विवेचन सारांश
सात्त्विक जीवनचर्या ही श्रेष्ठ है

ID: 8259
हिन्दी
रविवार, 16 नवंबर 2025
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग
1/2 (श्लोक 1-10)
विवेचक: गीता प्रवीण ज्योति जी शुक्ला


देशभक्ति गीत, श्रीहनुमान चालीसा पाठ, दीप प्रज्वलन, भारत माता, पूज्य गुरुदेव एवं श्रीकृष्ण वन्दना से सत्र का आरम्भ हुआ।

इसके पहले बारहवाँ, पन्द्रहवाँ, सोलहवाँ अध्याय हो चुका है। आज सत्रहवाँ अध्याय देखेंगे। 

बारहवाँ अध्याय-भक्ति योग, इसमें भक्त के गुणों के बारे में बताया गया। 

पन्द्रहवें अध्याय में गुह्यतम ज्ञान की बात कही गई। संसार की उल्टे वृक्ष से तुलना की गई। इस संसार का ढाँचा कैसा है? 

सोलहवाँ अध्याय-दैवासुरसम्पद्विभागयोग। छब्बीस गुण बताए गए। अच्छे बच्चों में ये सारे गुण होते हैं, जिसके कारण वे अच्छे बच्चे बनते हैं। अर्जुन में ये सारे गुण थे। 

बुरे लोगों में क्या बुराइयाँ होती हैं? जिन भी बच्चों में बुराइयाँ हैं, वे उनको प्रयास से छोड़ सकते हैं। 

पिछली बार बुराई छोड़ने के लिए कहा गया था। किन-किन बच्चों ने आरम्भ किया, उसके बाद उनको कैसा लग रहा है? यह हम बाद में प्रश्नों के माध्यम से जानेंगे। 

सत्रहवें अध्याय का नाम है, श्रद्धात्रयविभागयोग। 

श्रद्धा का अर्थ है, सन्देहरहित विश्वास। माता-पिता, कुछ मित्र और कुछ सम्बन्धियों के प्रति सन्देहरहित विश्वास होता है। हम ये सोच ही नहीं सकते कि वे लोग हमारा बुरा कर सकते हैं। 

जिनकी श्रीभगवान् में श्रद्धा होती है, वे कुछ भी बुरा हो जाने पर यह नहीं कहते हैं, हे! भगवान् मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ, आपने ऐसा क्यों किया?  

जिनकी श्रद्धा नहीं होती, वे अच्छे समय में तो याद नहीं करते पर कुछ भी बुरा हो जाए तो हे भगवान्! मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? मैंने इतनी पढ़ाई की थी, मेरे अङ्क क्यों कम आये? हमारी सच्ची श्रद्धा नहीं होने से ही क्या, क्यों की बात आती है। 

सबकी श्रद्धा अलग-अलग हो सकती है। किसी की पढ़ाई में, किसी की यूट्यूब देखने में, किसी की क्रिकेट खेलने में। श्रद्धानुरूप पढ़ाई वाला बहुत अधिक पढ़ाई करके, नाना उपाधियाँ प्राप्त कर लेता है। यूट्यूब में श्रद्धा वाला यूट्यूबर, खेलने वाला बल्लेबाज, गेन्दबाज बन जाता है। हमारे जीवन की दिशा का निर्धारण इसी से होता है कि हमारी श्रद्धा किस ओर है। 

अध्याय का नाम है, श्रद्धात्रयविभागयोग। त्रय अर्थात् तीन। संस्कृत में तीन को त्रय बोलते हैं। विभाग- विभाजन कर देना। 

इस अध्याय में तीन तरह की श्रद्धा को विभाजित करके समझाया है। यह अध्याय, बड़े-बूढ़े, युवा, बच्चे सबके लिए महत्त्वपूर्ण है। कैसी पूजा करे, कैसा भोजन करे, आदि-आदि सब कुछ गीताजी में बताया है। 

तीन तरह की श्रद्धा होती है। सात्त्विक, राजसी और तामसी। 

पहले अध्याय में कहा गया था कि जिनकी शास्त्रों में अर्थात् रामायण, महाभारत, गीताजी में श्रद्धा नहीं होती उनका पतन हो जाता है। अर्जुन ने पूछा था कि श्रद्धा क्या है? श्रद्धा की बात सोलहवें अध्याय में शुरू हुई थी। आगे के श्लोकों से श्रद्धा और समझ में आने लगेगी। 

एक बहुप्रचलित कहानी है। एक बार खरगोश को अपनी तेज चाल पर घमण्ड हो गया और वो जो मिलता उसे दौड़ लगाने के लिए चुनौती करता रहता।

कछुए ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली। दौड़ हुई। एक कुएँ तक पहुँचने की बात हुई। खरगोश नाना क्रियाओं से कछुए को चिढ़ाता जा रहा था। थोड़ी देर में वह थक गया। वह तेजी से भागा और काफी आगे जाने पर पीछे मुड़ कर देखा, कछुआ कहीं आता दिखाई नहीं दिया। उसने मन ही मन सोचा कछुए को तो यहाँ तक आने में बहुत समय लगेगा, थक तो गया हूँ, चलो थोड़ी देर आराम कर लेते हैं और वह एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगा। विश्राम करते हुए, कब उसकी आँख लग गई पता ही नहीं चला।

उधर कछुआ धीरे-धीरे किन्तु लगातार चलता रहा। बहुत देर बाद जब खरगोश की आँख खुली तो कछुआ कुएँ तक पहुँच गया था। खरगोश तेजी से भागा, किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी थी और धीमा और लगातार चलने वाला कछुआ दौड़ जीतता है।

कछुआ अगर अपनी धीमी गति पर विचार करके दौड़ में भाग ही नहीं लेता, तो जीतता ही कैसे? कछुए की श्रद्धा अपने परिश्रम और लगन पर थी।

इसी तरह पढ़ाई में कोई-कोई विषय हमको समझ में नहीं आते हैं। उन विषयों में हमारी श्रद्धा कम होती है। निरन्तरता, लगन से सफलता मिलती है।

गीताजी कभी कठिन लग सकती है। प्रयास और लगन से धीरे-धीरे समझ में आने लगती है।

हमें अपनी सोच हमेशा को, विषय-वस्तु, मित्र, शिक्षक, सम्बन्धियों के प्रति सकारात्मक भाव ही रखना आवश्यक है।

17.1

अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य, यजन्ते श्रद्धयान्विताः|
तेषां(न्) निष्ठा तु का कृष्ण, सत्त्वमाहो रजस्तमः||17.1||

अर्जुन बोले - हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र-विधि का त्याग करके श्रद्धापूर्वक (देवता आदि का) पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी-तामसी

विवेचन- सोलहवें अध्याय की समाप्ति श्रद्धा पर हुई। अर्जुन श्रद्धा के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं। बहुत से मनुष्यों को शास्त्रों के बारे में, उसमें वर्णित विधि-विधान का पता नहीं होता किन्तु वे पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन, दान करते हैं। अच्छे आचरण करते हैं। माता-पिता को, सन्तों को, श्रीभगवान् को प्रणाम करते हैं। इसका कारण उनको पता नहीं होता है। ये सारी क्रियाएँ हम अपने बड़ो के कथनानुसार करते हैं, परम्परा से परिवार में देखते आ रहे हैं, इसलिये करते हैं। अर्जुन का प्रश्न यह है कि परम्परा से की जानी वाली ये श्रद्धा सात्त्विक, राजसी और तामसी कौन सी है? 

वेद, स्मृतियाँ, मनुस्मृति, याज्ञवल्कस्मृति, पाराशरस्मृति, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता, अट्ठारह महापुराण, आदिम ग्रन्थ, दर्शन शास्त्र, योग वेदान्त आदि सभी शास्त्र कहलाते हैं। कुछ के ही नाम यहाँ पर बताए हैं। शास्त्र कोई एक पुस्तक नहीं है, अपितु पुस्तकों का समूह है। इसमें से कई शास्त्रों का तो नाम भी हमको नहीं पता। 

शास्त्र विधि का तात्पर्य है, इन पुस्तकों में बताया गया है। सत्य बोलना चाहिए, ये शास्त्र में बताया गया है। 

सत्यं वद्।

शास्त्रों को नहीं जानने वाले भी, अच्छी क्रियाओं को करने वालों की श्रद्धा सात्त्विक, राजसी, तामसी कौन सी है? 

17.2

श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा, देहिनां(म्) सा स्वभावजा|
सात्त्विकी राजसी चैव, तामसी चेति तां(म्) शृणु||17.2||

श्री भगवान बोले - मनुष्यों की वह स्वभाव से उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी - ऐसे तीन तरह की ही होती है, उसको (तुम) मुझसे सुनो।

विवेचन- श्रीभगवान् अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए, कहते हैं कि तीन तरह की श्रद्धा सात्त्विक, राजसी और तामसी होती है। 

सात्त्विक- कुछ बच्चे सच बोलते हैं, अच्छे-अच्छे कार्य, माता-पिता की आज्ञा का पालन करते हैं, किसी को तङ्ग नहीं करते, किसी से ईर्ष्या नहीं करते हैं, वे बच्चे सात्त्विक है। 

राजसी- जिनको अपनी वस्तुओं से बहुत लगाव होता है। कोई उनके खिलौनों में भी हाथ लगाने से रुष्ट हो जाते हैं। राजसी बच्चों के मन में कामना बहुत होती है। 

तामसी- जिसकी वृत्ति केवल खाने और सोने की होती है। 

ये तीनों श्रद्धा एक ही उदाहरण से समझा सकते हैं। दीपावली हम प्रभु राम के अयोध्या वापस आने के हर्ष में मनाते हैं। 

रामायण में पूरी कथा है। प्रभु राम को चौदह वर्ष का वनवास हुआ था। वहाँ रावण ने सीता-माता का हरण कर लिया था। उनको लङ्का में बन्दी बना कर रखा हुआ था। सीताजी को छुड़ाने के लिए ही रावण का वध करना पड़ा था। 

रावण तीन भाई थे। 
विभीषण- घोर सात्त्विक। पूजा करना, सच बोलना, अच्छे कार्य करना। यह सब उसके स्वभाव में था। लङ्का में राक्षसी वातावरण था। 

रावण- राजसी है। उसको प्रशंसा चाहिये थी। कामना और इच्छा भरी हुई थी। सम्पत्ति की इच्छा थी। 

कुम्भकरण- तामसी है। सोना और खाना। छह महीने सोता था और एक दिन उठता था, बहुत सारा खाना खाता था और सो जाता था। 

एक ही घर में विभीषण घोर सात्त्विक, रावण घोर राजसी और कुम्भकरण घोर तामसी था। इस उदाहरण से सात्त्विक, राजसी और तामसी क्या है? सबको समझ में आ गया। 

प्रश्न- अच्छे-अच्छे कार्य, सच कौन से बच्चे बोलते है? किसको बहुत सारे समान चाहिए। इच्छा और कामना भरी हुई है। कौन से बच्चे विद्यालय नहीं जाना चाहते?  केवल खाने और सोने की इच्छा रखते हैं। 

उत्तर- सभी तरह के बच्चे हैं। अधिकांश बच्चे सात्त्विक हैं। कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जिनको ये विषय समझ में नहीं आया। 

इस तरह से श्रीभगवान् ने तीन तरह की श्रद्धा बतायी है। 

17.3

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य, श्रद्धा भवति भारत|
श्रद्धामयोऽयं(म्) पुरुषो, यो यच्छ्रद्धः(स्) स एव सः||17.3||

हे भारत ! सभी मनुष्यों की श्रद्धा अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धामय है। (इसलिये) जो जैसी श्रद्धावाला है, वही उसका स्वरूप है अर्थात् वही उसकी निष्ठा (स्थिति) है।

विवेचन- इस श्लोक में श्रीभगवान् बता रहे हैं, जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वैसा ही वह बन जाता है। कई जन स्वयं को बुद्धिमान, बहुत कुछ कर सकेंगे, ऐसी श्रद्धा, ऐसा आत्मविश्वास होता है। सही में वह वैसा ही बन जाता है। बहुत सारे बड़े-बड़े काम भी अपनी श्रद्धा के कारण कर लेता है।

कुछ मनुष्य ऐसा सोचते हैं, मैं कुछ भी नहीं कर  पाऊँगा,  इस कारण वास्तव में कुछ नहीं कर पाते। कई विषय गणित, अंग्रेजी, विज्ञान आदि विषयों के लिए ये सोच बना लेते हैं, बहुत जटिल विषय है, इस नकारात्मक सोच के कारण आगे नहीं पढ़ पाते। भाई-बहनों में स्वभावतः किसी एक भाई को मूर्ख, गधा, कुछ भी नहीं समझ में आता है, ऐसा बोलते है, सही में वो बच्चा वैसा ही मूढ़ और गधा बन जाता है। 

माता-पिता अपने बच्चों को प्रोत्साहित करते हैं, तुम सबकुछ कर सकते हो, उस सकारात्मक श्रद्धा भरने के कारण बच्चा बहुत कुछ कर भी लेता है। 

श्रीभगवान् में पूर्ण श्रद्धा वाला मनुष्य उलाहना कभी भी नहीं देता है। आगे भी बताया था, पढ़ाई में श्रद्धा वाला पढ़ाकू, यूट्यूब में श्रद्धा वाला यूटबर, क्रिकेट की श्रद्धा वाला अच्छा खिलाड़ी बन जाता है। आज की कक्षा में कोई कला में, नृत्य में, पढ़ाई में पारंगत है, एकमात्र अपनी श्रद्धा के कारण। 

कई बच्चे सुबह उठते ही बोलेंगे कि मुझे अच्छा नहीं लग रहा है, अभी तो कुछ हुआ ही नहीं। फिर अच्छे या बुरे का कारण क्या है। सारा दिन उनका बहुत अच्छा नहीं जाएगा। कुछ बच्चों के मुख पर, उदासी ही रहती है, कुछ के मुख पर प्रसन्नता। इसका कारण उनकी सकारात्मक और नकारात्मक सोच ही है। इसकारण सुखी दुःखी रहते हैं। 

आजकल मानसकिता और सोच को बदलने वाले भाषणों में यही कहा जाता है, जैसा सोचोगे वैसा बनोगे। मनुष्य विचारशील प्राणी है, विचारों का क्रम चलता ही रहता है।  जैसा सोचते हैं, वैसा ही बनते जाते हैं। 

पहले श्लोक में अर्जुन ने जो प्रश्न किया था, शास्त्रों को नहीं जानने वाले भी सद्कर्म, पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन करते हैं, उनकी श्रद्धा कैसी होगी? वह श्रीभगवान् ने बताया। अब श्रीभगवान् बतायेंगे, कौन सी पूजा सात्त्विक, राजसी और तामसी होती है। 

17.4

यजन्ते सात्त्विका देवान्, यक्षरक्षांसि राजसाः|
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये, यजन्ते तामसा जनाः||17.4||

सात्त्विक मनुष्य देवताओं का पूजन करते हैं, राजस मनुष्य यक्षों और राक्षसों का और दूसरे (जो) तामस मनुष्य हैं, (वे) प्रेतों (और) भूतगणों का पूजन करते हैं।

विवेचन- पूजा भक्ति भी अनेक प्रकार की होती है। श्रीभगवान् कहते हैं, जो भगवान् की पूजा बिना फल की कामना से की जाती है, सात्त्विक पूजा है। देवताओं की पूजा ऐसे लोग स्वयं की शांति के लिए करते है। उनको पूजा करना अच्छा लगता है। 

कुछ लोग कामना और किसी फल की प्राप्ति के लिए पूजा करते हैं, राजसी पूजा कहलाती है। मुझे स्पर्धा में विजय मिल जाय, परीक्षा में अच्छे अङ्क की प्राप्ति हो जाय, प्रत्येक दिन कुछ न कुछ माँगना, धन-सम्पत्ति माँगना, उसके लिये पूजा करवाते रहना या करना राजसी पूजा है। यक्ष, राक्षसों की पूजा कामना पूर्ति के लिए होती है। ऐसी पूजा राजसी है। 

तामसी पूजा दूसरों के अहित के लिए की जाती है। कोई आगे बढ़ रहा है, नित्य सफल हो रहा है, यह नहीं हो, इस भावना से की जानी वाली पूजा तामसी है। भूत-प्रेत की पूजा श्मशान में जाकर दूसरों के अहित के लिए की जाती है, तामसी पूजा है। ऐसी पूजा बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिये। 

सात्त्विक पूजा का प्रयास करना चाहिए। अर्जुन को स्पष्ट हो गया, कौन सी पूजा सात्त्विक, राजसी और तामसी है। 

17.5

अशास्त्रविहितं(ङ्) घोरं(न्), तप्यन्ते ये तपो जनाः|
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः(ख्), कामरागबलान्विताः||17.5||

जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित घोर तप करते हैं; (जो) दम्भ और अहंकार से अच्छी तरह युक्त हैं; (जो) भोग- पदार्थ, आसक्ति और हठ से युक्त हैं; (जो) शरीर में स्थित पाँच भूतों को अर्थात् पांच भौतिक शरीर को तथा अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं उन अज्ञानियों को (तू) आसुर निष्ठा वाले (आसुरी सम्पदा वाले) समझ। ( 17.5-17.6)


17.6

कर्शयन्तः(श्) शरीरस्थं(म्), भूतग्राममचेतसः|
मां(ञ्) चैवान्तः(श्) शरीरस्थं(न्), तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्||17.6||

विवेचन- पिछले अध्याय से कुछ प्रश्न 
प्रश्न- आर्जवम् का क्या अर्थ है? 
विकल्प हैं-प्रसन्नता, दान, सरलता अर्चना करना।
अधिकतर बच्चे गलत उत्तर दे रहे हैं। 
पाँच बच्चों ने आर्जवम्, एक ने दान, छह ने सरलता, छह ने अर्चना करना। 
सरलता सही उत्तर है। 

प्रश्न- सोलहवें अध्याय का क्या नाम है? 
उत्तर- दैवासुरसम्पद्विभागयोग। सभी बच्चों ने सही उत्तर दिये। 

प्रश्न- आपके प्रिय, इष्ट भगवान् कौन हैं? कृष्ण, राम, गणेश, कौन से भगवान प्रिय हैं? 
उत्तर- शिव, गणपति। ये बहुत से बच्चों ने उत्तर दिये हैं। 

पाँचवा और छठा श्लोक एक साथ लेते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं, कुछ लोग हाथ में कपूर जला लेते हैं। ऐसी पूजा तामसी के अन्तर्गत आती है। गणपति पूजा में फिल्मी गानों पर कई जन नृत्य करते हैं, ये आसुरी और तामसी प्रवृत्ति है। शास्त्रों में ऐसा नहीं लिखा है। श्रीभगवान् के भजन पर नृत्य करो। फिल्मी गानों पर नृत्य श्रीभगवान् को रुचिकर नहीं लगता है। 

पूजा-अर्चना में भाव प्रधान होता है। श्रद्धा से पूजा-अर्चना करनी चाहिये। माता-पिता की वैवाहिक वर्षगाँठ पर उनके रुपयों से ही उपहार देते हैं, उनको अच्छा लगता है क्योकि उसमें श्रद्धा और अपनेपन का भाव है। 

श्रीभगवान् को फल-फूल, दूध सभी कुछ श्रद्धा से चढ़ायें, बिना ये सोचे कि ये नाली में जा रहा है। चलचित्रों में बोला गया सत्य नहीं है।  हमारे सनातन धर्म को बदनाम करने के षड्यन्त्र हैं। 

17.7

आहारस्त्वपि सर्वस्य, त्रिविधो भवति प्रियः|
यज्ञस्तपस्तथा दानं(न्), तेषां(म्) भेदमिमं(म्) शृणु||17.7||

आहार भी सबको तीन प्रकार का प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, तप (और) दान (भी तीन प्रकार के होते हैं अर्थात् शास्त्रीय कर्मों में भी गुणों को लेकर तीन प्रकार की रुचि होती है,) (तू) उनके इस भेद को सुन।

विवेचन- भोजन भी तीन प्रकार का होता है। सबको अपने स्वभाव के अनुसार वह प्रिय भी लगता है। इसी तरह यज्ञ, तप, दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। 

17.8

आयुः(स्) सत्त्वबलारोग्य, सुखप्रीतिविवर्धनाः|
रस्याः(स्) स्निग्धाः(स्) स्थिरा हृद्या, आहाराः(स्) सात्त्विकप्रियाः||17.8||

आयु, सत्त्वगुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता बढ़ाने वाले, स्थिर रहने वाले, हृदय को शक्ति देने वाले, रसयुक्त (तथा) चिकने - (ऐसे) आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक मनुष्य को प्रिय होते हैं।

विवेचन- इस श्लोक में सात्त्विक आहार की बात कही गयी है। हमारे बड़े कहते हैं, घर का बना शुद्ध भोजन करो। 

घर में दाल, चावल, रोटी घी में चुपड़ी हुई, सब्जी, दूध-दही आदि। ये सब सात्त्विक भोजन है। इस भोजन से बल, आयु की वृद्धि होती है। सात्त्विक भोजन करके अस्सी वर्ष तक की आयु पा सकते हैं। 

उल्टे-पुलटे भोजन अपच, शरीर में विषाणु पैदा कर देते हैं। बासी भोजन विषाक्त हो जाता है। नाना प्रकार की बीमारियाँ भी सही भोजन के न करने से हो जाती हैं। खराब भोजन शरीर और मन दोनों के लिए हानिकारक होता है। सात्त्विक भोजन सुख और प्रसन्नता देता है। 

श्रीभगवान् बता रहे हैं, रसयुक्त अर्थात् फल, चिकने घी, मक्खन आदि सात्त्विक भोजन हैं। ये बलवर्द्धक, प्रसन्नता देने वाले, निरोगी रखते हैं। ऐसा भोजन करने वाले सात्त्विक होते हैं। 

17.9

कट्वम्ललवणात्युष्ण, तीक्ष्णरूक्षविदाहिनः|
आहारा राजसस्येष्टा, दुःखशोकामयप्रदाः||17.9||

अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखे, अति रूखे और अति दाह कारक आहार अर्थात् भोजन के पदार्थ राजस मनुष्य को प्रिय होते हैं, (जो कि) दुःख, शोक और रोगों को देने वाले हैं।

विवेचन- बहुत कड़वा, खट्टा, बहुत गर्म भोजन राजसी भोजन होता है। कई लोग तो इतना गर्म खाते हैं कि उनकी जीभ भी जल जाती है। बहुत तीखे, चटपटे, ये राजसी भोजन हैं। 

हम देखते हैं, मैगी, नूडल्स, पिज्जा, पास्ता, मोमो बहुत मिर्च होती है, तीखे होते हैं, आँखो से पानी निकलता रहता है और खाते रहते हैं। ये सब राजसी भोजन हैं। बाहर जाकर खाते हैं या घर पर मँगवा कर खाते हैं, सारे भोजन राजसी ही होते हैं। 

ऐसे खाने से शरीर में भी आधी-व्याधि आती है। अपच की समस्या भी हो जाती है। पेट में दर्द होने लगता है। तुरन्त ऐसे भोजन का प्रभाव नहीं दिखता, किन्तु लम्बे समय के बाद इसके दुष्परिणाम सामने आने लगते हैं। कभी-कभी खा सकते हैं, नित्य में दाल, चावल ही ठीक रहता है। 

17.10

यातयामं(ङ्) गतरसं(म्), पूति पर्युषितं(ञ्) च यत्|
उच्छिष्टमपि चामेध्यं(म्), भोजनं(न्) तामसप्रियम्||17.10||

जो भोजन सड़ा हुआ, रस रहित, दुर्गन्धित, बासी और जूठा है तथा (जो) महान अपवित्र (मांस आदि) भी है, (वह) तामस मनुष्य को प्रिय होता है।

विवेचन- जो भोजन सड़ा हुआ हो, जिसमें दुर्गन्ध आ रही है, भूख नहीं है, फिर भी खा लेते हैं, वह तामसी भोजन है। माँस भी तामसी भोजन में आता है। फ्रिज में रखा हुआ भोजन, एक दिन बाद खा रहे हैं, तामसी भोजन में आता है। रूखा-सूखा, दुर्गन्धयुक्त, माँसाहारी भोजन तामसी भोजन है। 

जैसा खाये अन्न, वैसा होये मन। 

ये कहावत है। जितना सात्त्विक भोजन करेंगे, मन और विचार सात्त्विक होंगे। सकारात्मक सोच होगी। 

राजसी भोजन से विचार राजसी होंगे। 

तामसी भोजन से विचार तामसी होंगे, चिड़चिड़ापन बढ़ेगा, क्रोध अधिक आयेगा। भोजन का मन और विचारों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। सात्त्विक बनने के बहुत लाभ है।

प्रश्न- सबको कौन सा भोजन पसन्द है? विकल्प हैं-

-रसयुक्त, सादा, सुगन्धित भोजन जो कि सात्त्विक है। 
-तेल से भरा हुआ, चटपटा, तीखा राजसी भोजन है। 
-फ्रिज में रखा हुआ तामसिक भोजन है।  
बीस बालसाधकों ने सात्त्विक भोजन को पसन्द किया है। दो साधकों ने राजसी। 
सात्त्विक भोजन श्रेष्ठ है। 
हरिनाम सङ्कीर्तन से आज के सत्र का विश्राम होता है। 

इसी के साथ प्रश्नोत्तर सत्र प्रारम्भ हुआ।

प्रश्नोत्तर सत्र

प्रश्नकर्ता- परी दीदी
प्रश्न- अगले सत्र में हम क्या सीखेंगे?
उत्तर- अगले सत्र में भी हम यज्ञ, दान और तप के सम्बन्ध में सीखेंगे।

प्रश्नकर्ता- अवनि दीदी
प्रश्न- हमें सात्त्विक भोजन क्यों करना चाहिए? 
उत्तर- हमें सात्त्विक भोजन इसलिए करना चाहिए क्योंकि सात्त्विक भोजन करने से शरीर बलिष्ठ होता है और कोई रोग भी नहीं होते हैं। हम स्वस्थ रहते हैं।

।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।