विवेचन सारांश
संसार रूपी वृक्ष और जीवात्मा

ID: 257
हिन्दी
रविवार, 01 मई 2022
अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोग
1/2 (श्लोक 1-6)
विवेचक: गीता विशारद डॉ आशू जी गोयल


 प्रार्थना, दीप प्रज्वलन एवं गुरु चरण वंदना के साथ आज के सत्र का शुभारंभ किया गया। भगवान की अतिशय कृपा है कि हम लोग भगवत गीता को जानने, समझने व जीवन में लाने की ओर अग्रसर हुए हैं।  पूर्वजों की या किसी संत महात्मा की कृपा दृष्टि हम पर पड़ गई है कि हम गीता सीख रहे हैं।  गीता सीखने के लिए,  भगवान ने हमें चुना है , यह चुनाव हमारा नहीं है। जहाँ  अध्याय 12 भक्ति योग के बारे में बताता है वहाँ  अध्याय 15 पुरुषोत्तम योग के बारे में बताता है यह अध्याय ईश्वर की सम्पूर्णता के बारे में बताता है और इसलिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय  है। भगवान ने इसे स्वयं शास्त्र कहा है,  क्योंकि इसमें ईश्वर, प्रकृति व जीव की खुलकर चर्चा की गई है। 'मैं ही पुरुषोत्तम हूं ' यह भगवान ने कहा है। यदि एक ही अध्याय का पारायण करना हो तो यह अध्याय उत्तम है क्योंकि भगवान ने स्वयं इसे पुरुषोत्तम योग के रूप में प्रतिपादित किया है। 

15.1

श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधः(श्) शाखम्, अश्वत्थं(म्) प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि, यस्तं(व्ँ) वेद स वेदवित्॥15.1॥

श्रीभगवान् बोले – ऊपर की ओर मूल वाले (तथा) नीचे की ओर शाखा वाले (जिस) संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष को (प्रवाह रूप से) अव्यय कहते हैं (और) वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसार-वृक्ष को जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदों को जानने वाला है।

विवेचन:  श्रीभगवान की बड़ी अद्भुत संकल्पना है, वे  संपूर्ण ब्रह्मांड की उपमा एक उल्टे पीपल के पेड़ से करते हैं, जिसकी जड़ें अथवा मूल ऊपर एवं शाखाएं नीचे की ओर हैं। ऊर्ध्व  और अधो  के बारे में विचार करें तो यह दिशाओं तक ही सीमित नहीं है। पृथ्वी घूम रही  है अतः अंतरिक्ष से हमें इसे ऐसे नहीं देख सकते। 

स्वामी रामतीर्थ जी गणित के प्रोफेसर व् उत्कृष्ट विद्वान थे, एक बार वे अमेरिका गए जहाज के कप्तान से उनकी मित्रता हो गयी, और वे  उन्हें अपने घर ले गए, जहां उनके 8 वर्षीय बालक ने उनसे पूछा कि सरल लाइन क्या होती है? स्वामी जी ने हंसकर कहा की परीक्षा की दृष्टि से पूछ रहे हो कि वास्तविकता क्या है वह बताऐं  क्योंकि स्कूलों में तो अधूरा ही पढ़ाया गया है। जैसे रेल की पटरी सीधी है पर उन्हें बहुत अधिक बढ़ा दें  व अंतरिक्ष से देखें तो थोड़ी दूरी तक तो  सीधी दिखेंगी पर पृथ्वी गोल है अतः अंतरिक्ष से वही रेल लाइनें अंडाकार दिखेंगी। उनका यह शास्त्रार्थ न्यूयॉर्क के अनेक प्रोफ़ेसर  के साथ हुआ और उन्होंने सबके सामने सिद्ध कर दिया कि हर वस्तु शून्य  से प्रारंभ होकर शून्य में ही समाप्त हो जाती है।
शास्त्र की दृष्टि से ऊर्ध्व व अधो का अर्थ निम्न और उच्च है। मनुष्य शरीर के अंग यदि कट जाए तो वह जीवित रहता है किंतु यदि मस्तिष्क कट जाए तो मृत्यु हो जाती है, उसी प्रकार पेड़ की यदि जड़े काट दी जाएं  तो पेड़ समाप्त  हो जाएगा।अश्व का अर्थ है जो कल नहीं रहे और हर क्षण बदलता रहे पीपल का पत्ता बिल्कुल हवा नहीं चल रही है तब भी हिलता है इसी भांति संसार हर क्षण बदल रहा है हमारा शरीर मैं भी हर साढ़े तीन साल में सारी कोशिकाएं बदल जाती हैं शरीर एक सा नहीं रहता किंतु यही भगवान ने इसका विरोध में भी कह किया है कि शरीर अव्यय है नामरूप बदलता है किंतु अस्तित्व बना ही रहता है एक
कागज के टुकड़े को भी यदि हम नष्ट करना चाहे जला दें तो राख  बनेगी गला दे तो रूप बदल जाएगा किंतु वह नष्ट नहीं होगा जैसे पृथ्वी पर जनसंख्या बढ़ती जाती है किंतु पृथ्वी का वजन नहीं घटता बढ़ता उसी भांति हमारा शरीर मृत्यु के पश्चात मिट्टी में और वायु में मिल जाता है पर नष्ट नहीं होता ज्ञान अर्थात वेद इसके पत्ते हैं वेद को जानने वाला कौन है? यह एक रोचक कथा के माध्यम से स्पष्ट किया एक बार एक संत चेन्नई में एक घर में कथा कह रहे थे और सामने एक 5 वर्षीय बालक अंग्रेजी का अखबार पढ़ रहा था पूछने पर उसने बताया कि वह यह पेपर पढ़ सकता है संत ने उसे जोर से पढ़ने को कहा तो उसने टी आई एम  इ एस  ओ  एफ आई एन डी आई ए   इस तरह पढ़ना आरंभ कर दिया सबका जानना अपनी अपनी क्षमता के अनुसार होता है।

एक बार कुछ व्यक्ति गीता पर चर्चा कर रहे थे पहले अनजान व्यक्ति ने कहा यह एक पुस्तक है जिससे कोर्ट में शपथ दिलाई जाती है दूसरे ने कहा यह कृष्ण और अर्जुन का संवाद है तीसरे ने कहा इसमें 700 श्लोक हैं चौथे ने श्लोक सुना दीजिए पांचवी ने उनका अर्थ भी बता दिया क्या यह पांचों व्यक्ति भगवत गीता जानते थे? हमारे  गुरु जी ने गीता को जिया और जाना है और उसे जीवन में अपनाया भी है ।जानना मात्र पर्याप्त नहीं है जानने का स्तर तब तक पूरा नहीं होता जब तक  वह हमारे अनुभव में ना आ जाए।

15.2

अधश्चोर्ध्वं(म्) प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके।।2।।

उस संसार वृक्ष की गुणों (सत्त्व, रज और तम) के द्वारा बढ़ी हुई (तथा) विषय रूप कोंपलों वाली शाखाएँ नीचे, (मध्य में) और ऊपर (सब जगह) फैली हुई हैं। मनुष्यलोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाले मूल (भी) नीचे और (ऊपर) (सभी लोकों में) व्याप्त हो रहे हैं।

विवेचन : अश्वत्थ अर्थात पीपल के एक  काल्पनिक वृक्ष का चित्र दिखाते हुए स्पष्ट किया गया कि इस वृक्ष में सबसे ऊपर परमात्मा,  परम ब्रह्म परमात्मा जिसे हम निराकार मानते हैं वह है चाहे हम उसे किसी भी नाम से पुकारें। तना ब्रह्मा जी हैं। तीन शाखाएं क्रमशः तमोगुण, रजोगुण, सद्गुण हैं ।संपूर्ण ब्रह्मांड इन्हीं तीन गुणों से बना है ,जैसे कि तीन मूल रंग होते हैं लाल, हरा ,नीला इनसे हजारों रंग बनाए जा सकते हैं। वैसे ही इन तीन गुणों से सारा मानव जगत व  सभी जीव तथा चल अचल  बने हैं। जैसे किन्ही भी दो मानव का रेटिना, उंगलियों के निशान व स्वभाव एक सा नहीं होता। एक ही माता-पिता के बच्चों के स्वभाव भी अलग-अलग होते हैं। दो पत्ते भी एक से नहीं होते।  निर्जीव पहाड़, नदी आदि भी एक से नहीं होते यह सभी इन तीन गुणों से मिलकर बनते हैं। वृक्ष की तीनों शाखाओं में जो ऊपर की ओर जा रही हैं वह देव बीच में मनुष्य और नीचे की ओर जाती हुई शाखाएं पशु योनि बता रही हैं 84 लाख योनि मूल योनियाँ हैं, वास्तव में तो यह अनंत है 14 भुवन में से सातवें मे मनुष्य रहते हैं इसके नीचे भी सात भुवन और हैं।

तीन योनि में नभचर, जलचर और थलचर है।

जीव की उत्पत्ति 4 तरह से है-

अंडज- जो अंडे उत्पन्न से उत्पन्न होता है। 

योनिज- जो योनि से पैदा होते हैं। 

सेवज-जो पसीने आदि से पैदा होते हैं । 

ऊधभिज  -जो बीज से निकलते हैं। 

इन्हीं चार प्रकार से संपूर्ण प्रजाति का जन्म होता है। 

मनुष्य का शरीर पंचमहाभूत से बना है। देव और असुरों का नहीं। सभी कार्य पञ्च तत्वों के सम्मिश्रण से सम्पन्न हो रहे हैं जैसे,  हम मोबाइल पर विवेचन सुन रहे हैं तो यह प्रकाश तत्व और वायु तत्व के कारण हो रहा है। जीव की तीन अवस्थाएं हैं सत ,रज और तम इन तीनों से सभी जीवों  का निर्माण हुआ है। हम जैसे कर्म करते हैं वैसा फल मिलता है और फिर जीवन चलता रहता है। वह' पुनरपि  जन्मम पुनरपि मरणम।' इन्हीं में घूमते रहते हैं  इन्हीं तीन विषयों में हमारी आसक्ति है-अहन्ता ,ममता और वासना। जो मनुष्य इन तीनों गुणों को पार कर  लेता है वह गुणातीत अवस्था मे चला जाता है।

15.3

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते, नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं(म्) सुविरूढमूलम्, असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।3।।

इस संसार वृक्ष का (जैसा) रूप (देखने में आता है), वैसा यहाँ (विचार करने पर) मिलता नहीं; (क्योंकि इसका) न तो आदि है, न अन्त है और न स्थिति ही है। इसलिये इस दृढ़ मूलों वाले संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ असङ्गता रूप शस्त्र के द्वारा काटकर –

विवेचन : भगवान अर्जुन से कहते हैं कि वास्तव में संसार वैसा ही नहीं है पेड़ का आदि अंत दिखता है किंतु ब्रह्मांड का आदि अंत नहीं दिखता यह तो हर क्षण बदलता रहता है। कल्पना करें कि आप एक टूर पर गए हैं तो सबसे पहले रिसोर्ट में पहुंचकर आप अपनी पसंद की जगह ले लेते हैं और उसे अपना समझने लगते हैं पत्नी, पुत्र ,शरीर को मेरा मानने लगते हैं।" मैं" शरीर होता तो मैं की प्रवृत्ति बदलती नहीं ?शरीर हर क्षण बदल रहा है तो मैं तो नहीं बदला।

अहन्ता- गलत पदार्थों को अपना मान लेना।
ममता -कुछ को मेरा मान लेना
वासना -कुछ को वासना मानना कि उसके बिना तो रह ही नहीं सकते। 

हम इन्हीं सांसारिक चीजों से चिपक जाते हैं हम मान ही नहीं सकते कि वह हमसे अलग हो सकते हैं। हमें वैराग्य के शस्त्र इन्हें काटना होगा। अत्यंत रोचक कथा से यह बात स्पष्ट की -एक बार  वेद व्यास  जी ने अपने पुत्र शुकदेवजी जो कि बचपन से ही जंगल में रहकर वैरागी जीवन जी रहे थे और वेद शस्त्रों का अध्ययन सम्पूर्ण कर चुके थे उन्हें ज्ञान  की पूर्णता के लिए राजा जनक के पास भेजा। पिता के कहने पर वह राजा जनक के पास पहुंचे और द्वारपाल से अपने पिता व अपने बारे में अनेक अलंकार लगाकर राजा जनक को सूचना भिजवाई, राजा जनक ने उन्हें प्रतीक्षा करने को कहा। इसी प्रकार 7 दिन तक वह अपने बारे में बड़ाई  के शब्द बोलते हुए सूचना भिजवाते रहे और राजा जनक उनसे प्रतीक्षा करवाते रहें। अंत में हार कर उन्होंने द्वारपाल से कहा राजा जनक से कहो कि शुकदेव उनके दर्शन करना चाहता है, यह सुनकर राजा जनक ने उन्हें आदर पूर्वक बिठाया उनके चरणों की पूजा की और उन्हे बताया कि हमारे नगर में देवी पूजा के लिए आप उपयुक्त पात्र हैं। इस  देवी  पूजा के  लिए एक पात्र में  तेल रखकर जो ऊपर तक तेल से लबालब भरा है, आपको नगर का चक्कर लगाना है और ध्यान रहे की एक बूंद तेल भी छलकना नहीं चाहिए।  मुनि शुकदेव तेल पात्र हाथ में लेकर अनेक सैनिकों के संरक्षण में नगर में  घूमे। पथ पर कालीन बिछे हुए थे, पुष्प वर्षा हो रही थी। जब वे लौट के आए तो राजा जनक ने बहुत प्रसन्नता प्रकट  करते हुए पूछा कि आपको नगर कैसा लगा? शुकदेव जी  ने कहा वह तो कुछ देख ही नहीं पाए क्योंकि उनका पूरा ध्यान तो पात्र की ओर था कि तेल कहीं गिर ना जाए अतः उन्होंने कुछ और नहीं देखा राजा जनक ने उन्हें  समझाया कि उनकी पहली शिक्षा पूर्ण हुई। इसी भांति हमें संसार में रहना है किंतु मन को वासना में नहीं लगाना है ।

15.4

ततः(फ्) पदं(न्) तत्परिमार्गितव्यं(य्ँ) यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं(म्) पुरुषं(म्) प्रपद्ये यतः(फ्) प्रवृत्तिः(फ्) प्रसृता पुराणी॥15.4॥

उसके बाद उस परमपद (परमात्मा) की खोज करनी चाहिये जिसको प्राप्त होने पर मनुष्य फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिससे अनादिकाल से चली आने वाली (यह) सृष्टि विस्तार को प्राप्त हुई है, उस आदिपुरुष परमात्मा के ही मैं शरण हूँ।

विवेचन : जब  मन में थोड़ा वैराग्य आएगा तब ही मन को विषयों से अलग  कर सकेगें। तब अध्यात्म के लिए रुचि होगी व गुणातीत संसार में जाएंगे जिसमें गए व्यक्ति कभी लौट कर नहीं आते।

15.5

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा, अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः(स्) सुखदुःखसञ्ज्ञै:(र्), गच्छन्त्यमूढाः(फ्) पदमव्ययं(न्) तत्।।5।।

जो मान और मोह से रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्ति से होने वाले दोषों को जीत लिया है, जो नित्य-निरन्तर परमात्मा में ही लगे हुए हैं, जो (अपनी दृष्टि से) सम्पूर्ण कामनाओं से रहित हो गये हैं, जो सुख-दुःख नाम वाले द्वन्द्वों से मुक्त हो गये हैं, (ऐसे) (ऊँची स्थिति वाले) मोह रहित साधक भक्त उस अविनाशी परमपद (परमात्मा) को प्राप्त होते हैं।

विवेचन : ऐसा ध्यान करने से तीन बातें होंगी "मैं "का भाव चला जाएगा ममता से मोह छूट जाएगा और वासना का संग भी दूर हो जाएगा और तीन बातें होंगी अध्यात्म में ठहराव आ जाएगा, इच्छाओं से निवृत हो जाएंगे तथा सुख दुख में समभाव आ जाएगा तब परम पद प्राप्त हो सकेगा।

15.6

न तद्भासयते सूर्यो, न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते, तद्धाम परमं(म्) मम।।6।।

उस (परमपद) को न सूर्य, न चन्द्र (और) न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है (और) (जिसको) प्राप्त होकर जीव लौट कर (संसार में) नहीं आते, वही मेरा परम धाम है।

विवेचन : श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं कि उस  परम पद को ना सूर्य और ना ही चंद्रमा प्रकाशित कर सकता है. वह तो स्वयं ही प्रकाशित है वही मेरा परमधाम है, जहां जाकर मनुष्य कभी वापस नहीं आता।

अगले सत्र में हम वहां तक कैसे पहुंचे इस पर विस्तार से चर्चा होगी। कुछ पलों के हरिनाम संकीर्तन के संग आज के ज्ञान पूरित सत्र का समापन हुआ।