विवेचन सारांश
भगवत्प्राप्ति का उपाय एवं भक्त के लक्षण
विवेचन सत्र से पूर्व मधुर रामधुन, माँ गंगा की प्रार्थना एवं हनुमान चालीसा का पाठ हुआ, तदोपरान्त योगेश्वर भगवान की प्रार्थना, गुरू वन्दना के उपरान्त दिव्य दीप प्रज्वलन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। आज का यह कार्यक्रम हैदराबाद के भाग्यनगर में गीता साधकों के साथ संपन्न हो रहा है। जब गीता मैत्री मिलन में लोगों को प्रत्यक्ष मिलते है तो आनंद का अनुभव होता है। परम श्रद्धेय गोविंद देव गिरिजी महाराज के निर्देशों के अनुसार यह कार्यक्रम चलता है। परम श्रद्धेय स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज ने ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी है कि वेद मंत्र बार बार बोले जा रहे है। कश्मीर, मणिपुर में वेद पाठशालाएँ खोल दी गई हैं। परमपूज्य गोविंद देव गिरि जी महाराज को पूछा गया कि आपने ऐसा क्यों किया? तो उन्होंने कहा, कि देश को अखंडित रखने का मंत्र वेदों में है। यहाँ की वेशभूषा, स्वाद अलग है किंतु वेद मंत्र का गायन वैसे ही संपन्न होता है, जैसे उत्तर भारत में होता है, वैसे ही दक्षिण भारत में होता हैI वेदों में देश को अखंडित रखने का सूत्र है। कश्मीर के पंडितों को क्यों निकाला गया? क्योंकि पंडित चले जाएँगे तो वेद भी समाप्त हो जाएँगे। फिर इरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यानमार देश के अनेक हिस्से टूटते, कटते चले गए। वेदों में देश को अखंड रखने का मंत्र है, वेदों में देश को अखंडित रखने का सूत्र है I उस परंपरा को हम प्रणाम करते हैं। भगवद्गीता के द्वादश अध्याय के पूर्वार्द्ध मे अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से प्रश्न किया कि कुछ लोग सतत् रूप से आपके निर्गुण रूप की पूजा करते हैं और कुछ लोग आपके सगुण रूप की पूजा करते हैं, इन दोनो प्रकार के भक्तों में आपको कौन से भक्त अधिक प्रिय हैं? तब भगवान अर्जुन को भक्त और भक्ति को सरल भाषा में समझाते हैं कि जो भी भक्त निरन्तर मेरे सगुण रूप का श्रद्धा पूर्वक उपासक है, वही मेरे निकट हैI लेकिन निरन्तर मेरे निर्गुण रूप के उपासक भी मेरे पास ही पहुंचेंगे। आवश्यक यह है वह कितने दृढ़ निश्चय के साथ मेरा उपासक है। भगवान आगे यह भी बताते हैं कि उपासना कैसे करें? नित्य उपासना मे श्री कृष्ण अपने को एक माध्यम बताते हैं, उपासना परम शक्ति या ईश्वर की करने को कहते हैं। अव्यक्त रूप का ध्यान कठिन प्रतीत हो तो केवल अपने सभी कर्मों को यह समझते हुए करो कि तुम मेरा कार्य कर रहे हो। जैसे आप शिक्षक हो और पढ़ा रहे हो तो विद्यार्थियों को पढ़ाते वक्त मुझे ही समझा रहे हो ऐसे कार्य करो।अगर व्यापार करते हो तो मेरी सेवा समझ कर करो। अगर घर का काम कर रहे हो तो मेरे ही लिए कार्य कर रहे हो ऐसा समझो। मुझ में ही मन लगाओ। केवल अपने विचारों मे परिवर्तन कर दो। अपने सभी कार्य मेरा सेवाकार्य समझ कर करो। यदि तुम्हें यह भी कठिन प्रतीत होता है तो भगवान आगे के श्लोक मे अर्जुन को बताते हैं कि --------
12.11
अथैतदप्यशक्तोऽसि, कर्तुं(म्) मद्योगमाश्रितः|
सर्वकर्मफलत्यागं(न्), ततः(ख्) कुरु यतात्मवान्||11||
अगर मेरे योग (समता) के आश्रित हुआ (तू) इस (पूर्व श्लोक में कहे गये साधन) को भी करने में (अपने को) असमर्थ (पाता) है, तो मन इन्द्रियों को वश में करके सम्पूर्ण कर्मों के फल की इच्छा का त्याग कर।
विवेचन- जैसे एक माता अपने छोटे से बालक को सरलतम् से सरलतम् विधि से भोजन कराती है या पालन करती हैI वैसे ही भगवान अर्जुन को भक्ति की सरलतम् विधि समझाते हुए बताते हैं कि यदि अपने सभी कर्मों को मुझे समर्पित करके करना कठिन प्रतीत होता है, तो तुम अपने सभी कर्मों को यथावत करो, बस कर्मफल की आकाँक्षा का त्याग कर दो। कर्म करने से उक्त फल मिलेगा - इसलिए कार्य करना है, यह कर्म फल प्राप्ति की आकांक्षा हुई। बस मन से कर्मफल की इच्छा का त्याग कर दो। फल की अपेक्षा करते हुए कर्म करना दु:ख, अशान्ति का कारण है। कर्मफल का त्याग ही व्यक्ति को संन्यासी बनाता है और यही शान्ति व मुक्ति का मार्ग है I
कर्म करता जा,कर्म करे तो फल की इच्छा मत कर ऐ इंसान l
जैसा कर्म करेगा, वैसा फल देगा भगवान ll
तू बीज बोता चल, फल उगते चले जाएँगे।
बीज बोना है तो फूलों का बोना, फलों का बोना,
बबूल का क्यों बोना? उदाहरण से समझते है कि एक व्यापारी हमेशा रोता रहता था I हमेशा अशान्त रहता था। उसकी पत्नी ने इसका कारण बताया कि उसके शेयर मे लगाये गये धन मे उसे दस लाख का लाभ अपेक्षित था किंतु उसे पाँच लाख का ही लाभ हुआ, पाँच लाख की हानि हो गई। लाभ कम हो गया, जिसकी उसे अपेक्षा नही थी I अतः वह हमेशा रोता रहता था I इसी प्रकार अर्जुन भी युद्ध क्षेत्र मे रो रहा था, लेकिन भगवान द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश ने उसे सही ज्ञान प्राप्त हुआ और वह शान्त होकर सफल हुआI
कर्म करता जा,कर्म करे तो फल की इच्छा मत कर ऐ इंसान l
जैसा कर्म करेगा, वैसा फल देगा भगवान ll
तू बीज बोता चल, फल उगते चले जाएँगे।
बीज बोना है तो फूलों का बोना, फलों का बोना,
बबूल का क्यों बोना? उदाहरण से समझते है कि एक व्यापारी हमेशा रोता रहता था I हमेशा अशान्त रहता था। उसकी पत्नी ने इसका कारण बताया कि उसके शेयर मे लगाये गये धन मे उसे दस लाख का लाभ अपेक्षित था किंतु उसे पाँच लाख का ही लाभ हुआ, पाँच लाख की हानि हो गई। लाभ कम हो गया, जिसकी उसे अपेक्षा नही थी I अतः वह हमेशा रोता रहता था I इसी प्रकार अर्जुन भी युद्ध क्षेत्र मे रो रहा था, लेकिन भगवान द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश ने उसे सही ज्ञान प्राप्त हुआ और वह शान्त होकर सफल हुआI
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्, ज्ञानाद्ध्यानं(व्ँ) विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्याग:(स्),त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥12.12॥
अभ्यास से शास्त्रज्ञान श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है (और) ध्यान से (भी) सब कर्मों के फल की इच्छा का त्याग (श्रेष्ठ है)। क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति प्राप्त हो जाती है।
विवेचन- भगवान अर्जुन को समझाते हैं कि बिना मर्म जाने लगातार अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ होता है, और ज्ञान से अधिक श्रेष्ठ परमात्मा का ध्यान करना होता है और ध्यान से भी श्रेष्ठ होता है, कर्मों के फल का त्याग करना। यह श्लोक अत्यन्त उपयोगी है क्योकि यह भक्ति का एक सरल मार्ग प्रशस्त करता है। कर्म फल के त्याग से ही शान्ति आती है। भगवान ने बताया कि भक्ति मार्ग में साधन महत्वपूर्ण नही होते हैं, अपितु साधना के सभी मार्ग श्रेष्ठ होते हैं, भगवान के लिए सभी महत्वपूर्ण होते हैं। जैसे वृक्ष अपने फलो को स्वयं नही खाता, उसे छोड़ देता है, वैसे ही हमे फल की आपेक्षा रख कर कोई कार्य नही करना है। अपेक्षा करना ही दु:ख का कारण है।
एक भजन है-
अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथो में।
है जीत तुम्हारे हाथो मे और हार तुम्हारे हाथो में।
जब यह भाव आ जाएगा तो कर्मों के फल प्राप्ति की आकाँक्षा समाप्त हो जाएगी।
एक भजन है-
अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथो में।
है जीत तुम्हारे हाथो मे और हार तुम्हारे हाथो में।
जब यह भाव आ जाएगा तो कर्मों के फल प्राप्ति की आकाँक्षा समाप्त हो जाएगी।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां(म्), मैत्रः(ख्) करुण एव च|
निर्ममो निरहङ्कारः(स्), समदुःखसुखः क्षमी||13||
सब प्राणियों में द्वेषभाव से रहित और मित्र भाव वाला (तथा) दयालु भी (और) ममता रहित, अहंकार रहित, सुख दुःख की प्राप्ति में सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीर को वश में किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला, मुझ में अर्पित मन बुद्धि वाला जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है। (12.13-12.14)
12.13 writeup
सन्तुष्टः(स्) सततं(य्ँ) योगी, यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धि:(र्), यो मद्भक्तः(स्) स मे प्रियः॥12.14॥
विवेचन- भगवान ने अर्जुन को भक्तों के विविध लक्षण बताए हैं। लक्षण बताते हुए भगवान कहते हैं कि:
* जो किसी से द्वेष नही करता अर्थात दूसरे की हानि का भाव नही रखता है।
* सभी के प्रति मैत्र और करुणा का भाव रखता है।
* सुखी और पुण्य आत्मा से मैत्री एवं पाप आत्मा के प्रति करुणा का भाव रखता है, वही भक्त मुझे प्रिय है।
* ममत्व का भाव तथा स्वयं पर अहंकार से रहित व्यक्ति ही मेरा भक्त है। जो स्वयं को विशिष्ट समझे वह मेरा भक्त नही हो सकता।
* जो सुख दु:ख मे समान रहे।
* जिसमे क्षमाशीलता का भाव हो, वह मुझे प्रिय है।
*दूसरों के अपराध को छोटा करना सीखे।
जब हम किसी से अपने बच्चे जैसा प्रेम करते है तो उसकी गलतियाँ और अपराध भी छोटी लगती है, हम उसे क्षमा करते हैं। वैसे ही भक्त सब मे मुझे ही देखते हुए सबसे प्रेम करता है और अपराध को भी क्षमा करता है। यह मेरे भक्त का लक्षण है।
* जो संतुष्टि के भाव को ग्रहण करे।
* जो दृढ निश्चय वाले हों।
* " जब आए संतोष धन सब धन धूरि समान "
को अपनाए वही मुझे प्रिय है। योगी वही होते है जो संतुष्ट होते हैं। सभी परिस्थिति मे सम रहने वाले ही योगी होते हैं।
योगी का अभाव मे, या प्रभाव मे, अंदर का भाव नही बदलता। यही एक भक्त का लक्षण है। वे सभी मे सम रहते है और दृढ़ निश्चय वाले होते हैं। मुझे जो भी अर्पण करना हो, उसे मन बुद्धि दोनों से करो और समर्पण का भाव रखो।
" श्रद्धावान् लभते ज्ञानं" श्रद्धावान को ही ज्ञान की अनुभूति हो सकती है और इन्द्रयों पर संयम तभी हो सकती है जब दृढ़ निश्चयी होंगे। ऐसे भक्त मुझे प्रिय हैं।
* जो किसी से द्वेष नही करता अर्थात दूसरे की हानि का भाव नही रखता है।
* सभी के प्रति मैत्र और करुणा का भाव रखता है।
* सुखी और पुण्य आत्मा से मैत्री एवं पाप आत्मा के प्रति करुणा का भाव रखता है, वही भक्त मुझे प्रिय है।
* ममत्व का भाव तथा स्वयं पर अहंकार से रहित व्यक्ति ही मेरा भक्त है। जो स्वयं को विशिष्ट समझे वह मेरा भक्त नही हो सकता।
* जो सुख दु:ख मे समान रहे।
* जिसमे क्षमाशीलता का भाव हो, वह मुझे प्रिय है।
*दूसरों के अपराध को छोटा करना सीखे।
जब हम किसी से अपने बच्चे जैसा प्रेम करते है तो उसकी गलतियाँ और अपराध भी छोटी लगती है, हम उसे क्षमा करते हैं। वैसे ही भक्त सब मे मुझे ही देखते हुए सबसे प्रेम करता है और अपराध को भी क्षमा करता है। यह मेरे भक्त का लक्षण है।
* जो संतुष्टि के भाव को ग्रहण करे।
* जो दृढ निश्चय वाले हों।
* " जब आए संतोष धन सब धन धूरि समान "
को अपनाए वही मुझे प्रिय है। योगी वही होते है जो संतुष्ट होते हैं। सभी परिस्थिति मे सम रहने वाले ही योगी होते हैं।
योगी का अभाव मे, या प्रभाव मे, अंदर का भाव नही बदलता। यही एक भक्त का लक्षण है। वे सभी मे सम रहते है और दृढ़ निश्चय वाले होते हैं। मुझे जो भी अर्पण करना हो, उसे मन बुद्धि दोनों से करो और समर्पण का भाव रखो।
" श्रद्धावान् लभते ज्ञानं" श्रद्धावान को ही ज्ञान की अनुभूति हो सकती है और इन्द्रयों पर संयम तभी हो सकती है जब दृढ़ निश्चयी होंगे। ऐसे भक्त मुझे प्रिय हैं।
यस्मान्नोद्विजते लोको, लोकान्नोद्विजते च यः|
हर्षामर्षभयोद्वेगै:(र्), मुक्तो यः(स्) स च मे प्रियः||15||
जिससे कोई भी प्राणी उद्विग्न (क्षुब्ध) नहीं होता और जो स्वयं भी किसी प्राणी से उद्विग्न नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या), भय और उद्वेग (हलचल) से रहित है, वह मुझे प्रिय है।
विवेचन- जो सदैव शांत रहे, किसी प्रकार उद्विग्न ना हो, हर्ष, दु:ख तथा चिन्ता से मुक्त हो अर्थात जिसमें सहनशीलता का भाव हो वही मेरा भक्त है।
हर्ष - आनंद की अनुभूति
अमर्ष - दुख की अनुभूति
भय- डर
उद्वेग - हलचल (reaction) से रहित
उद्वेग, क्रोध से प्रतिक्रिया निकलती हैं। हम बहुत reactive हो जाते हैं । गाली गलौज करने लगते हैं। एक बात से दूसरी बात निकल जाती और झगड़ा बढ़ता जाता है। क्रोध लेकर अगर हम अपनी गाड़ी चलाते है। एक्सीडेंट की संभावना बढ़ जाती है। रिएक्टिव नहीं प्रोएक्टिव बने। वातावरण को सकारात्मक करना सीखें। विस्तार से समझे कि प्राणी पीड़ा तभी पहुंचाते है जब उनको तकलीफ होती है I भक्ति अंकुरित हुई, तो जान लेना, जानवर भी आपके प्रति आश्वस्त हो जाते हैं। ऋषि-मुनियों के साथ जानवर होते थे। उनके पास जाने से बिल्कुल नहीं डरते थे। जिस प्राणी के कारण दूसरे प्राणी को पीड़ा ना हो, जो दूसरे द्वारा पीड़ित ना हो और सभी भय मुक्त हो ऐसे प्राणी मुझे प्रिय हैं।
हर्ष - आनंद की अनुभूति
अमर्ष - दुख की अनुभूति
भय- डर
उद्वेग - हलचल (reaction) से रहित
उद्वेग, क्रोध से प्रतिक्रिया निकलती हैं। हम बहुत reactive हो जाते हैं । गाली गलौज करने लगते हैं। एक बात से दूसरी बात निकल जाती और झगड़ा बढ़ता जाता है। क्रोध लेकर अगर हम अपनी गाड़ी चलाते है। एक्सीडेंट की संभावना बढ़ जाती है। रिएक्टिव नहीं प्रोएक्टिव बने। वातावरण को सकारात्मक करना सीखें। विस्तार से समझे कि प्राणी पीड़ा तभी पहुंचाते है जब उनको तकलीफ होती है I भक्ति अंकुरित हुई, तो जान लेना, जानवर भी आपके प्रति आश्वस्त हो जाते हैं। ऋषि-मुनियों के साथ जानवर होते थे। उनके पास जाने से बिल्कुल नहीं डरते थे। जिस प्राणी के कारण दूसरे प्राणी को पीड़ा ना हो, जो दूसरे द्वारा पीड़ित ना हो और सभी भय मुक्त हो ऐसे प्राणी मुझे प्रिय हैं।
अनपेक्षः(श्) शुचिर्दक्ष, उदासीनो गतव्यथः|
सर्वारम्भपरित्यागी, यो मद्भक्तः(स्) स मे प्रियः||16||
जो अपेक्षा (आवश्यकता) से रहित, (बाहर-भीतर से) पवित्र, चतुर, उदासीन, व्यथा से रहित (औरः सभी आरम्भों का अर्थात् नये-नये कर्मों के आरम्भ का सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
विवेचन- जो आकांक्षा रहित हो, मन से पवित्र हो, जो उदासी अर्थात पक्षपात रहित हो, और तटस्थ हो, जो फल के लिए प्रयत्नशील ना हो, ऐसे भक्त मुझे प्रिय हैं। जो शुचिता का पालन अंदर-बाहर दोनो से करता हो, निर्मलता उसके व्यवहार मे भी झलकती हो, कोई भी अपेक्षा नही रखता हो, दक्ष हो अर्थात जाग्रत हो, उदासीन हो अर्थात निर्लिप्त हो, दु:ख के भाव से मुक्त हो और जो करता भाव को छोड़ने वाला हो, अहंकार को त्यागने वाला हो। ऐसे गुणों वाले भक्त मुझे प्रिय होते हैI
यो न हृष्यति न द्वेष्टि, न शोचति न काङ्क्षति|
शुभाशुभपरित्यागी, भक्तिमान्यः(स्) स मे प्रियः||17||
जो न (कभी) हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है (और) जो शुभ-अशुभ कर्मों से ऊँचा उठा हुआ (राग-द्वेष रहित) है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।
विवेचन- जो कभी व्यर्थ मे ही प्रसन्न नही होता, न ही दुःखी होता है, तथा जो शोक से मुक्त हो और आकांक्षा से भी मुक्त हो और शुभ और अशुभ का परित्याग करने वाला हो, न तो पश्चाताप करता हो, न ही इच्छा रखता हो । ऐसा भक्त मुझे प्रिय है। कार्य शुभ या अशुभ है यह कर्म फल ही निर्धारित करता है। यदि अशुभ कार्य करना अपरिहार्य है, जैसे युद्ध मे योद्धा द्वारा वध करना यद्यपि अशुभ है लेकिन अपरिहार्य है और योद्धा के लिए उसका धर्म है। अर्जुन के लिए दुर्योधन को मारना, उसका वध करना यही एकमात्र विकल्प है। यह अशुभ कर्म है किन्तु ही उसका धर्म भी है और इसके बाद उसने कर्म फल का त्याग करना चाहिए। सैनिक को आतंकवादी को मारना ही पड़ता है I यह गलत नहीं है यही उसका धर्म है। इसीलिए भगवान कर्म फल का त्याग करने की शिक्षा दे रहे हैं।
समः(श्) शत्रौ च मित्रे च, तथा मानापमानयोः|
शीतोष्णसुखदुःखेषु, समः(स्) सङ्गविवर्जितः||18||
(जो) शत्रु और मित्र में तथा मान-अपमान में सम है (और) शीत-उष्ण (शरीर की अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःख (मन बुद्धि की अनुकूलता-प्रतिकूलता) में सम है एवं आसक्ति रहित है (और) जो निन्दा स्तुति को समान समझने वाला, मननशील, जिस किसी प्रकार से भी (शरीर का निर्वाह होने न होने में) संतुष्ट, रहने के स्थान तथा शरीर में ममता आसक्ति से रहित (और) स्थिर बुद्धिवाला है, (वह) भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है। (12.18-12.19)
विवेचन- जो मित्र और शत्रु को समान समझे, मान अपमान को समान रूप से ग्रहण करे, शीत और गर्मी, सुख-दुःख सब में समान रहे, वही मेरा भक्त है। भगवान को आसक्ति का विसर्जन प्रिय है।
गीता पढ़ें, पढ़ाएँ जीवन में लाएँ।
आपका शत्रु के प्रति द्वेष, यह काँटा भी आपको बर्बाद कर देगा। काँटा मन से, आत्मा से चिपक जाएगा। फिर बदले की भावना रह जाएगी। वह निकालना होगा। उस के पास जाकर क्षमा मांगनी पड़ेगी। यह प्रयोग करके देखें। मन साफ हो जाएगा।
गीता पढ़ें, पढ़ाएँ जीवन में लाएँ।
आपका शत्रु के प्रति द्वेष, यह काँटा भी आपको बर्बाद कर देगा। काँटा मन से, आत्मा से चिपक जाएगा। फिर बदले की भावना रह जाएगी। वह निकालना होगा। उस के पास जाकर क्षमा मांगनी पड़ेगी। यह प्रयोग करके देखें। मन साफ हो जाएगा।
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी, सन्तुष्टो येन केनचित्|
अनिकेतः(स्) स्थिरमति:(र्), भक्तिमान्मे प्रियो नरः||19||
विवेचन- जो मान अपमान से परे रह कर, जो कुछ मिल जाए उसमे संतुष्ट रहेI पीठ पीछे अगर कोई निंदा करता है तो उसे रिएक्शन देने की जरूरत नहीं है। अत्याधिक सुख में या दुख में निर्णय न ले। संतुष्ट रहना सीखें। अनिकेत- घर के प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए। बुद्धि को स्थिर रखे,और भक्ति में लीन हो, ऐसा भक्त मुझे हमेशा प्रिय है।
ये तु धर्म्यामृतमिदं(य्ँ), यथोक्तं(म्) पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा, भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥12.20॥
परन्तु जो (मुझ में) श्रद्धा रखने वाले (और) मेरे परायण हुए भक्त इस धर्ममय अमृत का जैसा कहा कहा है, (वैसा ही) भली भांति सेवन करते हैं, वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।
विवेचन- भगवान अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि जो मैने जैसा अभी बताया है वैसे ही धर्म के मार्ग को धारण करते हैं, मुझमे श्रद्धा की भावना रखते हैं, वही भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं। भगवान ने बताया कि यही मेरी भक्ति के गुण हैं और जिस प्राणी में ये गुण अंकुरित हो जाते है,उसका जीवन बड़ा शांत हो जाता है। आनंदमय हो जाता है। वह मुक्त हो जाता है। इस प्रकार इस सुन्दर भक्ति योग का वर्णन इस विवेचन सत्र मे सम्पन्न हुआ एवं प्रश्नोत्तर सत्र प्रारम्भ हुआ।
प्रश्नकर्ता - कोमल दीदी
प्रश्न - श्रीमद्भगवद्गीता नाम क्यों हुआ?
उत्तर - इसमे वासुदेव उवाच नही है, श्रीकृष्ण के द्वारा भगवत तत्व के रूप मे उनकी पद्यात्मक वाणी को भगवान उवाच के रूप मे गाया गया है, इसलिए भगवत गीता या गीता कहा गया है।
प्रश्नकर्ता - बजरंग भैया
प्रश्न - जीवन में बुद्धत्व या निर्वाण कैसे प्राप्त करें?
उत्तर- अष्टांग योग के द्वारा निर्वाण प्राप्त कर सकते है।
प्रश्नकर्ता- शकुन दीदी
प्रश्न - हमे किस अध्याय का पाठ करना चाहिए?
उत्तर- जो अध्याय आपको सरल लगे या आप समझ जाए उसे नियमित रूप से पाठ करें। अध्याय द्वादश के सभी श्लोक प्रभावी हैं। आवश्यक है कि मन से, श्रद्धा पूर्वक नित्य पाठ करें और उसका अनुपालन करने का प्रयास करें।
प्रश्नकर्ता - कृष्ण भैया
प्रश्न- कर्मफल के त्याग को विस्तार से समझाएं।
उत्तर- जो भी कार्य हम करते हैं, उसमें हम पहले फल की अपेक्षा रखते हैं, बस हमें उसी फल की अपेक्षा को त्यागना है। फल की इच्छा मत रखिए। अपेक्षा होने पर उद्वेग रहता है, और अपेक्षित फल न मिलने पर अशान्ति आती है जिससे कार्य क्षमता कम हो जाती है।
प्रश्नकर्ता - अर्चना दीदी
प्रश्न - किसी उपासना मे यदि व्यवधान हो जाए तो क्या वह खंडित हो जाती है?
उत्तर-भगवान भाव को देखते हैं, वे प्रेम के भूखे हैं। हमे यथाशक्ति श्रद्धा पूर्वक अपनी उपासना करनी चाहिए।
इस प्रकार समापन प्रार्थना एवं हनुमान चालीसा के मधुर पाठ के उपरान्त सत्र का समापन हुआ।
प्रश्नकर्ता - कोमल दीदी
प्रश्न - श्रीमद्भगवद्गीता नाम क्यों हुआ?
उत्तर - इसमे वासुदेव उवाच नही है, श्रीकृष्ण के द्वारा भगवत तत्व के रूप मे उनकी पद्यात्मक वाणी को भगवान उवाच के रूप मे गाया गया है, इसलिए भगवत गीता या गीता कहा गया है।
प्रश्नकर्ता - बजरंग भैया
प्रश्न - जीवन में बुद्धत्व या निर्वाण कैसे प्राप्त करें?
उत्तर- अष्टांग योग के द्वारा निर्वाण प्राप्त कर सकते है।
प्रश्नकर्ता- शकुन दीदी
प्रश्न - हमे किस अध्याय का पाठ करना चाहिए?
उत्तर- जो अध्याय आपको सरल लगे या आप समझ जाए उसे नियमित रूप से पाठ करें। अध्याय द्वादश के सभी श्लोक प्रभावी हैं। आवश्यक है कि मन से, श्रद्धा पूर्वक नित्य पाठ करें और उसका अनुपालन करने का प्रयास करें।
प्रश्नकर्ता - कृष्ण भैया
प्रश्न- कर्मफल के त्याग को विस्तार से समझाएं।
उत्तर- जो भी कार्य हम करते हैं, उसमें हम पहले फल की अपेक्षा रखते हैं, बस हमें उसी फल की अपेक्षा को त्यागना है। फल की इच्छा मत रखिए। अपेक्षा होने पर उद्वेग रहता है, और अपेक्षित फल न मिलने पर अशान्ति आती है जिससे कार्य क्षमता कम हो जाती है।
प्रश्नकर्ता - अर्चना दीदी
प्रश्न - किसी उपासना मे यदि व्यवधान हो जाए तो क्या वह खंडित हो जाती है?
उत्तर-भगवान भाव को देखते हैं, वे प्रेम के भूखे हैं। हमे यथाशक्ति श्रद्धा पूर्वक अपनी उपासना करनी चाहिए।
इस प्रकार समापन प्रार्थना एवं हनुमान चालीसा के मधुर पाठ के उपरान्त सत्र का समापन हुआ।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः॥
इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘भक्तियोग’ नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।