विवेचन सारांश
कर्मयोग का परिपक्व रूप: सात्त्विक त्याग

ID: 8855
हिन्दी
रविवार, 15 फ़रवरी 2026
अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग
2/6 (श्लोक 7-14)
विवेचक: गीता विशारद डॉ आशू जी गोयल


श्री हनुमान चालीसा, मधुर गीता गीत और दीप प्रज्वलन के पश्चात आज के सत्र का प्रारम्भ हुआ। श्रीभगवान् की अतिशय मङ्गलमय कृपा से हम सबका ऐसा सद्भाग्य जागृत हुआ जो अपने इस मानव जीवन को सफल करने के लिए, सार्थक करने के लिए, इसके परमुच्चय लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, अपना इहलोक और परलोक दोनों का कल्याण करने के लिए हम श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़ने और कण्ठस्थ करने लग गए और उसको जीवन में लाने का प्रयास भी करने लग गए। प्रत्येक विवेचन से जीवन सूत्र भी ग्रहण करने लग गए। पता नहीं हमारे इस जीवन के अथवा पूर्व जन्म के सुकृत हैं या किसी जन्म में किसी महापुरुष की दृष्टि हम पर पड़ गयी जिससे हमारा ऐसा भाग्योदय हो गया कि हम लोग भगवद्गीता के लिए चुन लिए गए और श्रीभगवान् की कृपा से हम यहाँ तक पहुँच गए। हमारे हृदय में यह परम विश्वास होना चाहिए कि हमने गीता जी को नहीं चुना है वरन् हम गीता जी पढ़ने के लिए चुने गए हैं। अट्ठारहवें अध्याय के प्रथम भाग में हमने देखा और जाना कि ट्रेन के अन्तिम डिब्बे में चढ़ जाने से ट्रेन पकड़ में आ जाती है और हम अन्तिम डब्बे में चढ़ गये हैं।

प्रत्येक माह में आने वाली शिवरात्रि की महिमा और फाल्गुन व श्रावण माह में आने वाली महाशिवरात्रि की महिमा का भी वर्णन किया गया। फाल्गुन में आने वाली त्रयोदशी साधन दृष्टि से अत्यन्त विशिष्ट है। आज के दिन को शिवरात्रि कहते हैं परन्तु कभी हमने शङ्कर रात्रि नहीं सुना है। आज के सत्र में शिव और शङ्कर के भेद को भी बताया गया। जब हम शङ्कर कहते हैं तो उनके विशेष प्रकार का आकार का ध्यान करते हैं। महादेव की जटाओं में गङ्गा और चन्द्रमा, गले में भुजङ्ग की माला, शरीर पर बाघाम्बर है और वे कर्पूर वर्ण हैं। ऐसा अद्भुत स्वरुप है उनका। परन्तु शिव का स्वरुप इनसे भिन्न है। आकार सहित महादेव शङ्कर जी का रूप है और वही महादेव जब आकार रहित हो जाता है तो वह शिव हो जाता है। इसलिए इसे शिवलिंग कहते हैं शङ्करलिङ्ग नहीं। लिङ्ग का अर्थ होता है प्रतीक या चिन्ह। इसी प्रकार स्त्रीलिङ्ग(स्त्री का प्रतीक), पुर्लिङ्ग(पुरुष का प्रतीक) अथवा नपुंसक लिङ्ग( नपुंसक का प्रतीक) कहा जाता है। लिङ्ग का अर्थ जननेन्द्रियाँ नहीं होता। वास्तविकता में शङ्कर अपनी सभी इन्द्रियों को अपने भीतर समेट लेते हैं। कल्पना करें कि हम अपने सभी हाथ-पैरों को समेट कर अपने सर को दोनों घुटनों में झुका लें तो अपना आकार कैसा होगा? हमारा आकार भी शिवलिङ्ग की भाँति हो जायेगा। आकार सहित शङ्कर और आकार रहित शिव हैं। यह जीवन यात्रा तो शङ्कर से शिव बनने की यात्रा है। शङ्करजी को सवारी के लिए नन्दी की आवश्यकता है, रक्षा के लिए त्रिशूल और नृत्य के लिए डमरू की आवश्यकता है। पत्नी पार्वती, बड़ा पुत्र  कार्तिकेय, छोटा पुत्र गणेश, गणेश जी की दो पत्नियॉं रिद्धि सिद्धि, उनके एक-एक पुत्र शुभ-लाभ हैं। उनके यहाँ भी प्रतिदिन झगड़ा होता है। कभी कार्तिकेय जी रुष्ट होकर दक्षिण भारत में चले गए तब गणेश जी उनको मिलने जाते हैं। तब हम दस दिन का गणेश उत्सव मनाते हैं। दक्षिण में सुब्रमण्यम, मुरुगन आदि अनेक नामों से कार्तिकेय भगवान् की पूजा होती है। उत्तर में गणपति मौर्य हैं। कहने का तात्पर्य है कि शङ्कर रूप में पूरा प्रपञ्च हम महादेव के भीतर देखते हैं। परन्तु जब वो शङ्कर प्रपञ्च से पूर्ण होकर स्वयं को समेट लेते हैं तब वे शिव रूप में इस प्रपञ्च से परे हो जाते हैं। शङ्कर से शिव बनने की यात्रा ही साधना है।

भारत में शिवालय की अत्यन्त महत्ता है। उत्तर से दक्षिण तक पूरे भारत के प्रत्येक ग्राम में सबसे अधिक शिवालय हैं। हमारे पाँच सौ मीटर की परिधि में ही अनेक शिवालय होंगे। महादेव जब शिव बन जाते हैं और अपनी सभी इन्द्रियों को अपने भीतर समेट लेते हैं तब शिवलिङ्ग के रूप में उनकी प्रतिष्ठा होती है। उनके वाहन नन्दी अपने घुटने नीचे टिकाकर उनके सामने बैठ जाते हैं। उनका त्रिशूल डमरू के साथ द्वार पर स्थापित हो जाता है। भगवान् शिव का समस्त परिवार उनके साथ ही होता है। माता पार्वती भी हाथ जोड़कर उनके साथ बैठी रहती हैं। शिवालय में एक ओर सती माता की प्रतिमा होती है। एक ओर बैठे हुए भगवान् गणेश द्रष्टा भाव से देखते हैं। एक ओर सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु रिद्धि-सिद्धि विराजमान होती हैं। कुछ शिवालय में शिवजी के रुद्रावतार हनुमान जी सन्नद्ध अवस्था में बैठे हुए होते हैं। सेना को युद्ध से पहले सन्नद्ध अवस्था का आदेश दिया जाता है। हनुमान जी भी उसी सन्नद्ध अवस्था में, हाथ में गदा लिए हुए, एक पाँव ऊपर एक नीचे बैठे हुए होते हैं।

शङ्कर से शिव बनने पर उनकी शक्तियाँ छोड़कर जाती नहीं हैं वरन् स्थिर रहती हैं और प्रतीक्षा करती हैं कि अब हमें कब शिवजी की सेवा का सुअवसर प्राप्त होगा।

आज का दिन उद्घोष का दिन है कि अब मैं शिवत्व को प्राप्त हो जाऊँ। शिव का अर्थ है कल्याण। आइये और अपने भीतर के शिव को जगायें और अपना कल्याण करें। अब मैं सान्निध्य, चिन्तन, दर्शन, मनन में अन्तर्भूत हो जाऊँ। शङ्कर की अवस्था में जीवन में परिवर्तन आते रहते हैं परन्तु शिव की अवस्था में वो परिवर्तन ठहर जाते हैं, अपरिवर्तनीय हो जाते हैं। इसीलिए शास्त्र विज्ञों ने कहा-

सत्यम शिवम् सुन्दरम
शिव ही सत्य है, शिव ही सुन्दर है।

फाल्गुन की शिवरात्रि को शिव-पार्वती के विवाह की रात्रि कहा जाता है। इस महाशिवरात्रि का तन्त्र साधना के लिए बड़ा उपयोग है। इस रात्रि में अनेक महात्मा शिव-अर्चना करते हैं। इस समय में जो शक्तियों का जागरण होता है वह अन्य दिनों में नहीं होता। इन्द्रियों को समेट कर हम भी शिव बन जायें।

18.7

नियतस्य तु सन्न्यासः(ख्), कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्याग: (स्), तामसः(फ्) परिकीर्तितः॥18.7॥

नियत कर्म का तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है।

विवेचन- हे अर्जुन! नियत कर्मों का त्याग करना तामस त्याग कहा गया है।
लोग कहते हैं कि मन चंगा तो कठौती में गङ्गा।
ये भी कहते हैं कि दैनिक स्नान करके क्या करना है, पूजा करके क्या करना है, हम तो मानसिक पूजा कर लेंगे। मेरा तो पूजा-पाठ में मन नहीं लगता। अतः मैं ध्यान कर लेता हूँ। आलसी लोग ही ऐसा कहा करते हैं। जो बातें आवश्यक हैं उन्हें त्याग नहीं सकते। चलते-फिरते एक लाख नाम जप करना उत्तम है परन्तु एक, दो माला बैठ कर अवश्य करनी चाहिए। कुछ समय श्रीभगवान् के पास बैठकर स्तुति बोलना, गीता परायण करना चाहिए। उनसे मन की बात करनी चाहिए।
सवेरे उठते ही श्रीभगवान् के स्मरण हेतु प्रार्थना-
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥
समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव।।

प्रातः स्मरण मन्त्र बोलना, भोजन से पूर्व भली प्रकार से हाथ-पैर धोना, दैनिक स्नान करना, बिना स्नान-पूजा के भोजन आदि नहीं करना ये सभी हमारे नियत कर्म हैं। जितनी भी माला का नियम लिया, गीता क्लास का नियम लिया, इन सबको छोड़ना नहीं चाहिए। इन्हें छोड़ना तामसिक कार्य है। श्रीभगवान् ने इन मनुष्यों को मूढ़ कहा है। जो मानसिक भोजन कर सकता है, उसी को मानसिक पूजा करने का अधिकार है।

हम धन, श्रम को बचाने के लिए बहाने ढूँढते हैं। अन्य कार्यों में रूचि के कारण नियत कार्य को टालते हैं। श्रीभगवान् ने कहा कि यह तामसिक बात है।

18.8

दुःखमित्येव यत्कर्म, कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं(न्) त्यागं(न्), नैव त्यागफलं(म्) लभेत् ॥18.8॥

जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है - ऐसा (समझकर) कोई शारीरिक परिश्रम के भय से (उसका) त्याग कर दे, (तो) वह राजस त्याग करके भी त्याग के फल को नहीं पाता।

विवेचन- शास्त्रकारों ने काया प्रेम के विषय में बताया कि किस भाँति काया के कष्ट के कारण हम सात्विक कार्य छोड़ देते हैं। जैसे हवन करने में उसके धुएँ के कारण आँखें जलेंगी, यह सोचकर स्वयं न बैठकर दूसरे को बैठा देना। बिना वातानुकूलित के, बिना पङ्खे के बैठना पड़ेगा, धुँआ भी लगेगा, इन सब असुविधा से कार्य छोड़ना राजसिक त्याग है। हम अपनी सुविधा के लिए श्रीभगवान् का त्याग कर देते हैं। जो लोग कहते हैं कि हम वर्षों से साधना कर रहे हैं परन्तु सफल नहीं हुई, वे लोग काया को कष्ट देने से बचते हैं। शरीर की सुविधा का त्याग करने में, शरीर को तपाने में हमें कठिनाई होती है तो साधना सफल नहीं होगी।
श्रीभगवान् ने दूसरे अध्याय में कहा,
तांस्तितिक्षस्व: भारत
जिसको तितिक्षा नहीं, सहन करने की शक्ति नहीं वह साधना नहीं कर सकता। सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी, भूख-प्यास, नींद को सहन किये बिना कोई उत्तम साधक नहीं बन सकता। शरीर की ममता रखने से शरीर से कैसे छूटेंगे? सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमें यह जानना है, अनुभव करना है कि मैं यह शरीर नहीं हूँ और हर समय इस शरीर की चिन्ता/रक्षा करेंगे तो इस शरीर से ममत्व किस प्रकार दूर होगा?

प्रयाग विश्व विद्यालय में शिवनारायण गाँधी नाम के प्राध्यापक थे। वे गाँधी जी के परम भक्त थे। अतः उन्होंने अपना उपनाम गाँधी लिखना आरम्भ कर दिया था। कोई छात्र गलती करता था तो वे स्वयं को छड़ी मारते थे। उन्होंने गाँधी जी की प्रेरणा से अस्वाद का व्रत लिया था अर्थात् जो वस्तु अच्छी लगे उसे दोबारा नहीं लेंगे। इस जिव्हा को स्वाद का अभ्यास नहीं करने देना अत्यन्त कठिन कार्य है। स्वार्थ बुद्धि, आलस्य, असुविधा, शरीर को कष्ट से बचाने के कारण नियत कर्म के त्याग को राजसिक त्याग कहा जाता है।

18.9

कार्यमित्येव यत्कर्म, नियतं(ङ्) क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं(न्) त्यक्त्वा फलं(ञ्) चैव, स त्यागः(स्) सात्त्विको मतः॥18.9॥

हे अर्जुन ! 'केवल कर्तव्य मात्र करना है' -- ऐसा (समझकर) जो कर्म आसक्ति और फलेच्छा का त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।

विवेचन- क्या फल मिलेगा जब तक यह दृष्टि होती है तब तक भजन-कीर्तन में आनन्द नहीं आता। यदि नियत कर्म में आनन्द आने लग जाये तो 'क्या मिलेगा' की चिन्ता नहीं रहती।

एक बार द्रौपदी ने महाराज युधिष्ठिर से किसी बात पर कहा कि महाराज इस कार्य से क्या लाभ? युधिष्ठिर ने कहा, द्रौपदी तुम्हारे मुख से ये कैसा वचन निकला? हम किसी कर्तव्य को लाभ के लिए नहीं करते हैं। धर्म दुःख सहकर भी पालन के लिए होता है, सुख के लिए नहीं होता। अर्थात् क्रिया का त्याग तामसिक त्याग है और क्रिया के फल का त्याग करना सात्विक कर्म है।

यदि बीज बोया है तो उगेगा ही परन्तु वह उगेगा या नहीं, इस बात की चिन्ता छोड़ देना सात्विक त्याग है ।
मैं दैनिक रोगियों की सेवा करूँ ,अन्नदान करूँ, कुछ अच्छा कार्य करूँ,इस इच्छा का भी त्याग कर देंगे।

सङ्गं त्यक्त्वा में फल की इच्छा का त्याग कर दो।
फलं चैव जो मिले उसमे फल की इच्छा का त्याग कर देना चाहिए। शुभ कर्म और सेवा के बाद दुःख नहीं आता है तो सात्त्विक कर्म की कसौटी यही है। अच्छा कार्य करते हुए हमारे सामने कोई घटना घटी और उस घटना के कारण दुःख हुआ तो वह सात्त्विक नहीं था। जो सात्त्विक होगा वो सामने वाले के अपमान करने पर, उलटी बात करने पर, मेरे किये हुए कर्म का श्रेय कोई और ले जायेगा तो मुझे कोई अन्तर ही नहीं पड़ेगा। मैंने अपना कर्म कर्तव्य भावना से किया, उसके बदले में मुझे कुछ नहीं चाहिए। किसी भी कारण से दुःख हो रहा है तो मैं सात्विक नहीं हूँ, राजसिक हूँ। अपनी संस्था, अपने गुरूजी का नाम बढ़ाने वाला सात्त्विक कर्म भी फँसाने वाला ही है। किसी भी प्रकार से मैं अपने कर्तव्य की प्रधानता रखते हुए कर्म करूँ। उसके फल की आसक्ति का त्याग करना ही सात्त्विक त्याग है।

18.10

न द्वेष्ट्यकुशलं(ङ्) कर्म, कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो, मेधावी छिन्नसंशयः॥18.10॥

(जो) अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता (और) कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता, (वह) त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देह रहित (और) अपने स्वरूप में स्थित है।

विवेचन- श्रीभगवान् ने कहा कि जिसका न करने योग्य कार्य से भी द्वेष नहीं है और करने योग्य कर्म में जिसकी आसक्ति नहीं है, जो सामने है वही कर्तव्य करना है चाहे वो मुझे अच्छा लगता है अथवा नहीं, ऐसे व्यक्ति ही संशय रहित हो जाते हैं और वही बुद्धिमान हैं।

18.11

न हि देहभृता शक्यं(न्), त्यक्तुं(ङ्) कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी, स त्यागीत्यभिधीयते॥18.11॥

कारण कि देहधारी मनुष्य के द्वारा सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी है - ऐसा कहा जाता है।

विवेचन- श्रीभगवान् ने कहा कि जिसको सही-गलत का विचार नहीं करना पड़ता, जो जानता है कि सही क्या है, ऐसे मनुष्य ही मेधावी हैं। जैसे हमें पता है कि पाँच और पाँच जोड़कर दस होता है, दो और दो मिलकर चार होता है, हमें जोड़ना नहीं पड़ता। इसी प्रकार मेधावी मनुष्य को सही-गलत का विचार नहीं करना पड़ता। वह जानता है कि उसका नियत कर्म क्या है, उसका कर्तव्य क्या है? उसको विचार करके सोचना नहीं पड़ता, स्वाभाविक रूप से उसके भीतर आता है। इसी प्रकार ज्ञानी को विहित और निषिद्ध कर्म का विचार आता है। भगवान् राम ने शिला रुपी अहिल्या का उद्धार करने के लिए विचार नहीं किया कि उसे अपने चरण का स्पर्श करूँ अथवा नहीं।

मारीच को बिना फल का बाण मार दिया उन्होंने विचार नहीं किया कि उसे कौन सा बाण मारूँ। बिना विचार किये ही बिना फल का बाण मार दिया। रामायण में इसका विवरण आता है कि बिना फल का बाण (बिना नोक या अग्रभाग वाला बाण) उसे जान से नहीं मारता वरन् बहुत दूर (सौ योजन समुद्र के पार) ले जाकर गिरा देता है। विहित कर्म और निषिद्ध कर्म के विषय में जिसकी बुद्धि में जितनी अधिक सात्विकता है उसको उतनी अधिक स्पष्टता आती है।
सर्वारम्भपरित्यागी
समुद्र लँघन के समय अङ्गद जी, जाम्बवन्त जी,नल-नील, मयन्द और हनुमान जी एक ही दल में थे। सम्पाति ने बता दिया था कि समुद्र के पार जाना है उसके लिए सौ योजन का समुद्र लाँघना है। सब आपस में बात करते हैं। जाम्बवन्त जी कहते हैं-
जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा।
नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा॥

अङ्गद कहते हैं, मैं पार तो चला जाऊँगा, परन्तु लौटते समय के लिए हृदय में कुछ सन्देह है।

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा।
जियँ संसय कछु फिरती बारा॥

सब बातें कर रहे हैं परन्तु हनुमान जी चुप बैठे हैं, कुछ बोलते नहीं हैं। हनुमान जी बिना पूछे कभी अपनी राय नहीं देते। हम उल्टा व्यवहार करते हैं। बिना पूछे अपनी राय देने लगते हैं इसलिए अटकते भी हैं, हनुमान जी कभी नहीं अटकते हैं।
बहुत समय पश्चात जाम्बवन्त जी हनुमान जी के पास आये और बोले-
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना।
का चुप साधि रहेहु बलवाना॥

पवन तनय बल पवन समाना।
बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥

हे हनुमान! हे बलवान! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है? तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि, विवेक और विज्ञान की खान हो। ऐसा कौन सा कार्य है जो इस जगत में तुम्हारे लिए असम्भव हो, तुम्हारा अवतार ही प्रभु सेवा के लिए ही हुआ है।
इतना सुनते ही हनुमान पर्वत रूप हो गये।

कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा।
सुनतहिं भयऊ पर्बताकारा।।

कनक भूधराकार सरीरा।
समर भयंकर अतिबल बीरा॥

हनुमान जी बिना कहे कार्य नहीं करते और कहने के पश्चात तनिक भी विलम्ब नहीं करते। तुरन्त प्रकट हुए और छलाँग मार कर समुद्र पार पहुँच गए। साधक का स्वभाव भी हनुमान जी जैसा ही होना चाहिए। हनुमान जी पूरा जीवन अपना कर्तव्य करते हैं और एक बार भी स्वयं पर गर्व नहीं करते हैं। सीता जी का पता लगाकर वापस आये तो अपने राजा सुग्रीव के पास गए और सारी बात बता दी। सुग्रीव भगवान् राम के पास गए तब भी हनुमान जी उनके साथ नहीं गए। उनके कहने से साथ गए तब भी बाहर ही खड़े रहे। सुग्रीव ने जब भगवान् राम को बताया कि हनुमान जी सीता जी का पता लगाकर वापस आ गए तब राम जी ने उन्हें भीतर आने को कहा। उनके पूछने पर सब बताया कि क्या-क्या हुआ। सम्पूर्ण रामायण में एक भी स्थान पर ऐसा विवरण नहीं मिलता जहाँ हनुमान जी ने कहा कि यह कार्य मैंने किया। सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों में वे सबसे आगे हैं। ऋष्यमूक पर्वत पर जब राम जी पहुँचे तब सुग्रीव, हनुमान जी को राम जी से मिलाते हैं।

हनुमान जी सीता जी का पता लगाकर आते हैं, विभीषण को राम जी से मिलवाते हैं, मेघनाथ प्रसङ्ग में लङ्का जलाते हैं, इतने सभी महत्त्वपूर्ण कार्य करने पर भी वे कभी नहीं कहते कि उन्होंने किया है। वे इतने शक्तिशाली हैं कि वे सीता जी से कहते हैं कि मैं अभी आपको यहाँ से ले जा सकता हूँ, कोई मुझे रोक नहीं सकता परन्तु मुझे अभी इसकी आज्ञा नहीं मिली है। अभी मुझे आपका पता लगाने और आपकी सूचना एकत्र करने का ही आदेश मिला है। वे पूर्णतः अनुशासन का पालन करते हैं।

ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥

मेघनाद द्वारा छोड़े गए ब्रह्मास्त्र का हनुमान जी सम्मान करते हैं। वे सोचते हैं कि यदि इस अस्त्र को नहीं माना तो ब्रह्मा जी की महिमा नष्ट हो जाएगी, इसलिए उन्होंने स्वयं को मूर्छित होने का नाटक कर बँध जाने दिया। ब्रह्मास्त्र में बँध कर वे चले जा रहे हैं, छोटे बच्चे केले फेंक कर मार रहे हैं। कोई पत्थर मार रहा है। इतने बलशाली होने के बाद भी वे पत्थर सहन करते हुए चले जा रहे हैं।

भगवान् राम के राज्याभिषेक के पश्चात जब अश्वमेध यज्ञ किया गया तो हनुमान जी को लव-कुश दिख गए। उन्होंने अश्व को छोड़ने को कहा परन्तु लव-कुश ने मना कर दिया। हनुमान जी के पुनः कहने पर लव-कुश ने कहा कि अरे बन्दर यहाँ से जाते हो या नहीं और उन्हें रस्सी से बाँध दिया। स्वामी के पुत्र हैं इसलिए वे बँध गए। इतना बल है उनमें कि कोई उनको पकड़ नहीं सकता तब भी वे लव-कुश के हाथों बँध गए, इतनी विनम्रता है उनमें। न कभी अपनी प्रशंसा न ही कभी अपमान, इतना सहज होकर अपने कर्तव्य कर्मों में लगे रहते हैं हनुमान जी।

राज्याभिषेक के बाद जब भगवान् राम ने सभी का अभिनन्दन करके पुष्पक विमान से वापस भेज दिया तब हनुमान जी आये। उन्हें देखकर भगवान् ने पूछा कि वे अभी तक कहाँ थे तब हनुमान जी ने कहा कि वे वापस नहीं जाना चाहते। उन्होंने भगवान् राम से प्रार्थना की कि वे उन्हें सदैव अपने पास रखें।

जब भगवान् राम अपने साकेत धाम को गए तो हनुमान जी को अयोध्या का राजा बनाकर गए। आज भी हनुमान गढ़ी में हनुमान जी विराजमान हैं। इसलिए आज भी रामलला के दर्शन के पश्चात् हनुमान गढ़ी जाना आवश्यक है। आज भी हनुमान जी महाराज ही अयोध्या के राजा हैं। इतनी विनम्रता का परिणाम यह हुआ कि आज देश में भगवान् राम से कई गुना अधिक मन्दिर हनुमान जी के हैं। जो मनुष्य हनुमान जी की भक्ति करता है उसे भगवान् राम की भक्ति स्वतः ही प्राप्त हो जाती है। हनुमान भक्त पर राम जी स्वयं ही प्रसन्न हो जाते हैं।

जैसे हनुमान जी अपने कर्तव्य में संलग्न हैं उसी प्रकार सन्त कबीरदास जी निर्गुण स्थति में हैं। सहज स्थिति में आ जाओ।

भजन-Pasted image 


साधो सहज समाधि भली। साईं ते मिलन भयो जा दिन ते सुरत न अन्त चली।

मैं बैठा रहूँ, सोऊँ, ,मेरे मन से एक क्षण भी भगवान् का स्मरण नहीं छूटता है, ऐसा मेरा तार जुड़ गया है।

उनमुनि- लाला जी महाराज नाम के एक उत्तम सन्त हुए। हमारे प्रधानमन्त्री जी ने उनकी जन्म शताब्दी पर एक सौ रुपये का सिक्का भी आरम्भ किया है। कानपुर के पास फतेहपुर में उनके गुरूजी रहते थे। वे अपने उन गुरूजी से मिलने प्रत्येक बुधवार को जाया करते थे। उस समय साधनाभाव के कारण पैदल या तॉंगा से ही जाना पड़ता था। वे प्रातः चार बजे अपने एक अन्य गुरुभाई के साथ निकले, सोचा था दस बजे तक पहुँच जायेंगे। दो-तीन घण्टा गुरूजी के पास बैठेंगे और संध्या तक घर वापस आ जायेंगे। परन्तु उस दिन भीषण वर्षा होने लगी। कच्चे रास्ते होने के कारण मिट्टी में लथपथ शाम को चार बजे वहाँ पहुँचे। पहले तालाब पर जाकर अपने मिट्टी में सने कपडे साफ़ किये। इस सब कार्य में उन्हें संध्या के पाँच बज गए। जब वे दोनों गुरु जी के घर के पास पहुँचे तो गुरु जी घर की मचान पर बैठे हुए थे। लाला जी ने दूर से ही देखा और अपने गुरुभाई को कहा कि आज गुरु जी से नहीं मिलेंगे, वापस चलो। गुरुभाई ने कहा कि अब तो संध्या हो गयी है। अतः आज हम गुरूजी के यहाँ ही रुक जाते हैं। कुछ खा-पी भी लेते हैं परन्तु लाला जी ने मना कर दिया। गुरुभाई ने फिर कहा कि अच्छा इतने परिश्रम के बाद हम यहाँ पहुँचे हैं तो गुरूजी को प्रणाम तो कर लेते हैं। परन्तु लाला जी ने फिर मना कर दिया कि नहीं, आज नहीं, हम फिर आयेंगे। बात न जँचने के बाद भी गुरुभाई ने बात मान ली और दोनों वापस लौट गये। उन्होंने लाला जी से इसका कारण जानना चाहा तो लाला जी ने बताया कि आज गुरु जी उनमुनि में थे। उन गुरुभाई को उनमुनि का अर्थ नहीं पता था तो फिर पूछा कि उनमुनि क्या होता है? लाला जी ने कहा कि अगले बुधवार को गुरु जी से मिलने चलेंगे तब बताएँगे। अगले बुधवार को जब वे दोनों पहुँचे तो गुरु जी ने लाला जी को देखते ही गले से लगा लिया। गुरुभाई यह देखकर आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने तो सोचा था कि आज गुरूजी डाँटेंगे कि पिछले सप्ताह दोनों आकर भी बिना मिले चले गये। लाला जी भी रोने लग गये और गुरूजी के चरणों में गिर गये। लाला जी को रोते देखकर गुरु भाई भी रोने लग गये। उन्होंने गुरु जी से पूछा कि मैंने तो सोचा था कि आज आप डाँटेंगे परन्तु आपने तो इन्हें गले लगा लिया। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। लाला जी भी कुछ नहीं बता रहे हैं, आप ही बताइये। ये बातें यदि मैं समझने लायक हूँ तो कृपया मुझे बताइये। गुरूजी ने बताया कि उस दिन मैं उनमुनि में था।
उसने फिर पूछा कि उनमुनि क्या होती है?
गुरूजी ने बताया कि उनमुनि वो स्थति होती है जब सोने से अधिक न सोना अच्छा लगे, खाने से अधिक न खाना अच्छा लगे, बोलने से न बोलना अच्छा लगे और मिलने से अधिक न मिलना अच्छा लगे। उस समय मैं ईश्वर के सम्पर्क से जुड़ा हुआ था। मैंने तुम दोनों को देख भी लिया था। मुझे लगा था कि तुम दोनों आकर मेरा यह ईश्वरीय चिन्तन भङ्ग न कर दो। तभी मैंने देखा कि तुम दोनों वापस चले गये और तब मैं भी अपनी लगन में डूब गया। चार-पाँच घण्टे बाद मुझे याद आया कि तुम आये थे और मुझसे मिले बिना ही वापस चले गये। मैं समझ गया था कि लाला समझ गया था कि मैं उनमुनि में हूँ और मुझे मिला नहीं। शिष्य गुरु का भाव समझ गया इसलिए बाद में गुरु जी लाला जी को गद्दी देकर गये। 

जब दिल को नींद आ जाती है और रूह भी गाफिल होती है
तब मैं भी अकेला होता हूँ और यार की महफिल होती है।

हम लोग तो एकान्त को बोरियत मानते हैं। ऐसे कितने लोग हैं जो घर में किसी के न होने पर और बिजली भी चले जाने पर एकान्त का आनन्द लेते हैं। रजोगुणी को करने के लिए कुछ चाहिए जबकि सत्त्व और गुणातीत को एकान्त ही सबसे प्रिय होता है।

18.12

अनिष्टमिष्टं(म्) मिश्रं(ञ्) च, त्रिविधं(ङ्) कर्मणः(फ्) फलम्।
भवत्यत्यागिनां(म्) प्रेत्य, न तु सन्न्यासिनां(ङ्) क्वचित्॥18.12॥

कर्मफल का त्याग न करनेवाले मनुष्यों को कर्मों का इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित - (ऐसे) तीन प्रकार का फल मरने के बाद (भी) होता है; परन्तु कर्मफल का त्याग करने वालों को कहीं भी नहीं होता।

विवेचन- श्रीभगवान् ने यहाँ तीन प्रकार के फल बताये हैं-
1.निष्ट फल
2.अनिष्ट फल
3.मिश्रित फल
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प्रत्येक को मृत्यु उपरान्त हर कर्म का अच्छा, बुरा और मिश्रित फल मिलता है। किसी भी कर्म के सञ्चित, प्रारब्ध और क्रियमाण फल मिलते हैं। सञ्चित कर्म अर्थात् वो कर्म जो मैंने पिछले जन्म में किया और उसका फल मुझे नहीं मिला। मेरे कर्म बैंक में जमा हो गए। एफ .डी बन गयी। उसमें से जो कुछ इस जन्म में परिपक्व होगा, वो है प्रारब्ध। जो कर्म मैंने इस जीवन में किये और उनका फल मुझे तुरन्त नहीं मिला वो क्रियमाण फल है। यही क्रियमाण अगले जन्म में सञ्चित हो जाता है।

प्रारब्ध में भी तीन प्रकार के फल प्राप्त होंगे निष्ट, अनिष्ट और मिश्रित। ऐसी भी कुछ घटनाएं होती हैं जिनमें कुछ लाभ और कुछ हानि भी होती है तब वह मिश्रित फल हो जाता है।
प्रत्येक कर्म का एक संस्कार अंश बनता है-शुद्ध अथवा अशुद्धसंस्कार
मैंने कोई अच्छा चित्र देखा, श्रीभगवान् के दर्शन किये तो इसका तो लाभ मिला ही, साथ ही शुद्ध संस्कार का निर्माण भी हो गया। यदि कोई गन्दा दृश्य देखा, कोई रक्त देखा या किसी की हत्या देखी तो हम कहते हैं कि मैंने कोई पुराने जन्म के पाप किये होंगे जो आज ऐसा बुरा दृश्य देख कर आ रहा हूँ। पता नहीं कौन से जन्म के पाप आज देखे। पाप तो देखा ही उसे देखने का अशुद्ध संस्कार भी आ गया। यह अनेक जन्मों में चलता रहता है।

कभी-कभी बैठे-बैठे बुरे विचार आने लगते हैं तो ये उसी पूर्वजन्मों में किये हुए अशुद्ध संस्कार के कारण है। कभी अच्छे विचार भी आते हैं, गीता पढ़ लूँ, श्रीभगवान् का जाप कर लूँ, किसी की सहायता/सेवा कर लूँ, ये शुद्ध संस्कार अंश हो गए।

किसी बच्चे के पैदा होते ही रामायण, गीता पढ़ने में बड़ा मन लगता है और किसी बच्चे को पकड़ कर करवाना पड़ता है पर उससे प्रणाम होता ही नहीं है। किसके संस्कारों में शुद्धता अथवा अशुद्धता है, यह भी पूर्व जन्म के संस्कारों से ही आता है। कर्मों से ही फल और संस्कारों का निर्माण होता है । फल हमें दिखाई देता है और संस्कार उसका प्रणेता बनता है । इस प्रकार से कर्मों का सारा चक्र चलता है।

हम जिनको भी महापुरुष कहते हैं, श्री राम जी, हरिश्चन्द्र जी, युधिष्ठिर जी, इनके जीवन में निष्ट, अनिष्ट और मिश्रित फलों की बाढ़ दिखाई देती है। हमारे जीवन से कहीं अधिक इनके जीवन में अनिष्ट फल दिखाई देते हैं। तब भी इनकी संस्कार पक्ष की शुद्धता इतनी बड़ी रही कि कितनी भी विपरीत परिस्थिति हो, ये अधर्म की ओर नहीं गये। युधिष्ठिर महाराज को कितना बड़ा फल भोगना पड़ा, राजसूय यज्ञ करके पूरे संसार के सम्राट नङ्गे पाँव वन-वन भटक रहे हैं, कन्द-मूल-फल खा रहे हैं, धरती पर सो रहे हैं तब भी कोई अधर्म नहीं किया।

हरिश्चन्द्र को वनवास भोगना पड़ा और चाण्डाल की नौकरी करनी पड़ी। पत्नी को बेचना पड़ा, पुत्र का देहान्त हो गया। परन्तु अपने पुत्र के दाह-संस्कार के लिए अपनी पत्नी से कहते हैं कि दाह-संस्कार के लिए शुल्क तो देना ही पड़ेगा। पत्नी ने कहा कि मेरे पास तो साड़ी के सिवा कुछ नहीं है तो उन्होंने कहा कि आधी साड़ी ही शुल्क में दे दो। मैं चाण्डाल के घर में नौकरी करता हूँ, चोरी नहीं कर सकता। मेरा दायित्व है कर लेना अतः कर के बिना दाह-संस्कार नहीं करने दूँगा। साक्षात् धर्म और इन्द्र प्रकट हुए और बोले कि हरिश्चन्द्र तुम धन्य हो। तुम्हारे जैसा सत्यवादी कोई नहीं हो सकता। उनका संस्कार पक्ष इतना  प्रबल था कि चाहकर भी मन अधर्म, बेईमानी, चोरी की ओर जाता ही नहीं।

जहाँ मन में नि:शुल्क वस्तु के पाने की भावना आती है तो वह हमारे संस्कार का ही दोष है। जो मैंने कमाया नहीं वो मुझे क्यों लेना है?
सेठ जी जयदयाल गोयनका जी कागज का व्यापार करते थे। उस समय सरकार कागज सरकारी कोटे में देती थी तो कागज पर बहुत ब्लैक चलता था। मद्रास में अँग्रेजों के अन्तर्गत कागज की मिल थी। वहाँ से व्यापारी लोग कागज मँगाकर ऊँचे मूल्य पर बेच देते थे। सेठ जी अपना माल मुनासिब मूल्य पर बेचते थे। इनका माल सबसे पहले बिक जाता था। संयोग ऐसा रहा कि मिल बन्द हो गयी। तब अंग्रेजों ने सबको पत्र भेजा कि जिनका भी उधार है, वे आधी रकम देकर अपना खाता पूरा कर लें। उनके खाते में बीस सहस्त्र की देनदारी थी। उनकी अनुपस्थिति में उनके मुनीम ने दस सहस्त्र रुपये देकर लिख लिया कि देनदारी चुकता हुयी। जब सेठ जी आये और उन्होंने खाते में देखा तो मुनीम जी से पूछा। मुनीम जी ने वह पत्र दिखाया। पत्र देखकर सेठ जी क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा कि इससे कुछ नहीं होता। हम पर बीस सहस्त्र की उधारी है उसे पूरा ही चुकता करो। हमारा वचन बीस सहस्त्र का है तो हम बीस सहस्त्र ही देंगे। जब तक तुम ये उधार पूरा नहीं कर दोगे मैं अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा। मुनीम को सेठ जी के इस व्रत का पता था। इसलिए उसने तुरन्त हवाई जहाज की टिकट करायी और पैसे देने के लिए मद्रास गये। वहाँ मिल बन्द हो गयी थी। मुनीम ने वहीँ डेरा जमा दिया कि जब तक मुझसे पैसे नहीं ले लोगे, मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा। चौकीदार भी यह देखकर हैरान था कि पैसे लेने वाले तो झगड़ा करते देखे हैं परन्तु पैसे देने वाला पहली बार झगड़ा करते देखा था। उसने अधिकारी को सूचित किया। अधिकारी ने कहा कि हमने तो खाता क्लियर करके फ़ाइल लन्दन भेज दी है। अब हम पैसे ले नहीं सकते। अब अधिकारियों ने लन्दन में सारा मामला सूचित किया। जैसे ही वहाँ से अनुमति आयी कि इनसे दस सहस्त्र रुपये ले लिए जाएँ तो अधिकारियों ने वो पैसे ले लिए। तीन साल बाद वो मिल वापस आरम्भ हो गयी, फिर से कोटे बनाये गये। उस कोटे में पहले सेठ जी की फर्म को कोटा मिलता। उसके बाद जो बचता उसमें से बाकी लोगों को कोटा मिलता था। जीवन में ऐसे ईमानदार भी हैं। यह संस्कार की बात है। जीवन में कोई मुझे निःशुल्क सामान देगा तो भी मुझे नहीं लेना चाहिए। मुझे किसी को सौ रुपये देने हैं तो पचास रुपये देकर मामला निपटा लें, ऐसा नहीं करना चाहिए। हमें सरकार से बँट रहे सामान को लेने का स्वभाव नहीं रखना चाहिए। श्रीभगवान् ने हमें देने लायक बनाया है, तो निःशुल्क क्यों लेना है?

18.13

पञ्चैतानि महाबाहो, कारणानि निबोध मे।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि, सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥18.13॥

हे महाबाहो ! कर्मों का अन्त करने वाले सांख्य-सिद्धान्त में सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, (इनको तू) मुझसे समझ।

विवेचन-श्रीभगवान् ने कहा कि किसी भी कर्म के पाँच मुख्य आधार हैं।

18.14

अधिष्ठानं(न्) तथा कर्ता, करणं(ञ्) च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा, दैवं (ञ्) चैवात्र पञ्चमम्॥18.14॥

इसमें (कर्मों की सिद्धि में) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकार के करण एवं विविध प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है।

विवेचन- श्रीभगवान् ने कहा कि यह जीवन सूत्र है। कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान, कर्ता, भिन्न-भिन्न प्रकार के करण, अनेक प्रकार की चेष्टाएँ और पाँचवाँ हेतु दैव है।

अधिष्ठान- कर्म का उद्देश्य। जब तक उद्दिष्ट्ता की स्पष्टता मन में नहीं होगी, कर्म की सफलता सन्दिग्ध रहेगी। एकदम सही किया परन्तु में कोई स्पष्टता नहीं है कि यह क्यों किया तो गड़बड़ होगी। व्यापार क्यों करें, नौकरी क्यों करें, भोजन क्यों बना रहे हैं, खिलाड़ी क्यों बनना है, अमीर क्यों बनना है,  बलवान क्यों बनना है, इन सबके कारण हैं-  अधिष्ठान।

कर्ता- अधिष्ठान को करने वाला कर्ता है । गीता कक्षा चलाने का निर्णय तो कर लिया पर पढ़ायेगा कौन? तो कर्ता की आवश्यकता है।

करण- पढ़ने का स्थान और सामग्री/साधन, व्यापार करने हेतु पूँजी, नौकरी करने हेतु डिग्री, एयरफोर्स में जाने हेतु लम्बाई, ये सब भिन्न-भिन्न प्रकार के साधन चाहिए।

चेष्टा- सब साधन होने के बाद भी समय पर काम पर न जाना, गीता पढ़ाने की कक्षा तो कर ली परन्तु कक्षा में ही नहीं जाना। चेष्टा के बिना कोई कर्म सफल नहीं होता।

दैव- सब कुछ होने पर भी किस्मत का न होना। सब साधन जुटाए परन्तु कोविड आ गया। उसमें सब दूकान बन्द हो गयीं। ये सब सञ्चित के रूप में प्रारब्ध कर्म हैं।

भाग्य की सफलता में इन सभी की मात्र बीस प्रतिशत ही भागीदारी है, इससे अधिक नहीं है।
कोई व्यक्ति चेष्टा को तीस प्रतिशत कर ले और भाग्य मात्र दस प्रतिशत हो तो भी कर्म सफल हो जाता है। इसलिए कहा गया कि पुरुषार्थ से भाग्य को बदला जा सकता है।

इसी अद्भुत मेहनत के बल पर सावित्री यमराज से सत्यवान के प्राण वापस लेकर आ गयी। सत्यवान के प्राण दैव से गए पर सावित्री दैव से लड़ गयी और अपने पुरुषार्थ से सत्यवान के प्राण वापस लेकर आ गयी।

कर्ता, कार्य के योग्य है अथवा नहीं, अन्तःकरण, बहिःकरण और उपकरण तीन प्रकार के उपकरण, प्रयास और हमारा दैव, इन पाँच बातों से कोई भी कलाकार, साधक, गीता व्रती बन सकता है। इन पाँच में एक भी दुर्बल होगा तो हमारा कर्म सिद्ध नहीं होगा। जीवन में सफल होने के यही पाँच सूत्र हैं। 

इसी के साथ हरि नाम सङ्कीर्तन के साथ आज का सत्र का समापन हुआ।
 
प्रश्नोत्तर सत्र 
प्रश्नकर्ता- विद्या दीदी
प्रश्न- महाभारत से हमें कौन से पाँच रत्न मिले हैं?
उत्तर- 1. भगवद्गीता
2. विष्णु सहस्रनाम
3. गजेन्द्र मोक्ष
4. अनुस्मृति
5. भीष्मस्तवराज स्तोत्र

प्रश्नकर्ता- रेणु गोयल दीदी
प्रश्न- एक काली मन्दिर में मेमनों की बलि दी जा रही थी। क्या यह सही है?
उत्तर- यह पूर्णतः तामसिक यज्ञ है। इसका फल भी तामसिक होगा। काल के प्रवाह में इसकी कमी और अधिकता होती रहती है। धीरे- धीरे  इसका प्रचलन कम होता जा रहा है।

प्रश्नकर्ता- नीता दीदी
प्रश्न- क्या नवजात शिशु में भी तीनों गुण होते हैं?
उत्तर-  जी हाँ, नवजात शिशु में भी तीनों गुण होते हैं। संसार की प्रत्येक वस्तु में तीनों गुण विद्यमान होते हैं। बालक में इन गुणों का समावेश उसके पूर्वजन्मों के अनुसार होता है।

।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।