विवेचन सारांश
जीवन में त्याग का महत्त्व
आज के विवेचन सत्र का प्रारम्भ मधुर मधुराष्टकम से हुआ। श्री हनुमान चालीसा के पश्चात् दीप प्रज्वलन किया गया। श्रीभगवान् की अतिशय मङ्गलमय कृपा से हम सब लोगों का ऐसा सद्भाग्य जाग्रत हुआ है जो हम लोग अपने जीवन को सुफल, सार्थक करने के लिए, अपने प्रमुख लक्ष्य को पाने के लिए अपने इहलौकिक और पारलौकिक जीवन में अपनी उन्नति करने के लिए, मानव जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, पठन-पाठन तथा अध्ययन में, उसके विवेचन को सुनने में और कण्ठस्थ करने में, उसके सूत्रों को समझकर जीवन में लाने के लिए, हम लोग प्रयास कर रहे हैं।
बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥
यह बात हम सबने सुनी है कि मनुष्य जन्म अत्यन्त दुर्लभता से मिलता है । और इस मनुष्य शरीर में सत्सङ्ग मिलना उससे भी बड़ी बात है।
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
बिना सत्सङ्ग के विवेक नहीं होता। विवेक की जागृति बिना सत्सङ्ग के सम्भव ही नहीं है। मात्र पुस्तक पढ़ने या पूजा करने से मनुष्य के विवेक की जाग्रति नहीं हो सकती। सत्सङ्ग आवश्यक है। परन्तु अच्छे लोगों का सङ्ग अपनी बुद्धि से नहीं मिलता। यह भी श्रीभगवान् की कृपा से ही मिलता है। उनकी कृपा से ही मनुष्य को सत्सङ्ग में रूचि आती है। हममें से कितने लोग भगवद्गीता का प्रचार करते हैं, लोगों को गीता पठन के लिए बुलाते हैं परन्तु बहुत कम लोग ही आते हैं। उनको भगवद्गीता में रस मिलना भी श्रीभगवान् की कृपा से ही होता है।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।
अतः यह श्रीभगवान् की कृपा ही माननी है कि हम भगवद्गीता पढ़ने के लिए चुने गए हैं। बिना उनकी कृपा के कोई इस कक्षा में आ ही नहीं सकता। हम चुने हुए कृपा पात्र हैं अतः यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि हमारा कल्याण पक्का है। सन्त महापुरुषों ने कहा है कि जो भी एक बार गीता जी में प्रवृत्त हो गया, उसकी अवनति/दुर्गति नहीं हो सकती। पूज्य स्वामी जी कहते हैं कि यदि हम अन्तिम समय तक गीता जी पढ़ते रहेंगे तो अगला जन्म भी मनुष्य जन्म ही मिलेगा। हम गधा, घोड़ा, कुत्ता, बिल्ली आदि अन्य कोई भी पशु योनि में जन्म नहीं लेंगे।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।।
श्रीभगवान् कहते हैं कि मैं योगभ्रष्ट लोगों को श्रीमान् लोगों के घर में जन्म देता हूँ। अतः हमारा क्या होगा, इस बात की चिन्ता मन से निकाल देनी चाहिए। जो होगा अच्छा ही होगा। बस हमें गीता जी का हाथ पकड़े रहना है। हाथ छोड़ते ही मन भटक जाएगा।
जैसी प्रीती कुटुम्ब की, तैसी गुरु सों होय ।
कहैं कबीर ता दास का, पला न पकडै कोय ।।
कहैं कबीर ता दास का, पला न पकडै कोय ।।
अट्ठारहवाँ अध्याय गीता जी का सारभूत अध्याय है। ज्ञानेश्वर महाराज ने इस अध्याय को एकद गीता कहा है। इस अध्याय का आरम्भ अर्जुन के एक प्रश्न से हुआ है। अर्जुन त्याग और संन्यास में अन्तर जानना चाहते हैं। ये दोनों शब्द एक जैसे ही लगते हैं।
मूल रूप से त्याग दो बातों का होता है-
एक पदार्थ का और दूसरा क्रिया का।
एक पदार्थ का और दूसरा क्रिया का।
मुख्यतः दो ही बातें प्रयोग की जाती हैं, हम ऐसा नहीं करेंगे अथवा हम इस वस्तु का उपयोग नहीं करेंगे। श्रीमद्भवद्गीता में दोनों बातों का प्रयोग क्रिया के लिए हुआ है, पदार्थ के लिए नहीं। श्रीभगवान् क्रिया का त्याग, स्वरुप से करने के लिए नहीं कहते। वे कहते हैं कि क्रिया का नहीं उसके फल का त्याग कर दो, फल इच्छा का त्याग कर दो।
रोगी को मन्दिर लेकर जायेंगे अथवा अस्पताल, गरीब को दूध पिलायेंगे अथवा शिवजी पर चढ़ाएंगे, ऐसी सभी बातें हमें भ्रमित करने वाली हैं, सत्कर्मों से हटाने वाली हैं। हम दोनों ही अच्छे कार्य भी तो कर सकते हैं। गरीब को दूध पिलाना है तो हम अपने हिस्से का दूध पिला सकते हैं, शिवजी के हिस्से वाला दूध ही क्यों? नियत कर्मों का त्याग करना अत्यन्त सरल प्रतीत होता है। जैसे हम सोचते हैं कि श्रीभगवान् को क्या अन्तर पड़ता है कि हम नहाये अथवा नहीं, मन्दिर गए अथवा नहीं। हम सोचते हैं कि मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा। परन्तु हम ये भूल जाते हैं कि यह बात कहने वाले कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। यह वचन किसके हैं, हमें यह पता होना चाहिए। ये वचन महान सन्त रविदास जी के हैं। क्या हम उनसे अपनी बराबरी कर सकते हैं? वो साधक नहीं थे, सिद्ध थे। मीराबाई जी के गुरु थे। जिनको मीराबाई जी ने अपना गुरु बनाया हो, उनकी सिद्धता का क्या अवलोकन किया जा सकता है?
रविदास जी चर्मकार थे,जूते बनाने का काम किया करते थे। एक दिन वह अपनी दुकान पर बैठे कार्य कर रहे थे कि एक व्यक्ति अपने जूते ठीक करवाने वहाँ आया। वह कहने लगा कि मेरे जूते शीघ्रता से ठीक कर दो। मुझे गङ्गा स्नान के लिए देर हो रही है। रविदास जी ने कहा कि मैं शीघ्र ही कार्य कर देता हूँ। मैं आपको देर नहीं होने दूंगा और शीघ्र ही उन्होंने जूता ठीक कर दे दिया। उस व्यक्ति ने उन्हें एक धेले का शुल्क दे दिया। रविदास जी ने वह धेला उस व्यक्ति को देते हुए कहा कि यह मेरी ओर से गङ्गा जी में चढ़ा देना। वह व्यक्ति धेला लेकर चला गया। जब वह गङ्गा जी में स्नान कर अपनी ओर से कुछ चढ़ाने लगा तो उसे रविदास जी का दिया हुआ धेला भी स्मरण हो आया। ज्यों ही वह धेला गङ्गा जी में चढ़ाने लगा, गङ्गा जी से एक हाथ बाहर आया और धेला लेकर चला गया। पुनः बाहर आकर उस हाथ ने एक स्वर्ण जड़ित कङ्गन व्यक्ति को दिया और उसे रविदास जी को देने को कहा। वह व्यक्ति यह सब देखकर आश्चर्चकित था। यह स्वर्गलोक का दिव्य कङ्गन था। ऐसा कङ्गन उसने कभी नहीं देखा था। उसके मन में लालच आ गया। उसने सोचा कि उस चमार को क्या पता कि गङ्गा जी ने कङ्गन दिया है। मैं इसे बाजार में बेच आता हूँ। परन्तु शहर के सभी सुनारों ने कहा कि यह तो अनमोल है। हम इसका मूल्य देने में असमर्थ हैं। तुम राजा के पास जाओ, वही इसका मूल्य दे सकते हैं। व्यक्ति राजा के पास पहुँचा। राजा ने कङ्गन देखते ही कहा कि यह तो अद्भुत कङ्गन है। तुम जो माँगोगे, मैं इसका मूल्य दूंगा। पर इससे पहले मैं इसे अपनी रानी को दिखाना चाहता हूँ। रानी कङ्गन देखते ही प्रसन्न हो गयी परन्तु फिर रानी ने पूछा कि दूसरा कङ्गन कहाँ है? राजा वापस दरबार में गया और उस व्यक्ति से दूसरे कङ्गन के विषय में पूछा। व्यक्ति ने मना करते हुए कहा कि मेरे पास दूसरा कङ्गन नहीं है। राजा ने उसे डाँटा कि तुमने चोरी की है। व्यक्ति ने कहा, नहीं, मैंने चोरी नहीं की है। तब राजा ने कहा कि तो जहाँ से एक कङ्गन लाये हो, वहीं से दूसरा भी लेकर आओ और धमकाया कि नहीं लाये तो तेरे प्राण ले लूंगा और ले आये तो तुम्हें अपना आधा राज्य दे दूंगा। वह व्यक्ति रोते-रोते गङ्गा जी के पास गया तो गङ्गा जी ने कहा कि तुम सन्त रविदास जी के पास जाओ। वह बहुत लज्जित था कि उसने रविदास जी के साथ छल किया था। परन्तु उसके पास कोई अन्य उपाय नहीं था। वह रविदास जी के पास जाकर उनके पैरों में पड़ गया।
रोगी को मन्दिर लेकर जायेंगे अथवा अस्पताल, गरीब को दूध पिलायेंगे अथवा शिवजी पर चढ़ाएंगे, ऐसी सभी बातें हमें भ्रमित करने वाली हैं, सत्कर्मों से हटाने वाली हैं। हम दोनों ही अच्छे कार्य भी तो कर सकते हैं। गरीब को दूध पिलाना है तो हम अपने हिस्से का दूध पिला सकते हैं, शिवजी के हिस्से वाला दूध ही क्यों? नियत कर्मों का त्याग करना अत्यन्त सरल प्रतीत होता है। जैसे हम सोचते हैं कि श्रीभगवान् को क्या अन्तर पड़ता है कि हम नहाये अथवा नहीं, मन्दिर गए अथवा नहीं। हम सोचते हैं कि मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा। परन्तु हम ये भूल जाते हैं कि यह बात कहने वाले कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। यह वचन किसके हैं, हमें यह पता होना चाहिए। ये वचन महान सन्त रविदास जी के हैं। क्या हम उनसे अपनी बराबरी कर सकते हैं? वो साधक नहीं थे, सिद्ध थे। मीराबाई जी के गुरु थे। जिनको मीराबाई जी ने अपना गुरु बनाया हो, उनकी सिद्धता का क्या अवलोकन किया जा सकता है?
रविदास जी चर्मकार थे,जूते बनाने का काम किया करते थे। एक दिन वह अपनी दुकान पर बैठे कार्य कर रहे थे कि एक व्यक्ति अपने जूते ठीक करवाने वहाँ आया। वह कहने लगा कि मेरे जूते शीघ्रता से ठीक कर दो। मुझे गङ्गा स्नान के लिए देर हो रही है। रविदास जी ने कहा कि मैं शीघ्र ही कार्य कर देता हूँ। मैं आपको देर नहीं होने दूंगा और शीघ्र ही उन्होंने जूता ठीक कर दे दिया। उस व्यक्ति ने उन्हें एक धेले का शुल्क दे दिया। रविदास जी ने वह धेला उस व्यक्ति को देते हुए कहा कि यह मेरी ओर से गङ्गा जी में चढ़ा देना। वह व्यक्ति धेला लेकर चला गया। जब वह गङ्गा जी में स्नान कर अपनी ओर से कुछ चढ़ाने लगा तो उसे रविदास जी का दिया हुआ धेला भी स्मरण हो आया। ज्यों ही वह धेला गङ्गा जी में चढ़ाने लगा, गङ्गा जी से एक हाथ बाहर आया और धेला लेकर चला गया। पुनः बाहर आकर उस हाथ ने एक स्वर्ण जड़ित कङ्गन व्यक्ति को दिया और उसे रविदास जी को देने को कहा। वह व्यक्ति यह सब देखकर आश्चर्चकित था। यह स्वर्गलोक का दिव्य कङ्गन था। ऐसा कङ्गन उसने कभी नहीं देखा था। उसके मन में लालच आ गया। उसने सोचा कि उस चमार को क्या पता कि गङ्गा जी ने कङ्गन दिया है। मैं इसे बाजार में बेच आता हूँ। परन्तु शहर के सभी सुनारों ने कहा कि यह तो अनमोल है। हम इसका मूल्य देने में असमर्थ हैं। तुम राजा के पास जाओ, वही इसका मूल्य दे सकते हैं। व्यक्ति राजा के पास पहुँचा। राजा ने कङ्गन देखते ही कहा कि यह तो अद्भुत कङ्गन है। तुम जो माँगोगे, मैं इसका मूल्य दूंगा। पर इससे पहले मैं इसे अपनी रानी को दिखाना चाहता हूँ। रानी कङ्गन देखते ही प्रसन्न हो गयी परन्तु फिर रानी ने पूछा कि दूसरा कङ्गन कहाँ है? राजा वापस दरबार में गया और उस व्यक्ति से दूसरे कङ्गन के विषय में पूछा। व्यक्ति ने मना करते हुए कहा कि मेरे पास दूसरा कङ्गन नहीं है। राजा ने उसे डाँटा कि तुमने चोरी की है। व्यक्ति ने कहा, नहीं, मैंने चोरी नहीं की है। तब राजा ने कहा कि तो जहाँ से एक कङ्गन लाये हो, वहीं से दूसरा भी लेकर आओ और धमकाया कि नहीं लाये तो तेरे प्राण ले लूंगा और ले आये तो तुम्हें अपना आधा राज्य दे दूंगा। वह व्यक्ति रोते-रोते गङ्गा जी के पास गया तो गङ्गा जी ने कहा कि तुम सन्त रविदास जी के पास जाओ। वह बहुत लज्जित था कि उसने रविदास जी के साथ छल किया था। परन्तु उसके पास कोई अन्य उपाय नहीं था। वह रविदास जी के पास जाकर उनके पैरों में पड़ गया।
सन्त ह्रदय नवनीत समाना।
सन्त का हृदय तो एकदम कोमल होता है। उन्होंने कहा तुमने कोई भी अपराध किया हो, मैं तुम पर कोई क्रोध नहीं करूँगा और उससे रोने के कारण पूछा। उसने सारी बात बता दी और कहा कि मुझे आप दूसरा कङ्गन दिला दें नहीं तो राजा मेरे प्राण ले लेंगे। सन्त ने कहा परन्तु मेरे पास तो कङ्गन नहीं है तो मैं तुम्हें कहाँ से दूँगा ? व्यक्ति ने कहा कि मैं गङ्गा जी के पास गया था तो उन्होंने कहा कि आप ही मुझे दूसरा कङ्गन दे सकते हैं। सन्त ने कहा कि यदि ऐसा है तो चलो गङ्गा जी से प्रार्थना करके दूसरा कङ्गन ले आते हैं। रविदास जी चलने लगे तो उनके मन में बात आयी कि
मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा।
वहीँ पास में लकड़ी का पात्र रखा हुआ था जिसमें वे जल रखते थे। उसमें उन्होंने जल रखा और गङ्गा जी से प्रार्थना की, कि "हे गङ्गा माता! यह व्यक्ति बड़े सङ्कट में है, इसका सङ्कट हरो।" उस पात्र में से वही हाथ प्रकट हुआ। उस हाथ में स्वर्णजड़ित दूसरा कङ्गन था। वह कङ्गन लेकर रविदास जी ने व्यक्ति को दे दिया। अब वह व्यक्ति इतना लज्जित था कि कङ्गन लेकर राजा के पास गया, उन्हें कङ्गन दिया और बिना कोई धन लिए वहाँ से चला गया।
तब से यह कहावत प्रसिद्ध हुई कि "मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा।"
परन्तु यह बात कहने का अधिकार तो उसी को ही है जिसका मन चंगा है। जिसके मन में पाप, कपट, झूठ, क्लेश, द्वेष, छल नहीं है।
तब से यह कहावत प्रसिद्ध हुई कि "मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा।"
परन्तु यह बात कहने का अधिकार तो उसी को ही है जिसका मन चंगा है। जिसके मन में पाप, कपट, झूठ, क्लेश, द्वेष, छल नहीं है।
"जिसने मेरी हानि की, मैं उस पर भी उपकार करूँ"
इस भावना को ही कहते हैं, मन चङ्गा।
इस भावना को ही कहते हैं, मन चङ्गा।
पूज्य स्वामी जी कहते हैं कि लोग कहते हैं कि मैं self made हूँ। मैंने सब अपने-आप किया है। स्वामी जी कहते हैं कि कोई व्यक्ति sefl made हो ही नहीं सकता। हम सबके जीवन में अनेकों जन के उपकार होते हैं। पता नहीं कितने लोगों ने मुझे अपने जीवन में सहायता दे-दे कर आगे बढ़ाया होगा। उन्हें हमसे कोई अपेक्षा भी नहीं होती। उन्होंने हम पर निस्वार्थ उपकार कर दिए होते हैं। वे बदले में कुछ नहीं चाहते और हम उन्हें बदले में कुछ दे भी नहीं पाए। हम में से ऐसा कौन है जिसके जीवन में ऐसे बहुत सारे व्यक्ति नहीं हैं? परन्तु हम उनके उपकारों को स्मरण करते हैं, यही कृतज्ञता है, यही मनुष्यता है। जिसमें कृतज्ञता नहीं, वह मनुष्य कहलाने लायक नहीं है। जीवन में ऐसे लोगों को बारम्बार याद करते रहना और अपनी अगली पीढ़ी को बताते रहना कि मैं आज जो कुछ हूँ, उनके उपकार के ही कारण हूँ। मेरे स्कूल की फीस उन्होंने दी थी, मुझे दुकान उन्होंने दिलवायी थी, मुझे मकान उन्होंने दिलवाया था, मेरा काम उन्होंने करवाया था अन्यथा काम होता ही नहीं, मुझमें बल नहीं था उन्होंने मुझे साहस दिया तब ही काम हो पाया, आदि अनेक बातें स्मरण करते रहना चाहिए। यह सब हमारे जीवन में कई बार घटित हुआ है परन्तु हम भूल जाते हैं इसलिए हमारा मन चङ्गा नहीं होता। जीवन में किसी व्यक्ति को यह अभिमान नहीं होना चाहिए कि मैं self made हूँ। हम सब दूसरों के उपकारों से उपकृत लोग हैं। दूसरों द्वारा किये गए उपकारों को स्मरण करते रहने से हमारा मन विनम्र बना रहता है। कृतज्ञता हमें मनुष्य बनाती है।
धर्मकार्यों को किसी भी बहाने से टालना नहीं चाहिए। श्रीभगवान् ने काम्य कर्मो के त्याग की बात कही है, निषिद्ध कर्मों के त्याग की बात की है, नियत कर्मों के त्याग की नहीं। लोग कहते हैं कि वे मानसिक स्नान कर लेंगे, मानसिक पूजा कर लेंगे, स्वामी जी कहते हैं कि ऐसे लोग मानसिक भोजन क्यों नहीं करते? जो मानसिक भोजन से काम चला सकता है उसे ही मानसिक पूजा करने का अधिकार है।
श्रीभगवान् ने गीता में सात्विक,राजसिक और तामसिक ऐसा क्रम लिया है। परन्तु यहाँ पर पहले तामसिक, राजसिक तब सात्विक का क्रम ले रहे हैं। इसका विशेष कारण है। जब श्रीभगवान् भोजन की बात करते हैं तो सबसे पहले सात्विक की बात करते हैं और जब त्याग की बात करते हैं तो पहले तामसिक कर्म के त्याग की बात करते हैं। जहाँ भी कुछ ग्रहण करने की बात है वहाँ श्रीभगवान् ने सात्विक लिया और जहाँ त्याग की बात आयी तो श्रीभगवान् ने कहा कि पहले तामसिक त्यागो।
धर्मकार्यों को किसी भी बहाने से टालना नहीं चाहिए। श्रीभगवान् ने काम्य कर्मो के त्याग की बात कही है, निषिद्ध कर्मों के त्याग की बात की है, नियत कर्मों के त्याग की नहीं। लोग कहते हैं कि वे मानसिक स्नान कर लेंगे, मानसिक पूजा कर लेंगे, स्वामी जी कहते हैं कि ऐसे लोग मानसिक भोजन क्यों नहीं करते? जो मानसिक भोजन से काम चला सकता है उसे ही मानसिक पूजा करने का अधिकार है।
श्रीभगवान् ने गीता में सात्विक,राजसिक और तामसिक ऐसा क्रम लिया है। परन्तु यहाँ पर पहले तामसिक, राजसिक तब सात्विक का क्रम ले रहे हैं। इसका विशेष कारण है। जब श्रीभगवान् भोजन की बात करते हैं तो सबसे पहले सात्विक की बात करते हैं और जब त्याग की बात करते हैं तो पहले तामसिक कर्म के त्याग की बात करते हैं। जहाँ भी कुछ ग्रहण करने की बात है वहाँ श्रीभगवान् ने सात्विक लिया और जहाँ त्याग की बात आयी तो श्रीभगवान् ने कहा कि पहले तामसिक त्यागो।
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते |
मोहात्तस्य परित्यागस्तमस: परिकर्तित: || 7||
मोहात्तस्य परित्यागस्तमस: परिकर्तित: || 7||
श्रीभगवान् ने कहा कि हे अर्जुन! नियत कर्म का स्वरुप से त्याग उचित नहीं है। अतः मोह के कारण उसका त्याग तामस कहा गया। नियत कर्मों के पाँच भाग पिछली बार पढ़े। उन नियत कर्मों का कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए।
18.8
दुःखमित्येव यत्कर्म, कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं(न्) त्यागं(न्), नैव त्यागफलं(म्) लभेत् ॥18.8॥
जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है - ऐसा (समझकर) कोई शारीरिक परिश्रम के भय से (उसका) त्याग कर दे, (तो) वह राजस त्याग करके भी त्याग के फल को नहीं पाता।
विवेचन- पहला, नियत कर्म का त्याग मूर्खता से होता है। दूसरा, राजस त्याग स्वार्थ बुद्धि से किया जाता है। हवन में बैठेंगे तो बिना पङ्खे के बैठना पड़ेगा और आँखें भी जलेंगी अतः दूसरे भाई को बैठा देते हैं। काया क्लेश के भय से त्याग कर देना। शरीर को थोड़ा भी कष्ट न होगा इसलिये कर्म का त्याग कर देना, यही राजसिक गुण है। बहुत साधन करने के बाद भी जिनकी आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती है, ऐसे लोग निश्चित ही काया क्लेश से बचते हैं। नियम, पूजा करने के बाद भी शारीरिक कष्ट से जो बचता है उनकी साधक क्षमता सीमित हो जाती है। शरीर के साथ ममता रखने से अलगाव कैसे सम्भव है?
शिव नारायण गाँधी प्रयाग विश्वविद्यालय के अध्यापक थे। गाँधी जी के भक्त होने के कारण उनका उपनाम गाँधी हो गया। वह अद्भुत अध्यापक थे। कोई छात्र झूठ बोलता था तो वे छात्र के स्थान पर स्वयं को छड़ी मारते थे। वे गाँधी जी की भाँति अस्वाद का व्रत करते थे। अस्वाद का अर्थ है, जो भोजन अच्छा लगे वह दोबारा नहीं खाऊँगा।
एक बार वर्धा में एक विदेशी पत्रकार लुइ फिशर, गाँधी जी का साक्षात्कार लेने के बहाने उनकी खिल्ली उड़ाने आया। मीराबेन ने उसे भोजन के लिए आमन्त्रित किया। उसने पूछा गाँधी जी कहाँ पर खाएंगे? मीराबेन ने कहा कि वो तो यहीं पर खाएंगे। तब उसने कहा कि मैं भी यहीं पर ही खाऊँगा। गाँधी जी की सहमति पर दो थालियाँ वहीँ पर लगा दी गयीं। परन्तु दोनों थालियों में अलग भोजन देखकर लुइ फिशर क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा कि मैंने बड़े-बड़े राष्ट्राध्यक्षों के साथ भोजन किया है परन्तु कभी भी मुझे अलग भोजन नहीं परोसा गया। यह अत्यन्त अपमानजनक बात है। तब मनुबेन ने कहा कि जो भोजन बापू कर रहे हैं, आप उसे नहीं खा सकेंगे। फिशर ने पूछा कि उन्हें कैसे पता कि मुझे क्या अच्छा लगता है, क्या नहीं? मुझे यही भोजन देंगे तो ही मैं भोजन करूँगा नहीं तो नहीं। तब गाँधी जी ने लुइ के लिए वही भोजन परोसने को कहा जो वह स्वयं खा रहे थे। अब वही पदार्थ परोसे गए। गाँधी जी ने उन्हें रोटी के टुकड़े को चटनी के साथ लगाकर खाने का तरीका बताया। खाते ही लुइ की आँखों से आँसू बहने लगे। मनुबेन ने कहा कि मैंने तो आपको पहले ही कहा था, यह बहुत कड़वा है और आप इसे नहीं खा पाएंगे। लुइ ने कहा कि मैं इसलिए नहीं रो रहा कि यह कड़वा है। बल्कि मैं इसलिए रो रहा हूँ कि जिनकी सारे विश्व में चर्चा हो रही है वे यह बाजरे की सूखी रोटी और बिना नमक की नीम की चटनी खाते हैं।
मरते समय यूँ ही गाँधी जी के मुख से राम नाम नहीं निकला। उन्होंने जीवन भर साधना की थी। जीवन भर इस प्रकार के कठिन नियमों का प्रयोग किया।
शिव नारायण गाँधी प्रयाग विश्वविद्यालय के अध्यापक थे। गाँधी जी के भक्त होने के कारण उनका उपनाम गाँधी हो गया। वह अद्भुत अध्यापक थे। कोई छात्र झूठ बोलता था तो वे छात्र के स्थान पर स्वयं को छड़ी मारते थे। वे गाँधी जी की भाँति अस्वाद का व्रत करते थे। अस्वाद का अर्थ है, जो भोजन अच्छा लगे वह दोबारा नहीं खाऊँगा।
एक बार वर्धा में एक विदेशी पत्रकार लुइ फिशर, गाँधी जी का साक्षात्कार लेने के बहाने उनकी खिल्ली उड़ाने आया। मीराबेन ने उसे भोजन के लिए आमन्त्रित किया। उसने पूछा गाँधी जी कहाँ पर खाएंगे? मीराबेन ने कहा कि वो तो यहीं पर खाएंगे। तब उसने कहा कि मैं भी यहीं पर ही खाऊँगा। गाँधी जी की सहमति पर दो थालियाँ वहीँ पर लगा दी गयीं। परन्तु दोनों थालियों में अलग भोजन देखकर लुइ फिशर क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा कि मैंने बड़े-बड़े राष्ट्राध्यक्षों के साथ भोजन किया है परन्तु कभी भी मुझे अलग भोजन नहीं परोसा गया। यह अत्यन्त अपमानजनक बात है। तब मनुबेन ने कहा कि जो भोजन बापू कर रहे हैं, आप उसे नहीं खा सकेंगे। फिशर ने पूछा कि उन्हें कैसे पता कि मुझे क्या अच्छा लगता है, क्या नहीं? मुझे यही भोजन देंगे तो ही मैं भोजन करूँगा नहीं तो नहीं। तब गाँधी जी ने लुइ के लिए वही भोजन परोसने को कहा जो वह स्वयं खा रहे थे। अब वही पदार्थ परोसे गए। गाँधी जी ने उन्हें रोटी के टुकड़े को चटनी के साथ लगाकर खाने का तरीका बताया। खाते ही लुइ की आँखों से आँसू बहने लगे। मनुबेन ने कहा कि मैंने तो आपको पहले ही कहा था, यह बहुत कड़वा है और आप इसे नहीं खा पाएंगे। लुइ ने कहा कि मैं इसलिए नहीं रो रहा कि यह कड़वा है। बल्कि मैं इसलिए रो रहा हूँ कि जिनकी सारे विश्व में चर्चा हो रही है वे यह बाजरे की सूखी रोटी और बिना नमक की नीम की चटनी खाते हैं।
मरते समय यूँ ही गाँधी जी के मुख से राम नाम नहीं निकला। उन्होंने जीवन भर साधना की थी। जीवन भर इस प्रकार के कठिन नियमों का प्रयोग किया।
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥
जन्म-जन्म तक जतन करने के बाद भी मुनि अन्त समय में राम नाम नहीं ले पाते। इस शरीर को थोड़ा तपाने का अभ्यास होना चाहिए। आदि शङ्कराचार्य जी ने षट्सम्पत्ति (सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास, अनुकूलता और प्रतिकूलता) सघन करने का साधन बताया। गर्मी में भी थोड़ी देर पङ्खा बंद करके बैठना चाहिए। स्वादिष्ट पकवान बनने पर भी खाना नहीं खाना चाहिए। एक समय की चाय नहीं पियेंगे अथवा मिष्ठान नहीं खाएंगे, आदि तरीकों से शरीर को तपाने की आदत होनी चाहिए। सब कुछ अच्छा-अच्छा देने से शरीर से ममता बढ़ेगी और ममता बढ़ने से संसार से ममता बढ़ेगी और फिर भगवान् नहीं मिलेंगे। सम्बन्ध विच्छेद फल से नहीं फल की इच्छा से करना है। फल तो मिलेगा ही।
कार्यमित्येव यत्कर्म, नियतं(ङ्) क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं(न्) त्यक्त्वा फलं(ञ्) चैव, स त्यागः(स्) सात्त्विको मतः॥18.9॥
हे अर्जुन ! 'केवल कर्तव्य मात्र करना है' -- ऐसा (समझकर) जो कर्म आसक्ति और फलेच्छा का त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।
विवेचन-श्रीभगवान् कह रहे हैं कि किसी क्रिया या पदार्थ का त्याग नहीं करना है। जितने भी कर्तव्य कर्म हैं, उनको फल की इच्छा के बिना और कर्तव्य भाव से करना है । जब तक फल की इच्छा रहेगी तब तक उस कर्म का आनन्द ही नहीं आएगा। भजन करने से क्या मिलेगा? पर भजन करने का आनन्द ही बहुत है। गीता जी पढ़ने से क्या मिलेगा? गीता जी पढ़ने में जो आनन्द की अनुभूति हो रही है, वो किसी से कम है क्या?
महाभारत में युधिष्ठिर और द्रोपदी का एक सम्वाद है। द्रोपदी ने प्रश्न किया कि आपको धर्म का पालन करने से क्या मिला? युधिष्ठिर ने कहा कि धर्म, सुख और दुःख से बचने के लिए नहीं होता। धर्म का पालन करने से क्या मिला, यह तो स्वार्थ दृष्टि हो गयी। मुझे तो यह करना ही है। कर्तव्य कर्म करने का जो आनन्द है वही जीवन में सन्तोष दायक है। दैनिक अन्न दान करें पर उससे लगाव नहीं। प्रत्येक कार्य में सहजता होनी आवश्यक है।
महाभारत में युधिष्ठिर और द्रोपदी का एक सम्वाद है। द्रोपदी ने प्रश्न किया कि आपको धर्म का पालन करने से क्या मिला? युधिष्ठिर ने कहा कि धर्म, सुख और दुःख से बचने के लिए नहीं होता। धर्म का पालन करने से क्या मिला, यह तो स्वार्थ दृष्टि हो गयी। मुझे तो यह करना ही है। कर्तव्य कर्म करने का जो आनन्द है वही जीवन में सन्तोष दायक है। दैनिक अन्न दान करें पर उससे लगाव नहीं। प्रत्येक कार्य में सहजता होनी आवश्यक है।
सङ्गं त्यक्त्वा
एक बार पूज्य स्वामी जी से किसी ने प्रश्न किया कि सात्विक कर्म की कसौटी क्या है? विकर्म सात्विक हुआ अथवा राजसिक, ये कैसे पता चल सकता है? स्वामी जी ने कहा कि जब शुभ कर्म और सेवा कर्म के पश्चात् मन में बड़ा आनन्द हो तो वह सात्विक है। यदि उसके बाद मन में दुःख हो तो वह राजस है। सेवा दोनों भावों से होती है। सर्दी में श्रीभगवान् की प्रेरणा से कुछ लोगों को कम्बल दे दिए यह अच्छी बात है पर प्रशंसा में फँस कर मैं हर बार करूँ, यह अटकने की बात है।
न द्वेष्ट्यकुशलं(ङ्) कर्म, कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो, मेधावी छिन्नसंशयः॥18.10॥
(जो) अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता (और) कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता, (वह) त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देह रहित (और) अपने स्वरूप में स्थित है।
विवेचन- मनुष्य को अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करना चाहिए और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होना चाहिए।
वैसे तो रक्त का स्पर्श करना अकुशल कार्य है परन्तु यदि सड़क पर किसी को चोट लग गयी और रक्त बह रहा है। उसे अस्पताल ले जाने में अपने वस्त्रों पर भी रक्त लगने की सम्भावना है। यह अकुशल कर्म होते हुए भी कर्तव्य है अर्थात सात्विक कर्म है। अतः यह करना ही है। राजा हरिश्चन्द्र ने कर्तव्य पालन हेतु अपनी पत्नी और पुत्र को भी बेच दिया। श्रीराम जी ने अपनी पत्नी का त्याग कर दिया। ये सभी अकुशल कर्म हैं। जिन सीता जी को प्राप्त करने के लिए सहस्त्रों मील पैदल चलकर गए, उनका कर्तव्य के पालन के लिए त्याग भी कर दिया। यह अकुशल कर्म ही तो है।
कुशल कर्मों से लिप्त नहीं होना है और अकुशल कर्मों से द्वेष नहीं करना है।
मेधावी छिन्नसंशय:
श्रीभगवान् ने कहा कि जिसको इस प्रकार विवेक की जाग्रति हो गयी उसको उचित -अनुचित का ज्ञान सरलता से हो जाता है। वह भटकता नहीं है। उसे सब स्पष्ट दिखायी देता है। पूज्य स्वामी जी कहते हैं कि मेधावी अर्थात् बुद्धिमानों में भी जो मेधावी है, वह सर्वश्रेष्ठ है।
छिन्नसंशयः- उन्हें कोई संशय नहीं होता।
जो अकुशल से द्वेष नहीं करता और कुशल से आसक्त नहीं होता, वही त्यागी है। श्रीभगवान् ने कहा, नियत कर्म का त्याग भी नहीं करना है और नियत कर्म से चिपकना भी नहीं है।
ज्ञानी को विहित और निषिद्ध का विश्लेषण नहीं करना पड़ता है। श्री राम जी को यह विचार नहीं करना है कि अहिल्या रुपी पत्थर पर पैर लगाऊँ या नहीं।
एक साधक के लिए सबसे उत्तम उदहारण हैं, हनुमानजी। कर्तव्य कर्म में कहीं पीछे नहीं हैं और अपने को कहीं अनावश्यक उलझाते भी नहीं हैं।
समुद्र लङ्घन के समय सबसे अधिक सम्भावना थी कि रावण समुद्र पार गया है। जाम्बवान, अंगद, नल, नील, हनुमान ये सभी श्रेष्ठ वानर थे। सभी समुद्र के किनारे बैठे थे और सामने सौ योजन का विशाल समुद्र था। कई घण्टे तक सभी विचार कर रहे थे कि उस पार कैसे जाएँ? हनुमान जी की विशेषता यही है कि वे तब ही बोलेंगे जब उनसे बोलने को कहा जायेगा। (हम तो इसका विपरीत करते हैं) कोई कहता कि मैं जा तो सकता हूँ, आने का पता नहीं। जाम्ब्वान ने कहा कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। जब हनुमान जी से पूछा गया,
वैसे तो रक्त का स्पर्श करना अकुशल कार्य है परन्तु यदि सड़क पर किसी को चोट लग गयी और रक्त बह रहा है। उसे अस्पताल ले जाने में अपने वस्त्रों पर भी रक्त लगने की सम्भावना है। यह अकुशल कर्म होते हुए भी कर्तव्य है अर्थात सात्विक कर्म है। अतः यह करना ही है। राजा हरिश्चन्द्र ने कर्तव्य पालन हेतु अपनी पत्नी और पुत्र को भी बेच दिया। श्रीराम जी ने अपनी पत्नी का त्याग कर दिया। ये सभी अकुशल कर्म हैं। जिन सीता जी को प्राप्त करने के लिए सहस्त्रों मील पैदल चलकर गए, उनका कर्तव्य के पालन के लिए त्याग भी कर दिया। यह अकुशल कर्म ही तो है।
कुशल कर्मों से लिप्त नहीं होना है और अकुशल कर्मों से द्वेष नहीं करना है।
मेधावी छिन्नसंशय:
श्रीभगवान् ने कहा कि जिसको इस प्रकार विवेक की जाग्रति हो गयी उसको उचित -अनुचित का ज्ञान सरलता से हो जाता है। वह भटकता नहीं है। उसे सब स्पष्ट दिखायी देता है। पूज्य स्वामी जी कहते हैं कि मेधावी अर्थात् बुद्धिमानों में भी जो मेधावी है, वह सर्वश्रेष्ठ है।
छिन्नसंशयः- उन्हें कोई संशय नहीं होता।
जो अकुशल से द्वेष नहीं करता और कुशल से आसक्त नहीं होता, वही त्यागी है। श्रीभगवान् ने कहा, नियत कर्म का त्याग भी नहीं करना है और नियत कर्म से चिपकना भी नहीं है।
ज्ञानी को विहित और निषिद्ध का विश्लेषण नहीं करना पड़ता है। श्री राम जी को यह विचार नहीं करना है कि अहिल्या रुपी पत्थर पर पैर लगाऊँ या नहीं।
एक साधक के लिए सबसे उत्तम उदहारण हैं, हनुमानजी। कर्तव्य कर्म में कहीं पीछे नहीं हैं और अपने को कहीं अनावश्यक उलझाते भी नहीं हैं।
समुद्र लङ्घन के समय सबसे अधिक सम्भावना थी कि रावण समुद्र पार गया है। जाम्बवान, अंगद, नल, नील, हनुमान ये सभी श्रेष्ठ वानर थे। सभी समुद्र के किनारे बैठे थे और सामने सौ योजन का विशाल समुद्र था। कई घण्टे तक सभी विचार कर रहे थे कि उस पार कैसे जाएँ? हनुमान जी की विशेषता यही है कि वे तब ही बोलेंगे जब उनसे बोलने को कहा जायेगा। (हम तो इसका विपरीत करते हैं) कोई कहता कि मैं जा तो सकता हूँ, आने का पता नहीं। जाम्ब्वान ने कहा कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। जब हनुमान जी से पूछा गया,
का चुप साधि रहेहु बलवाना।
पवन तनय बल पवन समाना।
पवन तनय बल पवन समाना।
तुम तो पवनदेव के पुत्र हो। तुम क्यों चुपचाप बैठे हो? हनुमान जी ने कहा कि कोई पूछेगा तो ही मैं बोलूंगा। जाम्ब्वान ने कहा कि अपनी शक्तियों का स्मरण करो।
"कनक भूधराकार सरीरा।
समर भयंकर अतिबल बीरा।।"
समर भयंकर अतिबल बीरा।।"
एक ही पल में विशाल रूप में प्रकट हो गए। एक ही छलाङ्ग में लङ्का पहुँच गए। वापस आकर सब कथा सुनाने लगे। वह सुग्रीव के अनुचर थे अतः सुग्रीव को ही सब समाचार सुनाया। सुग्रीव ने सब श्रीराम जी को बताया। तब श्रीराम जी ने कहा कि मुझे सब बात हनुमान के मुख से ही सुननी है। पूरी रामायण में हनुमान जी कहीं भी ऐसा नहीं कहते कि यह कार्य मैंने किया। मैंने सुग्रीव को श्रीराम जी से मिलवाया, मैंने बाली का वध करवाया, मैंने सीता जी का पता लगाया, मैं सञ्जीवनी बूटी लेकर आया, ऐसी कोई भी बात हनुमान जी नहीं करते। कर्तव्य कर्म सब करते हैं। जिस कार्य से श्रीराम जी प्रसन्न होंगे, वही करूँगा।
न द्वेष्ट्यकुशलं(ङ्) कर्म, कुशले नानुषज्जते
पूरे जीवन बस कर्तव्य कर्म ही करते हैं। पूरे जीवन में कहीं भी मलिनता नहीं है, स्पष्टता है। हर विपरीत परिस्थिति में भी वह सहज हैं।
मेघनाथ ने ब्रह्मास्त्र चलाया।
मेघनाथ ने ब्रह्मास्त्र चलाया।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥
तब हनुमान्जी ने मन में विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जाएगी। अतः वे बन्ध गए। बाद में स्वयं ही अपने बन्धन खोल दिए। मेघनाथ को आश्चर्य हुआ कि यदि सक्षम थे तो पहले क्यों नहीं खोला। इतना बल होने पर भी वे अत्यन्त सहज हैं।
भजन
लाला जी महाराज एक महान सन्त हुए। उनकी एक सौ पचासवीं जयंती पर मोदी जी ने एक सौ पचास (150) रुपये के सिक्के का विमोचन किया। कानपुर के पास फर्रुखाबाद में उनके गुरु जी रहते थे। गाँव में उस समय पैदल ही जाया करते थे। वे प्रत्येक बुधवार को गुरु जी के दर्शन के लिए जाते थे। वो और उनके एक अन्य गुरुभाई उनके दर्शन के लिए गए। रास्ते में भीषण वर्षा होने लगी। सुबह सात बजे निकले थे पर पहुँचते-पहुँचते संध्या के चार बज गए। जब पहुँचे तो गुरु जी बाहर एक पैर पर हाथ रख कर बैठे हुए थे। आँखें आधी बन्द थी। लाला जी ने अपने साथ आये गुरुभाई से कहा कि आज नहीं हम अगली बार आएंगे। अभी चलो। गुरुभाई ने कहा कि हम अब पहुँचे हैं। अब गुरूजी के दर्शन करके कुछ खाएंगे-पीयेंगे। सुबह से कुछ खाया भी नहीं है। रात को यहीं रुक जाते हैं। परन्तु लालाजी वापस चल दिए। अगले बुधवार को फिर से पहुँचे। देखते ही गुरु जी ने गले से लगा लिया। साथ में वही गुरु भाई भी थे। वह सोचने लगा कि पिछली बार की तो कोई बात लालाजी ने बताई नहीं और आज गुरूजी ने गले लगा लिया। गुरु जी ने लाला जी से कहा कि तू तो बड़ा समझदार निकला। पिछले सप्ताह आया था तो मैंने देख लिया था। परन्तु तू पास नहीं आया यह अच्छा किया। लाला जी ने कहा कि आपने एक बार कहा था तो वो मुझे याद था।
यह सब देखकर गुरुभाई आश्चर्यचकित था। उसने चरण पकड़ लिए कि यह सब क्या हो रहा है? उस दिन आप क्यों वापस लेकर गए और आज क्यों गुरूजी ने आपको गले से लगाया और क्या बात थी जो आपने कहा कि आपने पहले भी बात कही थी। कौन सी बात थी? लाला जी ने कहा, तुम भी थे उस दिन सत्सङ्ग में। गुरु जी ने एक पंक्ति कही थी "उन्मुनि रहनी" अर्थात जब सोने से न सोना अच्छा लगे, खाने से न खाना अच्छा लगे बोलने से न बोलना अच्छा लगे, मिलने से न मिलना अच्छा लगे। जिस समय व्यक्ति सोया नहीं है पर हर बात से उन्मुख हो गया है, उसका मन कहीं जुड़ गया है और कुछ उसे अच्छा नहीं लगता। उस दिन गुरु जी आधी आँख खोलकर भगवान् से जुड़े हुए थे। हम जाते तो उनका वो तार टूट जाता।
भजन
लाला जी महाराज एक महान सन्त हुए। उनकी एक सौ पचासवीं जयंती पर मोदी जी ने एक सौ पचास (150) रुपये के सिक्के का विमोचन किया। कानपुर के पास फर्रुखाबाद में उनके गुरु जी रहते थे। गाँव में उस समय पैदल ही जाया करते थे। वे प्रत्येक बुधवार को गुरु जी के दर्शन के लिए जाते थे। वो और उनके एक अन्य गुरुभाई उनके दर्शन के लिए गए। रास्ते में भीषण वर्षा होने लगी। सुबह सात बजे निकले थे पर पहुँचते-पहुँचते संध्या के चार बज गए। जब पहुँचे तो गुरु जी बाहर एक पैर पर हाथ रख कर बैठे हुए थे। आँखें आधी बन्द थी। लाला जी ने अपने साथ आये गुरुभाई से कहा कि आज नहीं हम अगली बार आएंगे। अभी चलो। गुरुभाई ने कहा कि हम अब पहुँचे हैं। अब गुरूजी के दर्शन करके कुछ खाएंगे-पीयेंगे। सुबह से कुछ खाया भी नहीं है। रात को यहीं रुक जाते हैं। परन्तु लालाजी वापस चल दिए। अगले बुधवार को फिर से पहुँचे। देखते ही गुरु जी ने गले से लगा लिया। साथ में वही गुरु भाई भी थे। वह सोचने लगा कि पिछली बार की तो कोई बात लालाजी ने बताई नहीं और आज गुरूजी ने गले लगा लिया। गुरु जी ने लाला जी से कहा कि तू तो बड़ा समझदार निकला। पिछले सप्ताह आया था तो मैंने देख लिया था। परन्तु तू पास नहीं आया यह अच्छा किया। लाला जी ने कहा कि आपने एक बार कहा था तो वो मुझे याद था।
यह सब देखकर गुरुभाई आश्चर्यचकित था। उसने चरण पकड़ लिए कि यह सब क्या हो रहा है? उस दिन आप क्यों वापस लेकर गए और आज क्यों गुरूजी ने आपको गले से लगाया और क्या बात थी जो आपने कहा कि आपने पहले भी बात कही थी। कौन सी बात थी? लाला जी ने कहा, तुम भी थे उस दिन सत्सङ्ग में। गुरु जी ने एक पंक्ति कही थी "उन्मुनि रहनी" अर्थात जब सोने से न सोना अच्छा लगे, खाने से न खाना अच्छा लगे बोलने से न बोलना अच्छा लगे, मिलने से न मिलना अच्छा लगे। जिस समय व्यक्ति सोया नहीं है पर हर बात से उन्मुख हो गया है, उसका मन कहीं जुड़ गया है और कुछ उसे अच्छा नहीं लगता। उस दिन गुरु जी आधी आँख खोलकर भगवान् से जुड़े हुए थे। हम जाते तो उनका वो तार टूट जाता।
जब दिल को नींद आ जाती है
रूह भी गाफिल होती है
तब मैं ही अकेला होता हूँ
यार की महफ़िल होती है।
तब मैं ही अकेला होता हूँ
यार की महफ़िल होती है।
एकान्त में जिसको रस आ जाए।
न हि देहभृता शक्यं(न्), त्यक्तुं(ङ्) कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी, स त्यागीत्यभिधीयते॥18.11॥
कारण कि देहधारी मनुष्य के द्वारा सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी है - ऐसा कहा जाता है।
विवेचन-देहधारी मनुष्य के द्वारा सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी है।
अनिष्टमिष्टं(म्) मिश्रं(ञ्) च, त्रिविधं(ङ्) कर्मणः(फ्) फलम्।
भवत्यत्यागिनां(म्) प्रेत्य, न तु सन्न्यासिनां(ङ्) क्वचित्॥18.12॥
कर्मफल का त्याग न करनेवाले मनुष्यों को कर्मों का इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित - (ऐसे) तीन प्रकार का फल मरने के बाद (भी) होता है; परन्तु कर्मफल का त्याग करने वालों को कहीं भी नहीं होता।
विवेचन- श्रीभगवान् तीन प्रकार के फल की बात कर रहे हैं-अनिष्ट, इष्ट और मिश्रित
हम कोई भी कर्म करते हैं तो उसके तीन फल होते हैं-
1.सञ्चित फल- हमारे द्वारा करोड़ों जन्मों में किये गए सभी कर्म
2.प्रारब्ध -सञ्चित में से जो इस जन्म में मुझे मिलने वाला है, वो है प्रारब्ध फल
3.क्रियमाण फल- जो हम इस जन्म में करेंगे वह हैं क्रियमाण फल। चौरासी लाख योनियों में एकमात्र मनुष्य है जो नया पाप और पुण्य कर सकता है। न कोई पशु, न देवता, न ही कोई यक्ष, न पाप कर सकते हैं न ही पुण्य कर सकते हैं। वो मात्र सञ्चित और प्रारब्ध को ही भोगते हैं।
इसमें से प्रारब्ध में भी तीन प्रकार के फल हैं- अनिष्ट, इष्ट और मिश्र।
1.इष्ट- पुत्र, पत्नी, घर, पैसा आदि सब मन को अच्छा लगने वाला
2.अनिष्ट- जो हमें नहीं चाहिए। परीक्षा में असफल हुए, विवाह नहीं हुआ, व्यापार नहीं चला, नौकरी नहीं लगी आदि
3.मिश्रित- अच्छा भी और बुरा भी। जैसे विवाह तो हो गया पर पत्नी हर समय झगड़ा करती है/ पति हर समय व्यसन करता है।
क्रियमाण फल- जो हम नया कर्म करते हैं उसके दो अंश होते हैं।
1.फल अंश- दृष्ट और अदृष्ट
दृष्ट फल- कोई कर्म करते ही फल दिख जाता है।
अदृष्ट फल- जो नहीं दिखता है। जैसे कहते हैं कि अच्छा किया हुआ व्यर्थ नहीं जाता। उसका फल बाद में मिलेगा। यह भी सुना है कि बुरा किया तो उसका फल भी मिलेगा। श्रीभगवान् की लाठी में आवाज नहीं होती। आज नहीं मिला, दस साल बाद मिलेगा, पर मिलेगा अवश्य।
2.संस्कार अंश-जैसे जन्म लेते ही छोटे बालक को माँ के साथ बैठकर गीता सीखना अच्छा लगता है और किसी को नहीं। हर कर्म का संस्कार अंश होता है। इसी भाँति आदत भी बनती हैं।
दृष्ट फल में दो फल होते हैं-
1.तात्कालिक- जैसे जूस पिया और तुरन्त शरीर में ताकत आ गयी।
2.कालान्तरिक- दूध पिया, घी, मक्खन खाया, उसका फल तुरन्त पता नहीं चलेगा। पाँच-दस साल बाद शरीर पुष्ट होता है। साठ साल के हो गए पर घुटने नहीं बदलवाने पड़े। बड़े गर्व से कहते हैं कि अरे गाँव का देसी गाय का घी खाया है। मेरे घुटने की ग्रीस समाप्त नहीं होगी। आज योगाभ्यास करेंगे तो तुरन्त कुछ फल नहीं मिलेगा परन्तु कुछ साल बाद सेहत अच्छी होगी।
अदृष्ट में दो फल होते हैं-
1.लौकिक
2.अलौकिक
लौकिक में तीन अनिष्ट, इष्ट और मिश्रित फल मिलते हैं।
अलौकिक में दो फल होते हैं। ऐसा फल जो मुझे पुनर्जन्म की ओर लेकर जाएगा। दूसरा नानुवृत्ति।
1.सञ्चित फल- हमारे द्वारा करोड़ों जन्मों में किये गए सभी कर्म
2.प्रारब्ध -सञ्चित में से जो इस जन्म में मुझे मिलने वाला है, वो है प्रारब्ध फल
3.क्रियमाण फल- जो हम इस जन्म में करेंगे वह हैं क्रियमाण फल। चौरासी लाख योनियों में एकमात्र मनुष्य है जो नया पाप और पुण्य कर सकता है। न कोई पशु, न देवता, न ही कोई यक्ष, न पाप कर सकते हैं न ही पुण्य कर सकते हैं। वो मात्र सञ्चित और प्रारब्ध को ही भोगते हैं।
इसमें से प्रारब्ध में भी तीन प्रकार के फल हैं- अनिष्ट, इष्ट और मिश्र।
1.इष्ट- पुत्र, पत्नी, घर, पैसा आदि सब मन को अच्छा लगने वाला
2.अनिष्ट- जो हमें नहीं चाहिए। परीक्षा में असफल हुए, विवाह नहीं हुआ, व्यापार नहीं चला, नौकरी नहीं लगी आदि
3.मिश्रित- अच्छा भी और बुरा भी। जैसे विवाह तो हो गया पर पत्नी हर समय झगड़ा करती है/ पति हर समय व्यसन करता है।
क्रियमाण फल- जो हम नया कर्म करते हैं उसके दो अंश होते हैं।
1.फल अंश- दृष्ट और अदृष्ट
दृष्ट फल- कोई कर्म करते ही फल दिख जाता है।
अदृष्ट फल- जो नहीं दिखता है। जैसे कहते हैं कि अच्छा किया हुआ व्यर्थ नहीं जाता। उसका फल बाद में मिलेगा। यह भी सुना है कि बुरा किया तो उसका फल भी मिलेगा। श्रीभगवान् की लाठी में आवाज नहीं होती। आज नहीं मिला, दस साल बाद मिलेगा, पर मिलेगा अवश्य।
2.संस्कार अंश-जैसे जन्म लेते ही छोटे बालक को माँ के साथ बैठकर गीता सीखना अच्छा लगता है और किसी को नहीं। हर कर्म का संस्कार अंश होता है। इसी भाँति आदत भी बनती हैं।
दृष्ट फल में दो फल होते हैं-
1.तात्कालिक- जैसे जूस पिया और तुरन्त शरीर में ताकत आ गयी।
2.कालान्तरिक- दूध पिया, घी, मक्खन खाया, उसका फल तुरन्त पता नहीं चलेगा। पाँच-दस साल बाद शरीर पुष्ट होता है। साठ साल के हो गए पर घुटने नहीं बदलवाने पड़े। बड़े गर्व से कहते हैं कि अरे गाँव का देसी गाय का घी खाया है। मेरे घुटने की ग्रीस समाप्त नहीं होगी। आज योगाभ्यास करेंगे तो तुरन्त कुछ फल नहीं मिलेगा परन्तु कुछ साल बाद सेहत अच्छी होगी।
अदृष्ट में दो फल होते हैं-
1.लौकिक
2.अलौकिक
लौकिक में तीन अनिष्ट, इष्ट और मिश्रित फल मिलते हैं।
अलौकिक में दो फल होते हैं। ऐसा फल जो मुझे पुनर्जन्म की ओर लेकर जाएगा। दूसरा नानुवृत्ति।
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्
जिसके कारण हम इस पुनर्जन्म के चक्र से छूट जाएंगे।
जिसके कारण हम इस पुनर्जन्म के चक्र से छूट जाएंगे।
संस्कार अंश के दो भाग हैं-
1.शुद्ध संस्कार
2.अशुद्ध संस्कार
पूज्य स्वामी जी के पिताजी गाँव के अच्छे पण्डित थे। वे कथा भी करते थे। स्वामी जी बताते हैं कि जब मैं छोटा था तब एक यजमान पिताजी के पास आया। उसने कहा कि मेरे बेटे का विवाह आप करा दीजिये। परन्तु किसी समस्या के कारण हम चाहते हैं कि दो घण्टे में फेरे का कार्य पूर्ण हो जाए। आप जो दक्षिणा कहेंगे, मैं देने को तैयार हूँ। पण्डित जी ने मना कर दिया कि यह नहीं हो पायेगा। यजमान दो गुनी दक्षिणा देने को तैयार था। तब भी पण्डित जी ने मना कर दिया। यजमान चला गया तब स्वामी जी ने अपने पिताजी से पूछा कि जब यजमान को इस बात की चिन्ता नहीं है कि देवता प्रसन्न होंगे या नहीं तो आप क्यों चिन्ता करते हैं? वह आपको दो गुनी दक्षिणा देने को तैयार था और आपका समय भी कम लग रहा था तो आप विवाह करा सकते थे। इसमें आपका क्या बिगड़ जाता? उनके पिताजी ने कहा कि बेटा तुम सही कहते हो। मेरा कुछ नहीं बिगड़ता परन्तु मेरे संस्कार बिगड़ जाते। थोड़े से पैसे के लिए मैं अपने हुआ, व्यवहार, संस्कार नहीं बिगाड़ सकता।
हमारा हर कर्म, हमारा संस्कार उत्पन्न करता है। मेरे संस्कार बिगड़ने न पावें, मेरे अन्दर कोई अनुचित प्रवृत्ति जागने न पावे, यह हमारे हर किर्यमाण हर कर्म में हमारे ध्यान में होना चाहिए। हम फल अंश तो देखते हैं परन्तु संस्कार अंश की उपेक्षा कर देते हैं।
जो बच्चा दैनिक अपने पिताजी को प्रणाम करता होगा, वह कभी उनसे ऊँचे स्वर में बात नहीं कर सकता। उसके अन्दर संस्कार का शुद्ध अंश है।
जो कर्म फल का त्याग नहीं करता, उसे अनिष्ट, इष्ट और मिश्रित फल मिलेगा,अनुचित पर जो कर्म फल का त्याग कर देता है उसे किसी प्रकार का फल नहीं मिलता। वह सारे फलों से मुक्त हो जाता है।
हमने भगवान् राम,भगवान् कृष्ण, राजा हरिश्चन्द्र, राजा युधिष्ठिर का जीवन देखा है। उनका जीवन कष्ट और समस्याओं से भरा हुआ है। इनके जीवन में तीनो फलों की बाढ़ है। परन्तु संस्कार पक्ष की शुद्धता के कारण कभी भी अनुचित निर्णय नहीं लिया। इसलिए ये महान हुए। इसलिए सहस्त्रों वर्ष के पश्चात भी हम इनकी चर्चा करते हैं।
एक बार एक गुरु जी के दो शिष्य थे। जाते समय वे विचार करने लगे कि गद्दी किसको दूँ? दोनों शिष्यों को बुलाया और तीन रुपये दिए और बोले इसमें से एक रुपया वहाँ खर्च करना जो यहाँ काम आये। एक रुपया ऐसी जगह खर्च करना जो वहाँ काम आये और एक रुपया ऐसी जगह खर्च करना जो न यहाँ काम आये और न ही वहाँ काम आये। दोनों शिष्य चले गए और एक घण्टे बाद वापस आये।
गुरु जी ने पहले शिष्य से पूछा कि उसने तीन रूपये कैसे खर्च किये? उसने कहा कि एक रुपये की उसने पूरी खा ली और दो महीने तक का खाता खोल दिया। एक रुपये से मैंने साधुओं को भोजन करा दिया और एक रुपया मैं वापस ले आया। जो वापस ले आया वो यहाँ का है, जो दान दिया वो वहाँ का है और जो खा लिया वो न यहाँ का न ही वहाँ का है।
दूसरे शिष्य से पूछने पर उसने कहा कि एक रुपये की पूरी खा ली, एक रूपये से दान कर दिया और एक रुपया मैं नदी में फेंक आया। गुरु जी पूछा इसमें उसका क्या निर्णय है? उस शिष्य ने कहा कि जो मैं पूरी खा कर आया हूँ वो यहाँ का है। जो दान किया वो वहाँ का और जो नदी में डाल कर आया वो न यहाँ का न वहाँ का।
हम किस कर्म को किस प्रकार देखते हैं, उसके संस्कार अंश को कैसे देखते हैं यह बात अत्यन्त गहरी है। पहले शिष्य ने 'यहाँ' का अर्थ आश्रम से लिया जबकि दूसरे शिष्य ने उसका अर्थ जीवन जाना।
पञ्चैतानि महाबाहो, कारणानि निबोध मे।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि, सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥18.13॥
हे महाबाहो ! कर्मों का अन्त करने वाले सांख्य-सिद्धान्त में सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, (इनको तू) मुझसे समझ।
विवेचन- श्रीभगवान् ने सांख्य शास्त्र में इस कर्म बन्धन से छूटने के पाँच हेतु कहे लेकिन वास्तविकता में किसी कर्म की सिद्धि के लिए ये पाँच हेतु हैं। दुनिया का कोई भी कर्म (चाहे व्यापार हो, नौकरी, पढ़ाई, विवाह, अध्यात्म अथवा साधना करेंगे) सभी में ये पाँच हेतु होते हैं।
अधिष्ठानं(न्) तथा कर्ता, करणं(ञ्) च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा, दैवं (ञ्) चैवात्र पञ्चमम्॥18.14॥
इसमें (कर्मों की सिद्धि में) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकार के करण एवं विविध प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि कोई भी कर्म करने के पाँच हेतु हैं। इन्हीं से कोई भी कर्म सिद्ध होता है। इन पाँच बातों में से कोई भी कम पड़ेगा तो कर्म बिगड़ेगा।
अधिष्ठान-
हम जो करने जा रहे हैं उसका उद्देश्य क्या है? इस बात को बहुत लोग नहीं सोचते। सब पढ़ रहे थे तो हम भी पढ़ लिए। सबने विवाह किया तो हमने भी कर लिया। सबने घर बनाया तो हमने भी बना लिया। सबने नौकरियां की तो हमने भी कर ली। सबने बच्चों को बड़ा किया तो हमने भी कर लिया। हम क्या और क्यों कर रहे हैं? हमारा उद्देश्य क्या है? जब तक उद्देश्य स्पष्ट नहीं है तब तक कर्म की सिद्धि भी नहीं होगी।
कर्ता-
उद्देश्य तो है पर करने वाला कर्ता भी होना आवश्यक है। स्वामी जी ने कहा लर्न गीता प्रोग्राम चलाएंगे। इसे चलाने के लिए पन्द्रह हज़ार कार्यकर्ता न हों तो चौदह लाख साधकों को पढ़ाने का काम कैसे चलेगा?
साधन-
उद्देश्य तो है, कर्ता भी हैं पर साधन नहीं हैं। फोन, इण्टरनेट, पुस्तकें नहीं है तो भी कर्म की सिद्धि नहीं होगी।
चेष्टा-
दुकान तो खोल ली पर दुकानदार दोपहर बारह बजे आता है तो उसकी दुकान चलेगी क्या? विवाह तो कर लिया पर रोज-रोज झगड़ा होता हो तो क्या सम्बन्ध टिकेंगे? नौकरी तो कर ली पर अक्सर बहाने करके छुट्टी ले ली तो नौकरी चलेगी क्या? कितना प्रामाणिक प्रयास है? गीता व्रती बनना है, उद्देश्य तो ले लिया पर कक्षा में ही नहीं जायेगे तो गीता व्रती बन पाएंगे क्या?
दैव, भाग्य, प्रारब्ध-
कई बार प्रारब्ध के कारण कार्य बिगड़ जाते हैं। कलाम जी ने पायलट बनने के लिए बहुत मेहनत की। परन्तु मात्र एक इञ्च लम्बाई कम होने के कारण चयन न हो सका। अन्य चारों बातें थीं पर एक कारण से रह गया। यह दूसरी बात है कि उनके प्रारब्ध ने उन्हें महान वैज्ञानिक और देश का राष्ट्रपति बनाया और यह श्रेष्ठ बात है। सन्तों ने कहा कि प्रारब्ध की कमी को चेष्टा से पूरा किया जा सकता है। चेष्टा के बल पर सावित्री ने सत्यवान के प्राण वापस लाए। हरि स्मरण के साथ आज के गहन विवेचन का समापन हुआ।
अधिष्ठान-
हम जो करने जा रहे हैं उसका उद्देश्य क्या है? इस बात को बहुत लोग नहीं सोचते। सब पढ़ रहे थे तो हम भी पढ़ लिए। सबने विवाह किया तो हमने भी कर लिया। सबने घर बनाया तो हमने भी बना लिया। सबने नौकरियां की तो हमने भी कर ली। सबने बच्चों को बड़ा किया तो हमने भी कर लिया। हम क्या और क्यों कर रहे हैं? हमारा उद्देश्य क्या है? जब तक उद्देश्य स्पष्ट नहीं है तब तक कर्म की सिद्धि भी नहीं होगी।
कर्ता-
उद्देश्य तो है पर करने वाला कर्ता भी होना आवश्यक है। स्वामी जी ने कहा लर्न गीता प्रोग्राम चलाएंगे। इसे चलाने के लिए पन्द्रह हज़ार कार्यकर्ता न हों तो चौदह लाख साधकों को पढ़ाने का काम कैसे चलेगा?
साधन-
उद्देश्य तो है, कर्ता भी हैं पर साधन नहीं हैं। फोन, इण्टरनेट, पुस्तकें नहीं है तो भी कर्म की सिद्धि नहीं होगी।
चेष्टा-
दुकान तो खोल ली पर दुकानदार दोपहर बारह बजे आता है तो उसकी दुकान चलेगी क्या? विवाह तो कर लिया पर रोज-रोज झगड़ा होता हो तो क्या सम्बन्ध टिकेंगे? नौकरी तो कर ली पर अक्सर बहाने करके छुट्टी ले ली तो नौकरी चलेगी क्या? कितना प्रामाणिक प्रयास है? गीता व्रती बनना है, उद्देश्य तो ले लिया पर कक्षा में ही नहीं जायेगे तो गीता व्रती बन पाएंगे क्या?
दैव, भाग्य, प्रारब्ध-
कई बार प्रारब्ध के कारण कार्य बिगड़ जाते हैं। कलाम जी ने पायलट बनने के लिए बहुत मेहनत की। परन्तु मात्र एक इञ्च लम्बाई कम होने के कारण चयन न हो सका। अन्य चारों बातें थीं पर एक कारण से रह गया। यह दूसरी बात है कि उनके प्रारब्ध ने उन्हें महान वैज्ञानिक और देश का राष्ट्रपति बनाया और यह श्रेष्ठ बात है। सन्तों ने कहा कि प्रारब्ध की कमी को चेष्टा से पूरा किया जा सकता है। चेष्टा के बल पर सावित्री ने सत्यवान के प्राण वापस लाए। हरि स्मरण के साथ आज के गहन विवेचन का समापन हुआ।
विचार-मन्थन (प्रश्नोत्तर)-
प्रश्नकर्ता- अरुण गुप्ता जी
प्रश्न- नियत कर्म को त्यागना भी नहीं है परन्तु चिपकना भी नहीं है, ये दोनों एक साथ कैसे सम्भव है ?
उत्तर- जैसे मेरा नियत समय पर पूजा का नियम है, परन्तु मार्ग में कोई एक्सीडेंट दिख गया। मैं अपना पूजा का नियम छोड़कर उस व्यक्ति को डॉक्टर के पास लेकर गया। फिर आकर अपनी पूजा कर लेता हूँ और मेरे मन में इस बात का कोई क्लेश नहीं है कि आज मेरी पूजा में विलम्ब हो गया। ये कर्म से चिपकना नहीं हुआ। सहजता से कर्म हो गया। कर्म को त्यागना भी नहीं हुआ और चिपकना भी नहीं हुआ क्योंकि क्लेश भी नहीं हुआ।
प्रश्न- अच्छा सत्संग किसे कहते हैं ? क्या ये जो विवेचन सुन रहे हैं वो भी सत्संग है ?
उत्तर- जी हाँ, ये जो विवेचन सुन रहें हैं वो भी सत्संग ही है। जो हम गीता जी की क्लास कर रहें हैं वो भी सत्संग है। सात्त्विकता को प्राप्त करने के लिए जो समूह में एकत्र हो रहें हैं वो भी सत्संग ही है। अपने जीवन का उन्नयन करने के लिए,भगवान् को प्राप्त करने के साधनों के बारे में एकत्र होकर चर्चा करना भी सत्संग ही है।
प्रश्न- नियत कर्म को त्यागना भी नहीं है परन्तु चिपकना भी नहीं है, ये दोनों एक साथ कैसे सम्भव है ?
उत्तर- जैसे मेरा नियत समय पर पूजा का नियम है, परन्तु मार्ग में कोई एक्सीडेंट दिख गया। मैं अपना पूजा का नियम छोड़कर उस व्यक्ति को डॉक्टर के पास लेकर गया। फिर आकर अपनी पूजा कर लेता हूँ और मेरे मन में इस बात का कोई क्लेश नहीं है कि आज मेरी पूजा में विलम्ब हो गया। ये कर्म से चिपकना नहीं हुआ। सहजता से कर्म हो गया। कर्म को त्यागना भी नहीं हुआ और चिपकना भी नहीं हुआ क्योंकि क्लेश भी नहीं हुआ।
प्रश्न- अच्छा सत्संग किसे कहते हैं ? क्या ये जो विवेचन सुन रहे हैं वो भी सत्संग है ?
उत्तर- जी हाँ, ये जो विवेचन सुन रहें हैं वो भी सत्संग ही है। जो हम गीता जी की क्लास कर रहें हैं वो भी सत्संग है। सात्त्विकता को प्राप्त करने के लिए जो समूह में एकत्र हो रहें हैं वो भी सत्संग ही है। अपने जीवन का उन्नयन करने के लिए,भगवान् को प्राप्त करने के साधनों के बारे में एकत्र होकर चर्चा करना भी सत्संग ही है।
॥ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥