विवेचन सारांश
कर्म करना ही हमारा कर्तव्य है।

ID: 9709
Hindi - हिन्दी
शनिवार, 06 जून 2026
अध्याय 3: कर्मयोग
1/3 (श्लोक 1-8)
विवेचक: गीता प्रवीण ज्योति जी शुक्ला


गुरु वन्दना एवं दीप प्रज्वलन के साथ आज के अध्याय का प्रारम्भ हुआ। यह अध्याय हमारे जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें कर्म का महत्त्व समझाता है। तुलसीदास जी की प्रसिद्ध चौपाई है-
"कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।"

 श्रीभगवान् ने इस संसार की रचना कर्म के आधार पर की है। यदि हम कर्म ही न करें तो जीवन में कुछ भी सम्भव नहीं है इसलिए अपने कर्तव्यों का पालन करना अत्यन्त आवश्यक है।

इसको एक कहानी के माध्यम से समझेंगे-
एक बार तीन मित्र साथ में घूम रहे थे। उसी समय एक राजा अपने रथ पर कहीं जा रहे थे। रास्ते में रथ का पहिया एक गड्ढे में फँस गया। तीनों मित्र दौड़कर वहाँ पहुँचे और मिलकर राजा की सहायता की। उनकी सहायता से रथ का पहिया बाहर निकल गया। राजा तीनों युवकों की सहायता से बहुत प्रसन्न हुए। बातचीत के दौरान उन्हें पता चला कि तीनों मित्रों के पास कोई व्यवसाय नहीं हैं और वे काम की तलाश कर रहे हैं। राजा ने उनकी सहायता करने का निश्चय किया और पुरस्कार में तीनों को समान आकार के चन्दन के बगीचे दे दिये।

तीनों के सामने एक समान अवसर था किन्तु उन्होंने उसका उपयोग अलग-अलग प्रकार से किया। लगभग छह महीने बाद राजा की भेंट पहले मित्र से हुई राजा ने पूछा-
"कैसा चल रहा है?"
उसने उत्तर दिया-
"राजा साहब, मैंने बगीचे के सारे चन्दन के पेड़ कटवाकर बेच दिये। उससे जो धन मिला, उसे मैंने खर्च कर दिया। अब मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है और मैं फिर उसी स्थिति में आ गया हूँ, जहाँ पहले था।"

राजा यह सुनकर बहुत दुःखी हुए। कुछ समय बाद राजा की भेंट दूसरे मित्र से हुई, उससे भी राजा ने वही प्रश्न पूछा।
उसने कहा-
"मैंने चन्दन के पेड़ों को काटकर उनका कोयला बनवा दिया और बेच दिया। उससे जो धन मिला, उससे मेरा कुछ समय तक काम चल गया किन्तु अब वह भी समाप्त हो गया है आज मैं भी पहले जैसी स्थिति में हूँ।"

यह सुनकर राजा और अधिक चिन्तित हो गये। अब राजा के मन में तीसरे मित्र को लेकर जिज्ञासा जागी। उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि तीसरे युवक को खोजकर लाया जाये। जब तीसरा मित्र राजा के सामने आया तो राजा ने मुस्कुराते हुए पूछा-
"बताओ, तुम्हारा क्या हाल है? तुमने उस बगीचे का क्या किया?"
वह युवक विनम्रता से बोला-
"राजा साहब, मैंने चन्दन के पेड़ों को नहीं कटवाया। मैं नियमित रूप से उनकी देखभाल करता रहा, जो पेड़ तैयार हुए, उन्हें ही बेचता रहा और साथ ही नए पौधे भी लगाता रहा। आज मेरा बगीचा पहले से बड़ा हो गया है। मेरी आय भी बढ़ गई है और कई लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।"

यह सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा-
"तुमने इस उपहार का सही उपयोग किया है तुमने केवल वर्तमान के बारे में नहीं सोचा बल्कि भविष्य को भी ध्यान में रखा।"

श्रीभगवान् अवसर, योग्यताएँ और साधन प्रदान करते हैं। 
यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम उनका उपयोग कैसे करते हैं।

कुछ लोग बिना सोचे-समझे सब कुछ खर्च कर देते हैं, कुछ लोग थोड़ी समझदारी दिखाते हैं किन्तु दूर दृष्टि नहीं रखते। जबकि कुछ लोग परिश्रम, धैर्य और बुद्धिमानी से अपने संसाधनों का उपयोग करते हैं और निरन्तर प्रगति करते हैं।

कर्मयोग हमें यही सिखाता है कि केवल अवसर मिल जाना पर्याप्त नहीं है। सही सोच, निरन्तर प्रयास और अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करना आवश्यक है। जब हम अपने कर्मों को समझदारी और निष्ठा के साथ करते हैं तभी हमें स्थायी सफलता प्राप्त होती है।

कर्म करना आवश्यक है जो कर्तव्य समझकर निरन्तर कर्म करता है, वह जीवन में आगे बढ़ता है और सफलता प्राप्त करता है।
यही कर्मयोग का सन्देश है।

 तीनों युवक समान आयु के थे और तीनों को एक जैसा अवसर मिला था। तीनों को समान मात्रा में चन्दन के बगीचे मिले थे। किसी को अधिक और किसी को कम नहीं मिला था। फिर भी तीनों के परिणाम अलग-अलग क्यों हुए? कारण था— उनके कर्म।

पहले युवक ने बिना सोचे-समझे सब कुछ बेच दिया और जो धन मिला उसे भी खर्च कर दिया। दूसरे युवक ने भी दूरदृष्टि से कार्य नहीं किया। तीसरे युवक ने परिश्रम, बुद्धिमानी और योजना के साथ कार्य किया। उसने अवसर का सही उपयोग किया और अपने भाग्य को स्वयं सँवार लिया।

कर्म से भाग्य को बदला भी जा सकता है।
कर्म से ही भाग्य को खोया भी जा सकता है।

कई बार लोग कहते हैं,
"जो भाग्य में लिखा होगा, वही मिलेगा।" 
यदि कोई व्यक्ति कहे कि मैं कोई काम नहीं करूँगा, फिर भी भगवान् मुझे भोजन दे देंगे तो क्या ऐसा सम्भव है? यदि भोजन हमारे भाग्य में लिखा भी हो उसे प्राप्त करने के लिए हमें प्रयास तो करना ही पड़ेगा। बिना कर्म किए कोई भी सफलता प्राप्त नहीं होती है। किसी विद्यार्थी के भाग्य में अच्छे अङ्क लिखे हों किन्तु वह पढ़ाई ही न करे तो परीक्षा में अच्छे अङ्क कैसे आएँगे?

जब तक वह परिश्रम नहीं करेगा तब तक वह अपने भाग्य में लिखी हुई सम्भावनाओं को भी प्राप्त नहीं कर पायेगा। केवल भाग्य पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। हमें पूरे मन, पूरी निष्ठा और पूरे प्रयास के साथ कर्म करना चाहिये। जब हम पूरी लगन से अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं तभी हमें सफलता प्राप्त होती है।

यही बात अर्जुन के मन में भी चल रही थी। ज्ञान के द्वारा मनुष्य श्रीभगवान् को प्राप्त कर सकता है। आत्मा और शरीर का भेद समझ सकता है तथा जीवन के वास्तविक सत्य को जान सकता है।

अर्जुन सोचने लगे,
"श्रीभगवान् कभी ज्ञानयोग की बात करते हैं और कभी कर्मयोग की। यदि ज्ञान के द्वारा श्रीभगवान् को प्राप्त किया जा सकता है तो फिर कर्म करने की क्या आवश्यकता है? यदि ध्यान, जप और ज्ञान से ही भगवान् के प्रिय बन सकते हैं तो फिर मैं युद्ध क्यों करूँ?"

उन्हें ऐसा लगने लगा कि यदि ज्ञानयोग श्रेष्ठ है तो सब काम छोड़ देने चाहिये। पढ़ाई छोड़ दो, युद्ध छोड़ दो, जिम्मेदारियाँ छोड़ दो और किसी कोने में बैठकर केवल श्रीभगवान् का ध्यान करो। यह सही समझ नहीं है।

मान लीजिये एक बच्चा कहे-
"मुझे परीक्षा में अच्छे अङ्क चाहियें।"
लेकिन वह दिनभर केवल टीवी देखता रहे, मोबाइल चलाता रहे और पढ़ाई न करे। फिर परीक्षा के समय कहे,
"भगवान् जी, मुझे अच्छे अङ्क दिला दीजिये।"
क्या केवल ऐसा कह देने से अच्छे अङ्क आ जाएँगे?
नहीं।
श्रीभगवान् भी कहेंगे कि पहले अपना कर्तव्य तो करो। पढ़ाई करना तुम्हारा नियत कर्म है। जब तुम मन लगाकर पढ़ाई करोगे, प्रयास करोगे तब तुम्हें उसका फल भी मिलेगा।

इसी प्रकार यदि कोई बच्चा कहे कि मुझे क्रिकेट में अच्छा खिलाड़ी बनना है लेकिन वह अभ्यास ही न करे तो क्या वह अच्छा खिलाड़ी बन सकता है? नहीं।
यदि कोई कहे कि मुझे सङ्गीत सीखना है लेकिन वह अभ्यास ही न करे तो क्या वह अच्छा गायक बन सकता है? नहीं।

हर क्षेत्र में सफलता के लिए कर्म आवश्यक है।

3.1

अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते, मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं(ङ्) कर्मणि घोरे मां(न्), नियोजयसि केशव॥3.1॥

अर्जुन बोले - हे जनार्दन! अगर आप कर्म से बुद्धि (ज्ञान) को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव! मुझे घोर कर्म में क्यों लगाते हैं ?

विवेचन - अर्जुन कहते हैं,
"हे भगवान् यदि आपके अनुसार ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, यदि  ज्ञानयोग के द्वारा भी श्रीभगवान् को प्राप्त किया जा सकता है तो फिर आप मुझे इस भयानक युद्ध में क्यों लगा रहे हैं?"

अर्जुन की उलझन बिल्कुल स्वाभाविक थी। द्वितीय अध्याय में श्रीभगवान् ने साङ्ख्ययोग अर्थात् ज्ञानयोग का वर्णन किया था। उन्होंने ज्ञान की महिमा बताई थी इसलिए अर्जुन सोचने लगे कि यदि ज्ञान प्राप्त करना ही श्रेष्ठ है तो फिर कर्म करने की क्या आवश्यकता है?

अर्जुन के मन में विचार आया कि यदि ज्ञान से श्रीभगवान् को प्राप्त किया जा सकता है तो युद्ध करने, सङ्घर्ष करने और इतने बड़े कर्म में पड़ने की क्या आवश्यकता है?
"मैं तो वन में चला जाता हूँ, ध्यान करता हूँ, तपस्या करता हूँ और भगवान् का स्मरण करता हूँ। मैं युद्ध क्यों करूँ?"

अर्जुन विशेष रूप से इस बात से भी चिन्तित थे कि युद्ध में बहुत अधिक हिंसा होने वाली है और अनेक लोगों का जीवन समाप्त हो जायेगा।  मान लीजिए कोई विद्यार्थी कहे कि पढ़ाई का उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना है। यदि ज्ञान प्राप्त करना ही सबसे महत्त्वपूर्ण है तो फिर होमवर्क करने की क्या आवश्यकता है? 

पढ़ाई करना ज्ञानयोग के समान है।
होमवर्क करना कर्मयोग के समान है।

3.2

व्यामिश्रेणेव वाक्येन, बुद्धिं(म्) मोहयसीव मे।
तदेकं(व्ँ) वद निश्चित्य, येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥3.2॥

(आप अपने) मिले हुए से वचनों से मेरी बुद्धि को मोहित-सी हो रही है। (अतः आप) निश्चय करके उस एक बात को कहिये, जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ।

विवेचन- अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं,
"मैं तो अज्ञानी हूँ। मुझे सही मार्ग समझ में नहीं आ रहा है। आप सर्वज्ञ हैं, आपको सब कुछ ज्ञात है। आपने जो बातें कही हैं, उनसे मेरी बुद्धि कुछ भ्रमित हो रही है इसलिए कृपा करके मुझे स्पष्ट रूप से बताइए कि मेरे लिए कौन-सा मार्ग उचित है।"
अर्जुन श्रीभगवान् से प्रार्थना करते हैं कि,
"आप मुझे वही बात बताइये, जिससे मेरा कल्याण हो, जिससे मेरा भला हो और जिससे मैं सही निर्णय ले सकूँ।"

यहाँ अर्जुन की एक बहुत सुन्दर विशेषता दिखाई देती है। यदि हमारे सामने कोई देवता आकर कह दें कि "माँगो, क्या माँगना है?"
सम्भव है कि हम अच्छा घर, गाड़ी, मोबाइल, धन, अच्छे अङ्क या कोई अन्य भौतिक वस्तु माँग लें। अर्जुन ने श्रीभगवान् से धन, राज्य, सुख या कोई अन्य वस्तु नहीं माँगी। उन्होंने श्रीभगवान् से मार्गदर्शन माँगा। उन्होंने कहा-
"मुझे वह बताइये जिससे मेरा कल्याण हो।"

यही कारण है कि अर्जुन को आदर्श शिष्य कहा जाता है यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझने योग्य है।
जीवन में दो प्रकार की चीज़ें होती हैं— प्रेय और श्रेय।

प्रेय-
वह होता है जो हमें तत्काल अच्छा लगता है। जो प्रिय लगता है और जिस से तुरन्त आनन्द मिलता है। जैसे अधिक समय तक टीवी देखना, मोबाइल चलाना, खेलते रहना और पढ़ाई टालना। ये बातें उस समय अच्छी लग सकती हैं लेकिन हमेशा हमारे हित में नहीं होतीं।

श्रेय-
वह होता है जो हमारे कल्याण के लिए अच्छा हो, भले ही वह उस समय कठिन लगे। जैसे नियमित पढ़ाई करना, समय पर उठना, अनुशासन का पालन करना, बड़ों की बात मानना और अपने कर्तव्य निभाना।

अर्जुन ने श्रीभगवान् से प्रेय नहीं वरन् श्रेय माँगा। उन्होंने कहा-
"मुझे वह मार्ग बताइये जिससे मेरा कल्याण हो।"

अब श्रीभगवान् अर्जुन के इस प्रश्न का उत्तर देना प्रारम्भ करते हैं और समझाते हैं कि ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनों का अपना-अपना स्थान है।साथ ही वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के लिए कर्म से भागना उचित नहीं है। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए ही जीवन में आगे बढ़ना चाहिये। श्रीभगवान् अर्जुन की शङ्का का समाधान करते हैं और कर्मयोग के गहन रहस्य को समझाना प्रारम्भ करते हैं।

3.3

श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा, पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां(ङ्), कर्मयोगेन योगिनाम्॥3.3॥

श्रीभगवान् बोले - हे निष्पाप अर्जुन! इस मनुष्यलोक में दो प्रकार से होने वाली निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है। (उनमें) ज्ञानियों की (निष्ठा) ज्ञानयोग से और योगियों की (निष्ठा) कर्मयोग से (होती है)।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि ज्ञानयोग और कर्मयोग भगवान् के प्रिय बनने के दो मार्ग हैं। मनुष्य के आध्यात्मिक उत्थान के लिए दो प्रकार की निष्ठाएँ बतलाई गई हैं ज्ञानयोग और कर्मयोग।
दोनों मार्गों का लक्ष्य एक ही है- श्रीभगवान् की प्राप्ति तथा उनके प्रिय भक्त बनना।
यद्यपि दोनों का उद्देश्य समान है किन्तु उनकी साधना-पद्धति भिन्न है। प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वभाव, रुचि और प्रकृति के अनुसार इनमें से किसी एक मार्ग का अनुसरण कर सकता है।

ज्ञानयोग ज्ञान-प्रधान मार्ग है
यह उन लोगों के लिए उपयुक्त है जिनकी रुचि अध्ययन, मनन तथा चिन्तन में होती है। ज्ञानयोग में साधक शास्त्रों का अध्ययन करता है, ध्यान करता है, जप करता है, तप करता है तथा आत्मस्वरूप और परमात्मा के स्वरूप को जानने का प्रयास करता है। गीता, उपनिषद्, रामायण तथा अन्य आध्यात्मिक ग्रन्थों के अध्ययन द्वारा वह अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझता है।

कर्मयोग क्रिया-प्रधान मार्ग है।
इसका अर्थ केवल कर्म करना नहीं अपितु निस्वार्थ भाव से कर्म करना है। जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी फल की इच्छा के करता है तब वह कर्मयोगी कहलाता है। यदि हम किसी कार्य के बदले प्रशंसा, पुरस्कार अथवा सम्मान की अपेक्षा रखते हैं तो वह कर्मयोग नहीं है। कर्मयोग का सार यह है कि कर्म करते रहो किन्तु उसके परिणाम को श्रीभगवान् पर छोड़ दो।

3.4

न कर्मणामनारम्भान्, नैष्कर्म्यं(म्) पुरुषोऽश्नुते।
न च सन्न्यसनादेव, सिद्धिं(म्) समधिगच्छति॥3.4॥

मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना निष्कर्मता का अनुभव करता है और न (कर्मों के) त्याग मात्र से सिद्धि को ही प्राप्त होता है।

विवेचन- केवल कर्मों का त्याग कर देने से मनुष्य निष्कर्मता को प्राप्त नहीं होता तथा केवल बाह्य संन्यास धारण कर लेने से भी सिद्धि प्राप्त नहीं होती।

 कर्म से भागना समाधान नहीं है।
जीवन में कर्म करना अनिवार्य है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने कर्तव्यों का पालन निस्वार्थ भाव से करें तथा फल की चिन्ता भगवान् पर छोड़ दें।

जब ज्ञान और कर्म दोनों भगवान् को समर्पित हो जाते हैं तब साधक का जीवन सार्थक बन जाता है। इस प्रकार ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनों ही श्रीभगवान् तक पहुँचने के दिव्य मार्ग हैं। हमें अपने स्वभाव के अनुसार इनका अनुसरण करते हुए जीवन को श्रेष्ठ, अनुकरणीय तथा ईश्वरमय बनाने का प्रयास करना चाहिये।

3.5

न हि कश्चित्क्षणमपि, जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः(ख्) कर्म, सर्वः(फ्) प्रकृतिजैर्गुणैः॥3.5॥

कोई भी (मनुष्य) किसी भी अवस्था में क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता; क्योंकि (प्रकृति के) परवश हुए सब प्राणियों से प्रकृति जन्य गुण कर्म करवा लेते हैं।

विवेचन- इस संसार में कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जो एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए रह सके। हम चाहे कुछ करें या न करें, किसी न किसी रूप में क्रिया निरन्तर चलती रहती है। चलना, बैठना, सोना, जागना, बोलना, सुनना; यहाँ तक कि श्वास लेना और छोड़ना भी कर्म ही हैं। इसलिए यह सोचना कि हम कर्मों का त्याग करके पूर्णतः निष्क्रिय हो सकते हैं केवल एक भ्रम है।

मनुष्य के निरन्तर कर्म करते रहने का कारण प्रकृति के तीन गुण हैं। ये तीन गुण हैं- सत्त्व, रज और तम। गीता के अनेक अध्यायों में इन गुणों का वर्णन किया गया है। प्रत्येक मनुष्य में ये तीनों गुण विद्यमान रहते हैं किन्तु उनकी मात्रा अलग-अलग होती है। किसी में सत्त्वगुण अधिक होता है किसी में रजोगुण और किसी में तमोगुण की प्रधानता होती है।

सत्त्वगुण- 
यह निर्मलता, ज्ञान, सद्भाव और श्रेष्ठ कर्मों की प्रेरणा देता है। जब मनुष्य अच्छे विचारों को अपनाता है, दूसरों का कल्याण करता है, अनुशासनपूर्वक जीवन जीता है तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयास करता है, तब उसके भीतर सत्त्वगुण की वृद्धि होती है।

रजोगुण-
यह इच्छाओं, महत्वाकाङ्क्षाओं और कर्मशीलता से सम्बन्धित है। जब मन में अनेक कामनाएँ उत्पन्न होती हैं और उन्हें पूर्ण करने के लिए व्यक्ति निरन्तर प्रयास करता है तब रजोगुण सक्रिय होता है। रजोगुण मनुष्य को कर्म करने की प्रेरणा तो देता है किन्तु उसके साथ फल की अपेक्षा और आसक्ति भी जुड़ी रहती है।

तमोगुण-
यह आलस्य, प्रमाद, अज्ञान और निष्क्रियता को बढ़ाने वाला गुण है। जब व्यक्ति आवश्यक कार्यों को टालता है, अत्यधिक निद्रा में समय व्यतीत करता है, कर्तव्यों की उपेक्षा करता है अथवा उत्साहहीन रहता है तब तमोगुण की प्रधानता दिखाई देती है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी व्यक्ति केवल एक ही गुण से प्रभावित नहीं होता। हम सभी में सत्त्व, रज और तम तीनों गुण उपस्थित रहते हैं। अन्तर केवल इतना होता है कि किसी समय कौन-सा गुण अधिक प्रभावी है। हमारे विचार, व्यवहार और कर्म ही इन गुणों को बढ़ाते या घटाते हैं।
अच्छे कर्म और सत्सङ्ग सत्त्वगुण को बढ़ाते हैं,
इच्छाएँ और भोग की प्रवृत्ति रजोगुण को बढ़ाती हैं,
तथा आलस्य और प्रमाद तमोगुण को बढ़ाते हैं।
 
प्रकृति के ये गुण मनुष्य से निरन्तर कर्म करवाते रहते हैं। चाहे हम चाहें या न चाहें, इन गुणों के प्रभाव से हम किसी न किसी प्रकार की क्रिया करते ही रहते हैं। इसलिए कर्मों से भागना सम्भव नहीं है। आवश्यक यह है कि हम अपने कर्मों को सही दिशा दें और सत्त्वगुण की वृद्धि करते हुए निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करें।

जब मनुष्य इन तीनों गुणों को समझ लेता है तब वह अपने जीवन को अधिक सन्तुलित बना पाता है। वह यह पहचानने लगता है कि उसके भीतर कौन-सा गुण कार्य कर रहा है और उसे किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिये। यही समझ आध्यात्मिक उन्नति और श्रेष्ठ जीवन का आधार बनती है।

3.6

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य, य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा, मिथ्याचारः(स्) स उच्यते॥3.6॥

जो कर्मेन्द्रियों (सम्पूर्ण इन्द्रियों) को (हठपूर्वक) रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करते हुए बैठता है, वह मूढ़ बुद्धि वाला मनुष्य मिथ्याचारी (मिथ्या आचरण करने वाला) कहा जाता है।

विवेचन- जो व्यक्ति कर्मेन्द्रियों को तो रोक लेता है किन्तु मन में इन्द्रिय-विषयों का चिन्तन करता रहता है वह मिथ्याचारी अर्थात् दिखावटी आचरण करने वाला कहलाता है।

इसे हम अपने दैनिक जीवन के उदाहरणों से सरलता से समझ सकते हैं। मान लीजिए किसी व्यक्ति ने निश्चय किया कि वह आज से चाय नहीं पियेगा। उसने बाहरी रूप से चाय पीना तो छोड़ दिया किन्तु उसके मन में बार-बार यही विचार आता रहता है कि चाय पीने में कितना आनन्द आता था, उसका स्वाद कितना अच्छा था और काश अभी एक कप चाय मिल जाये। ऐसी स्थिति में केवल इन्द्रियों का नियन्त्रण हुआ है मन का नहीं।

इसी प्रकार यदि किसी ने यह सङ्कल्प लिया कि वह मोबाइल पर अनावश्यक समय व्यतीत नहीं करेगा। उसने मोबाइल का उपयोग कम भी कर दिया किन्तु मन में निरन्तर यही चलता रहे कि मोबाइल देखने में कितना मज़ा आता था। क्या-क्या छूट गया होगा और कब फिर से उसे चलाने का अवसर मिलेगा तो यह भी वास्तविक संयम नहीं है।

 
केवल व्यवहार में परिवर्तन पर्याप्त नहीं है
मन का परिवर्तन भी आवश्यक है।

यदि किसी बुरी आदत को छोड़ना है तो उसके विषय में बार-बार चिन्तन करने के स्थान पर मन को किसी श्रेष्ठ कार्य में लगाना होगा। खाली मन उसी विषय की ओर पुनः आकर्षित होने लगता है। जब हम किसी अनुचित आदत को छोड़ने का प्रयास करें तब उसकी जगह किसी सकारात्मक और रचनात्मक गतिविधि को अपनाना चाहिये।

यदि मोबाइल का उपयोग कम करना है तो उस समय का उपयोग स्वाध्याय, ध्यान, जप, योगाभ्यास, खेल, चित्रकला, सङ्गीत, लेखन अथवा किसी नई कला को सीखने में किया जा सकता है। जब मन को कोई श्रेष्ठ विकल्प मिलता है तब वह धीरे-धीरे पुराने आकर्षण को छोड़ने लगता है।

वास्तविक संयम का अर्थ केवल इन्द्रियों को रोकना नहीं
बल्कि मन को भी सही दिशा देना है।
जब इन्द्रियाँ और मन दोनों श्रीभगवान् की ओर, ज्ञान की ओर और सकारात्मक कर्मों की ओर प्रवृत्त होते हैं तभी साधना सफल होती है।
बाहरी नियन्त्रण के साथ-साथ
आन्तरिक शुद्धि और मन पर नियन्त्रण भी आवश्यक है।

हमें केवल बुरी आदतों का त्याग ही नहीं करना चाहिये बल्कि उनके स्थान पर अच्छे संस्कारों और श्रेष्ठ गतिविधियों को अपनाना चाहिये। यही सच्चा संयम है और यही आत्मविकास का मार्ग है।

इसे एक छोटी-सी कहानी से समझते हैं।
एक बार एक लकड़हारा नदी के किनारे पेड़ काट रहा था। अचानक उसकी लोहे की कुल्हाड़ी नदी में गिर गई। वह बहुत दुःखी होकर रोने लगा क्योंकि उसी कुल्हाड़ी से उसका घर चलता था। श्रीभगवान् उसके सामने प्रकट हुए। उन्होंने उसकी सहायता करने का निश्चय किया। सबसे पहले श्रीभगवान् नदी से एक सोने की कुल्हाड़ी निकालकर लाये और पूछा,
"क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?"
लकड़हारे ने कहा,
"नहीं भगवान्, यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है।"
फिर भगवान् एक चाँदी की कुल्हाड़ी लेकर आए। लकड़हारे ने उसे देखकर भी कहा,
"नहीं भगवान्, यह भी मेरी नहीं है।"
अन्त में श्रीभगवान् उसकी लोहे की कुल्हाड़ी लेकर आए। लकड़हारा खुश होकर बोला,
"हाँ भगवान्, यही मेरी कुल्हाड़ी है।"
लकड़हारे की ईमानदारी देखकर श्रीभगवान् बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे उसकी लोहे की कुल्हाड़ी के साथ-साथ सोने और चाँदी की कुल्हाड़ी भी उपहार में दे दीं।

कुछ दिनों बाद उसके एक मित्र को यह बात पता चली। उसने सोचा कि वह भी ऐसा ही करेगा और उसे भी सोने-चाँदी की कुल्हाड़ियाँ मिल जाएँगी।
वह जान-बूझकर अपनी कुल्हाड़ी नदी में फेंककर रोने का नाटक करने लगा। श्रीभगवान् फिर उसके सामने प्रकट हुए और सबसे पहले सोने की कुल्हाड़ी लेकर आए।
इस बार वह तुरन्त बोला,
"हाँ भगवान्, यही मेरी कुल्हाड़ी है।"
भगवान् समझ गए कि वह झूठ बोल रहा है। वे उससे अप्रसन्न हो गये। उसे न तो सोने की कुल्हाड़ी मिली, न चाँदी की और न ही उसकी अपनी कुल्हाड़ी वापस मिली।

इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि हमें केवल उसी चीज़ पर अपना अधिकार समझना चाहिये जो वास्तव में हमारी है। हमें लालच नहीं करना चाहिये और हमेशा सत्य बोलना चाहिये। जो व्यक्ति ईमानदारी से अपना कर्तव्य करता है और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करता श्रीभगवान् भी उससे प्रसन्न होते हैं।

ठीक इसी प्रकार श्रीभगवान् गीता में भी कहते हैं कि हमें अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से करना चाहिये। पढ़ाई करें तो मन लगाकर पढ़ाई करें। सेवा करें तो मन से करें। हर समय केवल फल के बारे में ही न सोचते रहें।
जब हम ईमानदारी, सच्चाई और निस्वार्थ भाव से कर्म करते है तब वही कर्मयोग कहलाता है और यही भगवान् को प्रिय है।

3.7

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा, नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः(ख्) कर्मयोगम्, असक्तः(स्) स विशिष्यते॥3.7॥

परन्तु हे अर्जुन! जो (मनुष्य) मन से इन्द्रियों पर नियन्त्रण करके आसक्ति रहित होकर (निष्काम भाव से) कर्मेंद्रियों (समस्त इन्द्रियों) के द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है।

विवेचन- श्रीभगवान् अर्जुन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि जो मनुष्य अपने मन के द्वारा इन्द्रियों को नियन्त्रिण में करता है तथा फल की आसक्ति का त्याग करके अपने कर्तव्य कर्मों का पालन करता है वही वास्तव में श्रेष्ठ है। केवल इन्द्रियों को रोक लेना पर्याप्त नहीं है बल्कि मन को भी संयमित करना आवश्यक है।

मन और इन्द्रियाँ दोनों उचित दिशा में कार्य करते हैं
तब व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग पर अग्रसर होता है।

हमारी आँखें, कान, नाक, त्वचा और जिह्वा ये सभी इन्द्रियाँ हैं। ये निरन्तर विभिन्न विषयों की ओर आकर्षित होती रहती हैं। यदि मनुष्य इन इन्द्रियों को अपने विवेक के अधीन रखता है और उन्हें अनुचित विषयों की ओर भटकने नहीं देता तो वह अपने जीवन को सही दिशा में ले जा सकता है।

श्रीभगवान् यहाँ विशेष रूप से यह भी बताते हैं कि कर्म करते समय फल की इच्छा और आसक्ति नहीं रखनी चाहिये। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम कर्म को लापरवाही से करें या परिणाम की चिन्ता ही न करें। इसका वास्तविक अर्थ है कि हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करें किन्तु परिणाम को लेकर अत्यधिक चिन्ता, भय या मोह न रखें।

उदाहरण के लिए एक विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह मन लगाकर अध्ययन करे, नियमित अभ्यास करे और अपनी पूरी क्षमता के अनुसार प्रयास करे। यदि वह पढ़ाई करते समय केवल अङ्कों के विषय में ही सोचता रहे कि मुझे इतने प्रतिशत अङ्क ही प्राप्त करने हैं तभी मैं सफल कहलाऊँगा तो उसका मन परिणाम की चिन्ता में उलझ जायेगा। यदि वह पूरे मनोयोग और परिश्रम के साथ अध्ययन करे तथा परिणाम को श्रीभगवान् पर छोड़ दे तो वह कर्मयोग की भावना के अनुसार कार्य कर रहा है।

कर्मयोग का सन्देश यही है कि हम अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा, ईमानदारी और उत्साह के साथ करें किन्तु फल के प्रति आसक्त न हों। सफलता मिले तो अहङ्कार न आए और अपेक्षित परिणाम न मिले तो निराशा न हों। ऐसा सन्तुलित दृष्टिकोण ही मनुष्य को आन्तरिक शान्ति प्रदान करता है।

 वही व्यक्ति श्रेष्ठ है जो मन को संयमित रखते हुए, इन्द्रियों को नियन्त्रित करते हुए और फल की आसक्ति का त्याग करके; अपने कर्तव्य कर्मों का पालन करता है। यही कर्मयोग का सार है और यही जीवन को सफल तथा सार्थक बनाने का मार्ग है।

3.8

नियतं(ङ्) कुरु कर्म त्वं(ङ्), कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते, न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥3.8॥

तू शास्त्र विधि से नियत किये हुए कर्तव्य कर्म कर; क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।

विवेचन- कर्मों का वर्गीकरण एवं उनका महत्त्व जानना अत्याश्यक है।

श्रीभगवान् कहते हैं-
"तुम्हें अपने नियत कर्म करने चाहियें क्योंकि कर्म करना, कर्म न करने से श्रेष्ठ है।"
मनुष्य के लिए कर्म करना केवल एक विकल्प नहीं अपितु जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। यदि हम न भोजन करें, न जल ग्रहण करें, न अध्ययन करें और न ही अपने दायित्वों का निर्वहन करें, तो जीवन का सञ्चालन सम्भव नहीं होगा। कर्म करना मनुष्य का स्वभाव, उत्तरदायित्व और आवश्यकता तीनों हैं।

शास्त्रों में कर्मों को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया गया है-
 विधि कर्म और निषिद्ध कर्म
1. विधि कर्म
विधि कर्म वे कर्म हैं जिन्हें शास्त्रों द्वारा करने योग्य बताया गया है। ये कर्म व्यक्ति, परिवार और समाज के कल्याण में सहायक होते हैं।

(क) विहित कर्म
विहित कर्म वे श्रेष्ठ एवं मङ्गलकारी कर्म हैं जिन्हें सभी मनुष्यों के लिए करना आवश्यक माना गया है। सत्य बोलना, बड़ों का सम्मान करना, विनम्रता से व्यवहार करना, सेवा करना तथा दूसरों की सहायता करना; विहित कर्मों के उदाहरण हैं। ये कर्म समाज में सद्भाव, सहयोग और नैतिकता का संवर्धन करते हैं। विहित कर्म दो प्रकार के होते हैं—

नित्य कर्म
नित्य कर्म वे हैं जिन्हें प्रतिदिन करना आवश्यक होता है। जैसे- प्रार्थना, ध्यान, अध्ययन, स्वच्छता बनाए रखना तथा अपने दैनिक दायित्वों का निर्वाह करना। नित्य कर्मों का नियमित पालन जीवन में अनुशासन, संयम और सन्तुलन लाता है।

• नैमित्तिक कर्म
नैमित्तिक कर्म वे कर्म हैं जो किसी विशेष निमित्त, अवसर या परिस्थिति में किये जाते हैं। ये प्रतिदिन नहीं किये जाते किन्तु अवसर आने पर उनका पालन करना हमारा कर्तव्य बन जाता है।
जैसे— जन्मदिन, विवाह, त्योहार, पारिवारिक आयोजन अथवा किसी विशेष समारोह में सहयोग देना, अतिथियों का सम्मान करना, व्यवस्था में योगदान देना तथा परिवार के साथ मिलकर उत्तरदायित्व निभाना नैमित्तिक कर्म हैं। ऐसे अवसरों पर सहभागिता और सहयोग की भावना हमारे व्यक्तित्व को परिष्कृत करती है तथा परिवार एवं समाज के प्रति संवेदनशीलता का विकास करती है।

(ख) नियत कर्म
नियत कर्म वे कर्म हैं जो व्यक्ति की आयु, स्थिति, भूमिका और जिम्मेदारियों के अनुसार निर्धारित होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति का नियत कर्म भिन्न हो सकता है।

एक विद्यार्थी का नियत कर्म मन लगाकर अध्ययन करना, समय पर गृहकार्य पूर्ण करना, विद्यालय के नियमों का पालन करना तथा शिक्षकों का सम्मान करना है। इसी प्रकार माता-पिता के प्रति सम्मान, उनकी सहायता और उनकी आज्ञा का पालन करना भी हमारा नियत कर्म है। भाई-बहनों के प्रति प्रेम, सहयोग और सद्भावपूर्ण व्यवहार  करना कर्तव्य का ही अङ्ग है।

जब मनुष्य अपने नियत कर्मों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करता है, तब उसका जीवन व्यवस्थित, सन्तुलित और सफल बनता है। यही कर्मयोग की वास्तविक भावना है।

2. काम्य कर्म
काम्य कर्म वे कर्म हैं जो किसी विशेष कामना या इच्छा की पूर्ति के लिए किये जाते हैं। इन कर्मों के पीछे किसी न किसी फल की आकांक्षा रहती है।

उदाहरणस्वरूप, श्रेष्ठ अङ्कों की प्राप्ति के लिए अतिरिक्त अध्ययन करना, प्रतियोगिता में विजय पाने के लिए विशेष अभ्यास करना, यश, सम्मान अथवा सफलता प्राप्त करने हेतु प्रयास करना— ये सभी काम्य कर्म हैं।

किसी मनोकामना की पूर्ति के लिए व्रत, उपासना या विशेष अनुष्ठान करना भी काम्य कर्म की श्रेणी में आता है।

3. प्रायश्चित्त कर्म
मनुष्य से कभी-कभी भूल, त्रुटि या अनुचित कर्म हो जाता है। उस भूल के परिमार्जन तथा आत्मशुद्धि के लिए जो कर्म किए जाते हैं, उन्हें प्रायश्चित्त कर्म कहा जाता है।

किसी को कष्ट पहुँचाने पर क्षमा माँगना, असत्य बोलने के पश्चात सत्य का पालन करने का सङ्कल्प लेना, अपनी त्रुटियों को सुधारने के लिए सेवा, दान अथवा सत्कर्म करना-
ये सभी प्रायश्चित्त कर्म हैं। प्रायश्चित्त का उद्देश्य दण्ड नहीं, बल्कि आत्मसुधार और चरित्र निर्माण है।

4. आवश्यक कर्म
आवश्यक कर्म वे हैं जिनके बिना जीवन का सामान्य सञ्चालन सम्भव नहीं है। भोजन करना, जल पीना, स्वच्छता बनाए रखना, पर्याप्त विश्राम लेना तथा स्वास्थ्य की देखभाल करना आवश्यक कर्म हैं।

विद्यार्थियों के लिए नियमित अध्ययन भी आवश्यक कर्म है। जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए भोजन आवश्यक है, उसी प्रकार ज्ञान प्राप्त करने के लिए अध्ययन आवश्यक है। समय पर उठना, विद्यालय जाना, अध्ययन करना, परिवार के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करना तथा अनुशासित दिनचर्या का पालन करना; आवश्यक कर्मों में सम्मिलित हैं।

यद्यपि ये कार्य सामान्य प्रतीत होते हैं किन्तु वास्तव में यही जीवन की सफलता, सन्तुलन और प्रगति की नींव हैं।

5. निषिद्ध कर्म
निषिद्ध कर्म वे हैं जिन्हें शास्त्र तथा समाज दोनों अनुचित मानते हैं। झूठ बोलना, चोरी करना, किसी को कष्ट पहुँचाना, छल-कपट करना, अपमान करना तथा दूसरों को हानि पहुँचाना; निषिद्ध कर्म हैं। ऐसे कर्म मनुष्य के चरित्र को दूषित करते हैं और समाज में अशान्ति उत्पन्न करते हैं। अतः इनसे सदैव दूर रहना चाहिय।

श्रीभगवान् का सन्देश स्पष्ट है कि मनुष्य को कर्म से विमुख नहीं होना चाहिये।

नित्य, नैमित्तिक, नियत, काम्य, प्रायश्चित्त तथा आवश्यक कर्मों की सम्यक् समझ हमें अपने जीवन को सुव्यवस्थित, अनुशासित और मङ्गलमय बनाने में सहायता करती है। जब हम अपने कर्तव्यों का निष्ठा, समर्पण और प्रसन्नता के साथ निर्वहन करते हैं तथा निषिद्ध कर्मों से बचते हैं, तब हमारा व्यक्तित्व निखरता है। परिवार में सामञ्जस्य बढ़ता है और जीवन सार्थक बनता है।

सच्चा कर्मयोग यही है कि हम अपने प्रत्येक कर्तव्य को पहचानें, उसे पूर्ण मनोयोग से निभाएँ और अपने जीवन को सेवा, संयम, सदाचार एवं सत्कर्मों से अलङ्कृत करें।

नियत कर्मों को पहचानना चाहिये,
उन्हें ईमानदारी से
करना चाहिये। 

जब हम अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं तब हमारा जीवन व्यवस्थित और सफल बनता है। कर्म से भागना नहीं बल्कि अपने कर्तव्य को समझकर उसे श्रेष्ठ प्रकार से निभाना ही सच्चा कर्मयोग है।

श्रीभगवान् कहते हैं कि कर्म करना आवश्यक है। जो व्यक्ति अपने नियत कर्मों का पालन करता है वही आगे बढ़ता है और अपने जीवन को सार्थक बनाता है। जब हमें अपने कर्मों की सही समझ होती है, तब हम यह पहचान पाते हैं कि कौन-से कार्य हमें नियमित रूप से करने चाहियें और किन बातों में सुधार की आवश्यकता है।

 यदि हम इनकी स्पष्ट समझ अपने जीवन में विकसित कर लें, तो हम अपने अनेक कार्यों को बेहतर तरीके से कर सकते हैं और अपने जीवन को अधिक अनुशासित बना सकते हैं।

इन छोटी-छोटी शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाकर हम एक अच्छे विद्यार्थी, अच्छे परिवार सदस्य और अच्छे मनुष्य बन सकते हैं। इन्हीं शब्दों के साथ आज के अध्याय का सुन्दर विवेचन समाप्त हुआ। 

हरि नाम सङ्कीर्तन और श्री हनुमान चालीसा पाठ के साथ आज के विवेचन सत्र का समापन हुआ।