विवेचन सारांश
कर्त्तव्य भाव से कर्म करना
गीता प्रार्थना, मधुराष्टकम्, श्रीहनुमान चालीसा पाठ और आदि शङ्कराचार्य जी द्वारा रचित गीताध्यान श्लोक के साथ आज के सत्र का आरम्भ हुआ। इस अध्याय के प्रारम्भ में ही श्रीभगवान् ने अर्जुन को कर्मयोग बताया। वे कहते हैं कि यह ज्ञान कोई नया नहीं है, यह तो पुरातन ज्ञान है। यह मैंने पहले विवस्वान को बताया था और उसके पश्चात यह ऋषि-मुनियों तक पहुँच गया, लेकिन काल की महिमा ऐसी है कि यह नष्ट प्रायः हो गया और लोग इसे भूल गए। अतः वही योग मैं तुम्हें सुना रहा हूँ।
अर्जुन यह सुनकर आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने सोचा कि भगवान् सूर्य तो पुरातन हैं, जबकि भगवान् श्रीकृष्ण तो आयु में मुझ से कुछ ही वर्ष अधिक है तो इन्होने विवस्वान को बताया, यह मैं कैसे मानूं?
अपरं भवतो जन्म, परं जन्म विश्वतः।
कथमेतद्विजाानीयां, त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥ 4·4।।
कथमेतद्विजाानीयां, त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥ 4·4।।
तब श्रीभगवान् ने कहा,
बहूनि मे व्यतीतानि, जन्मानि तव च अर्जुन।
तानि अहं वेद सर्वाणि, न त्वं वेत्थ परन्तप॥ 4·5।।
तानि अहं वेद सर्वाणि, न त्वं वेत्थ परन्तप॥ 4·5।।
अब से पहले भी तुम्हारे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैं। मुझे वे सब स्मरण हैं, तुम भूल गए हो। मैं अजन्मा हूँ। मैं अपनी ही प्रकृति, अपनी ही माया से जब आवश्यक लगे तब प्रकट होता हूँ।
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा, भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय, सम्भवाम्यात्ममायया॥4·6।।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय, सम्भवाम्यात्ममायया॥4·6।।
श्रीभगवान् अपनी ही प्रकृति का आश्रय लेकर जिस रूप में चाहें, उस रूप में प्रकट हो सकते हैं।
।।जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।।4·9।।
मेरे इस जन्म को और कर्म को जो तत्वतः जानता है अर्थात् उसके भाव सहित मुझको जानता है।
श्रीभगवान् क्यों प्रकट होते हैं?
श्रीभगवान् क्यों प्रकट होते हैं?
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
धर्मसंस्थापनार्थाय संभावनामि युगे युगे ||
धर्मसंस्थापनार्थाय संभावनामि युगे युगे ||
इस श्लोक का गलत अर्थ भी हमने समझ लिया कि श्रीभगवान् आएँगे और हमें बचाएँगे। वे किस वेश, रूप, रङ्ग में आएँगे, यह तो पता नहीं और हम उनकी राह देखते हुए बैठे हुए हैं।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति |
हम सभी के हृदय में वह परमात्मा स्थित हैं। यदि सबने मिलकर प्रयास किया तो वे सङ्गठित रूप से प्रकट हो सकते हैं। ऐसा कहा गया है कि श्रीभगवान् एक रूप में नहीं आएँगे, वे तो अनेक रूपों में आएँगे।
"त्रेतायां मन्त्र शक्तिश्च,
ज्ञान शक्ति कृते युगे,
द्वापरे युद्ध शक्ति,
संघे शक्ति कलियुगे।"
कलयुग में सङ्गठित रूप से परमात्मा प्रकट होंगे। श्रीभगवान् कहते हैं कि ऐसे बहुत सारे ज्ञानियों ने मुझे प्राप्त कर लिया है।
वीतरागभयक्रोधा, मन्मया मामुपाश्रिता: |
बहवो ज्ञानतपसा, पूता मदभावमागता:।।4·10।।
बहवो ज्ञानतपसा, पूता मदभावमागता:।।4·10।।
बहुत सारे लोगों ने अपने ज्ञान और तपस्या के कारण मेरे जन्म, कर्म को समझ और जानकर मुझे प्राप्त कर लिया।
हम सामान्य लोग तो लोभ पद्धति से पूजा करते हैं, हमें श्रीभगवान् से जो कुछ चाहिए, उस रूप से उनका पूजन करते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं कि जो लोग जिस भाव से मुझे पूजते हैं, मैं उनके लिए वैसा ही बन जाता हूँ।
हम सामान्य लोग तो लोभ पद्धति से पूजा करते हैं, हमें श्रीभगवान् से जो कुछ चाहिए, उस रूप से उनका पूजन करते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं कि जो लोग जिस भाव से मुझे पूजते हैं, मैं उनके लिए वैसा ही बन जाता हूँ।
।।ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।।4·11।।
जब मनुष्य किसी कामना से श्रीभगवान् के किसी रूप की पूजा करता है तो वह उसी रूप में अटक जाता है। वास्तव में वे सभी परमात्मा के ही रूप हैं।
हम श्रीभगवान् के अनेक रूपों की आराधना करते हैं, यह गलत भी नहीं है। यदि हमें कला सीखनी है तो हम सरस्वती माँ की आराधना करेंगे। बल चाहिए तो हनुमान जी की पूजा करेंगे। शक्ति के लिए दुर्गा माता की उपासना करते हैं। अर्थार्जन के लिए लक्ष्मी माता की उपासना करते हैं। कार्य में कोई विघ्न न आये, अतः भगवान् गणेश की पूजा करते हैं। इन सभी देवी-देवताओं के द्वारा ही श्रीभगवान् हमारी आकाङ्क्षाओं को पूर्ण करते हैं। इस संसार में चार प्रकार के मुख्य लोगों का निर्माण हुआ है।
हम श्रीभगवान् के अनेक रूपों की आराधना करते हैं, यह गलत भी नहीं है। यदि हमें कला सीखनी है तो हम सरस्वती माँ की आराधना करेंगे। बल चाहिए तो हनुमान जी की पूजा करेंगे। शक्ति के लिए दुर्गा माता की उपासना करते हैं। अर्थार्जन के लिए लक्ष्मी माता की उपासना करते हैं। कार्य में कोई विघ्न न आये, अतः भगवान् गणेश की पूजा करते हैं। इन सभी देवी-देवताओं के द्वारा ही श्रीभगवान् हमारी आकाङ्क्षाओं को पूर्ण करते हैं। इस संसार में चार प्रकार के मुख्य लोगों का निर्माण हुआ है।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं, गुणकर्मविभागश: ।
तस्य कर्तारमपि मां, विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।।4·13।।
यहाँ चार वर्ण का अर्थ चार जाति नहीं है। इसका अर्थ है चार प्रकार के कर्म करने वाले लोग। तस्य कर्तारमपि मां, विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।।4·13।।
1.ब्राह्मण
2.क्षत्रिय
3.वैश्य
4.शूद्र
चौथा प्रकार शूद्र है, क्षुद्र नहीं है। क्षुद्र का अर्थ होता है तुच्छ।
ज्ञान सम्पादन का कार्य ब्राह्मण वर्ग का है।
राज्य चलाना, सभी का संरक्षण करना यह क्षत्रिय वर्ग का कार्य है। उसके लिए निडर होकर शत्रु को परास्त करना, अपने देश की रक्षा करना यह क्षत्रियों का कार्य होता है।
वाणिज्य, व्यापार करना, खेती करना, ये सब वैश्यों के कार्य हैं।
हमारे पूर्व प्रधान मन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का तो नारा ही यही था
ज्ञान सम्पादन का कार्य ब्राह्मण वर्ग का है।
राज्य चलाना, सभी का संरक्षण करना यह क्षत्रिय वर्ग का कार्य है। उसके लिए निडर होकर शत्रु को परास्त करना, अपने देश की रक्षा करना यह क्षत्रियों का कार्य होता है।
वाणिज्य, व्यापार करना, खेती करना, ये सब वैश्यों के कार्य हैं।
हमारे पूर्व प्रधान मन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का तो नारा ही यही था
"जय जवान, जय किसान।"
शूद्र का अर्थ है सेवा कार्य करने वाला, सभी लोगों की सेवा करने वाला श्रमजीवी।
ज्ञान शक्ति,
बाहु शक्ति,
अर्थ शक्ति,
श्रम शक्ति।
इन चारों लोगों की आवश्यकता है, इसलिए श्रीभगवान् कहते हैं कि मैंने चार प्रकार के लोग निर्माण किये। ये चारों वर्ण मनुष्य के गुणों के कारण निश्चित होते हैं और सत्त्व, रज, तम के प्रमाण पर आधारित होते हैं। मनुष्य के आस-पास जैसे लोग मिलेंगे, उनके वायुमण्डल का प्रभाव उस पर पड़ता है और उसका स्वभाव वैसा ही बनता जाता है।
विज्ञान कहता है कि माता-पिता के गुण-सूत्र पर मनुष्य का स्वभाव आधारित होता है। यह सत्य है, परन्तु मात्र यही सत्य नहीं है। मनुष्य किस प्रकार के लोगों में रहता है, किस प्रकार के कर्म करता है और पूर्व जन्म में किस प्रकार के कर्म किये हैं, इस से भी मनुष्य के गुण सुनिश्चित होते हैं। हम अनेक जन्मों के संस्कार लेकर आते हैं।
।।तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।
श्रीभगवान् कहते हैं कि मुझे कर्ता होते हुए भी अकर्ता जानो। प्रकृति का निर्माण श्रीभगवान् द्वारा हुआ है। सत्त्व, रज और तम ये तीनों प्रकृति के गुण हैं। कार्य तो प्रकृति कर रही है पर उसके निर्माता श्रीभगवान् हैं, तो वे ही कार्यकर्ता हैं। आगे हम देखेंगे कि कार्य करते हुए अकर्ता होना और अकर्ता होते हुए कार्य करना क्या होता है।
4.14
न मां(ङ्) कर्माणि लिम्पन्ति, न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां(म्) योऽभिजानाति, कर्मभिर्न स बध्यते॥14॥
कारण कि कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि वे कर्मों से लिप्त नहीं होते, क्योंकि उन्हें अपने कर्मों से कोई स्पृहा नहीं है। उनकी उपस्थिति मात्र से सृष्टि का सारा कार्य चलता है। हमारे अन्दर ईश्वर की उपस्थिति से हमारा शरीर चलता है। किसी कि मृत्यु होने पर हम कहते हैं कि अब उसके भीतर राम नहीं रहे। उसे उसके नाम से भी नहीं बुलाते। उसे कहते हैं यह शरीर है, इसको उठाओ, ले जाओ, अग्नि को समर्पण कर दो, क्योंकि अब इसमें वो तत्त्व ही नहीं रहा। उस चैतन्य के होने के कारण हमारे शरीर का कार्य हो रहा है। वास्तविक कार्यकर्ता तो वही है, पर हम कहते हैं कि मैंने किया।
श्रीभगवान् कहते हैं कि सारे कार्य मेरे द्वारा हुए हैं। मुझे उससे कुछ नहीं चाहिए, इसलिए मुझसे कर्म चिपकते नहीं है। मुझे कर्मों के फल की कोई अपेक्षा नहीं है।
मेरे इस प्रकार से कार्य करने को जो जानता है, वह व्यक्ति भी वैसे ही कार्य करने लगता है और वह भी कर्मों के बन्धन में नहीं पड़ता। यदि हम अपेक्षाओं के लिए कर्म करते हैं तो हमें कर्म का बन्धन हो जाता है, परन्तु अपना कर्त्तव्य मानकर कार्य करने से कर्म चिपकते नहीं हैं। श्रीभगवान् ने कार्य करने के लिए दिया है, यह मानकर कार्य किया और उनके ऊपर छोड़ देने से हम कर्म से मुक्त हो जाते हैं। यह मेरा है, यह मानने से बन्धन होगा परन्तु ईश्वर का है, यह मानने से बन्धन नहीं होगा। यह श्रीभगवान् की बताई हुई युक्ति है।
हम कहते हैं कि सारा संसार श्रीभगवान् चला रहे हैं। श्रीभगवान् कहते हैं कि तुम सब अपना-अपना कर्म कर रहे हो, अतः संसार चल रहा है, मैं नहीं चला रहा। संसार चलाकर भी श्रीभगवान् अलिप्त हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि सारे कार्य मेरे द्वारा हुए हैं। मुझे उससे कुछ नहीं चाहिए, इसलिए मुझसे कर्म चिपकते नहीं है। मुझे कर्मों के फल की कोई अपेक्षा नहीं है।
मेरे इस प्रकार से कार्य करने को जो जानता है, वह व्यक्ति भी वैसे ही कार्य करने लगता है और वह भी कर्मों के बन्धन में नहीं पड़ता। यदि हम अपेक्षाओं के लिए कर्म करते हैं तो हमें कर्म का बन्धन हो जाता है, परन्तु अपना कर्त्तव्य मानकर कार्य करने से कर्म चिपकते नहीं हैं। श्रीभगवान् ने कार्य करने के लिए दिया है, यह मानकर कार्य किया और उनके ऊपर छोड़ देने से हम कर्म से मुक्त हो जाते हैं। यह मेरा है, यह मानने से बन्धन होगा परन्तु ईश्वर का है, यह मानने से बन्धन नहीं होगा। यह श्रीभगवान् की बताई हुई युक्ति है।
हम कहते हैं कि सारा संसार श्रीभगवान् चला रहे हैं। श्रीभगवान् कहते हैं कि तुम सब अपना-अपना कर्म कर रहे हो, अतः संसार चल रहा है, मैं नहीं चला रहा। संसार चलाकर भी श्रीभगवान् अलिप्त हैं।
एवं(ञ्) ज्ञात्वा कृतं(ङ्) कर्म, पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं(म्), पूर्वैः(फ्) पूर्वतरं(ङ्) कृतम्॥15॥
पूर्वकाल के मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं, इसलिये तू भी पूर्वजों के द्वारा सदा से किये जाने वाले कर्मों को ही (उन्हीं की तरह) कर।
विवेचन- इस प्रकार इस बात को जानकर (कर्मों के फल प्राप्ति में कोई स्पृहा न रखते हुए यदि कर्त्तव्य भाव से कर्म किया तो उसका कर्मबन्धन नहीं होता) पूर्व काल में भी मोक्ष की इच्छा से कर्म किए गए हैं।
मुमुक्षु-
मोक्ष की प्राप्ति की इच्छा रखने वाले, मुझे परमात्मा के साथ एकरूपता चाहिए और कुछ नहीं चाहिए। बन्धनों से मुक्ति तो सभी चाहते हैं, परन्तु बन्धन किस प्रकार के हैं? यह बात हम नहीं जानते। हमें शरीर प्राप्त हुआ है तो इसके लिए कर्म करना ही है।
मुमुक्षु-
मोक्ष की प्राप्ति की इच्छा रखने वाले, मुझे परमात्मा के साथ एकरूपता चाहिए और कुछ नहीं चाहिए। बन्धनों से मुक्ति तो सभी चाहते हैं, परन्तु बन्धन किस प्रकार के हैं? यह बात हम नहीं जानते। हमें शरीर प्राप्त हुआ है तो इसके लिए कर्म करना ही है।
।।न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।।
कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी कार्य किये बिना नहीं रह सकता। प्रत्येक व्यक्ति को कर्म करना पड़ता है और इसका अर्थ है कि व्यक्ति को कर्म का बन्धन है।
जिस प्रकार लोहा काटने के लिये आरी भी लोहे की होती है उसी प्रकार कर्म काटने के लिए आरी कर्मों की ही चाहिए। कर्त्तव्य मानकर कर्म करते जाना और परमात्मा को अर्पण करते जाना है। मुमुक्षुओं ने भी इसी प्रकार से कर्म किये।
श्रीभगवान् कहते हैं कि मैंने तुम्हें सब बता दिया अब तुम्हारी जो इच्छा हो उस प्रकार कार्य करो। हे अर्जुन! तुम भी युद्ध को अपना कर्त्तव्य मानकर करो।
जिस प्रकार लोहा काटने के लिये आरी भी लोहे की होती है उसी प्रकार कर्म काटने के लिए आरी कर्मों की ही चाहिए। कर्त्तव्य मानकर कर्म करते जाना और परमात्मा को अर्पण करते जाना है। मुमुक्षुओं ने भी इसी प्रकार से कर्म किये।
श्रीभगवान् कहते हैं कि मैंने तुम्हें सब बता दिया अब तुम्हारी जो इच्छा हो उस प्रकार कार्य करो। हे अर्जुन! तुम भी युद्ध को अपना कर्त्तव्य मानकर करो।
किं(ङ्) कर्म किमकर्मेति, कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि, यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥16॥
कर्म क्या है और अकर्म क्या है - इस प्रकार इस विषय में विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भली भाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ (संसार-बन्धन) से मुक्त हो जायगा।
विवेचन -किमकर्मेति- किम् + अकर्म + इति
अकर्म क्या है? कर्म क्या है?
कर्म और अकर्म को जानने में ज्ञानी भी उलझ जाते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं कि जिसके विषय में ज्ञानियों को भी कठिनाई होती है, वह मैं तुम्हें बताऊँगा और तुम उसे जानकार अशुभ से मुक्त हो जाओगे। मुक्ति में आनन्द है और बन्धन में दुःख है। मनुष्य बन्धन में पड़ा रहता है।
अकर्म क्या है? कर्म क्या है?
कर्म और अकर्म को जानने में ज्ञानी भी उलझ जाते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं कि जिसके विषय में ज्ञानियों को भी कठिनाई होती है, वह मैं तुम्हें बताऊँगा और तुम उसे जानकार अशुभ से मुक्त हो जाओगे। मुक्ति में आनन्द है और बन्धन में दुःख है। मनुष्य बन्धन में पड़ा रहता है।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं(म्), बोद्धव्यं(ञ्) च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं(ङ्), गहना कर्मणो गतिः॥17॥
कर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है।
विवेचन-कर्म को भी जान लेना चाहिए और विकर्म को भी जान लेना चाहिए।
विकर्म को कुछ लोग निषिद्ध कर्म भी कहते हैं और कुछ लोग इसका अर्थ विशेष कर्म से भी लेते हैं। कर्मों की गति अत्यन्त गहन है।
विकर्म को कुछ लोग निषिद्ध कर्म भी कहते हैं और कुछ लोग इसका अर्थ विशेष कर्म से भी लेते हैं। कर्मों की गति अत्यन्त गहन है।
कर्मण्यकर्म यः(फ्) पश्येद्, अकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु, स युक्तः(ख्) कृत्स्नकर्मकृत्॥18॥
जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है, योगी है और सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।
विवेचन- जो व्यक्ति कर्मों में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, श्रीभगवान् कहते हैं कि वह बुद्धिमान है, योगी है। वह सारे कर्म करके श्रीभगवान् के साथ एकरूप हो जाता है। कर्म करके भी कर्म करने के भाव से जो छूट जाता है, वह कर्म करके भी अकर्म कर्ता है।
हम देखते हैं कि सूर्य भगवान् प्रतिदिन उदित और अस्त होते हैं, तो क्या वास्तव में ऐसा होता है? यदि हम सूर्य भगवान् से पूछेंगे कि आपके कारण ही मेरा संसार चल रहा है तो सूर्य भगवान् कहेंगे कि मैं तो एक ही स्थान पर स्थित रहता हूँ। तुम्हारी पृथ्वी गोल-गोल घूम रही, इसलिए तुम्हें ऐसा लगता है। न मैं उदित होता हूँ और न ही अस्त होता हूँ। यही उनके कर्म का अकर्म हो रहा है। कुछ न करते हुए, एक स्थान पर स्थित रहते हुए भी दैनिक उदय और अस्त हो रहे हैं, यह उनके अकर्म का कर्म हो रहा है।
हम देखते हैं कि सूर्य भगवान् प्रतिदिन उदित और अस्त होते हैं, तो क्या वास्तव में ऐसा होता है? यदि हम सूर्य भगवान् से पूछेंगे कि आपके कारण ही मेरा संसार चल रहा है तो सूर्य भगवान् कहेंगे कि मैं तो एक ही स्थान पर स्थित रहता हूँ। तुम्हारी पृथ्वी गोल-गोल घूम रही, इसलिए तुम्हें ऐसा लगता है। न मैं उदित होता हूँ और न ही अस्त होता हूँ। यही उनके कर्म का अकर्म हो रहा है। कुछ न करते हुए, एक स्थान पर स्थित रहते हुए भी दैनिक उदय और अस्त हो रहे हैं, यह उनके अकर्म का कर्म हो रहा है।
कर्म करके भी, मैंने किया का भाव जब मनुष्य छोड़ देता है,
तब उसके कर्म का अकर्म हो जाता है।
तब उसके कर्म का अकर्म हो जाता है।
कार्यालय में मैनेजर को देखते ही सभी कर्मचारी अपने-अपने कार्य में लग जाते हैं। मैनेजर ने तो कोई कार्य किया ही नहीं, पर उनकी उपस्थिति से ही सब लोग स्वयं ही कार्य करने लगते हैं। कुछ न करते हुए भी कर्म हो जाना अर्थात् अकर्म का कर्म हो जाना। कर्म करके भी, यह कर्म मैंने नहीं किया, इस भाव को जागृत रखना। परमात्मा की शक्ति मुझमें है, उस शक्ति के द्वारा सब काम हो रहा है, मेरे शरीर द्वारा कार्य हो रहा है। मेरी आँखे देख रही हैं, मेरे कान सुन रहे हैं, मेरी जिह्वा बोल रही है, इसमें मेरा शरीर कार्य कर रहा है, मैं नहीं कर रहा।
मेरे शरीर के द्वारा कार्य हो रहा है,
मैं नहीं कर रहा हूँ। यही सारे कर्मों का अकर्म है।
मैं नहीं कर रहा हूँ। यही सारे कर्मों का अकर्म है।
हम सब कहते हैं कि मैं ही सब काम कर रहा हूँ। मेरे बिना कोई काम नहीं होता। जब किसी काम में गलती हो जाती है तो कहते हैं कि हे भगवान्! ये आपने क्या करवा दिया? ये प्रकृति के बने हुए शरीर के द्वारा होने वाले कार्य हैं, इसका कर्ता मैं नहीं हूँ। इस बात को जानना ही कर्म में अकर्म देखना है और तब उसका अकर्म में ही कर्म होने लगता है। श्रीभगवान् कहते हैं कि ऐसा जो कर सकता है वही मनुष्यों में ज्ञानी है। सारे कर्म करके भी परमात्मा के साथ जो एकरूप हो जाता है, वह योगी बन जाता है।
यस्य सर्वे समारम्भाः(ख्), कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं(न्), तमाहुः(फ्) पण्डितं(म्) बुधाः॥19॥
जिसके सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भ संकल्प और कामनासे रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं, उसको ज्ञानीजन भी पण्डित (बुद्धिमान्) कहते हैं।
विवेचन- जिसके सारे कार्य कामनाओं और संकल्पों से मुक्त हैं, यह सारा कार्य श्रीभगवान् ने मुझे सौंपा है, इस भाव से कार्य करने वाला, जिसकी स्वयं की कोई कामना नहीं रही तो वह कार्य श्रीभगवान् का कार्य हो गया। उसने अपने सारे कर्मों को ज्ञानाग्नि में दग्ध कर दिया है। ये कर्म किसके द्वारा हो रहे हैं, यह कार्य शरीर के द्वारा हो रहे हैं, मेरी उपस्थिति के कारण कार्य हो रहे हैं - मैं नहीं कर रहा हूँ। श्रीभगवान् की शक्ति के कारण सारा कार्य हो सका, ऐसा उसका भाव होता है।
मैं कौन हूँ?
इसका ज्ञान जब हो जाता है,
तब उसको पता चलता है,
इन कर्मों का कर्ता मैं नहीं हूँ।
ज्ञानी लोग उसे पण्डित कहते हैं।
इसका ज्ञान जब हो जाता है,
तब उसको पता चलता है,
इन कर्मों का कर्ता मैं नहीं हूँ।
ज्ञानी लोग उसे पण्डित कहते हैं।
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं(न्), नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि, नैव किञ्चित्करोति सः॥20॥
जो कर्म और फल की आसक्ति का त्याग करके आश्रय से रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मों में अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता।
विवेचन- मुझे कुछ मिलेगा इसलिए मैं कर्म करूँगा, यह भाव नहीं होना चाहिए। जब मैं नौकरी करूँगा तो वेतन तो अपने-आप मिलेगा ही। कर्म करेंगे तो उसका फल तो मिलेगा ही, उसकी चिन्ता नहीं करनी है।
तीन प्रकार के बालक हैं। एक बालक विद्यालय में पढता है। घर आने के पश्चात् वह अपने हाथ-पाँव धोकर अपना पाठ करता है। उसके गुरुजनों ने पाठ करने का बताया है तो वह वह कर्त्तव्य भाव से पाठ करता है। दूसरा बालक इधर-उधर मस्ती करता घूमता रहता है, समय व्यर्थ करता रहता है। उसे अपना पाठ करने का समय नहीं मिलता है। माँ देखती है कि वह अपना कार्य नहीं कर रहा है तो वह कहती है कि यदि तुम शीघ्र ही अपना पाठ कर लोगे तो मैं तुम्हें आइसक्रीम दूँगी। इस लालच में वह कार्य कर लेता है। तीसरा बालक, जब माँ कहती है कि बेटा कार्य कर लो, मैं तुम्हें आइसक्रीम दूँगी। वह कहता है कि नहीं! मुझे पहले आइसक्रीम दो तब मैं सोचूँगा कि पाठ करना है अथवा नहीं करना है। इन तीनों बालकों में पहला बालक अपना कर्त्तव्य समझ कर पाठ कर रहा है और वह उसके फल से मुक्त रहता है।
व्यक्ति कर्म के फल की आसक्ति को छोड़कर, जो प्राप्त हुआ उसमें सन्तुष्ट रहे। कर्त्तव्य मानकर कार्य करें। कर्म करने के लिए किसी पर आश्रित भी न हो। किसी का साथ, वातावरण का साथ, नहीं! अपना कर्त्तव्य मानकर कार्य करे। आश्रय तो एक ही है, परमात्मा का। इस भाव से कार्य करना चाहिए कि श्रीभगवान् ने मुझे यह कार्य सौंपा है।
कर्म के फल प्राप्ति की आशा नहीं छोड़ सकते हैं तो उसका निरन्तर चिन्तन तो छोड़ ही सकते हैं। इस प्रकार कार्य करते हुए भी ऐसा व्यक्ति कुछ नहीं करता और वह कर्मों के बन्धन में नहीं बॅंधता, वह उनसे मुक्त हो जाता है।
तीन प्रकार के बालक हैं। एक बालक विद्यालय में पढता है। घर आने के पश्चात् वह अपने हाथ-पाँव धोकर अपना पाठ करता है। उसके गुरुजनों ने पाठ करने का बताया है तो वह वह कर्त्तव्य भाव से पाठ करता है। दूसरा बालक इधर-उधर मस्ती करता घूमता रहता है, समय व्यर्थ करता रहता है। उसे अपना पाठ करने का समय नहीं मिलता है। माँ देखती है कि वह अपना कार्य नहीं कर रहा है तो वह कहती है कि यदि तुम शीघ्र ही अपना पाठ कर लोगे तो मैं तुम्हें आइसक्रीम दूँगी। इस लालच में वह कार्य कर लेता है। तीसरा बालक, जब माँ कहती है कि बेटा कार्य कर लो, मैं तुम्हें आइसक्रीम दूँगी। वह कहता है कि नहीं! मुझे पहले आइसक्रीम दो तब मैं सोचूँगा कि पाठ करना है अथवा नहीं करना है। इन तीनों बालकों में पहला बालक अपना कर्त्तव्य समझ कर पाठ कर रहा है और वह उसके फल से मुक्त रहता है।
व्यक्ति कर्म के फल की आसक्ति को छोड़कर, जो प्राप्त हुआ उसमें सन्तुष्ट रहे। कर्त्तव्य मानकर कार्य करें। कर्म करने के लिए किसी पर आश्रित भी न हो। किसी का साथ, वातावरण का साथ, नहीं! अपना कर्त्तव्य मानकर कार्य करे। आश्रय तो एक ही है, परमात्मा का। इस भाव से कार्य करना चाहिए कि श्रीभगवान् ने मुझे यह कार्य सौंपा है।
कर्म के फल प्राप्ति की आशा नहीं छोड़ सकते हैं तो उसका निरन्तर चिन्तन तो छोड़ ही सकते हैं। इस प्रकार कार्य करते हुए भी ऐसा व्यक्ति कुछ नहीं करता और वह कर्मों के बन्धन में नहीं बॅंधता, वह उनसे मुक्त हो जाता है।
निराशीर्यतचित्तात्मा, त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं(ङ्) केवलं(ङ्) कर्म, कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥21॥
जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरह से वश में किया हुआ है, जिसने सब प्रकार के संग्रह का परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित कर्मयोगी केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पाप को प्राप्त नहीं होता।
विवेचन- यह अच्छी बात है कि श्रीभगवान् ने हमें कर्त्तव्य पालन करने के लिए कार्य सौंपे हैं। उससे कुछ मिलेगा, उसकी इच्छा नहीं करनी है। ऐसा सब कुछ करने के लिए, अपने सारे शरीर, अन्तःकरण और इन्द्रियों पर निग्रह करना पड़ता है। कुछ बातें मन के विपरीत भी करनी पड़ती हैं। सुखों की वस्तुओं का त्याग भी करना पड़ता है। जिन वस्तुओं से सुख मिलेगा, उन वस्तुओं की आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए। मैं कर्त्तव्य कर्म कर सकूँ, ऐसी बातें ही होनी चाहिएं।
अनावश्यक वस्तुओं को घर में जोड़कर नहीं रखना है। यम-नियम आसनों में पहले ही आता है, अनावश्यक वस्तुओं को जमा नहीं करना चाहिए। जिससे मुझे सुख मिले, मुझे उसकी अपेक्षा नहीं है। जीवन में बड़े ध्येय की प्राप्ति के लिए छोटे-छोटे सुखों का त्याग करना ही पड़ता है।
स्वर्गीय लता मङ्गेशकर विश्व की स्वर साम्राज्ञी थीं। उन्होंने आजीवन सङ्गीत की सेवा की और इसे अपना कर्त्तव्य मानकर कुछ बातें छोड़ीं। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि उन्होंने जीवन भर ठण्डा पानी नहीं पिया। सङ्गीत की सेवा करने के लिए, अपने गले का संरक्षण करना आवश्यक है। इसी कारण उन्होंने ठण्डे पानी का त्याग कर दिया। अपने कर्त्तव्य में जिससे बाधा आये, उन्हें ऐसा कोई परिग्रह नहीं चाहिए था।
ऐसे व्यक्तियों का सारा कार्य मात्र शारीरिक स्तर पर होता है और उनको कभी उसका पाप नहीं लगता। उससे कुछ गलती भी हो जाये तो भी उन्हें उसका पाप नहीं लगता, क्योंकि वे कोई भी कार्य फल पाने के लिए नहीं कर रहे।
दो संन्यासी जा रहे थे। शिष्य मार्ग स्वच्छ करते हुए जा रहा था। रास्ते में एक नदी थी, नदी किनारे एक युवती खड़ी थी। उसने शिष्य से कहा कि नदी गहरी नहीं है, पर प्रवाह बहुत तेज है। मैं कहीं बह न जाऊँ, मुझे डर लग रहा है। कृपया आप मुझे हाथ पकड़ कर उस किनारे ले जाओ। शिष्य ने कहा कि मैं संन्यासी हूँ। मैं आपका हाथ नहीं पकड़ सकता। मैं नियमों से बॅंधा हूँ। युवती रोने लगी कि घर पर मेरा छोटा बालक रोने लग जायेगा।
स्वर्गीय लता मङ्गेशकर विश्व की स्वर साम्राज्ञी थीं। उन्होंने आजीवन सङ्गीत की सेवा की और इसे अपना कर्त्तव्य मानकर कुछ बातें छोड़ीं। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि उन्होंने जीवन भर ठण्डा पानी नहीं पिया। सङ्गीत की सेवा करने के लिए, अपने गले का संरक्षण करना आवश्यक है। इसी कारण उन्होंने ठण्डे पानी का त्याग कर दिया। अपने कर्त्तव्य में जिससे बाधा आये, उन्हें ऐसा कोई परिग्रह नहीं चाहिए था।
ऐसे व्यक्तियों का सारा कार्य मात्र शारीरिक स्तर पर होता है और उनको कभी उसका पाप नहीं लगता। उससे कुछ गलती भी हो जाये तो भी उन्हें उसका पाप नहीं लगता, क्योंकि वे कोई भी कार्य फल पाने के लिए नहीं कर रहे।
दो संन्यासी जा रहे थे। शिष्य मार्ग स्वच्छ करते हुए जा रहा था। रास्ते में एक नदी थी, नदी किनारे एक युवती खड़ी थी। उसने शिष्य से कहा कि नदी गहरी नहीं है, पर प्रवाह बहुत तेज है। मैं कहीं बह न जाऊँ, मुझे डर लग रहा है। कृपया आप मुझे हाथ पकड़ कर उस किनारे ले जाओ। शिष्य ने कहा कि मैं संन्यासी हूँ। मैं आपका हाथ नहीं पकड़ सकता। मैं नियमों से बॅंधा हूँ। युवती रोने लगी कि घर पर मेरा छोटा बालक रोने लग जायेगा।
इतनी देर में गुरुजी आ गए और युवती को रोते देखा तो रोने का कारण पूछा। युवती ने पूरी बात बता दी। गुरुजी ने कहा कि चलो मैं तुम्हे उस पार छोड़ देता हूँ और वे युवती को हाथ पकड़कर दूसरे किनारे छोड़ आये। दूसरे दिन शिष्य ने गुरुजी से पूछा कि आप भी संन्यासी हैं। आप ही ने मुझे शिक्षा दी है। आप ही ने स्त्री के शरीर स्पर्श को वर्जित बताया है, फिर भी कल आपने उस स्त्री का हाथ पकड़ कर नदी पार कराई? तब गुरुजी ने कहा कि अरे! मैंने तो उसे वहीं छोड़ दिया था, तुमने अभी भी पकड़ कर रखा है। यह मैंने कर्त्तव्य के भाव से किया। ऐसा कर्म करने से कोई पाप नहीं लगता।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो, द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः(स्) सिद्धावसिद्धौ च, कृत्वापि न निबध्यते॥22॥
जो (कर्मयोगी) फल की इच्छा के बिना, अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्या से रहित, द्वन्द्वों से अतीत तथा सिद्धि और असिद्धि में सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता।
विवेचन- कर्त्तव्य कर्म करने से अपने-आप फलस्वरूप कुछ न कुछ प्राप्त हो गया। श्रीभगवान् के लिए कार्य किया तो श्रीभगवान् के प्रसाद स्वरूप कुछ प्राप्त हो गया। जो कुछ प्राप्त हुआ, वह प्रभु की इच्छा से हुआ। जो प्राप्त हुआ, उससे सन्तुष्ट हैं और आगे भी कर्त्तव्य करने के लिए तत्पर हैं। सन्तुष्ट होने का अर्थ जीवन में आगे बढ़ना है, रुकना नहीं है। आगे और भी कर्त्तव्य हैं।
कोई फेक्ट्री चलाता है और उसमें उसे जो भी लाभ हुआ उसमें सन्तुष्ट रहना है। उसे और आगे बढ़ाने के लिए प्रयास तो करना ही है। कार्य बड़ा करना है, पर उससे लाभ भी बड़ा हो ऐसा आवश्यक नहीं है। जो भी लाभ मिले, उसमें सन्तुष्ट रहना है। जो भी लाभ होने वाला है, वह तो होगा ही, उसकी चिन्ता नहीं करनी है।
लोग सोचते हैं कि जो होने वाला है, वह तो होगा ही तो कार्य क्यों करना है? परन्तु ऐसा नहीं है, हमें अपना कर्त्तव्य तो करना ही है और उससे जो भी प्राप्त होगा, उससे सन्तुष्ट भी रहना है। तदुपरान्त सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, शीत-उष्ण इन सभी द्वन्द्वों से मुक्त हो जाना। अतीत से आगे निकल जाना है, उसमें अटके नहीं रहना है ।
मत्सर-
कोई अपने साथ आता है तो कोई बात नहीं रहती। जब कोई अपने से आगे निकलने लगता है तो ईर्ष्या जन्म लेती है।
एक फिल्म थ्री इडियट में मित्रों के बारे में कहा गया था कि मित्र जब फेल होता है तो दुःख होता है, परन्तु जब मित्र प्रथम आता है तो और भी अधिक दुःख होता है। यह बात सच्चा मित्र होने में बाधक है। यह मत्सर अच्छा नहीं है। मुझे जो प्राप्त हुआ है, मैं उसमें सन्तुष्ट हूँ। मैं जितना प्रयास कर सकता था, मैंने किया है।
सिद्धि-असिद्धि, पूर्णता प्राप्त हुई, नहीं हुई, कार्य तो पूर्ण हो सका। देश के लिए दौड़ने निकला था, परन्तु स्वर्ण-पदक नहीं ला सका, तो निराश नहीं होना है, और अधिक प्रयास करना है। स्वर्ण-पदक मिलने से भी उत्तेजित नहीं होना और नहीं मिलने से निराश नहीं होना, सम रहना है।
हमारे कुछ खिलाड़ियों को हमने देखा है कि वे पदक मिलने के बाद भी उत्तेजित नहीं होते वरन् शान्त रहते हैं। जिसके द्वारा ये पदक मिला है, उसे प्रणाम करते हैं और असिद्ध नहीं होने पर क्रोध में अपने बल्ले को तोड़ नहीं देते। वे दोनों बातों में सम रहते हैं। इस भाॅंति वे कर्म करके भी उस कर्म के बन्धन में अटकते नहीं हैं।
कोई फेक्ट्री चलाता है और उसमें उसे जो भी लाभ हुआ उसमें सन्तुष्ट रहना है। उसे और आगे बढ़ाने के लिए प्रयास तो करना ही है। कार्य बड़ा करना है, पर उससे लाभ भी बड़ा हो ऐसा आवश्यक नहीं है। जो भी लाभ मिले, उसमें सन्तुष्ट रहना है। जो भी लाभ होने वाला है, वह तो होगा ही, उसकी चिन्ता नहीं करनी है।
लोग सोचते हैं कि जो होने वाला है, वह तो होगा ही तो कार्य क्यों करना है? परन्तु ऐसा नहीं है, हमें अपना कर्त्तव्य तो करना ही है और उससे जो भी प्राप्त होगा, उससे सन्तुष्ट भी रहना है। तदुपरान्त सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, शीत-उष्ण इन सभी द्वन्द्वों से मुक्त हो जाना। अतीत से आगे निकल जाना है, उसमें अटके नहीं रहना है ।
मत्सर-
कोई अपने साथ आता है तो कोई बात नहीं रहती। जब कोई अपने से आगे निकलने लगता है तो ईर्ष्या जन्म लेती है।
एक फिल्म थ्री इडियट में मित्रों के बारे में कहा गया था कि मित्र जब फेल होता है तो दुःख होता है, परन्तु जब मित्र प्रथम आता है तो और भी अधिक दुःख होता है। यह बात सच्चा मित्र होने में बाधक है। यह मत्सर अच्छा नहीं है। मुझे जो प्राप्त हुआ है, मैं उसमें सन्तुष्ट हूँ। मैं जितना प्रयास कर सकता था, मैंने किया है।
सिद्धि-असिद्धि, पूर्णता प्राप्त हुई, नहीं हुई, कार्य तो पूर्ण हो सका। देश के लिए दौड़ने निकला था, परन्तु स्वर्ण-पदक नहीं ला सका, तो निराश नहीं होना है, और अधिक प्रयास करना है। स्वर्ण-पदक मिलने से भी उत्तेजित नहीं होना और नहीं मिलने से निराश नहीं होना, सम रहना है।
हमारे कुछ खिलाड़ियों को हमने देखा है कि वे पदक मिलने के बाद भी उत्तेजित नहीं होते वरन् शान्त रहते हैं। जिसके द्वारा ये पदक मिला है, उसे प्रणाम करते हैं और असिद्ध नहीं होने पर क्रोध में अपने बल्ले को तोड़ नहीं देते। वे दोनों बातों में सम रहते हैं। इस भाॅंति वे कर्म करके भी उस कर्म के बन्धन में अटकते नहीं हैं।
गतसङ्गस्य मुक्तस्य, ज्ञानावस्थितचेतसः।
यज्ञायाचरतः(ख्) कर्म, समग्रं(म्) प्रविलीयते॥23॥
जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूप के ज्ञान में स्थित है, ऐसे केवल यज्ञ के लिये कर्म करने वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं।
विवेचन- जिसकी आसक्ति छूट गयी है, करने के भाव से मुक्त है, जो कार्य करता रहता है पर अहम् भाव से मुक्त होता जाता है, जिसका चित्त सदा ध्यान में अवस्थित रहता है (ध्यान अर्थात् आत्म ध्यान), वह कर्म बन्धन में नहीं फँसता। जब मनुष्य को यह ज्ञात रहता है कि मैं कौन हूँ, वह जानता है कि किसी भी कार्य का कर्ता मैं नहीं हूँ, तब वह सर्वदा ध्यान में रहता है।
मेरी उपस्थिति के कारण मेरा आत्मस्वरूप है। मैं इस शरीर में रहता हूँ, मैं शरीर नहीं हूँ। मैं शुद्ध आत्म रूप हूँ, यह मात्र शब्दशः जानना नहीं है। यह मैं नहीं कर रहा हूँ, यह हो रहा है, इसकी अनुभूति होना, मेरी उपस्थिति मात्र से, मेरे शरीर द्वारा कार्य हो रहा है।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं, तत्वज्ञानार्थदर्शनम् |
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ||
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ||
अपने को जानकर अध्यात्म ज्ञान में नित्य ही इस भाव में रह सकना सरल नहीं है।
यज्ञायाचरतः का अर्थ है, यज्ञ के लिए अर्थात् अपने कर्त्तव्य के लिए कर्म करना।
समग्रं(म्) प्रविलीयते-
श्रीभगवान् कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति के सारे कर्म विलीन हो जाते हैं। वह ज्ञानरूपी अग्नि में विलीन हो जाते हैं और ऐसे पुरुष कर्म से मुक्त हो जाते हैं।
इस अध्याय से हमें यही सीखना हैं।
यज्ञायाचरतः का अर्थ है, यज्ञ के लिए अर्थात् अपने कर्त्तव्य के लिए कर्म करना।
समग्रं(म्) प्रविलीयते-
श्रीभगवान् कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति के सारे कर्म विलीन हो जाते हैं। वह ज्ञानरूपी अग्नि में विलीन हो जाते हैं और ऐसे पुरुष कर्म से मुक्त हो जाते हैं।
इस अध्याय से हमें यही सीखना हैं।
प्रश्नोत्तर
प्रश्नकर्ता- श्री आदर्श भैया
प्रश्न- श्रीकृष्ण अर्जुन को “परं तप:” कहकर सम्बोधित करते हैं। इसका अर्थ क्या है?
उत्तर- सम्पूर्ण भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को अनेक विशेषणों से सम्बोधित करते हैं, यह उनका अर्जुन के प्रति स्नेह भाव दर्शाता है। परं तप: का अर्थ है जो युद्ध में शत्रुओं को ताप दे सकता है, अर्थात् शत्रुओं को अपने बल से पराजित कर सकता है। अर्जुन ने कठिन तपस्या कर यह सिद्धि प्राप्त की थी।
प्रश्नकर्ता- श्री आदर्श भैया
प्रश्न- श्रीभगवान् कर्मों से चिपकते नहीं हैं। कृपया इसे स्पष्ट करें।
उत्तर- कर्म करते हुए हमारे मन में यह भाव आता है कि यह मैंने किया है, जब कर्म हमने किया है तो उसका फल भी हमें भोगना पड़ेगा, यानि वह कर्म हमसे चिपक गया। “पड़ेगा” इस शब्द में बन्धन है। कर्म कोई भी हो उसका फल भोगना पड़ता है। पुण्यकर्म करते हैं तो उसका फल सुख के रूप में हमें भुगतना पड़ेगा, जिसके लिए हमें बार-बार देह धारण करना पड़ेगा।
कर्म करते हुए उसे श्रीभगवान् को समर्पित करने से हम कर्म के बन्धन में नहीं बँधते और जब कर्म ही हमारा नहीं है तो उसका फल हम क्यों भुगतें? कर्त्तव्य भाव से कर्म करना ही यज्ञ करना है। श्रीभगवान् की ज्ञान की अग्नि में उनके कर्म भस्मसात् हो जाते हैं, इसलिए वे कर्मों से नहीं चिपकते।
प्रश्नकर्ता - श्रीमती राधा झा दीदी (सुपुत्र)
प्रश्न- क्या श्रीभगवान् को कर्म समर्पित करने का अभ्यास करना होगा? बुरे काम तो श्रीभगवान् नहीं देते?
उत्तर- छात्र का प्रथम कर्त्तव्य ज्ञान प्राप्त करना है। हमें यह मनुष्य जन्म श्रीभगवान् ने दिया है, इसलिए हम जो भी करते हैं, वह काम श्रीभगवान् ने ही हमें सौंपा है। यह भाव मन में होना चाहिए और सभी काम बहुत अच्छे से करने चाहिएं।
श्रीभगवान् बुरे काम करने को नहीं कहते। जब हम सोचते हैं कि हम श्रीभगवान् का कार्य कर रहे हैं तो हमसे गलत काम होंगे ही नहीं।
उत्तर- छात्र का प्रथम कर्त्तव्य ज्ञान प्राप्त करना है। हमें यह मनुष्य जन्म श्रीभगवान् ने दिया है, इसलिए हम जो भी करते हैं, वह काम श्रीभगवान् ने ही हमें सौंपा है। यह भाव मन में होना चाहिए और सभी काम बहुत अच्छे से करने चाहिएं।
श्रीभगवान् बुरे काम करने को नहीं कहते। जब हम सोचते हैं कि हम श्रीभगवान् का कार्य कर रहे हैं तो हमसे गलत काम होंगे ही नहीं।
शिक्षक को श्रीभगवान् स्वरूप मानकर अपना गृहकार्य पूरा करना चाहिए। खेलते समय, भोजन करते हुए भी ऐसा ही सोचना चाहिए।
प्रश्नकर्ता- श्रीमती नन्दिनी मिश्रा दीदी
प्रश्न- क्या “निराश्रय: का अर्थ अपना सारा काम करते हुए श्रीभगवान् का साथ हो या न हो फिर भी काम करते रहना है?
उत्तर- नहीं, इसका अर्थ है हमें सारे काम श्रीभगवान् के आश्रय में ही करने हैं। अन्य कोई साथ हो न हो, श्रीभगवान् का साथ आवश्यक है।
प्रश्नकर्ता- श्री साईं प्रसाद भैया
प्रश्न- “बहुनि में व्यतीतानि” श्रीभगवान् ने अर्जुन जैसे मनुष्यों के साथ कई बार अनेक रूपों में जन्म लिया है, परन्तु इसी अध्याय के सातवें श्लोक में वे कहते हैं- “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत”। जब-जब धर्म की हानि होती है श्रीभगवान् जन्म लेते हैं। ये दो विरोधी तर्क हैं इन्हें कैसे समझें? बहुनि का अर्थ क्या है?
उत्तर- श्रीभगवान् ने केवल मनुष्य जन्म ही नहीं लिया है, उन्होंने मत्स्य, कूर्म आदि कई अवतार लिए हैं।
धर्म का अर्थ है अपने कर्त्तव्य कर्म करना और जब नियमों का पालन नहीं होता और धर्म की हानि होती है, तब श्रीभगवान् को अवतार लेना पड़ता है। वैसे ही जैसे सड़क के नियमों का पालन न करने पर पुलिस को आना पड़ता है।
श्रीभगवान् हमारी रक्षा करेंगे यह सोचकर हमें निष्क्रिय नहीं बैठना है।
श्रीभगवान् हमारी रक्षा करेंगे यह सोचकर हमें निष्क्रिय नहीं बैठना है।
प्रश्नकर्ता- श्रीमती विमल अरोरा दीदी
प्रश्न- सब कर्मों का फल श्रीभगवान् को कैसे सौंप सकते हैं?
उत्तर- इसके लिए कुछ विशेष करने की आवश्यकता नहीं है और न कहीं जाने की आवश्यकता है, बस मन में यह भावना होनी चाहिए कि हम जो भी काम कर रहे हैं, वह श्रीभगवान् का दिया हुआ है और उन्हें भी समर्पित कर रहे हैं।
प्रश्नकर्ता- श्रीमती अनुपमा अग्रवाल दीदी
प्रश्न- दुर्घटना या आत्महत्या से मृत्यु पहले ही निश्चित होती है?
उत्तर- जन्म के साथ ही मृत्यु भी निश्चित होती है। मृत्यु किस प्रकार होगी यह मनुष्य के कर्मों पर निर्भर करता है। हो सकता है कोई वाहन, प्राणी या कोई प्राकृतिक दुर्घटना हमारा काल बनकर आए। मृत्यु को किस प्रकार स्वीकार करना है? यह श्रीभगवान् ने आठवें अध्याय में बताया है। मृत्यु कभी भी किसी भी रूप में आ सकती है, इसलिए हमें सदा भगवत्स्मरण करते रहना चाहिए, क्योंकि स्मरण करते हुए मृत्यु आने पर श्रीभगवान् की प्राप्ति होगी।
प्रश्नकर्ता- श्रीमती श्वेता रेड्डी दीदी
प्रश्न- इस अध्याय के पन्द्रहवें श्लोक में श्रीभगवान् कहते हैं “एवं ज्ञात्वा कृत कर्म, पूर्वैरपि मुमुक्षुभि:”। मोक्ष प्राप्ति के लिए पूर्वजों का अनुसरण करना है, लेकिन हम यह कैसे जान पाएंगे कि उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ था या नहीं?
उत्तर- श्रीभगवान् ने इस अध्याय के प्रारम्भ में ही बता दिया कि वे जो ज्ञान अब अर्जुन को बता रहे हैं, वह पहले सूर्य भगवान् को और फिर मनु को भी बता चुके हैं। ऐसा लगता है कि वह ज्ञान अब विलुप्त हो गया है। वास्तव में ज्ञान विलुप्त नहीं होता, विस्मृत हो सकता है, लोग उसे भूल जाते हैं, इसलिए उसका स्मरण कराने के लिए श्रीभगवान् बार-बार यह उपदेश देते हैं, जिससे हम अपने पूर्वजों के बारे में जानकर वैसे ही कर्म करें, जिनसे उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ था।