विवेचन सारांश
भगवान को पूर्णतया समर्पण ही सर्वश्रेष्ठ भक्ति

ID: 2283
हिन्दी
शनिवार, 14 जनवरी 2023
अध्याय 12: भक्तियोग
1/2 (श्लोक 1-10)
विवेचक: गीता विशारद डॉ. संजय जी मालपाणी


प्रार्थना, सुंदर विग्रह के समक्ष दीप प्रज्वलन, पूज्य स्वामी गोविंददेव गिरि जी एवं अन्य गुरुजनों की वंदना के संग आज के सत्र का शुभारंभ हुआ। बारहवां अध्याय अपने आप में एक बहुत सुंदर अध्याय है। बहुत से लोग गीता को मोक्ष का द्वार समझते हैं। वे समझते हैं कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयत्न तो बुढ़ापे के समय करना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता केवल मोक्ष का द्वार नहीं है, यह तो विजय का शास्त्र है। गीता का मूल उद्देश्य अर्जुन को उस युद्ध में जिताना था इसलिए यह ग्रंथ किसी गुफा में, हिमालय के किसी वन में अथवा किसी आश्रम में नहीं कहा गया बल्कि यह ग्रंथ रणांगन में  विजय के लिए कहा गया। यह हतप्रभ अर्जुन को जगाने का, विजय का एवं सर्वोत्तम उपबोधन अर्थात काउंसलिंग (Counselling) का भी ग्रंथ है। यह चार लोगों के संवाद का ग्रंथ है।

इसका आरंभ धृतराष्ट्र जो एक अंधे व्यक्ति हैं, उनकी उत्सुकतावश पूछे गए एक प्रश्न से होता है।

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥१॥

धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि उनके पुत्र और पाण्डु के पुत्र धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र में क्या कर रहे हैं?

 श्रीमद्भगवद्गीता र्म शब्द से शुरू होती है और अंत होती है नीतिर्मतिर्म शब्द से संजय, जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है, श्रीमद्भगवद्गीता हमें अंधत्व से दिव्यदृष्टि की ओर ले जाती है। इसमें कुल मिलाकर अठ्ठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं।

अंतिम अध्याय के अंतिम श्लोक में संजय अपने राजा से कहते हैं:

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।

मेरी मति कहती है कि जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं, धनुर्धारी पार्थ हैं, जहाँ ध्रुव नीति है, वहाँ श्री(लक्ष्मी) हैं और वहाँ विजय निश्चित है। श्रीमद्भगवद्गीता का आरंभ 'ध' शब्द से और अंत 'म' शब्द से हुआ, अर्थात धर्म की व्याख्या। इसके पहले श्लोक से अंतिम श्लोक तक धर्म की व्याख्या है। बारहवें अध्याय में भक्ति योग बताया गया है लेकिन भक्ति का यह अर्थ नहीं है कि केवल भगवान की पूजा करने वाले ही इसे समझ सकते हैं। धर्म का यह मतलब नहीं है कि हम केवल पूजा पाठ करते रहें। इसका अर्थ है  धर्म की राह पर चलना। अर्जुन हर वस्तु का त्याग करना चाहते थे, वे युद्ध छोड़ना चाहते थे। श्रीभगवान ने उन्हें उनके धर्म की राह पर चलने का उपदेश दिया, उन्हें कहा कि तुम्हारा धर्म क्षत्रिय धर्म है।

श्रीभगवान कहते हैं कि धर्म वह नहीं है जो हमें जन्म से प्राप्त होता है,  उन्होंने चारों वर्णों की रचना गुण तथा कर्म को देखकर ही की है। 

चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।

  श्रीभगवान अर्जुन से कहते हैं कि तुम धनुर्धारी हो। तुम्हारा धर्म क्षत्रिय धर्म है इसलिए संन्यास तुम्हारे लिए नहीं है। तुम्हें अपने कर्म एवं धर्म अर्थात क्षत्रिय धर्म और कर्म में कौशल लाना है। 

  स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।

श्रीभगवान ने जब यह कहा तब हम सब को यह समझना है कि हमें कौन से धर्म का पालन करना है। क्योंकि अगर हम गृहणी हैं तो हम गृहस्थ धर्म में हैं और रसोई बनाना हमारी भक्ति, कर्म और धर्म है, अगर कोई विद्यार्थी हैं तो उसका छात्र धर्म है और पढ़ाई करना उसकी भक्ति, कर्म और धर्म है, अगर कोई व्यवसायी हैं तो वह व्यवसाय ही उसका कर्म, धर्म और भक्ति है।

12.1

अर्जुन उवाच
एवं(म्) सततयुक्ता ये, भक्तास्त्वां(म्) पर्युपासते|
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं (न्), तेषां(ङ्) के योगवित्तमाः||1||

अर्जुन बोले - जो भक्त इस प्रकार (ग्यारवें अध्याय के पचपनवें श्लोक के अनुसार) निरन्तर आप में लगे रहकर आप (सगुण साकार) की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निर्गुण निराकार की ही (उपासना करते हैं), उन दोनों में से उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?

विवेचन: अर्जुन ने कहा कि हे भगवान! आप मुझे समझाइये कि कौन से भक्त आपको सबसे ज्यादा प्रिय हैं? सगुण, साकार की भक्ति करने वाले या निर्गुण, निराकार की भक्ति करने वाले? कौन से योगी आपको ज्यादा पसंद आते हैं? भक्तियोग के मार्ग पर चलने वाले या सांख्ययोग या ज्ञानयोग के मार्ग पर चलने वाले?

ऐसा ही प्रश्न यदि किसी माॅं से पूछा जाए कि तुम्हें तुम्हारा बड़ा बेटा पसंद है या छोटा बेटा पसंद है तो माॅं क्या कहेगी? अगर माॅं से कोई यह पूछ ले कि मैं किसी एक को अपने साथ ले जाना चाहता हूॅं तो वह क्या कहेगी? माॅं कहेगी कि बड़े बेटे को ले जाओ, छोटा तो मुझ पर निर्भर है। वह अपना कार्य स्वयं नहीं कर सकता, हर बात पर केवल रोने लगता है और मैं इस के रोने की आवाज से समझ जाती हूॅं कि इसे क्या चाहिए। इसे भूख लग रही है अथवा कोई और परेशानी है। ऐसा नहीं है कि माॅं को बड़ा बेटा प्रिय नहीं है। माॅं को बड़ा बेटा भी उतना ही प्रिय है जितना कि छोटा बेटा परंतु छोटा बेटा माॅं के ऊपर पूर्णतया निर्भर है इसलिए उस पर माॅं की ममता अधिक होती है। इसी प्रकार अर्जुन के ऐसे प्रश्न पर श्रीभगवान ने उत्तर दिया।

12.2

श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां(न्), नित्ययुक्ता उपासते|
श्रद्धया परयोपेता:(स्), ते मे युक्ततमा मताः||2||

श्रीभगवान् बोले - मुझ में मन को लगाकर नित्य-निरन्तर मुझ में लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी (सगुण साकार की) उपासना करते हैं, वे मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।

विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं! जो भक्त अपने आप का निवेश मेरे अंदर कर देते हैं, जो श्रद्धा से युक्त हैं और जो प्रतिदिन, हर पल, हर क्षण मेरी उपासना करते हैं, वे भक्त मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं।

उपासना का अर्थ है उप+आसना। आसन का मतलब है बैठना और उप मतलब निकट।

उपासना का अर्थ है- भगवान के निकट बैठना।
श्रद्धा का अर्थ है - विश्वास एवं अशर्त प्रेम (Unconditional love)

श्रीभगवान कहते हैं कि जिसको मुझ पर पूर्ण विश्वास है - जैसे एक छोटे बालक को अपनी माॅं पर पूर्ण विश्वास होता है कि वह उसे संभाल लेगी, उसके साथ कुछ गलत न होने देगी। यदि कोई और छोटे बालक को उठा ले तो वह रोने लग जाता है और अपनी माॅं को देखने लगता है कि मुझे उठा लो। वह जानता है कि इस नए व्यक्ति का क्या भरोसा पर मेरी माॅं मुझे संभाल लेगी। माॅं भी उसे अपनी गोदी में उठा लेती है और बच्चा तुरंत चुप हो जाता है। ऐसा विश्वास और ऐसी श्रद्धा हमें भगवान के प्रति होनी चाहिए।

क्या हमारे अंदर ऐसा विश्वास है? हमारे साथ कुछ भी गलत हो जाए तो हम सोचते हैं भगवान ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया? हम भगवान की योजना को नहीं समझ पाते। हम क्षणिक दुःख के कारण परेशान होते हैं। हम यह नहीं समझते कि आगे सब कुछ ठीक करने के लिए शायद यह क्षणिक दुःख आया है। हमें भगवान पर ऐसी श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए कि भगवान को जो स्वीकार है, वह हमें भी स्वीकार है।
यदि माॅं अपने बच्चे को तमाचा भी लगा दे तो भी बच्चा तुरंत आकर माॅं से लिपट जाता है। बच्चा समझता है कि माॅं के प्रेम के आगे यह तमाचा बहुत ही छोटी सी बात है। ऐसे ही हमें भी भगवान पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि चाहे हमारे साथ कुछ अनपेक्षित, अप्रिय घट गया है लेकिन भगवान हमें बहुत प्रेम करते हैं, वे हमारे साथ हैं और हमारे साथ कुछ गलत नहीं होने देंगे।

12.3

ये त्वक्षरमनिर्देश्यम्, अव्यक्तं(म्) पर्युपासते|
सर्वत्रगमचिन्त्यं(ञ्) च, कूटस्थमचलं(न्) ध्रुवम्||3||

और जो (अपने) इन्द्रिय समूह को वश में करके चिन्तन में न आने वाले, सब जगह परिपूर्ण, देखने में न आने वाले, निर्विकार, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की तत्परता से उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में प्रीति रखन् वाले (और) सब जगह समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं कि जो निर्गुण, निराकार की उपासना करते हैं, अर्थात जो भक्त भगवान को हर तरफ देखते हैं, उन भक्तों को भी मैं उतना ही प्रेम करता हूँ। ऐसे भक्त जो पत्थर में, प्राणियों में, जीवो में, पहाड़ों में, नदियों में, पेड़ों में, भगवान को देखते हैं उनसे भी मैं बहुत प्रेम करता हूँ।

हमारी भारतीय संस्कृति में ऐसे बहुत से उदाहरण देखने को मिलते हैं। हम प्रतिदिन तुलसीजी की पूजा करते हैं, उनमें भगवान को देखते हैं। चतुर्थी को चंद्रमा की पूजा करते हैं, उन्हें चंदामामा कहते हैं। गंगा को मैया कहते हैं। गिरि पर्वतों की पूजा करते हैं, गोवर्धन की पूजा करते हैं। हम वृक्षों की पूजा करते हैं। चराचर सृष्टि की पूजा करते हैं। पंचमहाभूतों की पूजा करते हैं, सूर्य को अर्घ्य प्रदान करते हैं। ऐसे भक्त जो मानते हैं कि भगवान केवल एक मूर्ति में नहीं है बल्कि चराचर सृष्टि में बसते हैं, ऐसे भक्त जो निर्गुण निराकार की उपासना करते हैं, उन्हें भी मैं बहुत प्रेम करता हूँ। 

भक्त प्रह्लाद से उसके पिता हिरण्यकश्यप ने पूछा कि क्या तुम्हारे भगवान इस खंभे में हैं? तो प्रह्लाद कहते हैं कि हाँ, मेरे भगवान इस खंभे में हैं। यह उनका ईश्वर के प्रति अटल विश्वास था। भगवान को भी उनके लिए खंभे में से प्रकट होना पड़ा, भगवान ने नरसिंह अवतार लिया और प्रकट हुए।

श्रीमद्भगवद्गीता हमें हर प्रकार का मार्ग दिखाती है। आप कहाँ खड़े हैं यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आपको कर्मयोग के मार्ग पर चलना है, भक्तियोग के मार्ग पर चलना है, ज्ञानयोग के मार्ग पर चलना है, आपके स्वभाव से यह तय होगा कि आपको किस मार्ग पर चलना है। अंतिम उद्देश्य अवश्य शिखर पर पहुँचना है। जैसे एवरेस्ट पर जाने के लिए अनेक मार्ग हैं, तिब्बत से भी जाया जाता है, नेपाल से भी जाया जाता है, चीन से भी जाया जाता है। आप कहाँ खड़े हैं यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, उसके अनुसार ही आपको मार्ग बताया जाएगा।

12.4

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं(म्), सर्वत्र समबुद्धयः|
ते प्राप्नुवन्ति मामेव, सर्वभूतहिते रताः||4||

जो अपनी इन्द्रियों को वश में करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में रत और सब जगह समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं कि सर्वत्र भगवान ही हैं; मन और बुद्धि से जो यह देखता है, वह भी मुझे ही प्राप्त करता है। जिनके मन में सभी प्राणियों के लिए हित की भावना होती है, जो अपनी इंद्रियों और मन को अपने वश में कर सकता है, वह भी मुझे प्राप्त करता है।

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं -हमारी पाँच इंद्रियों और छठे मन का जो यह गाँव बसा हुआ है, उसे नियंत्रित करके जो मनुष्य चिंतन में न आने वाले, सब तरह से परिपूर्ण, निर्विकार, अचल, ध्रुव, जिनका कभी विनाश नहीं होता, जो व्यक्त न हो, ऐसे ईश्वर की तत्परता से  उपासना करने वाला हो और जो व्यक्ति प्राणी मात्र के हित में प्रीति रखने वाले, सब जगह सम बुद्धि रखने वाले हों, वे मनुष्य भी मुझे ही प्राप्त होते हैं।

श्रीभगवान कहते हैं कि केवल मूर्ति पूजा करने वाले, सगुण साकार की पूजा करने वाले ही भगवान को प्राप्त होते हैं ऐसा नहीं है।

12.5

क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्, अव्यक्तासक्तचेतसाम्|
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं(न्), देहवद्भिरवाप्यते||5||

अव्यक्त में आसक्त चित्त वाले उन साधकों को (अपने साधन में) कष्ट अधिक होता है; क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्त-विषयक गति कठिनता से प्राप्त की जाती है।

विवेचन:  श्रीभगवान कहते हैं कि यह मार्ग जिसमें सभी प्राणियों में व्यक्ति मुझे ही देखता है, यह कठिन मार्ग है। सगुण साकार की भक्ति करना आसान मार्ग है। जैसे छोटा बालक माॅं पर आश्रित होता है। उसे कुछ नहीं करना होता है, माॅं को उस पर स्वयं ध्यान देना पड़ता है, उसको केवल माॅं पर विश्वास करना होता है। सारा उत्तरदायित्व माॅं का ही हो जाता है लेकिन ज्ञानमार्गी को सभी कार्य स्वयं करना है। इसलिए श्रीभगवान कहते हैं कि इस मार्ग में अधिक कष्ट हैं। अव्यक्त की उपासना करना आसान कार्य नहीं है। इस मार्ग में कई प्रकार के दुःख हैं। 

श्रीभगवान हमें दोनों रास्ते दिखाते हैं। हम निर्गुण, निराकार की भक्ति के मार्ग पर खड़े हैं या सगुण, साकार की भक्ति के मार्ग पर खड़े हैं? यह जानना बहुत जरूरी है क्योंकि हर व्यक्ति का स्वभाव अलग है। जैसे मान लीजिए हमारे किसी मित्र का हमें फोन आता है कि उसे गंगा नदी पार करनी है, वह गंगा के किनारे खड़ा है। कौन सा नाविक अनुभव में अच्छा है, वह हमसे यह पूछता है तो इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है क्योंकि यह प्रश्न ही अधूरा है। इसमें बताया है कि गंगा के तट पर खड़ा हूॅं लेकिन कौन से तट पर खड़ा हूॅं यह नहीं बताया गया है। वह ऋषिकेश में खड़ा है, गंगोत्री पर खड़ा है, हरिद्वार में खड़ा है या त्रिवेणी संगम पर खड़ा है। अगर वाराणसी में खड़ा है तो उसको वाराणसी का नाविक बताया जाएगा, इसलिए हम खड़े कहाँ हैं, यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

बारहवें अध्याय में श्रीभगवान ने भक्ति मार्ग बताया है जो सबसे सरल है, इसलिए गीता परिवार में सबसे पहले बारहवां अध्याय सिखाते हैं। सभी यह प्रश्न करते हैं कि पहले पहला अध्याय क्यों नहीं सिखाते? स्वामी जी कहते हैं पहले आसान से शुरू करना चाहिए। बारहवां अध्याय सबसे छोटा अध्याय है, केवल बीस श्लोकों का अध्याय है। उच्चारण की दृष्टि से और समझने के लिए भी सबसे सरल है।

12.6

ये तु सर्वाणि कर्माणि, मयि सन्न्यस्य मत्पराः|
अनन्येनैव योगेन, मां(न्) ध्यायन्त उपासते||6||

परन्तु जो कर्मों को मेरे अर्पण करके (और) मेरे परायण होकर अनन्य योग (सम्बन्ध) से मेरा ही ध्यान करते हुए (मेरी) उपासना करते हैं।

विवेचन: श्रीभगवान आगे कहते हैं कि जो सगुण भक्ति करने वाले लोग हैं उनको भवसागर से पार करना, उनकी मुक्ति करना मेरा कार्य है। श्रीभगवान कहते हैं कि जो संपूर्ण कर्मों को मुझे अर्पण करके मेरा ही ध्यान करते हुए हर समय मेरी उपासना करते हैं उन लोगों को भवसागर से पार करना, उनकी मुक्ति करना मेरा ही कार्य है।

12.7

तेषामहं(म्) समुद्धर्ता, मृत्युसंसारसागरात्|
भवामि नचिरात्पार्थ, मय्यावेशितचेतसाम्||7||

हे पार्थ ! मुझ में आविष्ट चित्त वाले उन भक्तों का मैं मृत्युरूप संसार-समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।

विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं कि हे पार्थ! उन भक्तों को मुझे मृत्यु रूपी संसार सागर से पार करवाना पड़ता है। भगवान राम को जब केवट ने गंगा पार करवाई तो केवट ने उनके पैर खूब रगड़ - रगड़ के धोए। वह कहने लगा कि वह जानता है कि भगवान ने अहिल्या का उद्धार किया था। आपने शिला पर अपना पैर रखा तो शिला महिला बन गई। यदि आपके पैरों में धूल रह गई तो मेरी नौका महिला बन जाएगी और यदि मेरी नौका महिला बन गई तो मेरी आजीविका चली जाएगी। लक्ष्मण देख रहे थे कि यह केवट कितना अच्छा भाग्य लेकर आया है कि यह भगवान की चरण सेवा कर रहा है क्योंकि भगवान की चरण सेवा का भाग्य किसी को भी नहीं मिला, भगवान किसी से भी चरण सेवा नहीं करवाते। यह केवट की सरलता है, उसके प्रेम का भाव है जिसके वशीभूत होकर भगवान उससे चरण सेवा करवा रहे हैं। जब वे पार उतरे, भगवान के पास उसे देने के लिए कुछ नहीं था। वे तो सब छोड़कर आए थे। भगवान को लग रहा था कि इसने हमारी सेवा की तो इसे कुछ देना चाहिए। उन्होंने अचानक सीता जी की तरफ देखा। सीता मैया ने तुरंत अपनी स्वर्ण मुद्रिका उतारी और भगवान के हाथ में रख दी कि यह दे दो। भगवान केवट को वह सोने का अलंकार देने लगे कि तुमने मुझे गंगा पार कराई है, यह तुम्हारे परिश्रम स्वरुप पारितोषिक है।

मराठी में गीत रामायण लिखी गई है जिसमें केवट गीत गा रहा है कि:

 नकोंस नौके, परत फिरूंग,नकोस गंगे ऊर भरूं,
श्रीरामांचे नाम गात या श्रीरामाला पार करूं।।

गंगा मैया थोड़ा धीरे चल, मैं राम जी का नाम लेकर, राम जी ही को गंगा पार करवा रहा हूॅं। गंगा मैया भी धीमी हो जाती हैं और केवट उनको गंगा पार करवाता है। उस पार उतारता है और प्रणाम करता है। प्रेम वश उसकी आंखों से आँसू बह रहे हैं। भगवान वह अलंकार केवट को देना चाह रहे हैं। वह कहता है मैं यह नहीं ले सकता। भगवान उसको कहते हैं कि ले लो यह तुम्हारा कार्य है, इसका पारितोषिक लेना चाहिए। केवट भोले भाव से कहता है कि आपका और मेरा एक ही काम है। भगवान पूछते हैं कैसे? मैं तो अयोध्या का राजा हूँ और तुम केवट हो। वह उत्तर देता है कि मैं गंगा पार करवाता हूॅं और आप भवसागर पार कराते हो। आज मैंने आपको गंगा पार करवाई है। जब मेरा समय आए तो आप मुझे भवसागर पार करवा दीजिएगा।

12.8

मय्येव मन आधत्स्व, मयि बुद्धिं(न्) निवेशय|
निवसिष्यसि मय्येव, अत ऊर्ध्वं(न्) न संशयः||8||

(तू) मुझ में मन को स्थापन कर (और) मुझ में ही बुद्धि को प्रविष्ट कर; इसके बाद (तू) मुझ में ही निवास करेगा (इसमें) संशय नहीं है।

विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं कि उनको भवसागर से पार कराना मेरा कार्य है, लेकिन उसके लिए एक शर्त है। भक्त का मतलब है हम सब। भगवान का मतलब यहाँ पर कृष्ण नहीं है। महाभारत में सभी जगह 'वासुदेव उवाच' है; "वसुदेव के पुत्र वासुदेव," केवल इन अठ्ठारह अध्यायों में श्रीभगवानुवाच कहा गया है।

हम सब भक्त हैं और हमारी भक्ति हमारे अपने कर्मों के प्रति, चाहे मैं गृहणी हूँ, विद्यार्थी हूँ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, यह सभी अपना - अपना कर्म करते हुए अपने धर्म के मार्ग पर ही चलते हैं। सभी की उनकी अपनी भक्ति है। विद्यार्थी धर्म है पढ़ाई करना, मातृ धर्म, पितृ धर्म है अपने बच्चों का पालन पोषण करना। पुत्र धर्म है अपने वृद्ध माता-पिता का ध्यान रखना। राष्ट्रधर्म अपने देश के हित के लिए कार्य करना है। जिसका जो धर्म है उसे उसका पूरी तरह से पालन करना चाहिए।

श्रीभगवान कहते हैं‌ कि तू मुझ में अपने मन को पूरी तरह स्थापित कर‌ और जो तेरा धर्म है उसका पूरी तरह से पालन कर। जैसे विद्यार्थी का धर्म है पढ़ाई करना तो वह अपनी पढ़ाई पर पूरी तरह मन को स्थापित करे। मन एक जगह ही केंद्रित रहना चाहिए। यदि छात्र कक्षा में बैठकर यह सोच रहा है कि घर में क्या खाना बना होगा? तो यह गलत है। मन और बुद्धि उसी जगह केंद्रित रहनी चाहिए। यदि कोई गृहणी खाना पका रही है तो उसका मन और बुद्धि पूरी तरह वहीं पर होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति इन दोनों (मन और बुद्धि) का पूरी तरह मेरे अंदर निवेश करता है तो उनकी ऊर्ध्व गति निश्चित ही होगी। जो छात्र अपनी मन और बुद्धि पूरी तरह पढ़ाई में लगाएगा उसके नंबर अच्छे आएंगे। जो गृहणी मन और बुद्धि पूरी तरह खाना पकाने में लगाएगी, उसका खाना स्वादिष्ट बनेगा। जो व्यवसायी अपनी मन और बुद्धि अपने व्यापार में लगाएगा, वह ज्यादा अच्छे से काम कर पाएगा।

हम लोग बहुत संशय से भक्ति करते हैं। भगवान हैं या नहीं हैं? हम हमेशा संशययुक्त रहते हैं। भगवान से डर के उनको प्रणाम करते हैं, प्रेमस्वरूप नहीं। श्रीभगवान कहते हैं कि आपको अपनी कुशलता (performance-index) बढ़ाना है चाहे आप कोई भी कार्य करें। श्रीभगवान कहते हैं कि जो भी कार्य करो उसमें मन और बुद्धि दोनों अच्छे से लगाओ। हम मन तो लगा लेते हैं लेकिन बुद्धि सौ सवाल करती रहती है। भगवान हैं या नहीं हैं? इस मूर्ति में हैं या नहीं? मुझसे प्यार करते हैं या नहीं?

यहाँ एक प्रसंग बताया गया। एक संत थे जिनका नाम था श्री रामशरण दास जी महाराज। वे जन्मांध थे। उनकी लौकिक दृष्टि नहीं थी परंतु अलौकिक दृष्टि थी। वे रोज शाम को टहलने जाते तो उनके साथ दो-चार भक्त भी जाते। मनमौजी थे, कभी कहीं घूमने जाते तो कभी कहीं घूमने निकल जाते। एक दिन उनके साथ चार छह लोग थे और वे एक पेड़ के नीचे आकर रुक गए और वहाँ बैठ गए। बैठे-बठे उन्होंने वहाँ से एक पत्थर उठाया। उस पत्थर पर वह अपना हाथ घुमाते रहे, उससे बातें भी करते रहे। जब निकलने का समय हुआ तो उस पत्थर से बोले कि कल मैं फिर से आऊंगा तू मेरा इंतजार करना। लोगों ने यह सारी बात सुनीं लेकिन अनदेखी कर दीं। उनमें से एक व्यक्ति अगले दिन भी उनके साथ वहीं पहुँचा। महाराज जी उसी पेड़ के नीचे आकर रुके। उसी पत्थर को उठाया और बात करने लगे कि देखो मैंने कहा था न कि मैं आऊंगा और मैं आ गया। वह व्यक्ति जो उनके साथ आया था वह तार्किक स्वभाव का होने के कारण सोचने लगा कि महाराज जी ने जरूर कदम गिने होंगे। फिर जब महाराज वापस जाने लगे तो महाराज जी ने फिर उस पत्थर से कहा मैं कल फिर आऊंगा। उस व्यक्ति की बुद्धि में संशय आ गया, ऐसा कैसे संभव है? जब वापस जाने लगे तो व्यक्ति ने पत्थर उठा लिया और उस पत्थर को दाएं हाथ की जगह बाएं हाथ में दस बीस कदम आगे डाल दिया। अगले दिन उसको बहुत उत्सुकता होने लगी कि देखें आज क्या होता है। अगले दिन महात्मा जी फिर टहलने के लिए निकले और जिस पेड़ के नीचे उसने उस पत्थर को डाला था उस पेड़ के पास रुक गए, उसी पत्थर को उठाया और कहा तुम यहाँ कैसे आ गए, तुम्हारे पैर निकल गए? उस व्यक्ति ने महाराज जी को दंडवत प्रणाम किया और कहा कि मुझे माफ कर दो, मैंने आपकी परीक्षा ली। रामशरण दास महाराज जी हंसने लगे, कहने लगे कि कोई बात नहीं। उस व्यक्ति ने कहा कि महाराज मुझे एक बात बताइए, आप इस पत्थर के पास दोबारा कैसे आ जाते हैं? महात्मा जी ने कहा कि हर पत्थर में संवेदना है। उन संवेदनाओं को जगाना पड़ता है। मैंने उस पत्थर को सहला कर उस संवेदना को जागृत कर दिया। अगले दिन जब मैं वहाँ आता हूँ तो वह मुझे अपनी ओर खींच लेता है। उस पत्थर से जो आकर्षण की लहर आती है, वह मुझे खींचती है और मैं उसके पास पहुँच जाता हूॅं।

यदि हम भी भगवान को प्रतिदिन स्नेह करें, उन्हें नहलाएं ,उन्हें नए वस्त्र पहनाएं, चंदन का टीका लगाएं, उस मूर्ति के अंदर का भगवत् तत्त्व भी अवश्य जागेगा। पंढरपुर के विठ्ठल के पास जाने के लिए लोग कोसों चलते हैं। वारी के दिन आते हैं तो लोग बेचैन हो जाते हैं कि हमें जाना है पंढरपुर। पैरों में दर्द है, शरीर साथ नहीं दे रहा लेकिन पंढरपुर जाना और विठ्ठल को माथा टेकने का आनंद ही कुछ ओर है। मन में श्रद्धा और भक्ति का जागरण होना चाहिए।

शबरी को क्या पता था कि भक्ति कैसे की जाती है? वह बचपन से लेकर बुढ़ापे तक इंतजार करती रही कि मेरे राम आएंगे। मेरे गुरुदेव ने, मातंग ऋषि ने बताया है कि वे आएंगे तो वे निश्चय ही आएंगे। शबरी के मन में शंका नहीं थी। पहले दिन उसने केवल नदी से आने वाले रास्ते की सफाई की, तीन-चार दिन ऐसे ही करती रही। फिर उसे लगा कि यह कैसे पता कि भगवान किस रास्ते से आएंगे, फिर उसने चारों तरफ के रास्ते की सफाई करनी शुरू कर दी। उसने सोचा कि जब भी भगवान आएंगे तो उनके पैरों को गर्म पानी से साफ करूँगी इसलिए चौबीसों घंटे उसके चूल्हे पर गर्म पानी रहता था। वह सोचती थी कि यह भी नहीं पता कि भगवान को क्या भाता है, तो भिन्न-भिन्न प्रकार के फल इकट्ठे करती थी और उन्हें चख कर देखती थी कि यह मीठे भी हैं या नहीं? फिर एक दिन सोचने लगी कि यह तो पूछा ही नहीं गुरुदेव से कि भगवान दिन में आएंगे या रात में। अगर रात को आ गए तो मैं तो सोती रह जाऊँगी और भगवान वापिस चले जाएंगे। इसलिए शबरी दिन रात जागती थी। जब ऐसी मन और बुद्धि समर्पित हो तो भगवान को आना ही पड़ता है। जब भगवान आए तो शबरी उनके पैरों पर गिर पड़ी, उसके आंखों से आँसू बह रहे थे। भगवान कहने लगे शबरी अब गर्म पानी की आवश्यकता नहीं। मेरा पाद प्रक्षालन तो नेत्रों के जल से ही हो गया। भगवान ने कहा तुम्हारी भक्ति श्रेष्ठतम है। शबरी ने कहा कि मैं तो भक्ति के बारे में कुछ भी नहीं समझती। मुझे भक्ति का उपदेश दो। फिर भगवान को उस परम भक्त को भक्ति का उपदेश देना पड़ा। भगवान ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया- श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य (समर्पित हो जाना), साख्य (मैत्री का भाव) और आत्मनिवेदन - यह नवधा भक्ति है। शबरी श्रेष्ठ भक्त है और भगवान को शबरी के हठवश उसको यह उपदेश देना पड़ा।

अतः हर अवस्था में मन और  बुद्धि का तारतम्य यही समत्व है। समत्व को ही भगवान ने योग कहा है। समत्वं योगमुच्यते। आगे जाकर पतंजलि ऋषि ने योग को आठ भागों में (अष्टांग योग) में विभाजित किया। अष्टांग योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि यह आठ भाग हैं और इसका मूल सूत्र हमें श्रीमद्भगवद्गीता में मिलता है। जितनी सरलता से योग का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में हुआ है, शायद ही किसी ग्रंथ, किसी शास्त्र में ऐसा हुआ हो।

इसके प्रत्येक अध्याय की पुष्पिका में भी योगशास्त्रे शब्द आता है। जैसे बारहवें अध्याय मेंं-

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ।।

श्रीभगवान ने अर्जुन से आगे कहा कि मन और बुद्धि का निवेश कठिन है। अगर तू यह नहीं कर सकता तो मैं तुझे अन्य आसान मार्ग बताता हूॅं।

12.9

अथ चित्तं(म्) समाधातुं(न्), न शक्नोषि मयि स्थिरम्|
अभ्यासयोगेन ततो, मामिच्छाप्तुं(न्) धनञ्जय||9||

अगर (तू) मन को मुझ में अचल भाव से स्थिर (अर्पण) करने में अपने को समर्थ नहीं मानता, तो हे धनञ्जय ! अभ्यास योग के द्वारा (तू) मेरी प्राप्ति की इच्छा कर।

विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं कि यदि तू अपना मन मेरे अंदर स्थिर करने में सक्षम नहीं है, तो थोड़ा - थोड़ा अभ्यास करना आरंभ कर। शुरुआत में केवल दो मिनट, पाँच मिनट अभ्यास शुरू किया जा सकता है। रोज भगवान के आगे पाँच मिनट बैठना आरंभ करें, वह पाँच मिनट पूरी तरह भगवान को समर्पित करें। ऐसा नहीं कि शरीर वहाँ बैठा है और मन कहीं ओर है। मान लीजिए आपको मोदी जी ने मिलने बुलाया है तो आप मोबाइल को बंद करके जाएंगे, वाइब्रेटर (Vibrator)भी चालू नहीं करेंगे कि मोदी जी ने बुलाया है। यहाँ तो आप भगवान से मिलने जा रहे हैं, तो जब भगवान से मिलें तो फोन को दूसरे कमरे में छोड़ कर आएं। चाहे पाँच मिनट के लिए बैठें लेकिन पूरी श्रद्धा के साथ, समर्पण के साथ। भगवान कहते हैं कि तू मेरा बनेगा तभी तो मैं तेरा बनूँगा। तेरी आंखों से आंसू गिर जाने चाहिए।

धनञ्जय यदि ऐसा प्रेम करेगा तो अवश्य मुझे प्राप्त करेगा। धनञ्जय यानी अर्जुन। जब इंद्रप्रस्थ की स्थापना की गई थी तो अर्जुन ने बहुत राजाओं के साथ युद्ध लड़कर धन इकट्ठा किया था तो उन्हें धनञ्जय के नाम से पुकारा जाता है। धनञ्जय अर्थात धन को जीतने वाला। श्रीभगवान कहते हैं! जैसे तब राजाओं से लड़ने के लिए मन और बुद्धि दोनों लगाए थे, यदि मेरी भक्ति में भी ऐसे ही मन और बुद्धि दोनों लगाओगे तो तुम निश्चय ही मुझे प्राप्त करोगे।

12.10

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि, मत्कर्मपरमो भव|
मदर्थमपि कर्माणि, कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि||10||

(अगर तू) अभ्यास (योग) में भी (अपने को) असमर्थ (पाता) है, (तो) मेरे लिये कर्म करने के परायण हो जा। मेरे लिये कर्मों को करता हुआ भी (तू) सिद्धि को प्राप्त हो जायगा।

विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं कि यदि तू अभ्यास में भी असमर्थ है, तो तू जो भी काम कर रहा है वह मेरा ही समझ कर कर। जो भी कर्म कर रहा है वह मेरे लिए कर। पढ़ाई कर रहे हो तो ऐसा सोच कर करो कि भगवान के लिए कर रहे हो। रसोई बना रहे हो तो इस भाव से बनाओ कि भगवान का भोग बना रहे हो। सुबह जागो तो भी मन में यह भाव होना चाहिए कि भगवान के लिए जग गया हूॅं। तेरी निद्रा भी मेरी समाधि बन जाए, तेरा चलना भी भगवान के लिए हो जाए।

आत्मा त्वं गिरजा मति: सहचरा:प्राणा शरीरं गृहं।
पूजा ते विषयोपभोग - रचना निद्रा समाधिस्थिति:
संचारं पदयो: प्रदक्षिण -विधि: स्तोत्राणि सर्वागिरो,
यद्मद  कर्म करोमि तत्तद्खिलं शंभो तवाराधनं। ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌

भोजन कर रहा हूँ तो ऐसा सोचो कि अपने अंदर बैठे परमात्मा को संतुष्ट करने के लिए कर रहा हूॅं। किसी से बात कर रहा हूॅं तो मन में यह भाव है कि परमात्मा से ही बात कर रहा हूॅं। भगवान कहते हैं कि यदि तुम मेरे लिए ही काम करते रहोगे तो तुम सिद्धि को प्राप्त हो जाओगे। सिद्धि का मतलब है performance-index को बढ़ाना। इसका मतलब है मैं जो भी काम कर रहा हूॅं, उस काम में कौशल प्राप्त करना। यदि आप विद्यार्थी हैं तो आप अवश्य प्रथम आएंगे लेकिन मन और बुद्धि का पूर्ण निवेश करना है। आप घर का झाड़ू भी लगा रहे हैं तो मन में यह विचार आना चाहिए कि मैं अपने घर की सफाई कर रही हूॅं ताकि मैं अपने परमात्मा को अपने घर बुला सकूॅं। हर कर्म में भगवान को जोड़ना है। जब इस भाव से आप कोई भी कार्य करेंगे तो वह बहुत ही सुंदर होगा। अगर मन में ऐसा भाव नहीं होगा तो आप कोसेंगीं कि मुझे काम करना पड़ रहा है क्योंकि आज काम वाली नहीं आई है। मन में ऐसा भाव होगा कि परमात्मा के लिए कर रहे हैं तो प्रसन्नता होगी। कहीं चाकरी भी कर रहे हैं तो यही मन में भाव होना चाहिए कि मेरा काम मेरी पूजा बन जाए। उस समय पर जो भी आपके दरवाजे पर आए तो ऐसा समझना कि भगवान ही मेरे दरवाजे पर आए हैं। यदि ऐसा सोचेंगे तो किसी के लिए भी कभी अपशब्द मुँह से नहीं निकल पाएगा।

जीवों का कलरव, दिनभर सुनने में मेरे आवे।
तेरा ही गुणगान जान, मन प्रमुदित हो सुख पावे।।
तू ही है सर्वत्र व्याप्त हरि, तुझमें सारा यह संसार,
इसी भावना से अंतर भर, मिलूँ सभी से तुझे निहार।।

प्रतिपल निज इंद्रिय समूह से, जो कुछ भी आचार करूॅं,
केवल तुझे रिझाने को बस, तेरा ही व्यवहार करूॅं।।

मेरे मन में यही आए जो भी मैं सुन रहा हूँ वह परमात्मा का ही गुणगान है और मैं उसे सुनकर सुख पाऊॅं। यदि ऐसी भावना मन में आ जाएगी तो मन निर्विकार हो जाएगा और मोक्ष की प्राप्ति होगी। मेरा हर काम तुझे रिझाने के लिए ही हो, तू प्रसन्न हो इसीलिए मैं हर काम करूॅं। यह विचार हमें अपने जीवन में, व्यवहार में लाना चाहिए। केवल गीता सीखना ही पर्याप्त नहीं है। गीता को पढ़ें, पढ़ाएं, जीवन में लाएं। यदि यह विचार हम अपने जीवन में, व्यवहार में ले आएं तो यह चाहे दिन में पाँच मिनट के लिए भी घटित हो लेकिन उस पाँच मिनट के लिए हमारा मन प्रमुदित हो जाएगा। आनंद, स्नेह और प्रेम का झरना बहने लगेगा और आप पूर्ण रूप से आनंदित हो जाएंगें।

इसके बाद प्रार्थना के साथ इस विवेचन सत्र का समापन हुआ और प्रश्नोत्तर सत्र आरंभ हुआ।

प्रश्नोत्तर

प्रश्नकर्ता: विवेकानंद जी 

प्रश्न: आपने दूसरे श्लोक में कहा कि यदि मन और बुद्धि को भगवान में समर्पित कर दें तो भगवान मिल जाएंगे। क्या ऐसा हो सकता है? 

उत्तर: अवश्य मिलेंगे। भगवान हमारे मन में ही हैं, हमारे अंदर ही हैं, उनसे मिलने के लिए हमें अपने मन से क्रोध, राग, द्वेष को मिटाना पड़ेगा। जब हमारा मन सुंदर होगा तो ही हम परमात्मा से मिल सकेंगे।

प्रश्नकर्ता: बिरेन सोनी जी

प्रश्न: आपने बताया कि गीता मोक्ष का मार्ग नहीं है अपितु विजय का मार्ग है तो मोक्ष कैसे प्राप्त होगा? यह बताएं।

उत्तर : गीता मोक्ष का मार्ग नहीं है यह सही नहीं है। गीता केवल मोक्ष का मार्ग नहीं है, विजय का भी मार्ग है। इसका अर्थ है कि मोक्ष का मार्ग तो है ही और सबसे बड़ी विजय तो मोक्ष ही है। यदि हम गीता के बताए हुए मार्ग पर चलेंगे और अपने कार्य करेंगे तो हमें निश्चय ही विजय मिलेगी और छोटी-छोटी विजय ही हमें मोक्ष की तरफ ले कर जाएगी क्योंकि हमारे मन में प्रसन्नता होगी और उसी प्रसन्नता से हमें परमात्मा की प्राप्ति होगी। हम बंधनों से मुक्त हो पाएंगे और मोक्ष की प्राप्ति होगी। 

प्रश्नकर्ता : उर्मिला गोयल जी

प्रश्न : छठे श्लोक का अर्थ बताएं?

उत्तर: जो संपूर्ण कर्मों को मुझे अर्पण करके, मेरे परायण होकर अनन्य योग से मेरा ही ध्यान करते हुए उपासना करते हैं, उन भक्तों का मैं अवश्य उद्धार करता हूँ।