विवेचन सारांश
योगेश्वर श्रीकृष्ण का विश्वरूप

ID: 5165
हिन्दी
रविवार, 21 जुलाई 2024
अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोग
2/4 (श्लोक 15-27)
विवेचक: गीता विशारद श्री श्रीनिवास जी वर्णेकर


पारम्परिक प्रार्थना, दीप प्रज्वलन, हनुमान चालीसा पाठ, परमपूज्य गुरुदेव स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी की चरण वन्दना और गीता साधकों, गीता प्रेमियों का अभिवादन करते हुए ग्यारहवें अध्याय, विश्वरूपदर्शनयोग, का विवेचन सत्र आरम्भ हुआ।

गुरुदेव की कृपा से गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर सद्गुरु से पाया हुआ प्रसाद गीता प्रेमियों में बाँटने के शुभ कार्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वह महाप्रसाद जो श्रीभगवान् के विश्वरूप दर्शन का अध्याय है।

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
           यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥
11:12

सञ्जय धृतराष्ट्र को श्रीभगवान् के उस विश्वरूप का वर्णन बता रहे हैं जो अर्जुन देख रहे हैं। श्रीभगवान् के विश्वरूप की प्रभा इतनी तेज है कि यदि हजारों सूर्य आकाश में अचानक उदित हो जाएँ तो भी उससे जितना तेज होगा, उसकी भी शायद ही उस दिव्य प्रकाश के साथ तुलना की जा सकती है।

अर्जुन की वाणी से विश्व का दर्शन हम करेंगे जो प्रत्यक्षदर्शी हैं।

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्ट रोमा धनञ्जयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिभाषत॥
11:14

परमात्मा के दर्शन होते ही जीव हाथ जोड़कर माथा टेक देगा और उसके पश्चात् कुछ बात कहेगा।

अर्जुन ने भी श्रीभगवान् के विश्वरूप को देखकर अपना माथा टेक दिया। अपने हाथों की अञ्जलि बनाकर अत्यन्त रोमाञ्चित होकर अर्जुन भगवान के विश्वरूप का वर्णन करते हैं। उनके गीत की चाल बदल जाती है और त्रिष्टुप छन्द में अर्जुन गाने लगते हैं।

11.15

अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे,
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्।
ब्रह्माणमीशं(ङ्) कमलासनस्थम्,
ऋषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्॥11.15॥

अर्जुन बोले - हे देव! (मैं) आपके शरीर में सम्पूर्ण देवताओं को तथा प्राणियोंके विशेष-विशेष समुदायोंको और कमलासनपर बैठे हुए ब्रह्माजीको, शङ्करजीको, सम्पूर्ण ऋषियोंको और दिव्य सर्पोंको देख रहा हूँ।

विवेचन- अर्जुन कहते हैं कि हे देव! मैं आपकी एक देह में सब कुछ देख रहा हूँ। भूतों के सारे समूह, सारे भूतमात्र, सारे जीव, सारे प्राणीमात्र, सारे चर अचर, समस्त संसार मुझे आपकी एक देह में दिखाई दे रहा है।

जैसे खुले आकाश में अँधियारी रात को देखें तो आकाश में असङ्ख्य तारे और ग्रह दिखाई देंगे। ऐसे ही दिन में अर्जुन को श्रीभगवान् के शरीर में समस्त संसार दिखाई दे रहा है।

अर्जुन को कमलासन पर ब्रह्माजी, ब्रह्मदेव, ब्रह्मलोक दिखाई दे रहे हैं। साक्षात ईश्वर, महादेव के भी दर्शन हो रहे हैं। अर्जुन कहते हैं कि सभी आप में समाये दिख रहे हैं।

सारे ऋषि, मुनिगण भी दिखाई दे रहे हैं। ब्रह्माजी ने ऋषियों का निर्माण किया और उन्हीं की प्रजा हम सभी, सारी मनुष्य जाति निर्मित हुई। ये सारे ऋषि व मुनिगण अर्जुन को अभी दिखाई दे रहे हैं।

अर्जुन को काल के अतीत के दर्शन हो रहे हैं। जो ऋषि-मुनि पूर्व में हो चुके हैं उनके भी दर्शन अर्जुन को हो रहे हैं। जब बहुत सारी चीजें एक साथ दिखती हैं तो समझ नहीं आता कि क्या-क्या दिखाई दे रहा है।

अर्जुन को सारे लोक दिख रहे हैं, एक ओर ब्रह्मलोक दिखाई दे रहा है, स्वर्गलोक, इन्द्रलोक, कैलाश, पाताल सभी एक साथ दिखाई दे रहे हैं। साथ ही दिव्य सर्प भी दिख रहे हैं।

अचानक ही अनेक दृश्य एक ही स्थान पर दिखने के कारण अर्जुन क्रमबद्ध प्रकार से नहीं बता पा रहे हैं कि उन्हें क्या-क्या दिखाई दे रहा है।

बचपन में एक खेल खेलते थे, एक मेज़ पर बहुत सारी वस्तुएँ रख दी जाती थीं - जैसे कलम, पेंसिल, पेपर वेट, चम्मच, बर्तन, पुस्तक इत्यादि। आधा मिनट का समय देखने के लिए दिया जाता था और फिर कहा जाता था कि याद करके लिखो। यह स्मरण शक्ति का खेल था। स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए खेला जाता था।

अर्जुन को जो दिख रहा है वह बताते जा रहे हैं। चौरासी लक्ष योनियों के जितने भी भूतमात्र हैं, सब दिख रहे हैं, भूत विशेषों के समूह भी दिख रहे हैं।

ज्ञानेश्वर महाराज एक सुन्दर उदाहरण देते हैं। एक वट वृक्ष पर असङ्ख्य पक्षी अपने छोटे-छोटे घर बनाकर एक ही जगह पर रहते हैं।

किंवा महावृक्षावरी, असङ्ख्यात घरटी पक्षकुळांची।
आकाशाच्या ढोलीतं, ग्रह गणांचे पुञ्ज दिसतांत।।

जैसे आकाश में असङ्ख्य तारे - ग्रह दिखाई देते हैं, वैसे ही सारा संसार आप में ही दिखाई दे रहा है।

एकीकड़े सत्यलोक दिसे, तेथे ब्रह्मदेव प्रत्यक्ष वसे।
आणि दूसरी कडे दिसतसे कैलाश लोकं।।

एक तरफ मुझे ब्रह्मलोक दिख रहा है, दूसरी और कैलाश दिख रहा है।

एक उपमा देते हुए ज्ञानेश्वर माउली कहते हैं -

तुझा अवयवांच्या भित्तिवरं, चौदा भुवनांच्या आकृति सुन्दर, 
पाहतो मी चित्र विचित्र हे त्रैलोक्यनाथ।

हे त्रैलोक्यनाथ, आपके अवयव की एक सुन्दर दीवार है। उस पर अनेक लोक चित्रित किए गए हैं और अनेक प्रकार के लोकों के अवयव दिखाई दे रहे हैं।

11.16

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं(म्),
पश्यामि त्वां(म्) सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं(न्) न मध्यं(न्) न पुनस्तवादिं(म्),
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥11.16॥

हे विश्वरूप! हे विश्वेश्वर! आपको (मैं) अनेक हाथों, पेटों, मुखों और नेत्रों वाला (तथा) सब ओरसे अनन्त रूपोंवाला देख रहा हूँ। (मैं) आपके न आदिको, न मध्यको और न अन्तको ही देख रहा हूँ।

विवेचन-  अर्जुन श्रीभगवान् को अनेक नामों से सम्बोधित करते हैं।
विश्वेश्वर
विश्व के ईश्वर, विश्व पर जिनका शासन चलता है, विश्व पर जिसकी सत्ता चलती है जो विश्व के शासक हैं।

हे विश्वेश्वर! मुझे आपकी अनगिनत भुजाएँ, उदर, असङ्ख्य मुख, जितने मुख हैं उसके दुगुने नेत्र दिखाई दे रहे हैं। मुझे चारों ओर, सभी दसों दिशाओं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर, आदि दिशाओं, में आपका अनन्त रूप दिखाई दे रहा है।

आपका अन्त दिखाई नहीं दे रहा और आदि भी दिखाई नहीं दे रहा, इसी के साथ आपका मध्य भी दिखाई नहीं दे रहा। ऐसा कोई कण नहीं दिखता या परमाणु नहीं दिखता जहाँ आप नहीं हो।

अर्जुन ने श्रीभगवान् को अपना विश्वरूप दिखाने की प्रार्थना की और श्रीभगवान् ने अर्जुन को अपना दिव्य रूप दिखाया।

ज्ञानेश्वर माऊली कहते हैं कि आपके दिव्य रूप को देखकर यह आकाश है, यह भूमि है, स्वर्ग है, पाताल है, यह सारे भेद समाप्त हो गए हैं। मात्र आपकी विश्वमूर्ति दिखाई दे रही है। मात्र आप ही दिखाई दे रहे हैं।

।। हा भेद लोपला सकळं, दिसे केवळं विश्व मूर्ति ।।

जीव को यही तो पाना है। ईश्वर को सब ओर पाना है, सर्वत्र श्रीभगवान् का दर्शन करना है। जहाँ भी देखें, हमें श्रीभगवान् के दर्शन हों और हम श्रीभगवान् का स्मरण कभी भी भूलें नहीं।

अर्जुन को श्रीभगवान् के दर्शन हो गए! हमें भी शायद भगवद्कृपा से श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ते-पढ़ते विश्वरूप दर्शन करते हुए श्रीभगवान् के दर्शन हो जाएँ। सन्तों को सब में भगवान् दिखते हैं- 

जे जे भेटे भूत। तें तें मानिजे भगवंत।

11.17

किरीटिनं(ङ्) गदिनं(ञ्) चक्रिणं(ञ्) च,
तेजोराशिं(म्) सर्वतो दीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां(न्) दुर्निरीक्ष्यं(म्) समन्ताद्-
दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥11.17॥

(मैं) आपको किरीट (मुकुट), गदा, चक्र (तथा शंख और पद्म) धारण किये हुए हुए देख रहा हूँ। (आपको) तेज की राशि, सब ओर प्रकाशवाले, देदीप्यमान अग्नि तथा सूर्य के समान कान्तिवाले, नेत्रोंके द्वारा कठिनतासे देखे जानेयोग्य और सब तरफसे अप्रमेय स्वरूप (देख रहा हूँ)।

विवेचन- श्रीभगवान् अर्जुन के सामने बैठे हैं। अर्जुन यह स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि इस विराट रूप में, मैं आपको कैसे पहचान पा रहा हूँ।

अर्जुन कहते हैं, मैं आपके मुकुट से आपको पहचान पा रहा हूँ। आपका रूप तो विराट रूप है लेकिन मुकुट वही है, जिसका आकार विशाल है और तेज भिन्न है। आपके एक हाथ में गदा है।

साधारणतः हम श्रीभगवान् को मुरली धारण किए गोप-गोपियों से घिरे देखते हैं लेकिन हमें श्रीभगवान् का गदा, चक्रधारी स्वरूप भी देखना है।

योगेशं सच्चिदानंदं, वासुदेवं व्रजप्रियम् !
धर्म संस्थापकमं वीरं, कृष्णम् वंदे जगतगुरुम् !!

युद्धक्षेत्र में भगवान वीरवेश में आए हैं। उन्होंने प्रतिज्ञा की है कि शस्त्र नहीं उठाएँगे किन्तु श्रीभगवान् ने शस्त्र उठाए नहीं तो शस्त्र छोड़े भी नहीं हैं।

अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि मुझे आपका सुदर्शन चक्र भी दिख रहा है, जो आपकी पहचान है। आपके तेज पुञ्ज की राशि अपार है। मुझे चारों ओर केवल तेज ही तेज दिख रहा है। आपके तेज की प्रभा इतनी प्रदीप्त है मानो प्रज्वलित अग्नि हो। आपके तेज की राशि भगवान अर्क (सूर्य) के प्रकाश के समान है, वह अप्रमेय है।

प्रमेय - जिसको मापा जा सकता है।
अप्रमेय - जिसको मापा नहीं जा सकता है, अनगिनत।

आपके तेज की राशि की प्रभा अप्रमेय है और आपके दिव्य तेज को देखने से कष्ट हो रहा है।

दोपहर में सूर्य के प्रकाश में निकलना कठिन होता है। असङ्ख्य सूर्यों की प्रभा कितनी अधिक होगी, इसका अनुमान लगाना असम्भव है। आपकी प्रभा सभी ओर से अनगिनत है, अप्रमेय है।

श्रीभगवान् का विश्वरूप देखकर अर्जुन उनकी स्तुति करने लगते हैं।
स्तुति  के लिए कहें गए शब्दों या गीतों को स्तोत्र कहते हैं।

11.18

त्वमक्षरं(म्) परमं(म्) वेदितव्यं(न्),
त्वमस्य विश्वस्य परं(न्) निधानम्।
त्वमव्ययः(श्) शाश्वतधर्मगोप्ता,
सनातनस्त्वं(म्) पुरुषो मतो मे॥11.18॥

आप (ही) जाननेयोग्य परम अक्षर (अक्षरब्रह्म) हैं, आप (ही) इस सम्पूर्ण विश्वके परम आश्रय हैं, आप (ही) सनातनधर्म के रक्षक हैं (और) आप (ही) अविनाशी सनातन पुरुष हैं - (ऐसा) मैं मानता हूँ।

विवेचन- अर्जुन कहते हैं कि हे भगवान्! आप अक्षर हो, जिसका क्षरण नहीं होता, जिसका व्यय नहीं होता, जो कम नहीं होता। आपका आदि अन्त नहीं दिख रहा है।

जैसे एक विशाल सागर से चार बाल्टी पानी निकालने पर अपार सागर की जल राशि से कुछ कम नहीं होता। उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उसी प्रकार परमात्मा हैं, उनका कुछ कम नहीं होता। वे अक्षर हैं, अव्यय हैं।

भगवान् आप परम अक्षर हैं, परमात्मा हैं, परम ब्रह्म हैं। परमधाम भी आप ही हैं। जिसका कोई नाम नहीं वह भी आप ही हैं।

वेद का अर्थ है जानना, ज्ञान।
वेदितव्यं - जिसको जानना चाहिए।
आप वेदितव्य हैं, जानने योग्य हैं।

संसार में हर जीव की कृतार्थता इसी में है कि आपको जान ले, आपको समझे। परमात्मा को जानना ही जीव का मूल धर्म है। परमात्मा को वही जान सकता है, जो परमात्मा के समान हो। परमात्मा को परमात्मा ही जानते हैं। परमात्मा को जानना है तो उनके साथ एक रूप होना पड़ेगा।

योग का अर्थ है परमात्मा के साथ एकरूपता
श्रीमद्भगवद्गीता योगशास्त्र है।

आकाश कितना बड़ा है यह आकाश ही जानता है। खगोलशास्त्रियों को ज्ञान नहीं कि आकाश कितना विशाल है। उसी प्रकार परमात्मा कैसे हैं? यह परमात्मा ही जानते हैं। परमात्मा को परमात्मा ही जान सकते हैं।

आप इस विश्व के परम निधान हैं।

निधान- जहाँ पर हम रहते हैं। हम घर में रहते हैं, हम नगर में रहते हैं, नगर विश्व में है, विश्व धरती पर है, पृथ्वी सौरमण्डल में है। धीरे-धीरे विस्तार करने पर यह विशाल होता चला जाएगा। सारा विश्व जहाँ रहता है, वह आप ही हैं। विश्व आप में रहता है।

श्री ज्ञानेश्वर माऊली कहते हैं कि आप विश्व के निधान हैं। चारों वेद आपका घर ढूँढते हैं।

शोधत असति तुझे घर, चार ही वेद 

आपको जानने का समस्त संसार प्रयास करता रहता है और आप मेरे समक्ष प्रत्यक्ष खड़े हैं। सारे जग का आश्रय स्थल आप ही हैं। आप ही के आश्रय से सारा विश्व बसा हुआ है। लाखों करोड़ों प्रकाश वर्ष तक फैले असङ्ख्य ग्रह-नक्षत्र, तारे आप ही में समाये हैं। आप अक्षर हैं, अव्यय हैं।

शाश्वत धर्म, सनातन धर्म, जो आदिकाल से चला आया है, जिसके आरम्भ का ज्ञान नहीं, आप ऐसे धर्म के गोप्ता हैं, रक्षण करने वाले हैं, रक्षक हैं। आपके कारण ही यह सनातन धर्म है।

आप वह पुरुषतत्त्व, सनातन चैतन्य तत्त्व हैं जिससे सारे संसार का निर्माण हुआ है। वह सनातन पुरुष आप ही हैं। आपको देखकर ऐसा मेरा मत हो गया है।

11.19

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम्,
अनन्तबाहुं(म्) शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां(न्) दीप्तहुताशवक्त्रं(म्),
स्वतेजसा विश्वमिदं(न्) तपन्तम्॥11.19॥

आपको (मैं) आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओंवाले, चन्द्र और सूर्य रूप नेत्रोंवाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुखोंवाले (और) अपने तेजसे संसारको तपाते करते हुए देख रहा हूँ।

विवेचन- अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं, आपका आदि, अन्त, मध्य नहीं दिखाई देता। अर्जुन श्रीभगवान् के इस रौद्र रूप को देखकर इतने विस्मित हैं कि वे इस बात को बार-बार दोहराते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता कोई प्रबन्ध या निबन्ध नहीं है। प्रबन्ध में एक ही बात को दोहराया नहीं जाता। 
गीताजी तो संवाद है।
संवाद में महत्वपूर्ण बातों को दोहराया जा सकता है।

अर्जुन दोबारा कहते हैं कि भगवान् आपका आदि, मध्य, अन्त दिखाई नहीं देता। आपका सामर्थ्य अनन्त है। श्रीभगवान् की शक्ति कल्पना से परे है। हम इसको वैज्ञानिक दृष्टि से देखते हैं। आइन्स्टाइन का प्रसिद्ध समीकरण है -
E = mc²
E = energy ऊर्जा
m = matter द्रव्यमान
c = velocity of light प्रकाश की गति (3 लाख वर्ग किलोमीटर प्रति सेकण्ड)

जब किसी द्रव्यमान का निर्माण होता है तो उसके निर्माण में ऊर्जा लगती है। एक ग्राम द्रव्यमान को बनाने के लिए ऊर्जा लगेगी। उस द्रव्यमान के वजन और प्रकाश की गति के वर्ग के गुणा करने पर जो गुणनफल प्राप्त होगा वह उसके बराबर होगी, उतनी ऊर्जा लगेगी। उसका विस्फोट करने पर भी इतनी ही ऊर्जा उत्पन्न होगी।

हमारे शरीर में कितना द्रव्यमान है? सारे संसार का वस्तुमान अनन्त है। इस अनन्त वस्तुमान को बनाने के लिए जितनी ऊर्जा लगी होगी, इस ऊर्जा के खर्च होने के बाद भी ईश्वर की ऊर्जा नष्ट नहीं होती, वैसी की वैसी ही रहती है।

अर्जुन श्रीभगवान् से कह रहे हैं कि आपकी अनन्त भुजाएँ दिखाई दे रही हैं, आपके नेत्र सूर्य, चन्द्र जैसे दिख रहे हैं।

शशि- चन्द्रमा शीतलता प्रदान करता है, आनन्दित करता है। चन्द्रमा के शीतल प्रकाश से आनन्द मिलता है।
सूर्य तेज का प्रतीक है। सूर्य के तेज से कष्ट होता है।

श्रीभगवान् जब कृपा करते हैं तो शीतलता देते हैं और जब कुपित होते हैं तो सूर्य के समान उग्र हो जाते हैं। इसलिए अर्जुन ने श्रीभगवान् के नेत्रों को चन्द्रमा और सूर्य की संज्ञा दी है।

ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं कि कभी आप क्रोधित हो जाते हैं तो कभी प्रसन्न हो जाते हैं। कभी आप कृपा दृष्टि बरसाते हैं। जब सबके कल्याण के लिए कोई कार्यरत होता है तो आप कृपा दृष्टि दर्शाते हैं- 

तुझे सूर्य चन्द्र हे डोळे देवा, कोप प्रसाद जे करती जीवा।
तामसी दृष्टि ने कोपतोसं सर्वा, पाळतोसं कृपा दृष्टि ने।।

अर्जुन कहते हैं कि आपके मुख सामान्य नहीं दिख रहे, वे प्रज्वलित अग्नि के समान प्रतीत हो रहे हैं। यज्ञ के समय जब आहुति दी जाती है तो उसे श्रीभगवान् का मुख मानते हैं - 

विश्वतो मुखं
अग्नि को परमात्मा का मुख कहा गया है।

अर्जुन कहते हैं कि आपने‌ अपने तेज से समस्त विश्व को तप्त कर दिया है। यह अध्याय हमें विश्व की ओर देखने की दृष्टि प्रदान करता है। चर्म चक्षुओं से जो दिखता है उसे हम सत्य मान लेते हैं।

दृष्टि का अर्थ चर्म दृष्टि नहीं है। चर्म चक्षुओं को छोड़कर अपने विवेक से विश्व को देखना है। जब हम अपने विवेक से देखते हैं तो पाते हैं कि सारा संसार परिवर्तनशील है। हमें सत्य को जानना है।

सत्य की व्याख्या- 

त्रिकालाबाधित सत्य।

स्थल बदलने पर और काल बदलने पर,
जिसमें परिवर्तन नहीं होता वही सत्य है।

विश्व की ओर देखते हैं तो लगता है हर क्षण सब कुछ बदल रहा है। सब कुछ परिवर्तनशील है। हम बैठे हों तब भी हम स्थिर अवस्था में नहीं हैं क्योंकि पृथ्वी अपनी धुरी पर निरन्तर घूमती रहती है।

किसी पाश्चात्य तत्त्ववेत्ता ने कहा है- 

You can not wash your hands in same river again.
जिस नदी में हाथ धोए थे, वह तो बहकर आगे निकल गई। 

हमारा शरीर हर क्षण बदल रहा है। विज्ञान भी कहता है कि हर क्षण शरीर में नई-नई कोशिकाएँ बनती रहती हैं और पुरानी मरती जाती हैं।चर्म चक्षुओं से देखने पर जो हमें दिखाई देता है हम उसे सत्य मानते हैं। विवेक दृष्टि से देखने पर सारा विश्व परिवर्तनशील लगता है। जब हम भावमय होकर भावदृष्टि से देखते हैं तो सर्वत्र परमात्मा का दर्शन होता है सब भगवत् स्वरूप दिखाई देता है। जिसका भक्ति भाव जाग्रत हो गया है उसे सभी में ईश्वर नजर आता है। 

जे जे भेटे भूत। तें तें मानिजे भगवंत ।

भक्त प्रह्लाद की भाव दृष्टि है। एक बार हिरण्यकश्यपु ने प्रह्लाद से पूछा कि तुम नारायण-नारायण करते हो, क्या वह इस खम्बे में भी है? बालक प्रह्लाद ने कहा कि हाँ! वह खम्बे में है। यह भाव दृष्टि है। दिव्यदृष्टि जब मिल जाती है तो पता चलता है कि विश्व परमात्मा का मात्र एक अंश है।

इस प्रकार दृष्टि चार प्रकार की होती है -
1. चर्मचक्षु दृष्टि
2. विवेक दृष्टि
3. भाव दृष्टि
4. दिव्य दृष्टि

11.20

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं(म्) हि,
व्याप्तं(न्) त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
दृष्ट्वाद्भुतं(म्) रूपमुग्रं(न्) तवेदं(म्),
लोकत्रयं(म्) प्रव्यथितं(म्) महात्मन्॥11.20॥

हे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका अन्तराल और सम्पूर्ण दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं। आपके इस अद्भुत (और) उग्ररूपको देखकर तीनों लोक व्यथित (व्याकुल) हो रहे हैं।

विवेचन- अर्जुन कहते हैं, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच के अन्तराल, आकाश को आपने अकेले ही अपने आप में व्याप्त कर लिया है। सारी दिशाओं में आपके सिवा कुछ और दिखाई नहीं दे रहा है। आपका अद्भुत रूप, उग्र दिखाई दे रहा है। सारा विश्व, सभी लोक आपके उग्र विश्वरूप को देखकर व्यथित हो रहे हैं, भयभीत हो रहे हैं।

अर्जुन की कामना थी कि श्रीभगवान् का सुन्दर रूप देखने को मिलेगा, पर उन्हें श्रीभगवान् का उग्र रूप ही देखने को मिला।

11.21

अमी हि त्वां(म्) सुरसङ्घा विशन्ति,
केचिद्भीताः(फ्) प्राञ्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा:(स्),
स्तुवन्ति त्वां(म्) स्तुतिभिः(फ्) पुष्कलाभिः॥11.21॥

वे ही देवताओं के समुदाय आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। (उनमेंसे) कई तो भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए (आपके नामों और गुणोंका) कीर्तन कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धोंके समुदाय 'कल्याण हो! मंगल हो!' ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रोंके द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं

विवेचन- अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि देवों के समूह भी आप में ही प्रवेश कर रहे हैं, आपके साथ एकाकार हो रहे हैं, तादात्म्य हो रहे हैं। कुछ लोग भयभीत होकर करबद्ध होकर प्रार्थना कर रहे हैं, आपका गुणगान कर रहे हैं। सिद्ध ऋषि- मुनियों के समूह स्वस्ति गान गा रहे हैं- सभी का कल्याण हो।

सन्तों की वाणी है-

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

हमारी संस्कृति का मानना है कि सभी का कल्याण हो। ऋषि- मुनि ॐ स्वस्ति का आशीर्वाद सभी को देते रहते हैं। ऋषि - मुनि गण अलग-अलग प्रकार से आपकी स्तुति का गान करते रहते हैं।

11.22

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या-
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा,
वीक्षन्ते त्वां (म्) विस्मिताश्चैव सर्वे॥11.22॥

जो ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, बारह साध्यगण, दस विश्वेदेव और दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुद्गण और गरम गरम भोजन करनेवाले (सात पितृगण) तथा गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्धोंके समुदाय हैं, (वे) सभी चकित होकर आपको देख रहे हैं।

विवेचन- अर्जुन श्रीभगवान् का विश्वरूप देख रहे हैं और उन्हें लग रहा है कि उनके साथ सभी श्रीभगवान् के इस रूप का दर्शन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि सभी- 

ग्यारह रूद्र,

बारह आदित्य - अदिति के पुत्र
आठ वसु
बारह सिद्ध गण
दस विश्व देव
दो अश्विनी कुमार
उनचास मरुत।
असुर, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, पितर विस्मित होकर आपको ही देख रहे हैं

11.23

रूपं (म्) महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं(म्),
महाबाहो बहुबाहूरुपादम्।
बहूदरं(म्) बहुदंष्ट्राकरालं(न्),
दृष्ट्वा लोकाः(फ्) प्रव्यथितास्तथाहम्॥11.23॥

हे महाबाहो! आपके बहुत मुखों और नेत्रोंवाले, बहुत भुजाओं, जंघाओं और चरणोंवाले, बहुत उदरोंवाले (और) बहुत विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूपको देखकर सब प्राणी व्यथित हो रहे हैं तथा मैं भी (व्यथित हो रहा हूँ)।

विवेचन- अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि आपका यह विकराल रूप! जिसमें अनेक मुख हैं, अनेक नेत्र, भुजाएं, जङ्घाएँ और चरण हैं तथा बहुत सारे उदर और विकराल दाढें हैं, इसे देखकर सभी प्राणियों के साथ-साथ स्वयं अर्जुन भी भयभीत और व्यथित हो रहे हैं।

अर्जुन समझ रहे थे कि उन्हें श्रीभगवान् का सौम्य रूप देखने को मिलेगा और उन्हें शान्ति प्राप्त होगी, परन्तु यहाँ तो वे श्रीभगवान् का रौद्र और भयङ्कर रूप ही देख रहे थे, जिसे देख वे अत्यन्त विचलित हो उठे थे।

11.24

नभःस्पृशं(न्) दीप्तमनेकवर्णं(म्),
व्यात्ताननं(न्) दीप्तविशालनेत्रम्।
दृष्ट्वा हि त्वां(म्) प्रव्यथितान्तरात्मा,
धृतिं(न्) न विन्दामि शमं(ञ्) च विष्णो॥11.24॥

क्योंकि हे विष्णो! (आपके) देदीप्यमान अनेक वर्ण हैं, आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैं अर्थात् सब तरफसे बहुत बड़े हैं, आपका मुख फैला हुआ है, आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं। (ऐसे) आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला (मैं) धैर्य और शान्ति को प्राप्त नहीं हो रहा हूँ।

विवेचन- अर्जुन कहते हैं, आकाश को स्पर्श करता आपका अत्यन्त तेजस्वी रूप अनेक वर्णों- रङ्गों से युक्त है। जैसे आकाश में अनेक रङ्ग देखने को मिलते हैं, नीला आकाश, सूर्योदय के समय के रङ्ग, दोपहर के रङ्ग, सूर्यास्त के समय रङ्ग, बादलों के रङ्ग, सन्ध्या के समय रङ्ग, रात्रि के समय आकाश के रङ्ग। धरती पर भी कितने रङ्ग हैं। ये सभी रङ्ग श्रीभगवान् के ही तो हैं।

अर्जुन कहते हैं कि आपका विकराल जबड़ा खुला है। आपके तेजस्वी विशाल नेत्र देखकर मैं भयभीत हो रहा हूँ। मेरी अन्तरात्मा आपका विशाल रूप देखकर व्यथित हो रही है। आपका विशाल रूप देखकर मेरा धैर्य समाप्त हो गया और मुझे शान्ति भी नहीं मिल पा रही है। मुझे लग रहा था कि मैं युद्ध छोड़ दूँगा तो मुझे शान्ति प्राप्त हो जाएगी। आपका दर्शन करूँगा तो मुझे शान्ति प्राप्त होगी। पर आपका रूप तो हर क्षण भयावह हो रहा है और मैं आपका रूप देखकर व्यथित हो रहा हूँ।

हमारे देश की अनेक संस्थाओं के घोष वाक्य श्रीमद्भगवद्गीता से ही उद्धरित किए गए हैं।हैं।

नभ: स्‍पृशं दीप्‍तम्
- भारतीय वायु सेना का घोषवाक्य है।
ऊँची उड़ान भरकर आकाश को स्पर्श करने वाले हमारी वायु सेना के तेजस्वी वायुयान हैं।

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते -  ज्ञान जैसा पवित्र अन्यत्र नहीं है। कई शिक्षण संस्थाओं का बोध वाक्य है।

'योगक्षेमं वहाम्यहम्'- भारतीय जीवन बीमा निगम का बोध वाक्य है।

शं नो वरुण
: - भारतीय जल सेना का बोध वाक्य है, जो यजुर्वेद से उद्धृत है।

11.25

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि,
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म,
प्रसीद देवेश जगन्निवास॥11.25॥

आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक) मुखोंको देखकर (मुझे) न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल रही है। (इसलिये) हे देवेश! हे जगन्निवास! (आप) प्रसन्न होइये।

विवेचन- अर्जुन श्रीभगवान् से कहते हैं कि मैं आपके विकराल भयावह दाँत देख रहा हूँ।

प्रलय के समय जो आग लग जाती है या वह अग्नि जो वन में लग जाती है, कई मास तक प्रज्ज्वलित रहती है। सबको भस्म करने वाली कालाग्नि को आपके मुख में देखकर, मैं दिशाहीन हो रहा हूँ। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। मुझे शान्ति नहीं मिल रही है। अर्जुन उसी व्याप्ति में आ गये हैं लेकिन श्रीभगवान् ने द्वैत का भाव जागृत रखा है इसलिए उनके विराट रूप को अर्जुन देख पा रहे हैं। जब हजारों सूर्यों के प्रकाश हों और कालाग्नि लगी हो तो कुछ समझ नहीं आता, उसी प्रकार अर्जुन को कुछ समझ नहीं आ रहा है।

जैसे एक सागर में कोई जहाज है और रात के समय उसे दिशा का ज्ञान नहीं हो रहा है, वैसे ही अर्जुन को कुछ समझ नहीं आ रहा है। अर्जुन श्रीभगवान् से प्रार्थना करते हैं कि हे देवेश, हे जगन्निवास - जग के निवास स्थान, मुझ पर प्रसन्न हो जाएँ और कृपा करें। मुझसे आपका यह विकराल रूप देखा नहीं जाता।

11.26

अमी च त्वां(न्) धृतराष्ट्रस्य पुत्राः(स्),
सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः।
भीष्मो द्रोणः(स्) सूतपुत्रस्तथासौ,
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥11.26॥

हमारे पक्षके मुख्य-मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म, द्रोण और वह कर्ण भी आपमें (प्रविष्ट हो रहे हैं)। राजाओंके समुदायोंके सहित धृतराष्ट्रके वे ही सब के सब पुत्र,

11.26 writeup

11.27

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति,
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु,
सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गै:॥11.27॥

आपके विकराल दाढ़ोंके कारण भयंकर मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रविष्ट हो रहे हैं। (उनमें से) कई एक तो चूर्ण हुए सिरों सहित (आपके) दाँतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।

विवेचन- अर्जुन ने भयङ्कर दृश्य देखा। धृतराष्ट्र के सारे पुत्र, विभिन्न देशों से आए राजाओं के समूह, पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, सूतपुत्र कर्ण, कौरव पक्ष और पाण्डव पक्ष के मुख्य-मुख्य योद्धा श्रीभगवान् के भयानक विकराल दाँतों वाले मुख की कालाग्नि में जाते हुए दिख रहे हैं, अर्थात् समाप्त होते हुए दिख रहे हैं। ये सारे योद्धा अत्यन्त वेग से जा रहे हैं। वे उनके दाँतों के बीच के अन्तराल में फँसे हुए दिखाई दे रहे हैं, चिपके हुए लग रहे हैं।

शरीर का उत्तम अङ्ग सिर है और उन सभी योद्धाओं के सिरों का चूर्ण होता हुआ दिखाई दे रहा है। जो अभी हुआ भी नहीं है, घटित नहीं हुआ, वह भी अर्जुन देखकर स्वयं ही बता रहे हैं कि क्या हो रहा है।

युद्ध के बाद जो भयानक दृश्य देख रहे हो, वह भी मेरा स्वरूप है, ऐसा श्रीभगवान् अर्जुन को दिखा रहे हैं। वर्तमान समय में हम जो बाढ़, भूकम्प, सूखा या महामारी आदि देखते हैं, ये सभी रूप भगवान् के ही हैं।

दसवें अध्याय, विभूतियोग में हमने सीखा कि अच्छे में अच्छा कैसे देखना है। ग्यारहवें अध्याय में देख रहे हैं कि विकराल रूप भी भगवान् का ही रूप है और इस रूप को किस तरह से देखना है, यह सीखना है।

गुरु को देखकर कितना भी भयङ्कर दृश्य हो मन शान्त हो जाता है। आज गुरु-पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुरु-चरणों में नत मस्तक होकर शान्ति पा सकते हैं। आज के विवेचन को गुरुदेव के चरणों में समर्पित कर, साधकों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए सत्र का समापन हुआ।

प्रश्नोत्तर
 
प्रश्नकर्ता : श्री राजबिहारी जी 
प्रश्न : जब हम राधे कृष्ण कहते हैं तो राधा कौन है?
उत्तर :  राधाकृष्ण दो अलग रूप नहीं हैं, एक ही हैं। एक को छुपाते हैं तो दूसरा प्रकट हो जाता है। इस विश्व में जितने भी क्रिया कलाप हो रहे हैं वे राधा कृष्ण की प्रकट रासलीला ही है। 

प्रश्नकर्ता : श्रीमती अन्नपूर्णा खेमानी दीदी 
प्रश्न : ग्यारहवें अध्याय में श्लोक क्रमाङ्क पन्द्रह से पचास तक श्लोकों में कौन सा छन्द प्रयुक्त किया गया है?
उत्तर : इन श्लोकों में त्रिष्टुप छन्द प्रयुक्त हुआ है, जिसमें प्रत्येक पद में ग्यारह मात्राएँ होती हैं। जब भी कोई विशिष्ट भाव दर्शाने होते हैं तो त्रिष्टुप छन्द का प्रयोग किया जाता है। वैसे सम्पूर्ण भगवद्गीता अनुष्टुप छन्द में है जिसमें प्रत्येक पद में आठ मात्राएँ होती हैं।

प्रश्नकर्ता : श्रीमती अनिता अग्रवाल दीदी 
प्रश्न :  महाभारत काल में जाति-व्यवस्था और जातिवाद नहीं था, फिर भी कर्ण को सूतपुत्र कहकर क्यों अपमानित किया जाता था?
उत्तर : यह हमारा दृष्टिकोण है। पिता के व्यवसाय से सन्तान की पहचान होना एक स्वाभाविक पद्धति है 
स्वे स्वे कर्मण्यभिरत:, संसिद्धिं लभते नर:।
अपने-अपने कर्मों को करने से ही सिद्धि प्राप्त होती है। श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बने, यज्ञ में झूठी पत्तलें उठाईं, इन सबसे वे छोटे तो नहीं हुए। माता-पिता के नाम से या व्यवसाय से पहचाना जाना गलत नहीं है।

प्रश्नकर्ता : श्रीमती अनिता अग्रवाल दीदी
प्रश्न: ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं, पूर्णात् पूर्णमिदुच्यते, इसका संक्षिप्त अर्थ क्या है?
उत्तर : पूर्ण शब्द का अर्थ है अनन्त, जो पूर्ण हो, अनन्त हो यदि उसमें से पूर्ण निकाल दिया जाए तब भी पूर्ण ही रहता है 
          पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्णमेवावशिष्यते 
कहने का तात्पर्य यह है कि परमात्मा से अनन्त संसार का निर्माण हुआ है फिर भी परमात्मा अनन्त ही हैं।

प्रश्नकर्ता : श्री शम्भू रतन त्रिवेदी जी 
प्रश्न : श्रीभगवान् ने विकट रूप क्यों दिखाया?
उत्तर : प्राय: हम भयावह दृश्य देखकर भयभीत हो जाते हैं परन्तु जब यह जान जाते हैं कि वह भी श्रीभगवान् का ही एक रूप है तो उसे स्वीकार करना सरल हो जाता है। गुरु द्रोणाचार्य के कहने पर जब दुर्योधन और युधिष्ठिर अच्छे और बुरे व्यक्ति की खोज में गए तो दुर्योधन को सभी में बुराई ही दिखी और युधिष्ठिर को सभी में अच्छाई। अच्छा और बुरा हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। श्रीमद्भगवद्गीता हमें बुराई में भी अच्छाई देखना सिखाती है।

प्रश्नकर्ता : श्री सुमित जी 
प्रश्न : वर्तमान जीवन शैली में हमारा कल्याण कैसे होगा? क्या गुरु के बिना भी श्रीमद्भगवद्गीता द्वारा मुक्ति मिल सकती है?
उत्त्तर : जीवन शैली में परिवर्तन अवश्य हुआ है परन्तु हमारा अन्तरङ्ग नहीं बदला है। श्रीभगवद्गीता की शरण जाने से श्रीभगवान् के सान्निध्य का आनन्द प्राप्त होता है। काल बदलने पर भी श्रीभगवद्गीता चिर पुरातन और चिर नूतन है। वह श्रीकृष्ण का वाङ्मयी स्वरूप है। आज गुरु-पूर्णिमा के दिन श्रीभगवद्गीता को प्रणाम करना गुरु को प्रणाम करने के बराबर ही है।
ॐ तत्सत् श्री कृष्णार्पप्रश्नोत्त।