विवेचन सारांश
अनासक्ति एवं वैराग्य भगवत्प्राप्ति के साधन
गुरु वंदना एवं दीप प्रज्ज्लवन के साथ स्वयं भगवान के नाम को धारण किए हुए, अत्यंत पवित्र एवं सुंदर पुरुषोत्तमयोग नामक अध्याय का प्रारंभ हुआ।
हमारे पूर्व जन्मों के सत्कर्मों के कारण एवं गुरुजनों के आशीर्वाद से ही हम गीता जी को सुन पा रहे हैं एवं इस पवित्र यज्ञ में कार्य कर रहे हैं। पन्द्रहवाँ अध्याय अपने आप में ही एक अद्भुत अध्याय है। इस अध्याय को ही शास्त्र की उपाधि दी गई है। जब कोई बात किसी पढ़े-लिखे के द्वारा कही जाती है तो उसके शब्द अलग होते हैं। यदि यही बात किसी आचार्य या अलङ्कृत व्यक्ति के द्वारा की जाए तो उसके शब्द अति सुन्दर होते हैं। जो व्यक्ति जितना अधिक विद्वान होता है वह अपनी बात को उतने कम शब्दों में गहराई के साथ कह सकता है, किन्तु इस अध्याय को तो भगवान श्री कृष्ण जी ने स्वयं एक पुरुषोत्तम स्वरूप नाम दिया है। भगवान से अच्छा वक्ता कौन हो सकता है? उनसे अच्छा लेखक कौन हो सकता है या उनसे सुन्दर रचना किसकी हो सकती है? एक-एक शब्द की रचना में इतने रत्न भर लिए हैं कि उन्हें अभी भी खोजा जाना शेष है ।
ग्रन्थ का नियम उपन्यास जैसा नहीं होता है कि पहले पृष्ठ से आरम्भ किया और पढ़ते चले गए। ग्रन्थ में अध्याय पात्रता से एवं गुरु की आज्ञा से समझाया जाता है। जैसा उनके द्वारा निर्देशित किया गया है, वैसे ही पढ़ना चाहिए ऐसा आवश्यक तो नहीं है किंतु दीर्घकाल से महापुरुषों ने यह प्रथा विकसित की है कि गीता जी को पढ़ना है तो पहले बारहवाँ अध्याय पढ़ो, फिर पन्द्रहवांँ, फिर सोलहवांँ, फिर नवाँ पढ़ो कारण यह है कि इसे पढ़ने पर हम उसको समझ पाते हैं।
यदि हमारे घर में कोई शुभ कार्य हो, विवाह हो या फिर किसी की मृत्यु हो गई हो तब अत्यंत छोटा एवं शुभ होने के कारण हम पन्द्रहवांँ अध्याय का पाठ कर सकते हैं, सुन सकते हैं क्योंकि भगवान ने अपने पुरुषोत्तम स्वरूप का इस अध्याय में वर्णन किया है। वैसे तो यह गूढ़ परमज्ञान का अध्याय है किन्तु भगवान ने इसे इतने सुन्दर ढंग से समझाया है कि यह सभी को समझ में आ जाता है।
हमारे पूर्व जन्मों के सत्कर्मों के कारण एवं गुरुजनों के आशीर्वाद से ही हम गीता जी को सुन पा रहे हैं एवं इस पवित्र यज्ञ में कार्य कर रहे हैं। पन्द्रहवाँ अध्याय अपने आप में ही एक अद्भुत अध्याय है। इस अध्याय को ही शास्त्र की उपाधि दी गई है। जब कोई बात किसी पढ़े-लिखे के द्वारा कही जाती है तो उसके शब्द अलग होते हैं। यदि यही बात किसी आचार्य या अलङ्कृत व्यक्ति के द्वारा की जाए तो उसके शब्द अति सुन्दर होते हैं। जो व्यक्ति जितना अधिक विद्वान होता है वह अपनी बात को उतने कम शब्दों में गहराई के साथ कह सकता है, किन्तु इस अध्याय को तो भगवान श्री कृष्ण जी ने स्वयं एक पुरुषोत्तम स्वरूप नाम दिया है। भगवान से अच्छा वक्ता कौन हो सकता है? उनसे अच्छा लेखक कौन हो सकता है या उनसे सुन्दर रचना किसकी हो सकती है? एक-एक शब्द की रचना में इतने रत्न भर लिए हैं कि उन्हें अभी भी खोजा जाना शेष है ।
ग्रन्थ का नियम उपन्यास जैसा नहीं होता है कि पहले पृष्ठ से आरम्भ किया और पढ़ते चले गए। ग्रन्थ में अध्याय पात्रता से एवं गुरु की आज्ञा से समझाया जाता है। जैसा उनके द्वारा निर्देशित किया गया है, वैसे ही पढ़ना चाहिए ऐसा आवश्यक तो नहीं है किंतु दीर्घकाल से महापुरुषों ने यह प्रथा विकसित की है कि गीता जी को पढ़ना है तो पहले बारहवाँ अध्याय पढ़ो, फिर पन्द्रहवांँ, फिर सोलहवांँ, फिर नवाँ पढ़ो कारण यह है कि इसे पढ़ने पर हम उसको समझ पाते हैं।
यदि हमारे घर में कोई शुभ कार्य हो, विवाह हो या फिर किसी की मृत्यु हो गई हो तब अत्यंत छोटा एवं शुभ होने के कारण हम पन्द्रहवांँ अध्याय का पाठ कर सकते हैं, सुन सकते हैं क्योंकि भगवान ने अपने पुरुषोत्तम स्वरूप का इस अध्याय में वर्णन किया है। वैसे तो यह गूढ़ परमज्ञान का अध्याय है किन्तु भगवान ने इसे इतने सुन्दर ढंग से समझाया है कि यह सभी को समझ में आ जाता है।
15.1
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधः(श्) शाखम्, अश्वत्थं(म्) प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि, यस्तं(व्ँ) वेद स वेदवित्॥15.1॥
श्रीभगवान् बोले – ऊपर की ओर मूल वाले (तथा) नीचे की ओर शाखा वाले (जिस) संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष को (प्रवाह रूप से) अव्यय कहते हैं (और) वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसार-वृक्ष को जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदों को जानने वाला है।
विवेचन:- इस अध्याय को समझाने के लिए भगवान ने इसमें रूपक के रूप में संपूर्ण ब्रह्माण्ड की तुलना पीपल के पेड़ से की है। ऐसा पेड़ जिसकी जड़ें ऊपर की ओर है एवं शाखाएँ नीचे की ओर। इसमें ऊपर का अर्थ समझने के लिए जैसे कि कोई विद्यार्थी दूसरी कक्षा को पास करके तीसरी कक्षा में गया तो हम कहेंगे कि वह ऊपर की ओर चला गया, हो सकता है तीसरी कक्षा सबसे निचली मंजिल पर लगती हो और दूसरी कक्षा उसके ऊपर इसमें ऊपर का अर्थ ऊपर न मान के उच्च अवस्था माना जाएगा।
स्वामी रामतीर्थ जी शताब्दी के श्रेष्ठतम चिंतकों में थे। वे अमेरिका गए तब वह चौदह दिन तक बिना सामान के रहे। उन्होंने गणित में विश्व रिकॉर्ड बनाया था। अंग्रेजों के समय में उनके गणित के पेपर में सौ में से सौ नंबर आए थे। वह गणित के बहुत बड़े ज्ञाता थे। जहाज के कैप्टन जब उनसे मिले और उन्होंने स्वामी जी से पूछा कि आप कहाँ रहेंगे एवं आपके पास क्या सामान है? स्वामी जी के पास कोई सामान नहीं था तब उन्होंने कैप्टन से कहा कि क्या आप मेरा स्वागत अपने घर पर नहीं करना चाहेंगे? जहाज के कैप्टन चौदह दिन उनके साथ रहे थे, वह स्वामी जी के स्वभाव से प्रभावित थे। वह उन्हें अपने घर ले गए एवं भोजन करवाया। उसी समय उनका बालक गणित के प्रश्न लेकर आया, प्रश्न था कि सरल रेखा क्या होती है? कैप्टन ने बालक को स्वामी जी के पास भेजा और स्वामी जी से कहा कि आप उसका उत्तर बताइए। स्वामी रामतीर्थ जी ने बोला कि मैं सही उत्तर बताऊँ या फिर परीक्षा में पास होने वाला उत्तर बताऊँ? कैप्टन ने कहा आप क्या कहना चाहते हैं, हम बच्चों को गलत पढ़ाते हैं। तब स्वामी जी ने कहा कि गलत नहीं पढ़ाते किन्तु अधूरा होता है, उन्होंने बताया कि यदि दो बिन्दु को एक सीधी रेखा में मिला दिया जाए तो उस रेखा को सरल रेखा कहते हैं, यह सही है, किन्तु इसका आधार लेना पड़ेगा। यदि हम इसका आधार भूमि को लेते हैं या फिर इन दो बिन्दुओं को मिलाया जाए तो वह रेखा दिखेगी तो सीधी पर पृथ्वी गोल है इसलिए वह आकाश से देखने पर सीधी दिखाई नहीं देगी। इस बात को सुनकर बड़े-बड़े गणितज्ञ आए। इस बात पर तीन दिन तक वाद-प्रतिवाद चला एवं बड़े-बड़े गणितज्ञ ने अपना पक्ष रखा किन्तु अन्त में स्वामी रामतीर्थ जी ने यह सिद्ध कर दिया कि जो कुछ भी संसार में दिखाई देता है वह शून्य हैं और कुछ भी नहीं। स्वामी जी बिना किसी परिचय के पहुँचे थे और पहुँचने के चौदहवें दिन स्वामी रामतीर्थ जी ने वहाँ के राष्ट्रपति के साथ डिनर किया। यह भारत के साधु के लक्षण होते हैं। यह जो वृक्ष है इसकी शाखाएँ नीचे की ओर हैं एवं जड़ ऊपर की ओर है। यदि हम पेड़ की पत्तियों को, फूलों को काट देंगे तो पेड़ फिर से पूरा हो सकता है किन्तु यदि मूल को हानि पहुँचा दी जाए तो वह पेड़ नष्ट हो जाता है। उसी तरह यदि मनुष्य में उसके हाथ पैरों में कुछ हो जाए तो वह जीवित रह सकता है किन्तु सिर को अलग कर दिया जाए तो वह जीवित नहीं रह सकता। इसी प्रकार यह संसार वृक्ष का स्वरूप भी है इसकी जड़ ऊपर की ओर है शाखाएँ नीचे की ओर हैं। संसार प्रतिक्षण बदल रहा है। पीपल के पत्ते की एक विशेषता होती है कि सारे पत्तों से अलग होता है। यदि हवा नहीं चल रही है तब भी पीपल का पत्ता हिलता रहता हैै, उसमें निरन्तर कम्पन होता रहता है। इस संसार में कुछ भी नष्ट नहीं होता। उसका स्वरूप बदल सकता है। यदि हमें कागज को नष्ट करके दिखाना हो तो यदि हम उसको फाड़ देंगे तो उसके टुकड़े हो जाएँगे, यदि हम उसको जला देंगे तो वह कार्बन बन जाएगा और यदि हम उसको भिगो देंगे तो वह लुगदी बन जाएगा। कुछ न कुछ रूप परिवर्तित कर लेगा किन्तु नष्ट नहीं होगा। उसी प्रकार पञ्चमहाभूूतों से बने शरीर में आत्मा भी कभी नष्ट नहीं होती। शरीर का स्वरूप परिवर्तित होता रहता है। जो इसको जान लेता है वही परम पद को प्राप्त कर लेता है।
एक बार स्वामी जी महाराज चेन्नई गए। वहाँ एक पाँच वर्ष का बालक अंग्रेजी का पेपर पढ रहा था, उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ, उन्होंने बच्चे से पूछा क्या तुम्हें अंग्रेजी पढ़ना आती है? उसने कहा हाँ। क्या तुम पेपर पढ़ लेते हो? उसने कहा हाँ। स्वामी जी ने उससे बोला कि पढ़ कर बताओ, तो उस बच्चे ने बोला टी एच इ टी आई एम इ ओ एफ आई एन डी आई ए ( the time of India) बच्चे को शब्द बनाना नहीं आते थे, बच्चे को एबीसीडी आती थी वह उस पेपर में एबीसीडी ही पढ़ रहा था अतः वह बच्चा अपनी दृष्टि में ज्ञानी है किन्तु वह स्वामी जी की दृष्टि में पूर्ण रूप से ज्ञानी नहीं है, यदि हम गीता जी के बारे अलग-अलग व्यक्तियों से पूछेंगे कि आप गीता जी के बारे में कितना जानतें हैं तो कोई बोलेगा कि गीता जी पर हाथ रखकर कसम खिलाई जाती है, कोई बोलेगा मुझे गीता के श्लोक आते हैं, कोई बोलेगा मुझे गीता जी का अर्थ भी पता है और कोई बोलेगा कि हम उसे जीवन में उतारते हैं, इन सबका जानना अलग-अलग है किन्तु इनका जानना, जवाब पूरी तरह सही नहीं है। अतः हमारा जानना उस पाँच वर्ष के बच्चे के समान है, उसे समझ में तो नहीं आया किन्तु वह समझता है कि उसे सब ज्ञान है। इसी तरह गीता जी को समझने के लिए भी इस संसार वृक्ष को समझना अति आवश्यक है।
स्वामी रामतीर्थ जी शताब्दी के श्रेष्ठतम चिंतकों में थे। वे अमेरिका गए तब वह चौदह दिन तक बिना सामान के रहे। उन्होंने गणित में विश्व रिकॉर्ड बनाया था। अंग्रेजों के समय में उनके गणित के पेपर में सौ में से सौ नंबर आए थे। वह गणित के बहुत बड़े ज्ञाता थे। जहाज के कैप्टन जब उनसे मिले और उन्होंने स्वामी जी से पूछा कि आप कहाँ रहेंगे एवं आपके पास क्या सामान है? स्वामी जी के पास कोई सामान नहीं था तब उन्होंने कैप्टन से कहा कि क्या आप मेरा स्वागत अपने घर पर नहीं करना चाहेंगे? जहाज के कैप्टन चौदह दिन उनके साथ रहे थे, वह स्वामी जी के स्वभाव से प्रभावित थे। वह उन्हें अपने घर ले गए एवं भोजन करवाया। उसी समय उनका बालक गणित के प्रश्न लेकर आया, प्रश्न था कि सरल रेखा क्या होती है? कैप्टन ने बालक को स्वामी जी के पास भेजा और स्वामी जी से कहा कि आप उसका उत्तर बताइए। स्वामी रामतीर्थ जी ने बोला कि मैं सही उत्तर बताऊँ या फिर परीक्षा में पास होने वाला उत्तर बताऊँ? कैप्टन ने कहा आप क्या कहना चाहते हैं, हम बच्चों को गलत पढ़ाते हैं। तब स्वामी जी ने कहा कि गलत नहीं पढ़ाते किन्तु अधूरा होता है, उन्होंने बताया कि यदि दो बिन्दु को एक सीधी रेखा में मिला दिया जाए तो उस रेखा को सरल रेखा कहते हैं, यह सही है, किन्तु इसका आधार लेना पड़ेगा। यदि हम इसका आधार भूमि को लेते हैं या फिर इन दो बिन्दुओं को मिलाया जाए तो वह रेखा दिखेगी तो सीधी पर पृथ्वी गोल है इसलिए वह आकाश से देखने पर सीधी दिखाई नहीं देगी। इस बात को सुनकर बड़े-बड़े गणितज्ञ आए। इस बात पर तीन दिन तक वाद-प्रतिवाद चला एवं बड़े-बड़े गणितज्ञ ने अपना पक्ष रखा किन्तु अन्त में स्वामी रामतीर्थ जी ने यह सिद्ध कर दिया कि जो कुछ भी संसार में दिखाई देता है वह शून्य हैं और कुछ भी नहीं। स्वामी जी बिना किसी परिचय के पहुँचे थे और पहुँचने के चौदहवें दिन स्वामी रामतीर्थ जी ने वहाँ के राष्ट्रपति के साथ डिनर किया। यह भारत के साधु के लक्षण होते हैं। यह जो वृक्ष है इसकी शाखाएँ नीचे की ओर हैं एवं जड़ ऊपर की ओर है। यदि हम पेड़ की पत्तियों को, फूलों को काट देंगे तो पेड़ फिर से पूरा हो सकता है किन्तु यदि मूल को हानि पहुँचा दी जाए तो वह पेड़ नष्ट हो जाता है। उसी तरह यदि मनुष्य में उसके हाथ पैरों में कुछ हो जाए तो वह जीवित रह सकता है किन्तु सिर को अलग कर दिया जाए तो वह जीवित नहीं रह सकता। इसी प्रकार यह संसार वृक्ष का स्वरूप भी है इसकी जड़ ऊपर की ओर है शाखाएँ नीचे की ओर हैं। संसार प्रतिक्षण बदल रहा है। पीपल के पत्ते की एक विशेषता होती है कि सारे पत्तों से अलग होता है। यदि हवा नहीं चल रही है तब भी पीपल का पत्ता हिलता रहता हैै, उसमें निरन्तर कम्पन होता रहता है। इस संसार में कुछ भी नष्ट नहीं होता। उसका स्वरूप बदल सकता है। यदि हमें कागज को नष्ट करके दिखाना हो तो यदि हम उसको फाड़ देंगे तो उसके टुकड़े हो जाएँगे, यदि हम उसको जला देंगे तो वह कार्बन बन जाएगा और यदि हम उसको भिगो देंगे तो वह लुगदी बन जाएगा। कुछ न कुछ रूप परिवर्तित कर लेगा किन्तु नष्ट नहीं होगा। उसी प्रकार पञ्चमहाभूूतों से बने शरीर में आत्मा भी कभी नष्ट नहीं होती। शरीर का स्वरूप परिवर्तित होता रहता है। जो इसको जान लेता है वही परम पद को प्राप्त कर लेता है।
एक बार स्वामी जी महाराज चेन्नई गए। वहाँ एक पाँच वर्ष का बालक अंग्रेजी का पेपर पढ रहा था, उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ, उन्होंने बच्चे से पूछा क्या तुम्हें अंग्रेजी पढ़ना आती है? उसने कहा हाँ। क्या तुम पेपर पढ़ लेते हो? उसने कहा हाँ। स्वामी जी ने उससे बोला कि पढ़ कर बताओ, तो उस बच्चे ने बोला टी एच इ टी आई एम इ ओ एफ आई एन डी आई ए ( the time of India) बच्चे को शब्द बनाना नहीं आते थे, बच्चे को एबीसीडी आती थी वह उस पेपर में एबीसीडी ही पढ़ रहा था अतः वह बच्चा अपनी दृष्टि में ज्ञानी है किन्तु वह स्वामी जी की दृष्टि में पूर्ण रूप से ज्ञानी नहीं है, यदि हम गीता जी के बारे अलग-अलग व्यक्तियों से पूछेंगे कि आप गीता जी के बारे में कितना जानतें हैं तो कोई बोलेगा कि गीता जी पर हाथ रखकर कसम खिलाई जाती है, कोई बोलेगा मुझे गीता के श्लोक आते हैं, कोई बोलेगा मुझे गीता जी का अर्थ भी पता है और कोई बोलेगा कि हम उसे जीवन में उतारते हैं, इन सबका जानना अलग-अलग है किन्तु इनका जानना, जवाब पूरी तरह सही नहीं है। अतः हमारा जानना उस पाँच वर्ष के बच्चे के समान है, उसे समझ में तो नहीं आया किन्तु वह समझता है कि उसे सब ज्ञान है। इसी तरह गीता जी को समझने के लिए भी इस संसार वृक्ष को समझना अति आवश्यक है।
अधश्चोर्ध्वं(म्) प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके।।2।।
उस संसार वृक्ष की गुणों (सत्त्व, रज और तम) के द्वारा बढ़ी हुई (तथा) विषय रूप कोंपलों वाली शाखाएँ नीचे, (मध्य में) और ऊपर (सब जगह) फैली हुई हैं। मनुष्यलोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाले मूल (भी) नीचे और (ऊपर) (सभी लोकों में) व्याप्त हो रहे हैं।
विवेचन:- विषय प्रवाला का अर्थ है कि जब किसी वृक्ष में नया फूल आना प्रारंभ होता है या वह फूटता है तो उसे प्रवाला कहते हैं। यह संसार रूपी वृक्ष है किन्तु उसकी जड़ ऊपर की ओर है जिसमें ईश्वर निराकार, साकार रूप में है। ब्रह्मा जिसका तना है एवं देव, मनुष्य और तियर्क् आदि योनि है। अहंता, ममता और वासना इन तीनों एवं सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों से मिलकर यह बना हुआ है किन्तु स्वभाव शब्द स्पर्श, रूप, रस, गंध सभी से मिलकर जीवों का निर्माण होता है और एक भी वस्तु आपस में समान नहीं होती। पूरी सृष्टि में आज तक कोई भी आपस में समान नहीं है। सभी में कोई न कोई अतंर है। रूप, रंग, रस भिन्न-भिन्न हैं और शब्द, रूप, रंग, स्पर्श से मिलकर यह पूरा विशाल वृक्ष बना हुआ है। ग्रन्थियों के सहारे सभी योनि अपने काम करती हैं। सर्प अपनी जिह्वा से ही पता लगा लेता है कि आस-पास में कोई शिकार है। चमगादड़ की आंँखें एवं कान सामान्य नहीं होते किंतु ध्वनि तरङ्गो के द्वारा ही बहुत ऊपर तक उड़ सकती है बिना किसी से टकराए ऊँचाई तक चली जाती है। रडार का आविष्कार चमगादड़ को देखकर ही हुआ है। अतः इस वृक्ष की जड़ें परमात्मा की जड़ें हैं। यदि मनुष्य के हाथ-पैरों को कुछ क्षति होती है तो वह जीवित रह सकता है किन्तु उसके सिर को काट दिया जाए तो वह जीवित नहीं रह सकता। इसी प्रकार इस व्यक्ति की जड़ें परमात्मा है, यदि परमात्मा को हटा दिया जाए तो फिर जीवन सम्भव नहीं है। अतः उपरोक्त ग्रन्थियों का साथ लेते हुए, जीव की तीनों अवस्था सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण इसमें जिस गुण की वृद्धि होती है मनुष्य उसी रूप से आगे बढ़ता है। यदि सतोगुण बढ़ा हुआ होता है तो वह प्रकाश एवं ऊर्जा की ओर बढ़ेगा एवं देवत्व को प्राप्त होगा यदि रजोगुण बढ़ा हुआ होता है तो वो मध्यम गति से बढ़ेगा, मनुष्य योनि को प्राप्त होगा एवं तमोगुण बढा़ है तो उसकी अधोगति होगी। ऐसा विचित्र यह संसार है। इसमें तीनों गुणों को समझ कर एवं परम आनंद को प्राप्त करते हुए ही जीवन चक्र से मुक्त हुआ जा सकता है।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते, नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं(म्) सुविरूढमूलम्, असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।3।।
इस संसार वृक्ष का (जैसा) रूप (देखने में आता है), वैसा यहाँ (विचार करने पर) मिलता नहीं; (क्योंकि इसका) न तो आदि है, न अन्त है और न स्थिति ही है। इसलिये इस दृढ़ मूलों वाले संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ असङ्गता रूप शस्त्र के द्वारा काटकर –
विवेचन:- इस ब्रह्माण्ड का कोई अन्त नहीं है, न आदि है न कोई आकार है इसलिये इसे वैराग्य रूपी शस्त्रों के द्वारा ही काटा जा सकता है। अतः अहन्ता, ममता एवं वासना इन तीन चरणों में घिरे रहते हैं। जिसके कारण वैराग्य की कुल्हाड़ी से ही हम इस वृक्ष को काट सकते हैं। हमें अपने बचपन की फोटो दिखाई जाए किन्तु फोटो को हमने पहले देखा न हो तो हम पहचानेंगे नहीं कि वह हम ही हैं। वह हमेशा बदल रहा है किंतु मैं एक शरीर हूँ यही अहन्ता है। उसके बाद मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, मेरा व्यवसाय, मेरा घर, मेरा सामान यह सब ममता है और उसके बाद जो मुझे मिल गया है वह जाने न पाए और जो मैं सोचूँ वह मुझे मिल जाए यह सोचना ही वासना है। इन तीनों में उलझ कर ही व्यक्ति मुक्त नहीं हो पाता है। इनसे मुक्त होने के लिए वैराग्य होना अति आवश्यक है।
शुकदेव महाराज जी का प्रसंग है- उन्होंने परीक्षित जी को भागवत् सुनाई थी लेकिन उनके पिताजी वेदव्यास जी को लगा कि शुकदेव जी का ज्ञान अभी पूर्ण नहीं है, उनको अगर यदि ज्ञान की पूर्णता करना है तो गुरु के पास जाना चाहिए। वेदव्यास जी ने उन्हें कहा कि तुम राजा जनक के पास जाओ वहाँ से ज्ञान लेकर आओ। शुकदेव जी ने कहा कि मैं जीवन भर वैराग्य में रहने वाला राजा के पास जाकर ज्ञान लेकर आऊँ, यह कैसे सम्भव है किन्तु पिताजी ने आज्ञा दी है तो जाना पडेगा।
वह राजा जनक के दरबार में पहुँचे एवं द्वारपाल को कहा कि जाओ जाकर राजा जनक जी को बोलो कि परम सन्त, परम बैरागी, परम ज्ञानी एवं महान ज्ञाता सुखदेव मुनि जी आपके दर्शन के लिए पधारे हैं। द्वारपाल ने जाकर जनक जी को जब यह परिचय दिया तो जनक जी बोले कि उन्हें बोलिए कि प्रतीक्षा करें। जनक जी किसी सन्त को प्रतीक्षा करवाएँ, ऐसा उनका व्यवहार नहीं था किन्तु फिर भी उन्होंने ऐसा किया। द्वारपाल ने जाकर शुकदेव जी को बताया महाराज ने उन्हें प्रतीक्षा करने का कहा है। सुबह से शाम हो गई। शाम को दूसरा द्वारपाल आया शुकदेव जी ने सोचा कि हो सकता हो महाराज जनक भूल गए हों। तब उन्होंने दूसरे द्वारपाल को भी वही कहा कि जाओ महाराज को बताओ परम ज्ञानी, परम सन्त शुकदेव जी आपसे मिलने आए हैं। द्वारपाल ने आकर फिर से यही उत्तर दिया कि महाराज ने कहा है, प्रतीक्षा करिए। इस तरह सात दिन बीत गए इन सात दिनों में एक बात हुई कि सात दिन पहले जो चौदह उपाधि थी वह दस हो गई, तीसरे दिन उपाधि नौ, पाँचवे दिन आठ और सातवें दिन पूर्णतः खत्म हो गई। सातवें दिन उन्होंने द्वारपाल को कहा कि जाओ महाराज जी को बोलो कि सुखदेव आपके दर्शन करना चाहते हैं। जब उन्होंने सभी उपाधि छोड़ दी तो राजा जनक ने कहा आइए बैठिए उन्हें आसन दिया एवं उनके पैरों को धुलाया अर्ध्य दिया एवं कहा कि मेरा भाग्य कि मुझे आपके दर्शन मिले। सुखदेव जी सोचने लगे कि मुझे सात दिन प्रतीक्षा करवाने के बाद यह इस तरह की बातें कर रहे हैं। किन्तु वह कुछ नहीं बोले।
जनक जी ने उन्हें कहा कि आप बहुत शुभ दिन आए हैं आज देवी की पूजा है। उस देवी की पूजा का नियम है कि किसी व्यक्ति को पन्द्रह किलो तेल का पात्र उठाकर पूरे नगर में घूमना है और एक भी बूँद तेल गिरना नहीं चाहिए उसी तेल से देवी की पूजा होगी। अतः हम चाहते हैं कि यह शुभ कार्य आपके हाथों हो। शुकदेव जी सोच में पड़ गए पर उन्होंने मना नहीं किया और वह पूरा तेल का पात्र लेकर नगर में निकले उन पर पुष्प वर्षा की गई, सुगन्धित जल छिड़का गया एवं बहुत से लोग उन्हें देखने के लिए खड़े रहे। पूरी तन्मयता से घूमने के बाद छः घण्टे में वह तेल से भरा पात्र वापस लेकर पहुँचे। उनके हाथ लाल हो गए थे एवं पैर में छाले पड़ गए थे। जनक जी ने शुकदेव जी से कहा कि आपने बहुत ही शुभ काम किया है, आपको हमारा नगर कैसा लगा? शुकदेव जी ने कहा कि मैंने नगर को नहीं देखा। जनक जी बोले कि पूरे नगर को इतना सुन्दर सजाया गया था। इतने सारे फव्वारे थे, हाथी थे, इतनी सुन्दर सजावट थी। तब शुकदेव जी बोले कि मेरे हाथों में तेल था, मैंने आस-पास कुछ भी नहीं देखा क्योंकि मेरा पूरा ध्यान तेल के ऊपर ही था। तब जनक जी बोले कि आपने पहला अध्याय सीख लिया है कि," मैं जल में रहूँ तो ऐसे रहूँ जैसे कमल का फूल रहे" कमल का फूल जल में रहकर भी उससे विरक्त होता है अतः जिस व्यक्ति का संसार में रहकर भी मोह पति, पत्नी, पुत्रों, पिता में नहीं रहता वह उनके साथ रहते हुए भी अपने कर्त्त्व्य का पालन करते हुए उस परमात्मा में ही लगा रहता है। ऐसा व्यक्ति ही परम पद को प्राप्त करता है एवं संसार में रहकर भी संसार में बँधा नहीं होता है, अतः शुकदेव जी को ज्ञान प्राप्त हो गया।
शुकदेव महाराज जी का प्रसंग है- उन्होंने परीक्षित जी को भागवत् सुनाई थी लेकिन उनके पिताजी वेदव्यास जी को लगा कि शुकदेव जी का ज्ञान अभी पूर्ण नहीं है, उनको अगर यदि ज्ञान की पूर्णता करना है तो गुरु के पास जाना चाहिए। वेदव्यास जी ने उन्हें कहा कि तुम राजा जनक के पास जाओ वहाँ से ज्ञान लेकर आओ। शुकदेव जी ने कहा कि मैं जीवन भर वैराग्य में रहने वाला राजा के पास जाकर ज्ञान लेकर आऊँ, यह कैसे सम्भव है किन्तु पिताजी ने आज्ञा दी है तो जाना पडेगा।
वह राजा जनक के दरबार में पहुँचे एवं द्वारपाल को कहा कि जाओ जाकर राजा जनक जी को बोलो कि परम सन्त, परम बैरागी, परम ज्ञानी एवं महान ज्ञाता सुखदेव मुनि जी आपके दर्शन के लिए पधारे हैं। द्वारपाल ने जाकर जनक जी को जब यह परिचय दिया तो जनक जी बोले कि उन्हें बोलिए कि प्रतीक्षा करें। जनक जी किसी सन्त को प्रतीक्षा करवाएँ, ऐसा उनका व्यवहार नहीं था किन्तु फिर भी उन्होंने ऐसा किया। द्वारपाल ने जाकर शुकदेव जी को बताया महाराज ने उन्हें प्रतीक्षा करने का कहा है। सुबह से शाम हो गई। शाम को दूसरा द्वारपाल आया शुकदेव जी ने सोचा कि हो सकता हो महाराज जनक भूल गए हों। तब उन्होंने दूसरे द्वारपाल को भी वही कहा कि जाओ महाराज को बताओ परम ज्ञानी, परम सन्त शुकदेव जी आपसे मिलने आए हैं। द्वारपाल ने आकर फिर से यही उत्तर दिया कि महाराज ने कहा है, प्रतीक्षा करिए। इस तरह सात दिन बीत गए इन सात दिनों में एक बात हुई कि सात दिन पहले जो चौदह उपाधि थी वह दस हो गई, तीसरे दिन उपाधि नौ, पाँचवे दिन आठ और सातवें दिन पूर्णतः खत्म हो गई। सातवें दिन उन्होंने द्वारपाल को कहा कि जाओ महाराज जी को बोलो कि सुखदेव आपके दर्शन करना चाहते हैं। जब उन्होंने सभी उपाधि छोड़ दी तो राजा जनक ने कहा आइए बैठिए उन्हें आसन दिया एवं उनके पैरों को धुलाया अर्ध्य दिया एवं कहा कि मेरा भाग्य कि मुझे आपके दर्शन मिले। सुखदेव जी सोचने लगे कि मुझे सात दिन प्रतीक्षा करवाने के बाद यह इस तरह की बातें कर रहे हैं। किन्तु वह कुछ नहीं बोले।
जनक जी ने उन्हें कहा कि आप बहुत शुभ दिन आए हैं आज देवी की पूजा है। उस देवी की पूजा का नियम है कि किसी व्यक्ति को पन्द्रह किलो तेल का पात्र उठाकर पूरे नगर में घूमना है और एक भी बूँद तेल गिरना नहीं चाहिए उसी तेल से देवी की पूजा होगी। अतः हम चाहते हैं कि यह शुभ कार्य आपके हाथों हो। शुकदेव जी सोच में पड़ गए पर उन्होंने मना नहीं किया और वह पूरा तेल का पात्र लेकर नगर में निकले उन पर पुष्प वर्षा की गई, सुगन्धित जल छिड़का गया एवं बहुत से लोग उन्हें देखने के लिए खड़े रहे। पूरी तन्मयता से घूमने के बाद छः घण्टे में वह तेल से भरा पात्र वापस लेकर पहुँचे। उनके हाथ लाल हो गए थे एवं पैर में छाले पड़ गए थे। जनक जी ने शुकदेव जी से कहा कि आपने बहुत ही शुभ काम किया है, आपको हमारा नगर कैसा लगा? शुकदेव जी ने कहा कि मैंने नगर को नहीं देखा। जनक जी बोले कि पूरे नगर को इतना सुन्दर सजाया गया था। इतने सारे फव्वारे थे, हाथी थे, इतनी सुन्दर सजावट थी। तब शुकदेव जी बोले कि मेरे हाथों में तेल था, मैंने आस-पास कुछ भी नहीं देखा क्योंकि मेरा पूरा ध्यान तेल के ऊपर ही था। तब जनक जी बोले कि आपने पहला अध्याय सीख लिया है कि," मैं जल में रहूँ तो ऐसे रहूँ जैसे कमल का फूल रहे" कमल का फूल जल में रहकर भी उससे विरक्त होता है अतः जिस व्यक्ति का संसार में रहकर भी मोह पति, पत्नी, पुत्रों, पिता में नहीं रहता वह उनके साथ रहते हुए भी अपने कर्त्त्व्य का पालन करते हुए उस परमात्मा में ही लगा रहता है। ऐसा व्यक्ति ही परम पद को प्राप्त करता है एवं संसार में रहकर भी संसार में बँधा नहीं होता है, अतः शुकदेव जी को ज्ञान प्राप्त हो गया।
ततः(फ्) पदं(न्) तत्परिमार्गितव्यं(य्ँ) यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं(म्) पुरुषं(म्) प्रपद्ये यतः(फ्) प्रवृत्तिः(फ्) प्रसृता पुराणी॥15.4॥
उसके बाद उस परमपद (परमात्मा) की खोज करनी चाहिये जिसको प्राप्त होने पर मनुष्य फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिससे अनादिकाल से चली आने वाली (यह) सृष्टि विस्तार को प्राप्त हुई है, उस आदिपुरुष परमात्मा के ही मैं शरण हूँ।
विवेचन:- उस परम पद को प्राप्त करने के बाद मनुष्य संसार में लौट कर नहीं आते। उसको वैराग्य की कुल्हाड़ी से काटने के बाद वे परम पद को प्राप्त करते हैं। पुरातन अर्थात पुराना एवं सनातन जिसके आदि और अन्त का पता नहीं जो कि अनादि है। करोड़ों वर्षों से चलने वाली यह सृष्टि जो कि अनादि है। हिन्दू धर्म को सनातन माना जाता है। ज्ञानीजन द्वंद्वों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करते हैं। वह परमात्मा की शरण में चले जाते हैं।
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा, अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः(स्) सुखदुःखसञ्ज्ञै:(र्), गच्छन्त्यमूढाः(फ्) पदमव्ययं(न्) तत्।।5।।
जो मान और मोह से रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्ति से होने वाले दोषों को जीत लिया है, जो नित्य-निरन्तर परमात्मा में ही लगे हुए हैं, जो (अपनी दृष्टि से) सम्पूर्ण कामनाओं से रहित हो गये हैं, जो सुख-दुःख नाम वाले द्वन्द्वों से मुक्त हो गये हैं, (ऐसे) (ऊँची स्थिति वाले) मोह रहित साधक भक्त उस अविनाशी परमपद (परमात्मा) को प्राप्त होते हैं।
विवेचन:- ऐसा भक्त त्रिगुणातीत हो जाता है। वह मोह एवं मान से रहित हो जाता है। जग में रहकर भी अनासक्ति भरा जीवन जीता है। वह मोह, मान और वासना तीनों से बहुत ऊपर उठ जाता है। उसे इन छोटी-छोटी बातों से मुक्ति मिल जाती है एवं मान-अपमान, सुख-दु:ख, लाभ- हानि आदि से ऊपर उठकर उसके मन में कोई कामना नहीं रह जाती एवं वह हर समय प्रसन्न ही रहता है। वह वासनाओं से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है
न तद्भासयते सूर्यो, न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते, तद्धाम परमं(म्) मम।।6।।
उस (परमपद) को न सूर्य, न चन्द्र (और) न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है (और) (जिसको) प्राप्त होकर जीव लौट कर (संसार में) नहीं आते, वही मेरा परम धाम है।
विवेचन:- इस परमपद को प्राप्त होकर सूर्य, चंद्र या अग्नि के द्वारा प्रकाशित न होकर वह इतना प्रसन्न एवं परमानन्द को प्राप्त कर लेता है कि वह अपने आप में स्वयं ही प्रकाशित हो जाता है। परम आनन्दित हो परम तत्त्व को प्राप्त करने के बाद उसको वापस आना नहीं पड़ता एवं वह ईश्वर के साथ परमधाम को प्राप्त करता है। इस परमपद को न सूर्य, न चन्द्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है। वह ज्ञानीजन जन्म - मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। वह परमात्मा में ही विलीन हो जाता है।
इसके साथ आज का सत्र समाप्त हुआ।
इसके साथ आज का सत्र समाप्त हुआ।
विचार मंथन (प्रश्नोत्तर):-
प्रश्नकर्ता : बजरंग भैया
प्रश्न :कामना पूरी न होने पर क्रोध आता है। कामना को समाप्त करने का क्या उपाय है?
उत्तर -भोग पर संयम लगाना है। संसार विषयक होने के बजाय भगवान विषयक हो जाना है। अनासक्ति एवं वैराग्य से पूर्ण होने पर कामना को समाप्त किया जा सकता है।
प्रश्नकर्ता : कंचन दीदी
प्रश्न -रावण ने अपनी पत्नी को नारी के स्वभाव के दोष बताए थे, क्या वह सही हैं?
उत्तर - किसी भी शास्त्र, उपन्यास या लेखन में आदर्श पात्र के द्वारा कही गई बातों का ही महत्त्व होता है। रावण बुराई का प्रतीक था इसलिये उसकी कही गई बातों का कोई महत्त्व नहीं है। यदि यही बात राम जी, भरत जी या तुलसीदास जी द्वारा कही गई होती तो उसका महत्त्व होता।
प्रश्नकर्ता : बजरंग भैया
प्रश्न :कामना पूरी न होने पर क्रोध आता है। कामना को समाप्त करने का क्या उपाय है?
उत्तर -भोग पर संयम लगाना है। संसार विषयक होने के बजाय भगवान विषयक हो जाना है। अनासक्ति एवं वैराग्य से पूर्ण होने पर कामना को समाप्त किया जा सकता है।
प्रश्नकर्ता : कंचन दीदी
प्रश्न -रावण ने अपनी पत्नी को नारी के स्वभाव के दोष बताए थे, क्या वह सही हैं?
उत्तर - किसी भी शास्त्र, उपन्यास या लेखन में आदर्श पात्र के द्वारा कही गई बातों का ही महत्त्व होता है। रावण बुराई का प्रतीक था इसलिये उसकी कही गई बातों का कोई महत्त्व नहीं है। यदि यही बात राम जी, भरत जी या तुलसीदास जी द्वारा कही गई होती तो उसका महत्त्व होता।