विवेचन सारांश
श्रेष्ठ भक्त
18.54
ब्रह्मभूतः(फ्) प्रसन्नात्मा, न शोचति न काङ्क्षति।
समः(स्) सर्वेषु भूतेषु, मद्भक्तिं(म्) लभते पराम्॥18.54॥
भक्त्या मामभिजानाति, यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां (न्) तत्त्वतो ज्ञात्वा, विशते तदनन्तरम्॥18.55॥
एक बार एक भक्त के सपने में भगवान आए और उसे भगवान ने कहा कि आज मैं तुम्हें तुम्हारे जीवन का प्रवास दिखाता हूँ। भगवान ने चलना आरम्भ किया। समुद्र के किनारे मुलायम सी रेत पर जब वे दोनों चल रहे थे तो भगवान ने बताया कि देखो, ये जो दो पदचिह्न दिख रहे हैं, ये तुम्हारे पदचिह्न हैं और जब तुम चल रहे थे तो भगवान का चिन्तन कर रहे थे, इसलिए मैं भी तुम्हारे साथ-साथ तुम्हारे बाजू में तुम्हारा हाथ पकड़ कर चलता था। तुम्हारे बाजू में जो दो और पदचिह्न है वह मेरे पदचिह्न हैं क्योंकि मैं भी तुम्हारे साथ-साथ चल रहा था। भक्त ने कहा कि मुझे पता है आपकी मुझ पर कितनी अधिक कृपा है। मार्ग में आगे बढ़ने पर काँटे प्रारम्भ हो गए। भक्त ने देखा कुछ दूरी पर आगे बढ़ने पर अब केवल दो ही पदचिह्न दिखाई दे रहे हैं। तो भक्त ने भगवान से कहा कि जबसे काँटे प्रारम्भ हुए तबसे मुझे केवल दो ही पदचिह्न दिखाई दे रहे हैं, आपने मेरा साथ क्यों छोड़ा? तब भगवान ने कहा कि जब से काँटे प्रारम्भ हुए मैंने तुम्हें गोद में उठा लिया यह तुम्हारे पदचिह्न नहीं मेरे पदचिह्न हैं।
आशय है कि भगवान हमारी हर कदम पर रक्षा करते हैं। जब हम देखकर जानते हैं अनुभव करते हैं तो पता चलता है कि भगवान हमारी हर कदम पर रक्षा करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर गोद में भी उठा लेते हैं। यह सब कुछ बिना श्रद्धा और भक्ति के संभव नहीं है। जिसने विभक्त होना छोड़ दिया और भगवान के साथ एक रूप हो गया वही भक्त है।
सर्वकर्माण्यपि सदा, कुर्वाणो मद् व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति, शाश्वतं (म्) पदमव्ययम्॥18.56॥
अनपेक्ष: शुचीर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ:।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय: । (12.16)
फल की अपेक्षा छोड़ दो और कर्त्तव्य पथ पर निरन्तर आगे बढ़ते रहो। संन्यासी होकर भागने की आवश्यकता नही है। परन्तु अर्जुन संन्यासी बनने के लिए राजी था। उनकी राज्य और सुख भोग की कोई आकांक्षा नहीं। अपनों को मारकर अगर सारे सुख भोग मिलते हैं तो ऐसे सुख अर्जुन को नही चाहिये। इस प्रकार जीवित होने का क्या लाभ। वे कहते हैं-
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किसी मंदिर किसी मस्जिद में जाने की आवश्यकता नही; हमारा घर ही वृन्दावन बन जाता है। भगवान कहते हैं कि मेरा आश्रय लेने वाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी, मेरी कृपा से शाश्वत अविनाशी परम पद अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करता है।
चेतसा सर्वकर्माणि, मयि सन्न्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य, मच्चित्तः(स्) सततं(म्) भव॥18.57॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
पत्र, पुष्प, फल या जल एक वस्तु भी यदि कोई भक्त श्रद्धा, भक्ति से मुझे प्रदान करता है तो उस भक्त के द्वारा भक्तिपूर्वक अर्पण किये हुए वे पत्र पुष्पादि मैं ( स्वयं ) खाता हूँ अर्थात् ग्रहण करता हूँ।
यह भी सम्भव न हो तो रात्रि काल में दिन भर के किए समस्त कर्मों की माला ईश्वर को अर्पित करते हुए मन गदगद हो जाए, रोमांचित हो जाए, आँखों से आँसू निकल आए, मन पवित्र और पावन हो जाए। ऐसे भाव-विभोर होकर सब कुछ ईश्वर को अर्पित कर दें। मन और बुद्धि का समर्पित होना अति आवश्यक है। मन तो समर्पित हो जाता है लेकिन बुद्धि तर्क करती है, प्रश्न करती है और समर्पण को डगमगाने का प्रयास करती है। मन और बुद्धि दोनों जुड़ जाए अर्थात दोनों का योग हो जाए और इसी योग से ईश्वर के चरणों में चित्त अर्पित हो पाएगा।
मच्चित्तः(स्) सर्वदुर्गाणि, मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्, न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥18.58॥
स्वामी विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस ने कह दिया कि हाँ मैंने देखा है उस भगवती को। मैं जैसे तुमसे बात कर रहा हूँ, उसी प्रकार माँ से बात करता हूँ। यह सुनकर नरेंद्र ने कहा कि मेरी बात कराओ, मैं भी मिलना चाहता हूँ, माँ से बात करना चाहता हूँ। तो स्वामी रामकृष्ण ने कहा कि जाओ; भीतर जाकर बात कर लो। जब नरेंद्र भीतर गए तो माँ की मूर्ति को कम्पायमान होता देखकर नरेंद्र यह भी भूल गए कि माँगने क्या आए थे? वे कहने लगे माँ भक्ति दे, माँ ज्ञान दे, माँ वैराग्य दे। वे बाहर आ गए। माँ के तेज को सहन नहीं कर पाए क्योंकि भक्ति इतनी प्रगाढ़ नहीं थी। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कहा माँग लिया जो माँगना था उन्होंने कहा नहीं माँग पाया, गुरुदेव ने कहा जा वापस जा, माँग ले जो माँगना है। भीतर गए तो माँ ने फिर कहा माँगो क्या माँगते हो? फिर उन्होंने वही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य माँगा। तीसरी बार भी यही घटना घटी और इसके बाद स्वामी विवेकानंद अपने गुरु के बताए मार्ग पर चलने लगे और समर्पित हो गए।
सन्तों के द्वारा बताया गया मार्ग हमारी माँ के द्वारा बताए गए मार्ग के समान होता है। जिस प्रकार माँ के द्वारा कही गई बात के साथ हम तर्क-कुतर्क नहीं करते और उनकी बात मान लेते हैं उसी प्रकार सन्तों ने जो कह दिया उसमें बुद्धि लगाने की आवश्यकता नहीं है। बुद्धि का समर्पण होना आवश्यक है। भगवान ने इस बात की गारण्टी दे दी है कि घटना तो घटेगी बस मन और बुद्धि का साथ-साथ होना आवश्यक है।
यदहङ्कारमाश्रित्य, न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते, प्रकृतिस्त्वां (न्) नियोक्ष्यति॥18.59॥
उसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अहङ्कार का आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या झूठा है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति, तेरा स्वभाव तुझे युद्ध में लगा देगा। तुम अपने स्वभाव को जानो। तुम महावीर हो, रथी हो। तुम्हारे भीतर एक क्षत्रिय बैठा है। अगर तुम संन्यास लेकर जंगल में भी चले जाओगे और वहाँ शेर आ जाएगा तो वहाँ तुम धनुष बाण लेकर अपने क्षत्रिय धर्म का निर्वाह करोगे। मैं जो कह रहा हूँ उसे मान लो ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारा स्वभाव जबरदस्ती तुम्हें युद्ध में लगाएगा और जबरदस्ती कार्य करने से हारने की सम्भावना अधिक होगी।
स्वभावजेन कौन्तेय, निबद्धः(स्) स्वेन कर्मणा।
कर्तुं(न्) नेच्छसियन्मोहात्, करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥18.60॥
ईश्वरः(स्) सर्वभूतानां(म्), हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि, यन्त्रारूढानि मायया॥18.61॥
तमेव शरणं(ङ्) गच्छ, सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां(म्) शान्तिं(म्), स्थानं(म्) प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥18.62॥
इति ते ज्ञानमाख्यातं(ङ्), गुह्याद्गुह्यतरं(म्) मया।
विमृश्यैतदशेषेण, यथेच्छसि तथा कुरु॥18.63॥
सर्वगुह्यतमं(म्) भूयः(श्), शृणु मे परमं(म्) वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति, ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥18.64॥
मन्मना भव मद्भक्तो, मद्याजी मां(न्) नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं(न्) ते, प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥18.65॥
सर्वधर्मान्परित्यज्य, मामेकं(म्) शरणं(म्) व्रज।
अहं(न्) त्वा सर्वपापेभ्यो, मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥18.66॥
इदं(न्) ते नातपस्काय, नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं(न्), न च मां(म्) योऽभ्यसूयति॥18.67॥
य इमं(म्) परमं(ङ्) गुह्यं(म्), मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं(म्) मयि परां(ङ्) कृत्वा, मामेवैष्यत्यसंशयः॥18.68॥
न च तस्मान्मनुष्येषु, कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्माद्, अन्यः(फ्) प्रियतरो भुवि॥18.69॥
अध्येष्यते च य इमं (न्), धर्म्यं (म्) संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहम्, इष्टः (स्) स्यामिति मे मतिः॥18.70॥
श्रद्धावाननसूयश्च, शृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः(श्)शुभाँल्लोकान्, प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥18.71॥
कच्चिदेतच्छुतं(म्) पार्थ, त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः(फ्), प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥18.72॥
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः(स्) स्मृतिर्लब्धा, त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः(ख्), करिष्ये वचनं(न्) तव॥18.73॥
अब सौंप दिया इस जीवन का
सब भार तुम्हारे हाथों में,
है जीत तुम्हारे हाथों में
और हार तुम्हारे हाथों में।
अर्जुन कहते हैं कि अब आप जो कहेंगे वही मैं करूँगा। अर्जुन के मन में दीपावली के दीप जल उठे। वे कह रहें हैं- 'करिष्ये वचनं तव।'
अन्य देशों में भगवान अवतार नहीं लेते परन्तु भारतभूमि में श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान के लिये भगवान को भारत में स्वयं आना पड़ता है। भगवान हमसे विशेष प्रेम करते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने चतुर्थ अध्याय में कहा है-
श्री भगवानुवाच
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
यह परम्परा प्राप्त योग मैंने तुम्हें बताया। विवस्वान से होकर यह परम्परा भारत की परम्परा रही है। भगवान को भी यहाँ आना पड़ता है, उन्हें भी यहाँ बार-बार आना पसन्द है।
सञ्जय उवाच
इत्यहं(म्) वासुदेवस्य, पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषम्, अद्भुतं(म्) रोमहर्षणम्॥18.74॥
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवान्, एतद् गुह्यमहं(म्) परम्।
योगं(म्) योगेश्वरात्कृष्णात्, साक्षात्कथयतः(स्) स्वयम्॥75॥
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य, संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः(फ्) पुण्यं(म्), हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥18.76॥
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य, रूपमत्यद्भुतं(म्) हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्, हृष्यामि च पुनः(फ्) पुनः॥18.77॥
यत्र योगेश्वरः(ख्) कृष्णो, यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूति:(र्), ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥18.78॥
विषादयोग से आरम्भ हुई यह यात्रा विजय योग तक जाएगी।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।1.1।।
इस श्लोक से आरम्भ हुई यह यात्रा
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
इसके पश्चात् प्रश्नोत्तर हुए।
प्रश्नोत्तर सत्र;-
प्रश्नकर्ता: उमेश भैया
प्रश्न-1) हम लोग हमारे जीवन में गीता के अठारह अध्यायों के कण्ठस्थीकरण के बाद मुख्य शिक्षा क्या ग्रहण करें?
उत्तर - भगवद्गीता पराक्रम का ग्रन्थ है। कर्म के साथ भक्ति का सन्देश है गीता। यम, नियम का अभ्यास करें। पाठ और पारायण का जो नियम बनाएँ उसका पालन करें। घड़ी के मिनिट के काँटे की तरह जीवन चलता है। परन्तु हमारी श्रद्धा कम न हो। निरन्तर पाठ से हमारा व्यवहार सरल होगा और वाणी पवित्र होगी। मन गीता पाठ के तप से पवित्र हो जाता है। इस प्रकार अनजाने ही भगवद्गीता हमारे जीवन में आ जाती है और हमारा जीवन पूर्णता को प्राप्त होता है। इस लोक और परलोक में श्रेय प्रदान करने वाला ग्रन्थ भगवद्गीता है।
प्रश्न - 2) कण्ठस्थीकरण के लिये क्या आसान तरीका है?
उत्तर - संकल्प दृढ़ हो तो गीता साल-दो-साल में कण्ठस्थ हो जाएगी। पाठ के साथ श्रवण का भी महत्त्व है। आदरणीय सुवर्णा काकी जी के ऑडियो से मदद ले सकते हैं। साथ ही आप अपनी आवाज में गीता जी के श्लोक रिकॉर्ड करें और समय-समय पर सुने तो भी जल्दी याद हो जाएँगें। 'यतात्मा दृढ़ निश्चय:' यह दृढ़ निश्चय का ही विषय है।
प्रश्नकर्ता - नानकचंद गर्ग भैया
प्रश्न-1) अठारहवें अध्याय के 61वें श्लोक (ईश्वरः(स्) सर्वभूतानां(म्), हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि, यन्त्रारूढानि मायया॥) और
नवें अध्याय के 4थे श्लोक (मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित:।।) में विरोधाभास क्यों है?
उत्तर - यह समझने की आवश्यकता है। जैसे पूज्य गुरुदेव ने गीता परिवार की स्थापना की। वे प्रतिदिन यहाँ पर उपस्थित नहीं होते परन्तु उनके मार्गदर्शन में ही हम सब कार्य करते हैं। इसी प्रकार भगवान की अध्यक्षता में सभी जीव कार्य करते हैं। जैसे टाटा नमक रतन टाटा ने स्वयं नहीं बनाया कम्पनी के किसी कर्मचारी ने बनाया लेकिन नमक टाटा का ही कहा जाता है।
प्रश्न - अठारहवें अध्याय में "नष्टो मोहः(स्) स्मृतिर्लब्धा, त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः(ख्), करिष्ये वचनं(न्) तव॥" कहने के बाद भी अभिमन्यु के वीरगति प्राप्त होने पर अर्जुन मोहग्रस्त क्यों हो जाते हैं?
उत्तर - यह क्षणिक आवेग है। किसी के घर में प्रियजनों की मृत्यु के बाद कोई-कोई कई-कई दिनों तक शोक-ग्रस्त रहते हैं। जबकि ज्ञानी यथाशीघ्र शोक से मुक्त हो जाते हैं। जिनको जीवन में जीवन की नश्वरता का ज्ञान समझ में आ गया वे शीघ्र सम्भल जाते हैं। प्रसाद (मन के भीतर आनंद का झरना) भगवान की कृपा से ही प्राप्त होता है। मृत्यु भी आनन्द का उत्सव है तो फिर दुख किस बात का। यह बात अर्जुन को बहुत अच्छे से समझ में आ गया।
प्रश्नकर्ता - पुष्पा दीदी
प्रश्न -1) ध्यान लगाते समय मन चंचल होता है।
उत्तर - एकदम सबकुछ नहीं होता प्रयास करना पड़ता है। भगवान ने भी कहा कि मन चंचल है और उसका उपाय केवल और केवल अभ्यास है।
प्रश्न -2) मैं दान मन से देती हूँ परन्तु कभी कभी नहीं देने पर भी पछतावा होता है।
उत्तर - दान देश और काल का विचार करके पात्र व्यक्ति को देना चाहिये। सहृदयता का कोई अतिरिक्त लाभ ले तो यह ठीक नहीं।
प्रश्नकर्ता - नमिता दीदी
प्रश्न - गुरुद्रोण ने एकलव्य से उनका अँगूठा क्यों लिया?
उत्तर - यह प्रामाणिक नहीं है। मूल महाभारत में अँगूठा माँगने का प्रसंग है ही नहीं। केवल यह वचन गुरुद्रोण ने लिया कि उनके शिष्यों (पाण्डव और कौरवों के बीच युद्ध की स्थिति में) के पक्ष या विरोध में कभी धनुष नहीं उठाओगे। इतना कठोर वचन देने के प्रतिकार्थ लोगों ने लिया मानों गुरुद्रोण ने एकलव्य का अँगूठा ही दक्षिणा में माँग लिया।
प्रश्नकर्ता - पुखराज भैया
प्रश्न - अठारहवें अध्याय में चारों वर्णों के स्वभावज कर्म बताए हैं। परन्तु इस कारण समाज में ऊँच-नीच का दुर्भाव फैल गया है। जबकि गीता में ऐसा नहीं कहा गया है। हम ऐसी स्थिति में कैसे लोगों को समझाएँ।
उत्तर - भगवान ने कहा है कि "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुण कर्म विभागश:।" अर्थात गुण और कर्म के आधार पर चार वर्णों की सृष्टि भगवान ने की है और प्राचीन काल में वर्ण परिवर्तन के उदाहरण भी मिलते हैं। महर्षि विश्वामित्र राजर्षि थे वे बाद में ब्रह्मर्षि बने। परन्तु बाद में छुआछूत का मामला आया। परिचारक या डॉक्टर के संदर्भ में देखें तो कोरोनाकाल में इनके साथ भी हमने छुआछूत का व्यवहार किया जो जरूरी था। ऐसी परिस्थिति हो सकता है, पहले भी रही हो और हमने उसे केवल छुआछूत के रूप में ही ग्रहण किया जबकि उसके पीछे की वैज्ञानिकता को ग्रहण नहीं किया। जातिव्यवस्था का छुआछूत गलत है। हमारे पूर्वजों ने अज्ञानवश इस प्रकार का पाप किया है जिसका परिमार्जन हमें छुआछूत से ग्रस्त भाई-बहनों को शिक्षा आदि के माध्यम से आगे लाकर करना चाहिए। बाबा साहब अम्बेडकर जैसे महान व्यक्ति को छुआछूत के कारण कष्ट उठाना पड़ा। हमें इस विकृति से मुक्ति पाना ही होगा।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥