विवेचन सारांश
प्रिय भक्त के गुण
श्रीभगवान श्रीजगन्नाथ जी की असीम कृपा एवम् पूज्य गुरुदेव जी के आशीर्वाद से दीप प्रज्वलन एवं प्रार्थना के पश्चात सत्र का आरम्भ हुआ। पूज्य गुरुदेव जी का चित्र अथवा गीता परिवार का बोध चिह्न दिखाई नहीं भी दे तो कोई बात नहीं। ये सभी बोध चिह्न निमित्त मात्र होते हैं। ये चिह्न हमारे ह्रदय में बने होने चाहिए। हम हृदय में सदैव गुरुदेव का स्मरण करते हैं। परमपूज्य गुरु गोविन्ददेव गिरि जी महाराज, जिनकी अनुकम्पा से ये सारा उपक्रम चल रहा है, उनके आशीर्वाद से दस लाख साधक इस उपक्रम के साथ जुड़ गए हैं। उन्हीं के साथ- साथ समस्त गुरु परम्परा को वन्दन करते हैं।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुःगुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुःसाक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।
हम बारहवें अध्याय, भक्तियोग का चिन्तन कर रहे हैं। सबसे प्यारा, सबसे मीठा, भक्ति रस है। वैसे भी शर्करा युक्त होता है, सबसे मधुर होता है। सबसे सरल, सबसे अर्थपूर्ण, रसपूर्ण इस प्रकार का यह अध्याय है।
श्रीभगवान ने दूसरे अध्याय में सांख्ययोग अर्थात् ज्ञानयोग बताया, तीसरे अध्याय में कर्मयोग बताया। तदुपरान्त विराटस्वरूप दिखाने के पश्चात भक्तियोग सिखाया। इस बात को समझना अत्यन्त आवश्यक है। ग्यारहवें अध्याय में श्रीभगवान अपना विराट स्वरूप दिखाते हैं, विश्वरूप दर्शन कराते हैं, अपना योगेश्वर रूप दिखाते हैं, उसके पश्चात भक्तियोग सिखाते हैं। दसवें अध्याय में विभूतियाँ दिखाईं कि मैं कहाँ-कहाँ हूँ, ये तुम जान लो अर्जुन। श्रीभगवान अपने भक्तों से इतना प्रेम करते हैं कि अपने भक्त की प्रत्येक क्षुधा बुझाते हैं, प्रत्येक हठ को भी पूरी कर देते हैं। जब अर्जुन का मन नहीं भरा तब अर्जुन की हठ पर उनको ये यौगिक, अद्भुत रूप दिखाया। सर्वगुण, स्वाभाविक, साकार रूप जब अर्जुन ने देख लिया है तो उनको समझना अर्जुन के लिए सम्भव ही होगा, परन्तु हम जैसे अज्ञानियों के लिए बहुत सरल तरीके से अपनी बात समझायी।
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।12.8।।
श्रीभगवान आठवें श्लोक में कहते हैं मेरे अन्दर मन को लगा ले। मन और बुद्धि दोनों का लगाना आवश्यक है। श्रीभगवान भी एक कदम आगे बढ़ाते हैं। भक्तियोग का रस अनोखा है। यह एक तरफा रास्ता नहीं है। आना और जाना (incoming outgoing) दोनों तरफ से चलता है। आप एक कदम बढ़ाइए, श्रीभगवान भी एक कदम आगे बढ़ाएँगे क्योंकि वे भी भाव के भूखे हैं और हमें लगता है हमारे भोग दिखाने से उनका पेट भर रहा है, ऐसा नहीं हैं। उस समय जो हमने मन में परिवर्तन किया, मन में जो भाव जगा, उसके भूखे हैं श्रीभगवान किन्तु हमारा भोग दिखाना भी बड़ा औपचारिक हो गया है। हम थाली लेकर जाते हैं, श्रीभगवान के सामने रखते हैं, घण्टी बजाते हैं, हाथ में पानी लेकर घुमा दिया और उठा ली थाली। श्रीभगवान हमारे छोटे-छोटे विग्रह में हैं। यदि इसी समय में श्रीभगवान की खाना खाने की इच्छा भी हो गई कि हमारे हाथ का खाना खाएँ उतनी ही देर में हम थाली उठा लेते है और वहाँ से निकल जाते हैं। क्या ये भाव परोसना हुआ? हम कितने भी छप्पन भोग बना लें, यदि उसमें भाव नहीं हैं तो श्रीभगवान का भोग लगता ही नहीं। मन और बुद्धि दोनों अर्पण करके रोमाञ्चित हो जाना चाहिए कि जैसा भी बना है, मैं लेकर आई हूँ, भोजन कराऊँगी। आज इस भाव के साथ वहाँ बैठ जाना। वे हमारे दो ग्रासों के भूखे नहीं हैं। वे तो तीनों जगत के नियन्ता हैं। जो सारे जगत की भूख मिटाते हैं वो क्या हमारी एक थाली भर भोजन के भूखे हैं? कदापि नहीं। थाली भर भोजन दिखाने मात्र से हमारा ही भला होगा।
कहा भी गया है-
जैसा अन्न वैसा मन
जैसा पानी वैसी वाणी।
ऐसा करने से हमारा ही लाभ है। इस क्रिया के फलस्वरूप हम शुद्ध भोजन तैयार करते हैं। फिर हाथ-पैरों की शुद्धता करते हैं। तीसरी बात हम अपने मन को भी निर्मल करते हैं। फिर इस निर्मल मन से हम भोजन प्रसाद स्वरूप में ग्रहण करते हैं। तब हमारी चित्त वृत्तियाँ भी सात्त्विक बनने लगती हैं। ये उस प्रसाद रूप भोजन का माहात्म्य है। वहाँ बुद्धि और मन दोनों अर्पण हो जाएँ और जहाँ जिस काम में दोनों अर्पण कर दिए वहाँ उस काम में यश निश्चित है। जैसे यदि एक छात्र कक्षा में पढ़ता है और शिक्षक फलक पर कुछ लिख रहे हैं। छात्र का सिर, मस्तिष्क, आँखें वहाँ हैं, लेकिन मन घर पर चला गया कि आज रसोई में क्या बना होगा? आज खाने को क्या मिलेगा? मामा का बेटा आया हुआ है, उसके साथ खेलने को मिलेगा? इस प्रकार का चिन्तन यदि चल रहा है तो कक्षा में जो चल रहा है, वह उसे ग्रहण नहीं कर पाएगा परन्तु वही बच्चा मन अर्पण करके कक्षा में पढ़ता है तो उसे घर पर पुनः पठन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
अब ये मन और बुद्धि साथ-साथ कैसे जुड़ें, इस जुड़ाव का नाम है, योग। युज् धातु का मतलब जोड़ना है, एक दूसरे में जमा करना है। योग मन को बुद्धि से कैसे जोड़ता है? जब-जब मन किसी नकारात्मकता में जाता है, किसी दु:ख, निराशा, भय में चला जाता है, आपकी साँस फूलने लगती है, आप जल्दी-जल्दी साँस लेने लगते हैं। इसके विपरीत साँस को नियन्त्रित कर लिया तो मन नियन्त्रित हो जाता है। इसके लिए एक अभ्यास है, पैंतालीस सैकण्ड का। मन में क्रोध या बुरा विचार आया तो पैंतालीस सैकण्ड रुक जाइए।
दस लम्बी गहरी साँसें लें और धीरे-धीरे छोड़ें। पैंतालीस सैकण्ड में जैसे ही आपकी साँस धीमी हुई वैसे ही मन शान्त हो जाता है। जिस मन में क्रोध की अग्नि भड़क रही थी, निराशा के बादल छा गए थे, तनाव का तूफान आया हुआ था, वो सारे थम जाते हैं और मन शान्त हो जाता है। तब मन को साथ जोड़ें तो बुद्धि बताएगी, क्या काम करना है? क्रोध में लिया गया कोई भी निर्णय और क्रोध में कही गई कोई बात आपको यशस्विता तक नहीं पहुँचा सकती इसलिए क्रोध, दु:ख, निराशा पर संयम रखना। ये सब अस्थायी हैं, यह बात समझना आवश्यक है। शरीर प्रकृति से प्राप्त है। प्रकृति में जैसे ऋतु बदलती है, कभी दु:ख काल रहता है, कभी वर्षा आ जाती है, वैसे ही मन में भी बदलाव होते हैं, उथल-पुथल होती है।
पूर्णिमा की रात्रि में सागर में ऊँची-ऊँची लहरें उठती हैं। कहाँ वह चन्द्रमा कहाँ सागर, परन्तु सागर में उथल-पुथल आरम्भ हो जाती है। हमारे शरीर में भी सत्तर प्रतिशत पानी है, हड्डियों के रूप में भूमि है। भूमि, भूमि में मिल जायेगी एक दिन। दाह संस्कार होते ही सारा पानी भाप बन जायेगा। ये सारा पञ्च महाभूतों का बना शरीर वहीं विलय हो जायेगा लेकिन हमें पहचानना होगा कि यह शरीर प्रकृति से बना है तो उथल-पुथल तो होगी ही। जैसे अमावस्या या पूर्णिमा के होने से समुन्दर की लहरों में उथल-पुथल हो सकती है, वैसे ही हमारे शरीर में सत्तर प्रतिशत पानी में उथल-पुथल तो होगी ही लेकिन उस मन को कैसे संयमित किया जाता है?
प्राणापानौ समौ कृत्वा।
प्राण और अपान वायु को समत्त्व के साथ भर लो। पैंतालीस सैकण्ड धीमे-धीमे साँस लें साँस छोड़ें। किसी भी मुख्य सभा, साक्षात्कार में जाना हो या आवश्यक बात करनी हो, पैंतालीस सैकण्ड ये कर लें तब पता चलेगा, आपकी विजय होगी। श्रीमद्भगवद्गीता विजय का शास्त्र है। अर्जुन जीतें इसलिए श्रीभगवान ने गीता कही। भगवद्गीता का उद्देश्य ही अर्जुन को युद्ध के लिए प्रवृत्त करना और उन्हें जिताना था परन्तु युद्ध मन और बुद्धि के समन्वय से ही जीते जा सकते हैं। उसकी ऊर्ध्व गति होगी, इसमें कोई संशय नहीं है। उसके लिए पूर्ण श्रद्धा के साथ शबरी की तरह नवधा भक्ति करनी होगी।
1) श्रवण
2) कीर्तन
3) स्मरण
4) पाद सेवन
5) अर्चन
6) वन्दन
7) दास्य
8) साख्य
9) आत्म निवेदन
ये है नवधा भक्ति। यदि आप किसी को अपने मन की बात नहीं कह सकते तो जाइए बैठ जाइए श्रीभगवान के पास, सुनाइए उनको मन की बात, सुनते हैं वे। जैसे आप किसी पहाड़ पर जााएँ और जोर से आवाज निकालें राम-राम। पहाड़ों से प्रतिध्वनि गुञ्जित होती है, राम-राम। आप राम की आवाज बोलें तो वही सुनाई देगी। जब हम श्रीभगवान से आत्मनिवेदन करते हैं तो इस अभ्यास से हम उनको प्रिय होने लगते हैं। श्रीभगवान एक कदम आगे आते हैं और कहते हैं कि ये भी मुश्किल लगता है तो कोई बात नहीं। ये करके देखो। वे आसान करके बताते हैं-
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि।।
12.10
अभ्यास में भी यदि असमर्थ हैं तो कोई बात नहीं। तुझे और सरल करके बताता हूँ। तू जो भी काम कर रहा है, मेरे लिए कर। मेरे लिए काम कर रहा है, इस भाव के साथ आगे बढ़ तुझे सिद्धि प्राप्त हो जाएगी।
जब विवेचक भगवद्गीता कण्ठस्थ कर रहे थे और उसी में डूबे हुए थे, सुबह उठते ही शुरू हो जाते थे, हर समय सुनते रहते थे। कपड़े बदलते हुए भी मोबाइल में रिकार्ड करके सुनते रहते। प्रवास में जाते तब भी बोलते रहते, फ्लाइट में गीता की पुस्तक लेकर जाते। दो वर्ष गीतामय बन गए। अविश्वसनीय परन्तु सत्य है, एक दिन उन्होंने देखा कि उनके साथ कुछ अजीब घटना घट रही है। किसी भी किताब को पढ़ने का समय घट गया। पूरा पृष्ठ याददाश्त में आने लगा। उन्होंने अपने मित्रों को बताया तो उन्होंने परीक्षा ली। एक क्षण के लिए किताब दी और कहा कोई भी एक पृष्ठ देखो। उसके सारे के सारे अक्षर एक साथ विवेचक के अन्दर खिंचे चले जाते थे।
जैसे एक छोटे बच्चे ने समाचार पत्र पढ़ना शुरू किया। आपको उसे टाइम्स ऑफ इण्डिया पढ़ते देखकर आश्चर्य हुआ। उससे पढ़कर सुनाने को कहा। वो उसके एक-एक अक्षर को पढ़ता है। वो ही बच्चा दूसरी, तीसरी, चौथी कक्षा में आ जाता है तो उसे एक साथ पढ़ना सीख जाता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है उसे एक साथ कई शब्द खींचने की आदत लग जाती है। भगवद्गीता पढ़ते-पढ़ते विवेचक को भी ऐसा होने लगा, लगा पूरा पृष्ठ एक साथ खिंचा आ रहा है। अब जब भगवद्गीता कण्ठस्थ हो गई, गीताव्रती बन गये तो अभ्यास की आवश्यकता नहीं रही। दैनिक एक अध्याय पढ़ लेते हैं। एकादशी के दिन तीन अध्याय पढ़ लेते हैं। ये सिद्धियाँ बड़ी आसानी से आती हैं परन्तु जो सिद्धियों में अटक गए उनका सत्यनाश हो जाता है। जो सिद्धि आने पर भी आगे चलते रहते हैं वो पहुँच जाते हैं।
श्रीभगवान कहते हैं, तू बस मेरे लिए काम कर। तुझे जो भी आवाज सुनाई देती है वो मेरी ही आवाज है। योगासन के बाद शवासन में शेष समय में नहीं सुनाई देने वाली आवाजें सुनाई देने लगती हैं। आस-पास पेड़ पर पञ्छियों की आवाज सुनाई देती है जो कि शेष समय सुनाई नहीं देती। हम जब अन्दर से शान्त होते हैं तो शेष आवाजें सुनाई देती हैं। जब हम एकाग्रचित्त हो जाते हैं, सजगता के साथ शवासन करते हैं तो हृदय की धड़कन, धमनियों में बहते रक्त की आवाज भी सुनाई देती है। ये सारी आवाजें प्रभु का गुणगान है। प्रभु हैं तभी तो धमनियों में रक्त बह रहा है, ह्रदय धड़क रहा है। जब तब वो मेरे आत्मरूप से मेरे अन्दर सिद्ध है, तब तक मैं जीवित हूँ, तब तक साँस की भी आवाज चल रही है, कोहं-कोहं पर जैसे ही शवासन में लेटकर आवाज सुनते तो सुनाई देता, सोहं-सोहं। मैं वो ही हूँ और जब हम भगवान्वय होकर सारे काम उनको अर्पण किए जा रहे हैं, दुकानदार हैं तो ग्राहक में उनका रूप देख रहे हैं, रसोई कर रहे हैं तो उनका भोग लगाने के लिए ही बना रही हूँ, ये भाव मन में रखें। जब सारे काम उनको समर्पित करके करते हैं तो सारी आवाजें स्वाभाविक रूप से भगवान्मय सुनाई देती हैं।
जीवों का जो भी कलरव दिन भर सुनने में मेरे आवे,
तेरा ही गुणगान जान मन प्रमुदित हो अति सुख पावे।
ऐसा घटित होता है। एक बार विवेचक किसी के घर गये। बच्चे खेल रहे थे। बच्चों के दादा जी कहने लगे अन्दर चलकर बात करते हैं, यहाँ अत्यन्त शोर है। विवेचक ने कहा यह तो यह गोकुल है। बच्चों की आवाज श्रीभगवान की आवाज से क्या कम है? हम यहीं बैठकर बात करेंगे और बच्चों की आवाज आनन्द देती है। मन यदि नकारात्मक हो तो वो आपको कष्ट देती है। मन यदि सकारात्मक हो तो वही आवाज आपको प्रसन्नता देती है।
12.11
अथैतदप्यशक्तोऽसि, कर्तुं(म्) मद्योगमाश्रितः|
सर्वकर्मफलत्यागं(न्), ततः(ख्) कुरु यतात्मवान्||11||
मेरे लिए तो कर्म कर ही,
उसके फल की अपेक्षा त्याग दे।
एक उदाहरण से देखें। गीता परिवार से जुड़ी एक महिला का नेपाल से फोन आया। उसका बेटा बहुत परेशान था। बहुत होशियार था। दसवीं और बारहवीं में अठानवे प्रतिशत अङ्क आए। उसे हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रवेश लेना था। दो बार परीक्षा दी परन्तु सफलता नहीं मिली। प्रवेश नहीं मिलने से वह उद्विग्न था, निराश था। बात करने पर उससे कहा गया देखो तुम्हारी माँ और हम गीता परिवार से जुड़े हैं और गीता पर हमारा पूरा भरोसा है। गीता में कहा है-
तुम हार्वर्ड में प्रवेश पाने के लिए पढ़ाई कर रहे हो। अब ज्ञान की प्राप्ति के लिए पढ़ाई करो, फिर देखो क्या परिणाम आते हैं। उसने हार्वर्ड दिमाग से निकाल दिया। दो बार वैसे भी नहीं हुआ था। तीसरी बार क्या हो जायेगा, यही सोचकर उसने दिमाग से निकाल दिया। ज्ञान की प्राप्ति के लिए उसने पढ़ाई की। एक महीने बाद फिर नेपाल से फोन आया। भैया हार्वर्ड में प्रवेश मिल गया। जब अपने दिमाग से अपेक्षा का बोझ उतार देते हैं उसी क्षण हमारे कार्य सिद्ध होने लगते हैं।
इस भाव के साथ खेल रहे हैं तो मेडल आयेंगे। हमें अपेक्षाओं से बाहर निकलना होगा।
मेरी बहू बेटा मेरी सेवा करेंगे, मेरे बुढ़ापे की लाठी बनेंगे, इसी अपेक्षा के साथ उन्हें बड़ा किया। पढ़ाया लिखाया, विवाह कर बेटा विदेश चला गया। अपेक्षा की अपेक्षा भङ्ग हुई। न अपेक्षा करते, न भङ्ग होती। कभी-कभी आते और सेवा कर देते, उसमें भी प्रसन्नता होती इसलिए श्रीभगवान कहते हैं, कर्म करते रहो, फल की अपेक्षा मत करो। अपेक्षा के साथ में गड़बड़ निश्चित रूप से होती है।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्, ज्ञानाद्ध्यानं(व्ँ) विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्याग:(स्),त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥12.12॥
अद्वेष्टा सर्वभूतानां(म्), मैत्रः(ख्) करुण एव च|
निर्ममो निरहङ्कारः(स्), समदुःखसुखः क्षमी||13||
सन्तुष्टः(स्) सततं(य्ँ) योगी, यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धि:(र्), यो मद्भक्तः(स्) स मे प्रियः॥12.14॥
राम मन्दिर की प्रतिष्ठा हुई तब सभी साधु-सन्तों और गणमान्यों के जूते कौन सम्भाले? इसकी समस्या हुई। तब ये कार्य गीता परिवार को सौंपा गया। गीता परिवार के लोग सभी गणमान्यों को जूतों को हाथ नहीं लगाने देते थे। स्वयं जूते उतारते, उन्हें साफ करके रखते, हाथ धोने को पानी देते और वापसी में कूपन लेकर जूते स्वयं पहनाते। इस भाव के साथ राम मन्दिर में आने वाले सभी सन्तों की गीता परिवार ने सेवा की।
एक बहन लर्नगीता में गीता सिखाती थी। कोरोना में उनके पति बीमार हुए। चिकित्सालय में रहे। वहाँ किसी से मिलने की अनुमति नहीं थी। वहीं उनका देहान्त हो गया। पार्थिव शरीर भी परिवार को नहीं दिया गया। चिकित्सालय वालों ने ही दाह संस्कार किया। शाम को बहन ने सत्र लिया। सबने सोचा घटना रात को हुई होगी पर बाद में पता चला कि सुबह की ही घटना है। तब फोन करके उनसे पूछा, इतना धीरज कैसे? तब बहन ने कहा, जो घटना था, घट गया। पार्थिव शरीर भी घर नहीं आ रहा, क्या करना चाहिए? कोई घर नहीं आ रहा है तो मैंने सोचा गीता के श्लोक घर में गूञ्जें, इससे अच्छा क्या होगा? मैंने गीता के श्लोक सिखा दिए। गीता की गूॅंज घर में उठी तो सही। शरीर तो नश्वर है। एक दिन जाना है और ये दुःख आना है, फिर ये दुःख भी एक दिन चला जाएगा। जिसने सुख और दुःख दोनों के आने और जाने को समझ लिया, उनके लिए दोनों सम हो जाते हैं।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
यस्मान्नोद्विजते लोको, लोकान्नोद्विजते च यः|
हर्षामर्षभयोद्वेगै:(र्), मुक्तो यः(स्) स च मे प्रियः||15||
एक बार बच्चों से पूछा कि आपको सुख का विलोम पता है क्या? बच्चों ने तुरन्त हाथ ऊपर करके बताया दुःख। अब आनन्द का विलोम शब्द बताइए? बच्चों ने कहा दुःख परन्तु दुःख तो सुख का विलोम है। बहुत सुख-सुख करेंगे तो अन्त में दुःख की प्राप्ति होने वाली है। फिर किसी ने बताया, उद्वेग, खिन्नता, खेद। क्षणिक आनन्द की अनुभूति हर्ष कहलाती है और क्षणिक सुख की अनुभूति खेद कहलाती है इसलिए रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के देर से आने पर खेद प्रकट करने का उद्घोष होता है।
पहले विवेक खो जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है-
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।
एक चार्ट बनावें। A, AB, AC, BC, A मतलब anger. आज कितनी बार क्रोध किया? दिन में कई बार क्रोध आ जाता है। ठान लें, इस पर विजय प्राप्त करनी है। रात को लिखें- AC या anger control (क्रोध पर नियन्त्रण)। लम्बी गहरी साँस लेना है। क्रोध नियन्त्रण करना है। फिर BC, भगवत् चिन्तन। श्रीभगवान का नाम साथ में जोड़कर उतनी साँसें लेना है। अन्दर जाती साँस के साथ भगवत् नाम बाहर आती साँस के साथ भगवत् नाम। एक सप्ताह में ऐसा होने लगेगा, क्रोध आते ही याद जाएगा AC। लम्बी गहरी साँसें लो। दो सप्ताह में क्रोध आने से पहले ही जग जाआगे। याद आ जाएगा AC, BC करना है। क्रोध नियन्त्रण, भगवत् चिन्तन। महीने भर में क्रोध ही निकल जाता है लेकिन सजग रहना पड़ता है।
भागो नहीं जागो।
अनपेक्षः(श्) शुचिर्दक्ष, उदासीनो गतव्यथः|
सर्वारम्भपरित्यागी, यो मद्भक्तः(स्) स मे प्रियः||16||
जब भी आए नाकारात्मकता, निराशा अथवा क्रोध, सावधान हो जाना।भगवद् नाम चिन्तन और पैंतालीस सैकण्ड की शान्ति। जो दु:खों से बाहर निकल गया। दुःख अस्थायी है, जो ये समझ गया समझो दु:खों से बाहर निकल गया।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि, न शोचति न काङ्क्षति|
शुभाशुभपरित्यागी, भक्तिमान्यः(स्) स मे प्रियः||17||
हत्या करना अशुभ है, फिर भी श्रीभगवान अर्जुन से कह रहे हैं, दुर्योधन को मार दे। ये अशुभ काम भी कभी कभी करने पड़ते हैं। उसमे भी मैं का भाव निकाल देना। ये आततायी हैं जिन्होंने एक स्त्री, द्रौपदी के वस्त्रों को हाथ लगाया, वस्त्र हरण किया, ऐसे नीच लोगों को देह दण्ड देना क्षत्रियों का कर्त्तव्य होता है। यदि अशुभ कार्य भी कर्त्तव्य भाव से किया गया है तो उसके शुभ-अशुभ फलों का परित्याग अपने आप हो जाता है।
कोई जज कसाब को मृत्यु दण्ड देते हैं तो जज का कसाब से कोई बैर नहीं होता है। वो तो जज की कुर्सी पर बैठे हैं। उनका कर्त्तव्य है। यदि अशुभ काम भी कर्त्तव्य समझ कर किया जाए तो भी वह गड़बड़ नहीं करता।
समः(श्) शत्रौ च मित्रे च, तथा मानापमानयोः|
शीतोष्णसुखदुःखेषु, समः(स्) सङ्गविवर्जितः||18||
महाशनो महापापमा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।
सबसे बड़े बैरी तो मेरी कामनाएँ, मेरा क्रोध हैं। श्रीभगवान ने ग्यारहवें अध्याय में जब विराट रूप दिखाया तो अर्जुन ने देखा कि दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण, आचार्य द्रोण और पितामह भीष्म उनके मुख में खिंचे जा रहे हैं और प्रदीप्त अग्नि में जैसे पतङ्गे खिंचे जाते हैं वैसे ही सारे कौरव उनके मुख में खिंचे जा रहे हैं। श्रीभगवान उन्हें चबा रहे हैं और उनके होंठ से रक्त नीचे गिर रहा है। यह देखकर अर्जुन काँप गये। अर्जुन ने पूछा यह मैं क्या देख रहा हूँ?
श्रीभगवान ने कहा-
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान्।
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्
ये सभी मैंने मार दिए। अब बस तुम युद्ध जीतो और विजय को प्राप्त करो। ग्यारहवें अध्याय में श्रीभगवान कहते हैं- तुम बैरी नहीं कर्त्तव्य समझ कर युद्ध करो।
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी, सन्तुष्टो येन केनचित्|
अनिकेतः(स्) स्थिरमति:(र्), भक्तिमान्मे प्रियो नरः||19||
भगवान बुद्ध के ऊपर किसी ने थूक दिया। उन्होंने हँसते-हँसते पूछा, और भी कुछ कहना है? वह व्यक्ति वहाँ से चला गया। लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। अगले दिन उस व्यक्ति को पश्चाताप हुआ। उसने सोचा क्षमा माँगनी चाहिए। वह हार लेकर भगवान बुद्ध के पास गया। हार पहनाया और क्षमा माँगी। भगवान ने पूछा और भी कुछ कहना है। लोगों ने पूछा, कल भी उसके गाली देने के बाद भी आपने यही पूछा था, आज क्षमा माँग रहा है तब भी यही पूछ रहे हैं?
उन्होंने कहा, इसने गाली दी थी, मैंने ली नहीं थी। ऐसे ही आज पुष्पों का हार पहना रहा है, मैं ले थोड़े ही रहा हूँ। गाली क्या, पुष्प क्या? दोनों एक ही बात हैं।
मैं स्वीकार करूँगा तब ही वह मेरा होगा।
ये तु धर्म्यामृतमिदं(य्ँ), यथोक्तं(म्) पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा, भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥12.20॥
प्रश्न:- श्रीभगवान जी ने अपेक्षा किए बिना कर्म करने को कहा है या कर्म फल का त्याग करने को कहा है।
बुद्ध भगवान की भी एक प्रसिद्ध पंक्ति है- इच्छा ही समस्त बुराइयों की स्त्रोत है (Desire is the source of all evil.)
प्रश्न यह है कि अपेक्षा और इच्छा में क्या समानता है?
उत्तर:- इच्छा तो बिना कर्म किए भी कोई कर सकता है। जैसे आप किसी के लिए यह सोचो कि वह आपसे अच्छा व्यवहार करे जबकि आपने उसके लिए कुछ किया ही नहीं और यदि आप किसी के साथ अच्छा व्यवहार करते हो और सोचो कि वह भी आपके साथ अच्छा व्यवहार करे तो यह अपेक्षा है। इच्छा एक तरफ होती है और अपेक्षा दो तरफा। श्रीभगवान ने अपेक्षा करने के लिए मना किया है अर्थात् बिना किसी अपेक्षा के अपने कर्म को करने के लिए निर्देशित किया है। आप कर्म कीजिए फल की अपेक्षा मत कीजिए।
प्रश्नकर्ता:- प्रबोध भैया
प्रश्न:- क्या सभी प्रकार की इच्छाएँ खराब हैं?
उत्तर:- अनेक प्रकार की इच्छाएँ होती हैं। आप जिस प्रकार की इच्छा की बात कर रहे हो, वह इच्छा शुभ सङ्कल्प होती है किन्तु हमें इन शुभ सङ्कल्पों को पूर्ण करते समय कर्म फल की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए क्योंकि जब हम कार्य करते हैं और उसके प्रतिफल की अपेक्षा करते हैं तो हम बहुत कम फल के बारे में सोच पाते हैं किन्तु जब आप कर्म फल को श्रीभगवान के ऊपर छोड़ देते हो तो आपको कई गुना कर्म फल प्राप्त होता है जितना कि आपने सोचा भी नहीं होगा और न आप सोच सकते हैं। वह कर्मफल आपकी कल्पना से परे होगा। इसका एक साक्षात उदाहरण लर्न गीता का यह ऑनलाइन प्रकल्प है। जब हमने इसे प्रारम्भ किया, तब कभी यह नहीं सोचा था कि दस लाख साधक जुड़ जाएँगे और सब कुछ श्रीभगवान पर छोड़ दिया था। अब देखिए हमारी कल्पना से भी परे दस लाख साधक जुड़ चुके हैं। निरन्तर प्रतिदिन जुड़ने जा रहे हैं। बारह हजार सेवी अपनी सेवाएं प्रतिदिन नि:शुल्क दे रहे हैं।
प्रश्नकर्ता:- विद्या दीदी
प्रश्न:- क्रोध को कम करने और सहनशीलता को बढ़ाने के लिए क्या करें?
उत्तर:- यदि आपने यह मान लिया कि आपको बहुत क्रोध आता है तो आपने एक पग आगे बढ़ा लिया है। अब प्रतिदिन सुबह श्रीभगवान के आगे बैठकर पूरे मन से उनसे प्रार्थना कीजिए कि मुझे इस क्रोध से बचा लीजिए और मुझे सहनशीलता प्रदान कीजिए। प्रतिदिन रात को लिखिए, आपको कितनी बार क्रोध आया, क्यों आया? और उस पर चिन्तन कीजिए। धीरे-धीरे अभ्यास से क्रोध कम होता चला जाएगा और सहनशीलता बढ़ती जाएगी।
प्रश्नकर्ता:- रेखा दीदी
प्रश्न:- भगवत् चिन्तन किस प्रकार करना चाहिए?
उत्तर:- अपनी श्वास के साथ मुँह बन्द करके आपको जो भी मन्त्र ठीक लगता है, वह श्वास अन्दर लेते समय धीरे-धीरे मन-मन में बोलिए और श्वास छोड़ते समय पुनः उसको बोलिए।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः॥