विवेचन सारांश
कर्मार्पण मुक्ति का साधन
गीता परिवार गीत, श्री हनुमान चालीसा के पाठ, गुरु वन्दना और दीप प्रज्वलन के साथ आज के सत्र का शुभारम्भ हुआ।
हतोत्साहित अर्जुन के लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने रणाङ्गण में प्रत्यक्ष श्रीमद्भगवद्गीता का यह गीत गाया है। युद्ध के विपरीत परिणामों से डरनेवाले अर्जुन जिसने कभी भी किसी भी युद्ध में पीठ नहीं दिखाई, वह अर्जुन आज कुरूक्षेत्र में अपनों को युद्ध के लिए सजा देखकर, अपना धनुष छोड़कर युद्ध भूमि से पलायन को हैं। ऐसे अवसादग्रस्त अर्जुन में पुनश्चेतना का सञ्चार करने के लिए, कर्म की प्रेरणा भरने के लिए, जीवन की शक्ति पुनर्जागरण करने के लिए, मनोबल प्रदान करने के लिए, श्रीभगवान् ने अर्जुन को निमित्त बनाकर सम्पूर्ण मानव जाति के उत्थान के लिए यह गीता ज्ञान-गीत गाया हैं।
हतोत्साहित अर्जुन के लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने रणाङ्गण में प्रत्यक्ष श्रीमद्भगवद्गीता का यह गीत गाया है। युद्ध के विपरीत परिणामों से डरनेवाले अर्जुन जिसने कभी भी किसी भी युद्ध में पीठ नहीं दिखाई, वह अर्जुन आज कुरूक्षेत्र में अपनों को युद्ध के लिए सजा देखकर, अपना धनुष छोड़कर युद्ध भूमि से पलायन को हैं। ऐसे अवसादग्रस्त अर्जुन में पुनश्चेतना का सञ्चार करने के लिए, कर्म की प्रेरणा भरने के लिए, जीवन की शक्ति पुनर्जागरण करने के लिए, मनोबल प्रदान करने के लिए, श्रीभगवान् ने अर्जुन को निमित्त बनाकर सम्पूर्ण मानव जाति के उत्थान के लिए यह गीता ज्ञान-गीत गाया हैं।
इस अध्याय में कर्म को किस प्रकार से कर्मयोग मे परिवर्तित करना चाहिए, यह योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं।
हम लोग कर्म के परिणाम से डरते हैं। वास्तव में यह जीवन हमारे कर्म की रणभूमि है। मनुष्य जीवन पाकर हम अपने कर्म करने के लिए पृथ्वी पर आए हैं। बाकी सभी भोग योनियाँ हैं केवल मनुष्य ही योगयोनि है।
योग का अर्थ है जुड़ना, उस ईश्वर के साथ जुड़ना।
हम मनुष्यों में बुद्धि व विवेक हैं जिससे हम स्वयं को समझ सकते हैं, पहचान सकते हैं।
हमें मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है जिसमें बुद्धि है, बुद्धि निष्ठता है, विचारों की प्रधानता हैं।
"मैं किस लिए यहाँ पर आया हूँ? किसने मुझे यहाँ भेजा है? जिसने भेजा उससे मेरा क्या सम्बन्ध है? सृष्टि के साथ मेरा क्या सम्बन्ध है?" ऐसे प्रश्न जब मन में उठने लगते है, तब एक अन्तर्यात्रा प्रारम्भ होती है।
इस यात्रा को आनन्दमय बनाने के लिए, अपने कर्म को कर्मयोग में परिणित करने की योग्यता होनी चाहिए।
श्रीभगवान् वही खूबीयाँ हमें यहाँ सिखाते हैं कि कर्म कैसे करना?
ईश्वरार्पण बुद्धि से करना।
ईश्वरार्पण बुद्धि से करना।
कर्म किसके लिए करना?
ईश्वर के लिए ही कर्म करना।
कौनसा कर्म करना?
कर्त्तव्य कर्म करना।
कर्म करने के पश्चात क्या करना?
कर्म के परिणामों की व्यर्थ चिन्ता नहीं करना।
परिणाम को भगवान् का आशीर्वाद समझकर स्वीकार करना
और आगे बढ़ना।
परिणाम को भगवान् का आशीर्वाद समझकर स्वीकार करना
और आगे बढ़ना।
यह सब श्रीभगवान् अर्जुन को समझाते हैं। इसके पहले हमने निष्काम कर्मयोग के बारे में जाना, जो थोड़ा कठिन है।
जब हम अपनी जीवन यात्रा में इस प्रकार से चलते हैं तो एक आन्तरिक ऊर्जा, ब्रह्माण्ड की ऊर्जा (Cosmic Energy) हमारे साथ हो जाती हैं।
"जेथे जातो तेथे तू माझा संगाती, चालवीशि हाती धरोनिया।"
प्रभु, मैं जहाँ भी जाता हूँ, आप मेरे साथ होते हो। आप ही मुझे हाथ पकड़कर चलाते हो।
सन्त-महात्मा ऐसा जब कहते हैं तब ये उनकी अनुभूति होती हैं। जैसे-जैसे यह अनुभूति हमारे जीवन में प्रवेश करती है, आगे बढ़ती हैं हमारा कर्मयोग पर विश्वास और दृढ़ हो जाता है। इस निष्ठा को हम कर्मयोग में परिणित कर सकते है।
मनुष्य अपने जीवन में सदा कुछ न कुछ व्यवहार करता रहता हैं। कुछ न कुछ आदान-प्रदान करता है। अपनी ज्ञानेन्द्रियों से या कर्मेन्द्रियों से हमारा सृष्टि के साथ व्यापार चलता हैं और यह व्यापार चलते हुए हम समझते हैं कि जिसके साथ हमारा यह व्यवहार, व्यापार चल रहा है, उसके साथ हम व्यापार, व्यवहार कर रहे हैं।
श्री ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं की दृष्टिकोण बदल दो और उस सामने वाले व्यक्ति को सामने से हटा दो और कहो कि
"मैंने व्यवहार सामनेवाले के लिए नहीं किया, मैंने तो सृष्टि-कर्ता के लिए, श्रीभगवान् के लिए यह व्यवहार किया। मैने तो अपनी अन्तरात्मा के लिए यह किया।"
ऐसा करने से देखिए तो आपका हर एक साधारण कर्म, कर्मयोग में बदल जाएँगा।
ऐसा करने से देखिए तो आपका हर एक साधारण कर्म, कर्मयोग में बदल जाएँगा।
फिर चाहे हमारा यह कर्म कोई भी कर्म हो, चाहे वह साफ-सफाई करने का कर्म हो या मरे हुए जानवरों को उठाने का कर्म हो, चाहे वह अध्यापक का कर्म हो या किसी सैनिक का कर्म हो या किसी अभियन्त्रिक (Engineer) का ही कोई कर्म हो, जो इस प्रकार की भावना से कर्म करेगा, वह कर्मयोगी कहलाएगा।
श्रीभगवान् कर्म को ऊँचा-नीचा स्तरों में विभाजित नहीं करते। उनके लिए सब कर्म बराबर हैं। कर्म नहीं कर्मयोग दिव्य है। साधारण सा दिखने वाला कर्म भी एक दिव्य कर्म बन सकता है यदि हम उसे कर्मयोग में परिवर्तित कर दें। आगे श्रीभगवान् यही बता रहे हैं।
3.28
तत्त्ववित्तु महाबाहो, गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त, इति मत्वा न सज्जते॥3.28॥
परन्तु हे महाबाहो! गुण-विभाग और कर्म-विभाग को तत्त्व से जानने वाला महापुरुष 'सम्पूर्ण गुण (ही) गुणों में बरत रहे हैं' -- ऐसा मानकर (उनमें) आसक्त नहीं होता।
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः(स्), सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्, कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥3.29॥
प्रकृति जन्य गुणों से अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझने वाले मन्द बुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करे।
विवेचन- जब कर्म पर भगवान् की मोहर लग जाती है तो वह कर्म दिव्य हो जाता है। श्रीभगवान् ने अर्जुन से इसीलिए कहा,
"तुम्हें लोक सङ्ग्रह के लिए कर्म करना अनिवार्य है।"
उन्होंने जनक जी और स्वयं का उदारहण दिया-
"मैं स्वयं भी आया हूँ। मुझे कुछ प्राप्त नहीं करना है फिर भी मैं अखण्ड कार्यरत हूँ। आज सारथी बनकर तुम्हारे रथ के घोड़ों की लगाम थामकर बैठा हूँ। देखो, सारथ्य का कर्म भी मैं किस प्रकार आचरण में लाता हूँ।"
फिर बताते हैं कि प्रकृति तीन गुणों से प्राणी को बाँधते हुए उसे कर्मयात्रा में प्रविष्ट कराती है। इन गुणों के कारण जब मनुष्य कर्म करता है तो समझता है कि "मैंने यह कर्म किया।"
वास्तव में सत्त्व, रज और तम गुण मनुष्य से कर्म करवाते हैं।
जो तत्त्ववित्त लोग होते हैं, बुद्धिमान लोग होते हैं ये अपने भीतर झाँकते हैं कि ये कर्म की यात्रा किस तरह वे कर रहे हैं?
वे स्वयं को देखते हैं, परखते हैं। इन गुणों को कर्म करते हुए जानकर ये तत्त्ववित्त लोग अपने द्वारा किए कर्मों में अटकते नहीं हैं।
जो अज्ञानी होते हैं वे इन त्रिगुणों के बारे में अनभिज्ञ रहते हैं और स्वयं को ही अपने सभी कर्मों का कर्ता मानते हैं।
प्रकृति सूक्ष्म रूप से सब कर्म करवाती है। इसलिए श्रीभगवान् कहते हैं, "तुम सब अपने कर्म मुझको दे दो, अर्पित कर दो।"
"हे अर्जुन! तुम तुम्हारा युद्ध कर्म करो। "
जब किसी अपराधी को मृत्युदण्ड़ दिया जाता है, फाँसी लगाई जाती है,तो यह कर्म करने वाले जल्लाद को कोई पाप नहीं लगता क्योंकि उसने तो अपना कर्त्तव्य कर्म किया।
"हे अर्जुन! जब तुम अपना कर्त्तव्य कर्म, यह युद्ध करोगे तो लोग हताहत होंगे, लोगों को पीड़ा पहुँचेगी परन्तु उसके उत्तरदायी तुम नहीं रहोगे व तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा क्योंकि तुम युद्ध एक कर्त्तव्य कर्म के रूप में करोगे। कर्म का उत्तरदायित्व तुम्हारा नहीं है, उसे मुझे सौप दो।"
कर्म का उत्तरदायित्व उन्हें कैसे सौंपना है, यह सुन्दर बात श्रीभगवान् तीसवें श्लोक में बताते हैं। कर्म को कर्मयोग में कैसे परिणित करना यह बताते हैं।
मयि सर्वाणि कर्माणि, सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा, युध्यस्व विगतज्वरः॥3.30॥
(तू) विवेकवती बुद्धि के द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मों को मेरे अर्पण करके कामना रहित, ममता रहित (और) संताप रहित होकर युद्ध रूप कर्तव्य कर्म को कर।
विवेचन- "सारे कर्म और उनके परिणाम मुझे सौंप दो और तुम युध्यस्व विगतज्वरः, तुम युद्ध करो।"
श्रीभगवान अर्जुन से कहते हैं -अपना कर्त्तव्य कर्म ईश्वरार्पण बुद्धि से करो तो तुम्हारे मन का सारा सन्ताप, तुम्हारे मन का तनाव दूर हो जाएगा।
श्रीज्ञानेश्वर महाराज इसके लिए बहुत सुन्दर बात कहते हैं-
श्रीज्ञानेश्वर महाराज इसके लिए बहुत सुन्दर बात कहते हैं-
बाह्य अंतरा आपुलिया सर्व व्यापारा,
मज व्यापकाते वीरा विषय परी बाह्य अंतरा।।
मज व्यापकाते वीरा विषय परी बाह्य अंतरा।।
अन्दर चलने वाला व्यवहार कुछ न कुछ विचार और बाहर लोगों के साथ चलने वाला व्यवहार बाह्य अन्तरा अपुला यह सर्व तुम्हारा व्यापार, जो भी व्यवहार लोगों के साथ होता है तो लोगों को वहाँ से निकाल दो या लोगों के अन्दर के परमात्मा के लिए वह व्यवहार करो।
मन में ऐसा विचार करो कि "मैं यह काम परमात्मा के लिए कर रहा हूँ। यदि कोई बीमार है, उसकी सेवा उसके देह का जो भी नाम होगा उसके लिए नहीं परन्तु उसके अन्दर जो आत्म-तत्त्व है, उसके अन्दर जो परमात्म-तत्त्व है उसके लिए मैं कर रहा हूँ!" इस भावना से करो।
"मैं समाज के लिए नहीं, समाज उस परमात्मा का ही अङ्ग है इसलिए मैं कर रहा हूँ!" इस भावना से करो।
कोई भी कर्म ऋणमुक्ति की भावना से करो। मनुष्य पर चार प्रकार के ऋण हमने देखे।
देवताओं का ऋण- जो सृष्टि का सञ्चालन करती है उस सृष्टि का।
ऋषियों का ऋण- जिन्होंने ग्रन्थों का निर्माण किया, लौकिक विद्याओं के लिए भी जो पुस्तकें उन्होंने निर्माण की उनका ऋण भी हम पर होता है। गीताजी हम पढ़ रहे हैं, उनके विवेचन हम सुन रहे हैं। विवेचक जिनसे हमने विवेचन सुने, वे गुरु उनका ऋण अर्थात् ऋषि ऋण।
समाज का ऋण- जिस समाज के कारण हमारे लिए सारी व्यवस्थाओं का निर्माण होता है उसका ऋण।
पितरों का ऋण- जिन्होंने हमें जन्म दिया वे हमारे माता-पिता, उस अनुवंशता का, उस वंश का ऋण।
ये सारे ही ऋण हम पर जन्म से ही होते हैं और इन ऋणों की मुक्ति मनुष्य मात्र भावना से पा सकता है। वैसे तो इन ऋणों से मुक्त होना तो सम्भव नहीं होता परन्तु मन में कृतज्ञता का भाव होना अति आवश्यक है।
श्रीभगवान् कहते हैं "हे अर्जुन! "युध्यस्व विगतज्वरः" तुम मेरे लिए ये युद्ध करो। वीर अर्जुन! मैं जो व्यापक हूँ। उस परमात्मा को तुम विषय बनालो।
परमात्मा व्यापक कैसे हैं?
परमात्मा जो व्यापक हैं, जो अनन्त हैं, जो अविनाशी हैं, जो कण-कण में स्थित हैं, जो कण-कण में तो हैं पर कण से भी परे हैं, उस परमात्मा को तुम विषय बना लो और उसे यह सारे कर्म सौंप दो।
"व्यापकाते विरा विषयो करी"
"मैं तुम्हारे सारे कर्म ले लूँगा। श्रीभगवान् कहते हैं, मैं सब कर्म ले लूँगा। मैं तुम्हारा अपयश भी स्वीकार कर लूँगा। जो भी कर्म तुमने किया, तुमने मुझे दिया। मैं तुम्हारा किया हर कर्म ले लूँगा।"
बस हो गया कर्मयोग। यही तो है कर्मयोग।
श्रीभगवान् आगे चलकर कहते हैं कि कुछ लोग ये बात मानते हैं तो कुछ नहीं मानते।
जो मानते हैं, जैसे भगिनी निवेदिता जी। एक बार उनको किसी ने पूछा कि आप क्या पढ़ा रही थी बच्चों को?
तो वे बोलीं " मैं कहाँ बच्चों को पढ़ा रही थी! मैं तो ईश्वर की पूजा कर रही थी। वो नन्हें बालक जो हमारे सामने हैं वे तो ईश्वर का रूप हैं।"
गुरुदेव भी हमें गीता परिवार के बारे में जब सिखाते हैं-
"हमें गीताजी सिखानी है, बालकों को नहीं बाल-कृष्णों को सिखानी है। ये सब बालकृष्ण आए हैं। मुझसे कुछ सीख कर गए तो मेरी भी पूजा हो गई और मेरा भी जीवन महक गया।"
इस भावना से कुछ भी करो तो जीवन महक जाता है। उसकी सुगन्ध चारों ओर फैलने लगती है। यह एक सुन्दर सा कर्म योग बन जाता है।
कर्मयोगी किस प्रकार से कर्म करेगा और सामान्य व्यक्ति किस प्रकार से कर्म करेगा? दोनों के कर्म करने में क्या अन्तर होता हैं?
कोई अध्यापक है और यह सोचकर पढ़ा रहा है-
"पढ़ाने का मैं वेतन लेता हूँ तो मुझे पढ़ाना अनिवार्य है, मुझे जो पाठ्यक्रम पूर्ण करना है वह मैं पढ़ा रहा हूँ।"
"पढ़ाने का मैं वेतन लेता हूँ तो मुझे पढ़ाना अनिवार्य है, मुझे जो पाठ्यक्रम पूर्ण करना है वह मैं पढ़ा रहा हूँ।"
यह एक सामान्य कर्म करने वाला पगार के लिए पढ़ाने वाले व्यक्ति की सोच होती है।
दूसरा कोई अध्यापक सोचता है-
"पगार मिलती है, ठीक है। यह तो साधन है, साध्य कर्म है। इस पगार प्राप्ति के कारण मुझे एक अच्छा कर्म प्राप्त हुआ है। कर्म महत्त्वपूर्ण है जो साध्य है। वेतन महत्त्वपूर्ण नहीं है। मेरी कक्षा में पढ़ने वाला कोई बालक पता नहीं कल बड़ा होकर सेना का कोई अधिकारी होगा, कोई अध्यापक बनेगा, कोई अभियन्ता बनेगा, कोई चिकित्सक बनेगा, कोई वैज्ञानिक बनेगा और ये सब इस सृष्टि का, देश का, समाज का कार्य करेंगे। मैं इस भावना से कर्म करूँ। उन्हें ठीक से पढ़ाऊँ। इन्हें भगवान् ने मेरे द्वारा पढ़ाने के लिए भेजा है।"
इस भावना से जो कर्म करेगा वह कर्मयोगी कहलाएगा। स्वर्गीय विनोबाभावेजी कहते थे-
"पगार मिलती है, ठीक है। यह तो साधन है, साध्य कर्म है। इस पगार प्राप्ति के कारण मुझे एक अच्छा कर्म प्राप्त हुआ है। कर्म महत्त्वपूर्ण है जो साध्य है। वेतन महत्त्वपूर्ण नहीं है। मेरी कक्षा में पढ़ने वाला कोई बालक पता नहीं कल बड़ा होकर सेना का कोई अधिकारी होगा, कोई अध्यापक बनेगा, कोई अभियन्ता बनेगा, कोई चिकित्सक बनेगा, कोई वैज्ञानिक बनेगा और ये सब इस सृष्टि का, देश का, समाज का कार्य करेंगे। मैं इस भावना से कर्म करूँ। उन्हें ठीक से पढ़ाऊँ। इन्हें भगवान् ने मेरे द्वारा पढ़ाने के लिए भेजा है।"
इस भावना से जो कर्म करेगा वह कर्मयोगी कहलाएगा। स्वर्गीय विनोबाभावेजी कहते थे-
"कर्म और कर्मयोग में क्या अन्तर हैं? जिस प्रकार यदि हम पाँच सौ रुपए के नोट की तरह कोई दूसरा कागज लें तो उसका कोई मूल्य नहीं होता उसी प्रकार जब तक कर्म कर्मयोग समझकर हम नहीं करते तब तक हमारे किए कर्म का कोई मूल्य नहीं होता।"
जब तक हमारे कर्म पर श्रीभगवान् की मोहर नहीं लगती तब तक किसी नोट के अनुरूप ही हमारा कर्म भी मूल्यवान नहीं बनता।
हमारा कौनसा कर्म मूल्यवान बनेगा?
हमारा वह कर्म मूल्यवान बनेगा जो (कर्म) हम श्रीभगवान् को अर्पण कर देंगे हमारी दैनन्दिनी का कोई छोटा सा भी कर्म हो यदि हम उसे श्रीभगवान् को अर्पण कर देंगे तो वह कर्मयोग मे परिवर्तित हो जाएगा।
घर के छोटे-मोटे काम करते समय हमें यही सोचना चाहिए-
"यह भगवान् का घर हैं जिसमें हर काम मैं भगवान् के लिए कर रहा हूँ (या कर रही हूँ)।"
घर के छोटे-मोटे काम करते समय हमें यही सोचना चाहिए-
"यह भगवान् का घर हैं जिसमें हर काम मैं भगवान् के लिए कर रहा हूँ (या कर रही हूँ)।"
यदि खाना भी बना रही हो तो "यह मैं भगवान् के लिए बना रही हूँ/ बना रहा हूँ। "
यदि मैं नोकरी कर रहा हूँ तो "यह नौकरी मैं भगवान् के लिए कर रहा हूँ/ रही हूँ। "
यदि मैं नोकरी कर रहा हूँ तो "यह नौकरी मैं भगवान् के लिए कर रहा हूँ/ रही हूँ। "
यदी कोई मेहमान आए या किसी बीमार की सुश्रुषा करे तो "उनकी सेवा मैं भगवान् के लिए कर रहा हूँ/ रही हूँ।"
यही भाव हमारे मन में सदा किसी भी काम को करते हुए आने चाहिए और इस तरह हम छोटे से छोटे कर्म को भी कर्मयोग मे बदल सकते है।
श्रीभगवान् कहते हैं कुछ लोग मेरी इन कही बातों को नहीं मानते। जो लोग अपनों से बड़ों की बात मानते हैं, वे सारे अशुभों से परे हो जाते हैं।
ये मे मतमिदं(न्) नित्यम्, अनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो, मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥3.31॥
जो मनुष्य दोष-दृष्टि से रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्व श्लोक में वर्णित) मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।
विवेचन- "वे लोग जो शङ्का-कुशङ्का नहीं करते, जिनके मन में सृष्टिकर्ता के प्रति पूर्ण श्रद्धा है और जो दोष दृष्टि से रहित हैं, ऐसे श्रद्धावान लोग मेरे इस कथन का नित्य अनुसरण करते हैं। वे अपने सर्वकर्म मुझको या अपने इष्ट को अर्पण नहीं भी करते तो भी कुछ न कुछ कर्म तो वे मुझको अर्पण करते ही हैं क्योंकि मैं उनकी बुद्धि में रहता हूँ।
महाराष्ट्र के सावता माली नाम के जो प्रसिद्ध सन्त हुए वे कहते थे,
"कांदा, मूळा, भाजी, अवघी विठाई माझी।"
हर सब्जी, हर प्याज, हर मूली सभी मेरे लिये विठ्ठल हैं, भगवान् हैं। इस प्रकार की दृष्टि रखकर काम करने वाले सामान्य लोग भी असामान्य अवस्था तक पहुँच गए।
जनाबाई नाम की एक दासी सन्त नामदेव महाराज जी के यहाँ रहती थी। उसने अपने माता-पिता से कह दिया कि मैं अब घर नहीं जाऊँगी, अब यहीं पण्ढरपुर में ही रहूँगी और विठ्ठल भगवान् की सेवा करूँगी। यह बर्तन माञ्जने वाली, कपड़े धोने वाली सामान्य स्त्री भक्ति में लीन होकर, उच्च सोपान पर पहुँच गई कि निर्गुण निराकार में विट्ठल भगवान् को देखने लगी। वे कहती थी मैं जो भोजन कर रही हूँ वह भी परमात्मा हैं। मैं जो जल पी रही हूँ परमात्मा ही हैं। मैं जहाँ सो रही हूँ वह भी परमात्मा ही हैं।
देव खाते, देव पीते, देवावरी मी निजते।
देव देते, देव घेते, देवा संग व्यवहारते।।
जीवन में जो व्यवहार चल रहा है वह भी परमात्मा का है। जो दे रही हूँ वह भी परमात्मा हैं, जो ले रही हूँ वह भी परमात्मा ही हैं। जो हो रहा है, देव मुझे नहीं पता।
येथे देव, तीथे देव, देवा विण ना रीते।।
सभी स्थान पर वह परमात्मा हैं, वह कण-कण में हैं। एक जगह भी खाली नहीं है जहाँ पर वह नहीं हैं।
देवा बिन नाही रीते जनी,
म्हणे विठाबाई सबाई अभ्यंतरी भरुन राही।।
म्हणे विठाबाई सबाई अभ्यंतरी भरुन राही।।
जनाबाई कहती है-
विठाबाई तुम तो सबाई अभ्यंतरी भरुन राही,
मेरे अन्दर भी आप हैं, मेरे सामने भी आप हैं, मेरे पीछे भी आप हैं। मेरे सब स्थान आप हैं।
विठाबाई तुम तो सबाई अभ्यंतरी भरुन राही,
मेरे अन्दर भी आप हैं, मेरे सामने भी आप हैं, मेरे पीछे भी आप हैं। मेरे सब स्थान आप हैं।
इस अनुभूति तक सन्त-महात्मा पहुँच गए। कितनी सुन्दर दिव्य अनुभूतियों से मण्डित उनके जीवन हमारे लिए पथ प्रदर्शक बन जाते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं,
"कुछ लोग ये सुनते हैं तो वे भी कर्म बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।"
सामान्य लगने वाले इस प्रकार के सामान्य कर्म करके सन्त महात्मा उस अत्युच्च पायदान तक पहुँच जाते हैं। सन्त गोरा कुम्भारजी कुम्हार थे, मटके बनाते थे। वे कहते थे-फिरत्या चाका वरति देसी मातीला आकार,
विट्ठला तू वेडा कुंभार।
"कुछ लोग ये सुनते हैं तो वे भी कर्म बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।"
सामान्य लगने वाले इस प्रकार के सामान्य कर्म करके सन्त महात्मा उस अत्युच्च पायदान तक पहुँच जाते हैं। सन्त गोरा कुम्भारजी कुम्हार थे, मटके बनाते थे। वे कहते थे-फिरत्या चाका वरति देसी मातीला आकार,
विट्ठला तू वेडा कुंभार।
अरे विट्ठल भगवान् आप भी तो मेरे जैसे ही कुम्हार हो। आप ही तो घट-घट में घट का निर्माण करते हो।
श्रीभगवान् कहते हैं-
श्रीभगवान् कहते हैं-
"इस प्रकार से उस अपने कर्म से उस परमात्मा के साथ अनुसन्धान करने वाले जो लोग हैं अर्जुन वो भी अपने कर्म के बन्धन, कर्म के परिणामों से मुक्त हो जाते हैं क्योंकि कर्म किया तो फल आने वाला है, अनिवार्य है।"
कर्म किया (action) है तो फल उसकी प्रतिक्रिया (reaction) परन्तु जो फल हम जैसा चाहते हैं वैसा आता ही है ऐसा नहीं है और इन परिणामों के कारण हम लोग कर्म करने से डरते हैं। श्रीभगवान् हमें परिणामों के डर से मुक्त जीवन को एक आनन्द यात्रा कैसे बनानी है वह बात बताते हैं।
यहाँ पर सन्त श्रीज्ञानेश्वर महाराज और एक बात कहते हैं यहाँ पर भगवान् ने तो सभी कर्म उन्हें अर्पण करने को कह दिए परन्तु ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं कि जब हम प्रभु को अपने सब कर्म अर्पण करने जाएँगे तो हमारे गलत कर्म हम अर्पण नहीं कर पाएँगे।
यदि कल मैंने किसी को गालियाँ दीं, मैंने किसी की निन्दा की और कह दिया भगवान् ले लो वे तो भगवान् बाद में लेंगे परन्तु जो हमने निन्दा की है तो पहले तो हमारे अच्छे कर्म हमें देने पड़ेंगे और इसलिए श्रीज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं-
उचित कर्म आपली तया करो निज अर्पावी,
चित्तवृत्ति विन्यासावी आत्म रूपी।।
चित्तवृत्ति विन्यासावी आत्म रूपी।।
वे कहते हैं, आत्मरूप के साथ अपनी चित्तवृत्ति लगा के उचित कर्म अपने दिनभर में किए हुए सब अच्छे कर्म परमात्मा को अर्पण करो। पहले तो अच्छे कर्म करने की होड़ भी लगेगी, मन सत्कर्म कवाएगा। अपने आप गलत कर्म भी घटेंगे और भगवान् धीरे-धीरे गलत कर्म भी ले लेंगे क्योंकि जीवन की यात्रा में चलते-चलते दोनों बातें अनिवार्य हो जाती है।
श्रीभगवान् कहते हैं, कुछ लोग जो बड़ों का कहना मानते हैं तो हेअर्जुन! उनके जीवन का उन्नयन होता है। वे भी कर्म के बन्धनों से मुक्त होते हैं। कुछ लोग जो आप लोगों की बातों पर विश्वास नहीं रखते, अपना एक अलग ही रास्ता लेना चाहते हैं, वे बहुत संशयी होते हैं। संशय करना गलत नहीं है। जो आज संशय करेंगे, कल शरण में आ जाएँगे।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो, नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्, विद्धि नष्टानचेतसः॥3.32॥
परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मत में दोष-दृष्टि करते हुए (इसका) अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित (और) अविवेकी मनुष्यों को नष्ट हुए (ही) समझो अर्थात् उनका पतन ही होता है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं,
"अर्जुन! दो प्रकार के लोग होते हैं। कुछ सुनेंगे और नहीं सुनेंगे। ये जो दूसरे प्रकार के लोग होते हैं वे केवल दोषारोपण करने वाले होते हैं।"
असूय शब्द का अर्थ होता है दोष न रहते हुए भी दोष देखने की दृष्टि क्योंकि मन में असूया आ जाती है।
हम क्यों माने? "अर्जुन! मेरा मत ये लोग मानते नहीं हैं और वे अचेतस् होते हैं।"
श्रीभगवान् ने उनको अचेतस् अर्थात् जिनका चित्त चञ्चल है, संशययुक्त है, जो अव्यवस्थित (disorganised) होते हैं वे अभी सम्भ्रम में हैं। ये विचार नहीं कर सकते। उन्हें लगता है-
हमारा जीवन हमने गढ़ा हैं, I am a self made person.
मुझे किसी की, किसी शक्ति की आवश्यकता नहीं है, ऐसा वे समझते हैं। किसी के सामने झुकना, किसी के सामने नतमस्तक होना और कहना परमात्मा मुझसे करवा लो, इसे ये कमजोरी (weakness) समझते हैं।
हमारा जीवन हमने गढ़ा हैं, I am a self made person.
मुझे किसी की, किसी शक्ति की आवश्यकता नहीं है, ऐसा वे समझते हैं। किसी के सामने झुकना, किसी के सामने नतमस्तक होना और कहना परमात्मा मुझसे करवा लो, इसे ये कमजोरी (weakness) समझते हैं।
ये समर्पण की भावना समझते ही नहीं हैं। अचेतसा, कभी जुड़े ही नहीं। तो ऐसे अचेतसा सर्वज्ञानविमूढांस्तान्, विमूढ़ जिनका सारा ज्ञान ही नष्ट हो गया हो, विद्धि नष्टानचेतसः, जो मोहित हो गए हो, ऐसा समझो इसलिए वह ज्ञान, वह विवेक बुद्धि उनके पास नहीं है, वे ऐसा सोचते हैं और यह बात मानते नहीं है।
जैसे-जैसे हम इस कर्मयोग के पथ पर अग्रसर होते जाते हैं, वह शक्ति हमारे साथ बनी रहती है। उस शक्ति और ऊर्जा शक्ति के कारण हमारे विचारों का स्तर भी ऊपर-ऊपर उठने लगता है। हमारे विचारों में व्यापकता आ जाती है। सङ्कुचन से मनुष्य मुक्त हो जाता है। देह-बुद्धि सङ्कुचित करती है, आत्म-बुद्धि व्यापकता लाती है। व्यापकता में विकार नहीं होते।
जैसे जब थोड़े दूध में दही बनाने के लिए जामन लगाते हैं तो दूध में विकार हो जाता है, यदि दूध का क्षीर सागर, समुद्र होगा तो उसमें एक चम्मच दही डालने से उसमें विकार नहीं होगा। व्यापकता में विकार नहीं होता इसीलिए मनुष्य को व्यापक विचारवाला बनना आवश्यक है।
जैसे जब थोड़े दूध में दही बनाने के लिए जामन लगाते हैं तो दूध में विकार हो जाता है, यदि दूध का क्षीर सागर, समुद्र होगा तो उसमें एक चम्मच दही डालने से उसमें विकार नहीं होगा। व्यापकता में विकार नहीं होता इसीलिए मनुष्य को व्यापक विचारवाला बनना आवश्यक है।
श्रीभगवान् आगे कहते हैं- "अर्जुन! यह सब प्रकृति ही कार्य करवा रही है।"
सदृशं(ञ्) चेष्टते स्वस्याः(फ्), प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं(य्ँ) यान्ति भूतानि, निग्रहः(ख्) किं(ङ्) करिष्यति॥3.33॥
सम्पूर्ण प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं। ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। (फिर इसमें) किसी का हठ क्या करेगा?
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं-
"उत्तम से उत्तम ज्ञानी व्यक्ति भी अपने प्रकृतिगत स्वभाव को परिवर्तित नहीं कर सकते।"
"उत्तम से उत्तम ज्ञानी व्यक्ति भी अपने प्रकृतिगत स्वभाव को परिवर्तित नहीं कर सकते।"
अपनी प्रकृति के अनुसार ही मनुष्य का अपना एक स्वभाव होता है। हर व्यक्ति का स्वभाव अलग होता है।
उनके सत्व, रज, तम गुणों के मिश्रण अलग होते हैं। सभी व्यक्तियों में त्रिगुणों का वितरण भिन्न-भिन्न होता है इसलिए एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के समान नहीं होता।
त्रिगुणों के मिश्रण भिन्न होने के कारण,
लोगों के स्वभाव उनके भिन्न होते हैं।
लोगों के स्वभाव उनके भिन्न होते हैं।
रजोगुणी व्यक्ति अत्यन्त क्रियाशील (hyper) होता है। उसे कर्म किए बिना चैन नहीं आता परन्तु सत्वगुणी व्यक्ति को ज्ञान की आराधना अच्छी लगती है। तमोगुणी व्यक्ति में बहुत ज्यादा आलस्य, प्रमाद रहता है।
व्यक्ति में जिस प्रकार का त्रिगुणों का मिश्रण होगा व्यक्ति का उसी प्रकार का स्वभाव बनता है और उससे उसी प्रकार के कर्म घटते हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं, "प्रकृतिं(य्ँ) यान्ति भूतानि,
अर्जुन! इन पञ्च महाभूतों (अग्नि, जल, वायु, आकाश, पृथ्वी) से बने हुए प्राणी अपने प्रकृतिगत स्वभाव के अनुसार कर्म करते हैं।"
अर्जुन! इन पञ्च महाभूतों (अग्नि, जल, वायु, आकाश, पृथ्वी) से बने हुए प्राणी अपने प्रकृतिगत स्वभाव के अनुसार कर्म करते हैं।"
इनमें से जो ज्ञानवान होते हैं, स्वस्या प्रकृते सदृश्यम चेष्टते। चेष्टते अर्थात् चेष्टा करते हैं।
ज्ञानवान, अत्यन्त ज्ञानी व्यक्ति भी यह समझता है कि मैं अपनी प्रकृति के अनुसार ही कर्म करूँगा क्योंकि प्रकृति मुझसे ये कर्म करवा रही है। वह ज्ञानी है क्योंकि उसमें सत्त्वगुण है, बुद्धि है, विवेक है। इसलिए वह ज्ञान की आराधना कर सकता है। श्रीभगवान् कहते हैं कि सभी अपने प्रकृति के आधीन होकर कर्म करते हैं।
निग्रहः(ख्) किं(ङ्) करिष्यति,
निग्रह करने से क्या लाभ होता है? यहाँ पर ऐसा अर्थ होता है कि श्रीभगवान् इसलिए अर्जुन को कह रहे हैं कि तुम्हारा स्वभाव कैसा है, यह तुम स्वयं पहचानो, अपने पिण्ड को पहचानो। एक ही माँ की कोख से जन्मे हुए बालक भी समान नहीं होते हैं। एक बालक जब पाठशाला से आयेगा तो तुरन्त सामान सही स्थान पर ही रखेगा, बैग रखेगा, वाटर बैग रखेगा, हाथ पैर धोएगा।
निग्रह करने से क्या लाभ होता है? यहाँ पर ऐसा अर्थ होता है कि श्रीभगवान् इसलिए अर्जुन को कह रहे हैं कि तुम्हारा स्वभाव कैसा है, यह तुम स्वयं पहचानो, अपने पिण्ड को पहचानो। एक ही माँ की कोख से जन्मे हुए बालक भी समान नहीं होते हैं। एक बालक जब पाठशाला से आयेगा तो तुरन्त सामान सही स्थान पर ही रखेगा, बैग रखेगा, वाटर बैग रखेगा, हाथ पैर धोएगा।
माँ ने जो दिया है वह खाएगा और फिर पढ़ाई करेगा। दूसरा बालक सब सामान इधर-उधर फेंक देगा, दूरदर्शन का बटन चालू करेगा, मोबाइल पर खेलता रहेगा।
दो बालक किन्तु उनके पिण्ड भिन्न-भिन्न हैं क्योंकि त्रिगुणों मिश्रण भिन्न-भिन्न है और उनके पूर्व जन्म के कर्म और संस्कार दोनों ही भिन्न हैं। इसीलिए श्रीभगवान् कहते हैं, "तुम अपने पिण्ड को पहचानो।"
जब हम अपने पिण्ड को पहचान जाते हैं तो हम अपने पिण्ड में बदलाव भी कर सकते हैं।
जब हम अपने पिण्ड को पहचान जाते हैं तो हम अपने पिण्ड में बदलाव भी कर सकते हैं।
अर्जुन यदि युद्ध भूमि से चला गया तो क्या ध्यान कर पाएगा? क्या बड़े-बड़े ग्रन्थ पढ़ पाएगा? आध्यात्म शास्त्र पढ़ पाएगा? नहीं, उसका मन तो पूरा का पूरा उस युद्ध भूमि में ही रहेगा। हमने देखा है कि जहाँ पर मन होता है वहाँ पर हम होते हैं।
तत्रात्मा यत्र मन, जहाँ पर अपना मन है वहाँ पर हम होते हैं।
अब अर्जुन ध्यान नहीं लगा सकता। उसी प्रकार यदि कोई ज्ञानी व्यक्ति है समझो ज्ञान की आराधना में जिसका मन, जिसकी बुद्धि लगती है उस व्यक्ति को सेना में भर्ती कर दिया तो क्या होगा? वहाँ पर उसका मन लगेगा ही नहीं।
अर्जुन को अपने प्रकृतिगत स्वभाव को देखना है इसलिए श्रीभगवान् कहते हैं- मैं युद्ध छोड़ रहा हूँ, ऐसा निग्रह करके क्या करोगे? उससे अच्छा तो अपना कर्तव्य कर्म जो तुम्हें प्राप्त है, वह करो और ईश्वरात्मक बुद्धि से करो।
श्रीभगवान् आगे जाकर कहते हैं कि ये इन्द्रियाँ हमें भटकाती हैं। ये इन्द्रियाँ इन्हें जो प्रिय होता है, उसी ओर दौड़ाती हैं इसलिए उनको भी पहचानो।
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे, रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्, तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥3.34॥
इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में (प्रत्येक इन्द्रिय के प्रत्येक विषय में) (मनुष्य के) राग और द्वेष व्यवस्था से (अनुकूलता और प्रतिकूलता को लेकर) स्थित हैं। (मनुष्य को) उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्ग में) विघ्न डालने वाले शत्रु हैं।
विवेचन- इन्द्रियाँ और इन्द्रियों के विषय -
आँखों का विषय रूप है, कान का शब्द है,
नासिका का गन्ध है,
त्वचा का स्पर्श है और जिह्वा का विषय रस है।
जिह्वा का वाणी से भी सम्बन्ध है तो वह कर्मेन्द्रिय भी है और ज्ञानेन्द्रिय भी है।
ज्ञानेन्द्रियों में उनके विषय स्थित रहते हैं और इन विषयों में राग-द्वेष स्थित रहते हैं।
राग क्या है?
राग अथवा आसक्ति (attachment)
और द्वेष (hatered), जलन।
जो वस्तु हमें भाती है, उसके प्रति हमारे मन में आसक्ति होती है और जो नहीं भाती, उसके प्रति द्वेष होता है, जो हम नहीं चाहते।
चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, चाहे वह व्यक्ति के मनोनुकूल हो, उसे मन चाहता है, उसके प्रति राग रखता है और जो मन के प्रतिकूल, विपरीत है, उसके प्रति द्वेष रखता है। जो व्यक्ति हमारे लिए अनुकूल है, उसके प्रति हमारे मन में आसक्ति हो जाती है। जो हमारे लिए प्रतिकूल है, जो हमारे मार्ग में कुछ-न-कुछ अवरोध उत्पन्न करता है, उसके प्रति द्वेष का निर्माण होता है। हमारे मन में ये दोनों एक साथ ही आते हैं। इतना ही नहीं, जब किसी एक व्यक्ति के प्रति हमारे मन में राग होता है, प्रेम, आसक्ति होती है तो हम देखते हैं कि बहुत बार अन्य लोगों के मन में उसके प्रति जलन, द्वेष का निर्माण हो जाता है।
किसी कक्षा में यदि कोई एक विद्यार्थी प्रखर बुद्धिवाला है, सदैव प्रथम आता था। यदि शिक्षक उसके प्रभाव में या उसके प्रति अत्यधिक आसक्ति में उसी से बार-बार प्रश्न पूछते रहे तो शेष विद्यार्थियों के मन में उस बालक के प्रति द्वेष का ही निर्माण होगा, प्रेम का नहीं। उससे कोई मित्रता ही नहीं करेगा। बहुत बार ऐसा होता है कि किसी एक से अनुराग के कारण दूसरे लोग जलनवश उससे दूर हो जाते हैं।
एक माता अपनी कन्या को अत्यधिक चाहती हो, उसी की प्रशंसा, उसी की बातें करती रहती हो तो बहू के मन में उस ननद के प्रति द्वेष का निर्माण हो ही जाता है। हम बड़ों को देखना चाहिए कि अपने व्यवहार में स्वयं में या सामने वालों में कोई अति राग-द्वेष तो प्रविष्ट नहीं हो रहे हैं और बहुत बार, बड़े लोग इस बात को समझ ही नहीं पाते।
कभी यह व्यवहार अनायास या कभी जानबूझकर या जिसे हम कह सकते हैं, षड्यन्त्र के रूप में भी हो जाता है। कभी-कभी ये राग-द्वेष घर को नष्ट कर देते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं-
"इन्द्रियस्येन्द्रियस्य राग-द्वेष व्यवस्थित।
ये जो राग-द्वेष हैं, वे इन्द्रियों के विषयों में छिपे रहते हैं।"
ये जो राग-द्वेष हैं, वे इन्द्रियों के विषयों में छिपे रहते हैं।"
“तयोः वशं न आगच्छेत्, हमें उनके वश में, उनके नियन्त्रण में नहीं आना चाहिए, अर्जुन।"
“तौ हि अस्य परिपन्थिनौ,
ये तुम्हारे कल्याण-मार्ग के शत्रु हैं, ये राजपथ के लुटेरे हैं। ये तुम्हारी जीवन की आनन्द-यात्रा को बिगाड़ने वाले हैं। मन में स्थित आनन्द पर ग्रहण लगाने वाले हैं।"
"इसलिए तुम इनके वश में मत जाना, क्योंकि ये क्या लूटते हैं, यह जानते हो?"
"परिपन्थिनः
मार्ग के लुटेरे ये हमारा विवेक, हमारा ज्ञान, हमारी बुद्धि और हमारी सही-गलत की पहचान नष्ट कर देते हैं।"
मार्ग के लुटेरे ये हमारा विवेक, हमारा ज्ञान, हमारी बुद्धि और हमारी सही-गलत की पहचान नष्ट कर देते हैं।"
"जो मनोनुकूल है, उसके प्रति राग का निर्माण करते हैं “वही चाहिए, यही चाहिए।”
"जो प्रतिकूल है, वह नहीं चाहिए और इस प्रकार उसके प्रति द्वेष का निर्माण करते हैं।"
"इसीलिए, अर्जुन, चलते समय सावधान बनो।"
अब आगे चलकर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण श्लोक आता है।
अपने स्वभाव को पहचानते हुए, स्वयं को किसी के साँचे में नहीं ढालना चाहिए और न ही दूसरों को अपने साँचे में ढालना चाहिए।
हर व्यक्ति भिन्न है। पाँचों अङ्गुलियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं, किन्तु पाँचों से ही मुट्ठी बनती है।
इस सृष्टि में भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग सृष्टि के सञ्चालन के लिए आवश्यक हैं।
"मैं जिस प्रकार का हूँ, उस प्रकार का दूसरा व्यक्ति नहीं है, हमें इस बात को समझना चाहिए, घर के लोगों को समझना चाहिए, अपने बालकों को समझना चाहिए।"
"अपने स्वभाव के साथ-साथ अपने परिवारजनों के स्वभाव को भी समझना चाहिए।"
उनकी अधिग्रहण क्षमता (apptitude) कैसी है, यह समझना चाहिए।
माता-पिता चाहते हैं,
“नहीं, मेरा पुत्र डॉक्टर ही बने।”
“मैं इञ्जीनियर हूँ, मेरे पिता इञ्जीनियर हैं,
"मेरे पति इञ्जीनियर हैं, तो मेरा पुत्र भी इञ्जीनियर बने।”
यह उचित नहीं है। उनकी रुचि क्या है, बुद्धि कैसी है, उनका स्वभाव कैसा है, ये सब देखना चाहिए।
श्रीभगवान् कहते हैं,
"इसलिए अपने स्वभाव को पहचानो। विगुण प्रतीत होने वाला भी जो तुम्हारा स्वभाव है, जो तुम्हारा धर्म है, वही तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है।"
“श्रेयान्” शब्द से ही श्लोक का आरम्भ होता है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः(फ्), परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं(म्) श्रेयः(फ्), परधर्मो भयावहः॥3.35॥
अच्छी तरह आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुणों की कमी वाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में (तो) मरना (भी) कल्याणकारक है (और) दूसरे का धर्म भय को देने वाला है।
विवेचन- यह बहुत सुन्दर श्लोक है। श्रीभगवान् ने इस श्लोक को अट्ठारहवें अध्याय में फिर से एक बार बताया है और अर्जुन को कहा है-
"तुम्हारा जो क्षत्रिय-धर्म है, वही तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है। तुम ज्ञान के मार्ग के अभी अधिकारी नहीं हो। स्वयं को पहचानो, मानो, यहीं से तुम्हारा रास्ता आगे बढ़ेगा। यहीं से तुम्हारे रास्ते का उन्नयन होगा।"
"तुम्हारा जो क्षत्रिय-धर्म है, वही तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है। तुम ज्ञान के मार्ग के अभी अधिकारी नहीं हो। स्वयं को पहचानो, मानो, यहीं से तुम्हारा रास्ता आगे बढ़ेगा। यहीं से तुम्हारे रास्ते का उन्नयन होगा।"
इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक भिन्न अपना रास्ता होगा। श्रीभगवान् कहते हैं-
"अच्छे ढङ्ग से आचरण में लाया हुआ दूसरे का परधर्म भी अपने विगुण स्वधर्म से श्रेष्ठ नहीं होता।"
"अच्छे ढङ्ग से आचरण में लाया हुआ दूसरे का परधर्म भी अपने विगुण स्वधर्म से श्रेष्ठ नहीं होता।"
यहाँ पर “धर्म” शब्द का अर्थ प्रचलित अर्थ से नहीं है। धर्म यानी हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई ये धर्म नहीं हैं। ये तो विभिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं।
परमात्मा की आराधना करने की उपासना-पद्धतियाँ।
भगवद्गीता में “धर्म” शब्द का अर्थ है, अपना-अपना कर्त्तव्य।
यह अर्थ हम समझें कि अपना कर्त्तव्य, जो मेरे हिस्से में आया है, जो कभी-कभी हमें विगुण भी लगता है।
जल्लाद को तो अपराधी को फाँसी देने का ही कर्त्तव्य उसे निभाना पड़ता है। ऐसे करते हुए उसे कैसा लगता होगा? उसे लगता होगा,
“यह सज़ा दिलाने के लिए मैं हूँ। यह कैसा मेरा विगुण धर्म है!”
श्रीभगवान् कहते हैं,
"वही विगुण स्वधर्म तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है, अर्जुन।"
यहाँ पर कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र नहीं। इस प्रकार की सेवा-कर्म करने वाले, व्यापार-कर्म करने वाले, क्षत्रिय-धर्म निभाने वाले, देश की रक्षा करने वाले सैनिक, ज्ञान की आराधना करने वाले, वैज्ञानिक होंगे, अनुसन्धान करने वाले या शोध करने वाले, ये सारे ही हैं।
कोरोना की महामारी में हमने देखा कि जो वैज्ञानिक ज्ञानी लोग थे, उन्होंने वैक्सीन का निर्माण किया। जो परिचर्या-कर्म करने वाले थे, वे तो सब पी.पी.ई. किट पहनकर लोगों की सेवा कर रहे थे।डॉक्टर, नर्सें, स्टाफ सभी लोग सेवा में लगे थे। ये सब विगुण नहीं हैं। श्रीभगवान् कहते हैं,
"सभी की आवश्यकता इस सृष्टि को है और इसीलिए तुम्हारे हिस्से में जो आया है, तुम्हें लगता है विगुण है क्योंकि लोग इस प्रकार की दृष्टि रखते हैं परन्तु परमात्मा नहीं रखते।
अपना स्वधर्म ही श्रेयस्कर है।
आगे चलकर श्रीभगवान् कहते हैं,
"अर्जुन! स्वधर्म निभाते हुए जीवन समाप्त भी हो जाए तो भी वह श्रेयस्कर है।"
परधर्म अर्थात् दूसरों का कर्त्तव्य। दूसरों का जीवन हमारे लिए भयावह हो सकता है।
साधारण मनुष्य इसे नहीं समझ सकते।
“यह कैसे कर रहा है?”
“अरे! मुझसे तो नहीं होगा।”
श्रीभगवान् आपसे वह अपेक्षा भी नहीं करते।
श्रीभगवान् ने आपको जो गुण दिए हैं, उसी प्रकार से आप अपना आचरण रखो, अपना कार्य जारी रखो।
इसलिए याद रहे, हमें सदा अपना-अपना कर्त्तव्य करते रहना है।
शास्त्रज्ञों ने तीर्थ-यात्रा के लिए कहा है। लोग तीर्थ-यात्रा करते हैं, अच्छा है परन्तु गुरुदेव कहते हैं कि हमारे शास्त्रज्ञों ने केवल तीर्थ-यात्राओं का समर्थन नहीं किया। उन्होंने कहा-
तुम लोग अपने-अपने कार्यों में रमे कि नहीं? अपने घर के बड़े-बुज़ुर्गों की सेवा की कि नहीं? माता-पिता की सेवा की कि नहीं?
जिसने माता-पिता की सेवा की, उसने तीर्थ-स्नान किया या नहीं किया उससे क्या फर्क पड़ता है? उन्हें वही पुण्य मिलता है। भक्त पुण्डलिक से मिलने के लिए आए भगवान् पाण्डुरङ्ग उनकी फेंकी एक ईंट पर खड़े रहे। उन्होंने भगवान् को कहा-
“श्रीभगवान्, आप आए हैं परन्तु मैं अभी माता-पिता की सेवा में हूँ। यह मेरा उनकी सेवा का समय है। आप थोड़ी प्रतिक्षा करे।”
“श्रीभगवान्, आप आए हैं परन्तु मैं अभी माता-पिता की सेवा में हूँ। यह मेरा उनकी सेवा का समय है। आप थोड़ी प्रतिक्षा करे।”
ऐसा कहकर उन्होंने पास पड़ी ईट भगवान् की ओर सरका दी। श्रीभगवान् आनन्द से उस ईट पर खड़े रहे। ये सारे उदाहरण हमारे लिए हैं क्योंकि बहुत बार हम अपने कर्त्तव्यों से भागने की सोचते हैं। श्रीभगवान् यहाँ बहुत सुन्दर बात कहते हैं,
"दूसरों की ओर देखकर अपना जीवन जीना बन्द कर दो।"
आजकल ऐसा हो गया है कि इञ्जीनियर को लगता है, डॉक्टर बहुत अधिक कमाते हैं, समाज में बहुत बड़ा स्थान है। डॉक्टर को लगता है,
“मैंने इतना पढ़ा, लेकिन इन्हें देखो, कितना पैकेज है!”
“मैंने इतना पढ़ा, लेकिन इन्हें देखो, कितना पैकेज है!”
एक इञ्जीनियर दूसरे का पैकेज देखता है और नौकरी छोड़ देता है, दूसरी ओर जाने की सोचता है।
पहले स्वयं को पहचानो,
"मैं अपने काम में रम रहा हूँ कि नहीं?"
एक सत्य घटना है।
माता-पिता डॉक्टर थे। उन्होंने अपनी बेटी से कहा
“तुम्हें डॉक्टर ही बनना चाहिए।”
उसे आर्किटेक्ट बनना था। बहुत सुन्दर चित्रकारी करती थी। उसने माता-पिता की बात मानी।
एम.बी.बी.एस. होने के बाद वह तुरन्त बी.आर.सी. में, वी.एन.आई.टी. में गई, आर्किटेक्चर का फार्म भरा, परीक्षा दी और वहाँ प्रवेश लिया।
यह होती है स्वयं की पहचान। यह बहुत कम लोगों को होती है और जिसे हो जाती है, वह अपने जीवन का उन्नयन करता है फिर चाहे वह क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर हों, चाहे वह स्वर-कोकिला लता मङ्गेशकर हों, लेकिन सभी के लिए वही मार्ग नहीं होगा। ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं,
यदि रम्भा से भी सुन्दर अप्सरा आ जाए तो भी उसने बालक के पोषण के लिए क्या काम किया? बालक के लिए तो उसकी माता ही उसका पोषण कर सकती है। चाहे वह माता कुरूप ही क्यों न हो।
जैसे घी में जल से अधिक गुण होते हैं, घी महँगा भी होता है किन्तु मछली को जल से निकालकर घी में डाल दिया जाए तो क्या होगा?
वह तड़प-तड़प कर मर जाएगी।
इसी प्रकार दूसरों का धर्म, दूसरों का कर्त्तव्य, दूसरों का जीवन हमारे लिए भयावह होता है।
किसी से तुलना करके जीवन नहीं जीना है। याद रखें कि अपनी तुलना केवल स्वयं से करनी है। अपनी स्पर्धा स्वयं से ही होनी है।
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं(म्), पापं(ञ्) चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय, बलादिव नियोजितः॥3.36॥
अर्जुन बोले - हे वार्ष्णेय ! फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी जबर्दस्ती लगाये हुए की तरह किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?
विवेचन- हमारे भीतर भी इसी प्रकार कौरवों–पाण्डवों वाला महाभारत युद्ध चलता ही रहता है। यह युद्ध केवल पाँच हजार वर्ष पहले का नहीं है, यह तो आज भी हमारे भीतर चल रहा है। अच्छाई और बुराई का निरन्तर सङ्घर्ष हमारे मन में होता रहता है। सन्त तुकाराम महाराज कहते हैं,
“रात्रंदिन आम्हा युद्धाचा प्रसंग, अंतर बाह्य”
अर्थात् दिन-रात मन के अन्दर और बाहर यह युद्ध चलता रहता है। महाभारत में दुर्योधन का एक अत्यन्त महत्वत्पूर्ण वचन आता है-
“
जानामि धर्मं न च में प्रवृत्तिः।
जानाम्यधर्मं न च में निवृत्तिः"।।
जानाम्यधर्मं न च में निवृत्तिः"।।
"मैं जानता हूँ कि धर्म क्या है, पर मेरी प्रवृत्ति धर्म की ओर नहीं होती।
मैं अधर्म को भी जानता हूँ, फिर भी उससे मेरी निवृत्ति नहीं होती। मेरे भीतर कोई ऐसा तत्त्व है, कोई ऐसी शक्ति है जो मुझसे वैसा ही कर्म करवा रही है, जैसा वह चाहती है।"
अब मन में प्रश्न उठते हैं,
क्या कौरव और पाण्डव एक ही गुरु से एक ही पाठशाला में नहीं पढ़े थे?
क्या गुरु द्रोणाचार्य ने पाण्डवों को धर्म और कौरवों को अधर्म सिखाया?
ऐसा तो नहीं हो सकता। अच्छी बातें, अच्छे गुण, सभी ने एक ही स्थान पर सीखे। फिर कुछ लोग ऐसे क्यों बनते हैं?
यह प्रश्न स्वयं दुर्योधन भी करता है और कहता है,
"मुझे पता है कि क्या सही है। मुझे पता है कि किसी का राज्य हड़पना अधर्म है। मुझे यह भी पता है कि किसी स्त्री के वस्त्र को छूना पाप है फिर भी मैंने भाभी द्रौपदी के वस्त्रों को हाथ लगाने की आज्ञा दी।"
"मुझे पता है कि क्या सही है। मुझे पता है कि किसी का राज्य हड़पना अधर्म है। मुझे यह भी पता है कि किसी स्त्री के वस्त्र को छूना पाप है फिर भी मैंने भाभी द्रौपदी के वस्त्रों को हाथ लगाने की आज्ञा दी।"
"मैं जानता था कि वह रजस्वला है, फिर भी केश पकड़कर उसे सभा में घसीट लाया गया। यह सब जानते हुए भी मैं रुक नहीं सका।"
“जानामि अधर्मं न च मे निवृत्तिः
मैं अधर्म को जानता हूँ, फिर भी उससे हट नहीं पाता।"
मैं अधर्म को जानता हूँ, फिर भी उससे हट नहीं पाता।"
प्रश्न यही है,
"मेरे भीतर वह कौन-सा तत्त्व है जो मुझसे यह सब करवा रहा है?"
अर्जुन भी यही प्रश्न श्रीभगवान् से करते हैं और अब श्रीभगवान् इसका उत्तर देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष, रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा, विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥3.37॥
श्रीभगवान् बोले – रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम अर्थात् कामना (ही पाप का कारण है)। यह (काम ही) क्रोध (में परिणत होता) है। (यह) बहुत खाने वाला (और) महापापी है। इस विषय में (तू) इसको (ही) वैरी जान।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, "अर्जुन तुमने प्रश्न अच्छा पूछा। इससे सारे संसार के लिए ही अच्छा हो गया क्योंकि दूसरों के मन में यह प्रश्न तो आता ही रहेगा कि अपराध क्यों होता है?"
अपराध शरीर में रजोगुण की अधिकता के कारण होता है। रजोगुण के कारण जो चञ्चलता शरीर में रहती है वह रजो अर्थात् रञ्जन करने वाला रजोगुण जिसके कारण कार्यशीलता होती है।
तमोगुण अर्थात् जिसके कारण शरीर में जड़त्व आता है। मनुष्य में जड़त्व (Inertia) आता है, कार्य शून्यता होती है।
वहीं सत्त्वगुण के कारण मनुष्य सही दिशा में कार्य करने को प्रेरित होता है क्योंकि सत्त्वगुण मनुष्य में ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।
श्रीभगवान् बताते हैं, रजोगुण के कारण, रजोगुण समुद्भवा, रजोगुण के साथ-साथ किसका उद्भव होता है, क्या निर्माण होता है?
काम, क्रोध निर्माण होते हैं।
रजोगुण के कारण चञ्चलता निर्माण होती है, कर्म करने की प्रवृत्ति निर्माण होती है, क्रियाशीलता निर्माण होती है। एक कर्म के पीछे दूसरा कर्म घटता है जिससे मनुष्य अतिकर्म करने को प्रवृत्त होता है जिसे आजकल की भाषा में हम अति कर्मप्रिय (workoholic) कहते है। परन्तु याद रखे कि इसके कारण काम बढ़ता है।
काम का अर्थ विषय न होकर, इस काम का अर्थ है इच्छा। धीरे-धीरे ये इच्छाएँ बढ़ती जाती है। पहले काम, उसके पश्चात क्रोध आता है।
यदि मन की इच्छा पूरी नहीं हुई उसमें किसी ने अवरोध निर्माण कर दिया तो उस परिस्थिति या उस व्यक्ति के प्रति मन में अब क्रोध निर्माण होने लगता है। आजकल की राजनीति में हम देखते हैं कि लोग यहाँ तक गिर जाते हैं कि अनचाहे लोगों को कभी-कभी रास्ते से सदा के लिए हटा दिया जाता है। यह सब रजोगुण का ही खेल है। कामनाओं की प्रबलता के कारण काम और क्रोध ने दुर्योधन को अन्ध बना दिया था।
रजोगुण के कारण चञ्चलता निर्माण होती है, कर्म करने की प्रवृत्ति निर्माण होती है, क्रियाशीलता निर्माण होती है। एक कर्म के पीछे दूसरा कर्म घटता है जिससे मनुष्य अतिकर्म करने को प्रवृत्त होता है जिसे आजकल की भाषा में हम अति कर्मप्रिय (workoholic) कहते है। परन्तु याद रखे कि इसके कारण काम बढ़ता है।
काम का अर्थ विषय न होकर, इस काम का अर्थ है इच्छा। धीरे-धीरे ये इच्छाएँ बढ़ती जाती है। पहले काम, उसके पश्चात क्रोध आता है।
यदि मन की इच्छा पूरी नहीं हुई उसमें किसी ने अवरोध निर्माण कर दिया तो उस परिस्थिति या उस व्यक्ति के प्रति मन में अब क्रोध निर्माण होने लगता है। आजकल की राजनीति में हम देखते हैं कि लोग यहाँ तक गिर जाते हैं कि अनचाहे लोगों को कभी-कभी रास्ते से सदा के लिए हटा दिया जाता है। यह सब रजोगुण का ही खेल है। कामनाओं की प्रबलता के कारण काम और क्रोध ने दुर्योधन को अन्ध बना दिया था।
काम का उदर इतना बड़ा है कि कभी भरता ही नहीं है।
Desire is that state of mind which is always empty. इच्छाएँ, कामनाएँ कभी नहीं मरती।
एक पूरी होते ही दस कामनाएँ और जाग उठती हैं। इच्छा पूरी होने के बाद उसका महत्त्व खो देती हैं और मनुष्य नई इच्छा के पीछे भागने लगता है।
आजकल लोग मोबाइल, कार के नए संस्करण (model) आने से पहले ही उसको अपने लिए आरक्षित कर लेते है, pre launch booking करते हैं। यह इन इच्छाओं का ही खेल हैं।
कुछ लोगों को आवश्यक न होने पर भी सङ्ग्रह करने की, दिखावे के लिए खरीदने की चाह होती ही रहती है। काम, क्रोध का उदर इतना विशाल होता है कि कितनी भी कामनाएँ तुम पूरी करो, यह और बढ़ती जाती हैं।
"हे अर्जुन! काम, क्रोध ये राजोगुण महापापी हैं। अपनी कामना पूर्ण करने के लिए ये गलत काम भी करवाते हैं। इनको तुम अपने जीवन के वैरी समझो। कहीं न कहीं इस काम को समाप्त या रोकने की हमारी क्षमता बढ़नी चाहिए क्योंकि शक्ति का ह्यास होगा लेकिन भोगने से यह कम होगी ऐसा नहीं है। इसकी तृष्णा की वृद्धि होती जाती है, इसकी प्यास बढ़ती ही जाती है।"
सम्पूर्ण जग को विजय करने के लिए सिकन्दर चल पड़ा था। एक के बाद एक देश वह जीतता गया, उन्हें लूटता गया। बाद में जब उसका मृत्यु का समय आया तो उसने कहा-
"मुझे ये सारी धन-दौलत, यह सारा पैसा यहीं पर छोड़कर जाना है। मेरी मृत्यु के बाद मेरे ताबूत (Coffine) में जब मुझे दफनाने के लिए ले जाया जाएगा तब मेरे दोनों हाथों को ताबूत से बाहर लटकाकर रखना ताकि लोगों को पता चले कि महान सिकन्दर दुनिया जीत कर भी खाली हाथ ही इस दुनिया से गया।"
इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी कोई आगे बढ़ने की इच्छा होनी चाहिए परन्तु कहाँ पर रुकना है, यह समझ सभी में नहीं आती।
आयु के साथ ऐसे लोगों के जीवन की गति भले ही धीमी हो जाती है, रुक भी जाती है परन्तु उनकी इच्छाओं की, उन्हें प्राप्ति के कामों की गति नहीं रुकती इसलिए सिकन्दर ने कहा था कि हमारे साथ क्या जाएगा?
श्रीभगवान् ने आगे छठवें अध्याय में कहा कि
"गीता पढ़ने के कारण जिन लोगों में बुद्धि का उन्नयन होता है, विचारों का उन्नयन होता हैं और जो विचार उर्ध्वगामी होते हैं बस यही योग उनके साथ जानेवाला है। इसी से उनका अगला जन्म किस स्तर पर होगा, यह निश्चित होगा।"
ये जो भौतिकतावादी (materialistic) बातें हैं, जो सारी पद, प्रतिष्ठा, जो हमारे सारे बैंक बैलेंस धन, जेवर जो भी हैं वो यहीं रखने पड़ने वाले हैं और इसलिए भगवान् कहते हैं-
"काम, क्रोध रजोगगुणों को तुम अपना वैरी समझो, अर्जुन! काम यह ज्ञान का वैरी है। "
काम पहले विवेक बुद्धि को ढक देता है फिर कुछ सूझता नहीं है। तब चाहिए तो चाहिए ही, कुछ भी करके।
धूमेनाव्रियते वह्नि:(र्), यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भ:(स्), तथा तेनेदमावृतम्॥3.38॥
जैसे धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है (तथा) जैसे जेर से गर्भ ढका रहता है, ऐसे ही उस कामना के द्वारा यह (ज्ञान अर्थात् विवेक) ढका हुआ है।
विवेचन- जिस प्रकार धुएँ से अग्नि ढक जाती है, जिस प्रकार धूल से दर्पण ढक जाता है और हमें उसमें छवि ठीक से नहीं दिखती, वैसे ही जिस प्रकार आंवल से माँ के पेट में गर्भ आवृत्त हो जाता है और माँ के गर्भ में दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार काम के कारण ज्ञान ढक जाता है, बुद्धि ढक जाती है और मनुष्य से गलत व्यवहार होता है। शायर, राही मासूम रजा लिखते हैं-
पत्ता भी गर हिलता है, उसकी रजा से।
बंदा जो गुनाहगार है, मालूम नहीं क्यूँ?
यदि सब कुछ ऊपर वाले की सहमति से ही होता है तोअपराधिक प्रवृत्ति क्यों होती है?
'इच्छा' जीव की 'वासनाओं' के कारण होती है, उस पर हुए, संस्कारों, कुसंस्कारों के कारण होती है।
ऊर्जा, शक्ति तो परमात्मा सभी को देता है, कोई उसे अच्छे कामों में लगाता है तो कोई बुरे कामों में। यह काम तो ज्ञानियों का भी वैरी है। इसी काम ने अप्सरा, मेनका के द्वारा ऋषि विश्वामित्र जी की तपस्या भङ्ग कर दी थी जिससे शकुन्तला का जन्म हुआ था।
दूसरी बार जब लीन हो कर ऋषि विश्वामित्र जी तपस्या कर रहे थे तो हर दिन समय पर अप्सरा रम्भा ने उनकी पूजा की तैयारी करके उन्हें अपने ऊपर निर्भर कर दिया और फिर एक दिन पूजन की तैयारी में विलम्ब करके, ऋषि विश्वामित्र जी में क्रोध जगा दिया और इस प्रकार उनकी तपस्या भङ्ग कर दी थी। इसलिए श्रीभगवान् कहते हैं,
"काम ज्ञानियों का भी वैरी है।"
आवृतं(ञ्) ज्ञानमेतेन, ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय, दुष्पूरेणानलेन च॥3.39॥
हे कुन्तीनन्दन ! इस अग्नि के (समान) (कभी) तृप्त न होने वाले और विवेकियों के कामना रूप नित्य वैरी के द्वारा (मनुष्य) का विवेक ढका हुआ है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, जिस प्रकार अग्नि में कितनी भी आहूतियाँ डालो वह और भड़कता है, शान्त नहीं होता, ठीक उसी प्रकार यह कामाग्नि भी बढ़ती जाती है, शान्त नहीं होती।
हमारे शरीर में भी अग्नि ही है, ज्ञानाग्नि, ज्ञान की लालसा।
जठराग्नि है, पेट में लगी आग अर्थात् भूख।
श्रीभगवान् कहते हैं- "यह काम ज्ञानियों का नित्य वैरी है और यह विवेक बुद्धि को ढक देता है जिससे मनुष्य सही-गलत का निर्णय ठीक से नहीं कर पाता और उससे गलत कार्य हो जाता है। हे अर्जुन! तुम यह समझो।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धि:(र्), अस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष, ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥3.40॥
इन्द्रियाँ, मन (और) बुद्धि इस कामना के वास स्थान कहे गये हैं। यह कामना इन (इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि) के द्वारा ज्ञान को ढककर देहाभिमानी मनुष्य को मोहित करती है।
विवेचन- यह काम जो ज्ञान का वैरी है, यह रहता कहाँ हैं, यह तुम समझो। इसके रहने का स्थान होते हैं इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि। यह हमारी ज्ञानेन्द्रियों (आँख, कान, नासिका, त्वचा और जिह्वा), मन एवं बुद्धि में निवास करता है।
कोई अच्छी वस्तु, साड़ी, जेवर, अच्छी गाड़ी आदि यदि दिखे तो यह काम वहाँ जाकर बैठ जाता है। यह अन्तरात्मा को ढक देता है। परम पूज्य स्वामीजी कहते हैं,
"यह काम नाम का ऊँट, ज्ञान नाम के अरब को खदेड़ देता है।"
"काम का प्रवेश मन के राम को निकाल देता है।"
राम अर्थात् चैन, विश्रान्ति, शान्ति।
मन से जब राम चला जाता है तो अशान्त कर देता है। इसलिए यह काम देह में अधिष्ठान करके, जमकर बैठ जाता है, बुद्धि को आक्रान्दित कर देता है। श्री ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं,
ज्ञान निधिचे भुजंग, विषय दरीचे वाघ,
भजन मार्गीचे मांग मारप जे।।
भजन मार्गीचे मांग मारप जे।।
जलाविण बुडविती, आगी विण जाळीती,
त्या कळवीती प्राणियाते ।।
त्या कळवीती प्राणियाते ।।
उन्होंने काम को सर्प कह दिया।
"ये सर्प, ये शेर इतने क्रूर हैं कि भजन-पूजन में मन को रमने ही नहीं देते। न बोलते हुए घात कर देते हैं। ये बिना पानी के डुबो देते हैं, बिना अग्नि के जला देते हैं इसलिए हे अर्जुन! तुम इसकी ओर ध्यान दो क्योंकि यह तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य से बहका सकते है, विचलित कर सकते हैं।"
"ये सर्प, ये शेर इतने क्रूर हैं कि भजन-पूजन में मन को रमने ही नहीं देते। न बोलते हुए घात कर देते हैं। ये बिना पानी के डुबो देते हैं, बिना अग्नि के जला देते हैं इसलिए हे अर्जुन! तुम इसकी ओर ध्यान दो क्योंकि यह तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य से बहका सकते है, विचलित कर सकते हैं।"
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ, नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं(म्) प्रजहि ह्येनं(ञ्), ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥3.41॥
इसलिये हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! तू सबसे पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल।
विवेचन- "हे अर्जुन! मैंने ये सब तुम्हें इसलिए बताया कि तुम क्या करो, तुम सबसे पहले अपनी इन्द्रियों को नियमित करो, नियन्त्रित करो।"
"तुमने भी धनुर्विद्या सीखने के लिए कितनी ही बार अपनी कामनाओं पर विजय प्राप्त की थी परन्तु कभी-कभी ये कामनाएँ मनुष्य को अपने बस में कर लेती हैं। अभी तुमको मोह ने ग्रसित कर लिया है।"
हमारे सनातन धर्म में उपवास रखने की जो प्रथा है वह मन के नियन्त्रण में सहायक होती है। खाने को नियन्त्रित उपवास रखकर किया जाता है। बच्चों को भी बाल्यकाल से ही नियमबद्ध करना, उनकी उन्नति के लिए आवश्यक है। वे कितने समय तक दूरदर्शन देखें, कितने समय मोबाइल चलाएं, कितने समय खेले, कब पढ़ने बैठें, ये सब नियन्त्रित करना आवश्यक है। अच्छा पालकत्व (parenting) आज के समय में कोई सरल काम नहीं रहा है।
"हे अर्जुन! अपनी इन्द्रियों को वश में करके, ज्ञान और विज्ञान दोनों का नाश करने वाले इस महापापी काम पर तुम विजय प्राप्त करो। इन्द्रियों को अनुशासित करो।"
श्रीभगवान् आगे कहते हैं यह केवल आत्मबल से सम्भव है। अपना आत्मबल जागृत करो।
गीताजी श्रीभगवान् की वाङ्गमयी मूर्ति हैं।
"जयतु, जयतु तू गीतावाङ्गमयी कृष्णमूर्ति।"
यह आत्मतत्त्व सबसे बलवान होता है। जो सबसे सूक्ष्म वही है सबसे शक्तिवान।
इन्द्रियाणि पराण्याहु:(र्), इन्द्रियेभ्यः(फ्) परं(म्) मनः।
मनसस्तु परा बुद्धि:(र्), यो बुद्धेः(फ्) परतस्तु सः॥3.42॥
इन्द्रियों को (स्थूल शरीर से) पर (श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म) कहते हैं। इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है (औऱ) जो बुद्धि से भी पर है, वह (आत्मा) है।
विवेचन- "इन्द्रियाँ स्थूल शरीर से बलवान हैं। इन्द्रियाँ शरीर से सूक्ष्म है परन्तु हमारे पूरे शरीर को चलाती हैं। अपने वश मे रखती हैं। इसीलिए इन्द्रियाँ शरीर से श्रेष्ठ हैं परन्तु इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है। मन इन्द्रियों से भी सूक्ष्म है।"
"मन से बुद्धि श्रेष्ठ है परन्तु हे अर्जुन! बुद्धि से भी वह आत्मतत्त्व श्रेष्ठ है।"
इस प्रकार श्रीभगवान् अर्जुन को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले गए।
शरीर से इन्द्रियाँ, इन्द्रियों से मन, मन से बुद्धि, बुद्धि से आत्मतत्त्व सूक्ष्म है, शक्तिशाली है।
जो जितना व्यापक है वह उतना बलवान।
बर्फ का टुकडा उसके आकर जितना स्थान घेरता है। जब बर्फ का पानी बनता है तो वह पानी अधिक स्थान घेरता है। यदि उस पानी की भाष्प बन जाए तो वह और भी अधिक स्थान पर व्याप्त हो जाएगी, अधिक व्यापक बनेगी।
स्थूल से सूक्ष्म अधिक व्यापक, अधिक शक्तिशाली है।
"हे अर्जुन! इस प्रकार उस सूक्ष्म परन्तु शक्तिशाली आत्मतत्त्व से तुम स्थूल इन्द्रियों, शरीर को नियन्त्रित कर पाओगे।"
"हे अर्जुन! इस प्रकार उस सूक्ष्म परन्तु शक्तिशाली आत्मतत्त्व से तुम स्थूल इन्द्रियों, शरीर को नियन्त्रित कर पाओगे।"
इसलिए अत्यन्त सुन्दर बात श्रीभगवान् आगे कहते हैं-
"हे अर्जुन! तुम बुद्धि से भी परे, उस आत्मतत्त्व का तुम अनुसन्धान करो।"
"हे अर्जुन! तुम बुद्धि से भी परे, उस आत्मतत्त्व का तुम अनुसन्धान करो।"
एवं(म्) बुद्धेः(फ्) परं(म्) बुद्ध्वा, संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं(म्) महाबाहो, कामरूपं(न्) दुरासदम्॥3.43॥
इस तरह बुद्धि से पर (आत्मा) को जानकर अपने द्वारा अपने आपको को वश में करके हे महाबाहो ! (तू इस) कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल।
विवेचन- "इस कामना पर विजय करने के लिए हे अर्जुन! तुम बुद्धि से भी सूक्ष्म उस आत्मतत्त्व की पहचान कर लो। इस आत्मतत्त्व की अनुभूति तुम्हें जब होगी तब होगी पर आज तुम इस आत्मतत्त्व को जान लो मान लो।"
संस्कृत में आत्मा शब्द का प्रयोग शरीर, इन्द्रियों, बुद्धि, मन सभी के स्तर पर किया जाता है।
"हे महाबाहो! बुद्धि द्वारा, मन को वश में करते हुए इस काम रूपी दुर्जन को तुम समाप्त कर दो, उस पर तुम विजय प्राप्त कर लो।"
श्रीभगवान् ऐसे शुभचिन्तक हैं, गुरु हैं, पथ प्रदर्शक हैं जो अर्जुन को उनके गुणानुरूप सम्बोधनों से बार-बार सम्बोधित करके, अर्जुन को उनके गुण याद दिला रहे हैं। यहाँ उनको महाबाहों कहकर उन्हें याद दिला रहे हैं कि इन्द्र को लगा था कि तुमको उर्वशी का नृत्य बहुत प्रिय है इसलिए उसे भेजकर तुम्हारे अस्त्र-शस्त्र चुराने का उन्होंने प्रयोजन किया था परन्तु उर्वशी में तुमको अपनी माता दिखाई दी। जब तुमने उसे माता कहकर सम्बोधित किया तो उसने तुम्हें नपुसङ्क होने का श्राप दिया था। तुमने श्राप स्वीकार किया परन्तु अपनी कामना को बलवान नहीं होने दिया। तुम महाबाहो हो, अर्जुन! तुम रात-रात भर जागकर धनुर्विद्या का अभ्यास जो किया है इसलिए हे अर्जुन! तुम यह कर सकते हो। तुम उस काम की पहचान करके, उसको नियन्त्रित करो। विजय तुम्हारी ही होगी।
हमारा जीवन मार्ग प्रशस्त करनेवाला अनुपमेय गीत, भगवद्गीता है।
इसके साथ ही गुरु चरणों को वन्दन करके विवेचक ने आज के विवेचन की समाप्ति की।
सत्र आगे प्रश्नोत्तर की ओर बढ़ा।
प्रश्नोत्तर सत्र
प्रश्नकर्ता- भूषण भैया
प्रश्न- अट्ठाईसवें श्लोक का अर्थ समझा दीजिए
उत्तर-
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।।3.28।।
अर्थात् जो परमात्मा को तत्वत: जानता है वह सत्त्व, रज और तमो गुणों से अप्रभावित रहता है। वह अपने अन्दर झाँक कर देख सकता है कि ये तीनों गुण किस प्रकार अपना कार्य करते हैं? वह इन गुणों में नहीं फँसता है।
प्रश्नकर्ता- नन्दिनी दीदी
प्रश्न- सैंतीसवें श्लोक में महाशनो का क्या अर्थ है?
उत्तर-
श्री भगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।3.37।।
महा अर्थात् बड़ा, जिसका पेट बहुत बड़ा है, जिसे बहुत भूख लगती है। काम की भूख कभी पूरी नहीं होती, बढ़ती ही जाती है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्याय:॥
इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘कर्मयोग’ नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ।