विवेचन सारांश
कर्म से जनित - कर्मयोग
भक्त शिरोमणि हनुमान जी के गुणों एवं ख्याति की चालीस चौपाइयों में वर्णित काव्यात्मक स्तुति हनुमान चालीसा पाठ के पश्चात मङ्गलाचरण, दीप प्रज्वलन और सद्गुरु को वन्दन कर आज के विवेचन सत्र का शुभारम्भ हुआ।
गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय का चिन्तन मन्थन यदि लोकमान्य तिलक जी द्वारा रचित गीता रहस्य के सन्दर्भ में करें तो यह अध्याय, सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता का निचोड़ है। तीसरा अध्याय लोकमान्य जी को अत्यन्त प्रिय था। उनकी अनुभूति के अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता कर्मयोग का ग्रन्थ है। हम अपने स्वधर्म का पालन करते हुए, नित्य क्रियाओं का निर्वाह करते हुए भी किस प्रकार योग में लीन हो पायेंगे, इसकी सबसे प्रभावशाली कुञ्जी है - कर्मयोग। हमने कई बार ऐसा अनुभव किया होगा कि अपने सांसारिक जीवन से क्षुब्ध होकर कुछ लोग सब कुछ त्याग वृन्दावन जाने की बात कर बैठते हैं। इस अध्याय में हमें बोध होगा कि अपने नित सामान्य जीवन को भी योग में बदल पाना सम्भव है।
जीवन में होने वाली घटनाओं का यदि अवलोकन करें तो समझ में आता है-
जीवन की हर घटना दो बार घटती है-
एक बार हमारे मन में और दूसरी बार प्रत्यक्ष रूप में।
बिना मन में घटे कोई भी घटना साकार हो बाहर प्रकट नहीं होती। हमारे द्वारा किये गए इस कर्म से जब कर्त्ता का भाव, अर्थात् मैं का बोध मिट जाये तो वही कर्म, योग में परिवर्तित हो जाता है। जब हम अपने कर्म में 'मैं और मेरा' के भाव को परिवर्तित कर समष्टि का भाव जागृत कर पाएँ तो वह कर्मयोग हो जाता है। इस तथ्य को गीता परिवार से जुड़े हुए साधकों के उदाहरण से भली भाँति समझ सकते हैं। गीता परिवार के साधक बिना किसी अर्थ की कामना किए, स्वेच्छा से, अपना कर्त्तव्य मान, सेवा प्रदान करते हैं, अतः उनका हर कर्म, कर्मयोग हो जाता है। 'मैं अपने मन को आनन्दित करने के लिए यह कार्य करता या करती हूँ', सभी साधक इसी भाव से कार्य करते हैं तो उनका काज यज्ञ का रूप धारण कर लेता है।
श्रीभगवान् ने सातवें श्लोक में कहा -
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन |
कर्मेन्द्रियै: कर्मयोगमसक्त: स विशिष्यते || 7||
मन द्वारा इन्द्रियों को वश में रखकर किया गया कर्म श्रेष्ठतम कहलाता है। मन को संयमित कर इन्द्रियों को संयमित करना आवश्यक है क्योंकि मन सबसे प्रबल और शक्तिशाली इन्द्रिय है। जैसे उपवास रखकर भी अगर मन स्वादिष्ट व्यञ्जनों की चाह में उलझा रहे तो वह व्यक्ति मिथ्याचारी है और सदैव मूढ़ ही रहेगा। मन से इन्द्रियों को नियन्त्रित कर पाना श्रेयस्कर है। मन को संयमित करना अत्यन्त जटिल काज है, इन्द्रियों को वश में करने की अपेक्षा। यदि हम कोई काम इस उद्देश्य से करें कि उससे हमें प्रसिद्धि मिल जाये तो यह है लोकेषणा, जो वित्तेषणा से भी भयङ्कर है।
हनुमान जी जब सीता मैया की खोज के लिए लङ्का की ओर उड़े तो कितने ही व्यवधान उन्हें मार्ग से डगमगाने के लिए उत्पन्न किये गए। मैनाक पर्वत ऊपर उठ उन्हें विश्राम करने का प्रलोभन देता है। विश्राम इन्द्रियों का भोग है, हनुमान जी बड़ी विनम्रता के साथ विश्राम करने के प्रस्ताव को अस्वीकारते हैं। वे पर्वत शिखर को अत्यन्त आदरपूर्वक अपना पिता का मित्र सम्बोधित करते हुए नमन करते हैं और उनसे समय के अभाव का कारण देते हुए वहाँ से प्रस्थान करते हैं। अगर वे रुक जाते तो पर्वत उन्हें अपने अन्दर ले डुबा देता। उसके बाद आगे मार्ग में सुरसा राक्षसी प्रकट होती है जो उनके लिए फिर एक बाधा बनती है। सुरसा हनुमान जी को बिना उसके मुख से गुज़रे आगे निकलने की आज्ञा नहीं देती। हनुमान जी इस बाधा से पार होने के लिए पहले एक विराट रूप धारण करते हैं और फिर यकायक सूक्ष्म रूप में परिवर्तित हो सुरसा के मुख में प्रवेश कर, इससे पहले कि वह मुख बन्द कर पाए बाहर निकल आते हैं।
यह सूक्ष्म हो जाना, अर्थात शून्य हो जाना, कर्म को कर्मयोग में बदलने की विधा है। मन से शून्य हो जाना, उसमें उत्पन्न होने वाली आशाओं से मुक्त हो पाना-
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः। || 16.12 ||
योग की विद्या मन को शून्य करने की विधा है। यम, नियम के साथ आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा मन की शुद्धि के मार्ग हैं, जब तक मन विचारों से शुद्ध नहीं हो जाता। विचार से ही विकार हैं, पहले मन में विचार उत्पन्न होता है, फिर विकार पनपते हैं। निर्विकार हो पाना से तात्पर्य है - अपने षट् रिपु -
काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, और मात्सर्य
पर विजय प्राप्त कर लेना।
हनुमानजी का शून्य हो जाना इस तथ्य का बोधक है। फिर आगे मार्ग में उनका सामना सिंहिका नामक अद्भुत राक्षसी से होता है जो नभ में उड़ते हुए जीव जन्तुओं की छाया को पकड़ कर उन्हें ज़मीन पर गिरा देती है और फिर उस पर वार करती है। आजकल सामाजिक व्यक्ति भी छायाचित्र के मायाजाल में अटके हुए हैं। अपनी प्रसिद्धि हेतु अपना चित्र हर जगह छपवाने के विशेष अवसर ढूँढते रहते हैं। यह लोकेषणा की लालसा भी व्यक्ति के पतन का मार्ग बन सकती है।
परमपूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज के गीता परिवार के सिद्धान्त वाक्य हैं-
गीता पढ़ें, पढ़ायें, जीवन में लायें'
इसने भी गीता सेवियों और साधकों के लिए मुक्ति का नवीन मार्ग खोल दिया है। हर प्रकार के विकार को त्याग गीताजी के प्रचार-प्रसार में अपना जीवन समर्पित कर देना, ऐसा परम सौभाग्य है जो कर्मयोग है, जिससे स्वयं का उत्थान सुनिश्चित है।
इस श्लोक में श्रीभगवान् अर्जुन को समझा रहे हैं कि, नियम से अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला और समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करने वाला, व्यक्ति ही श्रेष्ठ होता है। यह नियम निश्चय से ही आता है। बिना निश्चय नियम का पालन नहीं हो पाता। अपने जीवन में हमने कई बार इसका अनुभव किया होगा, जैसे नववर्ष के आरम्भ में अनेक सङ्कल्प लिए जाते हैं, पर कुछ ही सप्ताह उपरान्त उन्हें भुला भी दिया जाता है। नियम से नियमन और निश्चय से ही नियम इसलिए जीवन में सत्सङ्कल्पों का निश्चय सदा होते रहना चाहिए। मन में जब सत्सङ्कल्प उठते हैं तो उन्हें सार्थक करने हेतु मानव हर सम्भव प्रयास करने लगता है। मन और बुद्धि के परिश्रम से विजय प्राप्त होती है -
यतात्मा दृढनिश्चयः
अर्जुन को विजय प्राप्त कराने के लिए ही श्रीमद्भगवद्गीता कही गयी। अर्जुन के मन को परिपक्व बनाने के लिए, कर्त्तव्य बोध समझाने के लिए कि यह युद्ध सिंहासन के लिए नहीं अपितु आतताइयों को देहदण्ड दिलवाने के लिए किया जा रहा है। अर्जुन जब तक 'मैं और मेरे' के भाव में अटके हुए थे तब तक युद्ध लड़ना एक कर्म था पर जब भाव धर्म की रक्षा का हो गया तो युद्ध लड़ना भी कर्मयोग हो गया।
3.8
नियतं(ङ्) कुरु कर्म त्वं(ङ्), कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते, न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥3.8॥
श्रीभगवान् अर्जुन को बार-बार उसका कर्त्तव्य समझा रहे हैं और उसे प्रेरणा दे रहे हैं कि वे केवल कर्म नहीं, अपितु कर्मयोग करें ताकि उनकी प्रजा को कौरवों जैसे आततायियों के भय से मुक्ति मिले।
वर्तमान सन्दर्भ में श्रीभगवान् के इस उपदेश को हम अपने जीवन में कैसे उतार सकते हैं, यदि यह विचार मन में आये तो युद्ध करने का अधिकार श्रीभगवान् केवल सेनानियों, सेनापतियों को देश और न्याय की सुरक्षा हेतु दे रहे हैं। अन्य लोगों का स्वधर्म वह है जो उन्होंने स्वीकृत किया है और जो उन्हें नीयत से प्राप्त है। उदाहरण के लिए, एक शिक्षक का धर्म है कक्षा में प्रत्येक बालक को शिक्षा प्रदान करना पर यदि कोई बालक ठीक से पढ़ाई नहीं करे तो शिक्षक का धर्म है कि वह उस बालक की अज्ञानता को मिटाने के लिए हर सम्भव प्रयास करे। बालक के अज्ञान का हरण करने के लिए अपने सम्पूर्ण मानसिक और शारीरिक बल का उपयोग कर बालक के भविष्य का निर्माण करना शिक्षक का नियत कर्म है। उसी प्रकार गृहिणी का कर्त्तव्य है - गृह कार्यों में दक्षता। रसोई बनाना गृहिणी का नियत कर्म है पर वह अपनी रसोई बनाते समय यह भाव रख ले कि वह श्रीभगवान् को प्रसाद भोग कराने के लिए भोजन बनाती है तो उसका कर्म कर्मयोग बन जाता है और उसके हाथों से प्रसाद जैसे हितकारी भोजन का निर्माण होता है।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र, लोकोऽयं(ङ्) कर्मबन्धनः।
तदर्थं(ङ्) कर्म कौन्तेय, मुक्तसङ्गः(स्) समाचर॥3.9॥
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः।।4.28।
अग्नि में आहुति देना एक प्रकार का यज्ञ है, लेकिन 'मैं' की भावना से परे रहकर जो भी कर्म किये जाते हैं, वे सभी यज्ञ की परिभाषा में सम्मिलित हैं।
रक्तदान शिविर में भाग ले यदि हम किसी अनजान व्यक्ति के लिए एक बोतल रक्त दान करें या फिर वर्षा ऋतु में वृक्ष लगायें, बिना इस चिन्ता के कि उसके फल किसको प्राप्त होंगे, ऐसे कर्म कर्मयोग बन जाते हैं। इसके विपरीत जो कार्य आसक्ति के साथ, अपना स्वार्थ सिद्ध करने हेतु किया जाता है वह कर्म में बाँध देता है। फल की आशा रख कर किया कार्य कर्म होता है। जब किसी भी कार्य से 'मैं और मेरा' का भाव छूट जायेगा तो व्यक्ति का समष्टि की ओर का प्रवास आरम्भ होगा और वही यज्ञ कर्मयोग कहलाएगा।
सहयज्ञाः(फ्) प्रजाः(स्) सृष्ट्वा, पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वम्, एष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥3.10॥
ब्रह्माजी ने एक बार अपने तीनों पुत्रों - देव, दानव और मानव को भोजन पर आमन्त्रित किया। जब वे सब एकत्रित हुए तो उन्होंने पिता से कहा कि कई दिनों बाद आपसे भेंट हुई, कृपया कर कुछ उपदेश दीजिये।
और बोले यही मेरा उपदेश है।
इसके बाद दानव बोले, कि आप हमें दया करने की प्रेरणा दे रहे हैं ताकि हम अत्यधिक हिंसा न करें।
मानव ने कहा, आप हमें दान का पाठ सिखा रहे हैं, हमारे पास जो भी हो उसका कुछ भाग हमें औरों में दान करना चाहिए।
ब्रह्मा जी के इसी उपदेश को इस श्लोक द्वारा बताया गया है - यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त करना। यह वृद्धि साधारण नहीं है, यह समृद्धि है। वृद्धि पैसे, सम्मान से आ जाएगी पर समृद्धि सब अङ्गों से आती है। इसका अगर साक्षात् अनुभव करना है तो प्रातः काल घर की छत पर प्रकृति के सानिध्य में उगते हुए सूर्य को अर्ध्य देते हुए ह्रऊ से कोई शुभ सङ्कल्प करना चाहिए। अगर पूरी आस्था से सङ्कल्प कर लें तो उसी दिन से उस सङ्कल्प के पूर्ण होने के मार्ग खुलते जाते हैं। ऐसा इसलिए सम्भव है क्योंकि यह मानव शरीर पूर्णतः सृष्टि के साथ जुड़ा हुआ है। ब्रह्माण्ड में जो घटता है, वह शरीर में भी अनुभूत होता है। जब हम अपना तादात्म्य उस विस्तृत सृष्टि के साथ खुले मन से बनाते हैं, तब वह सृष्टि भी हमारी सहयोगी बन जाती है।
प्रकृति का एक नियत कर्म है कि वह हर वस्तु को सन्तुलित करती है जैसे कि एक जगह यदि हवा का दबाव कुछ कम हुआ तो दूसरी तरफ से हवा उस ओर बहने लगती है। यह विज्ञान का विषय है, पर यह प्रकृति का स्वभाव है। अगर कहीं कुछ घटा तो उसे बढ़ाने का कार्य आरम्भ हो जाता है।
इस तथ्य का एक और उदाहरण है - दो महा विश्वयुद्धों के पश्चात् जब जन गणना की समीक्षा की गयी तो ज्ञात हुआ कि युद्ध के उपरान्त पैदा हुए बच्चों में लड़कों की सँख्या लड़कियों से अधिक थी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि युद्ध में मरने वालों में पुरुषों की सङ्ख्या अधिक थी।
इसी प्रकार, ग्रीष्म ऋतु के उपरान्त बञ्जर धरती में हरियाली लाने के लिए वर्षा ऋतु का आगमन होता है। गङ्गोत्री का उद्गम स्थान बर्फीले पहाड़ों में है, जो धरती की प्यास बुझाने के लिये जल का स्त्रोत बनी।
अतः प्रकृत्ति सृष्टि में सन्तुलन बनाये रखने के लिए क्रियाशील है परन्तु केवल तभी तक जब तक मानवता स्थापित है। जब मानवता ही नीचे गिर जाती है तो प्रकृति भी अपना मुँह फेर लेती है।
देवान्भावयतानेन, ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं(म्) भावयन्तः(श्), श्रेयः(फ्) परमवाप्स्यथ॥3.11॥
यदि यह भाव मन में आ जाये तो गौपालन करने वाले को गौमाता भगवान का ही रूप प्रतीत होगी। जिस गाय की सेवा बहुत प्यार-दुलार से की जाये तो वह गाय भी उस परिवार को प्रेम करने लगती है। भारतीय प्रथा में बड़े बुज़ुर्ग कहते थे कि घर की महिला गाय की सेवा करती है, कई बार अपने छोटे बालक को गोदी में लिए वह चारा डालती या अन्य कोई कार्य करती, तो गाय बालक को प्रतिदिन सूँघती। जब गाय को चराने के लिए बाहर लाया जाता तो वह वही औषधि वनस्पति को चबाती जिससे उस बालक के भोग हेतु दुग्ध निर्मित हो, जिसे ग्रहण कर वह बालक हृष्ट-पुष्ट बने। एक और कहावत है - यदि घर में कोई बालक अस्वस्थ है तो गाय को सुँघा दो। गाय बालक को सूँघ कर जान लेती है कि उसके लिए कौन सा चारा श्रेयस्कर होगा। यही परस्पर प्रेम का भाव है जो हर प्राणी के साथ हम निर्मित कर सकते हैं।
विद्यालय में पढ़ने वाले बालकों के प्रति यदि हरि का स्वरूप समझकर व्यवहार किया जाये तो वे बालक भी बड़े होकर वही प्रेम सत्कार बरसायेंगे।
तुझमें है यह सारा संसार,
इसी भावना से अंतर भर मिलूँ
सभी से तुझे निहार।
हर बाला देवी की प्रतिमा,
बच्चा बच्चा राम है ॥
इष्टान्भोगान्हि वो देवा, दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो, यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥3.12॥
राजसूय यज्ञ की कथा में, भगवान को पूजा का मान दिया गया परन्तु उन्होंने वहाँ भी अपनी सेवा देना ही स्वीकारा। औरों के झूठे पत्तल उठाने जैसा कार्य, जिसे हम सबसे निम्न श्रेणी का समझते हैं, वह उन्होंने सहर्ष स्वीकारा। यजमानों के झूठे पत्तल उठा कर एक स्थान पर एकत्रित कर दिए। उस स्थान पर एक अनोखे नेवले के दर्शन होते हैं जिसका आधा शरीर सोने का और आधा काला था। वह नेवला अपने शरीर को उन पत्तलों में बार-बार ऊपर नीचे घुमाता जा रहा था। जब आसपास जमा लोगों ने आश्चर्य चकित हो इस कृत्य का तात्पर्य समझना चाहा तो नेवले ने मनुष्य वाणी में उत्तर दिया कि, वह अपने शेष अर्ध शरीर को भी स्वर्णिम बनाने का प्रयास कर रहा था।
इससे पूर्व उसका अर्ध शरीर एक महायज्ञ में ही सोने का बन गया था। उस महायज्ञ की झूठन के स्पर्शमात्र से ही उसकी काया स्वर्णिम हो गयी थी। वह महायज्ञ एक निर्धन किसान की परमार्थ की भावना के फलीभूत परिपूर्ण हुआ था।
प्राचीन काल में अत्यन्त भीषण सूखा पड़ा था। किसी के पास भी खाने के लिए अन्न नहीं था। ऐसी आपात स्थिति में उस निर्धन किसान के पास भोजन के लिए केवल एक ही रोटी थी। जब वह भोजन करने लगा तो उसके द्वार पर एक अतिथि उपस्थित हुआ जो उससे अन्न के लिए आग्रह करने लगा। किसान ने अपनी रोटी का आधा हिस्सा उसे दिया, पर अतिथि की क्षुधा उस छोटे टुकड़े से शान्त न हुई। उसने किसान से फिर विनती की, कि वह चार दिन से भूखा है, उसे कुछ और अन्न मिल जाये तो उसकी भूख शान्त हो। किसान ने यह सुन अत्यन्त दया भाव से अपने हिस्से की आधी रोटी भी उस अतिथि को यह सोचकर दे दी कि मैंने तो कल ही रोटी खाई थी, मैं एक और दिन बिना अन्न के निर्वाह कर लूँगा। उस अतिथि ने रोटी चख, पानी से जब कुल्ला किया तो उसके मुँह से अन्न के कुछ कण उस कुल्ले की छींटों के साथ जमीन पर गिर गए। वह नेवला उस समय वहाँ उपस्थित था। उसने वह गिरे हुए कण ग्रहण किये और जहाँ कुल्ले से उछला हुआ पानी गिरा था, उस ठण्डी ज़मीन पर कुछ समय के लिए करवट लेकर सो गया। त्याग और परमार्थ के महान भाव से प्रेरित उस प्रतापी अन्न जल के स्पर्श मात्र से, उस करवट की बाजू सुनहरी हो गयी।
वह नेवला उस दिन से वैसे ही पराक्रमी, महादानी यज्ञ की खोज में निकला हुआ है ताकि बचा हुआ शरीर भी सोने का बन जाये। पाण्डवों द्वारा आयोजिय इस राजसूय यज्ञ में भी उसका शरीर सोने का नहीं बन पाया क्योंकि इस यज्ञ में भी 'मैं' का स्वार्थ जुड़ा हुआ है। पाण्डव अपनी महत्ता, अपने पराक्रम, अपने स्वामित्त्व और अधिकार को दुनिया के सामने दर्शाने के लिए यह यज्ञ कर रहे थे । 'मैं और मेरे' के भाव से किये गये कृत्य में इतनी शक्ति नहीं कि उसकी काया पलट कर दे।
जब हम स्वार्थ की भावना न रखते हुए केवल परमार्थ की भावना से दान करें और परहित के लिए योगदान दें, तभी वह यज्ञ बनता है। ऐसा यज्ञ ही हमारे जीवन को समृद्धि की ओर ले जाता है। वृद्धि तो मिल सकती है पर समृद्धि के लिए महान तप की आवश्यकता होती है।
यज्ञशिष्टाशिनः(स्) सन्तो, मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं(म्) पापा, ये पचन्त्यात्मकारणात्॥3.13॥
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।
17.20
अन्नाद्भवन्ति भूतानि, पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो, यज्ञः(ख्) कर्मसमुद्भवः॥3.14॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं(व्ँ) विद्धि, ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं(म्) ब्रह्म, नित्यं(य्ँ) यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥3.15॥
धरती पर वर्षा बरसाने के लिए हवन में आहुति दी जाती है। जहाँ नि:स्वार्थ भाव से सेवा कार्य किये जाते हैं, वहाँ उस पावन यज्ञ के सकारात्मक कम्पन से वर्षा निश्चित रूप से होती है। नि:स्वार्थ भाव से किये गए हर कार्य में श्रीभगवान् का अधिष्ठान सर्वथा जागृत हो जाता है।
श्रीभगवान् को यदि अपने निकट रखना है, उनकी अनुभूति सदा प्राप्त करनी है तो प्रतिदिन साँयकाल एक विचार अपनी दिनचर्या का अवश्य कीजिए और यह सुनिश्चित करिये कि कम से कम एक काज तो नि:स्वार्थ भाव से किया हो। केवल 'देने' का भाव रखना भी एक प्रकार का यज्ञ है। दूसरों की सहायता का भाव मन में यदि सदैव जागृत रहे तो उसकी सिद्धि के लिए अनेक अवसर भी प्राप्त होते रहते हैं, मानो सृष्टि आपके कर्म चक्र में आपकी भागीदार बन गयी।
एक समय एक गाँव में अकाल पड़ा तो वहाँ वर्षा प्राप्ति हेतु शिवजी का अभिषेक करने का सङ्कल्प लिया गया। मान्यतानुसार शिवजी को पानी में भिगो कर रखने से वर्षा अवश्य होती है। सब ग्रामवासी अपने-अपने साथ लोटे में पानी लेकर आये और शिव मन्दिर में शिव की प्रतिमा पर चढ़ाते गए। उनमें एक बालक एक हाथ में छोटी कटोरी में जल और दूसरे हाथ में छतरी लेकर वहाँ पहुँचा। उस छोटे बालक का यह कृत्य परमात्मा के साथ उसके अटूट बन्धन और विश्वास को दर्शाता है - 'जब-जब उसको नि:स्वार्थ भाव से याद करोगे तब-तब उसको आना ही पड़ेगा'। बच्चे की श्रद्धा के प्रमाण में उसके द्वारा जल चढ़ाते ही वर्षा की बूॅंदों ने उस गाँव पर अपनी कृपा बरसा दी। यह काल्पनिक कथा नहीं है।
ईश्वर में अटूट विश्वास से फलीभूत प्रमाण अभी हाल ही में अनुभव किया गया। कुछ विदेशी भारत में योग सीखने आये। भारत भूमि की अद्भुत चेतनाओं की कथाएँ जब उनसे साझा की गयीं तो उनमें यह इच्छा प्रबल हुई कि यज्ञ से क्या वास्तव में वृष्टि होती है? वे इसका सजीव अनुभव करना चाहते थे। यह परिस्थिति तो वैसी बन गयी, जिसमें हमारे विश्वास का प्रमाण माँगा जा रहा था। आयोजक ने अपने विश्वास की लाज रखने के लिए ईश्वर से घोर प्रार्थना की और चालीस हवन कुण्ड का निर्माण करवाया। पुरोहित को बुला एक विशाल विज्ञानमय यज्ञ का आयोजन किया गया। हर कुण्ड में पॉंच-छ: लोगों द्वारा आहुति दी गयी। विदेशी आगन्तुको को यज्ञ के विधान का अर्थ अङ्ग्रेज़ी भाषा में समझाया गया। शीघ्र ही ईश्वर की भक्ति में कितनी शक्ति होती है, उसका प्रमाण प्राप्त हो गया। आहुति पूर्ण होते ही ईश्वरीय प्रसाद स्वरूप पॉंच मिनट के लिए वर्षा हुई और विश्वास विजयी हुआ। श्रीभगवान् का भक्त के साथ कितना सुखदायी रिश्ता है, प्रतिपल इसका उदाहरण इस धरा पर सजीव मिलता रहता है।
केवल मन में अटूट विश्वास और उस परमात्मा के प्रति अपार श्रद्धा रखें
एवं(म्) प्रवर्तितं(ञ्) चक्रं(न्), नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो, मोघं(म्) पार्थ स जीवति॥3.16॥
एक बार की बात है कि हिमालय की गोद में बसे तिब्बत देश में एक विदेशी भ्रमण करने आया। तिब्बत देश वृक्ष वल्लियों से हरा भरा, प्रकृति के वरदान से सुसज्जित मनोरम स्थान है। वह विदेशी रात को एक तम्बू में सोया पर रात भर मच्छरों के काटने से परेशान रहा। सुबह उठकर उसने वहाँ के निवासियों से कहा कि उसके देश में मच्छरों से मुक्ति के लिए DDT रसायनिक छिड़का जाता है, तो क्यों न उसका प्रयोग यहाँ पर भी किया जाये। वहाँ के बुज़ुर्गों ने इस सुझाव का विरोध यह कहते हुए किया कि हम जीव हत्या नहीं कर सकते, मच्छरों के तो हम आदि हो चुके हैं। प्रान्त के कुछ युवा विदेशी की बात से समर्थन रखते थे क्योंकि उन्हें भी मच्छरों से कष्ट था। अतः DDT रसायनिक मँगवा कर छिड़काया गया। इस कार्य के फल स्वरूप मच्छरों के साथ-साथ वहाँ की बिल्लियाँ भी उस रसायन चाटने से मर गयीं। बिल्लियों के न रहने पर वहाँ चूहों ने उपद्रव मचा दिया, अन्न का विनाश करने लगे। सृष्टि के चक्र में व्यवधान पैदा कर तिब्बत के उस ग्राम में आपातकालीन स्थिति का निर्माण हो गया। अन्ततोगत्वा मनुष्य को ही कष्ट उठाना पड़ा।
मनुष्य ने जब भी निसर्ग पर अपना आधिपत्य स्थापित करने की चेष्टा की है, प्रकृति ने अपने बल का प्रमाण देते हुए अपना सन्तुलन बार-बार स्थापित किया है। सृष्टि के चक्र को जब-जब मानव ने तोड़ने का प्रयास किया है तब-तब उसके हानिकारक परिणामों को भोगा है।
विशाल नदियों की गति को थामने के लिए बाँध निर्मित किये जाते हैं, पर वृष्टि के वेग से वे बाँध जब टूटते हैं तो सब कुछ डुबो देते हैं।
भारत में कुछ वर्ष पूर्व चारधाम की यात्रा अत्यन्त जटिल एवं कष्टदायी होती थी। यात्रा को सुगम करने के लिए पहाड़ काट कर चौड़ी सड़कों का निर्माण तो कर दिया, पर प्रकृत्ति की रचना से छेड़छाड़ करने के लिए कई दुःखद घटनाएँ भी गत वर्षों में सामने आयीं हैं।
यस्त्वात्मरतिरेव स्याद्, आत्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्ट:(स्), तस्य कार्यं(न्) न विद्यते॥3.17॥
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥55॥
असन्तुष्टि हमारे जीवन चक्र को गड़बड़ा देती है, अतः सन्तुष्ट रहना सीखना अनिवार्य है, ताकि हम तृप्त हो जाएँ। जो असन्तुष्ट रहते हैं उनके अन्दर सदैव द्वन्द्व उभरते रहते हैं।
इस सप्ताह हम सब भी यह प्रयास करें कि अपने भीतर सन्तुष्टि का भाव जागृत कर पाएँ। प्रातः उठने से लेकर रात्रि शयन तक वह सन्तोष का भाव चेहरे की स्मित रेखाओं पर खिलकर प्रकट हो। आत्मचित्त की प्रसन्नता आपके मुख मण्डल को सुशोभित कर दे। हम मन में यह भाव ले आयें-
मेरे द्वारा किया हर कार्य ईश्वर को समर्पित है।
तब हमारी निद्रा भी समाधि हो जायेगी, हमारे विषयोपभोगों की सारी रचना पूजा बन जायेगी, हमारा सञ्चार भी प्रदक्षिणा की विधि बनकर, हमारे मुख से निकला हर शब्द स्तोत्र बन जायेगा।
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थिति:।
संचार: पदयो: प्रदक्षिणविधि: स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत् कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥
प्रश्नकर्ता- श्री उपेन्द्रनाथ मेहरा
प्रश्नकर्ता- भगवती भैया