विवेचन सारांश
दुर्योधन द्वारा दोनों सेनाओं के शूरवीरों का परिचय

ID: 3816
हिन्दी
शनिवार, 14 अक्टूबर 2023
अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग
1/4 (श्लोक 1-12)
विवेचक: गीता विशारद श्री श्रीनिवास जी वर्णेकर


आज के सत्र का आरम्भ पावन प्रार्थना और दीप प्रज्वलन के साथ परम पूजनीय स्वामी गुरु गोविन्ददेव गिरि जी महाराज तथा अपने माता-पिता एवम् अपने पितरों को प्रणाम करने के साथ हुआ।

श्री ज्ञानेश्वर महाराज जी ने भगवद्गीता को जागृतेश्वर वेद कहा है। भगवद्गीता को ग्रन्थ कहने में अजीब लगता है क्योंकि यह आकार में तो लघुत्तम है परन्तु ज्ञान में बहुत उत्तम है।

जिस प्रकार चकोर के बच्चे एकाग्रचित्त होकर शरद काल की चन्द्र कलाओं के कोमल अमृत कण चुनते हैं, उसी प्रकार भगवद्गीता को अन्तःकरण की सूक्ष्मता और शुद्धता से सुनना और समझना चाहिए। वैसे तो गीता के दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से भगवान ने ज्ञान देना आरम्भ किया था परन्तु फिर भी अर्जुन की परिस्थिति, मन: स्थिति और सन्दर्भ को जानने के लिए पहले अध्याय को पढ़ना बहुत आवश्यक है। अर्जुन की मन: स्थिति को समझने के लिए अर्जुन की भूमिका में जाना पड़ेगा।


1.1

धृतराष्ट्र उवाच:
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे, समवेता युयुत्सवः।
मामकाः(फ्) पाण्डवाश्चैव, किमकुर्वत सञ्जय।।1.1।।

धृतराष्ट्र बोले - हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

विवेचन:- श्रीमद्भगवदगीता का आरम्भ धृतराष्ट्र के प्रथम प्रश्न पूछने से होता है। धृतराष्ट्र पाण्डु का राज्य हड़पकर बैठा था। वह पुत्र प्रेम में अन्धा हो गया था। नेत्र से तो अन्धा था ही, बुद्धि से भी पुत्र प्रेम के कारण अन्धा हो गया था।  सभी लोग इस युद्ध के पक्ष में नहीं थे परन्तु जब  धृतराष्ट्र ने एक सुई की नोक जितनी जमीन भी देना स्वीकार नहीं किया तो किसी भी हालत में युद्ध टल नहीं सका और युद्ध होना आवश्यक हो गया।

धृतराष्ट्र, युद्ध भूमि में क्या हो रहा है और क्या होने वाला है? यह सब जानना चाहते थे। सञ्जय को गुरु वेद व्यास जी के द्वारा दी हुई दिव्य दृष्टि प्राप्त थी। वह युद्ध भूमि में क्या हो रहा है, यह सब कुछ वहीं बैठकर देख सकते थे और सुन सकते थे। सञ्जय एक पत्रकार की भूमिका निभा रहे थे। धृतराष्ट्र ने सञ्जय से उत्सुक होकर पूछा युद्ध भूमि में मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

युद्ध में क्या होने वाला है और क्या हो रहा है, उसकी सच्चाई के बारे में अपने राजा को बताना कितना साहसपूर्ण है, यह हमें सञ्जय से सीखना चाहिए।

पहले श्लोक में ही धृतराष्ट्र ने अपनी बुद्धि का परिचय दे दिया था। उन्होंने मेरा और तेरा का भाव दिखा दिया था। उसमें यह प्रभाव पूरी तरह दिख रहा था।

अहिल्या रानी भगवद्गीता को पढ़ना और जानना चाहती थी। इसके लिए एक ब्राह्मण को बुलाया गया। जब ब्राह्मण ने उन्हें पहला श्लोक ही सुनाया तो वह सुनकर बोलीं कि मुझे गीता का सार समझ मे आ गया है। प्रत्येक क्षेत्र में, मैं धर्म का पालन करूँ अर्थात् अपने-अपने कार्य क्षेत्र में अच्छे से अपने कर्त्तव्य का पालन करना ही धर्म है। अर्जुन अपने कर्त्तव्य से विमुख हो गए थे तो भगवान ने उन्हें उपदेश दिया। सब कुछ सुनने और समझने के बाद अन्त में अर्जुन ने कहा; आप जैसा कहोगे मैं वैसा ही करूँगा। 

1.2

सञ्जय उवाच: दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं(व्ँ), व्यूढं(न्) दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसङ्गम्य, राजा वचनमब्रवीत्॥1.2॥

संजय बोले - उस समय व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर राजा दुर्योधन ने द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।

विवेचन:- सञ्जय ने बताया कि व्यूह रचना में खड़ी हुई पाण्डवों की सेना को देख कर राजा दुर्योधन ने आचार्य द्रोण के पास जाकर ये वचन कहे।

1.3

पश्यैतां(म्) पाण्डुपुत्राणाम्, आचार्य महतीं(ञ्) चमूम्। व्यूढां(न्) द्रुपदपुत्रेण, तव शिष्येण धीमता।।1.3।।

हे आचार्य! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न के द्वारा व्यूहकार खड़ी की हुई पाण्डवों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये।

विवेचन :-   दुर्योधन ने कहा कि आचार्य यह पाण्डवों की सेना को देखो। आपके प्रिय मित्र द्रुपद के पुत्र, आपके बुद्धिमान शिष्य और द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने इस व्यूह की रचना की है। दुर्योधन ऐसा बोलकर आचार्य द्रोण को याद दिलाना चाहते था कि द्रुपद जिसके लिए आचार्य के मन में वैर है, यह उनका पुत्र है। ऐसा कहकर वह उन्हें उनके अपमान की याद दिलाना चाहता था।

आचार्य द्रोण का अर्जुन के लिए अति प्रेम है इसलिए जानबूझकर उन्हें क्रोध दिलाने के लिए उसने ऐसा बोला। वह फिर बोला, पाण्डु की विशाल सेना को देखें कितनी बड़ी है। ऐसा कहकर वह आगे बोला, उनकी सेना में कौन-कौन लोग भाग ले रहे हैं यह सब आपको बताता हूँ।

1.4

अत्र शूरा महेष्वासा, भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च, द्रुपदश्च महारथः।।1.4।।

यहाँ (पाण्डवों की सेना में) बड़े-बड़े शूरवीर हैं, (जिनके) बहुत बड़े-बड़े धनुष हैं तथा (जो) युद्ध में भीम और अर्जुन के समान हैं। (उनमें) युयुधान (सात्यकि), राजा विराट और महारथी द्रुपद (भी हैं)।

विवेचन :- दुर्योधन आचार्य को बता रहे हैं, यहाँ बड़े-बड़े धनुष धारण करने वाले तथा भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि, जो कि अर्जुन के शिष्य हैं और राजा विराट हैं। महारथी राजा द्रुपद जैसे अनेक श्रेष्ठ योद्धा हैं।

1.5

धृष्टकेतुश्चेकितानः(ख्), काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च, शैब्यश्च नरपुङ्गवः।।1.5।।

धृष्टकेतु और चेकितान तथा पराक्रमी काशिराज (भी हैं)। पुरुजित् और कुन्तिभोज – (ये दोनों भाई) तथा मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य (भी हैं)।

विवेचन :- यहाँ पर धृष्टकेतु है जो शिशुपाल के पुत्र हैं। चेकितान है जो यादव वंश का है। सारा यादव वंश कौरवों के साथ है केवल चेकितान पाण्डु पुत्रों का साथ दे रहा है।

अर्जुन जब भगवान श्रीकृष्ण के पास युद्ध में सहायता लेने के लिए गए तो भगवान विश्राम कर रहे थे। वे सोए हुए थे अतः अर्जुन भगवान के चरणों के पास जाकर खड़े हो गए। उसी समय दुर्योधन भी भगवान से सहायता माँगने के लिए आया। वह भगवान के सिर के पास जाकर खड़ा हो गया। कुछ देर बाद जब भगवान उठे तो उन्होंने पहले अर्जुन को देखा, उसके बाद उन्होंने दुर्योधन को देखा। दोनों ने उनसे मदद और साथ माँगा। भगवान बोले मैंने प्रतिज्ञा ली है कि मैं युद्ध में शस्त्र धारण नहीं करूँगा। केवल युद्ध में साथ रहूँगा। एक तरफ मेरी नारायणी सेना रहेगी और एक तरफ मैं, बोलो क्या चाहिए? अर्जुन बोला, मुझे केवल आप चाहिए। मुझे और कुछ नहीं चाहिए। (ऐसी ही हमारी भक्ति होनी चाहिए) तभी तो भगवान अर्जुन के सारथी बनें। दुर्योधन को भगवान की नारायणी सेना मिली जिसे पाकर वह अत्यन्त हर्षित हो गए।

काशिराज बड़े ही शूरवीर और महारथी हैं। यह भी पाण्डवों की सेना में खड़ा है। पुरजित और कुन्तिभोज यह दोनों कुन्ती के भाई होने से अर्जुन के मामा हैं। नर श्रेष्ठ राजा शैब्य युधिष्ठिर के ससुर हैं। पाण्डु के कुछ सेनापति भी हैं। दुर्योधन ने यह सब आचार्य द्रोण को बताया।

1.6

युधामन्युश्च विक्रान्त, उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च, सर्व एव महारथाः।।1.6।।

पराक्रमी युधामन्यु और पराक्रमी उत्तमौजा (भी हैं)। सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र (भी हैं)। (ये) सब के सब महारथी हैं।

विवेचन :-  उत्तमौजा और युधामन्यु जैसे वीर्यवान और पराक्रमी योद्धा, शक्तिवान, बलवान और महारथी, सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु भी युद्ध में भाग ले रहे हैं। द्रौपदी के पाँचों पुत्र युद्ध करने के लिए पाण्डु की सेना में उपस्थित हैं और सभी महारथी हैं।

1.7

अस्माकं(न्) तु विशिष्टा ये, तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य, संज्ञार्थं(न्) तान्ब्रवीमि ते।।1.7।।

हे द्विजोत्तम! हमारे पक्ष में भी जो मुख्य (हैं), उन पर भी (आप) ध्यान दीजिये। आपकी जानकारी के लिये मेरी सेना के (जो) नायक हैं, उनको (मैं) कहता हूँ।

विवेचन :- हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! (आचार्य द्रोण)! हमारे पक्ष में भी जो श्रेष्ठ योद्धा हैं, उनको भी जान लो, मेरी सेना के नायकों को भी जान लो। दुर्योधन ने जो ग्यारह अक्षौहिणी सेना इकट्ठी की है, इसका कारण दुर्योधन का एक ही गुण है; वह सबसे बहुत जल्दी मित्रता कर लेता है। उसी का परिणाम है इतनी बड़ी सेना। उसे इस बात का अहङ्कार भी है, इसलिए दुर्योधन मेरी सेना कह रहा है। वह बोला आचार्य, आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, मैं सबके नाम बताता हूँ।

1.8

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च, कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च, सौमदत्तिस्तथैव च।।1.8।।

आप (द्रोणाचार्य) और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।

विवेचन :- मुख्य रूप से- आचार्य आप स्वयं और पितामह भीष्म। आप दोनों सर्वश्रेष्ठ और ज्येष्ठ भी हैं। राजा कर्ण भी हमारे पक्ष में हैं। दुर्योधन ने अङ्ग देश का राज्य देकर कर्ण को अङ्ग देश का राजा बनाया था जो सदैव युद्ध में विजय होने वाला शूरवीर योद्धा है। सङ्ग्राम विजयी कृपाचार्य और चिरञ्जीवी अश्वत्थामा है। मेरा धर्मात्मा और शूरवीर भाई विकर्ण भी है। सोमदत्त के पुत्र सोमदत्ती भी हमारे पक्ष में हैं।

1.9

अन्ये च बहवः(श्), शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः(स्), सर्वे युद्धविशारदाः।।1.9।।

इनके अतिरिक्त बहुत से शूरवीर हैं, (जिन्होंने) मेरे लिये अपने जीने की इच्छा का भी त्याग कर दिया है और जो अनेक प्रकार के -शस्त्रास्त्रों को चलाने वाले हैं (तथा जो) सब के सब युद्धकला में अत्यन्त चतुर हैं।

विवेचन :- अन्य भी बहुत सारे शूरवीर योद्धा जो मेरे लिए जीवन का त्याग करने के लिए तैयार हैं, वे हमारे पक्ष में हैं। जो अनेक प्रकार के शस्त्र लेकर युद्ध में जीतने के लिए आए हुए हैं।

1.10

अपर्याप्तं(न्) तदस्माकं(म्), बलं(म्) भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं(न्) त्विदमेतेषां(म्), बलं(म्) भीमाभिरक्षितम्।।1.10।।

भीष्मपितामह द्वारा रक्षित हमारी यह सेना वह सेना स प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों कि यह सेना जीतने में सुगम है।

विवेचन :- हमारी सेना का बल अपर्याप्त है (यहाँ अपर्याप्त का अर्थ अमर्याद है, अर्थात जिसे जीता न जा सके) इसलिये विजय हमारी होगी। हमारी सेना के रक्षक पितामह भीष्म हैं। पाण्डु की सेना पर्याप्त है और उसका रक्षक भीम है।

दुर्योधन का मिश्रित भाव है। एक तरफ तो उसे लगता है उसकी सेना बड़ी है, कभी कहता है छोटी है। वह डरा हुआ है क्योंकि वह अधर्मी है, अन्यायी है। ऐसा मनुष्य कभी भी निर्भय नहीं हो सकता। उसे लगता है पितामह प्रतिज्ञा लेने के कारण खड़े तो हमारे साथ हैं पर कहीं ये पाण्डवों का साथ न दे दें। वह अपनी सेना को अपर्याप्त बता रहा है और पाण्डवों की सेना को पर्याप्त बता रहा है।


1.11

अयनेषु च सर्वेषु, यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु, भवन्तः(स्) सर्व एव हि।।1.11।।

आप सब के सब लोग सभी मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह दृढ़ता से स्थित रहते हुए ही निश्चित रूप से पितामह भीष्म की चारों ओर से रक्षा करें।

विवेचन :- दुर्योधन अपनी सेना को आज्ञा दे रहे हैं। सब अपनी-अपनी व्यूह रचना के अनुसार जैसा आपको कहा गया है अपनी-अपनी जगह जाकर खड़े हो जाओ। आप सभी को भीष्म पितामह; जो हमारे पक्ष के स्तम्भ हैं, उनकी रक्षा करनी है।

1.12

तस्य सञ्जनयन्हर्षं(ङ्), कुरुवृद्धः(फ्) पितामहः।
सिंहनादं(व्ँ) विनद्योच्चैः(श्), शङ्खं(न्) दध्मौ प्रतापवान्॥1.12॥

उस (दुर्योधन) के (हृदय में) हर्ष उत्पन्न करते हुए कौरवों में वृद्ध प्रभावशाली पितामह भीष्म ने सिंह के समान गरज कर जोर से शंख बजाया।

विवेचन :-  दुर्योधन को हर्षित करने के लिए महापराक्रमी, महाप्रतापी भीष्म ने बहुत जोर से सिंह गर्जना की और अपना शङ्ख बजाया।

युद्ध भूमि में जब शङ्खनाद किया जाता है तब इसका अर्थ होता है कि युद्ध करने के लिए मैं आज्ञा देता हूँ। हमें परिस्थिति के अनुसार अपनी मन: स्थिति को बदलना चाहिए। अर्जुन की भूमिका में जाकर अगर हम भगवद्गीता को समझने का प्रयास करेंगे तो हमें भगवद्गीता अधिक अच्छी तरह समझ आएगी। आगे की अर्जुन की परिस्थिति और मन: स्थिति को हम अगले सत्र में समझेंगे।

प्रश्नोत्तर 
प्रश्नकर्ता:- मगन भैया
प्रश्न:- परमात्मा को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है?
उत्तर:- जो परमात्मा के साथ एक रूप हो जाते हैं वो उसे प्राप्त कर लेते हैं। जो प्रयाण काल आने पर भी उनमें मन लगाए रखते हैं।

प्रश्नकर्ता :- राजीव भैया
प्रश्न :- प्रथम अध्याय के दसवें श्लोक में अपर्याप्त का अर्थ क्या है?
उत्तर :- यहाँ पर अपर्याप्त का अर्थ अमर्याद है अर्थात् इसे जीता जाना सम्भव नहीं है। दुर्योधन कह रहा है कि मेरी सेना बहुत बड़ी और शक्तिशाली है उसे कोई नहीं जीत सकता है।

प्रश्कर्ता :- आसावरी दीदी
प्रश्न :- सुबोध भावार्थ दीपिका पुस्तक कहाँ और कैसे मिलेगी?
उत्तर :- सुबोध भावार्थ दीपिका पुस्तक ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा लिखित ज्ञानेश्वरी का सरल मराठी ओवीबद्ध अनुवाद है। यह आपको jsyog.org नामक वेबसाइट पर ऑनलाइन उपलब्ध हो जाएगी। आप इसे ऑनलाइन मँगवा सकते हैं।

प्रश्कर्ता :- अर्पणा प्रकाश दीदी
प्रश्न :- भीष्म पितामह अपनी प्रतिज्ञा के कारण सिंहासन से जुड़े हुए हैं लेकिन जब गलत निर्णय हो रहे थे तो उन्होंने रोका क्यों नहीं?
उत्तर :- नहीं रोका, यही गलत निर्णय था। प्रतिज्ञा ली थी तो उसे नहीं तोड़ना था। उन्होंने सच का साथ देने को अधिक महत्त्व नहीं देते हुए उनकी प्रतिज्ञा पालन को अधिक महत्त्व दिया। प्रतिज्ञा श्रीकृष्ण ने भी ली थी कि वह कभी शस्त्र नहीं उठाएँगे, किन्तु उन्होंने सत्य का साथ देने के लिए अपनी यह प्रतिज्ञा तोड़ दी थी।

प्रश्नकर्ता :- अचला दीदी
प्रश्न :- अर्जुनविषादयोग में सभी की मन: स्थिति बताई गई है। इसे हमें किस प्रकार से अपने जीवन में उतारना है या उसकी पालना करनी है?
उत्तर :- गीता पढ़े पढ़ाएँ जीवन में लाएँ- इस वाक्य के अनुसार हमें भगवान के वचनों को अपने जीवन में लाना है, किन्तु प्रथम अध्याय अर्जुविषादयोग में भगवान के द्वारा कोई वचन नहीं कह गए हैं। प्रथम अध्याय भगवान के वचनों को समझने के लिए सन्दर्भ मात्र है। इस अध्याय में अर्जुन के मन की विषाद स्थिति को बताया गया है। जिसमें श्रीकृष्ण भगवान के साथ के कारण अर्जुन का विषाद भी विषादयोग में परिवर्तित हो गया है।

प्रश्नकर्ता :- राजकिशोर साहू भैया
प्रश्न :- दुर्योधन ने अपनी सेना की समस्त स्थिति भीष्म के सेनापति होते हुए भी आचार्य द्रोण को क्यों बताई?
उत्तर :- भीष्म पितामह तो दुर्योधन की सेना के सेनापति थे, उन्हें सब ज्ञात था और आचार्य द्रोण दुर्योधन के गुरु थे इसीलिए दुर्योधन ने सेना के सम्बन्ध में आचार्य द्रोण को बताया।

प्रश्नकर्ता :- राजकिशोर साहू भैया
प्रश्न :- राजा द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न को द्रोणाचार्य ने कब शिक्षा दी थी?
उत्तर :- राजा द्रुपद ने अपने पुत्र को शिक्षा प्राप्त करने के लिए द्रोणाचार्य के पास भेजा था। शिक्षा देते समय आचार्य अपने शिष्यों के प्रति कोई वैर नहीं रखते हैं। 

प्रश्नकर्ता :- गौरी महाजन दीदी
प्रश्न :- जब कोई व्यक्ति पुनर्जन्म लेता है और उसे अपने पिछले जन्म का सभी कुछ याद होता है तो यह किस प्रकार की स्मरण शक्ति होती है?
उत्तर :- "There is always exceptions rather than exceptions to prove the law."
जिस प्रकार स्मरण शक्ति होती है उसी प्रकार विस्मरण शक्ति भी होती है। कभी-कभी प्रकृति के नियमों के विरुद्ध अपवाद हो जाते हैं और किसी-किसी व्यक्ति को अपने पूर्व जन्मों का भी ध्यान रहता है और ऐसे ही घटनाक्रम पुनर्जन्म के सिद्धान्त के पक्ष में होते हैं।