने वाले को बीस श्लोकों में ही भक्तियोग प्राप्त हो जाएगा। प्राचीन काल से सन्तों और महापुरुषों ने श्रीमद्भगवद्गीता जी का अध्ययन बारहवें अध्याय से ही करने को कहा है।
शास्त्रों को कहाँ से साधकों को पढ़ाना चाहिये, यह शिष्य के पूर्व ज्ञान और क्षमता पर निर्भर करता है, इसलिए सबके लिए शास्त्रों का आरम्भ कहाँ से होगा, यह अलग-अलग होता है। नये साधकों के लिए श्रीमद्भगवद्गीता जी का आरम्भ बारहवें अध्याय से ही होना चाहिये। इस अध्याय के बीस श्लोक अनुष्टुप छन्द में हैं।
नवीन भक्तों के मन में यह प्रश्न भी आ सकता है कि लर्नगीता में हम पढ़ने, सीखने तो आये हैं, परन्तु प्रारम्भ ही बारहवें अध्याय से हो रहा है। क्या हमने सही कक्षा में पञ्जीकरण करवाया है या नहीं? शिक्षा का आरम्भ तो प्रथम अध्याय से ही होता है।
इस बात को एक उदाहरण से समझाने का प्रयास किया गया। सन उन्नीस सौ तेरह में अङ्ग्रेजों ने गेट वे ऑफ़ इण्डिया मुम्बई में बनवाया। पानी के जहाज़ से आकर, वहाँ उतर कर वे लोग उस बने हुए द्वार से भारत में प्रवेश करते थे। उस गेट का औचित्य भी समझ में आता था।
तत्पश्चात् सन उन्नीस सौ इक्कीस में अङ्ग्रेजों ने दिल्ली में इण्डिया गेट बनवाया। दिल्ली में इस गेट से प्रवेश कर के कौन कहाँ जायेगा? यह प्रासङ्गिक भी नहीं लगता था। प्रतीकात्मक रूप से इसका नाम इण्डिया गेट रखा गया। दिल्ली भारत का हृदय है। एक बार दिल्ली में आ गये तो भारत में आ गये, यह स्वीकृति मन में आ जाती है।
पहले अध्याय से जब श्रीमद्भगवद्गीता जी पढ़ते हैं तो यह गेट वे ऑफ़ इण्डिया से बम्बई से प्रवेश करने जैसा है। बारहवाँ अध्याय छोटा, श्रीमद्भगवद्गीता जी का हृदय, इण्डिया गेट जैसा है। भक्तियोग है व सरल है। पहला अध्याय है, अर्जुनविषादयोग। उसमें अर्जुन का दुःख है, जो एक साधारण मनुष्य के सदृश्य रोना और दुःखी होना दृष्टिगोचर होता है।
बारहवें अध्याय से प्रारम्भ करने वाले को बीस श्लोकों में ही भक्तियोग प्राप्त हो जाएगा। प्राचीन काल से सन्तों और महापुरुषों ने श्रीमद्भगवद्गीता जी का अध्ययन बारहवें अध्याय से ही करने को कहा है।
शास्त्रों को कहाँ से साधकों को पढ़ाना चाहिये, यह शिष्य के पूर्व ज्ञान और क्षमता पर निर्भर करता है, इसलिए सबके लिए शास्त्रों का आरम्भ कहाँ से होगा, यह अलग-अलग होता है। नये साधकों के लिए श्रीमद्भगवद्गीता जी का आरम्भ बारहवें अध्याय से ही होना चाहिये। इस अध्याय के बीस श्लोक अनुष्टुप छन्द में हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता जी में सात सौ श्लोक हैं। वक्ताओं द्वारा उच्चारित श्लोकों की सङ्ख्या-
पाँच सौ चौहत्तर श्लोक श्रीभगवान् के श्रीमुख से उच्चारित हुए हैं।
चौरासी श्लोक अर्जुन के मुख से,
इकतालीस सञ्जय के मुख से और
एक धृतराष्ट्र के द्वारा।
चौरासी श्लोक अर्जुन के मुख से,
इकतालीस सञ्जय के मुख से और
एक धृतराष्ट्र के द्वारा।
पाँच सौ चौहतर श्लोक जो श्रीभगवान् के मुख से निकले हैं, वे मन्त्र हैं। मन्त्रों का उच्चारण शुद्ध होना चाहिये। शुद्ध पढ़ने मात्र से वो अपना कार्य करते हैं।
उदाहरण के लिये कहीं जाकर हम वाईफाई (wifi) से अपने यन्त्र को जोड़ते हैं, तो जोड़ना मात्र प्रधान होता है, न कि उस यन्त्र की यान्त्रिकी की पूरी जानकारी।
ठीक इसी तरह मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण प्रमुख है। बिना उसका अर्थ जाने भी शुद्ध उच्चारण किया जाए तो उसका जीवन पर प्रभाव पड़ता है।
स्वामी जी का सूत्र वाक्य है-
”गीता पढ़े, पढ़ाये, जीवन में लायें।”
जीवन में लाना है, तो समझ कर लाना है। बिना समझे भी श्रीमद्भगवद्गीता जी के श्लोकों के उच्चारण से हमारे मन-मस्तिष्क में प्रभावशाली परिवर्तन आता है। बहुत थोड़े समय में ही इसका अनुभव हो जाता है। प्रारम्भ में शिक्षक को शुद्ध उच्चारण करते हुए देखते हैं तो लगता है, हमसे नहीं होगा। शिक्षक को भी पहले दिन ऐसा ही लगा था। आज वह शिक्षक बन कर श्रीमद्भगवद्गीता जी के श्लोकों को सिखा रहे हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता जी के पठन मात्र से सभी साधकों को शान्ति का अनुभव होता है। मन के भाव और विचार बदलने लगते हैं। यह बात चौदह लाख साधकों के अनुभवों से सभी के समक्ष आयी है।
श्रीमद्भगवद्गीता जी के अध्यायों में प्रवेश के पहले, वक्ता और श्रोता के बारे में भी जानना चाहिये। अर्जुन और श्रीकृष्ण की छवि हम चित्र में देखते हैं तो दोनों की आयु कितनी होगी, तीस वर्ष से चालीस वर्ष के मध्य की लगती है। वस्तुतः शोध से यह जानकारी मिली है कि अर्जुन की आयु चौरासी वर्ष की है तथा श्रीकृष्ण की सत्तासी वर्ष के लगभग है।
अर्जुन की आयु चौरासी वर्ष है, किन्तु वे महान धनुर्धर हैं। अर्जुन ने कई युद्ध लड़े हैं। सभी युद्धों में उनकी विजय ही हुई है। खाण्डव वन के युद्ध में गन्धर्वों, देवताओं, इन्द्र सभी से युद्ध करके भी विजयी हुए। उस समय श्रीकृष्ण भी उसके साथ नहीं थे।
जब अर्जुन, भगवान् पशुपतिनाथ शिव के साथ दस दिनों तक मल्ल युद्ध करके भी नहीं हारे, तब भगवान् पशुपतिनाथ प्रसन्न हो गये। मल्लिकार्जुन पर्वत पर मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई।अर्जुन ने सशरीर स्वर्ग का उपभोग किया। मनुष्य देह में इन्द्र के सिंहासन पर बैठने का गौरव प्राप्त हुआ। राजसूय यज्ञ में भी सबसे अधिक धन एकत्रित करने के कारण उनका नाम धनञ्जय पड़ा।
अर्जुन का व्यक्तित्व अद्भुत है। अर्जुन में पौरुष, पराक्रम है, अर्जुन नीतिवान हैं। वे किसी से भी ऊँचे स्वर में बात नहीं करते हैं। अपने कार्य का अभिमान भी नहीं है। देवराज इन्द्र परीक्षा लेने आये तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया, बड़े भाई की आज्ञा मेरे हेतु सर्वोपरि है, धर्म को नहीं छोड़ूँगा। तब इन्द्र प्रसन्न हुए।
उर्वशी नाम की अप्सरा जो अप्सराओं में श्रेष्ठ थी, वह अर्जुन के सामने प्रणय के लिए आकर खड़ी हो गयी । अर्जुन ने अपनी आँखे नीचे झुका ली। अर्जुन ने कहा, आप मेरी माँ के समान हो। कुपित होकर उर्वशी ने एक साल नपुंसक होने का श्राप दे दिया। अर्जुन धर्म, शास्त्र, शस्त्र, किसी भी परीक्षा में पराजित नहीं हुए। अज्ञातवास के समय बृहन्नला के रूप में उत्तरा को नृत्य की शिक्षा प्रदान की।
ऐसा पराक्रमी योद्धा आज भीष्म पितामह को, द्रोणाचार्य को देखकर पहली बार मोहित हुआ है। सोचने लगे कि मेरा कौन-सा धर्म श्रेष्ठ है? श्रीभगवान् ने अर्जुन को माध्यम बना कर मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए उपदेश किया है।
श्रीमद्भगवद्गीता जी के पठन मात्र से सभी साधकों को शान्ति का अनुभव होता है। मन के भाव और विचार बदलने लगते हैं। यह बात चौदह लाख साधकों के अनुभवों से सभी के समक्ष आयी है।
श्रीमद्भगवद्गीता जी के अध्यायों में प्रवेश के पहले, वक्ता और श्रोता के बारे में भी जानना चाहिये। अर्जुन और श्रीकृष्ण की छवि हम चित्र में देखते हैं तो दोनों की आयु कितनी होगी, तीस वर्ष से चालीस वर्ष के मध्य की लगती है। वस्तुतः शोध से यह जानकारी मिली है कि अर्जुन की आयु चौरासी वर्ष की है तथा श्रीकृष्ण की सत्तासी वर्ष के लगभग है।
अर्जुन की आयु चौरासी वर्ष है, किन्तु वे महान धनुर्धर हैं। अर्जुन ने कई युद्ध लड़े हैं। सभी युद्धों में उनकी विजय ही हुई है। खाण्डव वन के युद्ध में गन्धर्वों, देवताओं, इन्द्र सभी से युद्ध करके भी विजयी हुए। उस समय श्रीकृष्ण भी उसके साथ नहीं थे।
जब अर्जुन, भगवान् पशुपतिनाथ शिव के साथ दस दिनों तक मल्ल युद्ध करके भी नहीं हारे, तब भगवान् पशुपतिनाथ प्रसन्न हो गये। मल्लिकार्जुन पर्वत पर मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई।अर्जुन ने सशरीर स्वर्ग का उपभोग किया। मनुष्य देह में इन्द्र के सिंहासन पर बैठने का गौरव प्राप्त हुआ। राजसूय यज्ञ में भी सबसे अधिक धन एकत्रित करने के कारण उनका नाम धनञ्जय पड़ा।
अर्जुन का व्यक्तित्व अद्भुत है। अर्जुन में पौरुष, पराक्रम है, अर्जुन नीतिवान हैं। वे किसी से भी ऊँचे स्वर में बात नहीं करते हैं। अपने कार्य का अभिमान भी नहीं है। देवराज इन्द्र परीक्षा लेने आये तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया, बड़े भाई की आज्ञा मेरे हेतु सर्वोपरि है, धर्म को नहीं छोड़ूँगा। तब इन्द्र प्रसन्न हुए।
उर्वशी नाम की अप्सरा जो अप्सराओं में श्रेष्ठ थी, वह अर्जुन के सामने प्रणय के लिए आकर खड़ी हो गयी । अर्जुन ने अपनी आँखे नीचे झुका ली। अर्जुन ने कहा, आप मेरी माँ के समान हो। कुपित होकर उर्वशी ने एक साल नपुंसक होने का श्राप दे दिया। अर्जुन धर्म, शास्त्र, शस्त्र, किसी भी परीक्षा में पराजित नहीं हुए। अज्ञातवास के समय बृहन्नला के रूप में उत्तरा को नृत्य की शिक्षा प्रदान की।
ऐसा पराक्रमी योद्धा आज भीष्म पितामह को, द्रोणाचार्य को देखकर पहली बार मोहित हुआ है। सोचने लगे कि मेरा कौन-सा धर्म श्रेष्ठ है? श्रीभगवान् ने अर्जुन को माध्यम बना कर मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए उपदेश किया है।
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनंदनः ।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्तादुग्धं गीतामृतः महत् ॥
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्तादुग्धं गीतामृतः महत् ॥
श्रीभगवान् ने अर्जुन को बछड़ा बनाया है। बछड़े को देखकर गाय दूध देती है। अन्य लोग उस दुग्ध का पान करते हैं, वैसे ही श्रीभगवान् ने अर्जुन को निमित्त बनाकर श्रीमद्भगवतगीता जी का उपदेश दिया है।
श्रीमद्भगवद्गीता जीवनमूल्यों का शास्त्र है। चाहे इहलोक हो या परलोक, इसको पढ़ने वाला हर क्षेत्र में विजयी होता है। यह श्रीमद्भगवतगीता जी की प्रामाणिकता है।
गाँधी जी ने कहा-
श्रीमद्भगवद्गीता जीवनमूल्यों का शास्त्र है। चाहे इहलोक हो या परलोक, इसको पढ़ने वाला हर क्षेत्र में विजयी होता है। यह श्रीमद्भगवतगीता जी की प्रामाणिकता है।
गाँधी जी ने कहा-
"जब मेरी आँखो के आगे अन्धेरा छा जाता है, प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता है तो मैं गीता माता की गोदी में जाकर बैठ जाता हूँ।"
बालगङ्गाधर तिलक, विनोवा भावे, शताब्दी के महापुरुष जयदयाल जी गोयन्दका हों या स्वामी रामसुखदासजी हों, पूर्वाश्रम से आदि शङ्कराचार्य जी से लेकर रामानुजाचार्य जी की परम्परा तक में तथा विदेशी लेखक, वैज्ञानिक तक कोई भी श्रीमद्भगवद्गीता की उपेक्षा नहीं कर सकता।
हमारे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जी मुस्लिम होते हुए भी, नित्य श्रीमद्भगवद्गीता जी का पाठ किए बिना, जल भी नहीं ग्रहण करते थे।
हमारे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जी मुस्लिम होते हुए भी, नित्य श्रीमद्भगवद्गीता जी का पाठ किए बिना, जल भी नहीं ग्रहण करते थे।
12.1
अर्जुन उवाच
एवं(म्) सततयुक्ता ये, भक्तास्त्वां(म्) पर्युपासते|
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं (न्), तेषां(ङ्) के योगवित्तमाः||1||
अर्जुन बोले - जो भक्त इस प्रकार (ग्यारवें अध्याय के पचपनवें श्लोक के अनुसार) निरन्तर आप में लगे रहकर आप (सगुण साकार) की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निर्गुण निराकार की ही (उपासना करते हैं), उन दोनों में से उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
विवेचन- इस श्लोक में अर्जुन श्रीभगवान् को पूछते हैं कि जो दिन-रात आपके भजन ध्यान में लगा कर सगुण स्वरूप की पूजा करते हैं और दूसरे प्रकार के लोग आपके अविनाशी स्वरूप अर्थात् निराकार ब्रह्म को भजते हैं, उनमें श्रेष्ठ कौन है?
यही प्रश्न अरण्यकाण्ड में लक्ष्मणजी ने प्रभु राम से पूछा था। वह लक्ष्मण गीता के नाम से भी जानी जाती है।
कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥4॥
अर्जुन का तात्पर्य है कि जैसे औषधालय में विभिन्न रोगों की नाना प्रकार की औषधियाँ रहती हैं, वैसे ही भजन के नाना प्रकार श्रीभगवान् ने बता दिए, कोई एक क्यों नहीं बता देते? श्रीमद्भगवद्गीता जी में श्रीभगवान् कभी ज्ञानयोग, कर्मयोग, साङ्ख्ययोग, भक्तियोग के बारे में बताते हैं। इनमें कौन सा योग सही है, कोई एक योग बता दें।
उत्तम प्राध्यापक पहले विषय को संक्षेप में बता कर तत्पश्चात् उसे विस्तार से बताते हैं।
श्रीभगवान् भी आगे विस्तार से उत्तर देते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता जी में श्रीभगवान् ने किसी एक मार्ग का आग्रह नहीं किया है। तुम किसी भी मार्ग से जाओ, पहुँचे कहाँ तक हो, यह प्रमुख बात है। श्रीमद्भगवद्गीता जी ने कुछ मापदण्ड निर्धारित कर दिये हैं। उससे तुम स्वयं, अपनी परीक्षा ले सकते हो।
दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ के लक्षण बतलाये हैं।
बारहवें अध्याय में भक्त के उनतालीस लक्षण बताये हैं।
तेरहवें अध्याय में ज्ञानी के विषय में।
तेरहवें अध्याय में ज्ञानी के विषय में।
चौदहवें में तीन गुणों के बारे में, अर्थात् सत्त्व, राजस एवं तामस के
विषय में बताया है।सोलहवें अध्याय में दैवीय और आसुरी गुणों के बारे में।
अगले सप्ताह भक्त के उनतालीस लक्षण सुनेंगे। तब देखो, तुम में उनमें से कौन से हैं?
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां(न्), नित्ययुक्ता उपासते|
श्रद्धया परयोपेता:(स्), ते मे युक्ततमा मताः||2||
श्रीभगवान् बोले - मुझ में मन को लगाकर नित्य-निरन्तर मुझ में लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी (सगुण साकार की) उपासना करते हैं, वे मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।
विवेचन- इस श्लोक में श्रीभगवान् ने सीधे-सीधे बता दिया, जिसने मेरे में मन लगा लिया अर्थात् जो उनको अनन्य भाव से भजता है, वह श्रीभगवान् को प्रिय है। ज्ञानयोगी भी मान्य हैं, भक्तियोग सहज, सरल है। भक्ति बिना किसी शर्तो के की जा सकती है।
ज्ञानयोग की जो आवश्यक शर्तें हैं, वे श्रीभगवान् चौथे श्लोक में बताते हैं। श्रीमद्भागवतम् में भी नवधा भक्ति के बारे में बताया है।
ज्ञानयोग की जो आवश्यक शर्तें हैं, वे श्रीभगवान् चौथे श्लोक में बताते हैं। श्रीमद्भागवतम् में भी नवधा भक्ति के बारे में बताया है।
श्रवणं कीर्तनं विष्णुः स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
श्रवण- भगवान् की कथा सुनना। इसके अधिष्ठाता देवता परीक्षित जी हैं।
कीर्तन- श्रीभगवान् का कीर्तन करना। अधिष्ठाता देवता शुकदेव जी हैं।
स्मरण- श्रीभगवान् का स्मरण करना। इसके अधिष्ठाता देवता प्रह्लाद जी हैं।
पाद सेवन- चरणों की सेवा। अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मीजी हैं।
अर्चन- अधिष्ठाता देवता राजा पृथु हैं।
वन्दन- अधिष्ठाता देवता अक्रूर जी हैं।
दास्य- अधिष्ठाता देवता हनुमान जी हैं।
सख्य- अधिष्ठाता अर्जुन हैं।
आत्म निवेदन- अधिष्ठाता राजा बलि हैं।
इसमें से भक्ति का जो स्वरूप पसन्द है, उसको पकड़ लो।
कीर्तन- श्रीभगवान् का कीर्तन करना। अधिष्ठाता देवता शुकदेव जी हैं।
स्मरण- श्रीभगवान् का स्मरण करना। इसके अधिष्ठाता देवता प्रह्लाद जी हैं।
पाद सेवन- चरणों की सेवा। अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मीजी हैं।
अर्चन- अधिष्ठाता देवता राजा पृथु हैं।
वन्दन- अधिष्ठाता देवता अक्रूर जी हैं।
दास्य- अधिष्ठाता देवता हनुमान जी हैं।
सख्य- अधिष्ठाता अर्जुन हैं।
आत्म निवेदन- अधिष्ठाता राजा बलि हैं।
इसमें से भक्ति का जो स्वरूप पसन्द है, उसको पकड़ लो।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यम्, अव्यक्तं(म्) पर्युपासते|
सर्वत्रगमचिन्त्यं(ञ्) च, कूटस्थमचलं(न्) ध्रुवम्||3||
और जो (अपने) इन्द्रिय समूह को वश में करके चिन्तन में न आने वाले, सब जगह परिपूर्ण, देखने में न आने वाले, निर्विकार, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की तत्परता से उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में प्रीति रखन् वाले (और) सब जगह समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं(म्), सर्वत्र समबुद्धयः|
ते प्राप्नुवन्ति मामेव, सर्वभूतहिते रताः||4||
जो अपनी इन्द्रियों को वश में करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में रत और सब जगह समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।
विवेचन- निराकार परब्रह्म के आठ लक्षण-
अक्षरम्- जो कभी नष्ट नहीं होता है। जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है।
अनिर्देश्यम्- जो परमात्मा सब जगह व्याप्त हैं, उनको सङ्केत से कैसे बता सकते हैं?
अव्यक्तम्- शब्दों से व्यक्त नहीं कर सकते। शब्दों से बता दिया तो व्यक्त हो गया। जैसे मुरली धारण करने वाले कृष्ण, धनुषधारी राम, गले में नागों को धारण करने वाले शिव, सगुण हैं।
सर्वत्र- जो सब जगह व्याप्त हैं।
अचिन्त्य- निर्गुण निराकार का चिन्तन कैसे करें। कृष्ण, राम, शिव का चिन्तन कर सकते हैं।
कूटस्थ- जो कभी बदलता नहीं है। लोहार के यहाँ लोहे का पिण्ड होता है, जिस पर कूट-कूट कर बर्तन बनते हैं। वह पिण्ड कई पीढ़ियों से उसके घर में है। जिस पर रखकर वर्षों से कूट कर बर्तन बनाने के बाद भी, उसमें परिवर्तन नहीं आया।
अचल- गति नहीं होती है।
ध्रुव- नित्य, शाश्वत।
निर्गुण, निराकार के इन आठ लक्षणों को मानने वाला उत्तम ज्ञानी श्रीभगवान् को पा लेगा।
उसका जीवन आस-पास के लोगों की देख-भाल में लगता है। जीवित ही नहीं अपितु जड़ रूप नदी, पहाड़ सभी का समान भाव से ध्यान रखता है, वह मुझे पा लेता है। इसके लिए भी श्रीभगवान् ने प्रतिबन्ध लगाया है, जिसे वे आगे के श्लोक में बताते हैं।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्, अव्यक्तासक्तचेतसाम्|
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं(न्), देहवद्भिरवाप्यते||5||
अव्यक्त में आसक्त चित्त वाले उन साधकों को (अपने साधन में) कष्ट अधिक होता है; क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्त-विषयक गति कठिनता से प्राप्त की जाती है।
विवेचन- श्रीभगवान् बोलते हैं कि अर्जुन यह निर्गुण, निराकार की भक्ति क्लेश कारक एवं कठिन है। इस निर्गुण की उपासना में, मैं शरीर हूँ, इस भाव की विस्मृति होनी चाहिए। देहाभिमान होने से व्यक्त की उपासना मानी जाएगी। मैं को शरीर रूप में मानने वाला ज्ञानयोगी नहीं बन पायेगा। निर्गुण की उपासना का प्रथम नियम है, मैं शरीर नहीं हूँ।
मैं नहीं चल रहा हूँ, पैर चल रहे हैं। भोजन मैं नहीं कर रहा हूँ। भूख-प्यास मुझे नहीं, इस शरीर को लगी है। दर्द, पीड़ा मुझे नहीं शरीर को हो रही है। मैं कहीं आता-जाता नहीं, खाता-पीता नहीं। मैं वही हूँ। जन्म, मृत्यु, बच्चे से बूढ़ा होना, ये सब शरीर के विकार हैं।
मैं नहीं चल रहा हूँ, पैर चल रहे हैं। भोजन मैं नहीं कर रहा हूँ। भूख-प्यास मुझे नहीं, इस शरीर को लगी है। दर्द, पीड़ा मुझे नहीं शरीर को हो रही है। मैं कहीं आता-जाता नहीं, खाता-पीता नहीं। मैं वही हूँ। जन्म, मृत्यु, बच्चे से बूढ़ा होना, ये सब शरीर के विकार हैं।
मैं शरीर को धारण करने वाला चैतन्य ब्रह्म हूँ।
बोलना सहज है। इसको मानने वाले को अपमान का दुःख नहीं होता। शरीर की चिन्ता नहीं करनी पड़ती। शरीर सभी कर्मों का माध्यम मात्र है।
जब तक देहाभिमान है, तब तक अव्यक्त की उपासना सम्भव नहीं है।
ये तु सर्वाणि कर्माणि, मयि सन्न्यस्य मत्पराः|
अनन्येनैव योगेन, मां(न्) ध्यायन्त उपासते||6||
परन्तु जो कर्मों को मेरे अर्पण करके (और) मेरे परायण होकर अनन्य योग (सम्बन्ध) से मेरा ही ध्यान करते हुए (मेरी) उपासना करते हैं।
विवेचन- श्रीभगवान् बोल रहे हैं, सबसे महत्वपूर्ण बात तुमने पकड़ ली है। न अन्य, अर्थात् अनन्य। अन्यन का मतलब यह नहीं है कि किसी अन्य की पूजा नहीं करूँगा।
आदि शङ्कराचार्यजी ने पञ्चदेव पूजा का विधान बताया था।
एक गृहस्थ को पाँच देवताओं का पूजन अवश्य करना चाहिए।
आदि शङ्कराचार्यजी ने पञ्चदेव पूजा का विधान बताया था।
एक गृहस्थ को पाँच देवताओं का पूजन अवश्य करना चाहिए।
- सर्वप्रथम सूर्य भगवान को अर्ध्य देकर पूजन करना चाहिए।
- अपने पूजास्थल में विष्णु रूप कृष्णजी, रामजी, विष्णुजी, किसी भी एक की छवि होनी चाहिए।
- शिवजी का एक विग्रह अवश्य होना चाहिए। लिङ्ग स्वरुप में हो या छवि रूप में।
- एक देवी के स्वरुप की स्थापना होनी चाहिये। दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती कोई भी हो। देवी का पूजन आवश्यक है।
- गणेशजी की उपासना करनी चाहिये।
इनमें अपने इष्ट देव को बीच में विराजमान कर के, अन्य देवी, देवताओं को बायें-दायें स्थापित करना चाहिये। इसके अतिरिक्त आप कितने ही देवी-देवता, हनुमान जी, सती जी किसी की पूजा करें, परन्तु इन चार देवी-देवताओं की स्थापना पूजा स्थल में अवश्य हो, वरना पूजा अधूरी है।
एक विशेष बात, अगर हमारे इष्टदेव श्रीकृष्ण हैं तो अयोध्या जाएँ तब श्रीराम जी का दर्शन करें परन्तु अपने इष्ट श्रीकृष्ण की भक्ति माँगें। इष्ट शिवजी हैं तो शिवजी की भक्ति माँगें। विशेष ये है कि कहीं भी, किसी भी देवी-देवता का दर्शन करें, अपने जो इष्ट हैं, चाहे वे श्रीराम जी हों, श्रीकृष्णजी, श्रीगणेशजी या देवी हों, उनकी ही भक्ति माँगनी चाहिये।
सभी में अपने इष्ट देव के ही दर्शन करने चाहिये।
अब श्रीमद्भगवद्गीता जी पढ़ रहे हैं तो हमें लग सकता है, श्रीकृष्णजी की उपसाना करनी होगी। एक बात ध्यान देने योग्य है। महाभारत में एक लाख श्लोक हैं, उसमें जहाँ वेदव्यास जी ने श्रीकृष्ण जी का वर्णन किया है, वहाँ लिखा है, वासुदेव उवाच, श्रीकृष्ण उवाच, केशव उवाच। वहीं भीष्म पर्व के पच्चीसवें अध्याय से बयालीसवें अध्याय तक श्रीकृष्ण उवाच नहीं कहा, श्रीभगवानुवाच कहा है।
जहाँ श्रीकृष्ण बोला भी है, वहाँ परब्रह्म परमात्मा के लिए सम्बोधन है। जहाँ भी माम शब्द आया हैं, वहाँ अपने इष्ट उवाच ही मानना चाहिये।
हमारे इष्ट ही श्रीमद्भगवद्गीता जी के वक्ता हैं।
सभी पूजन में निरन्तरता की आवश्यकता है। अपनी माला, पूजा, ध्यान को किसी के कहने पर बार-बार नहीं बदलना चाहिए। जिसको इष्ट बना लिया, उसी का पूजन करना चाहिये।
एक विशेष बात, अगर हमारे इष्टदेव श्रीकृष्ण हैं तो अयोध्या जाएँ तब श्रीराम जी का दर्शन करें परन्तु अपने इष्ट श्रीकृष्ण की भक्ति माँगें। इष्ट शिवजी हैं तो शिवजी की भक्ति माँगें। विशेष ये है कि कहीं भी, किसी भी देवी-देवता का दर्शन करें, अपने जो इष्ट हैं, चाहे वे श्रीराम जी हों, श्रीकृष्णजी, श्रीगणेशजी या देवी हों, उनकी ही भक्ति माँगनी चाहिये।
सभी में अपने इष्ट देव के ही दर्शन करने चाहिये।
अब श्रीमद्भगवद्गीता जी पढ़ रहे हैं तो हमें लग सकता है, श्रीकृष्णजी की उपसाना करनी होगी। एक बात ध्यान देने योग्य है। महाभारत में एक लाख श्लोक हैं, उसमें जहाँ वेदव्यास जी ने श्रीकृष्ण जी का वर्णन किया है, वहाँ लिखा है, वासुदेव उवाच, श्रीकृष्ण उवाच, केशव उवाच। वहीं भीष्म पर्व के पच्चीसवें अध्याय से बयालीसवें अध्याय तक श्रीकृष्ण उवाच नहीं कहा, श्रीभगवानुवाच कहा है।
जहाँ श्रीकृष्ण बोला भी है, वहाँ परब्रह्म परमात्मा के लिए सम्बोधन है। जहाँ भी माम शब्द आया हैं, वहाँ अपने इष्ट उवाच ही मानना चाहिये।
हमारे इष्ट ही श्रीमद्भगवद्गीता जी के वक्ता हैं।
सभी पूजन में निरन्तरता की आवश्यकता है। अपनी माला, पूजा, ध्यान को किसी के कहने पर बार-बार नहीं बदलना चाहिए। जिसको इष्ट बना लिया, उसी का पूजन करना चाहिये।
एक भरोसो, एक बल, एक आस विश्वास,
एक राम-घनश्याम हित, चातक तुलसीदास।
एक राम-घनश्याम हित, चातक तुलसीदास।
भक्ति में निरन्तरता का महत्व
एक कहानी आती है, एक देवरानी-जेठानी थीं। उनमें थोड़ी खट-पट थी। देवरानी का नियम था, वह शिवजी के मन्दिर में जाती, जल चढ़ाती और एक दीपक जलाती। जेठानी थोड़ी देर बाद जाती, वह दीपक बुझा देती। एक बार बहुत बारिश हुई, देवरानी बहुत बारिश है, यह सोचकर शिवजी के मन्दिर नहीं गयी।
जेठानी नियमानुसार दीपक बुझाने, तेज बारिश में भी चली गयी। वहाँ जाकर देखा, दीपक बुझा हुआ है। पानी से बुझ गया होगा। यह सोच कर जेठानी ने दीपक जलाया, फिर बुझा दिया। कहते हैं, शिवजी प्रकट हो गये। उसने कहा, मैंने तो भक्ति भी नहीं की।
निरन्तरता से भक्ति फलित होती है।
पूजा-ध्यान बदल कर करने वाले पिचहत्तर वर्ष की आयु में बोलते हैं, बहुत कुछ किया परन्तु कोई फल मिला नहीं।
इससे सम्बन्धित एक अन्य कहानी है। एक गाँव में एक व्यक्ति बसने के लिए आया, वहाँ के सरपञ्च से मिला। सरपञ्च ने कहा, अपने घर के बाहर एक कुआँ खोद लो। सभी ने खोद रखा है। बीस हाथ खोदने से ही जल निकल आयेगा। चार से पाँच हाथ नित्य खुदाई से पाँच दिन में ही जल निकल आयेगा। वह व्यक्ति आठ दिन बाद आया, बोला आपने तो पाँच दिन कहा था, मैं तो आठ दिन से पाँच हाथ नित्य खुदाई कर रहा हूँ, जल नहीं निकला। सरपञ्च जी ने जाकर देखा, पाँच-पाँच हाथ के आठ खड्डे उसने खोद रखे थे। एक ही खड्डा प्रत्येक दिन खोदता तो जल पाँच दिन में ही प्राप्त हो जाता।
यह भी कर लूँ, वह भी कर लूँ, तब जीवन में उपलब्धि नहीं मिलती।
जेठानी नियमानुसार दीपक बुझाने, तेज बारिश में भी चली गयी। वहाँ जाकर देखा, दीपक बुझा हुआ है। पानी से बुझ गया होगा। यह सोच कर जेठानी ने दीपक जलाया, फिर बुझा दिया। कहते हैं, शिवजी प्रकट हो गये। उसने कहा, मैंने तो भक्ति भी नहीं की।
निरन्तरता से भक्ति फलित होती है।
पूजा-ध्यान बदल कर करने वाले पिचहत्तर वर्ष की आयु में बोलते हैं, बहुत कुछ किया परन्तु कोई फल मिला नहीं।
इससे सम्बन्धित एक अन्य कहानी है। एक गाँव में एक व्यक्ति बसने के लिए आया, वहाँ के सरपञ्च से मिला। सरपञ्च ने कहा, अपने घर के बाहर एक कुआँ खोद लो। सभी ने खोद रखा है। बीस हाथ खोदने से ही जल निकल आयेगा। चार से पाँच हाथ नित्य खुदाई से पाँच दिन में ही जल निकल आयेगा। वह व्यक्ति आठ दिन बाद आया, बोला आपने तो पाँच दिन कहा था, मैं तो आठ दिन से पाँच हाथ नित्य खुदाई कर रहा हूँ, जल नहीं निकला। सरपञ्च जी ने जाकर देखा, पाँच-पाँच हाथ के आठ खड्डे उसने खोद रखे थे। एक ही खड्डा प्रत्येक दिन खोदता तो जल पाँच दिन में ही प्राप्त हो जाता।
यह भी कर लूँ, वह भी कर लूँ, तब जीवन में उपलब्धि नहीं मिलती।
श्रीभगवान् कह रहे हैं, सब कर्मों को मुझे अर्पण कर के मुझे भजो।
तेषामहं(म्) समुद्धर्ता, मृत्युसंसारसागरात्|
भवामि नचिरात्पार्थ, मय्यावेशितचेतसाम्||7||
हे पार्थ ! मुझ में आविष्ट चित्त वाले उन भक्तों का मैं मृत्युरूप संसार-समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।
विवेचन- इस श्लोक में श्रीभगवान् बोल रहे हैं, हे अर्जुन! मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूपी संसार समुद्र से उद्धार कर देता हूँ।
मय्येव मन आधत्स्व, मयि बुद्धिं(न्) निवेशय|
निवसिष्यसि मय्येव, अत ऊर्ध्वं(न्) न संशयः||8||
(तू) मुझ में मन को स्थापन कर (और) मुझ में ही बुद्धि को प्रविष्ट कर; इसके बाद (तू) मुझ में ही निवास करेगा (इसमें) संशय नहीं है।
विवेचन- श्रीभगवान् बोल रहे हैं, हे अर्जुन! मन, बुद्धि को मुझ में लगा दो।
अच्चुतम् केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी बल्लभम्।
युवक, युवती का सम्बन्ध निश्चित हो जाता है, कुछ दिन बाद विवाह होने वाला होता है या युवती जब शादी होकर नयी-नयी ससुराल में आती है तो वह घर का काम करते हुए भी हर समय अपने पति के ध्यान में मग्न रहती है। अभी कार्यालय पहुँच गये होंगें, काम कर रहे होंगें।
आज कोई मीटिङ्ग थी, वह चल रही होगी। भोजन का समय हो गया, अपना भोजन निकाल कर खा रहे होंगें । आज उनके पसन्द का भोजन बना है, मुझे याद कर रहे होंगें। अब कार्यालय का समय समाप्त होने वाला है, कुछ देर में आते होंगें। काम सारा घर का करते हुए भी, चिन्तन अपने प्रिय का ही करती है।
ठीक ऐसे ही पति अपनी पत्नी की दिनचर्या के बारे में विचार करके, एक ख़ुशी की अनुभूति कर रहा होगा। संसार का काम करते हुए भी दोनों का मन एक-दूसरे में रमण कर रहा है।
श्रीभगवान् कह रहे कि संसार के जो भी काम करो, वे मुझे अर्थात् श्रीभगवान् को स्मरण करते हुए करो। परमात्मा में मन, बुद्धि को लगा के रखो।
भोजन भी, हे भगवान! आपके लिए बना रही हूँ। कार्यालय का काम भी, आपका ही काम है। यह विचार मन में लाते हुए समस्त कार्य करें।
अर्जुन को श्रीभगवान् कहते हैं, तुम मेरे प्रिय हो, इसलिए मुझे में मन लगाने के और तरीके बताता हूँ।
आज कोई मीटिङ्ग थी, वह चल रही होगी। भोजन का समय हो गया, अपना भोजन निकाल कर खा रहे होंगें । आज उनके पसन्द का भोजन बना है, मुझे याद कर रहे होंगें। अब कार्यालय का समय समाप्त होने वाला है, कुछ देर में आते होंगें। काम सारा घर का करते हुए भी, चिन्तन अपने प्रिय का ही करती है।
ठीक ऐसे ही पति अपनी पत्नी की दिनचर्या के बारे में विचार करके, एक ख़ुशी की अनुभूति कर रहा होगा। संसार का काम करते हुए भी दोनों का मन एक-दूसरे में रमण कर रहा है।
श्रीभगवान् कह रहे कि संसार के जो भी काम करो, वे मुझे अर्थात् श्रीभगवान् को स्मरण करते हुए करो। परमात्मा में मन, बुद्धि को लगा के रखो।
भोजन भी, हे भगवान! आपके लिए बना रही हूँ। कार्यालय का काम भी, आपका ही काम है। यह विचार मन में लाते हुए समस्त कार्य करें।
अर्जुन को श्रीभगवान् कहते हैं, तुम मेरे प्रिय हो, इसलिए मुझे में मन लगाने के और तरीके बताता हूँ।
अथ चित्तं(म्) समाधातुं(न्), न शक्नोषि मयि स्थिरम्|
अभ्यासयोगेन ततो, मामिच्छाप्तुं(न्) धनञ्जय||9||
अगर (तू) मन को मुझ में अचल भाव से स्थिर (अर्पण) करने में अपने को समर्थ नहीं मानता, तो हे धनञ्जय ! अभ्यास योग के द्वारा (तू) मेरी प्राप्ति की इच्छा कर।
विवेचन- यदि तुम मन को मेरे में स्थापित नहीं कर पा रहे हो, तो हे धनञ्जय! तुम कोई भी एक साधन पकड़ लो, उसका नित्य अभ्यास करते रहो।
ब्रह्मलीन परमश्रद्धेय स्वामी रामसुखदासजी कहते थे, कुछ मत करो, सिर्फ़ सारे दिन जब-जब याद आए तब कहिए-
ब्रह्मलीन परमश्रद्धेय स्वामी रामसुखदासजी कहते थे, कुछ मत करो, सिर्फ़ सारे दिन जब-जब याद आए तब कहिए-
“हे नाथ! मैं आपको भूलूँ नहीं”
भूल जाऊँ, तो आप याद दिला देना, मैं आपको भूलूँ नहीं। याद दिलाने का काम भी श्रीभगवान् का ही उत्तरदायित्व हो जाए। जब याद आये, यही कहें, हे नाथ मैं आपको भूलूँ नहीं। जप और श्रीमद्भगवद्गीता जी पढ़ने का अभ्यास करते रहना।
राम नाम रटते रहो, जब तक घट में प्राण,
कभी तो दीनदयाल के भनक पड़ेगी कान।
कभी तो दीनदयाल के भनक पड़ेगी कान।
तुलसी अपने राम को, रीझ भजो या खीज।
उलटो सीधो जामिहैं, खेत परे जो बीज।।
उलटो सीधो जामिहैं, खेत परे जो बीज।।
अर्थात्
बीज को भूमि पर उल्टा-सीधा कैसे भी डालिए। वृक्ष जैसे निकलता है, वैसे ही निकलेगा। अभ्यास में बल है।
भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥
तुलसीदासजी कह रहे हैं, भजन से, अभ्यास से दसों दिशाओं में कल्याण होगा। आगे श्रीभगवान् अनन्यता के लिए, भजन के लिए और भी विकल्प दे रहे हैं।
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि, मत्कर्मपरमो भव|
मदर्थमपि कर्माणि, कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि||10||
(अगर तू) अभ्यास (योग) में भी (अपने को) असमर्थ (पाता) है, (तो) मेरे लिये कर्म करने के परायण हो जा। मेरे लिये कर्मों को करता हुआ भी (तू) सिद्धि को प्राप्त हो जायगा।
विवेचन- श्रीभगवान् बोल रहे हैं, अगर अभ्यास भी नहीं होता है तो सारे कर्मों को मुझमें समर्पित कर दो।
“श्रीकृष्णार्पणस्तु”
जो भी कर्त्तव्य कर्म हैं, भोजन बनाना, कार्यालय जाना, सभी श्रीभगवान् के लिए कर रहा हूँ, यह भाव होना चाहिये।
मैं श्रीभगवान् द्वारा नियत कर्मों में लिप्त हूँ, यह भाव होना चाहिये।
मैं श्रीभगवान् द्वारा नियत कर्मों में लिप्त हूँ, यह भाव होना चाहिये।
अथैतदप्यशक्तोऽसि, कर्तुं(म्) मद्योगमाश्रितः|
सर्वकर्मफलत्यागं(न्), ततः(ख्) कुरु यतात्मवान्||11||
अगर मेरे योग (समता) के आश्रित हुआ (तू) इस (पूर्व श्लोक में कहे गये साधन) को भी करने में (अपने को) असमर्थ (पाता) है, तो मन इन्द्रियों को वश में करके सम्पूर्ण कर्मों के फल की इच्छा का त्याग कर।
विवेचन- ऊपर बताए हुए साधन भी नहीं कर पा रहे हो तो आत्मा, बल, बुद्धि पर विजय प्राप्त करने वाला हूँ, यह भाव होना चाहिए। ईश्वर ने हमें माँ, पिता, भाई, पड़ोसी, सैनिक, खिलाड़ी, कार्यकर्ता, कितने ही नियत कर्म दिए हैं। उन्हीं का निर्लिप्त भाव से निर्वहन कर रहा हूँ। यह भाव होना चाहिए। बैंक का एक कैशियर, रुपयों की गिनती मात्र करता है। एक करोड़, दस करोड़ कितने भी रुपय हों, किसी दिन नहीं भी आयें हो, वह सुखी-दुःखी नहीं होता। हम सभी अपने को नियत कर्मों को करने मात्र का अधिकारी समझें, न कि उसमें लिप्त हो जाएँ।
होई है वही जो राम रची राखा।
श्रीभगवान् बोल रहे हैं, सब कर्मों के फल का त्याग करने से-
तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार,
उदासी मन काहे को करे ।
तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार,
उदास मन काहे को करे ।
काहे को करे रे, काहे को करे,
काहे को करे, काहे को करे..
उदासी मन काहे को करे ।
तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार,
उदास मन काहे को करे ।
काहे को करे रे, काहे को करे,
काहे को करे, काहे को करे..
अपना सब कुछ श्रीभगवान् को अर्पित कर दो।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्, ज्ञानाद्ध्यानं(व्ँ) विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्याग:(स्),त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥12.12॥
अभ्यास से शास्त्रज्ञान श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है (और) ध्यान से (भी) सब कर्मों के फल की इच्छा का त्याग (श्रेष्ठ है)। क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति प्राप्त हो जाती है।
विवेचन- अभ्यास, नाम-जप, श्रीमद्भगवद्गीता जी पढ़ना, ये सब इन्द्रियों के प्रयोग से ही होता है। यह सब हाथ-पैर, मुख, आँख, नाक से ही करते हैं।
अभ्यास करते-करते समझ में आने लगता है, तो बुद्धि का प्रयोग होता है। अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है। ज्ञान में बुद्धि लगती है। मन और इन्द्रियों से बुद्धि श्रेष्ठ है। ज्ञान से भी ध्यान श्रेष्ठ है। ध्यान में चित्त लगता है।
हमारा शरीर स्थूल शरीर है। इसके अन्दर सूक्ष्म शरीर, अन्तःकरण चतुष्टय मन, बुद्धि, चित्त, अहम् है।
अभ्यास करते-करते समझ में आने लगता है, तो बुद्धि का प्रयोग होता है। अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है। ज्ञान में बुद्धि लगती है। मन और इन्द्रियों से बुद्धि श्रेष्ठ है। ज्ञान से भी ध्यान श्रेष्ठ है। ध्यान में चित्त लगता है।
हमारा शरीर स्थूल शरीर है। इसके अन्दर सूक्ष्म शरीर, अन्तःकरण चतुष्टय मन, बुद्धि, चित्त, अहम् है।
- सङ्कल्प-विकल्प मन द्वारा होता है।
- सही-ग़लत बुद्धि बताती है।
- चित्त, धारण करता है। मैं गीताव्रती बनूँगा। मैं श्रीमद्भगवद्गीता जी पढ़ने वाला बनूँगा। श्रेष्ठ मनुष्य, धार्मिक बनूँगा। मैं श्रेष्ठ मनुष्य जाति में पैदा हुआ हूँ। मैं स्त्री हूँ, पुरुष हूँ। यह धारणा चित्त का काम है।
- अहम्, अपने होने की अनुभूति का नाम है। सुबह निद्रा से जागे, तो बोलते हैं, आज सुख से सोया। सुख से सोया यह जानने वाला कौन है? स्वयं की अनुभूति अहम् है।
मन, बुद्धि, चित्त, अहम, अन्तःकरण चतुष्टय की स्थिति एक ही है।
अन्तःकरण जब विचार करता है तो मन होता है।
निर्णय करता है तो बुद्धि होती है।
धारण करता है तो चित्त होता है।
अपने होने की अनुभूति करता है तो अहम् कहलाता है।
निर्णय करता है तो बुद्धि होती है।
धारण करता है तो चित्त होता है।
अपने होने की अनुभूति करता है तो अहम् कहलाता है।
मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धि से चित्त श्रेष्ठ है, चित्त से अहम् को श्रेष्ठ बताया गया है।
ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है। इससे कर्तापन के अहङ्कार का त्याग होता है। त्याग से तत्काल शान्ति की प्राप्ति होती है। सब कुछ श्रीभगवान् पर छोड़ दो। सब कुछ छोड़ने से हम श्रीभगवान् को पा जाएँगे।
अगले सप्ताह तेरह से उन्नीस तक के श्लोकों में भक्त के लक्षण बतलाए गये है।
कैसा जीवन जीना, यह परम श्रद्धेय भाई जी की नित्य लीला में उनके द्वारा लिखी हुई प्रार्थना है। श्रीमद्भगवद्गीता जी में कैसे लगें, यह बताया है।
ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है। इससे कर्तापन के अहङ्कार का त्याग होता है। त्याग से तत्काल शान्ति की प्राप्ति होती है। सब कुछ श्रीभगवान् पर छोड़ दो। सब कुछ छोड़ने से हम श्रीभगवान् को पा जाएँगे।
अगले सप्ताह तेरह से उन्नीस तक के श्लोकों में भक्त के लक्षण बतलाए गये है।
कैसा जीवन जीना, यह परम श्रद्धेय भाई जी की नित्य लीला में उनके द्वारा लिखी हुई प्रार्थना है। श्रीमद्भगवद्गीता जी में कैसे लगें, यह बताया है।
श्रीभगवान् द्वारा प्रदत्त नियत कर्मों को श्रेष्ठता से करूँ।
हरि नाम सङ्कीर्तन के साथ आज के विवेचन सत्र का विश्राम हुआ।
हरि नाम सङ्कीर्तन के साथ आज के विवेचन सत्र का विश्राम हुआ।
विचार-मन्थन
प्रश्नकर्ता- उर्मिला दीदी।
प्रश्न- अध्याय बारह के सातवें श्लोक का अर्थ समझने में मैं असमर्थ हूँ। कृपया उसे समझाने का कष्ट करें कि इस श्लोक में श्रीभगवान् क्या उल्लेखित कर रहे हैं?
उत्तर- अध्याय बारह, श्लोक क्रमाङ्क सात इस प्रकार है-
तेषामहं समुद्ध्रता मृत्युसंसारसागरात् |
भवामि नचिरात्पार्थ मयावेशिचेतसाम् || 7||
भवामि नचिरात्पार्थ मयावेशिचेतसाम् || 7||
अर्थात्
जन्म एवं मरण के चक्रों की इस सतत प्रक्रिया में संलग्न रहते हुए किसी जीव को इस संसार रूपी भवसागर में अपने करोड़ो जन्मों एवं देहान्त अर्थात् मृत्यु को व्यतीत करना होता है।
जीव अपने प्रत्येक जन्म में नवीन देह प्राप्त करते हुए जगत में विद्यमान चौरासी लाख योनियों के मध्य भ्रमण करता है अर्थात् स्वयं के कर्मों के अनुसार नवीन जन्म में प्राप्त देह उसे किसी भी योनि का सदस्य बना सकती है।
जीव अपने प्रत्येक जन्म में नवीन देह प्राप्त करते हुए जगत में विद्यमान चौरासी लाख योनियों के मध्य भ्रमण करता है अर्थात् स्वयं के कर्मों के अनुसार नवीन जन्म में प्राप्त देह उसे किसी भी योनि का सदस्य बना सकती है।
यहाँ जानने योग्य तथ्य यह है कि एक मात्र मनुष्य योनि ही कर्म योनि है। जबकि शेष समस्त योनियाँ भोग योनियाँ हैं।
पुनरपि जननम् पुनरपि मरणम्।
पुनरपि जननी जठरे शयनम् |
पुनरपि जननी जठरे शयनम् |
इस श्लोक के माध्यम से श्रीभगवान् स्पष्ट रूप से कहते हैं कि मुझ में अपने मन को स्थापित करने वाले मनुष्यों को मैं जन्म-मृत्यु के इस सांसारिक बन्धनों से युक्त चक्रों से मुक्त कर देता हूँ अर्थात् उन जीवात्माओं को पुनः इस संसार में जन्म लेने की कोई आवश्यकता नहीं होती।
प्रश्नकर्ता- रितु दीदी।
प्रश्न- मेरे इष्ट देव कौन से हैं? यह समझ पाना मेरे लिए बेहद कठिन है। यदा-कदा मेरा ध्यान भगवान् विष्णु तथा बृहस्पतिदेव की उपासना की ओर जाता है। अत: मेरा मार्गदर्शन करें कि मुझे क्या करना चाहिए?
उत्तर- सर्वप्रथम हमें इस विषय की जानकारी होनी आवश्यक है कि श्रीभगवान् एवं देवता में अन्तर होता है।
श्रीभगवान् पूर्णतः जन्म-मरण के चक्रों से मुक्त हैं, अर्थात् न तो श्रीभगवान् का जन्म होता है तथा न ही एक निश्चित समयावधि के पश्चात् उनकी मृत्यु। अत: भगवान् विष्णु, महादेव शिव तथा आदिदेवी जिनका न तो जन्म हुआ है न ही उनकी मृत्यु ही सम्भव है। इनकी आराधना ही भगवद्भक्ति कही जाती है।
इसके विपरीत समस्त देवों का जन्म होता है तथा एक निश्चित काल (चाहें वह समय करोड़ो वर्षों का ही क्यों न हो) के पश्चात् उनकी मृत्यु भी अवश्यम्भावी होती है। देवता सदैव हेतु नहीं होते।
मात्र ये तीनों स्वरूप अर्थात् श्रीविष्णु, महादेव तथा आदिदेवी का स्वरूप सदा सर्वदा हेतु हैं। वे अजन्मे हैं। आदि भगवद् स्वरूप हैं। चूँकि समस्त देव श्रीभगवान् द्वारा संसार में हो रहे विभिन्न कल्याणकारी कार्यों के निमित्त नियुक्त किए गए हैं तथा वे हमारी आहुति से पुष्ट होते हैं एवं इस संसार हेतु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण एवं जीव कल्याणकारी कार्यों को सम्पादित करते हैं जैसे वर्षा के देवता बारिश करते हैं। अन्न के देवता अन्न उत्पन्न करते हैं।
समस्त देवताओं को उनके कार्यों के प्रतिफल आहुति प्रदान करना हमारा कर्तव्य है। जैसे अन्न प्रदान करने वाली अन्नपूर्णा देवी की उपासना तथा वरुण देव की उपासना करना। उनको आहुति देने का कार्य हमें निश्चित ही सम्पादित करना चाहिए।
देवताओं की उपासना किए बिना, उनके द्वारा प्रदत्त पदार्थों का उपभोग श्रीमद्भगवद्गीता जी के तृतीय अध्याय में श्रीभगवान् ने निषेध बताया है। परन्तु देवताओं की उपासना मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य नहीं है। यह मात्र एक मध्य मार्ग है।
मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य है भगवत् तत्त्व की प्राप्ति। भगवत् भक्ति ही किसी भी जीव के जीवन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। श्रीभगवान् के प्रिय होने हेतु निरन्तर प्रयास करने चाहिए। चूँकि हम श्रीभगवान् का ही अंश रूप हैं जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता जी के इस श्लोक में श्रीभगवान् ने स्वयं उच्चारित किया है-
प्रश्नकर्ता- रितु दीदी।
प्रश्न- मेरे इष्ट देव कौन से हैं? यह समझ पाना मेरे लिए बेहद कठिन है। यदा-कदा मेरा ध्यान भगवान् विष्णु तथा बृहस्पतिदेव की उपासना की ओर जाता है। अत: मेरा मार्गदर्शन करें कि मुझे क्या करना चाहिए?
उत्तर- सर्वप्रथम हमें इस विषय की जानकारी होनी आवश्यक है कि श्रीभगवान् एवं देवता में अन्तर होता है।
श्रीभगवान् पूर्णतः जन्म-मरण के चक्रों से मुक्त हैं, अर्थात् न तो श्रीभगवान् का जन्म होता है तथा न ही एक निश्चित समयावधि के पश्चात् उनकी मृत्यु। अत: भगवान् विष्णु, महादेव शिव तथा आदिदेवी जिनका न तो जन्म हुआ है न ही उनकी मृत्यु ही सम्भव है। इनकी आराधना ही भगवद्भक्ति कही जाती है।
इसके विपरीत समस्त देवों का जन्म होता है तथा एक निश्चित काल (चाहें वह समय करोड़ो वर्षों का ही क्यों न हो) के पश्चात् उनकी मृत्यु भी अवश्यम्भावी होती है। देवता सदैव हेतु नहीं होते।
मात्र ये तीनों स्वरूप अर्थात् श्रीविष्णु, महादेव तथा आदिदेवी का स्वरूप सदा सर्वदा हेतु हैं। वे अजन्मे हैं। आदि भगवद् स्वरूप हैं। चूँकि समस्त देव श्रीभगवान् द्वारा संसार में हो रहे विभिन्न कल्याणकारी कार्यों के निमित्त नियुक्त किए गए हैं तथा वे हमारी आहुति से पुष्ट होते हैं एवं इस संसार हेतु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण एवं जीव कल्याणकारी कार्यों को सम्पादित करते हैं जैसे वर्षा के देवता बारिश करते हैं। अन्न के देवता अन्न उत्पन्न करते हैं।
समस्त देवताओं को उनके कार्यों के प्रतिफल आहुति प्रदान करना हमारा कर्तव्य है। जैसे अन्न प्रदान करने वाली अन्नपूर्णा देवी की उपासना तथा वरुण देव की उपासना करना। उनको आहुति देने का कार्य हमें निश्चित ही सम्पादित करना चाहिए।
देवताओं की उपासना किए बिना, उनके द्वारा प्रदत्त पदार्थों का उपभोग श्रीमद्भगवद्गीता जी के तृतीय अध्याय में श्रीभगवान् ने निषेध बताया है। परन्तु देवताओं की उपासना मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य नहीं है। यह मात्र एक मध्य मार्ग है।
मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य है भगवत् तत्त्व की प्राप्ति। भगवत् भक्ति ही किसी भी जीव के जीवन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। श्रीभगवान् के प्रिय होने हेतु निरन्तर प्रयास करने चाहिए। चूँकि हम श्रीभगवान् का ही अंश रूप हैं जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता जी के इस श्लोक में श्रीभगवान् ने स्वयं उच्चारित किया है-
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
अत: उस परब्रह्म से पुनः एकीकार होना किसी भी जीव का परम लक्ष्य है। यह विचारते हुए ही जीवों को परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए।
देवताओं के सदृश्य श्रीभगवान् की उपासना मनुष्य द्वारा यदि किसी इच्छा की पूर्ति हेतु अथवा किसी पदार्थ की प्राप्ति हेतु की जाती है तब वे भी जीव की उस प्रार्थना को स्वीकार करते हुए उसकी इच्छा की पूर्ति करते हैं।
परमात्मा से सांसारिक सुखों की प्राप्ति की कामना पूर्ति हेतु प्रार्थना करना वैसे ही है जैसे पचास हजार के लैपटॉप से बीस रुपए के कैल्कुलेटर का कार्य साधना।
उस आनन्दमयी परब्रह्म से जीव को तो अपने जीवन के मुख्य उद्देश्य की पूर्ति की प्रार्थना करनी चाहिए ताकि जीव संसार रूपी इस भवसागर को पार कर सदैव हेतु भगवत् धाम की ओर प्रस्थान कर सके।
देवताओं के सदृश्य श्रीभगवान् की उपासना मनुष्य द्वारा यदि किसी इच्छा की पूर्ति हेतु अथवा किसी पदार्थ की प्राप्ति हेतु की जाती है तब वे भी जीव की उस प्रार्थना को स्वीकार करते हुए उसकी इच्छा की पूर्ति करते हैं।
परमात्मा से सांसारिक सुखों की प्राप्ति की कामना पूर्ति हेतु प्रार्थना करना वैसे ही है जैसे पचास हजार के लैपटॉप से बीस रुपए के कैल्कुलेटर का कार्य साधना।
उस आनन्दमयी परब्रह्म से जीव को तो अपने जीवन के मुख्य उद्देश्य की पूर्ति की प्रार्थना करनी चाहिए ताकि जीव संसार रूपी इस भवसागर को पार कर सदैव हेतु भगवत् धाम की ओर प्रस्थान कर सके।
।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।