विवेचन सारांश
महाभारत की युद्ध भूमि का वर्णन
प्रार्थना, दीप-प्रज्वलन और गुरु वन्दना के साथ आज का विवेचन सत्र प्रारम्भ हुआ। महाभारत के युद्ध में सञ्जय अपनी दिव्य दृष्टि से युद्ध का वर्णन कर रहे थे, धृतराष्ट्र को युद्ध का आँखों देखा हाल सुना रहे थे। सञ्जय को दिव्य दृष्टि प्राप्त थी, इसलिए युद्ध के मैदान में बिना गए ही देखने और समझने की क्षमता के साथ वे युद्ध भूमि का वर्णन कर रहे थे। धृतराष्ट्र ने सञ्जय से पूछा कि युद्ध भूमि पर उनके पुत्र और पाण्डु के पुत्र क्या कर रहे हैं, तो सञ्जय ने अपनी दिव्य दृष्टि से उन्हें युद्ध भूमि का वर्णन सुनाया।
1.14
ततः(श्) श्वेतैर्हयैर्युक्ते, महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः(फ्) पाण्डवश्चैव, दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः।।1.14।।
इसके पश्चात् सफेद घोड़ों से युक्त महान रथ पर बैठे हुए लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भी दिव्य शंखों को बड़े जोर से बजाया।
विवेचन- सञ्जय बताते है कि कौरवों के पक्ष में भयङ्कर गर्जना के साथ शङ्ख बजाए गए। पाण्डवों की ओर सफेद रङ्ग के घोड़े से युक्त बहुत बड़े रथ में माधव हैं। उन्होंने भी शङ्ख बजा दिया और अब युद्ध प्रारम्भ होगा।
पाञ्चजन्यं(म्) हृषीकेशो, देवदत्तं(न्) धनञ्जयः।
पौण्ड्रं(न्) दध्मौ महाशङ्खं(म्), भीमकर्मा वृकोदरः।।1.15।।
अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक (तथा) धनञ्जय अर्जुन ने देवदत्त नामक (शंख बजाया और) भयानक कर्म करने वाले वृकोदर भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।
विवेचन- महर्षि वेद व्यास जी ने भगवान् श्रीकृष्ण को अलग-अलग नाम से सम्बोधित किया है। यहाँ पर उन्होंने श्रीकृष्ण को हृषिकेश अर्थात् इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला, इन्द्रियों का स्वामी कहा है।
श्रीभगवान् ने अपना पाञ्चजन्य नामक दिव्य शङ्ख बजाया। भगवान् श्रीकृष्ण के शङ्ख का नाम पाञ्चजन्य है, जो पाञ्चजन्य नाम के एक दैत्य को मारने के बाद प्राप्त हुआ था। वह दैत्य शङ्ख रूप में था और भगवान् श्रीकृष्ण ने उसका वध करके इस शङ्ख को प्राप्त किया था। इसी कारण से इस शङ्ख का नाम पाञ्चजन्य है।
अर्जुन को धनञ्जय के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि उन्होंने राजसूय यज्ञ के लिए कई राजाओं के साथ युद्ध किया और उन्हें जीतकर बहुत सारा धन अकेले ही अर्जित किया। धनञ्जय नाम का अर्थ है धन का विजेता।
अनन्तविजयं(म्) राजा, कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः(स्) सहदेवश्च, सुघोषमणिपुष्पकौ।।1.16।।
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक (शंख बजाया तथा) नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक (शंख बजाये)।
विवेचन- यहाँ वेदव्यास जी युधिष्ठिर को कुन्तीपुत्र के नाम से सम्बोधित करते हैं। पाँचों पाण्डव कुन्ती पुत्र नहीं हैं। युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन, ये तीनों कुन्ती माता के पुत्र हैं और नकुल तथा सहदेव माद्री माता के पुत्र हैं।
कुन्ती पुत्र युधिष्ठिर ने अनन्त विजय नाम का शङ्ख बजाया। नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नाम के शङ्ख बजाए।
कुन्ती पुत्र युधिष्ठिर ने अनन्त विजय नाम का शङ्ख बजाया। नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नाम के शङ्ख बजाए।
काश्यश्च परमेष्वासः(श्), शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।1.17।।
हे राजन्! श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि,
विवेचन- यहाँ सञ्जय कहते हैं कि श्रेष्ठ धनुष रखने वाले काशीराज शिखण्डी, जो महारथी हैं व राजा द्रुपद के पुत्र हैं, वे अपने भाई धृष्टद्युम्न के साथ युद्ध भूमि में पाण्डवों की सेना में हैं। राजा विराट, मत्स्य देश के राजा सात्यकि, जो अर्जुन के शिष्य और एक महान योद्धा हैं, ये सभी महान योद्धा अपराजित माने जाते हैं और अपने वीरता और युद्ध कौशल के लिए प्रसिद्ध हैं।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च, सर्वशः(फ्) पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः(श्), शङ्खान्दध्मुः(फ्) पृथक्पृथक्।।1.18।।
राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र तथा लम्बी-लम्बी भुजाओं वाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु (इन सभी ने) सब ओर से अलग-अलग (अपने - अपने) शंख बजाये।
विवेचन- पाण्डवों की सेना में राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र हैं। सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु जैसे महान योद्धा खड़े हैं। जब इन महान वीरों ने अपनी सेना को तैयार देखा तो सभी राजाओं और योद्धाओं ने अपने-अपने शङ्ख बजाए। सभी के शङ्ख एक साथ बजने से उसका उद्घोष भयङ्कर हुआ।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां(म्), हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं(ञ्) चैव, तुमुलो व्यनुनादयन्।।1.19।।
और (पाण्डव-सेना के शंखों के) उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए धार्तराष्ट्रों अर्थात् आपके पक्ष वालों के हृदय विदीर्ण कर दिये।
विवेचन- सञ्जय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि जैसे ही शङ्खनाद हुआ तो उनकी भयानक गर्जना आकाश में गूञ्ज गई। एक साथ सारे शङ्ख बजने से यह गर्जना बहुत ही डरावनी और भयानक थी।
यह ध्वनि इतनी शक्तिशाली थी कि धरती और आकाश दोनों में प्रतिध्वनि हुई और धृतराष्ट्र के पुत्रों में एक चिन्ता की लहर दौड़ गई।
यह ध्वनि इतनी शक्तिशाली थी कि धरती और आकाश दोनों में प्रतिध्वनि हुई और धृतराष्ट्र के पुत्रों में एक चिन्ता की लहर दौड़ गई।
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।।1.20।।
हे राजन् इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने शास्त्र चलाने कि तैयारी के समय धनुष उठाकर मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र सम्बन्धियों को देखकर
विवेचन- सञ्जय शङ्खनाद के बाद धृतराष्ट्र के समक्ष अर्जुन की बात करते हुए अर्जुन को कपिध्वज कहकर सम्बोधित करते हैं।
कपि ध्वज का अर्थ है, वह रथ जिसकी ध्वजा पर वानर का चिह्न है जो हनुमान जी की उपस्थिति को दर्शाता है।
अर्जुन के रथ के ध्वज पर हनुमान जी की उपस्थिति के कारण उन्हें कपिध्वज कहा जाता है।
कपि ध्वज का अर्थ है, वह रथ जिसकी ध्वजा पर वानर का चिह्न है जो हनुमान जी की उपस्थिति को दर्शाता है।
अर्जुन के रथ के ध्वज पर हनुमान जी की उपस्थिति के कारण उन्हें कपिध्वज कहा जाता है।
हृषीकेशं(न्) तदा वाक्यम्, इदमाह महीपते। अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये, रथं(म्) स्थापय मेऽच्युत।।1.21।।
अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को (आप तब तक) खड़ा कीजिये, जब तक मैं (युद्धक्षेत्र में) खड़े हुए इन युद्ध की इच्छा वालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है।
विवेचन- अर्जुन श्रीकृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे हृषिकेश! मैं युद्ध के लिए तैयार हूँ। इस प्रकार अर्जुन अपने गाण्डीव को हाथ में लेकर युद्ध के लिए तैयार हो गए।
अर्जुन हृषिकेश को कहते हैं कि उनका रथ दोनों सेनाओं के बीच में स्थापित कर दो।
अर्जुन हृषिकेश को कहते हैं कि उनका रथ दोनों सेनाओं के बीच में स्थापित कर दो।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं(य्ँ), योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यम्, अस्मिन्रणसमुद्यमे॥1.22
अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना योग्य है।
विवेचन- अर्जुन युद्ध के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच में रथ को स्थापित कर दोनों सेनाओं का निरीक्षण करना चाहते हैं। दोनों सेनाओं के लिए कौन-कौन युद्ध करने के लिए पहुँचा है, ऐसा निरीक्षण आवश्यक भी है।
जैसे हमें परीक्षा में प्रश्न पत्र मिलता है तो लिखने से पहले हमें अध्यापक कहते हैं कि पहले पूरा प्रश्न पत्र अच्छे से पढ़ लें, ध्यान से सोच लें और उसके बाद समय के अनुसार उस प्रश्न पत्र को हल करें। हल करने से पहले उस प्रश्न पत्र को ध्यान से पढ़ना होता है। प्रश्न पत्र में से हम उन प्रश्नों को पहले हल करते हैं जो हमें अधिक सही से आते हैं और जो हमें अधिक अच्छे से नहीं आते, हम उनको बाद में हल करना पसन्द करते हैं। अर्जुन भी ऐसा ही मानते हैं। वे कहते हैं, जो बलशाली युद्ध में मेरे समान क्षमता रखता है, उनसे मैं पहले युद्ध करूँगा, जो युद्ध के अभिलाषी विपक्ष के योद्धा हैं और समर के मैदान में खड़े होकर अपनी जान को जोखिम में डालकर दुर्योधन के लिए अपनी जान देने की इच्छा से आए हैं, मैं उन सब को देखना चाहता हूँ।
जैसे हमें परीक्षा में प्रश्न पत्र मिलता है तो लिखने से पहले हमें अध्यापक कहते हैं कि पहले पूरा प्रश्न पत्र अच्छे से पढ़ लें, ध्यान से सोच लें और उसके बाद समय के अनुसार उस प्रश्न पत्र को हल करें। हल करने से पहले उस प्रश्न पत्र को ध्यान से पढ़ना होता है। प्रश्न पत्र में से हम उन प्रश्नों को पहले हल करते हैं जो हमें अधिक सही से आते हैं और जो हमें अधिक अच्छे से नहीं आते, हम उनको बाद में हल करना पसन्द करते हैं। अर्जुन भी ऐसा ही मानते हैं। वे कहते हैं, जो बलशाली युद्ध में मेरे समान क्षमता रखता है, उनसे मैं पहले युद्ध करूँगा, जो युद्ध के अभिलाषी विपक्ष के योद्धा हैं और समर के मैदान में खड़े होकर अपनी जान को जोखिम में डालकर दुर्योधन के लिए अपनी जान देने की इच्छा से आए हैं, मैं उन सब को देखना चाहता हूँ।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं(य्ँ), य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धे:(र्), युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥1.23॥
दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा वाले जो ये राजा लोग इस सेना में आये हुए हैं, युद्ध करने को उतावले हुए (इन सबको) मैं देख लूँ।
विवेचन- अर्जुन दुर्योधन को यहाँ दुष्ट बुद्धि वाला कहते हैं, क्योंकि उसने पाण्डवों को उनका अधिकार देने से मना कर दिया। इतना ही नहीं उसने पाण्डवों पर कई तरह के अत्याचार किए। द्रौपदी के साथ दुर्व्यवहार किया।
अर्जुन कहते हैं कि जो दुर्योधन युद्ध भूमि में अपनी सेना सहित पहुँचा है, उसके लिए कौन-कौन अपनी जान का त्याग करने के लिए आए हैं, मैं उन सब को देखना चाहता हूँ। धन और अन्य तरह के लालच देकर किसी भी ढङ्ग से वह अपने लिए सहयोगी बना लेता है। उसकी सेनाओं की तरफ देखते हुए अर्जुन कहते हैं कि इतनी बड़ी सेना होने का अर्थ है कि उसमें बहुत सारे लोग ऐसे होंगे जो किसी न किसी कारण से उसके साथ जुड़े होंगे, जिनको उसने किसी न किसी लालच से अपनी सेना में शामिल किया होगा।
स्कूल के बाहर कोई भी अगर हमें किसी भी तरह का लालच देकर, जैसे 'आपको आपके घर तक छोड़ देता हूँ' या कुछ खाने को देकर हमसे अपनी बात मनवाना चाहते हैं तो हमें नहीं माननी चाहिए, ऐसा हमारे माता-पिता हमें सिखाते हैं। सञ्जय कहते हैं कि जिनको किसी न किसी तरह के लालच के कारण अपने प्राण देने के लिए तैयार किया है, उन सब योद्धाओं को मैं देखना चाहता हूँ।
कितने लोगों ने ओलम्पियाड के लिए पञ्जीकृत किया है?
अयांश भैया- पहेली के लिए पञ्जीकृत किया है। अर्जुन के खेल के लिए पञ्जीकृत किया है। जिसमें खम्भे को छूए बिना ही ऊॅं पार करना होता है।
अमृत कलश एक ऐसा खेल है, जिसमें तामसिक, सात्त्विक भोजन के घड़े बने हुए हैं। इनमें से हमें कौन सा सेवन करना चाहिए, इसके बारे में खेल के माध्यम से बताया गया है। सकारात्मक वस्तुओं का सेवन करना है या नकारात्मक का, उसके लिए हमें चुनाव करना हो तो सात्त्विक वस्तुओं का सेवन करना चाहिए, ऐसा इस खेल के माध्यम से बताया गया है।
सबको playgeeta.com पर पञ्जीकृत होना है।
geetaolympiad.com, इस बार एक ऐसा ओलम्पियाड चल रहा है जिसके माध्यम से आप पञ्जीकृत होकर खेल और प्रश्नोत्तरी के माध्यम से गीता जी का अध्ययन सरल तरीके से कर सकते हैं।
इसमें अङ्को (पॉइंट्स) का स्कोर रहेगा और जो भी फरवरी तक इसको जारी रखेंगे और सही उत्तर देकर जो भी क्रेडिट प्वाइंट्स जमा होंगे उससे उनको विजेता घोषित किया जाएगा। प्रथम पुरस्कार एक लाख रुपए का, दूसरा पुरस्कार पचास हजार, तीसरा पुरस्कार पच्चीस हजार और इसके अलावा सांत्वना पुरस्कार में टी-शर्ट आदि दिए जाएँगे।
इसी के साथ आज का विवेचन सत्र समाप्त हुआ और प्रश्नोत्तर सत्र प्रारम्भ हुआ।
कितने लोगों ने ओलम्पियाड के लिए पञ्जीकृत किया है?
अयांश भैया- पहेली के लिए पञ्जीकृत किया है। अर्जुन के खेल के लिए पञ्जीकृत किया है। जिसमें खम्भे को छूए बिना ही ऊॅं पार करना होता है।
अमृत कलश एक ऐसा खेल है, जिसमें तामसिक, सात्त्विक भोजन के घड़े बने हुए हैं। इनमें से हमें कौन सा सेवन करना चाहिए, इसके बारे में खेल के माध्यम से बताया गया है। सकारात्मक वस्तुओं का सेवन करना है या नकारात्मक का, उसके लिए हमें चुनाव करना हो तो सात्त्विक वस्तुओं का सेवन करना चाहिए, ऐसा इस खेल के माध्यम से बताया गया है।
सबको playgeeta.com पर पञ्जीकृत होना है।
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इसी के साथ आज का विवेचन सत्र समाप्त हुआ और प्रश्नोत्तर सत्र प्रारम्भ हुआ।
प्रश्नोत्तर सत्र
प्रश्नकर्ता- धृति दीदी
प्रश्न- ओलम्पियाड में लाॅग इन करने के बाद क्या करना है?
उत्तर- आपको प्रश्नोत्तरी पूर्ण करनी है। उसमें विभिन्न खेल भी हैं जिन्हें आप सीमित समय के लिए खेलें तो ठीक रहेगा।
प्रश्नकर्ता- हिया दीदी
प्रश्नकर्ता- हिया दीदी
प्रश्न- अट्ठारह, उन्नीस और बीस श्लोक पुनः समझा दीजिए।
उत्तर- अट्ठारहवें श्लोक में किसने कौनसा शङ्ख बजाया इसका वर्णन है। शङ्ख बजाने से कौरवों की सेना पर क्या प्रभाव पड़ा, यह उन्नीसवे श्लोक में बताया गया है। बीसवें श्लोक में अर्जुन आगे युद्ध के लिए क्या कर रहे हैं, इसका वर्णन है।
।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।