विवेचन सारांश
आदर्श भक्त के गुण

ID: 8866
हिन्दी
शनिवार, 14 फ़रवरी 2026
अध्याय 12: भक्तियोग
2/2 (श्लोक 11-20)
विवेचक: गीता विशारद डॉ. संजय जी मालपाणी


सुमधुर प्रार्थना, दीप प्रज्वलन, गुरु वन्दना, देशभक्ति गीत और श्री हनुमान चालीसा पाठ के साथ आज का विवेचन सत्र आरम्भ हुआ।

गत सप्ताह हमने बारहवें अध्याय के दस श्लोक पूर्ण किए थे किन्तु आज पुनः थोड़ा पीछे जाकर हम सन्दर्भ को समझने का प्रयास करेंगे। 

अर्जुन ने श्रीभगवान् से प्रश्न पूछा-

“सर्वोत्तम योगवेत्ता कौन हैं? आपके सबसे प्रिय भक्त कौन हैं? जो सगुण-साकार की उपासना करते हैं, मूर्ति पूजा करते हैं श्रृंगार करते हैं और आपके स्वरूप में आपको निहारते हैं या जो भक्तिमार्गी हैं अथवा जो ज्ञानमार्गी हैं तथा निर्गुण-निराकार पर विश्वास करते हैं।” 

श्रीभगवान् ने पहले तो इसका उत्तर दिया, 

“मुझे वे भक्त अधिक प्रिय हैं जो भक्तियोग के मार्ग पर चलते हैं” किन्तु तत्काल अपनी बात को सम्भालते हुए यह भी कहा, 

“ज्ञानमार्गी भी मुझ तक ही पहुँचते हैं किन्तु ज्ञानमार्ग कुछ क्लिष्ट है।"  

क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम् 

"ज्ञान मार्ग में क्लेश है, वह मार्ग कठिन है जबकि भक्तिमार्ग आसान है। भक्तिमार्ग पर चलने वाले योगी श्रेष्ठतम योगी कहलाए जाते हैं तथा वे मुझे अधिक प्रिय भी लगते हैं क्योंकि वे मुझ पर विश्वास करके मेरी नौका में बैठ जाते हैं।" 

हमने केवट का प्रसङ्ग सुना तथा गत सप्ताह हमने स्वामी शरणानन्द महाराज की कथा भी सुनी।

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।। 

इस बात को समझने का भी प्रयास किया। 

श्रीभगवान् ने कहा कि मुझमें अपने मन तथा बुद्धि का निवेश करो तथा इसके उपरान्त जब तुम आगे बढ़ोगे, तब तुम्हारी ऊर्ध्वगति निश्चित है। उसके पश्चात श्रीभगवान् ने कहा- 

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।

“अच्छा, यदि तुम मेरे अन्दर अपने मन को स्थिर नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं।” 

श्रीभगवान् ने उससे भी सरल मार्ग बताया किन्तु उससे पूर्व श्रीभगवान् ने कह दिया-

“थोड़ा अभ्यास तो तो करो, भगवत्चिन्तन करो, माला हाथ में लेकर बैठो, अपनी श्वास को एकाग्र करो तथा श्वास के साथ माला की एक-एक मणि को खींचते हुए भगवत् नाम लेना आरम्भ करो। मन तथा बुद्धि को एक करने का प्रयास तो करो।”

अभ्यासयोगेन ततो, मामिच्छाप्तुं(न्) धनञ्जय 

“हे धनञ्जय! इस अभ्यास के योग से तुम मुझे प्राप्त हो जाओगे। इसमें कोई संशय नहीं है।” 

अर्जुन का नाम धनञ्जय इसलिए पड़ा है कि जब उन्हें स्वयं की नगरी बसानी थी, तब उन्होंने अनेक राजाओं को पराजित करके अत्यधिक धन-सङ्ग्रह किया था किन्तु यहाँ पर श्रीभगवान् किसी और ही धन की बात कर रहे हैं जो मीराबाई ने भी किया था-

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो॥ 

श्रीभगवान् उस धन को प्राप्त करने की बात समझा रहे हैं इसलिए स्वभाविक रूप से श्रीभगवान् के मुख से अर्जुन के लिए धनञ्जय नाम निकल गया।  

श्रीभगवान् ने पुनः कहा-

“यदि यह नवधा भक्ति भी सम्भव नहीं है, एकाग्र होकर घण्टों तक भगवत् नाम का जप करने में, श्वास के ऊपर-नीचे होने के साथ भगवत् नाम लेने में भी तुम असमर्थ हो तो तुम्हें और आसान मार्ग बताता हूँ,” 

यह कहकर श्रीभगवान् ने कहा-

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि।।   

“तुम अपने प्रत्येक कार्य, मुझे अर्पण करके करो।” प्रातःकाल उठते समय तुम्हारे मन में यह भाव होना चाहिए कि “अरे! श्रीभगवान् ने मुझपर कृपा करके आज भी मुझे जगा दिया। मैं आज भी दिन भर श्रीभगवान् के कार्य कर सकूँगा।" 

जब तुम अपने शरीर की शुद्धि करते हो तब भी मन में यह भाव रहना चाहिए कि श्रीभगवान् तो मेरे हृदय में बैठे हैं और मेरा शरीर उनका मन्दिर है। इस देह की शुद्धि, यह श्रीभगवान् के मन्दिर की सफाई है, इस भाव के साथ स्नान आदि कर्म करना चाहिए। 

कुछ भोजन करते हो तब भी इस भाव से करना कि मैं तो श्रीभगवान् को भोग दिखाकर उनके प्रसाद को ग्रहण कर रहा हूँ। तुम चलते-चलते कहीं जा रहे हो तो मन ही मन में यही भाव रखना कि मैं श्रीभगवान् की प्रदक्षिणा करने निकला हूँ। 

 उस समय हम लोगों ने एक श्लोक, जो शिव मानस पूजा में श्रीभगवान् आदि शङ्कराचार्य जी ने रचा, उस श्लोक का भी श्रवण किया था।  

आत्मा त्वं गिरिजा मति: सहचरा:, प्राणा: शरीरं गृहम्

पूजा ते विषयोपभोगरचना, निद्रा समाधिस्थिति:

संचार: पदयो: प्रदक्षिणविधि:, स्तोत्राणि सर्वा गिरो

यद्यत् कर्म करोमि तत्तदखिलं, शम्भो तवाराधनम् ॥ 

“मेरी निद्रा भी तेरी समाधि बन जाए। मैं जिन भोगों का उपभोग कर रहा हूँ, वे सारे उपभोग भी तेरी पूजा बन जाएँ। मेरा चलना-फिरना, मैं जो चलता हूँ, वह भी तेरी  प्रदक्षिणा बन जाए और मैं जो कुछ बोल रहा हूँ, वह बोलना भी तेरे स्तोत्र बन जाएँ। मैं जो-जो काम कर रहा हूँ,  सारे काम तेरी ही आराधना बन जाएँ।"

मैं रसोई करती हूँ तो मेरे मन में यह भाव रहना चाहिए कि मैं तो श्रीभगवान् को भोग दिखाने के लिए प्रसाद बना रही हूँ। यदि मैं दुकानदारी कर रहा हूँ तो मन में भाव यह रहना चाहिए कि मेरे सामने जो ग्राहक आएँगे, उन ग्राहकों में ही मैं अपने श्रीभगवान् को देखूँगा और उनकी सेवा करूँगा।  

इस प्रकार के भाव से आप प्रत्येक काम करें। यदि आप शिक्षक हैं तो आपकी कक्षा में जो बच्चे पढ़ रहे हैं, उनमें ही उस बाल-कृष्ण का रूप देखना और उनको रिझाने के लिए अपना काम आरम्भ कर देना। इस प्रकार के भाव से यदि काम करोगे तो उस समय जो भी लोग तुम्हारे सामने बोलेंगे, इसी भाव से सुनना कि मेरे ही भजन चल रहे हैं। 

जीवों का कलरव जो दिनभर सुनने में मेरे आवे
तेरा ही गुणगान जान मन प्रमुदित हो अति सुख पावे।
तू ही है सर्वत्र व्याप्त हरि, तुझमें यह सारा संसार,
इसी भावना से अन्तर हर,मिलूं सभी से तुझे निहार।। 

जो जो मुझे मिलेगा, उसमें तेरा ही रूप मैं जानूँगा और उससे मिलूँगा।  

श्रीभगवान् कहते हैं, 

“यह भी कठिन लगता है! अरे इतना मुश्किल नहीं है रे। करके तो देख! शबरी माता ने तो यही किया था, तभी तो नवधा भक्ति की कथा भगवान् श्रीराम ने शबरी को सुनाई थी।"

शबरी एक भील नायक की सात-आठ वर्ष की छोटी-सी कन्या थी। एक दिन उसके पिता घर में प्यारे-प्यारे मेमने लाए। इतने प्यारे  बच्चे देखकर शबरी को अपार आनन्द हुआ। वे मेमने कूदते-फाँदते, शबरी उन्हें पकड़ने का प्रयास करती, गले लगाती और उनके साथ खेलती। शबरी और मेमनों का प्रेम हो गया। सुबह उठते ही वह दौड़कर बाहर आ जाती और मेमने भी उसे देखकर उछलने लगते। शबरी को खाने-पीने की भी कोई सुध न रहती, दिन भर यही खेल चलता रहता। उसका यह खेल देखकर एक दिन उसके पिताजी ने उससे कहा, 

“खेल ले! खेल ले! ये यहाँ कुछ दिन ही रहने वाले हैं। जब तेरा विवाह होगा तो इन्हीं का माँस तो सबको परोसा जाएगा।"


शबरी को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने पूछा कि मेरे विवाह में इनका माँस क्यों परोसा जाएगा? पिताजी ने कहा, 

"अरे मैं सबके विवाह में गया हूँ और वहाँ भोजन किया है तो जब तेरा विवाह होगा तो मुझे सबको आमन्त्रित करना पड़ेगा तथा उन्हें भोजन करवाना पड़ेगा। मैं इसीलिए तो ये मेमने लाया हूँ। धीरे-धीरे ये बड़े हो जाएंगे तथा तेरे विवाह के समय काम आएंगे। ”


इस बात को सुनकर शबरी अत्यन्त व्यथित हुई। उसे चिन्ता हो गई कि मेरे कारण इन नन्हें मेमनों की बलि चढ़ायी जाने वाली है ? वह सोचने लगी कि अपराधी तो मैं हूँ। मेरे विवाह में इनकी बलि चढ़ायी जाएगी। इससे तो अच्छा होगा कि मैं भाग जाऊँ। 

रात के अन्धेरे में शबरी ने धीरे से द्वार खोला तथा बिना आहट किए वह वहाँ से भागने लगी, रात भर दौड़ती रही। जैसे ही भोर हुई, वह एक पेड़ पर चढ़ गई। जैसा उसका अनुमान था कि उसके पिताजी उसे ढूँढेंगे वैसा ही हुआ, वहाँ अनेक मनुष्य ढूँढते हुए आये। वे शबरी का नाम पुकार रहे थे। वह साँस रोक कर बैठ गई। उसे लगा श्वास से पत्ता न हिल जाये तथा जब तक वे सब वहाँ से चले नहीं गए, वह वहीं छिपी रही। सूर्यास्त के पश्चात वह फिर दौड़ने लगी। भूखी-प्यासी, धूल से सनी, वह अगली भोर फिर पेड़ पर चढ़ी।

जैसे ही सूर्योदय हुआ, शबरी ने देखा कि वहाँ कुछ हलचल है। उसने देखा कि एक आश्रम में सात्त्विक गेरुए वस्त्र धारण किए हुए कुछ लोग सफाई कर रहे थे, कुछ लोग मार्जन कर रहे थे, कुछ लोग फूल तोड़कर मालाएँ बना रहे थे। आश्रम का सात्त्विक वातावरण देखकर, शबरी ने सोचा कि कुछ दिन यहीं रुक जाए। वह नीचे उतरकर आश्रम में आयी। शबरी ने द्वार पर खड़े शिष्य से पूछा- 

“क्या मैं यहाँ रह सकती हूँ?”

धूल से सनी वह छोटी सी बच्ची उस आश्रम में पहुँची। शिष्यों ने उसे मतङ्ग ऋषि के समक्ष ले जाकर खड़ा कर दिया और कहा कि यह यहाँ रहने की अनुमति माँग रही है। मतङ्ग ऋषि ने कहा- 

“पुत्री, तुम अवश्य यहाँ रह सकती हो परन्तु तुम यह बताओ कि तुम कौन हो? कहाँ से आई हो? तुम्हारे पिता का क्या नाम है?”
शबरी ने उत्तर दिया, 

“यह मत पूछिये! यदि उन्हें पता चल गया कि मैं यहाँ हूँ तो वे मुझे लेने यहाँ आ जाएँगे और फिर मेरे मेमने मर जाएँगे। आप कृपया मुझे यहाँ रहने दीजिये। मैं यहाँ का सब कार्य करूंगी। मैं झाड़ू लगाऊँगी, सफाई करूँगी, गायों की सेवा करूँगी, माला बनाऊँगी।”


मतङ्ग ऋषि ने शबरी को वहाँ रहने की अनुमति दे दी। कुछ साल बीते, एक दिन अचानक मतङ्ग ऋषि ने सभी शिष्यों एकत्र किया तथा कहा- 

”अब मेरे समाधि का समय आ गया है। आप सबके मन में जो भी प्रश्न हैं वह पूछ लें।”


विद्वान शिष्य न्यायशास्त्र, व्याकरणशास्त्र, भाषाशास्त्र, योगशास्त्र, वेदों, उपनिषदों के गूढ़ प्रश्न पूछने लगे। जब शबरी की बारी आई, मतङ्ग ऋषि ने कहा- 

“शबरी, तुम्हारा भी कुछ प्रश्न हो तो आज ही पूछ लो।”
शबरी ने डरते-डरते, बहुत हिम्मत जुटाकर अपने मन का प्रश्न पूछ ही लिया,

 “गुरुवर यह बताइए, क्या मैं श्रीभगवान् को देख पाऊँगी? क्या श्रीभगवान् मुझे भी मिल सकते हैं?”

मतङ्ग ऋषि ने मुसकुराते हुए कहा, 

“हाँ शबरी! तुम अत्यन्त भाग्यशाली हो। श्रीभगवान् तुम्हें निश्चित मिलेंगे, यहीं इसी आश्रम में मिलेंगे। वे स्वयं तुम्हारे पास आयेंगे।”

श्रीभगवान् स्वयं मिलने आएँगे यह सुनकर शबरी खुशी में नाचने लगी। छोटी सी तो बालिका थी वह। मतङ्ग ऋषि के समाधिस्थ होने के बाद धीरे-धीरे सभी शिष्य भी आश्रम से चले गये। शबरी आश्रम में एकाकी रहकर दैनिक सेवा और साधना में लग गई।

उसका विश्वास अटूट था

मेरे प्रभु अवश्य आएँगे।

वह प्रभु के आने की प्रतीक्षा करते हुए, उनके स्वागत की व्यवस्था में जुट गई। एक दिन उसे भान हुआ कि मैंने यह तो पूछा ही नहीं कि श्रीभगवान् किस दिशा से आएंगे! मैंने तो केवल पूर्व का मार्ग स्वच्छ किया है। 

वह प्रतिदिन हर दिशा का मार्ग समतल करती, झाड़ू लगाती, पद-प्रक्षालन हेतु जल तैयार करती, माला के लिये फूल चुनती, मालाऐं बनाती और भगवान् को जलपान कराने के लिये फल एकत्रित करती। उसे लगता कि हो सकता है भगवान् आश्रम के पीछे से या दाएँ - बाएँ से आ जायें, तो हर ओर के मार्ग ठीक करने होंगे।

एक दिन उसे लगा कि शीतल जल से श्रीभगवान् का पाद प्रक्षालन करना उचित नहीं होगा, अतः वह लकड़ियाँ एकत्र करके पानी गर्म कर के रखने लगी। 
एक दिन उसे लगा कि उसने ऋषि से यह तो पूछा ही नहीं था कि श्रीभगवान् कब आयेंगे, सुबह आयेंगे, शाम को आयेंगे या रात को आयेंगे। वह रात को सोती नहीं थी, क्योंकि उसे भय था, 

“यदि प्रभु आए और मैं सोई रही, तो वे लौट जाएँगे। वे इतने कोमल हृदय हैं कि मुझे जगाएँगे नहीं।”


फिर सुबह से काम में लग जाती, अपनी तरफ देखने का ध्यान तक नहीं था और उम्र बढ़ती जा रही थी। प्रौढ़ हुई, वृद्धा भी हो गयी। निश्चय पक्का था, गुरु के शब्दों पर भरोसा था, इतनी श्रद्धा थी कि वे आयेंगे। वह प्रतिदिन नदी पर जाती, जल लाती, जल गर्म करती और फल एकत्र करके चखकर मीठे-मीठे फल श्रीभगवान् के लिए रखती। जितना चखती, वही उसका भोजन हो जाता। नदी की धारा के मध्य जल लाने जाती तो वही उसका स्नान हो जाता। आस-पास के व्यक्ति उसे पागल कहने लगे थे। सारा दिन राम-राम जपती रहती और प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा करती। तब तो श्रीराम प्रकट भी नहीं हुए थे।  

दिन भर अभ्यास चलता ही रहता। बाल श्वेत हो गए। उसे श्रद्धा ऐसी थी कि श्रीभगवान् को आना ही पड़ेगा।

जब श्रीराम वनवास में आए तो किसी ने कह दिया कि शबरी सालों से आपकी प्रतीक्षा कर रही है, आपके जन्म से पहले से ही आपकी प्रतीक्षा कर रही है। दिन भर राम-राम करती रहती है। आपको जाना ही होगा। प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण दोनों वहाँ पहुँचे। सीता माता का तो हरण हो चुका था। दोनों को सामने देखकर शबरी दौड़ी। फिर ठिठक गई। सोचने लगी- 

'ऐसा कई बार मैंने देखा है पर वह मेरा आभास होता है। क्या जो मैं देख रही हूँ वह सत्य है?'

फिर सोचती क्या सच में मेरे राम और मेरे लक्ष्मण मेरे सामने खड़े हैं? क्या वे सच में आ गये? जिनकी प्रतीक्षा करते-करते आयु बीत गयी, क्या वे राम-लक्ष्मण आ गये?
बार-बार दौड़ते हुए जाती, रुकती, सोचती कि कहीं यह सपना तो नहीं?


श्रीभगवान् मन्द मुस्कुराते वहीं खड़े हो गये। शबरी धनुर्धारी श्रीराम के चरणों में गिर पड़ी। आँखों से अश्रु धारा बहने लगी। ऊष्म अश्रु की बूँदे भगवान् के चरणों पर गिर रही हैं। श्रीभगवान् ने शबरी को उठाया और कहा, 

“शबरी अन्दर तो ले चलो।”

शबरी ने निवेदन किया, 

“हाँ, प्रभु, पधारिए। मैंने आपके पद प्रक्षालन के लिए गरम पानी रखा है।”

श्रीभगवान् कहते हैं, 

"इसकी आवश्यकता नहीं, मेरे चरण तुम्हारी ऊष्म अश्रुधारा से पहले ही धुल चुके। तुम्हें देखते ही मेरी सारी थकान मिट गई।" 

शबरी ने प्रभु को माला पहनाई। चख-चख कर कई प्रकार के फल शबरी ने इकट्ठा कर रखे थे। वह श्रीभगवान् को फल खिलाने लगी। श्रीभगवान् ने बड़े स्नेह और प्रेम से वह फल खाए। उन्हें उस समय माताओं का स्मरण हो आया कि वे भी इसी प्रकार प्रेम से भोजन करवाती थीं। उनके नेत्रों से भी अश्रुधारा बहने लगी। शबरी ने कहा, 

“प्रभु! एक कृपा कीजिये। जब मैं बहुत छोटी थी, मेरे गुरु चल बसे। मैंने तो उनसे कुछ पूछा ही नहीं। प्रभु, मुझे भक्ति का उपदेश दीजिए। भक्ति क्या होती है, भक्ति कैसी करनी है?”

उस समय शबरी को पगली कहने वाले अनेक वनवासी भी वहाँ एकत्र हो गये थे। उन्हें प्रतीत हो रहा था कि आज शबरी के आश्रम में कुछ अलौकिक घटित हो रहा है। श्रीभगवान् ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया-

1. श्रवण 
2. कीर्तन 
3. स्मरण 
4. पादसेवन 
5. अर्चन 
6. वन्दन 
7. दास्य  
8. सख्य 
9. आत्मनिवेदन

पूज्य स्वामी जी ने एक बार कहा था कि शबरी तो स्वयं इतनी बड़ी भक्त है, फिर भी श्रीराम ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश वहाँ उपस्थित वनवासियों को भक्ति की महिमा समझाने के उद्देश्य से शबरी को निमित्त बनाकर किया था। वास्तव वह नवधा भक्ति तो शबरी को प्रभु श्रीराम द्वारा प्रदत्त सम्मान-पत्र था। श्रीभगवान् ने शबरी की भक्ति को स्वीकार किया तथा उसे नवधा भक्ति सुनाकर उसे सम्मान-पत्र दिया।  

शबरी ने वहीं अपना जीवन-चक्र पूर्ण किया तथा रामायण के साथ-साथ शबरी भी अमर हो गयी। श्रीभगवान् कह रहे हैं, 

“ऐसी भक्ति यदि हो तो वह नित्ययुक्ता उपासते  बन जाती है किन्तु यदि यह अभ्यास भी कठिन लगता है तो सुनो।"


12.11

अथैतदप्यशक्तोऽसि, कर्तुं(म्) मद्योगमाश्रितः|
सर्वकर्मफलत्यागं(न्), ततः(ख्) कुरु यतात्मवान्||11||

अगर मेरे योग (समता) के आश्रित हुआ (तू) इस (पूर्व श्लोक में कहे गये साधन) को भी करने में (अपने को) असमर्थ (पाता) है, तो मन इन्द्रियों को वश में करके सम्पूर्ण कर्मों के फल की इच्छा का त्याग कर।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, 

“यदि यह भी कठिन है तो मेरे लिए कर्म करो किन्तु सम्पूर्ण कर्मों के फल की अपेक्षा का त्याग कर दो। बिना अपेक्षा के कर्म करने से तुम स्वयं भक्त बनते चले जाओगे। फिर तुम्हारे लिए कुछ भी कठिन नहीं होगा।”  

इसके उपरान्त श्रीभगवान् ने मन को शान्त करने की विधा भी बतायी।

12.12

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्, ज्ञानाद्ध्यानं(व्ँ) विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्याग:(स्),त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥12.12॥

अभ्यास से शास्त्रज्ञान श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है (और) ध्यान से (भी) सब कर्मों के फल की इच्छा का त्याग (श्रेष्ठ है)। क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति प्राप्त हो जाती है।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, 

“बिना मर्म जाने किए गए अभ्यास से अनुभव किया हुआ ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान और ध्यान करने से भी श्रेष्ठ कर्म के फल की आकांक्षा का त्याग है। उसी से अद्भुत शान्ति मिलती है।"

यहाँ श्रीभगवान् ने बहुत बड़ी बात बता दी है। जीवन में यदि शान्ति चाहिए तो कर्म-फल की इच्छा का त्याग कर दो। अपेक्षा ही सारे दुःखों तथा अशान्ति का मूल है। 

अपेक्षा छोड़ते ही तुम्हारे जीवन में शान्ति आ जाएगी। फिर तुम्हारे अन्दर भक्तिभाव प्रवेश करेगा तथा यह भक्तिभाव प्रवेश करते ही तुम्हारे चेहरे पर, तुम्हारे क्रियाकलापों में और तुम्हारे प्रत्येक कर्म में वह भक्तिभाव झलकने लगता है तथा सारे भक्त-लक्षण प्रकट होने लगते हैं।  

श्रीभगवान् ने भक्तों के  लक्षण बताना आरम्भ किया-

12.13

अद्वेष्टा सर्वभूतानां(म्), मैत्रः(ख्) करुण एव च|
निर्ममो निरहङ्कारः(स्), समदुःखसुखः क्षमी||13||

सब प्राणियों में द्वेषभाव से रहित और मित्र भाव वाला (तथा) दयालु भी (और) ममता रहित, अहंकार रहित, सुख दुःख की प्राप्ति में सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीर को वश में किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला, मुझ में अर्पित मन बुद्धि वाला जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है। (12.13-12.14)

विवेचन- श्रीभगवान् कह रहे हैं, 

“सारे भूत-मात्रों के प्रति तेरे मन में अद्वेष्टा का भाव रहेगा। अद्वेष्टा-भाव अर्थात् द्वेष रहित हो जाना। किसी भी प्राणी के लिए मन में द्वेष न रहे।"

 सन्त-महात्मा आदि के मन में द्वेष कभी प्रवेश ही नहीं करता है।  

एक दिन पूज्य स्वामीजी की कथा में कुछ भक्त श्रवण करने आए थे, उन्होंने कथा की तो भक्तों ने पोथी पर कुछ रुपए रख दिए। सारे रुपए उनके एक सेवक ने एकत्र किए तथा थोड़ी देर में एक जेब से कुछ रुपए निकाल कर दूसरी जेब में रख दिए। स्वामी जी को जब यह घटना बतायी गयी तब स्वामी जी ने उसको बुलाया और पूछा, “बेटा! तेरे घर पर सब ठीक तो है न? पैसों की कमी तो नहीं है। कुछ आवश्यकता हो तो बता दे और जितने पैसे वहाँ सामने रखे थे, वे भी उठाकर उसके हाथ में रख दिए कि रहने दे तेरे पास। तेरे घर भेज देना, काम आएँगे।"  

हममें और स्वामी जी में यही तो अन्तर है कि वह अद्वेषा हैं और हमने द्वेष करना सीखा है। हमें छिपकली से भी घृणा न हो, सर्पों का भी द्वेष न करें। जो भी पशु आए, उसके लिए हमारे मन में अद्वेष्टता का भाव रहे, मैत्री का भाव रहे, करुणा का भाव रहे।  

किसी भी प्राणी की, किसी भी पशु की, किसी भी व्यक्ति की मेरे मन से मेरे कर्मों से मेरे वचनों से क्षति न हो। “यह मैंने किया" यह जो अहङ्कार है, यह निकल जाना चाहिए।  

सुख में और दु:ख में भी भक्त सदा सम रहता है और क्षमावान भी रहता है।

सुख में और दु:ख में कैसे सम हुआ जा सकता है? क्योंकि सुख भी बाहर से आ रहा है और दु:ख भी बाहर से आ रहा है।  

आज सुबह-सुबह मुझे ठण्डे पानी से स्नान करना पड़ा। श्रीभगवान् ने तो इसी अध्याय में कह दिया है कि-

शीतोष्णसुखदुःखेषु  

पहले-पहले लगा  कि अरे! पानी तो ठण्डा है फिर पाँच मिनट बाद जब पानी निरन्तर गिरता रहा तब आनन्द आने लगा।

इस प्रकार जो दु:ख है, वह क्षणभङ्गुर है।  

दु:खों में भी सबसे बड़ा दु:ख तो अपने प्रिय व्यक्ति का जाना है लेकिन वह दु:ख भी कालान्तर से सौम्य होता चला जाता है। यदि इतना बड़ा दु:ख भी दो तीन साल में चला जाता है तो जो दो साल बाद जा सकता है, वह दो क्षण में भी जा सकता है। स्वीकार करने का भाव मन में होना चाहिए कि मैंने स्वीकार कर लिया। 

इसलिए श्रीभगवान् कहते हैं-

12.14

सन्तुष्टः(स्) सततं(य्ँ) योगी, यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धि:(र्), यो मद्भक्तः(स्) स मे प्रियः॥12.14॥

विवेचन- जो योगी है, वह सतत सन्तुष्ट रहता है। वह कभी असन्तुष्ट नहीं रहता

एक छोटी सी बात करके देखना। दिन भर में कोई नकारात्मक बात मत करना। “यह अच्छा नहीं था, वह अच्छा नहीं था।” जैसा है उसमें सन्तुष्ट रहना। सब्जी में नमक नहीं है फिर भी सन्तुष्ट होकर खा लो। एक दिन बिना नमक की सब्जी खाएँ तो कुछ नहीं होता। हाँ, यदि कोई अतिथि आने वाले हैं तो बनाने वाले को धीरे से कह देना कि थोड़ा नमक डालो तो सब्जी और अच्छी बन जाएगी लेकिन नमक नहीं है, यह नहीं कहना।

जो दृढ़ निश्चयी हैं, श्रीभगवान् को पाने का दृढ़ निश्चय जिनके मन में है कि श्रीभगवान् मुझे अवश्य मिलेंगे और जो मन और बुद्धि दोनों अर्पण करेंगे, वे विजयी होंगे। श्रीभगवान् का प्राप्त होना अर्थात् विजय को प्राप्त करना है।  

श्रीभगवान् अर्जुन को विजय दिलाना चाहते थे, इसलिए कह रहे थे कि मन और बुद्धि दोनों साथ लगाकर युद्ध कर। युद्ध करना तेरा काम है। तू क्षत्रिय है और इसलिए इसमें कोई पाप नहीं है लेकिन अर्जुन का मन व्यथित हो रहा था। अर्जुन का मन मोह में बह गया था इसलिए श्रीभगवान् ने कहा कि “मन और बुद्धि, दोनों एक कर, तब तू मुझे प्राप्त करेगा। विजयश्री को प्राप्त करेगा।" 

श्रीभगवान् ने आगे कहते हैं 


12.15

यस्मान्नोद्विजते लोको, लोकान्नोद्विजते च यः|
हर्षामर्षभयोद्वेगै:(र्), मुक्तो यः(स्) स च मे प्रियः||15||

जिससे कोई भी प्राणी उद्विग्न (क्षुब्ध) नहीं होता और जो स्वयं भी किसी प्राणी से उद्विग्न नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या), भय और उद्वेग (हलचल) से रहित है, वह मुझे प्रिय है।

विवेचन- “जिसके कारण किसी भी प्राणी को कोई पीड़ा नहीं पहुँचती और जिसे किसी भी प्राणी से घृणा नहीं होती, जो हर्ष, भय, उद्वेग आदि से परे हैं, वे मनुष्य मुझे प्रिय लगते हैं।”  

बात-बात पर क्रोध करने वाले, उद्वेग में जाने वाले या फिर बहुत अधिक प्रसन्न हो जाने वाले व्यक्ति भक्त कैसे होंगे?  

भक्त तो समदृष्टि हो जाता है। हर्ष और अमर्ष में  समान रहता है। हर्ष का अर्थ है बहुत आनन्द की स्थिति। अमर्ष का अर्थ है बहुत गहरे दु:ख की स्थिति। दोनों में ही जो समत्व-भाव को प्राप्त करता है, वह भय और उद्वेग से बाहर निकल जाता है। ऐसा भक्त भगवान् को प्रिय है। 

हमारा स्वभाव ऐसा होता है कि अभी कोई व्यक्ति सामने दिखा और हमें क्रोध चढ़ जाता है। आज से अद्वेषा बन जाइए। अब द्वेष का भाव मन में न रहे।  

यह बहुत आवश्यक है। यदि द्वेष का काँटा मन में चुभता रहा तो अन्तिम समय में बहुत समस्या हो जाएगी। 

श्रीभगवान् तो युद्ध करते समय भी वैर को त्याग करने की बात करते हैं। 

वे अर्जुन से कहते हैं  “दुर्योधन और दु:शासन तेरे वैरी हैं, इसलिए तू युद्ध नहीं कर रहा है। अरे! ये आतातायी हैं। इन्होंने एक स्त्री के वस्त्रों को हाथ लगाया और ऐसे अताताइयों का मर्दन करना, उनको देहदण्ड देना, क्षत्रिय होने के नाते तेरा काम है इसलिए तुझे यह करना है। बैर की भावना से नहीं अपितु कर्तव्य की भावना से इनको मार। जिस से तेरे मन से पूरा वैर निकल जाए।” 

क्या हम ऐसा कर पाएँगे?

हम अभी लर्नगीता में जुड़े हैं तो करना ही पड़ेगा। नहीं तो मन में वह काँटा रह जाएगा और मृत्यु कब आने वाली है, पता नहीं।

 यदि कोई भी काँटा मन में रह जाए तो मृत्यु के पश्चात आत्मा से मन चिपकेगा तथा फिर अगले जन्म में उसी बैर का बदला लेने के लिए उस प्रकार की कोख की खोज करेगा, उस प्रकार के घर की खोज करेगा।  

इस प्रकार हम अपनी इतनी हानि स्वयं करते हैं।

12.16

अनपेक्षः(श्) शुचिर्दक्ष, उदासीनो गतव्यथः|
सर्वारम्भपरित्यागी, यो मद्भक्तः(स्) स मे प्रियः||16||

जो अपेक्षा (आवश्यकता) से रहित, (बाहर-भीतर से) पवित्र, चतुर, उदासीन, व्यथा से रहित (औरः सभी आरम्भों का अर्थात् नये-नये कर्मों के आरम्भ का सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, “तू अपेक्षाओं से बाहर निकल।” 

“मेरी बहू से, बेटे से अपेक्षा है। उसे मेरा यह काम करना चाहिए। वह मेरे बुढ़ापे की लाठी बन जाए। मैंने इतना किया उसके लिए, वह मेरे लिए क्या कर रहा है?”

 अरे! आपने आपका कर्तव्य पूरा किया। उनका कर्तव्य वे जानें। कोई अपेक्षा ही मत रखिए। उसके बाद यदि बहू कुछ कर दे तो प्रसन्नता होगी। अपेक्षा के साथ रहेंगे तो अप्रसन्न ही रहेंगे। जीवन में आनन्द से परे कुछ नहीं होता। 

श्रीभगवान् स्वयं दूसरे अध्याय में कहते हैं, “यदि स्थितप्रज्ञ बनना है तो आनन्द के मार्ग पर चलना सीखो। यही सारे दु:खों की औषधि है। 

आनन्द से सारे दु:ख नष्ट किए जा सकते हैं।  

प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।। 

यदि प्रसन्न रहेगा तो बुद्धि भी स्थिर रहेगी और बुद्धि यदि स्थिर रहती है तो निर्णय ठीक होंगे और निर्णय यदि ठीक होंगे तो तू विजयी बनेगा। 

श्रीमद्भगवद्गीता विजय का शास्त्र है और इसलिए श्रीभगवान् कहते हैं कि बिना अपेक्षा के, अन्तर् बाह्य शुचिता के साथ में दक्षता, सावधानता और उदासीनता के साथ रहो। 

उदासीन का अर्थ उदास रहना नहीं है। श्रीभगवान् तो प्रसन्न रहने की शिक्षा देते हैं। उदासीन का अर्थ है तटस्थ। समत्व के भाव को जिसने अपनाया है, वह उदासीन है। व्यथा का अर्थ दु:ख है। 

जीवन में अनेक प्रकार के दु:ख आते हैं लेकिन उनको शीघ्र भूलकर आगे निकलना है। उन दु:खों को लेकर बैठेंगे तो समस्या बढ़ेगी।

 श्रीभगवान् ने विस्मरण का एक गुण आपको दे रखा है कि जिन बातों को याद रखने का कोई लाभ नहीं, उन्हें भूलने में ही हमारा कल्याण है। इसीलिए उन व्यथाओं से बाहर निकलो। “यह मैंने किया” इस प्रकार के भाव का परित्याग कर दो। ऐसा अहङ्कार रखने का कोई लाभ नहीं।

“हमें निमित्त बनाया गया” इस भाव के साथ काम करते रहना चाहिए।

12.17

यो न हृष्यति न द्वेष्टि, न शोचति न काङ्क्षति|
शुभाशुभपरित्यागी, भक्तिमान्यः(स्) स मे प्रियः||17||

जो न (कभी) हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है (और) जो शुभ-अशुभ कर्मों से ऊँचा उठा हुआ (राग-द्वेष रहित) है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

विवेचन- हर्ष का अर्थ है बहुत प्रसन्न हो जाना, नाचने लगना, थोड़े से लाभ होते ही मनुष्य नाचने लग जाते हैं और नाचते-नाचते सबको दिखावा करने लग जाते हैं, “देखो मेरा बङ्गला, देखो मेरी गाड़ी।"

छोटी-छोटी बातों पर शोक नहीं करना चहिए।

श्रीभगवान् ने तो मृत्यु पर भी शोक करने को मना कर दिया है। वे कहते हैं, “तुझे किसी की मृत्यु पर शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि हर कोई कभी न कभी तो मरने वाला है। इसलिए शोक से बाहर निकल अर्जुन।”  

 जो आकांक्षा से परे हो जाता है ऐसा भक्त भगवान को अति प्रिय है। अपेक्षा नहीं रखने वाला, शुभ और अशुभ का भी परित्याग करने वाला भक्त भगवान को प्रिय होता है।  

श्रीभगवान् अर्जुन को कहते हैं कि इन लोगों को तो पहले मैंने ही मार दिया है। तू केवल बाण चला।  

"द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान्।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्।।"

श्रीभगवान् ने ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन से यह बात कही है कि इस विचार से बाहर निकलना होगा कि तू हत्या जैसा अशुभ काम करने वाला है क्योंकि कर्तव्य-भाव से किये गये अशुभ काम का भी परित्याग किया जा सकता है, उससे भी बाहर निकला जा सकता है। 

12.18

समः(श्) शत्रौ च मित्रे च, तथा मानापमानयोः|
शीतोष्णसुखदुःखेषु, समः(स्) सङ्गविवर्जितः||18||

(जो) शत्रु और मित्र में तथा मान-अपमान में सम है (और) शीत-उष्ण (शरीर की अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःख (मन बुद्धि की अनुकूलता-प्रतिकूलता) में सम है एवं आसक्ति रहित है (और) जो निन्दा स्तुति को समान समझने वाला, मननशील, जिस किसी प्रकार से भी (शरीर का निर्वाह होने न होने में) संतुष्ट, रहने के स्थान तथा शरीर में ममता आसक्ति से रहित (और) स्थिर बुद्धिवाला है, (वह) भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है। (12.18-12.19)

विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं, “मनुष्य को शत्रु तथा मित्र को समान मानने वाला, मान और अपमान में भी स्थिर रहने वाला, होना चाहिए।"  

मित्र को भी समान मानना आना चाहिए। यह कैसे होगा?

कर्तव्य के भाव से आप शत्रुता कर रहे हैं, लड़ रहे हैं। लड़ने का अधिकार आपको है लेकिन शत्रुता के कारण नहीं।  

हम अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं तो लड़ना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता लड़ने को मना नहीं करती बल्कि यह तो लड़ने को कहती है। लड़ो। लेकिन लड़ते समय किसी के भी विषय में, मन में बैर का भाव रखने का भाव नहीं होना चाहिए। 

जब कसाब को मृत्युदण्ड दिया गया तब दण्ड देने वाले न्यायाधीश का कसाब से कोई व्यक्तिगत बैर नहीं था। वह तो समष्टि के लिए निर्णय लिया कि इसको छोड़ दिया जाए तो यह और भी आतङ्क मचाएगा और निरपराध लोगों की हत्या करेगा। इसलिए इसको देहदण्ड दिया जाना चाहिए। श्रीभगवान् मृत्युदण्ड देने वाले उस न्यायाधीश को कटघरे में नहीं खड़ा करते।  

हत्या का कार्य भी यदि कर्तव्य भाव से किया गया हो तो सही है। आप किसी के साथ मार-पीट करके आए तो आपको रात को नींद नहीं आएगी। 

आपके पास किसी को मारने का अधिकार भी नहीं है। वह अधिकार पुलिस का है। नहीं तो आप कहेंगे, “चलो श्रीभगवान् ने शिक्षा दी है, उठाओ धनुष-बाण और जो-जो दिखे, चलाओ बाण।"

ऐसा नहीं है।

इसके लिए श्रीभगवान् ने यह शिक्षा दी ही नहीं है। 

श्रीभगवान् कहते हैं, ”शीत में, उष्ण में, सुख में, दु:ख में जो समान भाव से रहता है और आसक्ति का विसर्जन करने वाला भक्त मुझे प्रिय है।"

12.19

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी, सन्तुष्टो येन केनचित्|
अनिकेतः(स्) स्थिरमति:(र्), भक्तिमान्मे प्रियो नरः||19||

विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं, “निन्दा और स्तुति से भी जो परे हो जाता है, वह मुझे प्रिय है। जिनकी मति स्थिर हो गई, ऐसे व्यक्ति मुझे बहुत प्रिय हैं।”

किसी ने आपकी स्तुति की तो आप बहुत प्रसन्न हो जाते हैं कि हार पहनाया, बुके दिया, आपकी स्तुति की, आपके लिए अच्छा-अच्छा बोला। यदि किसी ने आपको अपशब्द बोले तो आप दु:खी हो जाते हैं। दोनों ही स्थितियों में सम रहने वाला भक्त भगवान् को प्रिय है। किसी ने निन्दा भी कर दी तब भी आप प्रसन्न रहें।  

एक बार एक छोटा बच्चा रोता हुआ आया और उसने कहा कि इसने मुझे चिढ़ाया। वह मोटा था। बोला, “उसने मुझे हाथी कहा।”

उसे कहा गया कि यदि तू चिढ़ गया तो तू हार गया। तू चिढ़ता नहीं तो वह दोबारा नहीं चिढ़ाता। यदि तुझे जीतना है तो तेरा चिढ़ना बन्द होना चाहिए। अगली बार जब वह तुझे चिढ़ाए तो तू बस इतना कह देना कि मैं खाते पीते घर का हूँ।  

कुछ दिन पश्चात वह बच्चा पुनः आया और बोला कि आपने जो कहा था न, मैंने  बोला कि मैं खाते पीते घर का हूँ तो उसका मुँह इतना छोटा सा हो गया। वह हार गया। मैं जीत गया। 

हर स्थिति में जो सन्तुष्ट रहना सीखता है, अपने घर के प्रति भी जिसका मोह या आसक्ति नहीं रही, उसको अनिकेत कहते हैं।

 श्रीभगवान् शिवजी का कैलाश पर्वत पर इतना बड़ा स्वर्ण-महल है, कुबेर भी जिसकी सम्पत्ति देखकर चकित रह गया था। ऐसी सम्पत्ति के स्वामी श्रीभगवान् शङ्कर महल में नहीं रहते, वे श्मशान में जाकर रहते हैं। इसलिए उनका एक नाम अनिकेत है। उन्हें कोई आसक्ति नहीं है। वे सन्तुष्ट हैं।

12.20

ये तु धर्म्यामृतमिदं(य्ँ), यथोक्तं(म्) पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा, भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥12.20॥

परन्तु जो (मुझ में) श्रद्धा रखने वाले (और) मेरे परायण हुए भक्त इस धर्ममय अमृत का जैसा कहा कहा है, (वैसा ही) भली भांति सेवन करते हैं, वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, "मुझ में श्रद्धा रखने वाले और मुझ में परायण जो भक्त इस धर्ममय अमृत का, जैसा कहा, वैसा ही सेवन करते हैं, वे मुझे अत्यन्त प्रिय लगते हैं।"

इसी के साथ अध्याय का विवेचन पूर्ण हुआ तथा प्रश्नोत्तर सत्र आरम्भ हुआ।

प्रश्नोत्तर

प्रश्नकर्ता- पूर्वी दीदी
प्रश्न - अभी आपने बताया कि श्री भगवान् को वे लोग अधिक प्रिय हैं जो भक्ति करते हैं। भगवान् ने अर्जुन को कर्म करने के लिए कहा है तो फिर भगवान् को वे लोग अधिक प्रिय क्यों नहीं है जो कर्म करते हैं? भक्ति करने वाले लोग भगवान् को अधिक प्रिय क्यों है? यह विरोधाभास क्यों है?
उत्तर - इसमें विरोधाभास नहीं है। इस अध्याय में भगवान् कह रहे हैं कि आप सारे कर्म करो परन्तु कर्म-फल का त्याग कर दो। कर्म-फल का त्याग करते ही और कर्म-फल को भगवान् को अर्पण करते ही, आप भक्त बन जाते हैं। 

 शिखर पर जाने के लिए तीन अलग-अलग मार्ग हैं- कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग। आप जब इन तीनों में से किसी भी रास्ते से चलेंगे तो आपको प्रतीत होगा कि आप विरोधी रास्ते से चल रहे हैं। कोई पूर्व से पश्चिम की तरफ चल रहा है और कोई पश्चिम से पूर्व की तरफ चल रहा है लेकिन सबका ध्येय शिखर पर पहुँचना ही है। शिखर पर पहुँचने के लिए आप कहाँ खड़े हैं? यह महत्त्वपूर्ण है, इसी पर निर्भर करेगा कि आप कौन सा रास्ता लेंगे?

 यहाँ पर अर्जुन क्षत्रिय के रूप में खड़े हैं इसलिए अर्जुन को इस प्रकार भगवान् ने शिक्षा दी है। 

प्रत्येक दिशा से जाने वाले लोग अन्त में शिखर पर ही पहुँचेंगे। चाहे आप कर्मयोग करो और चाहे ज्ञानयोग करो पर शिखर के पास पहुँचने पर एक ही रास्ता बन जाता है और वह भक्तियोग ही होता है, इसीलिए भगवान् भक्ति योग का इतना समर्थन करते हैं।
जैसे शबरी है, वह दिन भर कम करती रही, पानी भरकर लाई, फल लेकर आई। वह सारे काम कर रही थी और उसका यह सब कर्म भक्ति के लिए ही था। उसके कर्म में कोई स्वार्थ निहित नहीं था इसलिए उनका कर्म, कर्मयोग बन गया। कर्म और कर्मयोग में भी अन्तर होता है; कर्म में स्वार्थ होता है और कर्मयोग निस्वार्थ भाव से किया जाता है।


प्रश्नकर्ता- पूर्वी दीदी 

प्रश्न - आपने बताया कि हमें क्रोध नहीं करना चाहिए। हम तो साधारण मनुष्य हैं, भगवान् ने भी तो अश्वत्थामा और शिशुपाल के ऊपर क्रोध किया था। हमें तो ज्यादा ही क्रोध आता है। कई बार ऐसा होता है कि सामने वाले से कोई काम करवाना हो तो क्रोध करने से वह कर देता है। मेरा प्रश्न है कि क्रोध करना चाहिए या नहीं करना चाहिए?

उत्तर - भगवान् ने कभी भी क्रोध नहीं किया है। उन्होंने क्रोध का नाटक किया है।

 शिवजी के लिए हम ऐसा बोलते हैं कि प्रभु क्षण में तुम हो अभ्यंङ्कर, क्षण में प्रभु तुम हो प्रलयङ्कर। इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवान् अत्यन्त क्रोधित हो जाते हैं। शिवजी भगवान् जब ताण्डव करते हैं तब भी उन्हें नटराज कहा जाता है। नटराज का अर्थ ही यह है कि वे सबसे अच्छा नाटक करने वाले हैं। 

क्रोध का नाटक करना अलग बात होती है और क्रोध का निचोड़ करना अलग बात है। हम ज्यादातर क्रोध का निचोड़ करते हैं। उस अवस्था में हमारा चेहरा लाल हो जाता है, हाथ पाँव काँपने लगते हैं। हमारा ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है और नाड़ी भी हमारी जोर से चलने लगती है। 

जब माँ अपने बच्चे को डाँटती है तो उसके मन में प्रेम का भाव भरा रहता है। वह केवल डाँटने का नाटक कर रही होती है। बच्चा सुधर जाए इसलिए वह आँखें बड़ी करके दिखाती है और बच्चे से जोर से बोलती है।

 क्रोध के नाटक से लोग ठीक हो सकते हैं परन्तु क्रोध के निचोड़ से बात बिगड़ जाती है। ऐसे में आप भी अपने आपे में नहीं रहते। आपको पता ही नहीं चलता कि आप क्या बोले जा रहे हो और तब फिर बात बिगड़ जाती है।

 क्रोध करना और क्रोध का नाटक करना, इन दोनों में बहुत अन्तर है। 

भगवान् यह सब लीला करते हैं। भगवान् के द्वारा किया हुआ क्रोध, केवल को क्रोध का नाटक है, इस बात को हमें समझना चाहिए। यह सोचना कि भगवान् ने क्रोध किया तो हमें भी क्रोध करने का अधिकार प्राप्त हो गया, सर्वथा गलत है।

 भगवान् ने और भी बहुत सारी चीजें की हैं, हम वह सब तो कभी कर ही नहीं सकते तो इसलिए भगवान् के साथ अपने को तुलना नहीं करनी चाहिए। भगवान् ने हमें कहा है कि अक्रोध में जाओ और अपने को नियन्त्रित करो तो हमें वही करना है। हमें सदा भगवान् की बात माननी चाहिए और भगवान् से अपनी तुलना कभी भी नहीं करनी चाहिए। 

भगवान् तो बंसी बजाते हैं तो हम यह थोड़ी सोचेंगे कि हम भी एक पाँव पर खड़े होकर बंसी बजाएँ। भगवान् जो करते हैं, वह सब उनकी लीला है। भगवान् कहते हैं कि क्रोध से आप नरक के दरवाजे पर खड़े हो जाते हैं। क्रोध करने से आप ही को तकलीफ होगी। भगवान् क्रोध से बाहर निकलने के अनेक रास्ते बताते हैं। भगवान् ने स्वयं कभी भी क्रोध नहीं किया है। सौ बार अपने को नियन्त्रित करने के बाद भगवान् ने शिशुपाल का वध किया है। शिशुपाल का वध देखकर आप भी वध करने निकल जाएँ तो यह कोई बात नहीं है। 

पहले आप सौ बार अपने को नियन्त्रित करके देखो फिर इस तरह की कोई बात करने के अधिकारी बनोगे। हम सभी को अपने क्रोध पर संयम करना चाहिए और उसके लिए योग करना चाहिए। इसके विषय में आपको आगे के अध्यायों में बताया जाएगा। जब आपका अपनी साँस पर नियन्त्रण हो जाएगा तो क्रोध पर नियन्त्रण करना भी आ जाएगा। क्रोध पर नियन्त्रण के लिए प्राणायाम करना सबसे अच्छा है।


इसके उपरान्त श्री हनुमानचलीसा पाठ के साथ आज के सुन्दर विवेचन सत्र का समापन हुआ।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः॥

इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘भक्तियोग’ नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।