विवेचन सारांश
स्वजनों को देखकर अर्जुन की दुविधा का वर्णन
प्रार्थना के साथ विवेचन प्रारम्भ हुआ। गीता परिवार में गीता जी सीखने का आरम्भ बारहवें अध्याय से होता है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम घूम-फिर कर पहले अध्याय की ओर आ रहे हैं। हम पीछे से पहले अध्याय की ओर क्यों आ रहे हैं? ऐसा प्रश्न मन में उठता है। हमारे शास्त्रों की पद्धति क्रम से जाने की नहीं है। हमेशा क्रम तात्पर्य पर आधारित होता है। बारहवाँ अध्याय भक्तियोग सिखाता है। अगर हम पहले अध्याय में अर्जुनविषादयोग और दूसरे अध्याय में सांख्ययोग सीखेंगे; तो मुश्किल हो जाएगी। ऐसा लगेगा कि हमसे होगा ही नहीं। इसलिए स्वामी जी ने बारहवें अध्याय को L-1 में रखा है। अगर किसी के पास बाद में समय न हो तो कम से कम उसे भक्ति तो मिल जाएगी। L-1 के माध्यम से बीस दिन में दो अध्याय सीखने के बाद एक आत्मविश्वास आता है कि अब पूरी गीता सीख सकेंगे। इसलिए पहला अध्याय बाद में रखा है। महाभारत का मूल कारण बताया जाता है कि द्रौपदी ने दुर्योधन से कहा- अन्धे का पुत्र अन्धा। ऐसी कोई भी बात व्याख्यान या मूल महाभारत में नहीं है।
महाभारत का मूल कारण है- धृतराष्ट्र। इसलिए सञ्जय धृतराष्ट्र को राजा कहकर (राजा वचनमब्रवीत्) उलाहना देते हैं। सञ्जय कहते हैं आप गद्दी पर बैठे हैं किन्तु हमेशा से शासन तो दुर्योधन कर रहा है। धृतराष्ट्र दुर्योधन की कोई बात नहीं काटते थे। दुर्योधन ने बाल्यावस्था में ही भीम को विष देने का दुस्साहस किया था। तब दुर्योधन को मना किया होता, विरोध किया होता तो दुर्योधन ऐसा कभी नहीं करता। बात इतनी आगे नहीं बढ़ती। इसलिए सञ्जय धृतराष्ट्र से कह रहे हैं कि राजा तो आप है किन्तु राज्य तो दुर्योधन ही कर रहा है। सञ्जय कह रहे राजा तो दुर्योधन ही है। चाहे उसका राज्याभिषेक हुआ हो या नहीं हुआ हो। महाभारत की कथा शान्तनु से आरम्भ होती है। उनके पुत्र भीष्म गङ्गा जी से प्राप्त हुए थे। राजा शान्तनु की दूसरी पत्नी सत्यवती से दो पुत्र हुए- विचित्रवीर्य और चित्राङ्गद। विचित्रवीर्य की दो पत्नियाँ थी जिनको पितामहा भीष्म लेकर आए थे-अम्बिका और अम्बालिका। अम्बा ने किसी और का वरण किया था। इसलिए उसे छोड़ दिया गया। किसी कारण अंबिका और अम्बालिका को गर्भधारण नहीं हुआ तो सत्यवती ने वेदव्यास जी से उनके गर्भधारण के लिए निवेदन दिया। वेदव्यास भी सत्यवती और ऋषि पराशर के पुत्र थे। अम्बालिका वेदव्यास जी का तेज सहन नहीं कर पाई तो उसने आँखें बन्द कर ली। इसलिए उसका पुत्र धृतराष्ट्र अन्धा हुआ। अम्बिका ने वेदव्यास जी को देखा तो वह पीली पड़ गई। इसलिए उसका पुत्र पाण्डु (पीले) हुआ। पाण्डु से पाण्डव और धृतराष्ट्र से कौरव हुए। ऐसी सारी कथाएँ आती हैं।
युद्ध होगा यह बात चौरस के कारण हुई। चौरस में पाण्डव हार गये जिसके कारण वे वनवास और अज्ञातवास में चले गए। वापस आने के बाद दुर्योधन से पाण्डवों ने अपना राज्य वापस माँगा तो दुर्योधन ने राज्य वापस नहीं दिया। तब युद्ध अनिवार्य हो गया। पाण्डवों ने कहा कि उन्हें कम से कम पाँच गाँव दे दिए जाएँ। पाँडव युद्ध नहीं चाहते थे। इसलिए श्रीकृष्ण सन्धि करना चाहते थे। भीम और द्रौपदी इसके लिए तैयार नहीं थे, किन्तु कृष्णजी करेंगे वह बात मानी जाएगी। तब श्रीकृष्णजी ने कहा की सन्धि के लिए तो हमको जाना ही पड़ेगा। किन्तु दुर्योधन ने सन्धि को भी ठुकरा दिया। युद्ध से पहले, पाण्डवों ने सबके पास जाकर आशीर्वाद लिया। यह नीति, शील की बातें सिखाता है। जब हम किसी के पास जाते हैं आशीर्वाद लेने तो विजयीभव ऐसे अच्छे आशीर्वाद मिलते हैं। लेकिन दुर्योधन ने किसी के पास जाकर आशीर्वाद नहीं लिया। दुर्योधन के मन में भय था। जब कोई गलत काम करता है तो उसके मन में भय बना ही रहता है। सोलहवें अध्याय में जो 'अभय' नामक दैवी गुण बताया गया है, वह कैसे आएगा? जितना सत्यनिष्ठ जीवन होगा उतना भय कम होगा। इस प्रकार युद्ध में श्रीकृष्ण जी की निर्णायक भूमिका होती हैI धृष्टद्युम्न के सेनापति होते हुए भी मुख्य सेनापति तो कृष्णजी हैं। अन्त में होगा वही जो श्रीकृष्ण चाहते हैं। अर्जुन ने कह दिया मुझे तो केवल आप ही चाहिए। दुर्योधन बड़े खुश हुए की अर्जुन ने नारायणी सेना को छोड़कर कृष्ण को माँग लिया। अर्जुन की कृष्ण में अनन्य निष्ठा है। भगवान श्रीकृष्ण नवें अध्याय में कहते हैं:
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते |
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।
जब द्रौपदी अन्य सहारे को छोड़ देती है और कृष्ण जी को ही भजती है तभी श्रीकृष्ण उनकी मदद करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं जो तुम्हें चाहिए वह मैं दिलवा दूँगा और जो मिल चुकी है, उसकी रक्षा भी करूँगा।
महाभारत का मूल कारण है- धृतराष्ट्र। इसलिए सञ्जय धृतराष्ट्र को राजा कहकर (राजा वचनमब्रवीत्) उलाहना देते हैं। सञ्जय कहते हैं आप गद्दी पर बैठे हैं किन्तु हमेशा से शासन तो दुर्योधन कर रहा है। धृतराष्ट्र दुर्योधन की कोई बात नहीं काटते थे। दुर्योधन ने बाल्यावस्था में ही भीम को विष देने का दुस्साहस किया था। तब दुर्योधन को मना किया होता, विरोध किया होता तो दुर्योधन ऐसा कभी नहीं करता। बात इतनी आगे नहीं बढ़ती। इसलिए सञ्जय धृतराष्ट्र से कह रहे हैं कि राजा तो आप है किन्तु राज्य तो दुर्योधन ही कर रहा है। सञ्जय कह रहे राजा तो दुर्योधन ही है। चाहे उसका राज्याभिषेक हुआ हो या नहीं हुआ हो। महाभारत की कथा शान्तनु से आरम्भ होती है। उनके पुत्र भीष्म गङ्गा जी से प्राप्त हुए थे। राजा शान्तनु की दूसरी पत्नी सत्यवती से दो पुत्र हुए- विचित्रवीर्य और चित्राङ्गद। विचित्रवीर्य की दो पत्नियाँ थी जिनको पितामहा भीष्म लेकर आए थे-अम्बिका और अम्बालिका। अम्बा ने किसी और का वरण किया था। इसलिए उसे छोड़ दिया गया। किसी कारण अंबिका और अम्बालिका को गर्भधारण नहीं हुआ तो सत्यवती ने वेदव्यास जी से उनके गर्भधारण के लिए निवेदन दिया। वेदव्यास भी सत्यवती और ऋषि पराशर के पुत्र थे। अम्बालिका वेदव्यास जी का तेज सहन नहीं कर पाई तो उसने आँखें बन्द कर ली। इसलिए उसका पुत्र धृतराष्ट्र अन्धा हुआ। अम्बिका ने वेदव्यास जी को देखा तो वह पीली पड़ गई। इसलिए उसका पुत्र पाण्डु (पीले) हुआ। पाण्डु से पाण्डव और धृतराष्ट्र से कौरव हुए। ऐसी सारी कथाएँ आती हैं।
युद्ध होगा यह बात चौरस के कारण हुई। चौरस में पाण्डव हार गये जिसके कारण वे वनवास और अज्ञातवास में चले गए। वापस आने के बाद दुर्योधन से पाण्डवों ने अपना राज्य वापस माँगा तो दुर्योधन ने राज्य वापस नहीं दिया। तब युद्ध अनिवार्य हो गया। पाण्डवों ने कहा कि उन्हें कम से कम पाँच गाँव दे दिए जाएँ। पाँडव युद्ध नहीं चाहते थे। इसलिए श्रीकृष्ण सन्धि करना चाहते थे। भीम और द्रौपदी इसके लिए तैयार नहीं थे, किन्तु कृष्णजी करेंगे वह बात मानी जाएगी। तब श्रीकृष्णजी ने कहा की सन्धि के लिए तो हमको जाना ही पड़ेगा। किन्तु दुर्योधन ने सन्धि को भी ठुकरा दिया। युद्ध से पहले, पाण्डवों ने सबके पास जाकर आशीर्वाद लिया। यह नीति, शील की बातें सिखाता है। जब हम किसी के पास जाते हैं आशीर्वाद लेने तो विजयीभव ऐसे अच्छे आशीर्वाद मिलते हैं। लेकिन दुर्योधन ने किसी के पास जाकर आशीर्वाद नहीं लिया। दुर्योधन के मन में भय था। जब कोई गलत काम करता है तो उसके मन में भय बना ही रहता है। सोलहवें अध्याय में जो 'अभय' नामक दैवी गुण बताया गया है, वह कैसे आएगा? जितना सत्यनिष्ठ जीवन होगा उतना भय कम होगा। इस प्रकार युद्ध में श्रीकृष्ण जी की निर्णायक भूमिका होती हैI धृष्टद्युम्न के सेनापति होते हुए भी मुख्य सेनापति तो कृष्णजी हैं। अन्त में होगा वही जो श्रीकृष्ण चाहते हैं। अर्जुन ने कह दिया मुझे तो केवल आप ही चाहिए। दुर्योधन बड़े खुश हुए की अर्जुन ने नारायणी सेना को छोड़कर कृष्ण को माँग लिया। अर्जुन की कृष्ण में अनन्य निष्ठा है। भगवान श्रीकृष्ण नवें अध्याय में कहते हैं:
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते |
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।
जब द्रौपदी अन्य सहारे को छोड़ देती है और कृष्ण जी को ही भजती है तभी श्रीकृष्ण उनकी मदद करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं जो तुम्हें चाहिए वह मैं दिलवा दूँगा और जो मिल चुकी है, उसकी रक्षा भी करूँगा।
1.29
सीदन्ति मम गात्राणि, मुखं(ञ्) च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे, रोमहर्षश्च जायते।।1.29।।
मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी (आ रही है) एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं।
1.29 writeup
गाण्डीवं(म्) स्रंसते हस्तात्, त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं(म्), भ्रमतीव च मे मनः।।1.30।।
हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और (मैं) खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ।
विवेचन - यहाँ पर अर्जुन अपने मन की स्थिति का वर्णन करते हैं। वह कहते हैं, यह सारे मेरे कुटुम्ब के हैं। इनको देखकर मेरा मुख सूख रहा है। मेरे शरीर में कँप-कँपी सी आ रही है। अर्जुन डिप्रेशन में है। डिप्रेशन में लोग अकेले रहना चाहते हैं। (कहते हैं leave me alone.) अर्जुन ने प्रतिज्ञा की, जो गाण्डीव गिराएगा या उसका अपमान करेगा, तो वह उसका वध कर देंगे। गाण्डीव का कोई अपमान नहीं कर सकता था। वही अर्जुन कहते हैं कि गाण्डीव मेरे ही हाथ से गिर रहा है। स्वजन के लिए कितना प्रेम भरा है अर्जुन के मन में। वह कह रहा है, मेरी त्वचा जल रही है, मैं खड़ा रहने में असमर्थ हूँ। ऐसे अपनी स्थिति का वर्णन अर्जुन करते हैं। मैं नहीं लड़ सकता। लेकिन भगवान वह नहीं करते जो हम चाहते हैं। भगवान वही करते हैं जो हमारे लिए अच्छा होता है।
What we want is not important for him.
What is good for us. That is important for him.
ब्रह्मसूत्र में एक सूत्र है, एक अधिकरण आता है-
वैषम्यनैधृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति।2/1/34
यहाँ भगवान के ऊपर आक्षेप किया गया है कि भगवान पक्षपाती हैं। किसी को सुख देते हैं तो किसी को दुख देते हैं। दूसरा भगवान कितने क्रूर हैं। वह संपूर्ण सृष्टि का विनाश करते हैं। इसके उत्तर में वेदांती कहते हैं- हम जो बीज बो रहे हैं, हम वही फसल काट रहे हैं। उसमें वर्षा का क्या काम होता है? सहयोग का ही काम होता है। बस सिर्फ उतना ही काम ईश्वर का है। सारे लोग अपने कर्म भोगते हैं I हमारे प्रारब्ध, क्रियमाण और संचित कर्म ही हमें फल देते हैं I भगवान अर्जुन के रथ को पितामह भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने लेकर जाते हैं। अर्जुन पितामह भीष्म और द्रोणाचार्य पर अत्यधिक श्रद्धा रखते थे। भगवान को पता था कि अभी अर्जुन मोहग्रस्त होगा। भगवान को गीता जो बतानी थी। एक सिद्धान्त और है जब हम सुख में होते हैं तो हमारा पुण्यक्षय होता है। दुख में हमारे पापक्षय होते हैं। भगवान के सामने हम काम-क्रोध आदि विकार लेकर नहीं जा सकते। भगवान एक दर्पण हैI इस दर्पण पर हमने काम-क्रोध जैसे विकारों की धूल चढ़ा दी है इसलिए उनके दर्शन नहीं हो पाते। उस काम क्रोध विकारों की धूल को साफ करना होगा। तभी भगवान के दर्शन हो पाएँगे।
What we want is not important for him.
What is good for us. That is important for him.
ब्रह्मसूत्र में एक सूत्र है, एक अधिकरण आता है-
वैषम्यनैधृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति।2/1/34
यहाँ भगवान के ऊपर आक्षेप किया गया है कि भगवान पक्षपाती हैं। किसी को सुख देते हैं तो किसी को दुख देते हैं। दूसरा भगवान कितने क्रूर हैं। वह संपूर्ण सृष्टि का विनाश करते हैं। इसके उत्तर में वेदांती कहते हैं- हम जो बीज बो रहे हैं, हम वही फसल काट रहे हैं। उसमें वर्षा का क्या काम होता है? सहयोग का ही काम होता है। बस सिर्फ उतना ही काम ईश्वर का है। सारे लोग अपने कर्म भोगते हैं I हमारे प्रारब्ध, क्रियमाण और संचित कर्म ही हमें फल देते हैं I भगवान अर्जुन के रथ को पितामह भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने लेकर जाते हैं। अर्जुन पितामह भीष्म और द्रोणाचार्य पर अत्यधिक श्रद्धा रखते थे। भगवान को पता था कि अभी अर्जुन मोहग्रस्त होगा। भगवान को गीता जो बतानी थी। एक सिद्धान्त और है जब हम सुख में होते हैं तो हमारा पुण्यक्षय होता है। दुख में हमारे पापक्षय होते हैं। भगवान के सामने हम काम-क्रोध आदि विकार लेकर नहीं जा सकते। भगवान एक दर्पण हैI इस दर्पण पर हमने काम-क्रोध जैसे विकारों की धूल चढ़ा दी है इसलिए उनके दर्शन नहीं हो पाते। उस काम क्रोध विकारों की धूल को साफ करना होगा। तभी भगवान के दर्शन हो पाएँगे।
निमित्तानि च पश्यामि, विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि, हत्वा स्वजनमाहवे।।1.31।।
हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत देख रहा हूँ (और) युद्ध में स्वजनों को मारकर श्रेय (लाभ) भी नहीं देख रहा हूँ।
विवेचन: अर्जुन भगवान को अलग-अलग तर्क दे रहे हैं ताकि युद्ध रुक जाए। वे सारे तर्क बताने के बाद अपने लिये श्रेय मार्ग भगावन से पूछते हैं। यही अर्जुन की विशेषता है। अर्जुन भगवान से कह रहे हैं मुझे युद्ध का मार्ग कल्याणकारी नहीं लग रहा है। स्वजनों को मारकर मुझे कोई लाभ होता हुआ भी नहीं दिखाई दे रहा है। परन्तु भगवान सोलहवें अध्याय में अर्जुन को आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि तुममें तो सभी दैवीय गुण विद्यमान हैं-
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोसि पाण्डव।।16-5।।
भगवान कहते हैं अर्जुन तुझमे सभी गुण मौजूद है। क्योंकि हमेशा अर्जुन भगवान से कहते हैं कि उनके लिए जो कल्याणकारी वह बताइए। अर्जुन का प्रेम तो भगवान स्वयं माँगते हैं। किंतु आज वही अर्जुन युद्ध टालने के लिए भगवान से बार-बार कह रहा है।
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोसि पाण्डव।।16-5।।
भगवान कहते हैं अर्जुन तुझमे सभी गुण मौजूद है। क्योंकि हमेशा अर्जुन भगवान से कहते हैं कि उनके लिए जो कल्याणकारी वह बताइए। अर्जुन का प्रेम तो भगवान स्वयं माँगते हैं। किंतु आज वही अर्जुन युद्ध टालने के लिए भगवान से बार-बार कह रहा है।
न काङ्क्षे विजयं(ङ्) कृष्ण, न च राज्यं(म्) सुखानि च।
किं(न्) नो राज्येन गोविन्द, किं(म्) भोगैर्जीवितेन वा।।1.32।।
हे कृष्ण! (मैं) न तो विजय चाहता हूँ, न राज्य (चाहता हूँ) और न सुखों को (ही चाहता हूँ)। हे गोविन्द! हम लोगों को राज्य से क्या लाभ? भोगों से (क्या लाभ)? अथवा जीने से (भी) क्या लाभ?
विवेचन- अर्जुन कहते हैं मुझे राज्य नहीं चाहिए, सुख नहीं चाहिए, विजय की भी कोई मुझे अभिलाषा नहीं है। हे गोविंद! हम लोगों को ऐसे राज्य से क्या लाभ होगा। ऐसे भोगों से कोई सुख नहीं मिलेगा। ऐसे जीने से भी कोई लाभ नहीं हो सकता। राज्य किसके लिये भोगना है। परिवार-स्वजन, कुटुम्ब न हो तो किसके लिये राज्य और सुख की कामना की जाए। अर्जुन भगवान से यह सब इसलिये कह पा रहे हैं क्योंकि अर्जुन का भगवान के प्रति सखा भाव है।
येषामर्थे काङ्क्षितं(न्) नो, राज्यं(म्) भोगाः(स्) सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे, प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।।1.33।।
जिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुख की इच्छा है, वे (ही) ये सब (अपने) प्राणों की और धन की आशा का त्याग करके युद्ध में खड़े हैं।
विवेचन-अर्जुन कहते हैं कि विजय हम अपनी स्वजनों के लिए चाहते हैं। हम अपने लिए विजय नहीं चाहते हैं, अपने कुटुम्ब के लिए विजय चाहते है। वही कुटुम्ब युद्ध के लिये सामने खड़ा है। आजकल छोटी-छोटी बात पर झगड़ा हो जाते हैं। यह कुटुम्ब हमारा है। इसमें स्वार्थ के लिए दरार डालना ठीक नहीं है। हम अपने कुटुम्ब से नहीं लड़ सकते हैं क्योंकि इससे कोई सुख नहीं मिलने वाला है। आजकल के परिवार कितने सीमित हैं। अर्जुन से हमें यह सीख लेनी चाहिये। परिवार और स्वजन से प्रेम होना ही चाहिये।
आचार्याः(फ्) पितरः(फ्) पुत्रास्, तथैव च पितामहाः।
मातुलाः(श्) श्चशुराः(फ्) पौत्राः(श्), श्यालाः(स्) सम्बन्धिनस्तथा।।1.34।।
आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा (अन्य जितने भी) सम्बन्धी हैं,
विवेचन- अर्जुन उस समय 84 वर्ष के थे, वे प्रबुद्ध थे। भगवान श्रीकृष्ण 87 वर्ष के थे। अर्जुन स्वयं की तपस्या के बल पर स्वर्ग गए थे। अर्जुन को सारे देवताओं ने सम्मान दिया था। अर्जुन शिवजी से भी नहीं हारे थे। उनको प्रसन्न कर उन्होंने पाशुपतास्त्र प्राप्त किया था। वह आचार्य, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले सभी सम्बन्धियों से प्रेम करते थे। वह उन्हें कभी भी मारना नहीं चाहते थे। उनके भाव बहुत पवित्र हैं।
एतान्न हन्तुमिच्छामि, घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य, हेतोः(ख्) किं(न्) नु महीकृते।।1.35।।
(मुझ पर) प्रहार करने पर भी (मैं) इनको मारना नहीं चाहता, (और) हे मधुसूदन! (मुझे) त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी (मैं इनको मारना नहीं चाहता), फिर पृथ्वी के लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या?
विवेचन: अर्जुन का रहे हैं कि त्रिलोक के राज्य के लिए भी मैं इन्हें नहीं मारना चाहता हूँI पृथ्वी, भूमि की बात ही क्या? त्रिलोक के राज्य के लिए कभी ऐसा नहीं करूँगा। मुझे कोई स्वयं को मार दे तो भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता। साफ शब्दों मेें अर्जुन कहते हैं।
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः(ख्), का प्रीतिः(स्) स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्, हत्वैतानाततायिनः।।1.36।।
हे जनार्दन! (इन) धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को मारकर हम लोगों को क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने से तो हमें पाप ही लगेगा।
विवेचन अर्जुन आगे कह रहे हैं कि हे जनार्दन! सम्बन्धियों को मारकर हमें कैसे प्रसन्नता होगी ? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा। यह अर्जुन का अपना तर्क है।
तस्मान्नार्हा वयं(म्) हन्तुं(न्), धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं(म्) हि कथं(म्) हत्वा, सुखिनः(स्) स्याम माधव।।1.37।।
इसलिये अपने बान्धव (इन) धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को मारने के लिये हम योग्य नहीं हैं; क्योंकि हे माधव! अपने कुटुम्बियों को मारकर (हम) कैसे सुखी होंगे?
विवेचन -अर्जुन अपने कुटुम्ब से, अपने बान्धवों से, सम्बन्धियों से बहुत प्रेम करते हैं। इसलिए वे कहते हैं कि अपने कुटुम्बियों को मार कर हमें कोई सुख नहीं मिलेगा। जब छोटे भाई की मृत्यु के बाद छोटे भाई के पुत्रों को, बच्चों को बड़े भाई अपने पुत्र के समान मानते हैं। पाण्डव धृतराष्ट्र के पुत्रों को भी स्वजन मानते हैं किंतु धृतराष्ट्र के लिए ऐसा नहीं था। वह अपने पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों को अलग-अलग मानते हैं:
धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चेव किमकुर्वत संजय।1।
धृतराष्ट्र की आज्ञा के कारण ही पाण्डव चौरस खेल रहे थे। युधिष्ठिर को सब पता था, सब ध्यान था कि वह क्या कर रहे हैं? किंतु धृतराष्ट्र की आज्ञा को वह नहीं टाल सकते थे। इसलिए वह चौरस खेल रहे थे।
धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चेव किमकुर्वत संजय।1।
धृतराष्ट्र की आज्ञा के कारण ही पाण्डव चौरस खेल रहे थे। युधिष्ठिर को सब पता था, सब ध्यान था कि वह क्या कर रहे हैं? किंतु धृतराष्ट्र की आज्ञा को वह नहीं टाल सकते थे। इसलिए वह चौरस खेल रहे थे।
यद्यप्येते न पश्यन्ति, लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं(न्) दोषं(म्), मित्रद्रोहे च पातकम्।।1.38।।
यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होने वाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होने वाले पाप को नहीं देखते,
विवेचन- अर्जुन आगे कह रहे हैं ये लोग लोभ से अन्धे हो गए हैं। ये लोग भ्रष्टाचारी हो गए हैं। मित्रदोह का जो दोष उनको लगेगा, कुलक्षय का जो दोष लगेगा, वह उन्हें कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा है। लेकिन कुल का नाश करने का दोष इस पाप को हम भली-भाँति जानते हैं। कुल का नाश करने से होने वाले दोष को हम अच्छे से पहचानते हैं। इसलिए इससे निवृत होने का विचार हमें करना चाहिए। इस प्रकार युद्ध में अपने सामने खड़े स्वजनों को देखकर अर्जुन बड़ी दुविधा में फँस गए हैं। मोहग्रस्त हो गए हैं। अर्जुन भगवान के आश्रित हैं। वे भगवान से स्वयं के लिये श्रेय मार्ग बताने की बात दूसरे अध्याय में कहते हैं।
इसके आगे का वर्णन हम अगले सत्र में सुनेंगे।
'हरि शरणं' संकीर्तन के साथ इस सुंदर सरल विवेचन का समापन हुआ। इसके पश्चात प्रश्नोत्तर हुए।
प्रश्न - पाप और पुण्य से ही दुख और सुख की प्राप्ति होती है तो ईश्वर के स्मरण का क्या लाभ?
उत्तर - ईश्वर के स्मरण से पुण्य प्राप्त होता है। ईश्वर की निकटता प्राप्त होती है। सिस्टम तो वही है परन्तु प्रधान मंत्री से परिचित होने का लाभ तो मिलेगा ही। दूसरे ईश्वर की उपासना से चित्त की शुद्धि भी होती है। चित्त की शुद्धि अनिवार्य है। विदुर नीति में एक श्लोक आता है जिसके अनुसार भगवान यदि हमारी रक्षा करना चाहते हैं तो वे हमें उत्तम बुद्धि से युक्त कर देते हैं। बुद्धि के बल पर हम कठिन परिस्थितियों से आसानी से पार पा जाते हैं।
प्रश्नकर्ता - माधुरी दीदी
प्रश्न - हम भगवान से मार्गदर्शन माँगें तो कैसे उनके मार्गदर्शन को समझेंगें?
उत्तर- भगवान की कृपा का अनुभव होता है। यह अनुभव की बात है।
प्रश्नकर्ता - अरुणकुमार पाण्डे
प्रश्न - मन के विचारों का शमन कैसे हो? मन में आशंकाएँ क्यों आती है?
उत्तर - सत्, रज और तम से मन आच्छादित है। इसलिये मन में विचलन होना स्वाभाविक है। पूर्वजन्म के संस्कार और वर्तमान कर्मों के कारण भी मन के संकल्प और विकल्प होते हैं। पूर्व जन्मों के संस्कारों पर तो हमारा नियन्त्रण नहीं होता परन्तु वर्तमान क्रियाओं को सुधारकर हम मन का संस्कार कर सकते हैं। दिनभर कर्म और विचार अच्छे सात्विक विचार हो तो मन पर नियन्त्रण हो सकता है। बुरे विचारों को महत्त्व न दें। मन में यदि बुरे विचार आये तो सत्कार्यों में लग जाएँ।
आशंकाओं का कारण परमात्मा में विश्वास की कमी है। जैसे-जैसे भगवान पर विश्वास बढ़ेगा मन की आशंकाओं का शमन होता जाएगा। भगवान द्वारा हमारे शुभ की रक्षा का जितना विश्वास बढ़ेगा उतना ही शंकाओं से मुक्ति मिलेगी।
प्रश्नकर्ता - कृष्णा जी
प्रश्न - क्या पितृ हमारे घर में आते हैं और हमारा अनिष्ट कर सकते हैं?
उत्तर - नहीं। ऐसा नहीं है। हमारे पितृ हमारा अहित कभी नहीं करते।
इसके आगे का वर्णन हम अगले सत्र में सुनेंगे।
'हरि शरणं' संकीर्तन के साथ इस सुंदर सरल विवेचन का समापन हुआ। इसके पश्चात प्रश्नोत्तर हुए।
प्रश्नोत्तर सत्र
प्रश्नकर्ता - मधु कुकरेती दीदीप्रश्न - पाप और पुण्य से ही दुख और सुख की प्राप्ति होती है तो ईश्वर के स्मरण का क्या लाभ?
उत्तर - ईश्वर के स्मरण से पुण्य प्राप्त होता है। ईश्वर की निकटता प्राप्त होती है। सिस्टम तो वही है परन्तु प्रधान मंत्री से परिचित होने का लाभ तो मिलेगा ही। दूसरे ईश्वर की उपासना से चित्त की शुद्धि भी होती है। चित्त की शुद्धि अनिवार्य है। विदुर नीति में एक श्लोक आता है जिसके अनुसार भगवान यदि हमारी रक्षा करना चाहते हैं तो वे हमें उत्तम बुद्धि से युक्त कर देते हैं। बुद्धि के बल पर हम कठिन परिस्थितियों से आसानी से पार पा जाते हैं।
प्रश्नकर्ता - माधुरी दीदी
प्रश्न - हम भगवान से मार्गदर्शन माँगें तो कैसे उनके मार्गदर्शन को समझेंगें?
उत्तर- भगवान की कृपा का अनुभव होता है। यह अनुभव की बात है।
प्रश्नकर्ता - अरुणकुमार पाण्डे
प्रश्न - मन के विचारों का शमन कैसे हो? मन में आशंकाएँ क्यों आती है?
उत्तर - सत्, रज और तम से मन आच्छादित है। इसलिये मन में विचलन होना स्वाभाविक है। पूर्वजन्म के संस्कार और वर्तमान कर्मों के कारण भी मन के संकल्प और विकल्प होते हैं। पूर्व जन्मों के संस्कारों पर तो हमारा नियन्त्रण नहीं होता परन्तु वर्तमान क्रियाओं को सुधारकर हम मन का संस्कार कर सकते हैं। दिनभर कर्म और विचार अच्छे सात्विक विचार हो तो मन पर नियन्त्रण हो सकता है। बुरे विचारों को महत्त्व न दें। मन में यदि बुरे विचार आये तो सत्कार्यों में लग जाएँ।
आशंकाओं का कारण परमात्मा में विश्वास की कमी है। जैसे-जैसे भगवान पर विश्वास बढ़ेगा मन की आशंकाओं का शमन होता जाएगा। भगवान द्वारा हमारे शुभ की रक्षा का जितना विश्वास बढ़ेगा उतना ही शंकाओं से मुक्ति मिलेगी।
प्रश्नकर्ता - कृष्णा जी
प्रश्न - क्या पितृ हमारे घर में आते हैं और हमारा अनिष्ट कर सकते हैं?
उत्तर - नहीं। ऐसा नहीं है। हमारे पितृ हमारा अहित कभी नहीं करते।