विवेचन सारांश
परमात्मा-एक अनन्त प्रकाश

ID: 8923
हिन्दी
शनिवार, 21 फ़रवरी 2026
अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
3/4 (श्लोक 12-19)
विवेचक: गीताव्रती श्रीमती श्रुति जी नायक


आज के सुन्दर सत्र का शुभारम्भ ईश-वन्दना, राष्ट्र-वन्दना एवं गुरु वन्दना के साथ श्री हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए किया गया। 

यह अध्याय बहुत ही ज्ञानवर्धक है- क्षेत्र क्षेत्रज्ञविभाग योग। इसे आपने दो भागों में सुना है। थोड़ा गहन ज्ञान है। थोड़ा कठिन अध्याय है किन्तु इसके बारे में जानना बहुत आवश्यक है। देखिए अध्याय का नाम ही है क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग।

क्षेत्र कौन है?

क्षेत्रज्ञ कौन है?

यदि इसके बारे में हमें समझ में आता है या थोड़ा बहुत ज्ञान है तो ही हम आगे इसको अच्छे से जान सकते हैं। बच्चों से इसके बारे में प्रश्न पूछे गये। ईश्वरी दीदी ने उत्तर दिया कि क्षेत्र अपने शरीर को बोलते हैं। उनका उत्साहवर्धन किया गया।

क्षेत्रज्ञ के बारे में स्पृहा दीदी से पूछा गया।

उन्होंने उत्तर दिया कि क्षेत्रज्ञ अपनी आत्मा (soul) को कहते हैं।

क्षेत्र अर्थात हमारा शरीर और क्षेत्रज्ञ आत्मा।
आत्मा में परमात्मा रहते हैं।

क्षेत्र को जो अच्छे से जानने का मतलब क्या है?

क्षेत्र को अच्छे से जानना अर्थात् अपने शरीर को जानना।अब इसमें ऐसे लगता है कि अपने शरीर अथवा क्षेत्र को क्या जानना है।

यह जो शरीर प्राप्त हुआ है कुछ कार्य करने के लिए प्राप्त हुआ है। हम ऐसे ही जन्म नहीं प्राप्त करते। हमें कुछ अच्छा करना है तो इसके लिए शरीर एक अर्थ से क्षेत्र है।

क्षेत्र का जो क्षेत्रज्ञ है वो है किसान (farmer)। ये बात हम अच्छे से समझ सकते हैं। क्षेत्र और उसकी देखभाल करने वाला किसान है।

किसान कहाँ काम करता है?

 खेत (क्षेत्र) में।

यह आप सभी को पता है। किसान को अच्छे से जानकारी रहती है। वो सब कुछ जानता है कि इस क्षेत्र में हम कौन-सा बीज बो सकते हैं?

कौन से बीज बोने से अच्छा फल हमें मिलता है?

उसमें क्या खाद डालनी पड़ती है?

कौन से जो अवांछनीय खर-पतवार (unwanted weeds) होते हैं जब हम बीज डालते हैं और जो खर-पतवार उगते हैं उनको समय-समय पर निकालना पड़ता है।

ये सब और कब इसको बोना, बारिश के पहले, बारिश के बाद में, कब इस फसल की कटाई करना ये- सब ज्ञान उस किसान को रहता है।

वैसे ही इस देह की जानकारी, इसको जानने वाला है क्षेत्र- इसके लक्षण क्या है?

यह हमें ज्ञान होना चाहिए कि ज्ञानी के क्या लक्षण हैं? और ये क्षेत्र किससे बना है?

हम लोगों ने चौदहवें अध्याय में सीखा था। यदि आपको याद है कि पुरुष और प्रकृति कौन हैं?

परमात्मा और प्रकृति से हम सभी का उत्पत्ति होती है।  

हम सभी जो मनुष्य कैसे बनते हैं?

एक पुरुष और एक प्रकृति, जड़ और चैतन्य- इसके संयोग से हम सभी पुरुष अर्थात् परमात्मा और प्रकृति से हमारा जन्म होता है। हमारे माता-पिता तो हैं ही किन्तु अहमबीजप्रद:पिता अर्थात् हम सभी के बीज अथवा पिता वो परमात्मा हैं और माता कौन है?

वो प्रकृति है।

तो यह शरीर किससे बना है?

प्रकृति और परमात्मा से। और क्या-क्या है? और क्या-क्या स्वरूप है? शरीर का क्या स्वरूप है?

पिछले सत्र में आप लोगों ने जाना था कि यह शरीर पंचमहाभूत से बना है पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं ज्ञानेंद्रिय तथा कर्मेंद्रिय और इन्द्रियों के विषय और हमारा अहम; स्वयं और मन बुद्धि ये सब मिलकर इसके चौबीस स्वरूप है।

हमने पिछले सत्र में ज्ञान के लक्षण भी देखे थे। वो कितने थे?

बीस (20)। यदि ये बीस लक्षण इस शरीर में हैं तो हम ज्ञानी कहलाते हैं।

वो बीस लक्षण कौन-कौन से थे?

ईश्वरी दीदी ने उत्तर दिया- दिखावा ना करना, श्रेष्ठता ना करना और क्षमा करना, मन सरल होना।

अमानित्त्व, अदम्भीत्त्व, क्षमा करना, अहिंसा, किसी के मन को ना दुखाना, आर्जवम, सरलता।

अमानित्वमदम्भित्वं अहिंसा क्षन्तिरार्जवं।आचार्योपासनं शौचम् स्थैर्यमात्मविनिग्रहः।।


अर्थात् आचार्यों की उपासना करना, हमारे गुरु के द्वारा बताई गई बात को मानना व उसी प्रकार से कार्य करना, स्थैर्य, धैर्य, आत्मनिग्रह अर्थात् इन्द्रियों पर नियन्त्रण चाहिये।

इंद्रियार्थेशु वैराग्यम अनहंकार एवच अर्थात् इंद्रियों में वैराग्य; बहुत कामना ना होना।

कभी-कभी अवान्छित इच्छाएं (unwanted desires) बढ़ती जाती हैं तथा आसक्ति (attatched)ना रहना।

हम अपने पति-पत्नी, बच्चे में आसक्त रहते हैं: उससे भी अनासक्त होना।

असक्तिरनभिश्वंग: पुत्रदाराग्रुहदिशु

नित्यं च समचित्तत्वं इश्तानिष्टोपपत्तिशु।।

आसक्त न होना और हर सुख-दुख में हमारा मन समभाव में रहना। ये सभी ज्ञान के लक्षण भी हैं। ये सभी गुण जिस पुरुष में रहते हैं, उसको ज्ञानी कहते हैं। ये ज्ञान का आधार है। उसके विकार भी हम लोगों ने देखे थे।

उसके पहले शरीर के क्या-क्या विकार हो सकते हैं?

कैसे मन में परिवर्तन होता है?

ये जो ज्ञान के बीस लक्षण हैं उनसे हम ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य वस्तु को पा सकते हैं।

13.12

ज्ञेयं(म्) यत्तत्प्रवक्ष्यामि, यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादिमत्परं(म्) ब्रह्म, न सत्तन्नासदुच्यते॥13.12॥

जो ज्ञेय (पूर्वोक्त ज्ञान से जानने योग्य) है, उस (परमात्मतत्त्व) को मैं अच्छी तरह से कहूँगा, जिसको जानकर मनुष्य (अमरता) का अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेय-तत्त्व) अनादिवाला (और) परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है (और) न असत् ही (कहा जा सकता है)।

विवेचन- जानने योग्य क्या है?

हमें क्या जानना है?

हमें जानने योग्य है वो परमात्मा का तत्व है। परमात्मा को प्राप्त करने के लिए, उन्हें जानने के लिये श्रीभगवान ने क्या कहा है?

परमात्मा ने कहा है कि परमात्मा को जानने से हम अमृत को हम पा लेते हैं।  अमृत अर्थात् परमानन्द को पा लेते हैं।

वो जानने योग्य वस्तु क्या है?

वो है परमात्मा का तत्व। हम स्कूल जा रहे हैं, डिग्री पा रहे हैं; वो सब चाहिए क्योंकि शरीर निर्वाह के लिए भी पैसा चाहिए किन्तु उसके साथ-साथ हम सभी को श्रीभगवान् को पाने का भी ज्ञान होना चाहिए।

उस ज्ञान का आधार क्या है?

कैसे हम श्रीभगवान् को प्राप्त कर सकते हैं?

जैसे श्रीभगवान् को अर्जुन बहुत अच्छे लगते थे, वो मित्र थे। वैसे ही हमें भी श्रीभगवान् का मित्र बनना है।

श्रीभगवान् को क्या अच्छा लगता है?

किस पथ पर हमें चलना चाहिए?

तो उसके लिए जो आधार है, जो ज्ञान के बीस लक्षण हैं, वो हम में होने चाहिए। अमानित्त्व, अदभित्त्व, अहिंसा, क्षमाभाव, आचार्यों की उपासना, आसक्ति न होना, श्रीभगवान् का अनन्य भक्त बनना, जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि- इन सबके बारे में भी सोचते रहना। हमें ऐसा लगता है कि यदि बार-बार हम जन्म लेकर आएंगे तो हम बहुत प्रसन्न(enjoy) कर सकते हैं। ऐसा नहीं है। हमें इसके पीछे की पीड़ा पता नहीं है क्योंकि अभी हम छोटे हैं। किन्तु जब बच्चा माँ के गर्भ में रहता है तो नौ महीने उसको बहुत कष्ट सहना पड़ता है। इसी प्रकार से मृत्यु के समय भी जब साँस जाती है तब भी बहुत कष्ट सहना पड़ता है। यदि किसी को कोई बीमारी रहती है तब भी उनको कष्ट सहना पड़ता है। यह उस परिस्थिति में ही पता चलता है।

इन सभी से हम कैसे छुटकारा पा सकते हैं?

इसका उत्तर है श्रीभगवान् को जानना, उनसे एक रूप होना और  उनको प्राप्त करना।

श्रीभगवान् को जानने के लिए हमें वो ज्ञान चाहिये, वो बुद्धि चाहिए तो इसके लिये हमें हमारे ज्ञान के आधार को दृढ़ (strong) करना चाहिए। आप सभी बच्चों को वो हर क्षण यह याद रहना चाहिए। यदि किसी से झगड़ा करते हैं तो सोचना चाहिए कि मुझे झगड़ा करना है कि नहीं।  यदि हम अनावश्यक बात करते हैं तो वो हमें ध्यान में आना चाहिए कि मैं बात जो कर रही/रहा था वो सही है कि गलत।

मुझे दम्भ दिखाना है कि नहीं, मुझे दर्प दिखाना है कि नहीं, मुझे हिंसा करनी है या अहिंसा का पथ पर चलना है। मेरे खिलौनों, वस्तुओं से मुझे आसक्त होना है कि नहीं? और श्रीभगवान् को प्राप्त करने के लिए मुझे और क्या-क्या करना है?

इसके बारे में थोड़ा हमें हमारे पढ़ाई के साथ सोचते रहना चाहिए।

कैसे मैं भक्त बनूँ?

कैसे मैं हर पल भगवान को सोचती रहूँ?

जैसे आप परीक्षा के लिए पढ़ते हो किन्तु प्रतिदिन भी थोड़ा-बहुत  जानने के लिए हम पढ़ते रहते हैं। हमारा ज्ञान बढाने के लिये कथा पढ़ते हैं। हमारे मन में ऐसे विचार आना चाहिए कि जो भी आज मैं जो भी पढ़ाई कर रही हूँ उसका अन्तिम उद्देश्य है श्रीभगवान् तक पहुचना।

श्रीभगवान् तक पहुॅंचने के लिए जो भी ज्ञान मुझे ग्रहण करना है, वो पढ़ाई लिखाई से ही होगा।  श्रीभगवान् तक पहुँचने के लिए हमें पढ़ना आना चाहिए। इसके लिए हम स्कूल जाते हैं। इस विषय के बारे में हमें ज्ञान होना चाहिए तो हमें निरन्तर भगवान का स्मरण मन में आता ही रहना है। हमें श्रीभगवान् के चिन्तन में ही समय व्यतीत करना है।  

हम स्कूल की पढ़ाई लिखाई करें, बाहर घूमने जायें, किसी की सहायता करें, जो भी कार्य करें तो श्रीभगवान् का चिन्तन होना चाहिए।  यहाँ वही बताया है कि इस परमात्मा के तत्व को प्राप्त करना अर्थात अमृत को पा लेना; अमृत अर्थात् परमानन्द में रहना। ये जो परमात्मा तत्व है वो क्या है अनादि है और बहुत पुराना है।

वो सत्य भी नहीं है असत्य भी नहीं है। परमात्मा का तत्व बिल्कुल भी असत्य नहीं हो सकता है। श्रीभगवान् सत्य स्वरूप है किन्तु परमात्मा एक ही है। परमानन्द का विलोम शब्द(opposite word) नहीं है। जैसे धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, दिन-रात्रि; इन सब का विलोम शब्द है। तो ये जो सत् और असत इसका विरोध शब्द है दोनों।

जब असत ही नहीं है। परमात्मा असत ही नहीं है तो वो सत्य नहीं वो सत्य उसको कह नहीं सकते हैं। इसको कैसे हम समझे देखिए।

जैसे दिन और रात हैं तो दिन किसको कहते हैं?

जहाँ प्रकाश है, उसको दिन कहते हैं और जहाँ प्रकाश नहीं है, उसको हम रात्रि कहते हैं। जहाँ अन्धकार है उसको रात्रि कहते हैं।

दिन और रात हमें कैसे समझ में आते हैं?

सूर्य के प्रकाश से। जब सूर्य भगवान् उगते हैं तो दिन हो गया। फिर उनका अस्त होता है तो रात हो गयी। ऐसे हम दिन और रात की अवधारणा को समझते हैं। यद्यपि यह सम्भव नहीं है किन्तु कल्पना करिये कि यदि हम सूर्य भगवान के सामने जाकर खड़े हो जाएँ तो सूर्य भगवान् कैसे हैं?

वहाँ प्रकाश है या अन्धकार?

सूर्य भगवान् तो प्रकाशमान हैं। वहाँ तो रात्री की अवधारणा ही नहीं है। 

सूर्य भगवान् के पास रात्रि है क्या?

नहीं है तो रात्रि नहीं है फिर दिन कैसे हो सकता है?

दिन भी नहीं है यदि रात्रि नहीं है क्योंकि उनका स्वरूप ही प्रकाशमान है। वहाँ एक ही अवधारणा है- वहाँ वो प्रकाशित रहते हैं। पूर्णतया वो प्रकाशमान ही रहते हैं किन्तु हमारी पृथ्वी की प्रणाली(system) ऐसा बनी है कि हमें लगता है कि पृथ्वी के घूमने के कारण एक ओर सूर्य का प्रकाश आता है और एक ओर अन्धकार रहता है। आप सभी को भूगोल(geography)पता है।

सूर्य भगवान् तो हमेशा प्रकाश देते हैं लेकिन पृथ्वी घूमती रहती है इसलिए उसकी दूसरी ओर अन्धकार रहता है क्योंकि वहाँ प्रकाश नहीं आता है। वैसे ही भगवान् असत नहीं है, भगवान् हमेशा सत्य हैं इसलिए वो असत और सत्य नहीं है।  जानने योग्य वो परमात्मा है। उनको किस प्रकार और कैसे जानेंगे?

सभी उनको जान पाते हैं क्या?

जो ज्ञानी है वही श्रीभगवान् को जान पाते हैं। वही श्रीभगवान् को देख पाते हैं। वही श्रीभगवान् को प्राप्त हो सकते हैं तो हमारे जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए?


श्रीभगवान् की प्राप्ति।

13.13

सर्वतः(फ्) पाणिपादं(न्) तत्, सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः(श्) श्रुतिमल्लोके, सर्वमावृत्य तिष्ठति॥13.13॥

वे (परमात्मा) सब जगह हाथों और पैरों वाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखों वाले (तथा) सब जगह कानों वाले हैं। (वे) संसार में सबको व्याप्त करके स्थित हैं।

विवेचनप्रत्येक स्थान पर क्या है?

पाणि अर्थात् हाथ, पाद अर्थात् पैर, सिर, मुख और कान हैं क्योंकि श्रीभगवान पूरे जगत में व्याप्त है। भगवान यहाँ नहीं है- ऐसा स्थान ही नहीं है।  

हम सभी श्रीभगवान को कैसे जानते हैं?

श्रीभगवान कहाँ हैं?

सर्वत्र हैं। अत्र तत्र सर्वत्र हैं। सभी जगह हैं तो भगवान के हाथ, पैर, आँख, कान जैसे ज्ञानेंद्रिय कहाँ-कहाँ है?

ज्ञानेंद्रिय कर्मेन्द्रिय हर जगह है इसे कैसे मानेंगे?

आप जहाँ भी रहो, श्रीभगवान को भक्ति से, श्रद्धा से पुकारो; भगवान, भक्त की बात सुनते हैं- सभी की नहीं; भक्त की बात भगवान हमेशा सुनते हैं. आप नित्य श्रीभगवान् को स्मरण करते हो, “भगवान, कृपया आज मुझे आपका दर्शन दो तो हमें कुछ तो समझ में आता है कि हाँ,आज भगवान आए थे.” कभी-कभी पूजा करते समय फूल गिरता है, हमें लगता है कि आज फूल गिरा तो श्रीभगवान् की उपस्थिति यहाँ है. ये आभास तो होता है कि श्रीभगवान् आपको कुछ देना चाहते हैं. आज माँ ने भोग के लिए खीर बनाया तो हम श्रीभगवान के लिये पहले रखते हैं और उन्हें बताते हैं कि भगवान आपके लिए माँ ने खीर बनायी है, आप आकर खा लीजिए तो श्रीभगवान् जहाँ भी हैं, उसको थोड़ा चख लेते हैं या उसको आशीर्वाद देते हैं. उसको खाने से मन भी एकदम शुद्ध हो जाता है. वैसे ही यदि आप श्रीभगवान् के पैर पर कुछ चढ़ाना चाहते हैं, जैसे श्रीभगवान् के चरण कमलों पर फूल चढ़ाना चाहते हैं तो आप कल्पना करो कि श्रीभगवान् हमारे सामने खड़े हैं तो श्रीभगवान् वहाँ भी आकर खड़े हो जाते हैं। आप पाँचवें तल(5th floor) पर हों या भूतल पर हों या आप हवा में उड़ रहे हों, आप जहाँ कल्पना करोगे वहीं श्रीभगवान् आकर खड़े रहेंगे। हम श्रीभगवान् की कल्पना करके उनके चरणों पर फूल चढ़ा सकते हैं। यदि आप कुछ देना भी चाहते हैं तो श्रीभगवान ऐसे ही खड़े रहेंगे।

“हमें देना है भगवान ले लीजिए”

जैसे हमें श्रीभगवान् को कुछ बताना है. आप ऐसे भी भगवान को याद करके बताओगे न कि आपसे कुछ कहना है तो भी श्रीभगवान् सुन भी लेंगे. श्रीभगवान् के कान, आँख और सिर हर स्थान पर है. आप जहाँ कल्पना करोगे, वहीं है. आप श्री भगवान के सिर पर फूल चढ़ाना चाहते हो तो आप कल्पना करो कि भगवान! ये आपका सिर है मैं उस पर फूल चढ़ाना चाहती हूँ, आप फूल चढ़ा सकते हो. भगवान को आप चन्दन का टीका लगाना चाहते हो, एक ही स्थान पर बैठकर आप खिला सकते हो, उनके पैर छू सकते हो, फूल भी चढ़ा सकते हो, कुछ बात भी बोल सकते हो क्योंकि भगवान तो हर जगह हैं. आप चालीसवें तल (40th floor) पर हो या भूतल पर हो, आप यात्रा कर रहे हो, रेलगाड़ी में हो, बस में हो. मुझे ऐसा लगता है कि अभी मैं भगवान की प्रार्थना कर रही हूँ और आप भी श्रीभगवान को याद करो तो वे वहाँ भी आएंगे यहाँ भी आएंगे तो एक ही श्रीभगवान नहीं है कि यहाँ ही होंगे, मेरे पास ही होंगे, आपके पास नहीं रहेंगे। हम जहाँ याद करेंगे श्रीभगवान वहाँ उपस्थित रहेंगे; यदि हम भक्त हैं तो


श्रीभगवान के आँख, कान कहाँ हैं?


सब जगह है। सब जगह श्रीभगवान हैं। ऐसे हम इस श्लोक को याद रखेंगे। जब भी ये श्लोक आप पढ़ते हैं, श्रीभगवान की कल्पना कीजिए। हर जगह भगवान है। जिस स्थान से हम पुकारेंगे, हम कुछ देना चाहते हैं, श्रीभगवान वहाँ खड़े रहेंगे। वो हमारे पुकार सुन कर दौड़-दौड़ कर आएंगे।

13.14

सर्वेन्द्रियगुणाभासं(म्), सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं(म्) सर्वभृच्चैव, निर्गुणं(ङ्) गुणभोक्तृ च॥13.14॥

वे (परमात्मा) सम्पूर्ण इन्द्रियों से रहित हैं (और) सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को प्रकाशित करने वाले हैं; आसक्ति रहित हैं और सम्पूर्ण संसार का भरण-पोषण करने वाले हैं; तथा गुणों से रहित हैं (और) सम्पूर्ण गुणों के भोक्ता हैं।

विवेचन- ऐसे तो भगवान एकदम सूक्ष्म हैं।  कितने छोटे हैं?

एक अणु-परमाणु। एकदम छोटा-सा बिन्दु।

श्रीभगवान सब जगह होते हैं, वो बिन्दु इतना छोटा-सा है फिर भी उसको कान, हाथ, पैर सब कुछ है। जिधर से भी आप बुलाओ वो हाथ आगे करेंगे, दौड़-दौड़ कर आएंगे, सुनेंगे, प्रसाद को स्वीकार करेंगे। वो कृष्ण भगवान के भी रूप में आएंगे, राम भगवान के भी रूप में आएंगे, वो कोई भी रूप धारण कर सकते हैं किन्तु इतने छोटे होने के बावजूद भी वो एक सूक्ष्म, एकदम बारीक होने के बावजूद भी वो पूरी इन्द्रियों से कार्य करते हैं। 

श्रीभगवान सबको देखते रहते हैं। उनकी आँखों के सामने कोई भी छिपा नहीं है। सभी की  जानकारी श्रीभगवान के पास रहती है। इसलिए हम कभी झूठ नहीं बोल सकते। कुछ भी गलत कार्य नहीं कर सकते क्योंकि श्रीभगवान के पास सबकी जानकारी रहती है।

हम किसी से भी झूठ बोल सकते हैं किन्तु श्रीभगवान् के सामने नहीं। वो हमें देखते रहते हैं। दण्ड (punishment) कब देंगे?

तुरन्त नहीं देंगे किन्तु जो भी कार्य हम करते हैं, उसका फल हम अवश्य पाते हैं। अच्छा कार्य किया तो अच्छा फल प्राप्त होगा। बुरा कार्य किया तो हमें बुरा फल प्राप्त होगा।

सभी इन्द्रियों के गुण श्रीभगवान् को पता है अर्थात् सबकी जानकारी श्रीभगवान् के पास है और इन्द्रिय न होने पर भी वे सब कुछ जानते हैं और आसक्ति रहित- हम सभी भगवान के ही बच्चे हैं। सबको उत्पन्न किसने किया है?

श्रीभगवान ही पिता हैं।  “अहम् बीजप्रद: पिता”- श्रीभगवान ने कहा है।जिस प्रकार माँ अपने जन्म दिए हुए बच्चों से जुडी रहती है, आसक्त रहती है किन्तु इतने सारे बच्चों को जन्म देने के बाद भी श्रीभगवान् किसी से आसक्त नहीं हैं किन्तु प्रेम सबसे करते हैं। हमारी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं किन्तु हमें भी श्रीभगवान् जो कहते हैं उसको मानना पड़ेगा। श्रीभगवान् ने हमें गीता के द्वारा, बड़ों के द्वारा जो अच्छे कार्य दिखायें हैं उन अच्छे कार्यों को ही हमें करना है, तो श्रीभगवान् भी हमारी आवश्यकताओं को पूरा करेंगे। तो वो सभी में आसक्ति रहित होने पर भी सबका भरण पोषण धारण वो सब करते हैं, पालन पोषण करते हैं, समय आने पर सभी की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं और वो गुणातीत हैं। कौन से तीन गुण हैं जो  हम लोगों ने पिछले अध्यायों में सीखे हैं?

अहाना दीदी ने उत्तर दिया- सत्त्व, रजस और तमस

सात्विक, राजसिक, तामसिक- ये तीन गुण प्रकृति से हमें मिलते हैं किन्तु श्रीभगवान इन तीनों गुणों से वो परे हैं, वे गुणातीत हैं। वो गुणातीत होने पर भी तीनों गुणों को भोगते हैं। कैसे?

क्योंकि परमात्मा सभी के अन्दर हैं तो शरीर के अन्दर श्रीभगवान जब रहते हैं तो जो गुण हैं, उनको भोगते हैं किन्तु ऐसे तो भगवान गुणातीत हैं।

13.15

बहिरन्तश्च भूतानाम्, अचरं(ञ्) चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं(न्), दूरस्थं(ञ्) चान्तिके च तत्॥13.15॥

वे (परमात्मा) सम्पूर्ण प्राणियों के बाहर-भीतर (परिपूर्ण हैं) और चर-अचर (प्राणियों के रूप में) भी (वे ही हैं) एवं दूर-से-दूर तथा नजदीक-से-नजदीक भी (वे ही हैं) वे अत्यन्त सूक्ष्म होने से जानने में नहीं आते ।

विवेचनसभी चराचर प्राणी के अन्दर बाहर कौन है?

भगवान है सभी को जो उत्पन्न करने वाले भगवान हैं तो बाहर भी भगवान हैं, सभी के अन्दर भी भगवान हैं और सबकी सृष्टि श्रीभगवान के ही द्वारा हुई है- चर-अचर सभी

चर और अचर का क्या अर्थ है?

चर अर्थात् जो चलता है तथा अचर अर्थात जो स्थिर है जैसे- वृक्ष. वृक्ष में भी जीव है। वो बढ़ता है किन्तु वो एक ही स्थान पर रहता है।
बाकी सब प्राणी जैसे मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान पर चल सकते हैं किन्तु ये सभी प्राणी जिन्हें श्रीभगवान् ने बनाया है, इन सभी में श्रीभगवान् हैं।

और कैसे हैं भगवान?

सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं अर्थात् अविज्ञेय हैं श्रीभगवान।

बहुत ही सूक्ष्म। इतना सूक्ष्म कि हम कल्पना कैसे करेंगे कि श्रीभगवान् कैसे हैं?

जैसे हम कपड़े सुखाते हैं, तो वो पानी कहाँ जाता है?

कपड़ा जब सूख जाता है तो पानी कहाँ गया?

वह वाष्पित(evaporate) हो जाता है। वो जो पानी है वो हवा में मिल जाता है। जब धूप तेज होगी, कपड़े सूख जाते हैं अर्थात् वो पानी हवा में गया।

इसका अर्थ क्या है?

हवा में पानी है, वो नमी कहाँ है? स्पर्श करने पर भी वह पानी नहीं दिखता इसका अर्थ है कि हवा में पानी नहीं है, ऐसे नहीं है, पानी तो है इसी प्रकार से श्रीभगवान भी उस नमी से भी एकदम सूक्ष्म है। वो हमारी कल्पना में वो बैठना चाहिए कि कितने सूक्ष्म हैं भगवान है?

जैसे पानी वाष्पित होकर हवा में है वैसे ही श्रीभगवान भी इतने ही सूक्ष्म हैं। सूक्ष्म होने के बावजूद भी वो हम सभी को सुनते हैं। श्रीभगवान को पता है अब इतने बच्चे आए हैं विवेचन सुनने के लिए। अब जाकर वो पढ़ाई करेंगे। उनके मन में ये विचार चलता रहेगा तो आपको सबको क्रेडिट पॉइंट मिलेगा क्योंकि आपने विवेचन सुना है आज। श्रीभगवान सबको देखते-सुनते रहते हैं और जब बच्चे अच्छे-अच्छे कार्य करते हैं तो वे श्रीभगवान को अच्छे भी लगते हैं, उनके प्रिय भी होते हैं, ऐसे ही अर्जुन श्रीभगवान् के बहुत प्रिय है इसलिए उन्होंने बताया कि जितना ज्ञान मुझे है, मैं सबकुछ तुम्हें भी बताना चाहता हूँ। इसके लिए अर्जुन को श्रीभगवान ने निमित्त बनाया और हम भी भाग्यशाली है कि अर्जुन को बताई हुई सारी बातें हम भी विवेचन के द्वारा, भगवत गीता के द्वारा हम भी सुन रहे हैं।

हम सबको यह कितना याद रहेगा, यह तो पता नहीं किन्तु सुनकर तो हमें आनन्द आता है कि ऐसा है गीता में ऐसा कहा है। इसीलिए गीता परिवार का ध्येय वाक्य है- “पढ़ो, पढ़ाओ, जीवन में लाओ”।  

जब हम इसी के बारे में सोचते हैं, जीवन में लाते हैं तो बार-बार हम इसको याद भी रख सकते हैं।

 कहाँ है भगवान्?

श्रीभगवान को जहाँ बुलाएंगे वो वहाँ हैं। यदि हम सोचेंगे कि श्रीभगवान वहाँ उधर दूर है तो दूर भी रहते हैं अर्थात् हर जगह भगवान हैं। सबके प्रकाश श्रीभगवान् हैं।  जैसे आँख का काम क्या है?

देखना, तो श्रीभगवान् उसके भी प्रकाश है। आँखों को प्रकाश देने वाले श्रीभगवान् है। कान का जो प्रकाश अर्थात् कान का जो विषय है शब्द- सुनना तो उसके लिए भी श्रीभगवान् ही कारण है। तो सुनना, देखना, स्पर्श, हमारी बुद्धि, मन- सबका वो जो प्रकाश है वह श्रीभगवान् है।

13.16

अविभक्तं(ञ्) च भूतेषु, विभक्तमिव च स्थितम्।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं(ङ्), ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥13.16॥

वे (परमात्मा) (स्वयं) विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियों में विभक्त की तरह स्थित हैं और (वे) जानने योग्य (परमात्मा ही) सम्पूर्ण प्राणियों को उत्पन्न करनेवाले तथा उनका भरण-पोषण करनेवाले और संहार करनेवाले हैं।

विवेचन- आकाश कहाँ से कहाँ तक है? उसका आदि और अन्त है क्या?
जहाँ भी देखो आकाश ही आकाश है और उस आकाश में क्या-क्या है?
यदि हम ऊपर जाकर अन्तरिक्ष में देखेंगे तो पूरी पृथ्वी भी आकाश में है, जल भी आकाश में है, वायु भी आकाश में है। सब कुछ आकाश में है, उस अन्तरिक्ष में है। आप कल्पना कर सकते हो। वैसे वो अविभक्त है। कुछ भी विभक्त नहीं है। पूरा आकाश एक है। विभाग रहित है। अविभक्त अर्थात् उसका भाग नहीं है। वो एक ही रिक्त स्थान (empty space) है। आकाश तो उसमें सब कुछ है।

पृथ्वी है, वायु है, जल है, अग्नि है, सब कुछ उसी आकाश में है। यदि हम उसको भगवान समझेंगे तो हम सभी कहाँ है?

श्रीभगवान की उस सृष्टि में है। विभक्तमिवचस्थितम् किन्तु विभागरहित होने के बावजूद भी वह सभी में है। मुझ में भी है, आप में भी है, हम सभी में है।

ऐसे तो भगवान को विभक्त नहीं किया जाता है फिर भी चमत्कार है वो कि हम सभी में हैं।

 
हम श्रीभगवान को इंग्लिश में क्या कहते हैं?

गॉड(god) है- G, O, D।

उसका अर्थ क्या है?

G- GENERATOR (सृष्टि)

O- OPERATOR (स्थिति)

D- DESTROYER (संहार)

सृष्टि, स्थिति और संहार।

जनरेटर अर्थात् सबकी सृष्टि करता है। कौन करता है?

हम बोलते हैं ब्रह्मा। ब्रह्मा सबकी सृष्टि करते हैं और 

भगवानविष्णु क्या करते हैं?

स्थिति अर्थात सबका पालन पोषण करते हैं। और

भगवान शिव क्या करते हैं?

संहार/लय। किसका संहार करते हैं?

जो अनुचित विषय हैं, उनका संहार करते हैं और जो अच्छे विषय हैं, उनका पालन भी करते हैं। इनके भी गुण होते हैं- रजोगुण से भगवान सृष्टि की रचना करते हैं और तमोगुण से उसका संहार करते हैं और सात्विक गुण से उसका पालन होता है। रुद्र रूप से उसका संहार होता है और विष्णु रूप से उसका पालन होता है और ब्रह्म रूप से उसका सृजन होता है।

हमें पता है कि ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु भगवान पालन करते हैं और भगवान शिव संहार करते हैं।

श्रीभगवान विभागरहित नहीं है किन्तु हम सभी में भगवान है।

13.17

ज्योतिषामपि तज्ज्योति:(स्), तमसः(फ्) परमुच्यते।
ज्ञानं(ञ्) ज्ञेयं(ञ्) ज्ञानगम्यं (म्), हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥13.17॥

वे (परमात्मा) सम्पूर्ण ज्योतियों के भी ज्योति (और) अज्ञान से अत्यन्त परे कहे गये हैं। (वे) ज्ञान स्वरूप, जानने योग्य, ज्ञान से प्राप्त करने योग्य (और) सबके हृदय में विराजमान है।

विवेचन- देखिए वह परमात्मा सम्पूर्ण ज्योतियों की भी ज्योति है अर्थात् हमें प्रकाश किससे मिलता है? हम लोगों ने अभी देखा था कि सूर्य भगवान् से।  सूर्य भगवान् से हमें प्रकाश मिलता है। सूर्य भगवान् को भी प्रकाश देने वाले कौन है?

वो भी परमात्मा है। परबह्म है। परमात्मा सम्पूर्ण ज्योतियों को भी ज्योति देते हैं और अज्ञान से परे हैं। वह ज्ञान स्वरूप, जानने योग्य है। परमात्मा तो ज्ञान के स्वरूप हैं और ज्ञेय- जानने योग्य हैं। ज्ञान से प्राप्त करने योग्य और सबके हृदय में विराजमान हैं।

सभी के हृदय में जो स्थित है कौन है वो?

वही परमात्मा है ज्योति अर्थात् प्रकाश है, सबका तेज, चैतन्य-शक्ति, वो एक ही स्रोत है, वही श्रीभगवान् हैं, उनसे ही वो प्रकाश मिलता है जैसे हमारा लैपटॉप है। लैपटॉप बिजली के बिना नहीं चलता है वैसे ही हम सभी मनुष्य, प्राणी, जीव-जन्तु है सबका स्रोत और प्रकाश है- परमात्मा।

त्वचा पर हमें स्पर्श जैसे- शीत, उष्ण हमें अनुभव होता है क्योंकि त्वचा का विषय है स्पर्श।

वो ज्ञान कहाँ से मिलेगा?

वो भी भगवान् हमें देते हैं और जब हम गन्ध (SMELL) अर्थात् सूँघते है किन्तु वो सुगन्ध है अथवा दुर्गन्ध है- उसका ज्ञान कहाँ से मिलेगा?

नाक से किन्तु वो बुद्धि भी श्रीभगवान् ही हमें देते हैं। वो ज्ञान देते हैं।

जैसे आँख के लिये अच्छा क्या है? बुरा क्या है?

देखने के लिए हम सब कुछ देखते हैं किन्तु अच्छे और बुरे का ज्ञान, वो भी विवेक शक्ति भी श्रीभगवान् ही देते हैं। प्रकाश को ही ज्योति कहते हैं। तो वो भगवान् देते हैं।

जैसे कान से सुनना-कितना, सुनना/ क्या-क्या सुनना/ गलत बातें सुनना है या अच्छी बातें सुनना हैं- यह सब ज्ञान भी श्रीभगवान् ही देते हैं। श्रीभगवान केवल सुनने की शक्ति देते हैं किन्तु वो बुद्धि, हमें ज्ञान से हमें बढ़ानी चाहिए कि गलत बातों को हमें नहीं सुनना है। फिर आदत पड़ जाती है। कोई आकर हमसे किसी के बुराई करते रहते हैं तो हमारी रूचि जागृत हो जाती है। फिर यदि एक बार आदत हो गई किसी की चुगली सुनने की तो फिर वो बढ़ता ही जाता है। इसके लिए हमें क्या करना है?

हम अच्छे से हमारी पढ़ाई करेंगे। हमें अंक अच्छे लाना है। हमने किसी के बारे में कुछ गलत सुन लिया तो हमारे मन में वही रहता है। फिर पढ़ाई में हम पीछे जाते हैं। इसलिए हमें यदि किसी के बारे में किसी ने बोल दिया तो हमें उनका मार्गदर्शन करना चाहिये।

अगर आपके मित्र हैं उन्होंने गलत किया है- यह जानकारी आपको मिल गई तो आप उनको सही मार्ग दिखा सकते हैं क्योंकि आपसभी अभी गीता सीख रहे हो तो आपको पता है कि क्या उचित है। आपके जैसे मित्र को पाकर वो धन्य हो गए कि आप विवेचन सुनते हो, आपको थोड़ा ज्ञान है, अभी तो हम उनका मार्गदर्शन कर सकते हैं। जो सुनी हुई बातें हैं, अच्छे-अच्छे विचार हैं,  जब हम उनके साथ बाँटते हैं ना तो उनको भी अच्छा लगता है। अरे ये तो मेरी बहुत अच्छी मित्र है। वो मेरी हमेशा सहायता करती है। अच्छी बातें बताती है। तो इससे उनको भी अच्छा लगता है। इसके लिए हमें आदत डालनी है कि जो अच्छे विचार हम सुनते हैं, उनको चार लोगों से बताएँ तब हमारा ज्ञान भी बढ़ जाता है। आज मैंने कुछ अच्छे विचार सुने तो मैं विवेचन के बाद मेरे माता-पिता को बताऊँगी। मेरे भाई-बहन, पड़ोसी, मित्रों को बताऊँगी कि आज मैंने ये अच्छे-अच्छे विचार सुने। जब हम लोगों से विचारों का आदान-प्रदान करते हैं तो वो बात हमारे मन में रहती है। तो ये सब जो है इसका ज्ञान होना कि सभी इंद्रियों का विषय है- गन्ध, रूप, रस- इसका जो ज्ञान है वो ज्योति है वो भगवान से ही हमें मिलती है।

बुद्धि, मन से जुडी हुयी है। मन की जो ज्योति है, उसको बुद्धि कहते हैं। मन का जो प्रकाश है वो बुद्धि है। बुद्धि से कर्तव्य क्या है और अकर्तव्य क्या है- हमें समझ में आता है। यह काम हमें करना है या नहीं करना है- वो बुद्धि हमें बताती है।

नित्य-अनित्य ज्ञान होने पर- सत्य क्या है/ असत क्या है/ मेरा कर्तव्य क्या है- ये सभी हमें बुद्धि से पता चलता है। बुद्धि कहाँ रहती है?

वो मेरी बुद्धि को स्वयं बताना पड़ता है। हम लोगों ने क्षेत्र के बारे में जाना है। अहंकार, मन, बुद्धि, प्रकृति- ये सब चौबीस स्वरूपों में आता है तो वो अहम्, को जानने का ज्ञान है।

बुद्धि की ज्योति है स्वयं और स्वयं की ज्योति है वो परमात्मा।
अहम अर्थात् मेरी ज्योति कौन है?

मुझे ये सब बातें कौन बताता है?

वो परमात्मा। तो सब ये आपस में जुड़ा हुआ है। परमात्मा से अर्थात् स्वयं, स्वयं से बुद्धि, बुद्धि से मन, मन से इन्द्रिय, इन्द्रियों के विषय- ये सब आपस में जुड़ा हुआ है किन्तु सब कुछ हमें कहाँ से प्राप्त होता है?

वो है परमात्मा से प्राप्त।

इसके लिए हमें जानने योग्य वह कौन है?

वह है स्वयं प्रकाशित परमात्मा। परमात्मा को और कोई प्रकाश नहीं दिखा सकता। हमें परमात्मा की ज्योति चाहिए। उससे हम प्रकाशित होते हैं। जैसे सूर्य के प्रकाश से चन्द्र प्रकाशित होते हैं। चन्द्रमा को अपना प्रकाश है क्या?

नहीं। वो सूरज के प्रकाश से वो प्रकाशित है वैसे ही हम सभी परमात्मा के उस प्रकाश से प्रकाशित हैं। हमें वो बुद्धि, ज्ञान, मन- सब हम में परमात्मा से मिलती है तो श्रीभगवान तो स्वयं प्रकाशित है। यही हमें जानना है।

13.18

इति क्षेत्रं(न्) तथा ज्ञानं(ञ्), ज्ञेयं(ञ्) चोक्तं(म्) समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय, मद्भावायोपपद्यते॥13.18॥

इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेप से कहा गया है। मेरा भक्त इसको तत्त्व से जानकर मेरे भाव को प्राप्त हो जाता है।

विवेचन- तो इस प्रकार क्षेत्र तथा, ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेप में कहा गया है। मेरा भक्त उसको जानकर मेरे भाव को प्राप्त हो जाता है।

श्रीभगवान् कहते हैं ज्ञान क्या है/ ज्ञेय क्या है/ जानने योग्य क्या है/ परमात्मा का तत्व क्या है/ यदि इन सभी को अच्छे से जो जानेंगे, आचरण में लाएँगे तो क्या होता है?  

वो श्रीभगवान् को ही प्राप्त हो जाता है। श्रीभगवान् से ही एक रूप हो जाता है। श्रीभगवान् कहते हैं कि वह मेरे ही भाव को प्राप्त हो जाता है।

इस ज्ञान को यदि हमें समझना है तो हमारा आधार (FOUNDATION) जो है वो मजबूत होना चाहिए। जैसे हम ऊँचा भवन(BUILDING) देखते हैं तो भवन मात्र वो भूमि पर खड़ा है क्या?

नहीं, उसके अन्दर उसका आधार है। उसके नीचे स्तम्भ (PILLARS) हैं। उसको अन्दर से इतना मजबूत करते हैं कि ऊपर आप कितनी भी ऊँचाई बढ़ाओ वो मजबूत रहता है ऐसे ही श्रीभगवान् का तत्व जानने के लिए हमारा जो आधार है वो सब क्या है?

वो द्वेष न करना, अद्रोह न करना, अहिंसा, क्षमाभाव, दम्भ ना करना, सरल रहना और श्रीभगवान् के ध्यान में एकान्त में रहना। ये बीस लक्षण जब मनुष्य में रहते हैं वो श्रीभगवान् को अच्छे से समझ पाता है और उन्हें तत्व से जो जानता है, वो उनको को ही प्राप्त हो जाता है।

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की अवधारणा सरल है किन्तु जीवन में लाना बहुत कठिन है। हमें धीरे-धीरे  इसका प्रयास करना चाहिए जैसे भवन का निर्माण करते हैं।

आज मैं किसी पर क्रोध नहीं करूँगी। आज कोई मुझे कुछ भी कहेगा तो मैं इसको श्रीभगवान् का प्रसाद मानूँगी। ऐसे ही भाव से इसको धीरे-धीरे बढाना है। ये जो लक्षण है ना इनको एक-एक करके स्वयं में लाना है तो हम बहुत अच्छे से श्रीभगवान् को जान सकते हैं।

13.19

प्रकृतिं(म्) पुरुषं(ञ्) चैव, विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव, विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥13.19॥

प्रकृति और पुरुष - दोनों को ही (तुम) अनादि समझो और विकारों को तथा गुणों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न समझो। कार्य और करण के द्वारा होने वाली क्रियाओं को उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही जाती है (और) सुख-दुःखों के भोक्तापन में पुरुष हेतु कहा जाता है।

विवेचन-   प्रकृति और पुरुष इन दोनों के संयोग से ही सबकी उत्पत्ति होती है और यह क्या है?

यह अनादि है। दोनों अनादि है और इसका विकार- राग और द्वेष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ जो है उसके विस्तार का वर्णन है। ये प्रकृति और पुरुष दोनों को ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न है। सभी गुण जो सत्व, रज और तम ये गुण भी हमें कैसे आते हैं?

ये प्रकृति से आते हैं- ये हम लोगों ने चौदहवें अध्याय में अच्छे से जाना है किन्तु प्रकृति से तो हमें ये गुण आते हैं।  प्रकृति भी यह गुण हमें किस मात्रा में, किस प्रमाण में देती है?

यह हमारे ही पूर्व जन्म का जो किया हुआ है, वही हम प्राप्त करते हैं। यदि हमने पिछले जन्म में बहुत अच्छे कार्य किये हैं तो वैसे ही गुणों को पाते हैं। यदि बुरे कार्य किए हैं तो वैसे ही गुणों को पाते हैं किन्तु जो गुण है हमें प्रकृति से प्राप्त होता है।

पुरुष क्या है?

पुरुष अर्थात् बिना चैतन्य के हमारी गाड़ी नहीं चलती है।  उसमें प्राण शक्ति चाहिए। एक मनुष्य में बिना प्राण शक्ति के तो वह नहीं रह सकता। जैसे लैपटॉप है। लैपटॉप में बिजली चाहिए। बिना बिजली के लैपटॉप कार्य नहीं कर सकता। कितना भी अच्छा-अच्छा एप्स डालिएगा, कुछ भी सॉफ्टवेयर डालिएगा किन्तु बिना बिजली वो काम का नहीं है वैसे पुरुष और प्रकृति दोनों साथ में रहेंगे तो ही मनुष्य काम कर पाते हैं।

प्रकृति अर्थात् हमारा स्वभाव है, सम्पूर्ण क्षेत्र के वो मूल हैं जो क्षेत्र अर्थात् इस देह का जो मूल है, वो प्रकृति है और ये सभी बातें हम लोगों ने समझ लीं कि वो पञ्च महाभूत हैं, मन, बुद्धि अहङ्कार- इन सभी से ये हमारा क्षेत्र बना है।

ये त्रिगुणात्मक, ये जो त्रिगुण है- सात्विक, राजसिक व तामसिक, वो प्रकृति से हमें मिला है और परमात्मा और प्रकृति से ही हम उत्पन्न हुए हैं।  

यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, इसके आगे का भाग हम अगले सप्ताह देखेंगे। तब तक हम इन बातों को अच्छे से समझेंगे। हमारे आधार को मजबूत करेंगे और श्रीभगवान् के तत्व को और अच्छे से समझने का प्रयास करेंगे। जो भी ज्ञान हम लोगों ने प्राप्त किया है उन सभी को श्रीभगवान् के चरणों में हम समर्पित करते हैं।


प्रश्नोत्तर सत्र



प्रश्नकर्ता- अहाना दीदी

प्रश्न- आकाश में वायु होती है यह आपने बताया, किन्तु हमें पढ़ाया गया कि वहाँ वायु नहीं होती क्या सच है?

उत्तर- आपने जो पढ़ा वह अन्तरिक्ष है open space है वहाँ वायु होती है।

प्रश्नकर्ता- स्पृहा दीदी
प्रश्न- भगवान तो सुना है लेकिन परमात्मा क्या है?
उत्तर- हम भगवान राम, कृष्ण, विष्णु आदि बोलते हैं, किन्तु परमात्मा एक ही है परम आत्मा सबसे श्रेष्ठ। वैसे सब एक ही हैं।