विवेचन सारांश
मृत्यु का ज्ञान ही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है

ID: 4180
हिन्दी
शनिवार, 30 दिसंबर 2023
अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग
2/3 (श्लोक 8-13)
विवेचक: गीता विशारद डॉ. संजय जी मालपाणी


 गुरु वन्दना एवं दीप प्रज्वलन के साथ इस अद्भुत आठवें अध्याय का विवेचन प्रारम्भ हुआ। आठवें अध्याय में मृत्यु के बारे में बताया गया है कि किस तरह मृत्यु को भी सुलभ बनाया जा सकता है और मृत्यु के समय क्या ध्यान किया जाए कि भगवत् प्राप्ति हो जाए। रावण के नाभि कुम्भ में जो अमृत था उसका भेदन भगवान श्रीराम ने विभीषण के कहने पर किया। रावण धराशायी हो गया तो भगवान राम उनके पास पहुँचे और बोले कि आप तो परम ज्ञानी हैं, तब भी आपने मुझसे शत्रुता क्यों की? शत्रुता किसी से भी अच्छी नहीं है और आपने जिस तरीके से मुझसे शत्रुता की बात की वह तो अत्यधिक निन्दनीय है। आप तो परम ज्ञानी थे फिर आपने इस तरह का व्यवहार क्यों किया? आप यदि मुझसे कुछ माँगते तो मित्रता करके भी माँग सकते थे, तब आपने मुझसे शत्रुता क्यों की? रावण बोले कि मुझे ज्ञान चाहिए होता तो वह तो मुझे कहीं और से भी मिल जाता किन्तु मुझे प्रभु के हाथ की मृत्यु चाहिए थी ताकि मुझे मोक्ष मिले और वह मुझे शत्रुता करके ही मिलती। रावण या कंस जैसे दुराचारी को भी भगवान के हाथों मरने के कारण या मृत्यु के समय भगवान के सामने होने के कारण मोक्ष मिला। अतः यदि अन्तिम समय में भगवान का ध्यान है तो मोक्ष निश्चित है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो मृत्यु के समय भी भगवान का ध्यान करता है, वही भगवान को प्राप्त होता है।

नचिकेता की एक कथा है। नचिकेता, उद्दालक ऋषि के पुत्र थे और उद्दालक ऋषि एक यज्ञ कर रहे थे और उस यज्ञ में प्रचुर मात्रा में दान कर रहे थे। दान करना उस यज्ञ की अनिवार्यता थी, अतः ऋषि ने अपना सर्वस्व दान कर दिया और अपने पास जितनी भी गायें थीं उन गायों को भी ब्राह्मणों को दान कर दिया। नचिकेता को यह बात अच्छी नहीं लगी। नचिकेता ने पूछा कि पिताजी आप जो गाय दान कर रहे हैं, उसमें कुछ गायें तो वृद्ध हैं एवं वह दूध भी नहीं देती और न ही देंगी, वह निरुपयोगी हैं, तो आप इस तरह का गायों का दान क्यों कर रहे हैं, वह उचित नहीं है। तब उद्दालक ऋषि बोले कि इस यज्ञ की अनिवार्यता है कि मेरा सर्वस्व मुझे देना पड़ेगा, इसलिए मुझे पता है कि यह गायें निरुपयोगी हैं तब भी मुझे उनका दान करना ही पड़ेगा। तब नचिकेता बोले कि आपने अपना सब कुछ दान नहीं किया, एक वस्तु आपने अपने पास रखी है। उद्दालक ऋषि पूछते हैं कि क्या रखा मैंने अपने पास? नचिकेता बोले- मैं आपका पुत्र, आपने मेरा दान नहीं किया। बताइए न आपने मुझे किसे दान किया है। तब एक बच्चे के द्वारा बार-बार यह प्रश्न पूछने पर ऋषि बहुत क्रोधित हो गए। उद्दालक ऋषि ने गुस्से में जल हाथ में लिया और बोला ठीक है मैं तुम्हें यम को दान करता हूँ। मृत्यु को दान करता हूँ। नचिकेता ने उद्दालक ऋषि को प्रणाम किया और पितृ आज्ञा मानकर यमलोक चले गए। वह यम लोक गए तो द्वार पर उन्हें द्वारपालों ने रोक लिया और बोले यहाँ पर मृत्यु लोक से कोई नहीं आ सकता। यह यमलोक है। यहाँ आने के लिए मरना जरूरी है, किन्तु उसने कहा कि नहीं मुझे यमराज से मिलना ही है।
उन्होंने कहा यमराज अभी कहीं बाहर गए हुए हैं, जब वह आएँगे तो हम
मिलवा देंगे। वह दो दिन तक रुके। यमराज तीसरे दिन आए। जब यमराज को पता चला कि यह व्यक्ति तीन दिन से भूखा प्यासा बैठा हुआ है, तब उन्होंने कहा कि नचिकेता तुम मेरे अतिथि हो और अतिथि भूखा बैठा रहे यह अच्छी बात नहीं है। मुझे इसका प्रायश्चित करना पड़ेगा। मैं तुम्हें तीन वरदान देता हूँ, माँगो तुम क्या माँगना चाहते हो। नचिकेता ने पहला वरदान माँगा कि मेरे पिताजी ने निरुपयोगी गायों का दान किया है, अतः उन्हें पाप मुक्त कर दिया जाए। यमराज ने कहा तथास्तु! उसके बाद यमराज ने कहा कि दूसरा वरदान माँगो। तब नचिकेता ने कहा कि मेरे पिताजी ने मेरा दान दिया है तो वे अत्यन्त दु:खी हैं और रो रहे हैं। आप उन्हें उस दु:ख से मुक्त कर दीजिए। यमराज ने कहा ठीक है। मैं उन्हें उस दु:ख से मुक्त करता हूँ। मैं तुम्हें वापस उन्हें देता हूँ। जब तुम उनके पास चले जाओगे तो वे अपने आप दु:ख मुक्त हो जाएँगे। फिर उन्होंने कहा कि अच्छा ठीक है अब तीसरा वरदान माँगो। नचिकेता ने कहा कि मुझे मृत्यु का ज्ञान दीजिए। इतना छोटा बालक मृत्यु का ज्ञान माँग रहा है! यमराज ने कहा कि मृत्यु का ज्ञान ही जीवन का ज्ञान होता है। यमराज कहते हैं, कि मैं तुम्हें मृत्यु का ज्ञान नहीं दे सकता। मैं तुम्हें तीनों लोक- पाताल लोक, स्वर्ग लोक और पृथ्वी लोक देता हूँ, किन्तु मृत्यु का ज्ञान नहीं दे सकता। नचिकेता ने कहा कि कोई बात नहीं, मैंने तो आपसे माँगा नहीं था, आप ही ने कहा था। आप नहीं दे पा रहे तो मैं चलता हूँ, किन्तु अगर यमराज नहीं देते तो यमराज की बात असत्य हो जाती। यमराज ने जो भी माँगने को कहा नचिकेता ने मना कर दिया। तब यमराज ने उन्हें कहा कि ठीक है, मैं तुम्हें मृत्यु का ज्ञान देता हूँ।

आपने देखा होगा कि जब भी कोई व्यक्ति मरता है तो मटकी के अन्दर जो आग घर से लेकर श्मशान तक जाती है उसे नचिकेता नाम दिया गया। उसे नचिकेता अग्नि कहा जाता है जो कि हमें बार-बार नचिकेता की याद दिलाती है। अतः नचिकेता को मृत्यु का ज्ञान प्राप्त करने के लिए यमराज के पास जाना पड़ा। वही ज्ञान कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में दिया ताकि हमें ज्ञान हो सके। भगवान ने जो ज्ञान दिया अर्थात् आज से मृत्यु तक हर पल मेरा ही ध्यान करो और मेरे में ही तुम्हारा मन लगा रहे। सभी कालों में चाहे सुख हो या दु:ख, चाहे युद्ध हो, प्रत्येक स्थान पर तुम मन और बुद्धि से सदैव मेरा ही स्मरण करो।

अन्त समय में जब प्राण शरीर को त्यागते हैं वह भी एक युद्ध ही तो है। उस समय भी तुम्हें मेरा स्मरण रहेगा तभी तुम मुझको प्राप्त कर सकते हो। अर्थात् प्रत्येक क्षण, हर काल, हर पीड़ा में केवल भगवत् स्मरण ही हमें मुक्ति दिला सकता है और यह सिर्फ और सिर्फ अभ्यास के द्वारा ही आएगा।

8.8

अभ्यासयोगयुक्तेन, चेतसा नान्यगामिना ।
परमं (म्) पुरुषं (न्) दिव्यं (म्), याति पार्थानुचिन्तयन् ॥ 8.8॥

हे पृथानन्दन! अभ्यासयोग से युक्त (और) अन्य का चिन्तन न करने वाले चित्त से परम दिव्य पुरुष का चिंतन करता हुआ (शरीर छोड़ने वाला मनुष्य) (उसी को) प्राप्त हो जाता है।

विवेचन:- हे पार्थ! अभ्यास योग से युक्त हो जा। तेरे मन में, चित्त में, चेतना में सभी में मैं स्थित हूँ। ऐसे परम दिव्य पुरुषोत्तम का जो चिन्तन करता है एवं चिन्तन करते हुए शरीर छोड़ता है, वह ईश्वर को ही प्राप्त हो जाता है। योग अर्थात् जुड़ाव, दो चीजों को जोड़ना है योग। मन और बुद्धि को जोड़ने की विधा है अष्टाङ्ग योग। अष्टाङ्ग योग में बताया गया है कि किस तरह आसनों के द्वारा इन्द्रियों का संयमन किया जाता है। भगवद्गीता मन और बुद्धि को जोड़ने का शास्त्र है। भगवद्गीता ज्ञान और विज्ञान दोनों को बताती है। विज्ञान परिवर्तनशील है किन्तु शास्त्र स्थिर हैं। पहले कहा जाता था कि पृथ्वी स्थिर है, सूर्य घूमता है किन्तु बाद में ज्ञात हुआ कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी घूमती है। अतः ज्ञान सनातन है। ध्यान आत्मा की अनुभूति है एवं परम सुख की प्राप्ति है किन्तु उसे निरन्तर करना पड़ता है। ऐसा नहीं कि हम ध्यान कर रहे हैं और मन में मिश्री, लड्डू और भविष्य की चिन्तायें आ रही हैं। पतञ्जलि में ज्ञान को आठ भागों में बाँटा गया है। यम मतलब सत्य से दूर रहना, हिंसा से दूर रहना, संग्रह की प्रवृत्ति से दूर रहना। कुछ साधने के लिए कुछ खोना पड़ता है, कुछ नियम जीवन में करने ही पड़ते हैं और जब हम नियम का पालन करते हैं तो हमें सब कुछ प्राप्त हो जाता है ।

एक साहूकार गुरुदेव के पास गया और उनसे पूछा कि मुझे मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी? गुरुदेव ने उत्तर दिया कि कुछ छोटा सा नियम बनाओ, उपवास, जप, ध्यान आदि। साहूकार ने कहा कि यह सब मैं नहीं कर सकता। तब गुरुदेव ने कहा कि तुम्हें जब कोई तिलक लगे व्यक्ति मिले उसे देखकर ही तुम घर पर खाना खाना। अतः साहूकार उस नियम का पालन करने लगा। प्रतिदिन उसे कोई तिलक लगा व्यक्ति मिलने लगा। उसके बाद ही वह खाना खाता, किन्तु एक दिन उसे कोई तिलक लगा व्यक्ति नहीं मिला और उसे लगा कि शायद आज मुझे भूखे ही रहना पड़ेगा। अतः वह दुकान पर ही बैठ गया। रात को जब वह दुकान में बैठा था, तभी कुछ तिलकधारी आए और वह उन्हें देखकर चिल्लाया, मिल गए-मिल गए- मिल गए, वे तिलकधारी चोर थे। जैसे ही वह चिल्लाया कि मिल गए-मिल गए तो वे चोर भाग गए। एक छोटे से नियम का पालन करने से साहूकार की दुकान लुटने से बच गई। अतः अगर हम नियमों पर चलेंगे तो हमारा जीवन भी अति सुलभ और सुन्दर होगा।

नियमों से लौकिक और भौतिक दोनों लाभ होते हैं। हम लोग नए साल में कुछ नियम बनाएँ ताकि अच्छे से योग कर पाएं। यम, नियम, आसन, प्राणायाम कुछ भी करने के लिए पहले साधना करनी पड़ेगी। पन्द्रह मिनट का प्राणायाम करें, जिससे कि हमें आनन्द की प्राप्ति हो एवं विचारों पर नियन्त्रण हो। कई तरह के आसान हैं, जैसे पान-अपान, अपान अर्थात् भारी हवा का बाहर जाना और पान अर्थात् भीतर आने वाली साँस। प्राणायाम के बहुत से आसन हैं। भुजङ्ग आसन, सेतुबन्ध आसन। इन सबसे हमारे शरीर में लचीलापन आता है एवं यदि हम सीधे बैठने का अभ्यास करते हैं तो हमारी रीढ़ की हड्डी से लेकर पूरा शरीर एक साथ होता है एवं आठों चक्र भी सीधे ही जागृत होते हैं, अतः सीधा बैठना बहुत आवश्यक है एवं हमारी शक्ति बढ़ती है। समस्त योग एक अभ्यास है जो कि हमें मृत्यु के समय काम आएगा और जब हमारे प्राण निकलेंगे तो हमारा ध्यान भृकुटि पर ही केन्द्रित होगा। कछुए से हम, वह किस तरह छः इन्द्रियों को अपने अन्दर कर लेता है, सीख सकते हैं। अतः धारणा और ध्यान तो करना ही पड़ेगा और वह अभ्यास के द्वारा ही होगा तभी हमें भगवान मिलेंगे और भगवत् प्राप्ति होगी।

8.9

कविं(म्) पुराणमनुशासितारम्,
अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम्,
आदित्यवर्णं (न्) तमसः (फ्) परस्तात्॥ 8.9॥

जो सर्वज्ञ, अनादि, सब पर शासन करने वाला, सूक्ष्म से अत्यन्त सूक्ष्म, सबका धारण-पोषण करने वाला, अज्ञान से अत्यन्त परे, सूर्य की तरह प्रकाशस्वरूप अर्थात् ज्ञानस्वरूप ऐसे अचिन्त्य स्वरूप का चिंतन करता है।

विवेचन:- सूर्य का वर्ण, सुनहरे रङ्ग का जिसका चिन्तन नहीं किया जा सकता, ऐसा वह भगवान है। सब पर शासन करने वाला, सूक्ष्म से सूक्ष्म का भरण पोषण करने वाला, सूर्य के समान प्रकाश स्वरूप ऐसे भगवान का चिन्तन करना "जो न देखे रवि, वह देखे कवि" जो सूरज को भी नहीं दिखता है वह कवि को दिखता है, ऐसे भगवान का चिन्तन करना क्योंकि कवि सब कुछ सोच के ही कविता करते हैं। इस प्रकार जब हम कोई बात सुनते हैं तो धारा बाहर की ओर बह रही है, बाहर की ओर देख रहे हैं, बाहर की ओर सोच रहे हैं, किन्तु जब वह धारा अन्दर की ओर बहने लगेगी तब वह राधा बन जाएगी। अतः बाहर से अन्दर की ओर बहाना पड़ेगा, राधा बन गए, अर्थात् कृष्ण मिल गए। अन्दर का चिन्तन करना ही पड़ेगा क्योंकि सबसे ज्यादा मन्दिर राधा के ही बने हैं। रुक्मणी के नहीं बने हैं।

अन्दर की ओर तो ध्यान करना ही पड़ेगा और उसके लिए जरूरी है, धारणा अर्थात् किसी भी एक इन्द्रिय पर अपने ध्यान को केन्द्रित करना एवं संवेदना पर भी अपना ध्यान केन्द्रित करना। कई बार जो नाटक होता है उसमें प्रेषक होता है वह नट को कुछ बोल नहीं सकता वह सिर्फ देख सकता है। उसी प्रकार जब हम ध्यान मुद्रा में हैं, यदि हमारी पीठ में खुजली हो रही है तब भी हमें खुजाना नहीं है क्योंकि हमारे हाथ ज्ञान मुद्रा में हैं और धीरे-धीरे बाद में खुजली अपने आप चली जाती है। अतः अपने मन पर और इन्द्रियों पर संयमन ही धारणा है। साँसों पर ध्यान केन्द्रित करना, उसके बाद संवेदनाओं पर ध्यान केन्द्रित करना और बाद में विचारों पर ध्यान केन्द्रित करना है। विचार इतनी तेजी से आते हैं कि एक विचार आने के तुरन्त बाद दूसरा आता है और उस एक और दूसरे के बीच में जो शून्य है वहीं पर भगवान है। कमलासन तैयार होगा वहीं पर भगवान होंगे। जैसे-जैसे आप ध्यान की ओर बढ़ेंगे धीरे-धीरे समाधि की ओर बढ़ेंगे, आपको भगवान मिलेंगे।

8.10

प्रयाणकाले मनसाऽचलेन,
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्,
स तं(म्) परं(म्) पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ 8.10॥

वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्त समय में अचल मन से और योग बल के द्वारा भृकुटी के मध्य में प्राणों को अच्छी तरह से प्रविष्ट करके (शरीर छोड़ने पर) उस परम दिव्य पुरुष को ही प्राप्त होता है।

विवेचन:- भक्ति युक्त मनुष्य योग बल के द्वारा भगवान में ध्यान केन्द्रित करके भृकुटि में भगवान को विराजित करे और उस अवस्था में जब प्राण निकले तो वह भगवत् को प्राप्त करेगा। भृकुटि का जो द्वार है उसको जगाया जाता है। त्रिनेत्र द्वार जिसको हमने कभी खुलाया ही नहीं, किन्तु यदि प्राण यहाँ से निकले तो उसे सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है। धीरे-धीरे ध्यान केन्द्रित करना और यदि प्राण भृकुटि से निकलें तो वही भगवत् प्राप्ति का मार्ग है।

8.11

यदक्षरं(म्) वेदविदो वदन्ति,
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं(ञ्) चरन्ति,
तत्ते पदं(म्) सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ 8.11॥

वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं (और) (साधक) जिसकी (प्राप्ति की) इच्छा करते हुए, ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद (मैं) तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा।

 विवेचन:- वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग योगी जिसको प्राप्त करते हैं और  साधक जिसकी प्राप्ति की इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा। परमपद को प्राप्त करना ही सर्वोच्च है। हम छोटे-छोटे पदों में उलझे रहते हैं कि हमारा सम्मान नहीं किया, यह कार्य मैंने किया और हमें पुष्प माला भेंट नहीं की गई। छोटे पदों को ध्यान में न रखकर और इन सबसे ऊपर उठकर हमें परम पद की प्राप्ति करनी होगी, तभी हमें भगवान प्राप्त होंगे।

8.12

सर्वद्वाराणि संयम्य, मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः(फ्) प्राणम्, आस्थितो योगधारणाम् ॥ 8.12॥

(इंद्रियों के) संपूर्ण द्वारों को रोक कर, मन का ह्रदय में निरोध करके और अपने प्राणों को मस्तक में स्थापित करके, योगधारणा में सम्यक् प्रकार से स्थित हुआ।

विवेचन:- हमारे शरीर में नौ द्वार हैं-

1) दो आँखें
2) दो कान
3) दो नासिका द्वार
4) एक मुख 
5) दो निकास के द्वार
इन सभी पर संयमन करना होगा।

इन्द्रियों के सम्पूर्ण द्वारों को रोक कर, मन का ह्रदय में निरोध करके और अपने प्राणों को मस्तक में स्थापित करके, योगधारणा में सम्यक् प्रकार से स्थित हुआ जो साधक ‘ॐ' इस एक अक्षर ब्रह्म का (मानसिक) उच्चारण (और) मेरा स्मरण करता हुआ, शरीर को छोड़कर जाता है वह परमगति को प्राप्त होता है।

आँखों से हम क्या देख रहे हैं, कानों से हम क्या सुन रहे हैं एवं जिह्वा से क्या बोल रहे हैं और मुख से हम क्या खा रहे हैं? यह भी एक संयमन है। क्या हम सब पर सही अमल कर रहे हैं? हमें गलत आदतों का दमन करना पड़ेगा। जब हम दमन करेंगे तभी संयमन होगा। धीरे-धीरे आदत हो जाएगी। हम अपनी ऊर्जा को बाहर खर्च करते हैं, किन्तु उसे अन्दर की ओर उतारना पड़ेगा। जब हम क्रोध करते हैं तो जिस पर क्रोध करते हैं उसका कुछ नुकसान नहीं होता, किन्तु हमारा बहुत नुकसान होता है। अतः हमें न ही क्रोध करना है और न ही इन्द्रियों को बाहर की ओर बहाना है क्योंकि उससे ऊर्जा का संयम हमारे मन के अन्दर होता है और वह हमें अन्दर से शक्ति प्रदान करती है। 

एक बाबूराम नाम के आदमी थे। अपने पिताजी का पिण्डदान कर रहे थे। बारहवें दिन पण्डित जी कहते हैं कि कुछ तो सङ्कल्प करो, कुछ छोड़ दो, उन्हें चावल पसन्द नहीं थे, उन्होंने कहा मैं चावल छोड़ता हूँ। एक दिन पत्नी ने पुलाव बनाया तो बोले मुझे भी खाना है। पत्नी ने याद दिलाया कि आपने तो चावल छोड़ दिए हैं, वे बोले कि मैंने चावल छोड़े, पुलाव नहीं। हम अपने ही मन को विचलित करते हैं एवं झूठ बोलते हैं तो उसको सही समझ लेते हैं, अतः इन्द्रियों का सही संयमन  करना अति आवश्यक है।

8.13

ओमित्येकाक्षरं(म्) ब्रह्म, व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
य:(फ्) प्रयाति त्यजन्देहं(म्), स याति परमां (ङ्) गतिम् ॥ 8.13॥

जो साधक ‘ॐ' इस एक अक्षर ब्रह्म का (मानसिक) उच्चारण (और) मेरा स्मरण करता हुआ, शरीर को छोड़कर जाता है वह परम गति को प्राप्त होता है।

 विवेचन:- अन्तिम समय में ॐ का उच्चारण परमगति देगा। ॐ प्रणव है, सभी धर्मों में ॐ को माना गया है। ॐ से सृष्टि का निर्माण होता है। ॐ अक्षर ब्रह्म है। "एक ओंकार सतनाम"। सनातन धर्म से कई धर्म प्रकट हुए। बौद्ध धर्म हुआ, जैन धर्म हुआ, इन सब के विचारों में अन्तर है किन्तु ॐ सब में एक है। जैनों की प्रार्थना में ॐ एक ओंकार नवकार से, इस प्रकार बुद्ध की प्रार्थना में भी बुद्धम् शरणम् गच्छामि ॐ से ही प्रारम्भ होती है। ॐ एक ऐसा नाद है, अक्षर है, अनाहत है।

अनाहत मतलब जो कि आहत नहीं होता। जैसे कि यदि हम क, ख, ग, घ बोलेंगे तो यह कण्ठ से होंगे। इसी प्रकार स्वर और व्यञ्जन दन्त्य, ओष्ठय, यह होंठ से निकलेंगे। ॐ को बोलेंगे तो कोई भी अङ्ग स्पर्श नहीं होंगे। यह अनाहत है या सम्पूर्ण नाद है। स्वर व्यञ्जन किसी अङ्ग से स्पर्श होते हैं किन्तु ॐ नाभि से निकलता है इसीलिए वह अन्दर से आपको आलोकित करता है, ऊर्जावान करता है एवं आनन्दमय करता है। ब्रह्माण्ड का अस्तित्व है ॐ सर्व व्यापक है। जब निराकार हो जाए एवं कोई भी आकाङ्क्षा न बचे, ऐसे ओमकार के साथ जब प्राण छूटे तो हम परम गति को प्राप्त होते हैं। इन्हीं शब्दों के साथ इस अद्वभुत अध्याय के विवेचन का समापन हुआ।

प्रश्नोत्तर सत्र:-

प्रश्नकर्ता:- कीर्ति दीदी

प्रश्न:- धारणा के विषय में बताइए।

उत्तर:- धारणा के अनेक प्रकार के अभ्यास हैं। जिसमें स्वयं सूचना एक अत्यन्त प्रभावशाली तन्त्र है। जो हम बार-बार स्वयं से कहते हैं, वह हमारे भीतर घटित होने लगता है। हम उसी प्रकार के हो जाते हैं, वैसा ही आचरण करने लगते हैं। विवेचक ने स्वयं एक प्रयोग किया जिसमें कुछ बच्चों के मस्तक पर अलग-अलग व्यक्तियों के नामों की पर्चियाँ चिपका दी गईं। जैसे किसी के मस्तक पर अमिताभ बच्चन, किसी के लालू यादव किसी के लता मंगेशकर इत्यादि और मस्तक पर जो पर्ची चिपकाई थी उसे उसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं था। खेल इस प्रकार था कि किसी को भी पर्ची पर लिखित नाम से उस बच्चों को सम्बोधित नहीं करना है, अपितु उसके गुण के बारे में ही उससे बात करनी है या उसके व्यक्तित्व के बारे में ही बात करनी है, किन्तु जब दूसरे बच्चे उससे मिलते तो वह ठीक उसी प्रकार आचरण करते जैसे कि उसे पर्ची के नाम वाले व्यक्ति ही उनके सामने हैं। लता मंगेशकर से कहते कि आप कितना अच्छा गाती हो। विवेचक ने देखा कि जिस बच्ची के मस्तक पर ऐश्वर्या राय लिखा था उससे सभी कहते कि आप अत्यन्त सुन्दर हैं, आप विश्व सुन्दरी हो, आपके साथ हम फोटो खिंचवाना चाहते हैं, आपके हस्ताक्षर हमें दे दीजिए, तो वह बच्ची ठुमक कर चलने लगी। किन्तु जिस बच्चे के मस्तक पर लालू यादव लिखा था वह मिल ही नहीं रहा था, वह छिप गया था किन्तु मैंने उसे ढूँढ़ निकाला। वह शिकायत करने लगा कि सभी को आपने अच्छे नाम दिए हैं मुझे ही पशु का नाम दिया। सभी मुझसे पूछते हैं कि चारा खाया क्या? जब पाँच मिनट में बच्चों पर इतना गहरा प्रभाव हो सकता है तो धारणा की शक्ति कितनी अदभुत है। यदि हम प्रतिदिन स्वयं से कहेंगे हम विनम्र हैं, हम स्वस्थ हैं तो ठीक इसी प्रकार का हमारे साथ घटित होगा। धारणा का मुख्य अभ्यास स्वयं के भीतर झाँकना है। मूल रूप से धारणा का जो अभ्यास है, वह स्वयं को देखना है।

प्रश्नकर्ता:- राजीव लोचन भैया

प्रश्न:-
अष्टाङ्ग योग में रेचक, पूरक, कुम्भक और त्राटक, उसमें आप त्राटक के बारे में बताइए।

उत्तर:- 
त्राटक का अर्थ अलग अलग प्रकार से अपनी दृष्टि को स्थिर करना। जिस प्रकार श्वास को प्राणायाम से केन्द्रित किया जाता है उसी प्रकार आँखों को त्राटक के द्वारा केन्द्रित किया जाता है। त्राटक में एक बिन्दु पर, एक ज्योति पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। त्राटक का उद्देश्य मन को स्थिर करना है।

प्रश्नकर्ता:- जक्का शिव रामदास भैया

प्रश्न:- क्या आपके द्वारा सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता का विवेचन किया गया है या भविष्य में एक साथ किया जाना सम्भव है?

उत्तर:- सञ्जय मालपानी यूट्यूब पर आपको ये सभी संक्षेप में मिल जाएगा। स्वामी जी का भी ज्ञानेश्वरी पर भाव दर्शन नाम से यूट्यूब पर पूरी श्रृङ्खला उपलब्ध है।