विवेचन सारांश
भगवत्प्राप्ति के लक्षण
भगवान श्रीकृष्ण की वन्दना, दीप प्रज्वलन एवम् श्रीगुरु चरणों में वन्दन के पश्चात् पन्द्रहवें अध्याय के पूर्वार्द्ध सत्र का विवेचन प्रारम्भ हुआ। श्रीकृष्ण की अत्यन्त मङ्गलमय कृपा से ऐसा भाग्योदय जागृत हुआ है कि हम अपने जीवन का उद्धार करने के लिए, उसका सदुपयोग करने के लिए, इस मनुष्य जीवन को सार्थक करने के लिए भगवद्गीता पढ़ने में, उसको समझने में और गीता को अपने जीवन में लाने में अग्रसर हो गए हैं। पता नही हमारे इस जन्म के सुकृत हैं या कोई पूर्व जन्म के कोई ऐसे सुकृत हैं कि श्रीभगवान की कृपादृष्टि हो गई है, जिससे हम भगवान की इस साधना में लग गए हैं।
गीताजी को सुनना, समझना, जानना इससे बड़ा सुगम, सुखद और कल्याणकारी मार्ग मानवमात्र के लिए कोई नहीं है। अनेक आचार्यों और महापुरुषों ने बार-बार ऐसा वर्णन किया है। गीताजी के मार्ग पर हम सभी लोग जिस प्रकार लग गए हैं, यह श्रीभगवान की ही कृपा से हुआ है। हम चुन लिए गए हैं, गीताजी को पढ़ने के लिए। बारहवाँ अध्याय पूर्ण हो गया है, उसका विवेचन भी आपने देखा है और भक्त के उनतालीस लक्षणों को भी आपने जाना है। भक्तिमार्ग का यह सर्वोत्तम अध्याय है। भक्ति मार्ग से ही हम श्री गीताजी का अध्ययन आरम्भ करें, ऐसी आचार्यों की आज्ञा है।
आज हम पन्द्रहवें अध्याय का चिन्तन करेंगे। बारहवाँ अध्याय भक्ति मार्ग का श्रेष्ठतम अध्याय है और पन्द्रहवाँ अध्याय ज्ञान मार्ग का श्रेष्ठतम अध्याय है। यह थोड़ा कठिन है, फिर भी समझने योग्य है। श्रीगीताजी का बारहवाँ और पन्द्रहवाँ अध्याय सबसे छोटे हैं। बारहवें अध्याय में आपने अनुष्टुप छन्द के बीस छोटे-छोटे श्लोक पढ़े हैं। अब तक कुछ साधकों को याद भी हो गए होंगे। पन्द्रहवें अध्याय में भी बीस ही श्लोक हैं, परन्तु कुछ श्लोक त्रिष्टुप छन्द के हैं।
त्रिष्टुप छन्द और अनुष्टुप छन्द क्या हैं?
अनुष्टुप छन्द आठ - आठ मात्राओं के चार चरण, ऐसे बत्तीस अक्षरों के चार चरण को अनुष्टुप छन्द कहा गया है। अनुष्टुप छन्द के श्लोकों को राग और लय में बैठाकर गायन किया जा सकता है। त्रिष्टुप छन्द के भी चार चरण हैं। ग्यारह मात्राओं का एक छन्द। ऐसे चवालीस मात्राओं के चार चरण, चार पंक्तियों में छपे होते हैं। अधिक मात्राओं के कारण लम्बे होते हैं। श्रीगीता जी में यही दो प्रकार के छन्द होते हैं। यह बहुत छोटा, परन्तु उतना ही महत्त्वपूर्ण अध्याय है। श्रीभगवान ने इसको शास्त्र की उपमा दी है।
गीताजी को सुनना, समझना, जानना इससे बड़ा सुगम, सुखद और कल्याणकारी मार्ग मानवमात्र के लिए कोई नहीं है। अनेक आचार्यों और महापुरुषों ने बार-बार ऐसा वर्णन किया है। गीताजी के मार्ग पर हम सभी लोग जिस प्रकार लग गए हैं, यह श्रीभगवान की ही कृपा से हुआ है। हम चुन लिए गए हैं, गीताजी को पढ़ने के लिए। बारहवाँ अध्याय पूर्ण हो गया है, उसका विवेचन भी आपने देखा है और भक्त के उनतालीस लक्षणों को भी आपने जाना है। भक्तिमार्ग का यह सर्वोत्तम अध्याय है। भक्ति मार्ग से ही हम श्री गीताजी का अध्ययन आरम्भ करें, ऐसी आचार्यों की आज्ञा है।
आज हम पन्द्रहवें अध्याय का चिन्तन करेंगे। बारहवाँ अध्याय भक्ति मार्ग का श्रेष्ठतम अध्याय है और पन्द्रहवाँ अध्याय ज्ञान मार्ग का श्रेष्ठतम अध्याय है। यह थोड़ा कठिन है, फिर भी समझने योग्य है। श्रीगीताजी का बारहवाँ और पन्द्रहवाँ अध्याय सबसे छोटे हैं। बारहवें अध्याय में आपने अनुष्टुप छन्द के बीस छोटे-छोटे श्लोक पढ़े हैं। अब तक कुछ साधकों को याद भी हो गए होंगे। पन्द्रहवें अध्याय में भी बीस ही श्लोक हैं, परन्तु कुछ श्लोक त्रिष्टुप छन्द के हैं।
त्रिष्टुप छन्द और अनुष्टुप छन्द क्या हैं?
अनुष्टुप छन्द आठ - आठ मात्राओं के चार चरण, ऐसे बत्तीस अक्षरों के चार चरण को अनुष्टुप छन्द कहा गया है। अनुष्टुप छन्द के श्लोकों को राग और लय में बैठाकर गायन किया जा सकता है। त्रिष्टुप छन्द के भी चार चरण हैं। ग्यारह मात्राओं का एक छन्द। ऐसे चवालीस मात्राओं के चार चरण, चार पंक्तियों में छपे होते हैं। अधिक मात्राओं के कारण लम्बे होते हैं। श्रीगीता जी में यही दो प्रकार के छन्द होते हैं। यह बहुत छोटा, परन्तु उतना ही महत्त्वपूर्ण अध्याय है। श्रीभगवान ने इसको शास्त्र की उपमा दी है।
15.1
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधः(श्) शाखम्, अश्वत्थं(म्) प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि, यस्तं(व्ँ) वेद स वेदवित्॥15.1॥
श्रीभगवान् बोले – ऊपर की ओर मूल वाले (तथा) नीचे की ओर शाखा वाले (जिस) संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष को (प्रवाह रूप से) अव्यय कहते हैं (और) वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसार-वृक्ष को जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदों को जानने वाला है।
विवेचन- श्रीभगवान जी अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! तुम इस अध्याय को शास्त्र समझो। कोई भी हर्ष का अवसर हो या शोक का अवसर अथवा किसी भी कार्य को करने से पहले पन्द्रहवें अध्याय का पठन किया जा सकता है। इस अध्याय में श्रीभगवान ने अपने पुरूषोत्तम स्वरुप का वर्णन किया है।
श्रीभगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! आदिपुरूष परमेश्वर मूलवाले और ब्रह्मरूप वाले इस संसाररूपी पीपल वृक्ष की शाखाओं वाले, अविनाशी वृक्ष के वेदरूपी पत्ते हैं। इस संसार रूपी वृक्ष को, मूल सहित तत्त्व को जानने वाला मनुष्य ही जो वेदों को जाननेवाला है, वही जानता है। अर्थात ऊपर की ओर मूल वाले तथा नीचे की ओर शाखा वाले (जिस) संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष को (प्रवाह रूप से) अव्यय कहते हैं (और) वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसार-वृक्ष को जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदों को जानने वाला है।

एक बार स्वामी रामतीर्थ अमेरिका गए, जहाज़ में चौदह दिन की यात्रा में उनका सामान खो गया। जहाज़ के कप्तान ने उन्हें पूछा कि आपको कोई लेने आएगा? प्रत्युत्तर में स्वामी रामतीर्थ ने उन्हें पूछा कि क्या आप मुझे अपने घर नहीं ले जाना चाहते? यह सुनकर ही कप्तान प्रसन्न हुआ, क्योंकि वह गत चौदह दिन में उनकी दिनचर्या से प्रभावित था। वह आदर सहित उन्हें घर ले गया। वहॉं बातों-बातों में स्वामी रामतीर्थ उन्हें बताते हैं कि वे गणित विज्ञान के विशेषज्ञ हैं। उसी समय कप्तान का आठ वर्षीय पुत्र गणित का एक प्रश्न अपने पिता से पूछता है। वह स्वामीजी से पुत्र का परिचय कराते हुए कहते हैं कि अपना प्रश्न स्वामीजी को बताओ वे समाधान बता देंगे।
बच्चा प्रश्न करता है कि एक सरल रेखा क्या होती है? स्वामी रामतीर्थ पूछते हैं कि तुम्हें जवाब विद्यालय में जो सिखाया जाता है वैसा चाहिए या जो सही उत्तर है वो बताएँ? इसपर कप्तान झुॅंझलाकर पूछता है कि सीधी रेखा तो दो बिन्दुओं को जोड़ने से बनती है तो सही उत्तर और क्या हो सकता है? स्वामीजी जवाब देते है-
दो बिन्दुओं में सीधी रेखा के लिए एक पर्याप्त जगह की आवश्यकता होती है।
वह कप्तान अचम्भित हो गया और रात्रि में ही न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के प्रशिक्षक को आमन्त्रित करता है। वह प्रशिक्षक भी तर्क-वितर्क में निरुत्तर हो जाता है। सुबह विभिन्न प्रशिक्षकों और विशेषज्ञों की मीटिंग होती है। स्वामी रामतीर्थ ने वहॉं प्रतिपादित किया कि शून्य से ऊपर कुछ भी नहीं है। अगले सात दिन उन्होंने भाषण किए। वो भाषण इतने प्रचलित हुए कि सातवें दिन अमेरिका के राष्ट्रपति श्री रूज़वेल्ट के साथ उन्होंने रात्रिभोज किया।
श्रीभगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! आदिपुरूष परमेश्वर मूलवाले और ब्रह्मरूप वाले इस संसाररूपी पीपल वृक्ष की शाखाओं वाले, अविनाशी वृक्ष के वेदरूपी पत्ते हैं। इस संसार रूपी वृक्ष को, मूल सहित तत्त्व को जानने वाला मनुष्य ही जो वेदों को जाननेवाला है, वही जानता है। अर्थात ऊपर की ओर मूल वाले तथा नीचे की ओर शाखा वाले (जिस) संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष को (प्रवाह रूप से) अव्यय कहते हैं (और) वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसार-वृक्ष को जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदों को जानने वाला है।
एक बार स्वामी रामतीर्थ अमेरिका गए, जहाज़ में चौदह दिन की यात्रा में उनका सामान खो गया। जहाज़ के कप्तान ने उन्हें पूछा कि आपको कोई लेने आएगा? प्रत्युत्तर में स्वामी रामतीर्थ ने उन्हें पूछा कि क्या आप मुझे अपने घर नहीं ले जाना चाहते? यह सुनकर ही कप्तान प्रसन्न हुआ, क्योंकि वह गत चौदह दिन में उनकी दिनचर्या से प्रभावित था। वह आदर सहित उन्हें घर ले गया। वहॉं बातों-बातों में स्वामी रामतीर्थ उन्हें बताते हैं कि वे गणित विज्ञान के विशेषज्ञ हैं। उसी समय कप्तान का आठ वर्षीय पुत्र गणित का एक प्रश्न अपने पिता से पूछता है। वह स्वामीजी से पुत्र का परिचय कराते हुए कहते हैं कि अपना प्रश्न स्वामीजी को बताओ वे समाधान बता देंगे।
बच्चा प्रश्न करता है कि एक सरल रेखा क्या होती है? स्वामी रामतीर्थ पूछते हैं कि तुम्हें जवाब विद्यालय में जो सिखाया जाता है वैसा चाहिए या जो सही उत्तर है वो बताएँ? इसपर कप्तान झुॅंझलाकर पूछता है कि सीधी रेखा तो दो बिन्दुओं को जोड़ने से बनती है तो सही उत्तर और क्या हो सकता है? स्वामीजी जवाब देते है-
दो बिन्दुओं में सीधी रेखा के लिए एक पर्याप्त जगह की आवश्यकता होती है।
वह कप्तान अचम्भित हो गया और रात्रि में ही न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के प्रशिक्षक को आमन्त्रित करता है। वह प्रशिक्षक भी तर्क-वितर्क में निरुत्तर हो जाता है। सुबह विभिन्न प्रशिक्षकों और विशेषज्ञों की मीटिंग होती है। स्वामी रामतीर्थ ने वहॉं प्रतिपादित किया कि शून्य से ऊपर कुछ भी नहीं है। अगले सात दिन उन्होंने भाषण किए। वो भाषण इतने प्रचलित हुए कि सातवें दिन अमेरिका के राष्ट्रपति श्री रूज़वेल्ट के साथ उन्होंने रात्रिभोज किया।
अधश्चोर्ध्वं(म्) प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके।।2।।
उस संसार वृक्ष की गुणों (सत्त्व, रज और तम) के द्वारा बढ़ी हुई (तथा) विषय रूप कोंपलों वाली शाखाएँ नीचे, (मध्य में) और ऊपर (सब जगह) फैली हुई हैं। मनुष्यलोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाले मूल (भी) नीचे और (ऊपर) (सभी लोकों में) व्याप्त हो रहे हैं।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि सत्त्व, रज और तम तीन गुणों के द्वारा बढ़ी हुई तथा इस संसाररूपी वृक्ष की विषय रूप कोंपलों (प्रवाल) वाली शाखाएँ नीचे, मध्य में और ऊपर सब जगह फैली हुई हैं। इस मनुष्य लोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाले मूलतत्व भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रहे हैं। मनुष्यरूपी वृक्ष की जड़ शीश है और शाखाएँ शरीर है। यदि शीश है तो मनुष्य जीवित है वरना मरण तो सभी का निश्चित है।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते, नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं(म्) सुविरूढमूलम्, असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।3।।
इस संसार वृक्ष का (जैसा) रूप (देखने में आता है), वैसा यहाँ (विचार करने पर) मिलता नहीं; (क्योंकि इसका) न तो आदि है, न अन्त है और न स्थिति ही है। इसलिये इस दृढ़ मूलों वाले संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ असङ्गता रूप शस्त्र के द्वारा काटकर –
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि जो आकृति वृक्ष की है, वैसी ही आकृति संसाररूपी वृक्ष की है। वृक्ष का आदि और अन्त है, परन्तु इस ब्रह्माण्ड का न तो कोई आदि है और न ही कोई अन्त। निर्गुणस्वरूप निराकार सृष्टि के रचयिता स्वयं श्रीकृष्ण हैं।
एक बार शुकदेव जी को भ्रम हो गया कि उनसे बड़ा कोई ज्ञान का वाचक नहीं है। उन्होंने यह बात ऋषि वेदव्यास जी के सामने रखी। ऋषि वेदव्यास जी समझ गए कि इन्हें घमण्ड हो गया है। वेदव्यास जी ने शुकदेव जी को राजा जनक के पास दीक्षा के लिए भेज दिया। जनकपुरी में वे बहुत बढ़ा-चढ़ा कर अपना परिचय द्वारपाल को देते हैं और राजा तक अपना समाचार देने को कहते हैं। द्वारपाल जाकर सूचना राजा को देता है। राजा जनक कहते हैं कि उन्हें पता है और उनको प्रतीक्षा करने को कहते हैं। द्वारपाल आकर बताता है तो शुकदेव जी को आघात लगता है कि मेरे विषय में जानने के पश्चात भी राजा ने प्रतीक्षा करने को बोला। ऐसे ही छह दिन बीत जाते हैं। प्रतिदिन राजा प्रतीक्षा करने को बोलते और शुकदेव जी वहीं द्वार पर खड़े होकर प्रतीक्षा करते हैं। सातवें दिन शुकदेव जी को लगा कि अपना परिचय का बहुत लम्बा दिया है, इसलिए शायद राजा को समझ नहीं आ रहा। वे द्वारपाल को नमन करके कहते हैं कि शुकदेव राजा जनक से दीक्षा लेने का अभिलाषी है। इतना सुनते ही राजा अपने सिंहासन से उठकर शुकदेव जी का आवभगत करते हैं। उन्हें तरह तरह के व्यञ्जन परोसते हैं और विश्राम करने को कहते हैं। कुछ समय बाद बुलाकर कहते हैं कि आप बहुत शुभ घड़ी में पधारे हैं। आज कुलदेवी की पूजा है, जिसमें किसी ब्राह्मण के द्वारा तेल से भरा पात्र उठाकर पूरे राज्य की प्रदक्षिणा करनी पड़ती है। आप यह शुभ कार्य करें। शुकदेव जी प्रदक्षिणा करने के बाद जब वापिस आते हैं तो राजा जनक शुकदेव जी से पूछते हैं कि आपको यह राज्य कैसा लगा? शुकदेव कहते हैं कि मेरा ध्यान तो तेल के पात्र पर ही था कि कहीं एक बूॅंद भी तेल नहीं गिर जाए। राजा जनक कहते हैं कि आपकी ज्ञान की दीक्षा पूर्ण हुई।
इससे यह शिक्षा मिलती है कि जो मनुष्य अपने नित्यकर्म करते हुए, ध्यान श्रीभगवान की ओर रखता है, उन्हीं का भजन सुमिरन करता है, वह श्रीभगवान को अत्यन्त प्रिय है और वह उनकी कृपा का पात्र है।
एक बार शुकदेव जी को भ्रम हो गया कि उनसे बड़ा कोई ज्ञान का वाचक नहीं है। उन्होंने यह बात ऋषि वेदव्यास जी के सामने रखी। ऋषि वेदव्यास जी समझ गए कि इन्हें घमण्ड हो गया है। वेदव्यास जी ने शुकदेव जी को राजा जनक के पास दीक्षा के लिए भेज दिया। जनकपुरी में वे बहुत बढ़ा-चढ़ा कर अपना परिचय द्वारपाल को देते हैं और राजा तक अपना समाचार देने को कहते हैं। द्वारपाल जाकर सूचना राजा को देता है। राजा जनक कहते हैं कि उन्हें पता है और उनको प्रतीक्षा करने को कहते हैं। द्वारपाल आकर बताता है तो शुकदेव जी को आघात लगता है कि मेरे विषय में जानने के पश्चात भी राजा ने प्रतीक्षा करने को बोला। ऐसे ही छह दिन बीत जाते हैं। प्रतिदिन राजा प्रतीक्षा करने को बोलते और शुकदेव जी वहीं द्वार पर खड़े होकर प्रतीक्षा करते हैं। सातवें दिन शुकदेव जी को लगा कि अपना परिचय का बहुत लम्बा दिया है, इसलिए शायद राजा को समझ नहीं आ रहा। वे द्वारपाल को नमन करके कहते हैं कि शुकदेव राजा जनक से दीक्षा लेने का अभिलाषी है। इतना सुनते ही राजा अपने सिंहासन से उठकर शुकदेव जी का आवभगत करते हैं। उन्हें तरह तरह के व्यञ्जन परोसते हैं और विश्राम करने को कहते हैं। कुछ समय बाद बुलाकर कहते हैं कि आप बहुत शुभ घड़ी में पधारे हैं। आज कुलदेवी की पूजा है, जिसमें किसी ब्राह्मण के द्वारा तेल से भरा पात्र उठाकर पूरे राज्य की प्रदक्षिणा करनी पड़ती है। आप यह शुभ कार्य करें। शुकदेव जी प्रदक्षिणा करने के बाद जब वापिस आते हैं तो राजा जनक शुकदेव जी से पूछते हैं कि आपको यह राज्य कैसा लगा? शुकदेव कहते हैं कि मेरा ध्यान तो तेल के पात्र पर ही था कि कहीं एक बूॅंद भी तेल नहीं गिर जाए। राजा जनक कहते हैं कि आपकी ज्ञान की दीक्षा पूर्ण हुई।
इससे यह शिक्षा मिलती है कि जो मनुष्य अपने नित्यकर्म करते हुए, ध्यान श्रीभगवान की ओर रखता है, उन्हीं का भजन सुमिरन करता है, वह श्रीभगवान को अत्यन्त प्रिय है और वह उनकी कृपा का पात्र है।
ततः(फ्) पदं(न्) तत्परिमार्गितव्यं(य्ँ) यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं(म्) पुरुषं(म्) प्रपद्ये यतः(फ्) प्रवृत्तिः(फ्) प्रसृता पुराणी॥15.4॥
उसके बाद उस परमपद (परमात्मा) की खोज करनी चाहिये जिसको प्राप्त होने पर मनुष्य फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिससे अनादिकाल से चली आने वाली (यह) सृष्टि विस्तार को प्राप्त हुई है, उस आदिपुरुष परमात्मा के ही मैं शरण हूँ।
विवेचन- श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि हे अर्जुन! भोग विलास रहित, ममता रहित, आसक्ति विहीन मनुष्य भी इस संसार के बन्धन से मुक्त नहीं होता। हजारों लाखों जन्मों के पश्चात ही कोई विरला होता है, जो जन्म मृत्यु के इस बन्धन से मुक्त हो सकता है। मनुष्य जिस परमपद परमात्मा की खोज में रहते हैं और जिनको प्राप्त होने पर मनुष्य फिर लौटकर, इस संसार में नहीं आते, जिनसे अनादिकाल से चली आने वाली यह सृष्टि विस्तार को प्राप्त हुई है, मैं उस आदिपुरुष परमात्मा की शरण में हूँ।
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा, अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः(स्) सुखदुःखसञ्ज्ञै:(र्), गच्छन्त्यमूढाः(फ्) पदमव्ययं(न्) तत्।।5।।
जो मान और मोह से रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्ति से होने वाले दोषों को जीत लिया है, जो नित्य-निरन्तर परमात्मा में ही लगे हुए हैं, जो (अपनी दृष्टि से) सम्पूर्ण कामनाओं से रहित हो गये हैं, जो सुख-दुःख नाम वाले द्वन्द्वों से मुक्त हो गये हैं, (ऐसे) (ऊँची स्थिति वाले) मोह रहित साधक भक्त उस अविनाशी परमपद (परमात्मा) को प्राप्त होते हैं।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि जिस प्राणी का मन मान-सम्मान, राग-द्वेष, अपना-पराया आदि भावनाओं से ऊपर उठता है, वही सर्वोत्तम प्राणी है। अर्थात जो व्यक्ति मान और मोह से रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्ति से होने वाले दोषों को जीत लिया है और जो नित्य निरन्तर परमात्मा में ही मग्न रहते हैं, जो अपनी दृष्टि से सम्पूर्ण कामनाओं से रहित हो गये हैं, जो सुख-दुःख नाम वाले द्वन्द्वों से मुक्त हो गये हैं, ऐसे उच्चकोटि वाले, मोहरहित साधक एवम् भक्त, उस अविनाशी परमपद परमात्मा को प्राप्त करते हैं।
: : प्रश्नोत्तर : :
प्रश्नकर्ता- अशोक लिमये
: : प्रश्नोत्तर : :
प्रश्नकर्ता- अशोक लिमये
प्रश्न - अद्वेष्टा सर्वभूतानां का पालन कैसे करें?
उत्तर - दूसरा कोई क्या करता है, इस पर हमारा अधिकार नहीं है। हमारे पिता जैसा चाहते थे, वैसे हम नहीं बने। कुछ उनकी मानी कुछ अपने मन से किया। मैं स्वयं दूसरों के लिए अद्वेष्टा हो जाऊं, भले ही वह मेरा शत्रु क्यों न हो! अङ्गद जी रावण के पास जाते समय श्रीराम से पूछते हैं कि वहॉं जाकर क्या करना है? श्रीराम जी कहते हैं-
काजु हमार तासु हित होई।
रिपु सन करेहु बतकही सोई।।
लङ्काकाण्ड(177:4 )
लङ्काकाण्ड(177:4 )
रामजी रावण के प्रति अद्वेष्टा रहे।
प्रश्नकर्ता - हनुमान प्रसाद बगड़िया भैया
प्रश्न - कर्मकाण्ड और विधि में क्या अन्तर है?
उत्तर- कर्मकाण्ड करने की विधि कर्मकाण्ड विधि कहलाती है। शास्त्र विहित विधि से कर्मकाण्ड करना चाहिए।
प्रश्नकर्ता - रश्मि दीदी
प्रश्न - मृत्यु के पश्चात् दूसरे जन्म में पिछला याद नहीं रहता तो हमारे देने से वे प्रसन्न कैसे होते हैं?
उत्तर - मृत्यु के पश्चात् जो पितृलोक में निवास करते हैं, उन्हें देखने की शक्ति होती है। हमारे द्वारा किए श्राद्ध और तर्पण देखने व प्राप्त होने से उन्हें तृप्ति होती है। जिन्होंने नया शरीर धारण कर लिया, वे भी इस प्रकार से पोषित होने पर प्रसन्नता अनुभव करते हैं।
प्रश्नकर्ता - सविता सिन्हा दीदी
प्रश्न - स्वयं का क्रियाकर्म कैसे करें?
उत्तर - जीवित अवस्था में स्वयं के लिए क्रिया कर्म नहीं करना। किसी अन्य को या योग्य ब्राह्मण को कह कर जा सकते हैं। वे आपके जाने के बाद करें। स्वयं के लिए गीतपाठ पढ़ते रहें या ईश्वर की आराधना करते रहें।
प्रश्नकर्ता - तिस्या भैया
प्रश्न - वेदों में श्री कृष्ण का नाम है, या नहीं?
उत्तर - वेदों का प्रादुर्भाव प्राचीन है। श्रीकृष्ण का का अवतार बाद में हुआ। वेदों में ईश्वर की पूजा का विधान है। इसलिए ईश्वर के अवतार की उपासना करते हैं। पण्डित जी पूजा करते समय सारे वैदिक देवी देवताओं का स्मरण करते हैं।
प्रश्नकर्ता - कृपा वाडीवाला दीदी
प्रश्न - श्रीराम का चरित्र सरल है, श्रीकृष्ण को समझना कठिन क्यों है?
उत्तर - श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों के जीवन कठिन और कष्टपूर्ण रहे हैं। कष्टों में भी प्रसन्न रहे हैं। दोनों ने दूसरों की भलाई के कार्य किए हैं। श्रीकृष्ण का जन्म जेल में हुआ। बार-बार उनका वध करने के प्रयास होते रहे।
प्रश्नकर्ता - राशि दीदी
प्रश्न - श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ बारहवें अध्याय से क्यों करते हैं?
उत्तर - कथा कहानी को हम आरम्भ से अन्त तक क्रमानुसार पढ़ सकते हैं। शास्त्र सीखना है, तो आचार्य के निर्देशानुसार अध्ययन करना चाहिए।
सामान्य पठन की दृष्टि से पहले अध्याय से पढ़ सकते हैं, उसमें अर्जुन के विषाद का ही वर्णन है। उसके बाद द्वितीय अध्याय में भगवान अर्जुन को फटकारते और समझाते हैं। दोनों अध्याय अपेक्षाकृत बड़े भी हैं। आरम्भ में यह सब नये साधक की समझ में नहीं आता। साधक की रुचि बन पाना कठिन है।
हमारे आचार्य विद्वान श्रीमद्भगवद्गीता का पाठन भक्तियोग से आरम्भ करवाते हैं। यह बारहवाँ अध्याय अत्यन्त सरल और छोटा है। इससे पठन और अध्ययन में सरलता और रुचि बनी रहती है। सरलता पूर्वक आरम्भ होने और रुचि बन जाने पर, बाद में क्लिष्टता भी सरल लगने लगती है।
प्रश्नकर्ता - स्वर्णा कुमारी दीदी
प्रश्न - श्रीराम ने किसी अन्य के कहने पर सीताजी को क्यों छोड़ा?
उत्त र- व्यक्ति से समाज का, समाज से देश का और देश से विश्व का चरित्र परिलक्षित होता है। श्रीराम ने साधनहीन समय में हजारों मील की यात्रा करके सीता जी की खोज की। वानर भालुओं की सेना एकत्र करके, उस समय के सबसे शक्तिशाली रावण का परास्त किया।
श्रीसीता जी के लिए उनके मन में अत्यन्त आदर और प्रेम है। राजा महाराजाओं में तो बहुविवाह प्रचलित है। सीता जी के वाल्मीकि आश्रम में जाने के बाद, गुरु वशिष्ठ जी के कहने पर भी श्रीराम ने अन्य विवाह नहीं किया। श्रीसीता जी की स्वर्ण प्रतिमा बनाकर, अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किया गया। श्रीसीता के प्रति इतना प्रेम होने पर भी, श्रीराम राजधर्म को अपने व्यक्तिगत धर्म से ऊपर रखते हैं। वे केवल सीतापति नहीं हैं, वे अयोध्या के राजा हैं। भगवान के रूप में वे आलोचक की बुद्धि बदल सकते थे। उन्होंने आदर्श स्थापित किया कि राजधर्म के लिए पत्नी को भी त्यागना पड़ सकता है। ऐसा आदर्श स्थापित किया है, इसलिए मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
पाश्चात्य सभ्यता व्यक्तिगत जीवन को महत्व देती है। भारतीय संस्कृति में श्रीराम या पॉंचों पाण्डव भी अपना जीवन व्यक्तिगत न मानकर, परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए है, ऐसा मानते हैं। दशरथ जी ने स्वयं अपने मुख से श्रीराम को वन जाने के लिए नहीं कहा। फिर भी यह ज्ञात होने पर कि पिता ने वचन दिया है, श्रीराम सहर्ष वन में चले गए।