विवेचन सारांश
यज्ञ, दान और तप के तीन प्रकार

ID: 8308
हिन्दी
रविवार, 23 नवंबर 2025
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग
2/2 (श्लोक 12-28)
विवेचक: गीता विशारद डॉ. संजय जी मालपाणी


देश भक्ति गीत, हनुमान चालीसा, सुमधुर प्रार्थना, दीप प्रज्वलन एवम् गुरु वन्दना के साथ आज के सत्र का आरम्भ हुआ।

श्रीमद्भागवद्गीता के विभिन्न अध्यायों में हमें जीवन जीने की शैली के सिद्धान्त बताए गए हैं। इन सिद्धान्तों को हम अपने दैनिक जीवन में कैसे व्यावहारिक रूप से लाएँ, यह ज्ञान मुख्य रूप से सत्रहवें अध्याय से प्राप्त होता है। इसलिए यह अध्याय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

अर्जुन ने श्रीभगवान् से प्रश्न किया था कि जो लोग शास्त्रों के नियम नहीं जानते, फिर भी श्रद्धा से कोई कार्य करते हैं, उनकी श्रद्धा कैसी मानी जाए सात्त्विक, राजसिक या तामसिक?
श्रीभगवान् ने उत्तर दिया कि मनुष्य की श्रद्धा ही उसके व्यक्तित्व का दर्पण है। श्रद्धा जैसी होगी, व्यक्ति का जीवन भी वैसा ही होगा।

हम देखते हैं कि एक ही माता-पिता की सन्तानें भी स्वभाव में भिन्न होती हैं। बड़ा बालक बड़ों को आदरपूर्वक प्रणाम करता है, जबकि छोटा बालक माता-पिता के कहने पर भी झुकना नहीं चाहता। एक अत्यन्त विनम्र होता है, दूसरा अहङ्कारयुक्त। यदि कहा जाए कि छोटे बच्चे बड़ों को देखकर सीखते हैं, तो फिर यह भिन्न प्रवृत्ति कहाँ से आती है?

इसका उत्तर है, हम केवल इस जन्म के संस्कार नहीं लाते, पूर्वजन्म के संस्कार भी साथ लेकर आते हैं।

हम खान-पान की आदतों से भी व्यक्ति की प्रवृत्ति को समझ सकते हैं।
 यदि सात्त्विक भोजन प्रिय है तो प्रवृत्ति सात्त्विक मानी जाती है।
जो खारा, तीखा, खट्टा, अधिक गर्म भोजन पसन्द करता है वह राजसिक प्रवृत्ति का होता है।

जो रूखा-सूखा, बासी, दुर्गन्ध युक्त भोजन करता है, उसे तामसिक प्रवृत्ति वाला समझना चाहिए।

ध्यान रहे, आहार प्रवृत्ति बनाता नहीं है, पर जिसकी प्रवृत्ति जैसी होती है उसे वैसा ही आहार पसन्द आता है 

यज्ञ का विवेचन
 श्रीमद्भगवद्गीता जी में यज्ञ भी तीन प्रकार के बताए गए हैं।
शास्त्र-विधि से, कर्तव्य-भावना से, और फल-त्यागपूर्वक किया गया यज्ञ, सात्त्विक यज्ञ कहलाता है।

एक बार एक पीठाधीश ने अत्यन्त आग्रहपूर्वक यज्ञ करना चाहा और उनका यजमान बनने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। यज्ञ काफी बड़ा और विस्तृत अनुष्ठान था।

यज्ञ में परम्परा यह है -
प्रथम आहुति कुलदेवता को दी जाती है।
दूसरी ग्राम देवता को।
फिर स्थान-देवता को।
घर में हवन करते समय भी जो देवी-देवता वहाँ स्थापित हों, उनकी आहुति दी जाती है।
इसके बाद पितरों की आहुति
फिर गणेशजी का आह्वान करके गणपति हवन,
अष्टमात्रिकाओं और नवग्रहों की पूजा,
और अन्त में जिस कार्य हेतु यज्ञ किया जा रहा है, उस यज्ञ-देवता की पूजा की जाती है।
यह सब शास्त्र-विधान के अनुसार होता है।

यज्ञ से पहले यह भी आवश्यक है कि
किस दिन यज्ञ किया जा रहा है?
वेदपाठी कौन हैं?
वे शास्त्रों के ज्ञाता हैं या नहीं?
इन सब बातों का ध्यान रखा जाए।

आनन्द और सुख में अन्तर 
आनन्द और सुख में गहरा अन्तर है।
इच्छा पूरी होने पर जो क्षणिक प्रसन्नता मिलती है वह सुख है। इसका अन्ततः परिणाम दुःख में ही होता है।
जबकि जो भीतर से उत्पन्न होता है, किसी आकाङ्क्षा से रहित होता है, वही आनन्द है, और उसका अन्तिम छोर परमात्मा का परम आनन्द है।

दशरथजी ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया और उन्हें चार पुत्र प्राप्त हुए, पर अन्ततः उनकी मृत्यु पुत्र-वियोग में ही हुई—यह सुख के परिणाम को दर्शाता है।

जैसे, कमरे में ए.सी. लगवाने से सुख मिलता है, पर यदि उससे जोड़ों में दर्द शुरू हो जाए तो वही सुख दुःख में बदल जाता है।

अधिक मीठा, अधिक नमकीन, अधिक मसालेदार भोजन स्वाद देता है, पर बाद में पेट में तकलीफ देता है। यह भी सुख से दुःख की ओर ले जाने वाला उदाहरण है।

बालकों को दिया गया उदाहरण-
मैंने बच्चों से कहा,“मैं तुम्हें पैसे दूँगा, तुम सूची बनाओ कि क्या-क्या लाना चाहोगे।”
उन्होंने वही वस्तुएँ लिखीं जो उन्हें क्षणिक सुख देंगी।
फिर मैंने एक बालक को पाँच सौ का नोट देते हुए पूछा “क्या तुम इसे फाड़ सकते हो?”
उसने उत्तर दिया “हम मेहनत के पैसे को नष्ट नहीं करेंगे।”

एक और बालक से जब पूछा गया कि उसे क्या आनन्द देता है, उसने कहा “क्रिकेट खेलने से।”
यह भी सही है यह मनोरञ्जन भी देता है और स्वास्थ्य भी।

दूसरा बच्चा बोला “जब परीक्षा का समय हो, तब क्रिकेट खेलने में समय बिताने से दुःख होगा।”

स्पष्ट है कि अनुशासन में किया गया कार्य आनन्द देता है, अनियन्त्रित कार्य सुख देकर दुःख देता है।

यज्ञ का व्यापक अर्थ
सात्त्विक यज्ञ केवल अग्नि में आहुति देने भर का नाम नहीं है।
श्रीभगवान ने अनेक प्रकार के यज्ञ बताए हैं—
द्रव्य यज्ञ
योग यज्ञ
तप यज्ञ
स्वाध्याय यज्ञ
अहिंसा यज्ञ
आत्म-संयम का यज्ञ
इन्द्रिय विषयों का त्याग-यज्ञ आदि।

पितृ-ऋण से मुक्ति के लिए श्राद्ध और अगली पीढ़ी का निर्माण भी एक प्रकार का यज्ञ है।
देव-ऋण से मुक्ति के लिए हवन किया जाता है।
गुरु-सेवा, परम्पराओं को जीवित रखना, धर्म को जीवन्त रखना ये सब भी यज्ञ हैं।
लोक-ऋण और समाज-ऋण भी हमारे ऊपर हैं। अस्पताल, मन्दिर, विद्यालय जहाँ से हम लाभ लेते हैं, वहाँ कुछ न कुछ योगदान अवश्य देना चाहिए।

एक व्यक्ति से श्मशान की (कम्पाउण्ड वॉल) चारदीवारी बनवाने के लिए चन्दा माँगा गया तो उसने कहा-“श्मशान में चोरी क्या होना है!”

पर जब स्विमिंग पूल के लिए चन्दा माँगा गया तो वह एक बाल्टी पानी भरकर ले आया और बोला-“यह मेरी तरफ से रहा, बाल्टी खाली हो जाए तो लौटा देना।”

ऐसी प्रवृत्ति वाले लोग भी होते  हैं।

शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है कि जब कोई देह-दाह होता है तो चिता में लकड़ी जलती है इसलिए जीवन में कम से कम एक वृक्ष लगाएँ और उसके वृक्ष बनने तक उसकी सेवा करें-यह भी यज्ञ है।

गर्मी में प्याऊ लगाना, पशु-पक्षियों के लिए जल की व्यवस्था करना ये भी द्रव्य यज्ञ हैं।

उद्दालक ऋषि ने स्वर्ग प्राप्ति के लिए विश्वजीत यज्ञ किया था। यह यज्ञ का एक विशिष्ट उदाहरण है।

17.12

अभिसन्धाय तु फलं(न्), दम्भार्थमपि चैव यत्|
इज्यते भरतश्रेष्ठ, तं(म्) यज्ञं(म्) विद्धि राजसम्||17.12||

परन्तु हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! जो यज्ञ फल की इच्छा को लेकर अथवा दम्भ (दिखावटीपन) के लिये भी (किया जाता है), उस यज्ञ को (तुम) राजस समझो।

विवेचन - अहङ्कार और दिखावे के लिए जो यज्ञ किए जाते हैं, वे राजसिक यज्ञ समझने चाहिए।

उद्दालक ऋषि विश्वजीत यज्ञ कर रहे थे। उनके पुत्र नचिकेता यह सब देख रहे थे। विश्वजीत यज्ञ की विशेषता यह है कि इसमें यजमान अपने लिए कुछ नहीं रखता, सब कुछ दान कर देता है। ऋषि ने अपने आश्रम की सभी गौओं का दान कर दिया, जिनमें बहुत-सी वृद्ध गौएँ भी थीं, जो दूध देने में असमर्थ थीं।

नचिकेता को यह अनुचित लगा। उसने सोचा कि ऐसी वृद्ध गौएँ तो सेवा की अधिक अधिकारी हैं; इन्हें दान करना उचित नहीं और ऐसा करने से मेरे पिताजी पाप के भागी बनेंगे। अतः नचिकेता ने अपने पिता को ऐसी गौओं के दान से रोकना चाहा।

तब ऋषि ने कहा-“तुम नहीं समझते, चुप रहो। इस यज्ञ में सब कुछ दान देना अनिवार्य है।”

नचिकेता ने पूछा-“आप मुझे किसे दान देंगे? मैं भी तो आपका पुत्र हूँ।”

इसी संवाद के कारण नचिकेता को पिता ने यम को दान देने का सङ्कल्प घोषित कर दिया। तत्पश्चात नचिकेता तीन दिन तक यम-द्वार पर खड़े रहे, क्योंकि यमदूतों ने उन्हें भीतर प्रवेश नहीं दिया। तीन दिन बाद यमराज वहाँ पहुँचे।

यमराज ने पूछा “यह बालक कौन है?”
द्वारपालों ने कहा “यह तीन दिन से भूखा-प्यासा यहाँ बैठा है। कहता है कि इसके पिता ने इसे आपको दान में दे दिया है।”
यमराज ने कहा “वत्स! तुम तीन दिन तक मेरे लिए उपवास करते रहे हो, अतः तीन वर माँगो।”

नचिकेता ने कहा, “मेरे पिता का क्रोध शान्त हो जाए और उन्हें किसी प्रकार का पाप न लगे।”

नचिकेता ने अग्नि-विद्या सीखना चाहा, “स्वर्ग प्राप्त करने के लिए जो अग्नि-विद्या आवश्यक है, वह मुझे सिखाएँ।”

बालक की जिज्ञासा और तप देखकर यमराज प्रसन्न हुए। उन्होंने अग्नि-विद्या का उपदेश दिया। यह अग्नि आगे चलकर “नचिकेता अग्नि” कहलायी। यमराज ने यह वरदान भी दिया कि, “अब से मृत्यु-लोक से बिना अग्नि के कोई यमलोक नहीं आएगा।”

इसी कारण हिन्दू परम्परा में शव-दाह के समय घर से अग्नि ले जाने की प्रथा है। घर के आँगन में जो अग्नि जलाई जाती है, वह रसोईघर की उसी अग्नि से ली जाती है जिस पर नित्य नैवेद्य पकता है। उसी अग्नि से दाह-संस्कार किया जाता है। यह विधान स्वयं यमराज ने नचिकेता को बताया था।

अग्नि में देह का हवन होना स्वर्ग-प्राप्ति हेतु अत्यन्त आवश्यक माना गया है।

तीसरे वरदान में नचिकेता ने यमराज से मृत्यु का ज्ञान माँगा।
यमराज ने कहा, “वत्स! यह ज्ञान किसी को नहीं दिया जा सकता। तुम और कुछ माँग लो।”
नचिकेता ने उत्तर दिया, “मुझे और कुछ नहीं चाहिए। यदि आप यह ज्ञान नहीं देना चाहते, तो कोई बात नहीं।”
यमराज बोले,“तीसरा वर माँगना ही पड़ेगा।”
नचिकेता पुनः बोले, “मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
अन्ततः नचिकेता की सत्य-जिज्ञासा और दृढ़ निष्ठा को देखकर यमराज को मृत्यु-विद्या का उपदेश देना ही पड़ा।

अतः उद्दालक ऋषि का विश्वजीत यज्ञ राजसिक था, किन्तु नचिकेता ने यमराज के द्वार पर तीन दिन तक भूखे-प्यासे रहकर जो तप-यज्ञ किया वह सात्त्विक था और उसी के फलस्वरूप नचिकेता अमर हो गए, उनका नाम सदैव के लिए अमर-तपस्वियों में प्रतिष्ठित हो गया।

17.13

विधिहीनमसृष्टान्नं(म्), मन्त्रहीनमदक्षिणम्|
श्रद्धाविरहितं(म्) यज्ञं(न्), तामसं(म्) परिचक्षते||17.13||

शास्त्र विधि से हीन, अन्न-दान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के (और) बिना श्रद्धा के किये जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।

विवेचन- शास्त्र-विधि से हीन, अन्नदान से रहित, मन्त्रों के बिना, अशुद्ध मन्त्र-उच्चारण के साथ, दक्षिणा-रहित और श्रद्धा-रहित किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहा जाता है।

प्रायः देखा जाता है कि विवाह-संस्कार के समय वर और वधू पक्ष के लोग वरमाला के अवसर पर वधू को ऊपर उठा लेते हैं और हवा में ही वरमाला होती है। जबकि शिव-पार्वतीजी का विवाह पृथ्वी पर हुआ, श्रीराम का विवाह पृथ्वी पर हुआ, श्रीकृष्ण का विवाह भी पृथ्वी पर हुआ।

हमारे यहाँ अब विवाह आकाश में होने लगे—तो फिर विवाह की मङ्गलता कैसे दिखाई देगी? इस प्रकार शास्त्र-विहित विधि नष्ट होने लगी है।

हम समय और मुहूर्त का पालन भी सही प्रकार से नहीं करते। नाच-गाने में अधिक समय व्यतीत हो जाता है। आज हमारे विवाहों का स्वरूप लगभग पूर्णतः विधिहीन हो गया है। पहले घर के लोग स्वयं रसोई बनाते थे और बाहर से नर्तक आते थे; अब स्थिति उलट गई है  घर के लोग नाचते हैं और भोजन बनाने वाले बाहर से बुलाए जाते हैं।

विवाह-यज्ञ कराने के लिए ऐसे पण्डित को बुलाना चाहिए जिसने अपना सम्पूर्ण बाल्यकाल वेदाध्ययन में व्यतीत किया हो। ऐसे विद्वान के मन्त्र-उच्चारण स्वतः शुद्ध होंगे। उन्हें उचित दक्षिणा देकर यज्ञ कराना चाहिए। दक्षिण और उत्तर भारत से आने वाली वेद-पाठ की पारम्परिक टीमें जब एक स्वर में वेद-मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण करती हैं, तो वह स्थान अलौकिक बन जाता है।

अग्नि-पूजा और अग्नि-मन्त्रों का उच्चारण अनेक स्थानों पर बन्द होता जा रहा है, जिसके कारण सनातन परम्परा धीरे-धीरे पीछे हटती जा रही है।

पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, इंडोनेशिया, म्यांमार — ये सब किसी समय भारत के ही अङ्ग थे। जहाँ भी वेद-ध्वनि रुकी, वहाँ संस्कृति कट गई। कश्मीर में भी जिस स्थान से ऋचाएँ बन्द हुईं, वहाँ से पण्डितों को विस्थापित होना पड़ा।

स्वामीजी ने इस स्थिति को समझा और पैन्तालीस वेदशालाएँ स्थापित कीं। मणिपुर, जम्मू आदि स्थानों पर वेद-पाठशालाएँ पुनः आरम्भ हुईं। वेद-मन्त्रों का उच्चारण रुकना नहीं चाहिए, क्योंकि जहाँ वेद रुकते हैं वहाँ राष्ट्र की शक्ति घटती है। यह देश न रुके, न झुके यही सङ्कल्प है।

पुरोहित का भी परिवार होता है, अतः उसका उचित भरण-पोषण होना चाहिए। जो पुरोहित दो से चार घण्टे यज्ञ, हवन, पूजन करवाता है, उसे योग्य दक्षिणा देना भी श्रद्धा का हिस्सा, भाग है।
श्रद्धा के बिना किया गया यज्ञ तामस कहलाता है।

विवाह के समय दूल्हा-दुल्हन पर अक्षत चढ़ाए जाते हैं, अक्षत अर्थात् वे चावल जिनका कभी क्षय नहीं होता। इन्हें रङ्ग देकर मन्त्रों के साथ वर-वधू पर अर्पित किया जाता है। एक व्यक्ति ने इसे “ (waste of resource) संसाधन का अपव्यय” कहा। वास्तव में इसमें मात्र दो मुट्ठी चावल लगते हैं; परन्तु भोजन के समय जितना भोजन लोग व्यर्थ फेंकते हैं, वह कोई नहीं देखता।

अक्षत भी व्यर्थ नहीं जाते; साफ-सफाई के बाद उन्हें अलग स्थान पर रख दिया जाता है, जहाँ चिड़ियाँ आकर उन्हें खा लेती हैं। उनका पेट भरता है।

महादेव पर दूध चढ़ाने पर कुछ लोग कहते हैं कि “दूध बर्बाद हो रहा है”, परन्तु ऐसे लोग न तो किसी भूखे बच्चे को दूध पिलाते हैं और न ही भगवान पर चढ़ाने देते हैं। इस प्रकार की प्रवृत्ति तामसिक कही गई है।

इस प्रकार श्रीभगवान् ने हमें यज्ञ के तीन प्रकार बताए। अगले श्लोकों में श्रीभगवान् तप के स्वरूप का वर्णन करते हैं।

17.14

देवद्विजगुरुप्राज्ञ, पूजनं(म्) शौचमार्जवम्|
ब्रह्मचर्यमहिंसा च, शारीरं(न्) तप उच्यते||17.14||

देवता, ब्राह्मण, गुरुजन और जीवन्मुक्त महापुरुष का यथायोग्य पूजन करना, शुद्धि रखना, सरलता, ब्रह्मचर्य का पालन करना और हिंसा न करना - (यह) शरीर-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

 विवेचन - दो प्रकार से या दो बार जन्म लेने वाले को द्विज कहा जाता है। जैसे पक्षी के।अण्डें के रूप में पहली बार माता के गर्भ से बाहर आते हैं और दूसरी बार अण्डे से निकलते हैं।
उसी प्रकार जिसने ब्रह्म को जान लिया, उन ब्राह्मण को भी द्विज कहा गया है। उनका पहला जन्म माता से होता है और दूसरा जन्म ज्ञान के माध्यम से अर्थात् अज्ञानरूपी आवरण से बाहर निकलना।

ऐसे गुरु को अपनी गुरु-दक्षिणा समर्पित करनी चाहिए। जो ज्ञानवान हो, इनका पूजन करना चाहिए। ये वे लोग हैं जो पवित्र, निष्कपटी, सरल स्वभाव वाले, अहिंसक और ब्रह्मचारी होते हैं। ऐसे लोग शरीर का तप करते हैं, ऐसा मानना चाहिए।

17.15

अनुद्वेगकरं(म्) वाक्यं(म्), सत्यं(म्) प्रियहितं(ञ्) च यत्|
स्वाध्यायाभ्यसनं(ञ्) चैव, वाङ्मयं(न्) तप उच्यते||17.15||

जो किसी को भी उद्विग्न न करने वाला, सत्य और प्रिय तथा हितकारक भाषण है (वह) तथा स्वाध्याय और अभ्यास (नाम जप आदि) भी - यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

 विवेचन - हमें ऐसे शब्द या वाणी बोलनी  चाहिए जिससे सामने वाले के मन में उद्वेग उत्पन्न न हो।
सत्य कभी-कभी कड़वा होता है, परन्तु सत्य वचन को भी प्रिय बनाकर बोलना चाहिए। संस्कृत शास्त्रों का यह महत्वपूर्ण वचन है


"सत्यम् ब्रु यात् प्रियं ब्रूयात्,
न ब्रूयात् सत्यम् प्रियम्।

प्रियं च नानृतम् ब्रूयात्।
एष धर्म: सनातन:”

अर्थात् सत्य बोलो, पर प्रिय रूप में बोलो। अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए और प्रिय लगने वाली असत्य बात भी नहीं कहनी चाहिए।

इसे एक प्रसङ्ग से समझते हैं,
एक राजा को ज्योतिष-शास्त्र में बहुत रुचि थी। एक दिन उनके राज्य में एक प्रसिद्ध ज्योतिषी आया। राजा ने उससे अपना भविष्य बताने का आग्रह किया। ज्योतिषी ने राजा की हस्तरेखाएँ देखकर गहन चिन्ता प्रकट की। राजा के बार-बार आग्रह करने पर उसने अत्यन्त दुखद भविष्य बताते हुए कहा कि राजा अपने सभी सम्बन्धियों की मृत्यु का साक्षी बनेगा। यह सुनकर राजा क्रोधित हो गया और ज्योतिषी को कोड़ों की सज़ा देकर राज्य से निष्कासित कर दिया, क्योंकि उसने सत्य तो कहा, पर अप्रिय ढङ्ग से कहा।

कुछ समय बाद राजा ने एक दूसरे ज्योतिषी को बुलाया। उसने भी हस्त रेखाओं का निरीक्षण किया और कहा, “महाराज, आप दीर्घायु होंगे और सदा स्वस्थ रहेंगे।” यह बात सुनकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसे भरपूर पुरस्कार दिया। इस ज्योतिषी ने भी वही सत्य देखा था, पर उसने इसे प्रिय रूप में प्रस्तुत किया।

उसने यह नहीं कहा कि राजा अपने सम्बन्धियों से अधिक जीवित रहेगा; उसने केवल राजा की दीर्घायु का सुखद पक्ष ही बताया।

अर्थात् दोनों ज्योतिषियों ने सत्य ही बताया, परन्तु दूसरे ज्योतिषी ने विवेक का उपयोग किया। उसने अप्रिय बात कहकर हृदय को दुखी नहीं किया, बल्कि सत्य के प्रिय रूप को सामने रखा।

हमारा वचन भी ऐसा ही होना चाहिए जो सत्य हो, हितकारी हो, और जिससे किसी के मन में क्लेश न उठे।

प्रतिदिन स्वाध्याय करना चाहिए। केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं; जीवन में उसका अभ्यास करना आवश्यक है। श्रीमद्‌भगवद्गीता जी केवल पढ़ने की पुस्तक नहीं है, बल्कि व्यवहार में उतारने का ग्रन्थ है।

वाणी का यह संयम ही वाणी का तप कहलाता है।

यदि हम श्रीभगवान्  के इस वचन को अपने जीवन में उतार लें, तो हमारा घर-परिवार आनन्द और शान्ति से भर जाएगा। क्योंकि प्रायः सारी गड़बड़ी जीभ से ही आरम्भ होती है, इसलिए वाणी का तप जीवन का बड़ा साधन है।

17.16

मनः(फ्) प्रसादः(स्) सौम्यत्वं(म्), मौनमात्मविनिग्रहः|
भावसंशुद्धिरित्येतत्, तपो मानसमुच्यते||17.16||

मन की प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मन का निग्रह (और) भावों की भली भाँति शुद्धि - इस तरह यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

 विवेचन -मन सौम्य और प्रसन्न हो, आत्मनिग्रह हो, मौन और शान्ति का भाव हो। विचार और भावना शुद्ध हों।
किसी के प्रति बुरे विचार न उठें।
मन ऐसा हो कि दूसरों के आनन्द में स्वयं आनन्द अनुभव करे और दूसरों का दु:ख भी सहन न हो।
दूसरों को प्रसन्न देखकर उन्हें शुभकामनाएँ देना, बधाई देना—यह अत्यन्त उत्तम भाव है। यह मन का सात्त्विक तप कहलाता है।

17.17

श्रद्धया परया तप्तं(न्), तपस्तत्त्रिविधं(न्) नरैः|
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः(स्), सात्त्विकं(म्) परिचक्षते||17.17||

परम श्रद्धा से युक्त फलेच्छा रहित मनुष्यों के द्वारा (जो) तीन प्रकार (शरीर, वाणी और मन) - का तप किया जाता है, उसको सात्त्विक कहते हैं।

 विवेचन -किसी भी फल की आकाङ्क्षा न रखते हुए सेवा करना सात्त्विक तप है।
गीता परिवार के कार्यकर्ता निष्काम भाव से जो सेवा दे रहे हैं, वह वास्तव में वाणी का तप है।
 वे बार-बार शुद्ध उच्चारण में श्लोक सिखाते हैं, बिना क्रोध के सिखाते हैं, बिना किसी का मन दुखाए, ज्ञान का आदान-प्रदान करते हैं और स्वामीजी के आदेश का पालन करते हैं। ऐसे सभी साधक तपस्वी ही कहलाते हैं।

17.18

सत्कारमानपूजार्थं(न्), तपो दम्भेन चैव यत्|
क्रियते तदिह प्रोक्तं(म्), राजसं(ञ्) चलमध्रुवम्||17.18||

जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये तथा दिखाने के भाव से किया जाता है, वह इस लोक में अनिश्चित (और) नाशवान फल देने वाला (तप) राजस कहा गया है।

विवेचन — कोई मेरा सम्मान करे, मुझे यश दे, मेरी प्रशंसा करे” इस भावना से किया गया तप राजसिक तप कहलाता है।
उदाहरणार्थ—
किसी मण्डल ने भागवत कथा का आयोजन किया। यजमान बने, धन लगाया यह आवश्यक है, परन्तु गाड़ी के ऊपर बड़े अक्षरों में “कथा के मुख्य यजमान” लिखवाना या मञ्च के समीप गाड़ी खड़ी करना ताकि सब देख लें यह तप नहीं, अहङ्कार को प्रदर्शित करता है।

शरीर तो झुकता है, किन्तु मन ऊँचा उठता है। यह व्यवहार अहङ्कार को बढ़ाता है, और ऐसा तप राजसिक कहलाता है।

17.19

मूढग्राहेणात्मनो यत्, पीडया क्रियते तपः|
परस्योत्सादनार्थं(म्) वा, तत्तामसमुदाहृतम्||17.19||

जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से अपने को पीड़ा देकर अथवा दूसरों को कष्ट देने के लिये किया जाता है, वह (तप) तामस कहा गया है।

विवेचन - जो तप शरीर को पीड़ा देकर या दूसरों को कष्ट देकर किया जाए, वह तामसिक तप है।
उदाहरण—
एक बूढ़ी महिला ने बहुत तप किया। भगवान् जानते थे कि उसका मन स्थिर नहीं है और पड़ोस की महिला के प्रति उसके मन में द्वेष है। भगवान् प्रकट हुए और बोले, “माँगो, जो चाहो माँगो; पर ध्यान रखना, जो भी तुम पाओगी, तुम्हारी पड़ोसिन को उसका दुगुना मिलेगा।"
भगवान् के इस वचन से ही उसका आनन्द नष्ट हो गया। वह सोचने लगी “तप मैंने किया और लाभ उसे मिलेगा?”
उसने माॅंगा बड़ा सा घर बन जाए। उसकी पड़ोसन के दो बड़े घर बन गए।
द्वेषवश उसने कहा, “भगवान्! मेरी एक आँख फोड़ दीजिए।”
यह विचार ही तामसिक है। ऐसा भाव कभी नहीं होना चाहिए।

17.20

दातव्यमिति यद्दानं(न्), दीयतेऽनुपकारिणे|
देशे काले च पात्रे च, तद्दानं(म्) सात्त्विकं(म्) स्मृतम्||17.20||

दान देना कर्तव्य है - ऐसे भाव से जो दान देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर अनुपकारी को अर्थात् निष्काम भाव से दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।

विवेचन“दान देना मेरा कर्तव्य है” इस भाव से दिया गया दान सात्त्विक दान कहलाता है।
दान के बदले उपकार की कोई भावना न हो।
दान से घर में यदि अनजाने में आया हुआ कोई अपवित्र धन हो, तो उसकी शुद्धि भी हो जाती है।

देशहित में किया गया दान, सुपात्र को दिया गया दान और उचित समय पर दिया गया दान ये सब सात्त्विक दान हैं।

एक भिखारी मन्दिर के सामने बैठकर भीख माँगता था। वह विश्वास रखता था कि झोली पूरी खाली नहीं ले जानी चाहिए, इसलिए उसमें थोड़ा चावल रखता था।
एक दिन उसने सपना देखा कि राजा उसे बड़ा दान देगा। वह प्रसन्न होकर मन्दिर के सामने बैठ गया। तभी राजा का रथ आया। राजा ने बताया कि उसे भी सपना आया है कि आज पूर्व दिशा से निकलकर जो पहला व्यक्ति मिले, उससे दान लेना चाहिए, तभी राज्य में वर्षा होगी।
यह सुनकर भिखारी चकित रह गया। उसने झोली में हाथ डाला। पहले तो उसने मुट्ठी भर चावल देने सोचा, फिर लोभ आ गया और केवल दो दाने राजा की हथेली पर रख दिए।
राजा ने धन्यवाद दिया और वर्षा आरम्भ हो गई।

शाम को भिखारी की झोली अच्छी तरह भर चुकी थी। पत्नी ने झोली खाली करते समय देखा कि उसमें सोने के दो दाने हैं। भिखारी ने समझ लिया मैंने जितना दिया था, उसी का रूपान्तर होकर वही लौटा।
यदि वह पूरी मुट्ठी देता, तो सारी मुट्ठी के दाने सोने के हो सकते थे।

दान की शुद्ध भावना ही दान का मूल्य बढ़ाती है।
श्रेय का दान, समयदान, देहदान, रक्तदान, नेत्रदान ऐसे सभी दान मनुष्य के जीवन को ऊँचा उठाते हैं, उन्नत बनाते हैं।

17.21

यत्तु प्रत्युपकारार्थं(म्), फलमुद्दिश्य वा पुनः|
दीयते च परिक्लिष्टं(न्), तद्दानं(म्) राजसं(म्) स्मृतम्||17.21||

किन्तु जो (दान) क्लेशपूर्वक और प्रत्युपकार के लिये अथवा फल-प्राप्ति का उद्देश्य बनाकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है।

 विवेचन - राजस दान वह है जिसमें देने का भाव निष्कपट नहीं होता
भले ही हाथ से दान दिया जा रहा हो, पर मन कहीं भीतर लाभ की गणना कर रहा हो।
“आज मैं दूँगा, कल वह मेरे काम आएगा।”
“लोग क्या कहेंगे, इसलिए देना ही पड़ेगा।”
“उपहार दूँगा तो लौटकर कुछ मिलेगा।”

ऐसा दान बाहरी रूप में भले अच्छा दिखाई दे, पर ईश्वर उसके पीछे की मनोवृत्ति को देखते हैं, वस्तु को नहीं।

यदि उपहार लेने-देने के पीछे प्रत्युपकार का दबाव है, तो वह दान शुद्ध नहीं रहता; वह लेन–देन का सौदा बन जाता है।

एक बार भगवान् बुद्ध किसी घर में भिक्षा के लिए खड़े हुए।
वहाँ की गृहिणी असहाय होकर कहती है,
“भगवान्! आज घर में भोजन ही नहीं बना। हमारे पास देने को कुछ भी नहीं।”
बुद्ध मुस्कराते हैं,
“तो आँगन की थोड़ी-सी मिट्टी ही मेरी झोली में डाल दो।”
स्त्री चकित, “भिक्षु की झोली में मिट्टी! इससे तो अन्न भी दूषित हो जाएगा!”
तब भगवान् बुद्ध कहते हैं,
“अन्न तो एक दिन खराब हो जाएगा।
मैं भी आज उपवास कर लूँगा।
परन्तु यदि दान की आदत ही छूट गई तो मन का ‘देने वाला भाव’ नष्ट हो जाएगा।
इसलिए मिट्टी ही क्यों न हो देना आवश्यक है।”

यह कथा एक बड़ी शिक्षा देती है।

दान वस्तु का नहीं, भाव का नाम है।
दान राशि कम हो या अधिक, ईश्वर देखते हैं कि हम देते समय कैसा भाव रखते हैं।
राजस दान मन को हल्का नहीं करता; उल्टा अपेक्षा का बोझ बढ़ाता है। 

17.22

अदेशकाले यद्दानम्, अपात्रेभ्यश्च दीयते|
असत्कृतमवज्ञातं(न्), तत्तामसमुदाहृतम्||17.22||

जो दान बिना सत्कार के तथा अवज्ञापूर्वक अयोग्य देश और काल में कुपात्र को दिया जाता है, वह (दान) तामस कहा गया है।

  विवेचन - तामस दान वह है जिसमें दाता का मन अन्धकार से भरा रहता है।
कभी-कभी हम दान तो कर देते हैं, पर सामने वाले को अपमानित करते हुए, मन में घृणा रखते हुए, यह सोचकर कि “चलो, इससे पीछा छूटे।"
या फिर ‘कुपात्र’ को दान देकर समाज में अनर्थ कराने वाले कार्यों को बढ़ावा देते हुए दान करते हैं।
ऐसा दान न केवल व्यर्थ है, बल्कि समाज और स्वयं दाता के लिए हानिकारक भी है।
“चोरी से धन कमाना और फिर वन में धर्मशाला बनवा देना”
पूरी तरह तामस दान  है।

17.23

ॐ तत्सदिति निर्देशो, ब्रह्मणस्त्रिविधः(स्) स्मृतः|
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च, यज्ञाश्च विहिताः(फ्) पुरा||17.23||

ऊँ, तत् और सत् - इन तीन प्रकार के नामों से (जिस) परमात्मा का निर्देश (संकेत) किया गया है, उसी परमात्मा से सृष्टि के आदि में वेदों तथा ब्राह्मणों और यज्ञों की रचना हुई है।

  विवेचन 'ॐ तत् सत्’ — ये तीनों सच्चिदानन्द ब्रह्म के नाम हैं। इन्हीं परमात्मा के द्वारा सृष्टि के आदिकाल में वेद, ब्राह्मण और यज्ञों की रचना की गई।

हमारी परम्परा की विशेषता यह है कि सुपारी पर मोली बाँधकर हम गणपति का रूप मानकर पूजन कर लेते हैं। संभवतः अन्य किसी धर्म में ऐसी सरलता और अन्त:स्थ श्रद्धा नहीं मिलती।

श्रीभगवान सम्पूर्ण चराचर जगत‌ में व्याप्त हैं।

शब्द को भी ब्रह्म कहा गया है और अन्न को भी ब्रह्म कहा गया है- इसलिए शब्द ब्रह्म, नाद ब्रह्म और अन्न ब्रह्म, ये रूप विशेष प्रशंसित हैं।

सनातन संस्कृति सचमुच अद्भुत है। यहाँ ॐ, तत् और सत् - ये ब्रह्म के नाम कहे गए हैं।
इसी कारण किसी भी शुभ कार्य के अंत में ॐ तत् सत् कहा जाता है, जिससे वह कार्य परमात्मा को समर्पित हो जाए।

17.24

तस्मादोमित्युदाहृत्य, यज्ञदानतपः(ख्) क्रियाः|
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः(स्), सततं(म्) ब्रह्मवादिनाम्||17.24||

इसलिये वैदिक सिद्धान्तों को मानने वाले पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत यज्ञ, दान और तप रूप क्रियाएँ सदा 'ॐ’ इस परमात्मा के नाम का उच्चारण करके (ही) आरम्भ होती हैं।

 विवेचन - इसलिए वेद-मन्त्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुष, शास्त्र-विधि से नियत यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ ॐ का उच्चारण करके आरम्भ करते हैं।
इसी परम्परा के अनुसार हम भी ‘ॐ श्रीपरमात्मने नमः’ कहकर ही गीता अध्याय का पाठ आरम्भ करते हैं तथा समापन ‘ॐ तत्सदिति…’ कहकर करते हैं।

अर्थात, अध्याय के अन्त में भी ॐ तत् सत् का उच्चारण इसलिए किया जाता है कि वह सम्पूर्ण पाठ श्रीभगवान् को समर्पित हो जाए।
इस प्रकार भगवान् कहते हैं कि ॐ, तत् और सत्—ये ब्रह्म के नाम हैं और इनका उच्चारण करके श्रेष्ठ पुरुष यज्ञ, दान और तप का शुभारम्भ करते हैं।

17.25

तदित्यनभिसन्धाय, फलं(म्) यज्ञतपः(ख्) क्रियाः|
दानक्रियाश्च विविधाः(ख्), क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभि:||17.25||

तत्' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा के लिये ही सब कुछ है - ऐसा मान कर मुक्ति चाहने वाले मनुष्यों द्वारा फल की इच्छा से रहित होकर अनेक प्रकार की यज्ञ और तप रूप क्रियाएँ तथा दान रूप क्रियाएँ की जाती हैं।

विवेचन -यह कहते हुए कि “सब कुछ तत्—अर्थात परमात्मा का ही है” और किसी फल की कामना न रखते हुए, मोक्ष की इच्छा रखने वाले साधक अनेक प्रकार के यज्ञ, तप और दान करते हैं।

यह भावना कि “मैं नहीं, यह कार्य भगवान् का है”, मन को पवित्र करती है।

कर्म तो वही रहता है, परन्तु जब फल-त्याग जुड़ जाता है, तब वही कर्म साधना बन जाता है।

17.26

सद्भावे साधुभावे च, सदित्येतत्प्रयुज्यते|
प्रशस्ते कर्मणि तथा, सच्छब्दः(फ्) पार्थ युज्यते||17.26||

हे पार्थ ! सत्- ऐसा यह परमात्मा का नाम सत्ता मात्र में और श्रेष्ठ भाव में प्रयोग किया जाता है तथा प्रशंसनीय कर्म के साथ 'सत्' शब्द जोड़ा जाता है।

 विवेचन - “सत्”– यह शब्द परमात्मा का नाम है।
यह शब्द सत्य, श्रेष्ठ, पवित्र और सद्कर्मों के लिए प्रयोग किया जाता है

हे अर्जुन, उत्तम कर्मों में, शुभ सङ्कल्पों में और सद्आचरण में “सत्” शब्द का प्रयोग होता है।
साधना का सार यही है कि
कर्म श्रेष्ठ हो, भावना सत्य हो और सङ्कल्प पवित्र हो।
श्रद्धा मन को स्थिर करती है, उसे शान्ति देती है और साधक को भीतर से सशक्त बनाती है।
इसीलिए इन तीनों, यज्ञ, तप और दान को कभी छोड़ना नहीं चाहिए।

17.27

यज्ञे तपसि दाने च, स्थितिः(स्) सदिति चोच्यते|
कर्म चैव तदर्थीयं(म्), सदित्येवाभिधीयते||17.27||

यज्ञ तथा तप और दान रूप क्रिया में (जो) स्थिति (निष्ठा) है, (वह) भी 'सत्' - ऐसे कही जाती है और उस परमात्मा के निमित्त किया जाने वाला कर्म भी 'सत्' - ऐसा ही कहा जाता है।

  विवेचन -यज्ञ, तप और दान ये तीनों कर्त्तव्य हैं और इन्हें कभी त्यागना नहीं चाहिए।
परन्तु इन्हें करते समय एक बात अत्यन्त आवश्यक है, श्रद्धा।
यदि श्रद्धा नहीं होगी तो कार्य तो होगा परन्तु वह आध्यात्मिक उन्नति नहीं दे सकेगा।

अश्रद्धा से किया गया कर्म केवल एक “औपचारिकता" बनकर रह जाता है, जिसमें जीवन-परिवर्तन की शक्ति नहीं होती।

17.28

अश्रद्धया हुतं(न्) दत्तं(न्), तपस्तप्तं(ङ्) कृतं(ञ्) च यत्|
असदित्युच्यते पार्थ, न च तत्प्रेत्य नो इह||17.28||

हे पार्थ ! अश्रद्धा से किया हुआ हवन, दिया हुआ दान (और) तपा हुआ तप तथा (और भी) जो कुछ किया जाय, (वह सब) 'असत्' - ऐसा कहा जाता है। उसका (फल) न तो यहाँ होता है और न मरने के बाद ही होता है अर्थात् उसका कहीं भी सत् फल नहीं होता।

  विवेचन -अश्रद्धा से किया हुआ हवन, दिया गया दान, किया गया तप या कोई भी अन्य कार्य सब ‘असत्’ में गिने जाते हैं।
इसलिए श्रद्धा अत्यन्त आवश्यक है।
जो कुछ भी करना है, पूर्ण श्रद्धा के साथ ही करना है।

अश्रद्धा से किए गए कार्य का फल न इस लोक में मिलता है और न परलोक में; अर्थात् न जीवन में लाभ मिलता है और न मृत्यु के बाद।

इसलिए गीता का अध्ययन भी पूर्ण श्रद्धा, उचित समय पर, सम्पूर्ण मन से करना चाहिए।
अपने आहार-विहार और शब्दों का ध्यान रखना चाहिए।
यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ सात्त्विक बनानी चाहिए।

धीरे-धीरे हमारा जीवन सात्त्विकता की ओर अग्रसर हो और एक दिन ऐसा आए कि हम तीनों गुणों से ऊपर उठकर गुणातीत बन जाएँ।
गुणातीत कैसे बना जाता है, इसे श्रीभगवान् अगले अध्याय में बताएँगे।

पुष्पिका का गायन करते हुए आज का अध्याय के विवेचन सत्र का समापन हुआ और प्रश्नोत्तर प्रारम्भ हुए।

प्रश्नोत्तर
प्रश्नकर्ता - शिव कैलाश शर्मा 
प्रश्न - पन्द्रहवें अध्याय के प्रथम श्लोक में संसार को पीपल के वृक्ष की तरह अविनाशी कहा गया है। यह संसार अविनाशी कैसे है?
उत्तर - यह संसार क्षणिक रूप से नश्वर है, पर उसका (रोटेशन) आवर्तन रुकने वाला नहीं है, वह सदा चलता ही रहेगा। जैसे यह शरीर है और यह इस संसार का एक हिस्सा है। एक न एक दिन इसको नष्ट होना ही है। इसका अर्थ यह नहीं है की सारी मानव जाति ही समाप्त हो जाएगी। इसके पहले भी कई प्रलय आए और सब कुछ नष्ट हुआ। लेकिन फिर से बना क्योंकि वह बीज बचा हुआ था। शरीर नश्वर है परन्तु वह अनन्त भी है। 

प्रश्न- सत्रहवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में अफलाकाङ्क्षी होने को कहा गया है। एक एकादशी आती है जिसका नाम सफला एकादशी है उस दिन का व्रत हम रखें तो क्या प्रभाव होगा? 
उत्तर - वह एकादशी का एक नाम है। आप फल की इच्छा के बगैर व्रत रखें तो वह सात्त्विक कहलाएगा। यदि वही व्रत आप फल की आकाङ्क्षा के साथ करेंगे तो वह राजस कहलाएगा।
हम प्रकृति के पुत्र हैं तो हमें राजस कार्य भी करने चाहिए। ऐसा नहीं है कि हम कोई राजस कार्य करें ही नहीं। जब जीवन में आए हैं तो हमारे साथ कामनाएँ रहने वाली हैं। हम कोई यज्ञ कामना के साथ भी कर सकते हैं।
अधिकतर हमारे यज्ञ निष्काम भाव से हों तो ज्यादा अच्छा है।

प्रश्नकर्ता - सुमन दीदी
प्रश्न - संयोग जनित सुख की लोलुपता कैसे मिटेगी? कई बार कोई आकाङ्क्षा नहीं होती है पर फिर भी मन में इच्छा रहती है कि ऐसा कुछ हो जाए। यदि ऐसे इच्छा रखने से कुछ प्राप्त हो जाए तो क्या करना चाहिए?
 यह इच्छा रखने का भाव भी अपने मन से किस प्रकार हटाएं?
उत्तर - कई बार हम अपने मन में चाहते हैं और कुछ प्राप्त हो जाता है। ऐसे में भगवान को धन्यवाद देना चाहिए। भगवान से कहें कि यह आपकी कृपा से प्राप्त हुआ है आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। भगवान से कहें कि मेरे जीवन को आनन्ददायक और सुखी बनाने के लिए आपने इतना कुछ किया है और आज आपने मुझे एक चीज और प्रदान कर दी, इसलिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

प्रतिदिन रोज सोने से पहले और सवेरे उठने के बाद भगवान को धन्यवाद अवश्य दें। हमारी सारी प्रार्थना भगवान को धन्यवाद देने के लिए होनी चाहिए। भगवान के सामने हमेशा माँगने के लिए मत जाइये।

एक बार एक भिखारी भगवान के मन्दिर में गया और उसने भगवान से कहा कि मुझे भोजन दे दीजिए। उसके पीछे-पीछे राजा आया। राजा ने कहा भगवान मुझे राज्य दे देना। उसकी बात सुनकर भिखारी बोला यह राजा नहीं है, यह तो मुझसे भी बड़ा भिखारी है। माँगने वाला हमेशा भिखारी ही होता है।
यदि आप सफला एकादशी का व्रत कर रहे हैं और फल की इच्छा नहीं है तो वह एकादशी भी आपके लिए सार्थक बन जाएगी।

प्रश्न- क्या मन ही मनुष्य के बन्धन का कारण है?
उत्तर - निश्चित रूप से, सारा बन्धन मन का ही है। यदि मन को वहाँ से निकाल लें तो कोई बन्धन ना रहे।
बन्धन बन्धन क्या करते हो, बन्धन मन के बन्धन हैं ।
आओ उठो एक झटका दो, बन्धन क्षण के बन्धन हैं।

जो मन को झटका देना चाहिए, वह एक क्षण में लग सकता है।

ऐसा करने से वह बन्धन टूट जाते हैं। जो भी बन्धन हम बनाते हैं वह एक कोशकृमि के जैसे हैं। जैसे एक कोशकृमि अपने चारों ओर जाल बना लेता है और फिर उसी में फँस कर मर जाता है। इस प्रकार का बन्धन हमने भी अपने चारों ओर बना लिया है। सब मन से किए गए बन्धन हैं। जिस दिन मन उन बन्धनों को छोड़ने का निश्चय करेगा, उसी दिन और उसी क्षण वह बन्धन टूट सकते हैं।

इसी के साथ आज के सुन्दर विवेचन सत्र का समापन हुआ।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्याय:।।

इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘श्रद्धात्रयविभागयोग’ नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।