विवेचन सारांश
अर्जुन द्वारा श्रीभगवान् के विश्वरूप का वर्णन
श्रीभगवान् की अतिशय मङ्गलमय कृपा से हम सब लोगों का ऐसा सद्भाग्य जाग्रत हुआ है जो अपने इस मानव जीवन को सफल, सार्थक करने के लिए, इसको इसके सर्वोच्च लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए, इहलोक और परलोक दोनों में अपना कल्याण करने के लिए हम लोग भगवद्गीता के पठन-पाठन से जुड़ गए हैं। उसके उच्चारण को सीखने लगे हैं, कण्ठस्थ भी करने लगे हैं, हृदयस्थ करने लगे हैं। इसकी विवेचना को सुनकर समझने का प्रयास कर रहे हैं। कोई-कोई स्वाध्याय भी करते हैं। हम में से कुछ लोग तो उसके सूत्रों को अपने जीवन में कुछ-कुछ लाने का प्रयास भी कर रहे हैं।
पता नहीं हमारे इस जन्म के कुछ पुण्यकर्म हैं, पूर्व जन्मों के कुछ सुकृत्य हैं, हमारे पूर्वजों के कुछ पुण्य फल हैं जिसके कारण हमारा ऐसा भाग्य उदय हो गया जिससे हम सब लोग भगवद्गीता पढ़ने के लिए चुन लिए गए हैं। भगवद्गीता के समान कल्याण करने वाला दूसरा कोई ग्रन्थ मानव सभ्यता के लिए सुगम नहीं है, ऐसा आचार्यों ने, महापुरुषों ने बारंबार बताया है।
जब हम ग्यारहवें अध्याय विश्वरूपदर्शनयोग के चिन्तन के बारे में सोचते हैं तो उसकी कल्पना करने मात्र से रोम-रोम हर्षित हो जाता है। क्या स्थिति हुई होगी अर्जुन की, सञ्जय की जब जिन्होंने उसका दर्शन किया। हम उसको पढ़ते मात्र हैं। पढ़ने-सुनने मात्र से हम लोगों को कैसी अनुभूति होती है तो हम उस अर्जुन की धन्यता का क्या अनुभव करेंगे जिसने श्रीभगवान् के दिव्य रूप का दर्शन किया। जिसके लिए भगवान् ने कहा-
न वेदज्ञाध्यायनैर्न दानैर्न च क्रियाभर्न तपोभिरुग्रै:। (11.48)
किसी भी वेद, यज्ञ, दान, कर्म से यह कर पाना संभव नहीं। ना किसी ने पहले कभी पाया है, न हीं आगे कोई पा सकेगा। श्रीभगवान् ने ऐसा विराट अद्भुत रूप दिखाया।
बारहवें श्लोक तक सञ्जय ने श्रीभगवान् के रूप का वर्णन किया है क्योंकि अर्जुन की दशा जब तक बोलने योग्य नहीं हुई तब तक अर्जुन ने कैसा अनुभव किया था यह कैसे पता चलेगा? भगवद्गीता एकदम प्रामाणिक है।
अर्जुन विस्मित होकर केवल देख रहे हैं। वह क्या देख रहे हैं उसे भगवान् वेदव्यास जी ने सञ्जय की वाणी में लिखा। सञ्जय ने धृतराष्ट्र को यह बताया कि अर्जुन क्या-क्या देख रहा है, बारहवें श्लोक में जो हमने देखा उसके बारे में रॉबर्ट ओपनहैमर (Robert Oppenheimer) ने सबसे पहले परमाणु विस्फोट को देखा।
दिवि सूर्यसहस्त्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भा: सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मन:।।(11.12)
एक साथ एक हजार सूर्य हैं।
एक सूर्य को सामने खड़े होकर देखने जाएँ दिन में बारह बजे, तो आँखों को कष्ट हो जाता है, देख नहीं पाते हैं। एक हजार सूर्य होंगे तो कैसा होगा? सञ्जय कह रहे हैं कि एक हजार सूर्यों का प्रकाश भी कदाचित वैसा होगा जैसा यह प्रकाश है। एक हजार सूर्यों का प्रकाश भी कम पड़ जाने वाला है, इतना अधिक प्रकाश है।
पता नहीं हमारे इस जन्म के कुछ पुण्यकर्म हैं, पूर्व जन्मों के कुछ सुकृत्य हैं, हमारे पूर्वजों के कुछ पुण्य फल हैं जिसके कारण हमारा ऐसा भाग्य उदय हो गया जिससे हम सब लोग भगवद्गीता पढ़ने के लिए चुन लिए गए हैं। भगवद्गीता के समान कल्याण करने वाला दूसरा कोई ग्रन्थ मानव सभ्यता के लिए सुगम नहीं है, ऐसा आचार्यों ने, महापुरुषों ने बारंबार बताया है।
जब हम ग्यारहवें अध्याय विश्वरूपदर्शनयोग के चिन्तन के बारे में सोचते हैं तो उसकी कल्पना करने मात्र से रोम-रोम हर्षित हो जाता है। क्या स्थिति हुई होगी अर्जुन की, सञ्जय की जब जिन्होंने उसका दर्शन किया। हम उसको पढ़ते मात्र हैं। पढ़ने-सुनने मात्र से हम लोगों को कैसी अनुभूति होती है तो हम उस अर्जुन की धन्यता का क्या अनुभव करेंगे जिसने श्रीभगवान् के दिव्य रूप का दर्शन किया। जिसके लिए भगवान् ने कहा-
न वेदज्ञाध्यायनैर्न दानैर्न च क्रियाभर्न तपोभिरुग्रै:। (11.48)
किसी भी वेद, यज्ञ, दान, कर्म से यह कर पाना संभव नहीं। ना किसी ने पहले कभी पाया है, न हीं आगे कोई पा सकेगा। श्रीभगवान् ने ऐसा विराट अद्भुत रूप दिखाया।
बारहवें श्लोक तक सञ्जय ने श्रीभगवान् के रूप का वर्णन किया है क्योंकि अर्जुन की दशा जब तक बोलने योग्य नहीं हुई तब तक अर्जुन ने कैसा अनुभव किया था यह कैसे पता चलेगा? भगवद्गीता एकदम प्रामाणिक है।
अर्जुन विस्मित होकर केवल देख रहे हैं। वह क्या देख रहे हैं उसे भगवान् वेदव्यास जी ने सञ्जय की वाणी में लिखा। सञ्जय ने धृतराष्ट्र को यह बताया कि अर्जुन क्या-क्या देख रहा है, बारहवें श्लोक में जो हमने देखा उसके बारे में रॉबर्ट ओपनहैमर (Robert Oppenheimer) ने सबसे पहले परमाणु विस्फोट को देखा।
दिवि सूर्यसहस्त्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भा: सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मन:।।(11.12)
एक साथ एक हजार सूर्य हैं।
एक सूर्य को सामने खड़े होकर देखने जाएँ दिन में बारह बजे, तो आँखों को कष्ट हो जाता है, देख नहीं पाते हैं। एक हजार सूर्य होंगे तो कैसा होगा? सञ्जय कह रहे हैं कि एक हजार सूर्यों का प्रकाश भी कदाचित वैसा होगा जैसा यह प्रकाश है। एक हजार सूर्यों का प्रकाश भी कम पड़ जाने वाला है, इतना अधिक प्रकाश है।
11.13
तत्रैकस्थं(ञ्) जगत्कृत्स्नं(म्), प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य, शरीरे पाण्डवस्तदा॥11.13॥
उस समय अर्जुनने देवोंके देव भगवान्के उस शरीर में एक जगह स्थित अनेक प्रकारके विभागोंमें विभक्त सम्पूर्ण जगत् को देखा।
विवेचन- पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार के विभक्त अर्थात् पृथक्-पृथक् जितनी योनियाँ है, जितने लोक हैं, जितने देवता हैं, जितने ऋषि-मुनि हैं, सबको देखा। वह जो विचार करते हैं वह सब उनको सामने दिखता जाता है। चौरासी लाख योनियाँ, चौदह भुवन उनके सामने हैं। आश्चर्य की बात है, सम्पूर्ण जगत् को देवों के देव भगवान् श्रीकृष्ण में देखा।
"तत्रैकस्थं अपश्यत्"
सबसे महत्वपूर्ण शब्द है एकस्थं।
श्रीभगवान् का स्वरूप जब विश्वरूप हुआ तो सामान्य दृष्टि से देखना तो सम्भव ही नहीं था। अर्जुन को श्रीभगवान् ने दिव्य नेत्र दिए। लेकिन दिव्य नेत्रों से भी अनन्त रूप को कैसे देखेंगे जिसका आदि है ना अन्त है।
सामान्यतः देखने के लिए दाएँ, बाएँ, ऊपर, नीचे देखना पड़ता है। इतनी विराटता जिस स्वरूप की होगी उसे देखने के लिए ऐसा नहीं करना पड़ता। श्रीभगवान् के एक-एक रोम में कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड हैं।
यथा पिंडम् तथा ब्रह्ममय
यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे
वेदान्त का एक महत्वपूर्ण सूत्र है -यह ब्रह्माण्ड कैसा है? एक-एक कण में पूरा-पूरा ब्रह्माण्ड है।
विज्ञान की क्वांटम फिजिक्स इस सिद्धान्त के बहुत निकट पहुँच रही है। क्वाण्टम् फिजिक्स कहती है कि जितने भी अणु हैं उन सब का प्रतिकृति अणु होता है। जो क्रिया यहाँ होती है उसकी प्रतिक्रिया वहाँ भी होती है। यह असीमित है, अनन्त है।
आजकल हम लोग मोबाइल में ज़ूम प्रयोग करते हैं। अँगुली से बड़ा करो और चित्र बड़ा होता जाता है। अर्जुन भी श्रीभगवान् को जब एक स्थान पर केंद्रित करके देखते होंगे, वह बड़ा होता जाता होगा। इस प्रकार जो-जो उनको देखना है वह सब दिखता जाता होगा। अर्जुन को गर्दन नहीं घुमानी पड़ी होगी। वे एक ही स्थान पर देखते हैं और भगवान् की अनन्त सृष्टि का दर्शन हो जाता है।
"तत्रैकस्थं अपश्यत्"
सबसे महत्वपूर्ण शब्द है एकस्थं।
श्रीभगवान् का स्वरूप जब विश्वरूप हुआ तो सामान्य दृष्टि से देखना तो सम्भव ही नहीं था। अर्जुन को श्रीभगवान् ने दिव्य नेत्र दिए। लेकिन दिव्य नेत्रों से भी अनन्त रूप को कैसे देखेंगे जिसका आदि है ना अन्त है।
सामान्यतः देखने के लिए दाएँ, बाएँ, ऊपर, नीचे देखना पड़ता है। इतनी विराटता जिस स्वरूप की होगी उसे देखने के लिए ऐसा नहीं करना पड़ता। श्रीभगवान् के एक-एक रोम में कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड हैं।
यथा पिंडम् तथा ब्रह्ममय
यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे
वेदान्त का एक महत्वपूर्ण सूत्र है -यह ब्रह्माण्ड कैसा है? एक-एक कण में पूरा-पूरा ब्रह्माण्ड है।
विज्ञान की क्वांटम फिजिक्स इस सिद्धान्त के बहुत निकट पहुँच रही है। क्वाण्टम् फिजिक्स कहती है कि जितने भी अणु हैं उन सब का प्रतिकृति अणु होता है। जो क्रिया यहाँ होती है उसकी प्रतिक्रिया वहाँ भी होती है। यह असीमित है, अनन्त है।
आजकल हम लोग मोबाइल में ज़ूम प्रयोग करते हैं। अँगुली से बड़ा करो और चित्र बड़ा होता जाता है। अर्जुन भी श्रीभगवान् को जब एक स्थान पर केंद्रित करके देखते होंगे, वह बड़ा होता जाता होगा। इस प्रकार जो-जो उनको देखना है वह सब दिखता जाता होगा। अर्जुन को गर्दन नहीं घुमानी पड़ी होगी। वे एक ही स्थान पर देखते हैं और भगवान् की अनन्त सृष्टि का दर्शन हो जाता है।
ततः(स्) स विस्मयाविष्टो, हृष्टरोमा धनञ्जयः।
प्रणम्य शिरसा देवं(ङ्), कृताञ्जलिरभाषत॥11.14॥
भगवान् के विश्वरूप को देखकर वे अर्जुन बहुत चकित हुए (और) आश्चर्य के कारण उनका शरीर रोमांचित हो गया। (वे) हाथ जोड़कर विश्वरूप देव को मस्तकसे प्रणाम करके बोले।
विवेचन -
एकस्थं अपश्यं
यह बड़ी विशिष्ट बात है।
भगवान् के विश्वरूप को देखने के बाद अर्जुन विस्मय से आविष्ट हो गए, आश्चर्य से आविष्ट हो गए अर्थात् आश्चर्य के अतिरिक्त कुछ बचा ही नहीं। बाकी सब चला गया।
आश्चर्य से आविष्ट और पुलकित शरीर से अर्जुन ने उस प्रकाशमय परमात्मा को श्रद्धा-भक्ति सहित "प्रणम्य शिरसा देवं" दोनों हाथों को जोड़कर, सिर को झुका कर हाथों से लगाकर प्रणाम किया। अर्जुन का रोम-रोम खड़ा हो गया और अर्जुन बोले।
एकस्थं अपश्यं
यह बड़ी विशिष्ट बात है।
भगवान् के विश्वरूप को देखने के बाद अर्जुन विस्मय से आविष्ट हो गए, आश्चर्य से आविष्ट हो गए अर्थात् आश्चर्य के अतिरिक्त कुछ बचा ही नहीं। बाकी सब चला गया।
आश्चर्य से आविष्ट और पुलकित शरीर से अर्जुन ने उस प्रकाशमय परमात्मा को श्रद्धा-भक्ति सहित "प्रणम्य शिरसा देवं" दोनों हाथों को जोड़कर, सिर को झुका कर हाथों से लगाकर प्रणाम किया। अर्जुन का रोम-रोम खड़ा हो गया और अर्जुन बोले।
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे,
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्।
ब्रह्माणमीशं(ङ्) कमलासनस्थम्,
ऋषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्॥11.15॥
अर्जुन बोले - हे देव! (मैं) आपके शरीर में सम्पूर्ण देवताओं को तथा प्राणियोंके विशेष-विशेष समुदायोंको और कमलासनपर बैठे हुए ब्रह्माजीको, शङ्करजीको, सम्पूर्ण ऋषियोंको और दिव्य सर्पोंको देख रहा हूँ।
विवेचन - अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को, अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्माजी को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को, दिव्य सर्पों को देखता हूँ। अर्जुन ने सारे दिव्य लोकों के दर्शन भगवान् के अन्दर कर लिए। देवलोक, ब्रह्मलोक, बैकुण्ठ, कैलाश, जो भी अर्जुन देखना चाह रहे हैं वह सब वहाँ दिखाई दे रहा है।
अर्जुन ने वहाँ ब्रह्मा जी को भी देखा है। ब्रह्माजी उत्पत्ति का कारण हैं। हम सब भी ब्रह्मा हैं। अनेक बार हम लोग कहते हैं कि मेरे कारण यह हुआ। फिर कभी-कभी हम लोग विष्णु भी बन जाते हैं। जब कहते हैं कि मैं अपने परिवार का पालन करता हूँ।
मैं बहुत सारे लोगों की फैक्ट्री चलाता हूँ । मैं इतनी बड़ी संस्था चलाता हूँ। मतलब हम विष्णु भी बन जाते हैं।
पर शिव कभी नहीं बनते। कुछ चला गया तो मेरे कारण गया, ऐसा नहीं बोलते। मैंने पैदा किया, मैंने पाला है, ऐसा बोलते हैं पर मैंने मारा है ऐसा कभी नहीं बोलते।
वेदान्त में तीन आकाश हैं -
1• घटाकाश- घट के अन्दर का आकाश।
2• मठाकाश- मठ के अन्दर का आकाश।
3• महाकाश- बाहर का आकाश।
लेकिन इससे भी बड़ा एक आकाश और है-
चित्ताकाश - अपने चित्त का आकाश। आकाश अनन्त होने पर भी चित्त की कल्पनाएँ उससे भी बड़े आकाश में अनन्त हो जाती हैं।
एक मित्र ने दूसरे मित्र को पूछा तुम्हारा कारखाना कैसा चलता है? उसने कहा वह कारखाना तो बन्द कर दिया। आजकल दूसरा कारखाना सम्भालता हूँ। पहले मित्र ने पूछा दूसरा कौन सा? उस ने बोला पत्नी का कारखाना। उसके पास दुःखों का कारखाना है उसी को सम्भालता रहता हूँ। कभी यह दुःख सम्भालो कभी दूसरे दुःख को सम्भालो।
यह चित्त कुछ भी कल्पनाएँ कर लेता है इतना कल्पनाशील है।
अर्जुन ने श्रीभगवान् में ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ सम्पूर्ण देवताओं को, ऋषियों को, अनेक प्रकार के भूत समुदायों को, जिनको अर्जुन ने पहले कभी देखा नहीं था, विचार नहीं किया था, कल्पना भी नहीं की थी, सबको देखा।
अर्जुन ने वहाँ ब्रह्मा जी को भी देखा है। ब्रह्माजी उत्पत्ति का कारण हैं। हम सब भी ब्रह्मा हैं। अनेक बार हम लोग कहते हैं कि मेरे कारण यह हुआ। फिर कभी-कभी हम लोग विष्णु भी बन जाते हैं। जब कहते हैं कि मैं अपने परिवार का पालन करता हूँ।
मैं बहुत सारे लोगों की फैक्ट्री चलाता हूँ । मैं इतनी बड़ी संस्था चलाता हूँ। मतलब हम विष्णु भी बन जाते हैं।
पर शिव कभी नहीं बनते। कुछ चला गया तो मेरे कारण गया, ऐसा नहीं बोलते। मैंने पैदा किया, मैंने पाला है, ऐसा बोलते हैं पर मैंने मारा है ऐसा कभी नहीं बोलते।
वेदान्त में तीन आकाश हैं -
1• घटाकाश- घट के अन्दर का आकाश।
2• मठाकाश- मठ के अन्दर का आकाश।
3• महाकाश- बाहर का आकाश।
लेकिन इससे भी बड़ा एक आकाश और है-
चित्ताकाश - अपने चित्त का आकाश। आकाश अनन्त होने पर भी चित्त की कल्पनाएँ उससे भी बड़े आकाश में अनन्त हो जाती हैं।
एक मित्र ने दूसरे मित्र को पूछा तुम्हारा कारखाना कैसा चलता है? उसने कहा वह कारखाना तो बन्द कर दिया। आजकल दूसरा कारखाना सम्भालता हूँ। पहले मित्र ने पूछा दूसरा कौन सा? उस ने बोला पत्नी का कारखाना। उसके पास दुःखों का कारखाना है उसी को सम्भालता रहता हूँ। कभी यह दुःख सम्भालो कभी दूसरे दुःख को सम्भालो।
यह चित्त कुछ भी कल्पनाएँ कर लेता है इतना कल्पनाशील है।
अर्जुन ने श्रीभगवान् में ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ सम्पूर्ण देवताओं को, ऋषियों को, अनेक प्रकार के भूत समुदायों को, जिनको अर्जुन ने पहले कभी देखा नहीं था, विचार नहीं किया था, कल्पना भी नहीं की थी, सबको देखा।
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं(म्),
पश्यामि त्वां(म्) सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं(न्) न मध्यं(न्) न पुनस्तवादिं(म्),
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥11.16॥
हे विश्वरूप! हे विश्वेश्वर! आपको (मैं) अनेक हाथों, पेटों, मुखों और नेत्रों वाला (तथा) सब ओरसे अनन्त रूपोंवाला देख रहा हूँ। (मैं) आपके न आदिको, न मध्यको और न अन्तको ही देख रहा हूँ।
विवेचन- अर्जुन श्रीभगवान् को विश्वेश्वर कहकर सम्बोधित कर रहे हैं क्योंकि वे सम्पूर्ण विश्व के ईश्वर हैं। वे श्रीभगवान् से कहते हैं कि मैं जो कुछ कल्पना कर सकता हूँ. सबके स्वामी आप हैं, आप सबके ईश्वर हैं।
हे विश्वेश्वर! आपको अनेक भुजाएँ, अनेक उदर, अनेक पीठ, अनेक मुख, अनेक नेत्रों से युक्त अनन्त रूप वाला देखता हूँ। थोड़ी गर्दन घुमाने पर भी आपकी दी हुई दिव्य दृष्टि के कारण मैं बहुत दूर तक देख पाता हूँ। शायद अर्जुन हजारों किलोमीटर तक देख पा रहे थे। इतना दूर देखने पर भी श्रीभगवान् का रूप समाप्त ही नहीं हो रहा था। अर्जुन प्रयास कर रहे हैं कि दाईं ओर से कहाँ तक देखें? बाँईं ओर से देखें तो कहाँ तक श्रीभगवान् हैं। ऊपर से देखे या नीचे से देखें कि कहाँ-कहाँ तक श्रीभगवान् का विस्तार है। दसों दिशाओं में अर्जुन अपनी दृष्टि घूमा रहे हैं। सब जगह श्रीभगवान् के अनन्त रूप को ही देख रहे हैं पर वह समाप्त ही नहीं हो रहा है। अब अर्जुन कहते हैं हे विश्वरूप ! मैं न तो आपके अन्त को देख रहा हूँ, न मध्य देख पा रहा हूँ और न ही आरम्भ देख पा रहा हूँ।
विश्व रूप का वर्णन रामचरितमानस के बालकाण्ड में भी भगवान् श्रीराम के जन्म के बाद आया है।
एक बार जननी अन्हवाए। कर सिंगार पलनाँ पौढ़ाए।।
निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना।।
एक बार माता कौशल्या ने भगवान् श्रीराम को स्नान कराया और श्रृंगार करके पालने में लिटा दिया। फिर अपने कुल के इष्टदेव की पूजा करने के लिए स्नान किया। फिर अपने मन्दिर में जाकर भगवान् की पूजा के लिए बैठ गईं।
करि पूजा नेबैद्य चढ़ावा। आपु गई जहॅं पाक बनावा।।
बहुरि मातु तहवाँ चली आई। भोजन करत देख सुत जाईं।।
कौशल्या जी पूजा में बैठी। श्रीभगवान् को लड्डू का भोग लगाया। श्रीभगवान् के लिए और क्या भोग बन रहा है, यह देखने के लिए स्वयं रसोई में गईं। वहाँ से वापस जब मन्दिर में आईं तो वह अपने उस बालक को, जो अभी छोटा, गोदी का बालक है, लेटा रहता है, स्वयं से करवट भी नहीं लेता मन्दिर में बैठकर श्रीभगवान् को जो नैवेद्य का भोग लगाया था, वह नैवेद्य खाते देखकर आश्चर्यचकित रह गईं।
गै जननी सिसु पहिं भयभीता।
कौशल्या जी घबरा गईं कि यह कैसे हो सकता है। पालने से उठकर बालक स्वयं यहाँ कैसे आ सकता है। यहाँ कोई और है भी नहीं कि दूसरा कोई इनको यहाँ लाया हो। कौशल्या जी भयभीत होकर वापस पालने की ओर भागीं।
देखा बाल तहाँ पुनि सूता।
भगवान् श्रीराम को वहाँ पालने में सोता हुआ देखकर आश्चर्यचकित रह गईं। राम जी और भरतजी एकदम एक जैसे ही दिखते हैं पर उनको वहाँ कोई नहीं लाया।
बहुरि आई देखा सुख सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई।।
भगवान् श्रीराम को पालने में सोता हुआ देखकर वापस मन्दिर में जाकर देखती हैं कि वह तो मन्दिर में बैठे नैवेद्य खा रहे हैं। एक ही बालक को मन्दिर और पालने दोनों स्थानों पर देखकर माता कौशल्या घबरा गईं।
इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मति भ्रम मोर कि आन बिसेषा।।
यहाँ भी राम जी और वहाँ भी राम जी हैं। क्या मेरी बुद्धि भ्रमित हो गई है। एक ही बालक दो जगह कैसे हो सकता है! यह सोचकर माता कौशल्या घबरा गईं। जब भगवान् श्रीराम ने देखा कि माता एकदम घबराई हुई हैं।
देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी।।
यह देखकर भगवान् मुस्कुरा दिए और माता एकदम भाव विह्वल हो गईं।
देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड।
रोम रोम प्रति लागे कोटि-कोटि ब्रह्मंड।।
श्रीभगवान् ने इस समय अपना विश्वरूप प्रकट कर कौशल्या माता को दिखाया। पहले तो एक से दो हुए और फिर दूसरे से विश्वरूप हो गए।
अगनित रवि ससि सिव चतुरानन।
बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन।।
काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ।
सोउ देखा जो सुना न काऊ।।
अगणित सूर्य, चन्द्रमा, शिव, ब्रह्मा, बहुत से पर्वत, नदियाँ, पृथ्वी, उपवन, वो पदार्थ जो पहले कभी सुने ही नहीं थे वह सब माता कौशल्या को दिखाई दे रहे थे।
देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी ।।
देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही।।
सब प्रकार से प्रभु की माया को देखा और माया भी श्रीभगवान् के सामने भयभीत होकर हाथ जोड़कर खड़ी है। जीव को देखा जिसको माया नचाती है, भक्ति को भी देखा जो माया से जीव को छुड़ा लेती है।
तनु पुलकित मन बचन न आवा।
नयन मूदि चरननि सिरु नावा।
बिसमयवंत देखि महतारी।
भये बहुरि सिसुरूप खरारी।।
कौशल्या जी का शरीर पुलकित हो गया लेकिन मुख से चाह कर भी बोल नहीं पा रहीं। स्थिति ऐसी हो गई कि कुछ समझ नहीं पा रही हैं कि मैं क्या देख रही हूँ? यह क्या हो रहा है? कौशल्या जी इतना घबरा गई कि अन्त में आँखें बँद कर श्रीरामजी के चरणों में सर नवाया। माँ को इस प्रकार आश्चर्य से घबराते हुए देखा तो श्रीभगवान् फिर से बाल रूप हो गए।
अस्तुति करि न जाइ भय माना।
जगत पिता मैं सुत करि जाना।।
माता से स्तुति नहीं की जाती। वो डर गई हैं कि मैंने जगत् पिता परमात्मा को पुत्र समझ लिया। श्रीभगवान् ने कहा कि जो कुछ भी तुमने देखा है वह किसी को बताना नहीं।
हरि जननी बहुबिधि समुझाई।
यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई।।
किसी को बताना नहीं। बताने से सारी लीला बिगड़ जाएगी। श्रीभगवान् अपने भक्तों पर इस प्रकार अद्भुत कृपा करते हैं। जो स्थिति अर्जुन की है वही स्थिति माता कौशल्या की है।
श्रीभगवान् का वह अनन्त रूप कैसा है? स्याही की एक बोतल किसी को मिल जाए। उस स्याही की बोतल में अनन्त शब्द हैं। उस बोतल की स्याही से हम कुछ भी लिख सकते हैं, क्योंकि उस स्याही में अनन्त का निर्माण करने की व्यापकता है। जिस प्रकार स्वर्ण के ढेले से कोई सा भी आभूषण बन सकता है, इस प्रकार श्रीभगवान् का कौन सा नाम रूप हो सकता है। उस अनन्त में जो तुम देखना चाहो, जो तुम स्याही से बनाना चाहो वह बनाते जाओ। अर्जुन भी यही कर रहे हैं। अर्जुन ने पहले कभी जो कल्पना की थी वह सब देख रहे हैं। श्रीभगवान् अनन्त रूप में आ गए।
हे विश्वेश्वर! आपको अनेक भुजाएँ, अनेक उदर, अनेक पीठ, अनेक मुख, अनेक नेत्रों से युक्त अनन्त रूप वाला देखता हूँ। थोड़ी गर्दन घुमाने पर भी आपकी दी हुई दिव्य दृष्टि के कारण मैं बहुत दूर तक देख पाता हूँ। शायद अर्जुन हजारों किलोमीटर तक देख पा रहे थे। इतना दूर देखने पर भी श्रीभगवान् का रूप समाप्त ही नहीं हो रहा था। अर्जुन प्रयास कर रहे हैं कि दाईं ओर से कहाँ तक देखें? बाँईं ओर से देखें तो कहाँ तक श्रीभगवान् हैं। ऊपर से देखे या नीचे से देखें कि कहाँ-कहाँ तक श्रीभगवान् का विस्तार है। दसों दिशाओं में अर्जुन अपनी दृष्टि घूमा रहे हैं। सब जगह श्रीभगवान् के अनन्त रूप को ही देख रहे हैं पर वह समाप्त ही नहीं हो रहा है। अब अर्जुन कहते हैं हे विश्वरूप ! मैं न तो आपके अन्त को देख रहा हूँ, न मध्य देख पा रहा हूँ और न ही आरम्भ देख पा रहा हूँ।
विश्व रूप का वर्णन रामचरितमानस के बालकाण्ड में भी भगवान् श्रीराम के जन्म के बाद आया है।
एक बार जननी अन्हवाए। कर सिंगार पलनाँ पौढ़ाए।।
निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना।।
एक बार माता कौशल्या ने भगवान् श्रीराम को स्नान कराया और श्रृंगार करके पालने में लिटा दिया। फिर अपने कुल के इष्टदेव की पूजा करने के लिए स्नान किया। फिर अपने मन्दिर में जाकर भगवान् की पूजा के लिए बैठ गईं।
करि पूजा नेबैद्य चढ़ावा। आपु गई जहॅं पाक बनावा।।
बहुरि मातु तहवाँ चली आई। भोजन करत देख सुत जाईं।।
कौशल्या जी पूजा में बैठी। श्रीभगवान् को लड्डू का भोग लगाया। श्रीभगवान् के लिए और क्या भोग बन रहा है, यह देखने के लिए स्वयं रसोई में गईं। वहाँ से वापस जब मन्दिर में आईं तो वह अपने उस बालक को, जो अभी छोटा, गोदी का बालक है, लेटा रहता है, स्वयं से करवट भी नहीं लेता मन्दिर में बैठकर श्रीभगवान् को जो नैवेद्य का भोग लगाया था, वह नैवेद्य खाते देखकर आश्चर्यचकित रह गईं।
गै जननी सिसु पहिं भयभीता।
कौशल्या जी घबरा गईं कि यह कैसे हो सकता है। पालने से उठकर बालक स्वयं यहाँ कैसे आ सकता है। यहाँ कोई और है भी नहीं कि दूसरा कोई इनको यहाँ लाया हो। कौशल्या जी भयभीत होकर वापस पालने की ओर भागीं।
देखा बाल तहाँ पुनि सूता।
भगवान् श्रीराम को वहाँ पालने में सोता हुआ देखकर आश्चर्यचकित रह गईं। राम जी और भरतजी एकदम एक जैसे ही दिखते हैं पर उनको वहाँ कोई नहीं लाया।
बहुरि आई देखा सुख सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई।।
भगवान् श्रीराम को पालने में सोता हुआ देखकर वापस मन्दिर में जाकर देखती हैं कि वह तो मन्दिर में बैठे नैवेद्य खा रहे हैं। एक ही बालक को मन्दिर और पालने दोनों स्थानों पर देखकर माता कौशल्या घबरा गईं।
इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मति भ्रम मोर कि आन बिसेषा।।
यहाँ भी राम जी और वहाँ भी राम जी हैं। क्या मेरी बुद्धि भ्रमित हो गई है। एक ही बालक दो जगह कैसे हो सकता है! यह सोचकर माता कौशल्या घबरा गईं। जब भगवान् श्रीराम ने देखा कि माता एकदम घबराई हुई हैं।
देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी।।
यह देखकर भगवान् मुस्कुरा दिए और माता एकदम भाव विह्वल हो गईं।
देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड।
रोम रोम प्रति लागे कोटि-कोटि ब्रह्मंड।।
श्रीभगवान् ने इस समय अपना विश्वरूप प्रकट कर कौशल्या माता को दिखाया। पहले तो एक से दो हुए और फिर दूसरे से विश्वरूप हो गए।
अगनित रवि ससि सिव चतुरानन।
बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन।।
काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ।
सोउ देखा जो सुना न काऊ।।
अगणित सूर्य, चन्द्रमा, शिव, ब्रह्मा, बहुत से पर्वत, नदियाँ, पृथ्वी, उपवन, वो पदार्थ जो पहले कभी सुने ही नहीं थे वह सब माता कौशल्या को दिखाई दे रहे थे।
देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी ।।
देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही।।
सब प्रकार से प्रभु की माया को देखा और माया भी श्रीभगवान् के सामने भयभीत होकर हाथ जोड़कर खड़ी है। जीव को देखा जिसको माया नचाती है, भक्ति को भी देखा जो माया से जीव को छुड़ा लेती है।
तनु पुलकित मन बचन न आवा।
नयन मूदि चरननि सिरु नावा।
बिसमयवंत देखि महतारी।
भये बहुरि सिसुरूप खरारी।।
कौशल्या जी का शरीर पुलकित हो गया लेकिन मुख से चाह कर भी बोल नहीं पा रहीं। स्थिति ऐसी हो गई कि कुछ समझ नहीं पा रही हैं कि मैं क्या देख रही हूँ? यह क्या हो रहा है? कौशल्या जी इतना घबरा गई कि अन्त में आँखें बँद कर श्रीरामजी के चरणों में सर नवाया। माँ को इस प्रकार आश्चर्य से घबराते हुए देखा तो श्रीभगवान् फिर से बाल रूप हो गए।
अस्तुति करि न जाइ भय माना।
जगत पिता मैं सुत करि जाना।।
माता से स्तुति नहीं की जाती। वो डर गई हैं कि मैंने जगत् पिता परमात्मा को पुत्र समझ लिया। श्रीभगवान् ने कहा कि जो कुछ भी तुमने देखा है वह किसी को बताना नहीं।
हरि जननी बहुबिधि समुझाई।
यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई।।
किसी को बताना नहीं। बताने से सारी लीला बिगड़ जाएगी। श्रीभगवान् अपने भक्तों पर इस प्रकार अद्भुत कृपा करते हैं। जो स्थिति अर्जुन की है वही स्थिति माता कौशल्या की है।
श्रीभगवान् का वह अनन्त रूप कैसा है? स्याही की एक बोतल किसी को मिल जाए। उस स्याही की बोतल में अनन्त शब्द हैं। उस बोतल की स्याही से हम कुछ भी लिख सकते हैं, क्योंकि उस स्याही में अनन्त का निर्माण करने की व्यापकता है। जिस प्रकार स्वर्ण के ढेले से कोई सा भी आभूषण बन सकता है, इस प्रकार श्रीभगवान् का कौन सा नाम रूप हो सकता है। उस अनन्त में जो तुम देखना चाहो, जो तुम स्याही से बनाना चाहो वह बनाते जाओ। अर्जुन भी यही कर रहे हैं। अर्जुन ने पहले कभी जो कल्पना की थी वह सब देख रहे हैं। श्रीभगवान् अनन्त रूप में आ गए।
किरीटिनं(ङ्) गदिनं(ञ्) चक्रिणं(ञ्) च,
तेजोराशिं(म्) सर्वतो दीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां(न्) दुर्निरीक्ष्यं(म्) समन्ताद्-
दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥11.17॥
(मैं) आपको किरीट (मुकुट), गदा, चक्र (तथा शंख और पद्म) धारण किये हुए हुए देख रहा हूँ। (आपको) तेज की राशि, सब ओर प्रकाशवाले, देदीप्यमान अग्नि तथा सूर्य के समान कान्तिवाले, नेत्रोंके द्वारा कठिनतासे देखे जानेयोग्य और सब तरफसे अप्रमेय स्वरूप (देख रहा हूँ)।
त्वमक्षरं(म्) परमं(म्) वेदितव्यं(न्),
त्वमस्य विश्वस्य परं(न्) निधानम्।
त्वमव्ययः(श्) शाश्वतधर्मगोप्ता,
सनातनस्त्वं(म्) पुरुषो मतो मे॥11.18॥
आप (ही) जाननेयोग्य परम अक्षर (अक्षरब्रह्म) हैं, आप (ही) इस सम्पूर्ण विश्वके परम आश्रय हैं, आप (ही) सनातनधर्म के रक्षक हैं (और) आप (ही) अविनाशी सनातन पुरुष हैं - (ऐसा) मैं मानता हूँ।
विवेचन - अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि मैं समझ गया हूँ कि आप ही जानने योग्य हैं। आपके अतिरिक्त किसी और को जानने की आवश्यकता नहीं है। आप परम अक्षर, परम ब्रह्म परमात्मा हैं, आप ही इस जगत् के परम आश्रय हैं। आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं। आप अविनाशी हैं और आप सनातन पुरुष हैं।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम्,
अनन्तबाहुं(म्) शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां(न्) दीप्तहुताशवक्त्रं(म्),
स्वतेजसा विश्वमिदं(न्) तपन्तम्॥11.19॥
आपको (मैं) आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओंवाले, चन्द्र और सूर्य रूप नेत्रोंवाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुखोंवाले (और) अपने तेजसे संसारको तपाते करते हुए देख रहा हूँ।
विवेचन - अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि हे परमेश्वर! मैं आदि, अन्त, मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्यवान, अनन्त भुजाओं वाले, प्रज्वलित चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र हैं, अग्नि रुप मुख वाले रूप में देख रहा हूँ। आप अपने तेज से इस विश्व को सन्तप्त कर रहे हैं। आपके तेज से यह विश्व जला जा रहा है।
सोलहवें श्लोक में श्रीभगवान् को अर्जुन ने अनादि कहा है, वहाँ पर आकार भाव के लिए अनादि शब्द का प्रयोग किया गया है।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
यहाँ इस श्लोक में ना आदि, ना मध्य, ना अन्त का प्रयोग काल भाव से किया है।
भक्त प्रहलाद का गीत है
मैं कहता डंके की चोट पर
अपना हरि है हजार हाथ वाला
ओ दीन दयाला
सोलहवें श्लोक में श्रीभगवान् को अर्जुन ने अनादि कहा है, वहाँ पर आकार भाव के लिए अनादि शब्द का प्रयोग किया गया है।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
यहाँ इस श्लोक में ना आदि, ना मध्य, ना अन्त का प्रयोग काल भाव से किया है।
भक्त प्रहलाद का गीत है
मैं कहता डंके की चोट पर
अपना हरि है हजार हाथ वाला
ओ दीन दयाला
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं(म्) हि,
व्याप्तं(न्) त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
दृष्ट्वाद्भुतं(म्) रूपमुग्रं(न्) तवेदं(म्),
लोकत्रयं(म्) प्रव्यथितं(म्) महात्मन्॥11.20॥
हे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका अन्तराल और सम्पूर्ण दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं। आपके इस अद्भुत (और) उग्ररूपको देखकर तीनों लोक व्यथित (व्याकुल) हो रहे हैं।
विवेचन - अर्जुन श्रीभगवान् को देख रहे हैं। किसी भी दृष्टि से श्रीभगवान् की कोई सीमा नहीं है। अर्जुन कहते हैं कि महात्मन्! स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश और दिशाएँ सब आप से ही परिपूर्ण हैं।
दिशाओं की बात तभी तक होती है जब तक हम इस वायुमण्डल में है। पृथ्वी के वायुमण्डल के बाहर अन्तरिक्ष में कोई दिशा नहीं होती।
अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि सारी दिशाएँ आपमें ही समाहित हैं। आपके इस अलौकिक और भयङ्कर रूप को देखकर तीनों लोक व्यथित हो रहे हैं।
अर्जुन इस समय युद्धभूमि में हैं, युद्ध की स्थिति में हैं। युद्ध को तैयार हैं। अर्जुन ने श्रीभगवान् के उग्र रूप का दर्शन किया। अर्जुन को संसार की उत्पत्ति, प्रलय, क्षय दिखाई दे रहा है। अनेक ब्रह्माण्ड, अनेक लोक, अनेक ग्रह- उपग्रह नित्य बन रहे है और टूट रहे हैं। श्रीभगवान् में मिले जा रहे हैं और फिर से बने जा रहे हैं।
अर्जुन को यह सब भयङ्कर लग रहा है।
दिशाओं की बात तभी तक होती है जब तक हम इस वायुमण्डल में है। पृथ्वी के वायुमण्डल के बाहर अन्तरिक्ष में कोई दिशा नहीं होती।
अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि सारी दिशाएँ आपमें ही समाहित हैं। आपके इस अलौकिक और भयङ्कर रूप को देखकर तीनों लोक व्यथित हो रहे हैं।
अर्जुन इस समय युद्धभूमि में हैं, युद्ध की स्थिति में हैं। युद्ध को तैयार हैं। अर्जुन ने श्रीभगवान् के उग्र रूप का दर्शन किया। अर्जुन को संसार की उत्पत्ति, प्रलय, क्षय दिखाई दे रहा है। अनेक ब्रह्माण्ड, अनेक लोक, अनेक ग्रह- उपग्रह नित्य बन रहे है और टूट रहे हैं। श्रीभगवान् में मिले जा रहे हैं और फिर से बने जा रहे हैं।
अर्जुन को यह सब भयङ्कर लग रहा है।
अमी हि त्वां(म्) सुरसङ्घा विशन्ति,
केचिद्भीताः(फ्) प्राञ्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा:(स्),
स्तुवन्ति त्वां(म्) स्तुतिभिः(फ्) पुष्कलाभिः॥11.21॥
वे ही देवताओं के समुदाय आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। (उनमेंसे) कई तो भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए (आपके नामों और गुणोंका) कीर्तन कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धोंके समुदाय 'कल्याण हो! मंगल हो!' ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रोंके द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं
विवेचन- अर्जुन कहते हैं कि देवताओं के समूह आप में प्रवेश करते हैं। कुछ भयभीत करबद्ध होकर आपके नाम और गुणों का उच्चारण कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धों के समुदाय कल्याण हो! कल्याण हो! कहकर उत्तम स्तोत्रों से आपकी स्तुति करते प्रतीत हो रहे हैं। अर्जुन को देवता भी डरे हुए दिखाई दे रहे है क्योंकि कहा गया है -
जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि
जङ्गल में एक स्त्री अपने पति और पुत्र के साथ खड़ी है। पुत्र को वह स्त्री माँ के रूप में दिखाई देती है। पति को वह पत्नी के रूप में प्रतीत होती है। जङ्गल में कोई शेर आ जाए तो शेर को वह स्त्री भोजन के रूप में दिखाई देगी।
स्त्री वही है पर किसी को माँ, पत्नी और भोजन के रूप में दिखाई देती है अर्थात् यदि दृष्टि बदल जाए तो प्रतीति बदल जाती है।
अध्यारोप बदल जाने से सामने की वस्तु बदल जाती है।
पण्डित जी हवन-पूजा करने पर कहते हैं-
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
यह एक शुद्धिकरण मन्त्र है जिसका अर्थ है कि चाहे कोई व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र और चाहे वह किसी भी स्थिति में हो, यदि वह कमल नेत्र वाले भगवान् श्रीविष्णु का स्मरण करता है, तो वह बाहरी और आन्तरिक रूप से शुद्ध हो जाता है। यह मन्त्र पूजा से पहले स्वयं को और वातावरण को शुद्ध करने के लिए बोला जाता है।
यह दृष्टि है। हमने श्रीभगवान् के स्मरण मात्र से अपने को बाहर और भीतर से पवित्र कर लिया है।
अर्जुन घबराये हुए हैं जिसके कारण उन्हें देवता, सिद्धों, महर्षि के समुदाय भी भयभीत प्रतीत हो रहे हैं।
जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि
जङ्गल में एक स्त्री अपने पति और पुत्र के साथ खड़ी है। पुत्र को वह स्त्री माँ के रूप में दिखाई देती है। पति को वह पत्नी के रूप में प्रतीत होती है। जङ्गल में कोई शेर आ जाए तो शेर को वह स्त्री भोजन के रूप में दिखाई देगी।
स्त्री वही है पर किसी को माँ, पत्नी और भोजन के रूप में दिखाई देती है अर्थात् यदि दृष्टि बदल जाए तो प्रतीति बदल जाती है।
अध्यारोप बदल जाने से सामने की वस्तु बदल जाती है।
पण्डित जी हवन-पूजा करने पर कहते हैं-
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
यह एक शुद्धिकरण मन्त्र है जिसका अर्थ है कि चाहे कोई व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र और चाहे वह किसी भी स्थिति में हो, यदि वह कमल नेत्र वाले भगवान् श्रीविष्णु का स्मरण करता है, तो वह बाहरी और आन्तरिक रूप से शुद्ध हो जाता है। यह मन्त्र पूजा से पहले स्वयं को और वातावरण को शुद्ध करने के लिए बोला जाता है।
यह दृष्टि है। हमने श्रीभगवान् के स्मरण मात्र से अपने को बाहर और भीतर से पवित्र कर लिया है।
अर्जुन घबराये हुए हैं जिसके कारण उन्हें देवता, सिद्धों, महर्षि के समुदाय भी भयभीत प्रतीत हो रहे हैं।
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या-
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा,
वीक्षन्ते त्वां (म्) विस्मिताश्चैव सर्वे॥11.22॥
जो ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, बारह साध्यगण, दस विश्वेदेव और दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुद्गण और गरम गरम भोजन करनेवाले (सात पितृगण) तथा गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्धोंके समुदाय हैं, (वे) सभी चकित होकर आपको देख रहे हैं।
विवेचन - अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि हे महात्मन्! ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, विश्वदेव, दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुत, पितरों के समुदाय, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय भी आप को विस्मित हो कर देख रहे हैं।
दसवें अध्याय में श्रीभगवान् ने जो विभूतियाँ बताई हैं। अर्जुन उन सभी को श्रीभगवान् को स्तुति में गा रहे हैं।
अर्जुन विस्मित भाव से श्रीभगवान् को देख रहे हैं इसलिए उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सभी लोग श्रीभगवान् को विस्मय से देख रहे हैं।
श्रीभगवान् के दर्शन इन इन्द्रियों से करेंगे तो मेरी इन्द्रियाँ जिस भाव से श्रीभगवान् को देखेगी वही रूप दिखाई देगा। श्रीभगवान् का कोई रूप नहीं है। भक्त अपनी भावना से जिस भी भाव को प्रत्यारोपित कर देते हैं श्रीभगवान् का वही रूप हो जाता है।
श्रीभगवान् को जब हम प्रेम भाव से देखते हैं तो श्रीभगवान् प्रेमारोपित हो जाते हैं।
जब हम वात्सल्य भाव से श्रीभगवान् को देखते हैं तो श्रीभगवान् वत्सल रूप धारण कर लेते हैं।
श्रीभगवान् को देखकर अर्जुन को भय का भाव आया तो श्रीभगवान् ने भयङ्कर रूप धारण कर लिया। उस अर्जुन के मन की दृष्टि से उस सृष्टि का निर्माण हुआ। श्रीभगवान् अनन्त हैं, आप उन्हें कोई भी आकार दे सकते हो। श्रीभगवान् ने अर्जुन से कहा कि कोई भी रूप में मुझे देख लो।
दसवें अध्याय में श्रीभगवान् ने जो विभूतियाँ बताई हैं। अर्जुन उन सभी को श्रीभगवान् को स्तुति में गा रहे हैं।
अर्जुन विस्मित भाव से श्रीभगवान् को देख रहे हैं इसलिए उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सभी लोग श्रीभगवान् को विस्मय से देख रहे हैं।
श्रीभगवान् के दर्शन इन इन्द्रियों से करेंगे तो मेरी इन्द्रियाँ जिस भाव से श्रीभगवान् को देखेगी वही रूप दिखाई देगा। श्रीभगवान् का कोई रूप नहीं है। भक्त अपनी भावना से जिस भी भाव को प्रत्यारोपित कर देते हैं श्रीभगवान् का वही रूप हो जाता है।
श्रीभगवान् को जब हम प्रेम भाव से देखते हैं तो श्रीभगवान् प्रेमारोपित हो जाते हैं।
जब हम वात्सल्य भाव से श्रीभगवान् को देखते हैं तो श्रीभगवान् वत्सल रूप धारण कर लेते हैं।
श्रीभगवान् को देखकर अर्जुन को भय का भाव आया तो श्रीभगवान् ने भयङ्कर रूप धारण कर लिया। उस अर्जुन के मन की दृष्टि से उस सृष्टि का निर्माण हुआ। श्रीभगवान् अनन्त हैं, आप उन्हें कोई भी आकार दे सकते हो। श्रीभगवान् ने अर्जुन से कहा कि कोई भी रूप में मुझे देख लो।
रूपं (म्) महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं(म्),
महाबाहो बहुबाहूरुपादम्।
बहूदरं(म्) बहुदंष्ट्राकरालं(न्),
दृष्ट्वा लोकाः(फ्) प्रव्यथितास्तथाहम्॥11.23॥
हे महाबाहो! आपके बहुत मुखों और नेत्रोंवाले, बहुत भुजाओं, जंघाओं और चरणोंवाले, बहुत उदरोंवाले (और) बहुत विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूपको देखकर सब प्राणी व्यथित हो रहे हैं तथा मैं भी (व्यथित हो रहा हूँ)।
विवेचन - अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि हे महाबाहो! आपके बहुत से मुख हैं, बहुत से नेत्र हैं, अनेक हाथ, पैर और उदर हैं।आपके विकराल दाढ़ों को देखकर सभी लोग व्याकुल हो रहे है और मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।
यदि किसी कथा में आपको आनन्द आता है तो आपको प्रतीत होता है कि कथा में उपस्थित सभी लोगों को कथा में आनन्द आ रहा है। यदि आपको कथा में आनन्द नहीं आता, मन नहीं लगता तो, आप समझते हैं कि सभी को आनन्द नहीं आ रहा।
जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि
अर्जुन की भी ऐसी ही स्थिति है। वे श्रीभगवान् के भयङ्कर स्वरूप का अनुभव करते है जिसके कारण उन्हें प्रतीत होता है कि श्रीभगवान् के विशाल स्वरूप को देखकर सभी भयभीत हो रहे हैं। वे व्याकुल हो रहे हैं।
यदि किसी कथा में आपको आनन्द आता है तो आपको प्रतीत होता है कि कथा में उपस्थित सभी लोगों को कथा में आनन्द आ रहा है। यदि आपको कथा में आनन्द नहीं आता, मन नहीं लगता तो, आप समझते हैं कि सभी को आनन्द नहीं आ रहा।
जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि
अर्जुन की भी ऐसी ही स्थिति है। वे श्रीभगवान् के भयङ्कर स्वरूप का अनुभव करते है जिसके कारण उन्हें प्रतीत होता है कि श्रीभगवान् के विशाल स्वरूप को देखकर सभी भयभीत हो रहे हैं। वे व्याकुल हो रहे हैं।
नभःस्पृशं(न्) दीप्तमनेकवर्णं(म्),
व्यात्ताननं(न्) दीप्तविशालनेत्रम्।
दृष्ट्वा हि त्वां(म्) प्रव्यथितान्तरात्मा,
धृतिं(न्) न विन्दामि शमं(ञ्) च विष्णो॥11.24॥
क्योंकि हे विष्णो! (आपके) देदीप्यमान अनेक वर्ण हैं, आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैं अर्थात् सब तरफसे बहुत बड़े हैं, आपका मुख फैला हुआ है, आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं। (ऐसे) आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला (मैं) धैर्य और शान्ति को प्राप्त नहीं हो रहा हूँ।
विवेचन - अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि हे विष्णो ! आकाश को स्पर्श करने वाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त, फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपके स्वरूप को देखकर मेरा अन्तःकरण भयभीत हो रहा है। मुझे धीरज और शान्ति नहीं मिल रही। मुझे तो लगा था कि आपका स्वरूप देखकर मुझे बहुत आनन्द होगा किन्तु यह तो मेरी सोच के विपरीत हो रहा है। मुझे आपका स्वरूप देखकर बहुत भय लग रहा है। आप बहुत भयङ्कर हैं और आप सबका भक्षण कर रहे हैं। सभी लोग भयभीत हो रहे हैं। देवता भी हाथ जोड करबद्ध खड़े हैं।
ऋषि मुनि आपकी प्रशंसा कर रहे हैं कि आप प्रसन्न हो जाएँ पर आप तो मुस्कुरा भी नहीं रहे। आप विकराल रूप धारण कर किए हैं।
ऋषि मुनि आपकी प्रशंसा कर रहे हैं कि आप प्रसन्न हो जाएँ पर आप तो मुस्कुरा भी नहीं रहे। आप विकराल रूप धारण कर किए हैं।
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि,
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म,
प्रसीद देवेश जगन्निवास॥11.25॥
आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक) मुखोंको देखकर (मुझे) न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल रही है। (इसलिये) हे देवेश! हे जगन्निवास! (आप) प्रसन्न होइये।
विवेचन -अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि भयङ्कर दाढ़ों के कारण आपका विकराल मुख प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा है। उस विकराल मुख को देखकर मुझे दिशा भ्रम हो रहा है और मुझे कोई सुख भी प्राप्त नहीं हो रहा है इसलिए हे जगन्निवास ! हे परमात्मा !आप प्रसन्न हों।
अमी च त्वां(न्) धृतराष्ट्रस्य पुत्राः(स्),
सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः।
भीष्मो द्रोणः(स्) सूतपुत्रस्तथासौ,
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥11.26॥
हमारे पक्षके मुख्य-मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म, द्रोण और वह कर्ण भी आपमें (प्रविष्ट हो रहे हैं)। राजाओंके समुदायोंके सहित धृतराष्ट्रके वे ही सब के सब पुत्र,
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति,
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु,
सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गै:॥11.27॥
आपके विकराल दाढ़ोंके कारण भयंकर मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रविष्ट हो रहे हैं। (उनमें से) कई एक तो चूर्ण हुए सिरों सहित (आपके) दाँतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।
विवेचन - अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि मैं देख रहा हूँ कि धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश कर रहे हैं। इनके साथ में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, सूत पुत्र कर्ण और हमारे पक्ष के बहुत से प्रधान योद्धा भी आपके भयानक दाढ़ों वाले विकराल मुखों में से तीव्र वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कुछ के उत्तम अङ्ग उनके सिरों सहित आपके दाँतों के बीच दबकर चूर्ण हो गए हैं और वह चूर्ण दाँतो के बीच लगा हुआ दिख रहा है।
सातवें श्लोक में श्रीभगवान् ने अर्जुन से कहा कि जो तू देखना चाहता है वैसा देख।
यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि
अर्जुन योद्धा हैं। वे शत्रु का विनाश देखना चाहते हैं। श्रीभगवान् ने कहा तू जैसा देखना चाहता है वैसा ही देख लो। जो विचार उनके मन में आया वह प्रकट हो गया। जब अर्जुन ने अपने मन में विनाश की परिकल्पना चित्रित की तो उस चित्र को देखकर अर्जुन स्वयं ही डर गए। अर्जुन को लगा सब लोग मरने वाले हैं।
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।
झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।।
कबीर दास जी कहते हैं कि कौन बचने वाला है? कोई काल के मुख में बैठा है तो कोई गोदी में बैठा है।
मृत्यु तो सबकी अवश्यम्भावी है।
माली आवत देखकर, कलियाँ करें पुकार ।
फूले फूले चुन लिए , काल हमारी बार।।
अर्जुन को लग रहा है कि सब लोग मर रहे हैं। वास्तविकता में श्रीभगवान् कुछ नहीं कर रहे हैं। अर्जुन को वही दिख रहा है जो वे देखना चाहते हैं।
सातवें श्लोक में श्रीभगवान् ने अर्जुन से कहा कि जो तू देखना चाहता है वैसा देख।
यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि
अर्जुन योद्धा हैं। वे शत्रु का विनाश देखना चाहते हैं। श्रीभगवान् ने कहा तू जैसा देखना चाहता है वैसा ही देख लो। जो विचार उनके मन में आया वह प्रकट हो गया। जब अर्जुन ने अपने मन में विनाश की परिकल्पना चित्रित की तो उस चित्र को देखकर अर्जुन स्वयं ही डर गए। अर्जुन को लगा सब लोग मरने वाले हैं।
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।
झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।।
कबीर दास जी कहते हैं कि कौन बचने वाला है? कोई काल के मुख में बैठा है तो कोई गोदी में बैठा है।
मृत्यु तो सबकी अवश्यम्भावी है।
माली आवत देखकर, कलियाँ करें पुकार ।
फूले फूले चुन लिए , काल हमारी बार।।
अर्जुन को लग रहा है कि सब लोग मर रहे हैं। वास्तविकता में श्रीभगवान् कुछ नहीं कर रहे हैं। अर्जुन को वही दिख रहा है जो वे देखना चाहते हैं।
यथा नदीनां(म्) बहवोऽम्बुवेगाः(स्),
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।
तथा तवामी नरलोकवीरा,
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥11.28॥
जैसे नदियोंके बहुत-से जलके प्रवाह (स्वाभाविक) ही समुद्रके सम्मुख दौड़ते हैं, ऐसे ही वे संसारके महान् शूरवीर आपके सब तरफ से देदीप्यमान मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं।
विवेचन- जैसे नदियों का जल प्रवाह स्वाभाविक रूप से समुद्र की ओर दौड़ता है अर्थात् समुद्र में प्रवेश करता है वैसे ही नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे है।
अर्जुन की यह घबराहट स्वाभाविक है क्योंकि वे द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह को मरते हुए नहीं देखना चाहते। वे जानते हैं कि यह होने वाला है। इसलिये इस दृश्य को देखकर वह घबरा रहे हैं।
हरिनाम सङ्कीर्तन के साथ विवेचन सत्र का समापन हुआ और प्रश्नोत्तर आरम्भ हुआ।
अर्जुन की यह घबराहट स्वाभाविक है क्योंकि वे द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह को मरते हुए नहीं देखना चाहते। वे जानते हैं कि यह होने वाला है। इसलिये इस दृश्य को देखकर वह घबरा रहे हैं।
हरिनाम सङ्कीर्तन के साथ विवेचन सत्र का समापन हुआ और प्रश्नोत्तर आरम्भ हुआ।
विचार-मन्थन (प्रश्नोत्तर)-
प्रश्नकर्ता- गोपाल जी
प्रश्न- सातवें अध्याय के सोलहवें श्लोक (7.16) को थोड़ा समझा दीजिए।
उत्तर- इस श्लोक में चार प्रकार के भक्तों के बारे में बताया गया है।
1.आर्त भक्त- जो शारीरिक या मानसिक सन्ताप,विपत्ति से व्यग्र, व्याकुल होकर भगवान् का भजन करते हैं।
2.अर्थार्थी भक्त- जो केवल मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा आदि सांसारिक कामना पूर्ति के लिए भगवान् का भजन करते हैं।
3.जिज्ञासु भक्त- सांसारिक कामना पूर्ति की उपेक्षा करके एकमात्र परमात्मा को तत्त्व से जानने की इच्छा से भगवान् का भजन करते हैं।
4.ज्ञानी भक्त- जिनकी दृष्टि में परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। जिनकी समस्त कामनाएँ निःशेषरूप से समाप्त हो चुकी हैं। जो सहज भाव से ही परमात्मा का भजन करते हैं।
इस श्लोक में श्रीभगवान् की उदारता के बारे में बताया गया है। वे सभी लक्षणों वाले भक्त को स्वीकार करते हैं।
प्रश्न- श्रीभगवान् ने अर्जुन को विश्वरूप क्यों दिखाया था? क्या अपनी माया दिखाने के लिए ?
उत्तर- नहीं! श्रीभगवान् ने अर्जुन की इच्छा पर, आग्रह पर विश्वरूप दिखाया था। दसवें अध्याय में अर्जुन के आग्रह पर विभूतियों का विस्तार से वर्णन किया था। ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन के प्रार्थना करने पर श्रीभगवान् ने उनको अपने विश्वरूप के दर्शन करवाये हैं ।
प्रश्नकर्ता- सुभाषिणी जी
प्रश्न- क्या धृतराष्ट्र को विश्वरूप दर्शन हुए थे ?
उत्तर- नहीं! धृतराष्ट्र को विश्वरूप दर्शन नहीं हुए थे। उन्हें सञ्जय द्वारा विवरण सुनाया गया था।
प्रश्नकर्ता- सुबोध जी
प्रश्न- श्रीहनुमान जी को केसरीनंदन,पवनपुत्र और रुद्रस्वरूप कहा जाता हैं, थोड़ा समझा दीजिए।
उत्तर- श्रीहनुमान जी केसरी के पुत्र हैं, पवन देव के अंश एवं महादेव के अवतार हैं, इसलिये उनके ये नाम हैं।
प्रश्न- सातवें अध्याय के सोलहवें श्लोक (7.16) को थोड़ा समझा दीजिए।
उत्तर- इस श्लोक में चार प्रकार के भक्तों के बारे में बताया गया है।
1.आर्त भक्त- जो शारीरिक या मानसिक सन्ताप,विपत्ति से व्यग्र, व्याकुल होकर भगवान् का भजन करते हैं।
2.अर्थार्थी भक्त- जो केवल मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा आदि सांसारिक कामना पूर्ति के लिए भगवान् का भजन करते हैं।
3.जिज्ञासु भक्त- सांसारिक कामना पूर्ति की उपेक्षा करके एकमात्र परमात्मा को तत्त्व से जानने की इच्छा से भगवान् का भजन करते हैं।
4.ज्ञानी भक्त- जिनकी दृष्टि में परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। जिनकी समस्त कामनाएँ निःशेषरूप से समाप्त हो चुकी हैं। जो सहज भाव से ही परमात्मा का भजन करते हैं।
इस श्लोक में श्रीभगवान् की उदारता के बारे में बताया गया है। वे सभी लक्षणों वाले भक्त को स्वीकार करते हैं।
प्रश्न- श्रीभगवान् ने अर्जुन को विश्वरूप क्यों दिखाया था? क्या अपनी माया दिखाने के लिए ?
उत्तर- नहीं! श्रीभगवान् ने अर्जुन की इच्छा पर, आग्रह पर विश्वरूप दिखाया था। दसवें अध्याय में अर्जुन के आग्रह पर विभूतियों का विस्तार से वर्णन किया था। ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन के प्रार्थना करने पर श्रीभगवान् ने उनको अपने विश्वरूप के दर्शन करवाये हैं ।
प्रश्नकर्ता- सुभाषिणी जी
प्रश्न- क्या धृतराष्ट्र को विश्वरूप दर्शन हुए थे ?
उत्तर- नहीं! धृतराष्ट्र को विश्वरूप दर्शन नहीं हुए थे। उन्हें सञ्जय द्वारा विवरण सुनाया गया था।
प्रश्नकर्ता- सुबोध जी
प्रश्न- श्रीहनुमान जी को केसरीनंदन,पवनपुत्र और रुद्रस्वरूप कहा जाता हैं, थोड़ा समझा दीजिए।
उत्तर- श्रीहनुमान जी केसरी के पुत्र हैं, पवन देव के अंश एवं महादेव के अवतार हैं, इसलिये उनके ये नाम हैं।
।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।।