विवेचन सारांश
कर्मयोग की व्याख्या
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्"।
यह कल-कल छल-छल बहती, क्या कहती गंगा धारा ।
भगवद्गीता मूलतः कर्मयोग के लिए ही कही गई है। अर्जुन कर्म से विमुख हो गया था और पलायन वादी हो चुका था, अपने कर्मों को छोड़कर संन्यास लेकर यह वन में जाना चाहता था। भगवद्गीता का उपदेश भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिया क्योकि अर्जुन बहुत पराक्रमी था। जीवन में पराक्रम करना हो तो कर्म करना चाहिए। कर्म वृद्धि को लाएगा लेकिन जीवन समृद्ध होना चाहिए। जीवन में वृद्धि के साथ समृद्धि भी लानी होगी। वृद्धि और समृद्धि में जो अंतर है, वह कर्म और कर्मयोग का अंतर है। कर्म में जब योग शब्द जुड़ जाता है तो वह केवल कर्म नहीं रहता वह कर्मयोग बन जाता है। भगवान ने यह नहीं कहा कि हम जो काम कर रहे हैं, वह नहीं करना है। क्या काम करने से हमारा कर्म, कर्मयोग बन जाएगा यह भगवान ने गीता में बताया है। भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन ! तू कुछ और काम मत कर। अर्जुन, जो एक वीर, पराक्रमी योद्धा था, उसे युद्ध करने के लिए ही भगवान कह रहे थे। भगवान ने उसको जप, ध्यान और साधना के लिए नहीं कहा था, युद्ध करने के लिए कहा। लेकिन वह स्वार्थ के लिए नहीं होना चाहिए। समष्टि के कल्याण का विचार होना चाहिए। स्वार्थ रहित कर्म होना चाहिए अर्जुन को लग रहा था कि वह युद्ध स्वार्थ के लिए कर रहा है। युद्ध जीतकर उसके बड़े भाई राजा बनेंगे। लेकिन भगवान कृष्ण का उद्देश्य कुछ और था।
मैं अपने घर की सफाई कर रहा हूँ। मन में अगर यह भाव आता है तो वह कर्म स्वार्थ बन गया और मन में अगर यह भाव आ जाएगा कि यह घर नहीं एक मंदिर है और मंदिर को साफ सुथरा रखना मेरा कर्त्तव्य है तो वह कर्म समष्टिगत बन जाता है।
एक बार भारत के उद्योगपति जापान में वहाँ के उद्योगों का मुआयना करने के लिए इस उद्देश्य से जापान गये कि वहाँ प्रगति कैसे हो रही है? कई कारखानों को देखा। एक दुभाषिए ने जापान के सफाई कर्मचारी से पूछा,आप क्या काम करते हैं? तो सफाई कर्मचारी ने कहा कि वह देश की अर्थव्यवस्था को समृद्ध कर रहा है। उसका जवाब सुनकर सब एक दूसरे की तरफ देखने लगे,फिर पूछने लगे कि तुम्हारा अर्थमंत्री क्या कर रहा है, यह नहीं जानना चाहता, तुम क्या कर रहे हो, यह पूछ रहे हैं। जापान के सफाई कर्मचारी ने फिर कहा कि मैं अर्थमंत्री की बात नहीं कर रहा, मैं अपनी बात कर रहा हूँ। मैं अपनी बात को समझाता हूँ। मेरा काम तो यहाँ के शौचालय साफ करने का है लेकिन यह सब मैं मन लगाकर साफ करता हूँ। मैंने यहाँ पर बगीचे से फूल भी लाकर लगा रख दिए हैं। क्योंकि जब मेरे कारखाने के कर्मचारी यहाँ पर आए तो यहाँ से प्रसन्न होकर जाएँ और कारखाने में ज्यादा मेहनत से काम करें जिससे हमारा उत्पाद और भी अच्छा होगा फिर वह निर्यात होगा उससे हमारे देश में विदेशी मुद्रा भंडार समृद्ध होगा इससे हमारा देश समृद्ध बनेगा। सफाई कर्मचारी का काम तो सफाई करने का था लेकिन उसका उद्देश्य अपने देश को समृद्ध करना था इसलिए उसका कर्म कर्मयोग बन गया। जब रोजी-रोटी के लिए व्यक्ति सफाई कर्मचारी का कार्य कर रहा है; वह तो कर्म करता है; लेकिन कर्मयोग वह होता है जो सृष्टि के लिए होता है। मेरे कार्य की तनख्वाह तो मिलती है लेकिन मेरे कार्य से देश का भी भला हो यह विचार अगर मन में हो तो वह कर्मयोग बन जाता है। कर्मयोग की व्याख्या बिल्कुल सरल है। भगवान कहते हैं ऐसे जो लोग होते हैं उन्हें बड़ा सजग रहना पड़ता है। भगवान यह सब आगे के श्लोकों में विस्तार से कहते हैं:-
3.21
यद्यदाचरति श्रेष्ठ:(स्), तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं(ङ्) कुरुते, लोकस्तदनुवर्तते॥3.21॥
सूबेदार तानाजी मालुसरे के पुत्र रायबा के विवाह की तैयारी हो रही थी। तानाजी मालुसरे छत्रपति शिवाजी महाराज को आमंत्रित करने पहुँचे। तब छत्रपति शिवाजी महाराज ने कोंढाणा पर चढ़ाई करने के लिए तानाजी की इच्छा जानना चाही। तब तानाजी ने कहा राजे मैं कोंढाणा पर आक्रमण करुँगा। अपने पुत्र रायबा के विवाह जैसे महत्वपूर्ण कार्य को महत्व न देते हुए उन्होने शिवाजी महाराज की इच्छा का मान रखते हुए कोंढाणा किला जीतना अधिक आवश्यक समझा।
शिवाजी कर्मयोगी थे। समर्थ रामदास जी शिवाजी के लिए श्रीमंतयोगी लिखते थे। यह दोनों चीजें साथ में होना कठिन है क्योंकि 'श्री' का मतलब ही लक्ष्मी है। लेकिन लक्ष्मी शुभ-लक्ष्मी होती है। दिवाली पर 'शुभ लाभ' लिखा जाता है। शुभ लाभ भी होता है पर वह लक्ष्मी श्री नहीं होती। केवल लक्ष्मी की उपासना करने से लक्ष्मी उल्लू पर बैठकर आती है लेकिन नारायण की उपासना करने पर गरुड़ पर बैठकर आती है। केवल लक्ष्मी जी की उपासना करने से उल्लू पर बैठकर आती है और सारे घर को उजाड़ कर चली जाती है लेकिन नारायण के साथ जो लक्ष्मी घर पर आती है तो वह कमला, गरूड़ वाहिनी, शुभ लक्ष्मी होती है। शिवाजी श्रीमंत के साथ कर्मयोगी भी थे।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं(न्), त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं(व्ँ), वर्त एव च कर्मणि॥3.22॥
"चदरिया झीनी रे झीनी'।
महाराष्ट्र में एक माली किसान थे खेतों में काम करते थे। जब पंढरपुर जाने का समय आता तो वर्षा आती थी और खेतों में बहुत काम होता था तब वह कहते कि यह जो शाक सब्जियाँ उगा रहा हूँ वही मेरे विठोबा हैं; वही मेरे भगवान हैं और कर्म को ही भगवान मानते थे।
गोरा कुम्हार जब पानी और मिट्टी को एक साथ रौंदते थे। वे कहते थे इसी प्रकार काया, वाचा और मन से एक ही काम करने लग जाओ तब मन में भगवान का स्मरण और जो रूप दिखाई पड़ता है वह अद्भुत होता है।
रविदास (रैदास) जूता ठीक करते हैं। वे लिखते हैं-
"मन चंगा तो कठौती में गंगा'।
भगवान के चरणों की सेवा का भाव दूसरे के जूते ठीक करते समय वे करते हैं। यदि कोई व्यक्ति जूता ठीक कराने आता तो यह सोचकर कार्य करते थे कि भगवान के चरण-कमलों की सेवा कर रहा हूँ।
भाव अगर बदल जाए तो कर्म कर्मयोग बन जाता है। भगवान कहते हैं मुझे कर्म करने की जरूरत नहीं है फिर भी मैं करता हूँ।
यदि ह्यहं(न्) न वर्तेयं(ञ्), जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते, मनुष्याः(फ्) पार्थ सर्वशः॥3.23॥
एक बहरा व्यक्ति सत्संग में प्रतिदिन जाता था। उसको बिल्कुल भी सुनाई नहीं देता तो फिर भी सत्संग में जाकर बैठता था। किसी ने पूछा- तुम्हें तो कुछ भी सुनाई नहीं देता फिर क्यों आते हो? पहले व्यक्ति ने कहा, अगर मैं नहीं आऊँगा तो मेरे परिवार के सदस्य, पुत्र - पौत्र भी नहीं आएंगे। उनको संस्कार देने के लिए ही मैं यहाँ आता हूँ।
उत्सीदेयुरिमे लोका, न कुर्यां(ङ्) कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्याम्, उपहन्यामिमाः(फ्) प्रजाः॥3.24॥
सक्ताः(ख्) कर्मण्यविद्वांसो, यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्त:(श्), चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥3.25॥
जब हमें किसी अच्छे सामाजिक कार्य में जाना हो तब जल्दी-जल्दी घर के कार्य निपटा कर वहाँ पर भी कर्म करते हैं और सेवा देते हैं। मन प्रसन्न हो जाता है। आसक्त रहित सेवा मन को प्रसन्न करती है। इसलिए आसक्ति रहित जो विद्वान होते हैं, वह लोक संग्रह करते हुए अच्छे कर्म करके सामाजिक कार्यों में योगदान देते हैं।
न बुद्धिभेदं(ञ्) जनयेद्, अज्ञानां(ङ्) कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि, विद्वान्युक्तः(स्) समाचरन्॥3.26॥
प्रकृतेः(ख्) क्रियमाणानि, गुणैः(ख्) कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा, कर्ताहमिति मन्यते॥3.27॥
एक राजा था। जब दान देता था तो उसकी आँखें भूमि की तरफ कर लेता था किसी ने पूछा कि आप ऊपर देखकर क्यों नहीं देते तो राजा ने कहा के ऊपर कर देने से लेने वाला मुझे प्रणाम करेगा इससे अहंकार बढ़ेगा। मुझे देने वाला दे रहा है और मैं दे रहा हूँ। मैं तो केवल माध्यम हूँ। देने वाला तो भगवान है और उसका दिया हुआ देने से मेरे मन में अहंकार आ जाए कि मैं दे रहा हूँ तो देने से जो पुण्य मिल रहा है; वह क्षीण हो जाएगा। इसलिए नीचे झुक जाता हूँ। जैसे-जैसे हाथ ऊपर उठते हैं; वैसे-वैसे निगाह नीचे झुक जाती है ताकि अहंकार मेरे मन को स्पर्श न करें। अहंकार तो सर्वनाश का कारण है।
तत्त्ववित्तु महाबाहो, गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त, इति मत्वा न सज्जते॥3.28॥
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः(स्), सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्, कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥3.29॥
मयि सर्वाणि कर्माणि, सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा, युध्यस्व विगतज्वरः॥3.30॥
अगर कोई बच्चा प्रथम आने के लिए पढ़ाई में मेहनत करता है तो कभी भी प्रथम नहीं आ पाता परंतु अगर प्रथम न आने की सोच कर सिर्फ मेहनत से पढ़ाई करता है तो उसकी योग्यता बढ़ जाती है और वह प्रथम भी आ जाता है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए पढ़ाई करने से सफलता मिलती है।
ये मे मतमिदं(न्) नित्यम्, अनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो, मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥3.31॥
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो, नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्, विद्धि नष्टानचेतसः॥3.32॥
सदृशं(ञ्) चेष्टते स्वस्याः(फ्), प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं(य्ँ) यान्ति भूतानि, निग्रहः(ख्) किं(ङ्) करिष्यति॥3.33॥
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे, रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्, तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥3.34॥
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
द्वेष से रहित हो जाना चाहिए किसी के लिए अपने मन में द्वेष की भावना न रखें।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः(फ्), परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं(म्) श्रेयः(फ्), परधर्मो भयावहः॥3.35॥
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं(म्), पापं(ञ्) चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय, बलादिव नियोजितः॥3.36॥
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष, रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा, विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥3.37॥
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
इन तीनों चीजों का त्याग करना बहुत बड़ा कार्य है क्योंकि यह तीनों नर्क के दरवाजे हैं- काम, क्रोध, लोभ। नरक का विवरण में लिखा होता है कि जैसे हम नरक के द्वार पर पहुँचते हैं तो खौलते तेल में डाला जाता है। वास्तव में जीते जी ही मनुष्य नरक में जाता है। जब भी क्रोध आता है हम विवेक खो देते हैं। बुद्धि से काम नहीं करते गाली गलौज से बात करते हैं। खून उबलता है तो वह नर्क के कार्य है। यह तो बहुत ही भयंकर है।
धूमेनाव्रियते वह्नि:(र्), यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भ:(स्), तथा तेनेदमावृतम्॥3.38॥
आवृतं(ञ्) ज्ञानमेतेन, ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय, दुष्पूरेणानलेन च॥3.39॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धि:(र्), अस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष, ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥3.40॥
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ, नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं(म्) प्रजहि ह्येनं(ञ्), ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥3.41॥
इन्द्रियाणि पराण्याहु:(र्), इन्द्रियेभ्यः(फ्) परं(म्) मनः।
मनसस्तु परा बुद्धि:(र्), यो बुद्धेः(फ्) परतस्तु सः॥3.42॥
एवं(म्) बुद्धेः(फ्) परं(म्) बुद्ध्वा, संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं(म्) महाबाहो, कामरूपं(न्) दुरासदम्॥3.43॥
इस प्रकार एक सुंदर ज्ञानवर्धक विवेचन भगवान के संकीर्तन के साथ समाप्त हुआ।
प्रश्नोत्तर:-
प्रश्न कर्ता :-जया दीदी
प्रश्न:- मुनि ज्ञानी होकर भी जरा सी बात पर क्रोधित होकर श्राप दे देते हैं फिर उनके ज्ञान का क्या फायदा होता है?
उत्तर:- यह बात बिल्कुल सही है। विश्वामित्र एक ऋषि थे उनको ब्रह्मर्षि होने के लिए बहुत तपस्या करनी पड़ी। उनका बार-बार पतन होता रहा। ये शरीर प्रकृति का दिया हुआ है। ऋषियों की भी अलग - अलग श्रेणी होती थी जैसे राजर्षी, महर्षि और ब्रह्मर्षि। जिसको ज्ञान हो जाए जरूरी नहीं कि उसका आचरण भी सही हो। ज्ञान होना अलग बात है और आचरण द्वारा उस मार्ग पर चलना अलग बात है। इस तरह ऋषियों को ज्ञान तो हो जाता है लेकिन उस मार्ग पर चलते-चलते उनकी प्रकृतिवश उन्हें क्रोध आ जाता है फलत: वे फिर एक सीढ़ी नीचे आ जाते थे; फिर से शुरू करना पड़ता था और यह चक्र चलता रहता था, इसलिए कहते हैं:-
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।।
इनसे हमें निकलना है इसलिए भगवान कहते हैं कि अगर तुझे कुछ भी नहीं आता तो अपने कर्म कर और उसके फल को मुझे अर्पण कर दे और आसानी से अपने मार्ग पर आगे बढ़ता रह।
प्रश्न कर्ता:- जया दीदी
उत्तर:- आम मनुष्य और मंत्री में कोई अंतर नहीं है। दोनों ही शरीर हैं। मंत्री एक पद है और इसके ऊपर अलग-अलग व्यक्ति आकर आसीन होते हैं जैसे प्रधानमंत्री कई हुए। अटल बिहारी वाजपेयी आए और अब इस पद पर नरेन्द्र मोदी हैं परंतु कुछ लोग पतित भी हो जाते हैं क्योंकि प्रकृति के राजस गुण के कारण मनुष्य में कामनाएं आ जाती हैं और यह गुण स्वार्थ और अहम् के कारण अपने आप आ जाता है। यह मार्ग रस्सी पर चलने जैसा कठिन मार्ग हैं। इस पर से कब झुक जाए, कब गिर जाए, इसका कोई भरोसा नहीं है इसी अध्याय में भगवान कहते हैं कि अखंड सावधान रहना होगा।
भगवान और देवता, अलग - अलग हैं। देवता अपनी तपस्या से पद तो प्राप्त कर लेते हैं लेकिन उस पद को पाने के बाद, उस पद पर बने रहने के लिए और तपस्या नहीं करते इसलिए उनका पतन हो जाता है फिर एक सीढ़ी नीचे गिर जाते हैं। भोग में ज्यादा भ्रमित रहते हैं। जितना ऊँचा मनुष्य जाएगा उतने ही ज्यादा मोह के क्षण आएंगे। उतने ही संकट से घिर जाएगा। ऐसे में अपने समत्व को बनाए रखना ही तो योग है। इसलिए कहते हैं:-
समत्वं योग उच्यते।
प्रश्नकर्ता:- बजरंग भैया जी।
उत्तर:- अगर अच्छा कार्य जबरदस्ती से भी हो जाता है तो भी पुण्य मिलता है और गलती से अगर गलत काम हो जाता है तो पाप भी मिलता है। पाप और पुण्य, दोनों हमें यहीं मिलेंगे। मन के भाव से पता चलता है कि हमारा जीवन कैसा था और यह इस पर निर्भर करता है कि अंतिम समय में हमारे मन में कोई कांटे नहीं रहने चाहिए। बारहवें अध्याय में भगवान कृष्ण ने कहा है कि:-
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
जीवन के अंतिम क्षण में मन में संतुष्टि होनी चाहिए। जैसे भाई का भाई से अदालत में जायदाद के लिए झगड़ा हो जाता है और एक भाई अपना अंत में हिस्सा छोड़ देता है। लेकिन अंतिम समय तक उसके मन में यह कांटा रहता है कि भाई ने मेरा हिस्सा छीन लिया और अगर मन में से यह यह कांटा निकाल दे कि उसको ज्यादा मिल गया और प्रसन्न रहे क्योंकि जमीन पाने से उतना कल्याण नहीं है जितना संतुष्टि से कल्याण है अगर लोभ का कांटा मन में रह गया तो यह कांटा मन को आत्मा से चिपकायेगा और आकांक्षा पूरी करने के लिए फिर पुनर्जन्म होगा। अगर मन, निर्मल, पवित्र और विकारों से मुक्त हो जाए तो मन आत्मा से चिपक कर नहीं जाता। आत्मा को गलत दिशा में नहीं ले जाता। मन में हमेशा एक ही विचार चलता है या तो नकारात्मकता का या सकरात्मकता का।
एक विचार जाने के बाद ही दूसरा विचार मन में आता है और जब तक विचार रहेंगे तब तक भगवान भी मन में नहीं आएंगे इसलिए सूक्ष्म- सूक्ष्म विचारों को भी मन में नहीं रखना चाहिए और तभी मन के अंदर भगवान प्रवेश कर पाएंगे।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्याय:॥