विवेचन सारांश
महाभारत युद्ध के लिए तत्पर सेनाओं का विवरण एवं धनुर्धर अर्जुन का प्रथम उपक्रम

ID: 2196
हिन्दी
रविवार, 01 जनवरी 2023
अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग
2/4 (श्लोक 14-27)
विवेचक: गीता विदूषी सौ वंदना जी वर्णेकर


आज नववर्ष के प्रथम दिवस की प्रथम संध्या में सभी को शुभकामना सन्देश एवं मधुर कविता के साथ श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के मध्य के श्लोकों के विवेचन सत्र का शुभारम्भ वासुदेव की प्रार्थना, दीप प्रज्वलन एवं  गुरुवंदना के उपरांत हुआ। प्रारम्भ में ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की प्रार्थना संपन्न हुई एवं भगवान वेदव्यास जी इस महान ग्रन्थ के रचयिता की वंदना की गयी। आज नववर्ष 2023 का प्रथम दिवस है और हम सभी लोग इसे अपने परिजनों एवं मित्रों को शुभकामना संदेशों का आदान - प्रदान कर के उत्साह पूर्वक मना रहें है। यह अच्छी बात है लेकिन यह भी आवश्यक है कि हम अपनी सनातन काल गणना को भी याद रखे। अपनी सनातन काल गणना, विक्रम सम्वत को भी महत्त्व दें, उसे याद रखे और उस पर गर्व करें। हमारी काल गणना अत्यंत विशाल है जो चतुर्युगी है, जिसमें सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग आते हैं। इसमें कलयुग ही चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का है।

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग के विषय में बताता है। इस अध्याय में भगवान ने गीता का कोई उपदेश नहीं दिया पर फिर भी यह अध्याय अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि यह हमें अर्जुन की मनोभावना के बारे में बताता है कि किस प्रकार उनके जैसा नरोत्तम भी हतोत्साहित हो गया।

उनके लिये ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं;

तू सुमनु शुद्धमति, अनिंदकु अनन्यगति।

अर्जुन तुम्हारा मन बहुत अच्छा है और तुम्हारी मति शुद्ध है, तुम किसी की निंदा नहीं करते और शरण आना तो कोई तुमसे सीखे।

ऐसे अर्जुन की अवस्था इस प्रकार क्यों हो गई, वह हम इस अध्याय के माध्यम से ही जान सकते हैं। आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व द्वापर काल के लगभग अंतिम चरण में महाभारत का युद्ध हुआ था। माना जाता है कि राजा परीक्षित, जो अर्जुनपुत्र अभिमन्यु के पुत्र थे, के शासन काल के अंतिम चरण में कलियुग का प्रारम्भ हुआ था। हम पाते है कि लोगों की मनःस्थिति अभी भी वैसी ही है चाहे युग बदल गए हों। काम क्रोध, लोभ, ईर्ष्या इत्यादि विकार तब भी थे और आज भी हैं, यह हम महाभारत के माध्यम से जान सकते हैं और हमें ज्ञात होता है कि मनुष्य कभी भी पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए हम पाते हैं कि युधिष्ठिर जिन्हें धर्मराज भी कहा जाता है, वे बालपन से ही धर्म को याद रखने में नहीं अपितु धर्म का जीवन जीने में विश्वास रखते थे।

सत्यं वद धर्मं चर।

उन्होंने भी कुछ स्थानों पर धर्म का पूर्णता से एवं सत्यता से पालन नहीं किया। युधिष्ठिर ने भी द्यूत खेलना स्वीकार किया और महान ज्ञानी एवं धर्मनिष्ठ होने के उपरान्त भी अपना सम्पूर्ण राज्य, सभी भाइयों को एवं अपनी पत्नी को भी दांव पर लगा दिया। युद्ध के मध्य में भी अश्वत्थामा की मृत्यु के छल पूर्ण उद्घोष का समर्थन कर आचार्य द्रोण के वध में योगदान दिया, अर्थात प्रत्येक मनुष्य से भूल होती है पर उस भूल को सुधारना ही इंसानियत है।

जो ठीक कर ले गलती को, उसे इंसान कहते हैं,
किसी के काम जो आये, उसे इंसान कहते हैं। 


इंसान को समझना, उसके विकारों को समझना, क्यों हताशा है यह जानना और फिर उसे दूर कर मन में उत्साह जगाकर सही मार्ग दिखाने का पाथेय है भगवद्गीता। महान धनुर्धर, वीर, ज्ञानी एवं तपस्वी, युद्ध करने के लिए तत्पर, पूर्ण रूप से तैयार अर्जुन भी युद्धक्षेत्र में कैसे अवसादग्रस्त हो गए, विषादग्रस्त हो गए यह देखने को मिलता है। ऐसे समय में श्रीमद्भवद्गीता का ज्ञान ही उन्हें उस विषाद से मुक्त करा कर, सभी विकारों  को नष्ट कर, युद्ध करने को प्रेरित करता है और विजयी भी बना देता है। आज के परिप्रेक्ष्य में भी यह उतना ही सत्य है। हतोत्साहित व्यक्ति में गीता सही ज्ञान बता कर उत्साह भर देती है अतः आज के परिप्रेक्ष्य में भी गीता उतनी ही प्रासंगिक है।

जब दुर्योधन ने एक सुई की नोंक जितना भी राज्य देने से मना कर दिया तो युद्ध अटल हुआ और दोनों सेनाएं युद्ध के लिए एकत्रित हूईं। श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय में धृतराष्ट्र कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए एकत्र हुई अपने पुत्र कौरवों एवं पांडवों की सेना का विवरण संजय से पूछते है और संजय, जिन्हें युद्ध को देखने की दिव्य दृष्टि प्राप्त थी वे पूरा विवरण बताते हैं, इसका उल्लेख है। संजय ने बताया कि युद्धक्षेत्र में दोनों पक्षों की सेनाओं के महारथियों ने अपने - अपने शंख बजाये और दोनों तरफ से नगाड़े बजने लगे एवं भयंकर नाद उत्पन्न हो गया।
आगे का विवरण बताते हुए संजय कहते हैं-

1.14

ततः(श्) श्वेतैर्हयैर्युक्ते, महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः(फ्) पाण्डवश्चैव, दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः।।1.14।।

इसके पश्चात् सफेद घोड़ों से युक्त महान रथ पर बैठे हुए लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भी दिव्य शंखों को बड़े जोर से बजाया।

 विवेचनसंजय ने बताया कि  कैसे श्वेत अश्वों से युक्त अत्यन्त उत्तम एवं महान रथ पर आसीन सारथी के रूप में माधव एवं पाण्डव अर्जुन ने अपने - अपने दिव्य शंखो को उच्च स्वर में बजाया। बताया जाता है कि यह रथ इतना विशाल था कि नौ बैलगाड़ियों में रखे हुए सभी अस्त्र - शस्त्र उस रथ में आ जाते थे और इसे अर्जुन को अग्निदेव ने प्रसन्न हो कर खांडवप्रस्थ प्रसंग के समय दिया था। अग्निदेव ने अर्जुन को दिव्य धनुष गाण्डीव भी प्रसन्न हो कर दिया था। ऐसा रथ जिसपर हरि के रूप में श्रीकृष्ण सारथी हों, विशाल पताका जो चार कोस फहराती थी, उस पर स्वयं शंकर जी के अवतार हनुमानजी विराजमान हों एवं अग्निदेव द्वारा प्रदत्त हो, वह कितना महान होगा। सभी पाण्डवों ने भी अपने अपने शंखों को उच्च स्वर में बजाया।

1.15

पाञ्चजन्यं(म्) हृषीकेशो, देवदत्तं(न्) धनञ्जयः।
पौण्ड्रं(न्) दध्मौ महाशङ्खं(म्), भीमकर्मा वृकोदरः।।1.15।।

अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक (तथा) धनञ्जय अर्जुन ने देवदत्त नामक (शंख बजाया और) भयानक कर्म करने वाले वृकोदर भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।

विवेचनहृषीकेश श्रीकृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य नामक शंख एवं धनञ्जय अर्जुन ने अपना देवदत्त नामक शंख बजाया। श्रीकृष्ण को यहाँ हृषीकेश कहा गया है, ऋषिक अर्थात इंद्रिय और ऋषिकेश याने इंद्रियों के स्वामी। वे सभी इन्द्रियों पर विजय पा चुके थे। वे स्वयं इन्द्रियों के स्वामी है। इन्द्रियां उन पर शासन नहीं करती हैं परन्तु वे इन्द्रियों पर शासन करते हैं।

अर्जुन को धन्ञजय कहा गया है क्योंकि उन्हें राजसूय यज्ञ में धन एकत्रित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी और उन्होंने सबसे अधिक धन एकत्रित किया था। विशालकाय शरीर वाले वृकोदर पाण्डु पुत्र भीम ने भी अपना पौण्ड्रं नामक महान शंख बजाया। वृक अर्थात अग्नि और वृकोदर याने जिसके उदर में अग्नि सदैव प्रज्वलित रहे, जिसकी भूख बहुत विशाल है।

1.16

अनन्तविजयं(म्) राजा, कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः(स्) सहदेवश्च, सुघोषमणिपुष्पकौ।।1.16।।

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक (शंख बजाया तथा) नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक (शंख बजाये)।

 विवेचनइसी प्रकार कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपना अनंतविजय नामक शंख बजाया। नकुल ने सुघोषमणि और सहदेव ने मणिपुष्पक नामक शंख को बजाया। कौरवों की सेना अनुशासनबद्ध थी परंतु पाण्डवों  की स्नेहबद्ध थी। उनके सेनापति धृष्टद्युम्न थे पर प्रथम शंख श्रीकृष्ण ने बजाया। शंख बजने के बाद कायरों को डर लगता है परंतु वीरों का उत्साह वर्धन होता है।

1.17

काश्यश्च परमेष्वासः(श्), शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।1.17।।

हे राजन्! श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि,

विवेचन संजय ने राजा धृतराष्ट्र को पाण्डवों की सेना के विषय में आगे बताया कि हे राजन! काशीराज, जो अत्यंत श्रेष्ठ धनुर्धर हैं, महारथी शिखण्डी एवं राजा धृष्टद्युम्न तथा अजेय राजा सात्यकि ने भी अपने - अपने शंखों को बजाया। राजा सात्यकि को अजेय बताया गया है क्योंकि ये महाभारत के युद्ध में जीवित रहे और इन्हें श्रीकृष्ण की विशेष अनुकम्पा प्राप्त थी। बताया जाता है कि महाभारत के युद्ध समाप्त होने के काफी वर्षों के उपरांत यादवों के आपसी युद्ध में इनकी मृत्यु हुई थी।  

1.18

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च, सर्वशः(फ्) पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः(श्), शङ्खान्दध्मुः(फ्) पृथक्पृथक्।।1.18।।

राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र तथा लम्बी-लम्बी भुजाओं वाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु (इन सभी ने) सब ओर से अलग-अलग (अपने - अपने) शंख बजाये।

विवेचनइसी प्रकार राजा द्रुपद, रानी द्रौपदी के पाँचों पुत्रों ने एवं लम्बी - लम्बी भुजाओं वाले सुभद्रा पुत्र, महान योद्धा अभिमन्यु ने अपने शंखों को अलग - अलग बजाया।  

1.19

स घोषो धार्तराष्ट्राणां(म्), हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं(ञ्) चैव, तुमुलो व्यनुनादयन्।।1.19।।

और (पाण्डव-सेना के शंखों के) उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए धार्तराष्ट्रों अर्थात् आपके पक्ष वालों के हृदय विदीर्ण कर दिये।

 विवेचन- युद्धक्षेत्र में पाण्डवों द्वारा बजाये गए भयंकर शंखनाद से तुमुल, अर्थात प्रचंड घोष हुआ जिससे सम्पूर्ण आकाश एवं पृथ्वी काँप उठी, इतना उच्च स्वर उत्पन्न हुआ। धृतराष्ट्र के पक्ष में युद्ध करने के लिए एकत्र सभी योद्धाओं के हृदय विदीर्ण हो गए। उनके ह्रदय इसलिए कम्पित हो गए क्योंकि वे सभी कायर थे। वे धर्मयुद्ध में अधर्म का साथ देने के लिए एकत्र हुए थे। उनमें आमने - सामने के युद्ध में लड़ने की क्षमता ही नहीं थी, वे सदैव षड्यंत्र करके ही जीतते थे। जब कोई जानते हुए भी अधर्म का साथ देता है तो उसमें आंतरिक शक्ति का अभाव रहता है और वे आंतरिक रूप से अशक्त होते हैं, अतः उनके ह्रदय कम्पित हो गए।  

1.20

अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।।1.20।।

हे राजन् इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने शास्त्र चलाने कि तैयारी के समय धनुष उठाकर मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र सम्बन्धियों को देखकर

 विवेचनसंजय ने कहा कि हे महान राजन धृतराष्ट्र, शंखनाद के उपरांत अब शस्त्रों के चलने की तैयारी होने लगी। युद्धक्षेत्र में अन्यायपूर्वक राज्य को अधिग्रहित किये हुए राजाओं एवं उनके अधर्म में उनका साथ देने के लिए एकत्र सभी राजाओं को व्यवस्थित रूप से सम्मुख खड़े हुए देख कर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना गाण्डीव धनुष उठा लिया और अपने रथ के सारथी अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण से यह वचन बोले। 
अर्जुन के रथ के ध्वज पर कपि हनुमान जी विराजमान थे इसलिए अर्जुन के रथ के ध्वज को कपिध्वज भी कहा गया है।   

1.21

हृषीकेशं(न्) तदा वाक्यम्, इदमाह महीपते। अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये, रथं(म्) स्थापय मेऽच्युत।।1.21।।

अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को (आप तब तक) खड़ा कीजिये, जब तक मैं (युद्धक्षेत्र में) खड़े हुए इन युद्ध की इच्छा वालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है।

 विवेचनअर्जुन ने अच्युत श्रीकृष्ण से कहा कि आप मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चलिए एवं तब तक रथ को वहाँ खड़ा रखिये जब तक मैं इस युद्धक्षेत्र में युद्ध करने की इच्छा रखने वालों को देख न लूँ एवं यह जान न लूँ कि इस युद्ध मे मुझे किन - किन के साथ युद्ध करना है।

श्रीकृष्ण को यहाँ अच्युत कहा है क्योंकि वे स्थिर हैं, परिस्थितियों से च्युत नहीं होते, डगमगाते नहीं, स्थिर रहते हैं अतः अच्युत हैं। जो उनकी शरण में होता है उसे भी वे उसके मार्ग से डिगने नहीं देते
उनका संपूर्ण जीवन ही कर्त्तव्यनिष्ठा का प्रत्यक्ष उदाहरण है, चाहे वह यज्ञ में झूठी पत्तलें उठाना हो अथवा अर्जुन के सारथी के रूप में कर्त्तव्य पालन हो अथवा सांयकाल के समय घोड़ों की देखभाल करना हो।
उन्होंने बिना छोटे बड़े का विचार किये सदैव अपने कर्त्तव्य का पालन किया इसलिए भगवान ने अर्जुन की आज्ञानुसार रथ को ले जाकर दोनों सेनाओं के मध्य में खड़ा कर दिया।

1.22

यावदेतान्निरीक्षेऽहं(य्ँ), योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यम्, अस्मिन्रणसमुद्यमे॥1.22

अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना योग्य है।

विवेचन: इस युद्ध को धर्मयुद्ध कहा गया क्योंकि युद्ध के लिए कुछ नियम बनाये गए थे, जैसे पैदल सैनिक, पैदल सैनिक से युद्ध करेगा, रथी, रथी से, अश्वारोही, अश्वारोही से, निःशस्त्र पर वार नहीं होगा इत्यादि।   
इस नियम का पालन तब तक हुआ जब तक भीष्म पितामह कौरव सेना के सेनानायक थे लेकिन उनके घायल होने एवं सेनानायक के पद से हटने के उपरान्त सभी नियम ध्वस्त हो गए एवं अभिमन्यु को नियम विरुद्ध मारा गया।

युद्ध में रथ का पहिया फंसने पर कर्ण जब निःशस्त्र थे तब उन्होंने नियमों की याद दिलाई लेकिन श्रीकृष्ण ने कर्ण का उसी अवस्था में वध करने के लिए अर्जुन को कहा क्योंकि जब निहत्थे अभिमन्यु को मारा गया तब कर्ण भी उन सबके साथ थे।

इस प्रकार गीता में नियम विरुद्ध जा कर जैसे को तैसा का उपदेश भी दिया गया है एवं उसे धर्मसंगत बताया है। 

1.23

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं(य्ँ), य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धे:(र्), युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥1.23॥

दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा वाले जो ये राजा लोग इस सेना में आये हुए हैं, युद्ध करने को उतावले हुए (इन सबको) मैं देख लूँ।

 विवेचनअर्जुन के मन में उपहास था इसलिये उन्होंने कहा कि मैं यह भी देखना चाहता हूँ कि कौन - कौन हैं जो दुष्टबुद्धि, अधर्मी दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए, उसका साथ देने के लिए इस युद्ध में उपस्थित हुए है। अतः आप रथ को वहाँ ले चलिए।  

यह परिस्थिति आज भी उपस्थित होती है जब लोग सब कुछ जानते हुए भी स्वार्थवश एवं भयवश अच्छे लोगों के विरोध में एकत्र हो जाते हैं। अच्छे लोगों को परास्त करने के लिये बुराई सदैव एकत्रित हो जाती है इसलिये सदैव बुराई की संख्या अच्छाई से अधिक होती है। कौरव सौ थे और पांडव पाँच। कौरवों की सेना ग्यारह अक्षौहिणी थी जबकि पाण्डवों की सेना सात अक्षौहिणी ही थी। गीता में विषम परिस्थितियों में उचित निर्णय लेने का ज्ञान दिया गया है जो प्रत्येक काल में उपयोगी है। यहाँ बताया गया है कि कोई भी संपूर्ण रूप से बुरा नहीं होता है बस सही निर्णय लेकर अच्छाई को बढ़ाते जाना है।

1.24

सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो, गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये, स्थापयित्वा रथोत्तमम्।।1.24।।

संजय बोले - हे भरतवंशी राजन्! निद्रा विजयी अर्जुन के द्वारा इस तरह कहने पर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्य भाग में उत्तम रथ को खड़ा करके इस तरह कहा-

 विवेचनसंजय ने धृतराष्ट्र से कहा कि हे भरतवंशी राजन, निद्राविजयी अर्जुन के इस प्रकार कहने पर अन्तर्यामी भगवन श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्य पितामह भीष्म एवं आचार्य द्रोण के सम्मुख एवं सम्पूर्ण राजाओं के सामने अपने श्रेष्ठ रथ को खड़ा कर दिया।

अर्जुन के साथ यह विरोधाभास था कि वे वीर भी हैं और संवेदनशील भी और भगवान उनका मनोविज्ञान समझते हैं इसलिये उन्होंने पितामह भीष्म और गुरु द्रोण के सम्मुख रथ को ले जाकर खड़ा किया और कहा कि हे पार्थ अर्जुन, इन एकत्र हुए कुरुवंशियों एवं उनके सहयोगियों को देख लो। 

1.25

भीष्मद्रोणप्रमुखतः(स्), सर्वेषां(ञ्) च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्, समवेतान्कुरूनिति।।1.25।।

पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने इस तरह कहा कि 'हे पार्थ! इन इकट्ठे हुए कुरुवंशियों को देख'।

 विवेचनभगवान ने पितामह भीष्म एवं आचार्य द्रोण एवं सभी प्रमुख सम्बन्धियों के सम्मुख रथ को स्थापित कर के अर्जुन से कहा कि तुम इन्हें देख लो। भगवान को ज्ञात था कि अर्जुन पितामह भीष्म को अत्यधिक स्नेह करते हैं एवं भीष्म भी अर्जुन को अत्यधिक चाहते हैं। उसी प्रकार अर्जुन आचार्य द्रोण का अत्यधिक सम्मान करते हैं। वे आचार्य द्रोण के सबसे प्रिय शिष्य थे, उन्होंने अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने की प्रतिज्ञा ली थी जिसके लिये उन्होंने भी एकलव्य के साथ अनुचित व्यवहार किया। वे पक्षपाती भी थे, जब सभी शिष्य पानी लेने के लिये जाते तो वे अश्वत्थामा को चौड़े मुख का मटका देते थे जिससे वह शीघ्र वापस आ जाये और वे उसे अतिरिक्त ज्ञान सिखा सकें, परंतु अर्जुन ने एक दिन यह देख लिया और बाण के द्वारा समीप ही एक जलाशय बना लिया जिससे वे भी शीघ्र आकर अतिरिक्त ज्ञान प्राप्त कर सकें।

ऐसे अर्जुन का मन यहाँ आकर डिगने लगा। भगवान तो अन्तर्यामी हैं, वे जानते थे ऐसा होगा इसलिए  वे चाहते थे कि अर्जुन के मन का यह कोलाहल पहले ही निकल जाये। भगवान के साथ होने से अर्जुन का विषाद भी योग बन गया और तब उसे भगवान ने जीवन का ज्ञान गीता के माध्यम से दिया और अर्जुन का विषाद दूर किया।  विजय के लिए गीता का ज्ञान आज भी उतना ही उपयोगी है। 

1.26

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः(फ्), पितृ़नथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृ़न्, पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।।1.26।।

उसके पश्चात् पृथानन्दन अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित पिताओं को, पितामहों को, आचार्यों को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को भी देखा

 विवेचन - रथ के दोनों सेनाओं के मध्य में आने पर अर्जुन ने युद्ध के लिए आये हुए दोनों सेनाओं मे स्थित अपने पिताओं को,  पितामहों को , आचार्यों को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को, ससुरों को, अपने मित्रों को एवं अन्य सहृदयों को भी देखा। 

1.27

श्वशुरान्सुहृदश्चैव, सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः(स्), सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।।1.27।।

ससुरों को और सुहृदों को (देखा) अपनी अपनी जगह पर स्थित उन सम्पूर्ण बान्धवों को (देखकर) -

 विवेचनइस प्रकार अपने सभी पारिवारिक लोगों को और अपने बन्धु -बांधवों को देख कर कुन्तीपुत्र अर्जुन अत्यंत विषाद से ग्रसित हो गए, उनका चेहरा बदल गया, उसका उत्साह समाप्त हो गया और वे व्याकुल हो कर कायरता से ग्रसित होने लगे।

ज्ञानेश्वर महराज ने बताया है कि अर्जुन ने किस प्रकार तपस्या कर के अपनी धनुर्विद्या को सर्वश्रेष्ठ किया था। उन्होंने कैसे महादेव से भी युद्ध किया एवं भगवान शिव ने प्रसन्न हो कर उन्हें ब्रह्मास्त्र, दिव्यास्त्र प्रदान किये थे। ऐसे महान धनुर्धर अर्जुन को भी विषाद से ग्रषित हो कर युद्ध से विलग होना आश्चर्यजनक है, लेकिन ऐसी विकट परिस्थिति में भी श्रीकृष्ण द्वारा दिये गये गीता के ज्ञान ने ही उन्हें विजयी बनाया। 
 
इसके उपरांत इस सत्र का समापन हुआ एवं प्रश्नोत्तर सत्र प्रारम्भ हुआ।
  
प्रश्नकर्ता:  सुमित जी 

प्रश्न:  गीता में एकलव्य के कथानक का उल्लेख नहीं है, तो क्या एकलव्य की कथा काल्पनिक है ?

उत्तर: एकलव्य की कथा काल्पनिक नहीं है। यद्यपि श्रीमद्भगवद्गीता में इसका उल्लेख नहीं मिलता है। अन्य ग्रंथों में इसका उल्लेख है।  

प्रश्नकर्ता: मनीषा दीदी 

प्रश्न: किस अध्याय में भगवान के विराट रूप के बारे में बताया गया है ? 

उत्तर : एकादश अध्याय में भगवान के विराट रूप के बारे में बताया गया है। 

प्रश्न:  कर्ण का वध करने में नियम तोड़ने का क्या औचित्य था ?

उत्तर:  भगवान ने बताया है कि नियम कब तक नहीं तोड़ना है और कब उसे धर्म की स्थापना के लिए तोड़ना अधर्म नहीं है। जब एक पक्ष द्वारा नियम को तोड़ कर निःशस्त्र अभिमन्यु को कई योद्धाओं ने मार दिया तब इसके प्रति उत्तर में यदि धर्म की स्थापना के लिए नियम तोड़ना पड़े तो यह अनुचित नहीं है। यह आज के परिप्रेक्ष्य में भी सत्य है।  

अंत में वासुदेव की प्रार्थना के उपरांत सत्र का समापन हुआ।