विवेचन सारांश
भगवान की विभूतियाँ
पिछले सप्ताह हमने विभूति योग का वर्णन सुना और इस सत्र में वे विभूतियाँ कहाँ-कहाँ छिपी हैं, भगवान योगेश्वर के द्वारा अर्जुन को बतलाते हुए सुनेंगे परन्तु विभूतियों के बारे में जानने से पहले हमें यह जानना आवश्यक है कि इन विभूतियों को कहने का भगवान का क्या तात्पर्य था?
10.19
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि, दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
प्राधान्यतः(ख्) कुरुश्रेष्ठ, नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥10.19॥
अहमात्मा गुडाकेश, सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं(ञ्) च, भूतानामन्त एव च॥10.20॥
श्रीकृष्ण कहते हैं कि सम्पूर्ण प्राणियों के आदि, मध्य और अन्त में भी मैं ही हूँ और प्राणियोंके अंतःकरण में आत्मरूप से मैं ही स्थित हूँ, सब भूतों में मैं विराजमान हूँ।
जब भगवान ने इतना सब कह दिया तो और कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। अर्जुन ने शिष्य बनकर स्वयं को भगवान को सौंपा है। "शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्"। जब कोई शिष्य बन कर अपने आप को गुरु के चरणों में सौंपता है तब गुरु उसे एक बालक की भाँति देखता है और बालक के समान उसकी शङ्का का समाधान करता है। छोटे बालकों को प्रारम्भिक शिक्षा देते हुए वर्णमाला पढ़ाते हैं। इसमें हम क से कमल का पुष्प दिखाते हैं। उस बालक का कमल से जुड़ाव हो जाता है और वह जब भी क की आकृति को देखता है तो उसे कमल का पुष्प ध्यान में आता है परन्तु आगे की कक्षाओं में वह बालक कमल को भूल जाता है और केवल क को याद रखता है। उसी प्रकार भगवान अर्जुन के समक्ष उसके भाव-संसार से सम्बन्धित चित्र उपस्थत करके उसकी समस्या का निराकरण कर रहे हैं।
ग से गणेश भारत में तो चलता है परन्तु किसी अफ्रीकी देश में जहाँ गणेश जी की पूजा नहीं होती, वहाँ यह सम्बन्ध स्थापित करना वहाँ के बालकों के लिए बड़ा कठिन होगा। इसलिए अफ्रीकी बच्चों का जुड़ाव जिन-जिन चीजों से है उन्हीं से उन्हें वर्णमाला सिखाई जाएगी। उसी प्रकार अर्जुन का जुड़ाव जिन चीजों से है उन चीजों से भगवान स्वयं का परिचय देना आरम्भ करते हैं। भगवान ने बड़े ही सुन्दर-सुन्दर प्रतीक बताए हैं।
आदित्यानामहं(म्) विष्णु:(र्), ज्योतिषां(म्) रविरंशुमान्।
मरीचिर्मरुतामस्मि, नक्षत्राणामहं(म्) शशी॥10.21॥
सृष्टिकर्त्ता, पालनकर्त्ता और संहारकर्त्ता- ब्रह्मा, विष्णु और महेश के ये जो कार्य हैं, उनमें जो वर्तमान है, वह विष्णु है। यह बड़ा सुन्दर प्रतीक भी है कि जिसने वर्तमान में जीना सीख लिया वह आगे बढ़ता है। हम लोग अपने अतीत में जीते हैं अर्थात जो पुरानी घटनाएँ हैं उनको लगातार याद करते रहते हैं और उनसे निराश होते रहते हैं। आगे आने वाले भविष्य की चिन्ता हमें सताती है। हम लोग भविष्य में जीते हैं तो चिन्ताऐं आती हैं, भूत में जीते हैं तो व्यथाएँ आती हैं, लेकिन जिसने वर्तमान में जीना सीख लिया, जो अतीत को पीछे छोड़ आता है और भविष्य की चिन्ता नहीं करता, वह आगे बढ़ता है। चिन्ताओं में जीने वाला आगे कैसे बढ़ेगा? इसलिए जो संरक्षणकर्त्ता, विस्तारकर्त्ता और सञ्चालनकर्त्ता है, उस विभूति को भगवान सबसे पहले बताते हैं कि मैं आदित्यों में विष्णु हूँ।
फिर भगवान ने सूर्य के बारे में बताया। वैसे तो इस ब्रह्माण्ड में कितने ही सूरज, कितने ही अनन्त तारकमण्डल हैं लेकिन पृथ्वीवासियों के लिए सूर्य सबसे महत्त्वपूर्ण है। बिना सूरज के हमारा जीवन ठप्प हो जाएगा। हम रुक नहीं पाएँगे, हम इस जीवन की सृष्टि नहीं कर पाएँगे, सूरज हमारे लिए सब कुछ है और इसलिए भगवान ने कह दिया कि ज्योतिमान गोलों में, मैं सूर्य हूँ। सबसे पहले विष्णु जी को बताया है, अधिक मन्दिर भी विष्णुजी के बने हुए हैं क्योंकि राम और कृष्ण भी तो विष्णु के अवतार हैं। बुद्ध भी विष्णु के अवतार हैं जिनके बहुत मन्दिर हैं।
भगवान कहते हैं कि कुल उनचास मरुत हैं, जिनमें मैं मरीचि हूँ और सत्ताईस नक्षत्र हैं जिनका स्वामी चन्द्रमा मैं हूँ। कालगणना चन्द्रमा के अनुसार करते हैं। अमावस्या के बाद प्रथमा, द्वितीया, तृतीया आदि तिथियाँ आती हैं। पूर्णिमा के बाद चन्द्रमा का आकार छोटा होता चला जाता है। बीच में जो-जो नक्षत्र आते हैं उनकी गणना की जाती है और इन सब नक्षत्रों का स्वामी चन्द्रमा को कहा जाता है। भारत में विकसित हुआ यह ज्ञान वास्तव में अचम्भित कर देने वाला है। हर चार वर्ष के बाद उस कालगणना में जो न्यूनाधिक हो जाता है, उसको ठीक करने के लिए एक अधिक मास भी डाला गया, उसको भी पुरुषोत्तम मास के नाम से यानि विष्णु के नाम से जाना गया है। यह पुरुषोत्तम मास हमें फिर से वर्तमान पर ले आता है। ऐसी सुन्दर कालगणना शायद ही और कहीं हुई होगी और उस काल से हम लोगों को सूर्य ग्रहण और चन्द्र गहण कब होते हैं, इसका ज्ञान हुआ।
महाभारत के युद्ध में भी जब अर्जुन ने शपथ ली कि सूर्य ढलने से पहले आज मैं जयद्रथ-वध का पराक्रम करूँगा, तब भगवान को यह पता था आज सूर्य ग्रहण होने वाला है। अर्जुन उससे पहले जयद्रथ को नहीं मार पाया और उसको लगा कि सूर्यास्त हो गया है, परन्तु सूरज जब उस ग्रहण से बाहर निकलता है तब भगवान ने कहा कि पार्थ देखो वह सूरज और यह जयद्रथ; और जयद्रथ का वध किया गया। सवा पाँच हजार वर्ष पहले हमारे यहाँ इस कालगणना से सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण कब आने वाले हैं, इसका ज्ञान उन लोगों को हुआ करता था। बड़े आश्चर्य की बात है कि कल तक हम यही जानते थे कि सूरज स्थिर है और सारे नवग्रह घूमते हैं और इन नवग्रहों की पूजा तो हमारे यहाँ हजारों वर्षों से हो रही है। सूरज के नौ ग्रह हैं यह हमने पहले से जान रखा था। यह जब हमें विज्ञान ने बताया, तब हमने उन पर भरोसा किया और जो शास्त्र में लिखा है उस पर विश्वास नहीं कर रहे थे।
हनुमान जी ने बचपन में जब सूरज को निगलने का प्रयास किया, तब वह सिर्फ पन्द्रह दिन के थे। तब भी सूर्य ग्रहण आया और उस समय जो राहु सूर्य को ग्रसित करने के लिए आने वाला था उसने इस बाल हनुमान को देखा कि छोटा सा जीव यह वानर सूरज की तरफ चला है, तो उसने जाकर इन्द्र को बताया कि सूरज पर आक्रमण हो रहा है। तब ऐरावत पर बैठकर इन्द्र आए और उन्होंने अपने वज्र से प्रहार किया जो कि हनुमान जी की ठुड्डी पर लगा, हनु पर लगा इसलिए उनका नाम हनुमान हो गया। हनुमान पवन के पुत्र हैं। पवन ने उन्हें धीरे से पकड़ा और नीचे लेकर आए और गुफा में रुक गए। हनुमान मूर्च्छित हैं और पवन उन्हें जगाने का प्रयास करते हैं। जब पवन गुफा के अन्दर रुक गया और अपने आप को समेट लिया, तब पृथ्वी पर त्राहिमाम मच गया कि क्या हो रहा है, हवा क्यों नहीं बह रही? तब इन्द्र आदि देवता उनको समझाने के लिए उस गुफा में आए और सबने अपनी तरफ से हनुमान को कुछ भेंट दी। उस समय इन्द्र ने स्वयं यह कहा कि तुम्हारा देह वज्र जैसा बन जाएगा और मेरा वज्र भी तुम्हारे ऊपर काम नहीं करेगा। ये सारे वरदान जब हनुमान प्राप्त कर रहे थे तो बोले कि सूर्य पीछे खड़े हैं, उनको आगे बुलाओ। उन्होंने मुझे कुछ नहीं दिया। छोटा बालक तो कुछ भी माँग सकता है। निर्दोष सूरज जो केवल अपनी गति से चल रहे थे, अपराधी के भाव से आगे आए और बोले कि तुम्हें क्या चाहिये? हनुमान बोले कि आपको तो सारे ब्रह्माण्ड का ज्ञान है तो आप मुझे ज्ञान दीजिए, सूरज कहते हैं कि मैं तो गतिमान हूँ, मैं रुक नहीं सकता और मेरी गति से चलना तुम्हारे लिए सम्भव नहीं होगा, ऐसे में, मैं तुम्हें शिष्य बनाऊँ भी तो कैसे? हनुमान जी कहते हैं कि आप चिन्ता न करें, मैं आपकी गति से चलूँगा।
हनुमान जी तो बल, बुद्धि और विद्या के दाता हैं- बल बुद्धि विद्या देहू मोहि हरहु कलेश विकार। उन्होंने एक युक्ति की, कि वे सूर्य के रथ में लगे हुए घोड़े पर उल्टा मुँह करके बैठ गए और बोले कि अब मैं आपके साथ चल रहा हूँ, आप मुझे ज्ञान दीजिए। मैं आपके साथ चलता भी रहूँगा, आपको रुकने की कोई आवश्यकता नहीं। तार्किक बुद्धि से हम भी सोचने लगें कि सूरज तो स्थिर है फिर घोड़े क्यों दिए सूरज को? सूरज भी अपनी ग्रह माला के सहित साढ़े तीन सौ मील प्रति सेकण्ड की रफ्तार से उस महासूर्य की परिक्रमा कर रहा है। भगवान कह रहे हैं कि नक्षत्रों में, मैं चन्द्रमा हूँ। सूर्य और चन्द्रमा के विषय में इसलिए कहते हैं क्योंकि वे प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं।
वेदानां(म्) सामवेदोऽस्मि, देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां(म्) मनश्चास्मि, भूतानामस्मि चेतना॥10.22॥
अर्जुन ने इन्द्र के दरबार मे उर्वशी से नृत्य और गन्धर्वों से सङ्गीत सीखा है। अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने बृहन्नला बनकर विराटराज की पुत्री उत्तरा को नृत्य और सङ्गीत का प्रशिक्षण दिया था, इसलिए भगवान सामवेद की बात कर रहे है।
भगवान कहते हैं कि देवताओं में मैं इन्द्र हूँ। यहाँ अर्जुन को भगवान सिर्फ वही बता रहे हैं जो श्रेष्ठतम और शक्तिमान है। आगे भगवान कहते हैं कि इन्द्रियों में मैं मन हूँ। आधुनिक विज्ञान को अब तक केवल पाँच ही इन्द्रियाँ पता हैं। भगवान हमें यह बता रहे हैं कि मन छठी इन्द्रिय है।
मनः(ष्) षष्ठानीन्द्रियाणि, प्रकृतिस्थानि कर्षति॥१५.७॥
आगे भगवान कहते हैं कि प्राणियों में चेतना मैं हूँ। चेतन प्राणियों की प्राणशक्ति है, जिससे वे जीवित रहते हैं, वह मैं हूँ।
रुद्राणां(म्) शङ्करश्चास्मि,वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां(म्) पावकश्चास्मि, मेरुः(श्) शिखरिणामहम्॥10.23॥
और आठ वसु बताए गए हैं- अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास। वसुओं को सरल भाषा में दूसरी प्रकार से समझाया गया है, जिसके अनुसार अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश तथा इनके अतिरिक्त सूर्य, चन्द्रमा और तारे- ये आठ वसु कहे गए हैं।
योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि ग्यारह रुद्रों में मैं शङ्कर हूँ। शङ्कर मृत्यु के देवता तथा विनाश और प्रलय के अधिकारी हैं। जन्म और मृत्यु दोनों समग्रता से देखने की भारतीय दृष्टि है। भारतीय दृष्टि में मृत्यु को भी मङ्गल माना गया है। माना गया है कि मृत्यु अन्त नहीं, मध्य है और उसके पश्चात भी सृजन है। जीवन एक वर्तुल समझ गया है। हमारे यहाँ बहुत सुन्दर-सुन्दर श्लोक भगवद्गीता में भी हैं और वेदों में भी।
श्रीमद्भागवदगीता में मृत्यु को तो कपड़े बदलने के समान बताया गया है।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते||
कुबेर एक अति का नाम है, धन की अति या विपुलता। धन की आकाङ्क्षा जब बहुत ज्यादा होती है, तब वह राक्षस समझे जाते हैं। हमारी सोच से परे विपुल धन यानि कुबेर। इतनी विपुलता आ जाती है, वहाँ आकर्षण भी समाप्त हो जाते हैं। उसका कोई महत्त्व नहीं बचता। जब तक कुछ नहीं होता तब तक मानव चाहता है कि वह मिले। जब मिल जाता है तो उसकी महत्ता खत्म हो जाती है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि मैं यक्ष और राक्षसों में कुबेर हूँ।
भगवान कहते हैं कि पर्वतों में मैं मेरु हूँ। मेरु रत्नों के भण्डार वाला पर्वत माना गया है, इसलिए मेरु पर्वत श्रेष्ठतम पर्वत है।
पुरोधसां(ञ्) च मुख्यं(म्) मां(म्), विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।
सेनानीनामहं(म्) स्कन्दः(स्),सरसामस्मि सागरः॥10.24॥
आज का अन्तरिक्ष विज्ञान तो अभी विकसित हुआ, लेकिन हमारे यहाँ उस काल में भी सेनापति को ऊपर देखने को कहा गया। हम समझ सकते हैं कि शास्त्र कितना विकसित हो गया। जो हवा में भी उड़ता है, जमीन पर भी चलता है और पानी में भी तैरता है। ऐसे जल, थल और नभ तीनों में अपना अस्तित्व रखने वाले मोर को कार्तिकेय का वाहन बनाया गया। उसको रङ्ग भी ऐसे दिए गए जैसे हमारे सेना में हैं, जो जल्दी से किसी को दिखाई न दे। मोर अपने पङ्खो को पीछे से उठा लेता है ताकि पीछे से आने वाले शत्रु को आगे कुछ दिखाई न दे।
भगवान कहते हैं, जलाशय में मैं सागर हूँ। अपनी सीमाओं में रहने वाला गम्भीर और सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा पानी का स्रोत है सागर।
महर्षीणां(म्) भृगुरहं(ङ्),गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां(ञ्) जपयज्ञोऽस्मि, स्थावराणां(म्) हिमालयः॥10.25॥
गिर शब्द भाषा के अक्षरों से सम्बन्धित है और उसमें मैं एक अक्षर ओङ्कार हूँ। एक ओङ्कार सतनाम। यह एकमात्र अक्षर है जो कण्ठ से नीचे से आता है, शेष सभी अक्षर कण्ठ से ऊपर से ही निकलते हैं। प, फ, ब, भ, म- ओष्ठ्य हैं, त, थ, द, ध, न- दंत्य हैं। ये सभी अक्षर ऊपर ही रह जाते हैं, परन्तु कण्ठ से नीचे तक जाने वाली केवल एक ही ध्वनि है, वह है प्रणव, ॐ, अनहद नाद।
जप यज्ञ सबसे श्रेष्ठ बताया गया है। इसको किसी सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। बारिश होने पर समिधाएँ गीली हो जाएँ तो यज्ञ में विघ्न पड़ सकता है, परन्तु जप यज्ञ अनवरत चलने वाला क्रम है। यह किसी भी ऋतु, काल और अशौच के समय में भी, मन में भी जब चलता रहे तो उसमें कोई बाधा नहीं आती।
न हिलने वाली वस्तुओं में मैं हिमालय हूँ, जो कि स्थिर और अडिग खड़ा है।
अश्वत्थः(स्) सर्ववृक्षाणां(न्),देवर्षीणां(ञ्) च नारदः।
गन्धर्वाणां(ञ्) चित्ररथः(स्), सिद्धानां(ङ्) कपिलो मुनिः॥10.26॥
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५.१॥
भगवान आगे कहते हैं, देवर्षियों में मैं नारद हूँ। देवर्षि भी अनेक हैं और नारद भी अनेक परन्तु देवर्षि नारद एक ही हैं, जिनका तीनों लोकों में सहज विचरण होता है। जो भगवान का मन जानते हैं और भगवान के प्रिय, वह देवर्षि नारद भगवान की विभूति हैं।
अर्जुन और चित्ररथ की घनिष्ठता है। गान विद्या अर्जुन ने चित्ररथ से ही सीखी है। भगवान अपनी अनेक विभूतियों में से अर्जुन की परिचित चीजों की ही बात कर रहे हैं। अतः भगवान गन्धर्वों में चित्ररथ की बात करते हैं।
भगवान कहते हैं कि सिद्धों में मैं कपिल मुनि हूँ। कुछ तप से सिद्ध होते हैं, जबकि कुछ जन्म से ही सिद्ध होते हैं। कपिल मुनि जन्म से ही सिद्ध हैं। कर्दम जी के यहाँ पर देवहूति के गर्भ से कपिल मुनि का जन्म हुआ और वे उस साङ्ख्य शास्त्र के जनक हैं, जो कि श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भी बताया गया है।
उच्चैःश्रवसमश्वानां(म्),विद्धि माममृतोद्भवम्।
ऐरावतं(ङ्) गजेन्द्राणां(न्), नराणां(ञ्) च नराधिपम्॥10.27॥
गावः कामदुहा सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवांगनाः॥
अश्वः सप्तमुखो विषं हरिधनुः शंखोमृतं चाम्बुधेः।
रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्यात्सदा मंगलम्॥
आयुधानामहं(म्) वज्रं(न्), धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः(स्), सर्पाणामस्मि वासुकिः॥10.28॥
भगवान कहते हैं कि गायों में मैं कामधेनु हूँ।
कन्दर्प यानी कामदेव। केवल विषयों की ओर ले जाने वाला काम अलग है। सृष्टि के विस्तार के लिए, अपनी पीढ़ियों को आगे बढ़ाने के लिए और पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए गृहस्थी के लिए जो धर्म सम्मत बताया गया है, वह काम भगवान की विभूति है।
इसकी व्याख्या गीता के सातवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में आती है:
भगवान आगे कहते हैं कि सारे सर्पों में मैं वासुकि हूँ। वासुकि वह नाग है जिसे समुद्र-मन्थन के समय रस्सी बनाकर उससे समुद्र-मन्थन किया गया था।
अनन्तश्चास्मि नागानां(म्), वरुणो यादसामहम्।
पितॄणामर्यमा चास्मि, यमः(स्) संयमतामहम्॥10.29॥
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां(ङ्), कालः(ख्) कलयतामहम्।
मृगाणां(ञ्) च मृगेन्द्रोऽहं(म्), वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥10.30॥
पवनः(फ्) पवतामस्मि, रामः(श्) शस्त्रभृतामहम्।
झषाणां(म्) मकरश्चास्मि, स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥10.31॥
सात पितरों में अर्यमा को तथा न्यायपूर्वक शासन करने वालों में यम को भगवान ने अपनी विभूति कहा।
प्रह्लाद जी दैत्यकुल में उत्पन्न होकर भी भक्तराज बने, अतः भगवान उन्हें अपना स्वरूप बताते हैं।
हमारी कालगणना में मास, पक्ष, सप्ताह, दिवस आदि अनेक प्रकार हैं, परन्तु यह सारी कालगणना जिसमें निहित है, वह काल भगवान का ही स्वरूप है।
सारे प्राणियों में सिंह और पक्षियों में गरुड़ अर्थात वैनतेय को भगवान अपनी विभूति बताते हैं। वैनतेय शब्द आया है गरुड़ की माँ विनिता के नाम से। गरुड़ के उड़ने पर जो उनके पङ्खों के फड़फड़ाने से ध्वनि निकलती है, उस ध्वनि में हमारे ऋषि-मुनियों ने एक साम्य पाया और उसे सामगान कहा। इस ध्वनि और सामवेद की रचनाओं में एक समानता है। वायु, श्रीराम, मगर और गङ्गा जी के श्रेष्ठ उदाहरण भी भगवान ने यहाँ पर बताए।
सर्गाणामादिरन्तश्च,मध्यं(ञ्) चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां(म्), वादः(फ्) प्रवदतामहम्॥10.32॥
परस्पर शास्त्रार्थ करने वालों का तत्त्व के निर्णय के लिए किया जाने वाले वाद को भगवान अपना ही स्वरूप बताते हैं। शास्त्रार्थ तीन प्रकार के होते हैं: जल्प, वितण्ड और वाद। जल्प में एक पक्ष खण्डन करता है और दूसरा पक्ष मण्डन करता है। खण्डन और मण्डन जीतने के लिए किए जाते हैं। आदि शङ्कराचार्य और मण्डन मिश्र का जो शास्त्रार्थ था, वह जल्प था, जिसमें आदि शङ्कराचार्य जीते और मण्डन मिश्र का पराभव हुआ।
वितण्ड में केवल खण्डन होता है। कई लोग ऐसे मिलते हैं जो केवल वितण्डवादी होते हैं। जैसे कोई कहे कि कितना प्यारा बच्चा है! तो वे कहेंगे कि इसमें क्या प्यारा है, हाड़-माँस का पुतला ही तो है, क्षणभङ्गुर है, इसमें क्या सुन्दरता है? कोई कहे कि देखो, कितना सुन्दर सूरज है! तो भी वे कहेंगे कि इसमें क्या सुन्दरता है? यह तो आग का एक गोला है। हर बात को इसी प्रकार नकारात्मक रूप से लेंगे। केवल खण्डन करने में लगे रहने वाले लोगों को भी कई लोग बहुत महत्त्व देते हैं, उनको बड़ा विद्वान समझते हैं।
तीसरा होता है शास्त्रार्थ जिसमें वाद होता है, वह ज्ञान की वृद्धि के लिए किया जाता है, इसका निचोड़ परम ज्ञान निकलता है। इसमें साथ में बैठकर चिन्तन-मनन होता है। उस मन्थन को, उस विचार-विनिमय को वाद कहा जाता है। उसे भी भगवान अपना स्वरूप बताते हैं।
अक्षराणामकारोऽस्मि, द्वन्द्व:(स्) सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः(ख्) कालो, धाताहं(म्) विश्वतोमुखः॥10.33॥
श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि मैं अक्षय काल हूँ। बाकी सारा समय सूर्य की कालगणना के साथ मापा जाएगा लेकिन जब सूर्य ही विलय हो जाएगा, उस महाप्रलय के समय में जो गणना होगी, वह गणना जिस परिमाण से की जाएगी, वह परिमाण है अक्षय काल। एक दिन यह सूरज भी विलय हो जाएगा। भगवान कह रहे हैं कि वह अक्षय काल मैं हूँ।
सब ओर भगवान के मुख हैं, सब ओर भगवान की दृष्टि है। सब का भरण पोषण करने वाले भगवान हैं, इसलिए भगवान कह रहे हैं कि सब ओर मुख वाला धारणकर्त्ता मैं हूँ।
मृत्यु:(स्) सर्वहरश्चाहम्, उद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः(श्) श्रीर्वाक्च नारीणां(म्), स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥10.34॥
हमारे यहाँ नारी का सम्मान बहुत किया गया है यह इसका भी एक उदाहरण है। अन्यथा बहुत सी ऐसी बातें होती रहती हैं कि सनातन संस्कृति पुरुष प्रधान संस्कृति है।
हमारे यहाँ कहा जाता है:
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
जहाँ पर नारी का पूजन होता है, वहाँ नारायण आकर बसते हैं। हमारे यहाँ भगवान के प्रत्येक नाम से पहले भगवती का नाम लिया गया है। हम विष्णु लक्ष्मी ना कहकर लक्ष्मी विष्णु या लक्ष्मी नारायण कहते हैं, हम सीताराम, राधा कृष्ण कहते हैं। नारी का सम्मान हमारी मूलभूत संरचना में व्याप्त है।
बृहत्साम तथा साम्नां(ङ्),गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां(म्) मार्गशीर्षोऽहम्, ऋतूनां(ङ्) कुसुमाकरः॥10.35॥
द्यूतं(ञ्) छलयतामस्मि,तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि, सत्त्वं(म्) सत्त्ववतामहम्॥10.36॥
वृष्णीनां(म्) वासुदेवोऽस्मि, पाण्डवानां(न्) धनञ्जयः।
मुनीनामप्यहं(म्) व्यासः(ख्), कवीनामुशना कविः॥10.37॥
दण्डो दमयतामस्मि, नीतिरस्मि जिगीषताम्।
मौनं(ञ्) चैवास्मि गुह्यानां(ञ्), ज्ञानं(ञ्) ज्ञानवतामहम्॥10.38॥
यच्चापि सर्वभूतानां(म्), बीजं(न्) तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्, मया भूतं(ञ्) चराचरम्॥10.39॥
दूसरी-तीसरी कक्षा में आने के बाद ग से गणेश जैसा कुछ भी ध्यान में रखने की आवश्यकता नहीं रहती। उसी प्रकार एक बार समझ लिया कि यह सारी विभूतियाँ भगवान की हैं, तो उसके पश्चात उनको ध्यान में रखने की आवश्यकता नहीं। भगवान स्वयं इस बात को अधोरेखित करते हैं।
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां(म्), विभूतीनां(म्) परन्तप।
एष तूद्देशतः(फ्) प्रोक्तो,विभूतेर्विस्तरो मया॥10.40॥
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं(म्), श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं(म्), मम तेजोंऽशसम्भवम्॥10.41॥
अथवा बहुनैतेन, किं(ञ्) ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं(ङ्) कृत्स्नम्, एकांशेन स्थितो जगत्॥10.42॥
यहाँ पर यह विभूति योग का ज्ञानमय विवेचन पूर्ण हुआ। इसके पश्चात प्रश्नोत्तर हुए।
प्रश्न: गीता में भगवान ने भूत और उच्छिष्ट किसे कहा है?
उत्तर: सम्पूर्ण प्राणशक्ति से युक्त चर-अचर को भगवान ने भूत कहा है। उच्छिष्ट का अर्थ होता है जूठा। तीन प्रकार के अन्नों में जूठे पदार्थ को तामस के अन्तर्गत कहा गया है। एक ही थाली से दूसरा खाए तो उसे जूठा समझते हैं। कोरोना काल में हमें अपनी शास्त्रोक्त रीतियों की महत्ता पता चलीं।
प्रश्नकर्त्ता: कमलेश शर्मा दीदी
प्रश्न: हमारे यहाँ पीपल के वृक्ष को घर में लगाने से मना क्यों किया जाता है?
उत्तर: पीपल की जड़ें बहुत मजबूत और फैलने वाली होती हैं, जो पत्थर को भी फोड़ देती हैं। इसलिए घर से कुछ दूरी पर लगाने को बोला जाता है अन्यथा घर की नींव को खतरा हो जाता है।
वृक्ष को बढ़ने ही नहीं देना भी पाप माना जाता है, इसलिए बोन्साई को भी निशुद्ध माना गया है।
प्रश्नकर्त्ता: अक्षय भैया
प्रश्न: इस अध्याय में भगवान ने स्वयं को मन कहा है और अन्य किसी अध्याय में भगवान ने मन को बुद्धि से नियन्त्रण में रखने की बात कही है। ऐसा क्यों?
उत्तर: भगवान ने छठे अध्याय में कहा है कि-
प्रारम्भ में कठिन लगता है पर मन का दमन प्रारम्भ में ही करना पड़ता है, बाद में यह सब कुछ मन से होता है। बाद में द पृथक हो जाता है और फिर सब मन से होता है। यह निश्चयात्मक मन भगवान का ही रूप है।
प्रश्नकर्त्ता: अक्षय भैया
प्रश्न: मन यदि भगवान है, तो फिर आत्मा क्या है?
उत्तर: आत्मा तो मन-बुद्धि से भी परे है। वह शरीर में केवल उपस्थित रहती है। जो कुछ भी घटित होता है, वह प्रकृति में अर्थात पाँच महाभूतों और मन, बुद्धि और अहङ्कार में ही घटित होता है। प्रकृति के अधीन हो कर आत्मा भीतर बैठा है, वह इस अष्टधा प्रकृति से भिन्न है। उसके अस्तित्व की सुगन्ध प्राप्त करने के लिए अष्टाङ्ग योग की साधना बतायी गयी है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥