विवेचन सारांश
विज्ञानसहित ज्ञान- ईश्वर की अनुभूति

ID: 5376
हिन्दी
रविवार, 25 अगस्त 2024
अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोग
1/3 (श्लोक 1-7)
विवेचक: गीता प्रवीण कविता जी वर्मा


ईश्वर की असीम अनुकम्पा से एवम् गुरुदेव के आशीर्वाद से आज के विवेचन सत्र (बालकों हेतु) का शुभारम्भ सड्कीर्तन, भगवान श्रीकृष्ण की प्रार्थना एवम् दीप प्रज्वलन से हुआ। भगवान् श्रीकृष्ण के प्राकट्य दिवस को सम्पूर्ण संसार जन्माष्टमी के रूप में मनाता है अत: नवमें अध्याय के इस विवेचन में आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पूर्व सन्ध्या पर नन्हें गीता जिज्ञासुओं से कौन बनेगा ज्ञानपति सदृश्य कई प्रश्न पूछे गये। इन प्रश्नों का बालकों द्वारा बेहद उत्साहपूर्वक उत्तर दिया गया।
 
छान्दोग्योपनिषद् में वर्णित एक प्रसङ्ग
श्वेतकेतु नामक एक पॉंच वर्ष का बालक बेहद नटखट था। उसे शिक्षा प्राप्त करने हेतु गुरुकुल भेजा जाता है। बारह वर्ष पश्चात् जब वह अपनी शिक्षा पूर्ण कर घर वापस आता है, सत्रह वर्ष का हो जाता है। विद्या ग्रहण कर श्वेतकेतु शिक्षित होने के अभिमान से भर जाता है। अपने पिता से दम्भ के वशीभूत हो कहता है कि पिताजी मैं अपनी शिक्षा पूर्ण कर आया हूँ। अब आप मुझसे किसी भी विषय में प्रश्न पूछ सकते हैं, मैं उसका उत्तर भली प्रकार दे सकता हूँ।

सर्वज्ञ होने का अहम् लिए उस पुत्र को यह कहाँ पता था कि उसके पिताजी उससे जो प्रश्न पूछेंगे, वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सर्वाधिक कठिन प्रश्न होने वाला था। जिसका उत्तर उपनिषद के एक सम्पूर्ण अध्याय में समाहित हुआ।

प्रश्न था-
ऐसा क्या विषय है, जिसके अध्ययन एवम् जिसे समझने के पश्चात् संसार में अन्य कुछ भी समझना या अध्यन करना शेष नहीं रह जाता। हम सर्वज्ञ हो जाते हैं?

इसका उत्तर श्वेतकेतु न दे सका। उसका समस्त अभिमान स्वतः ही विलुप्त हो गया। प्रारम्भ में तो उसने इस विषय में अपने शिक्षकों द्वारा न समझाए जाने का दोष दिया, परन्तु अन्त में पिताजी से अपने इस व्यवहार हेतु क्षमा माँगते हुए, प्रश्न का उत्तर पूछा।

पिता उत्तर देते हैं-
वह ज्ञान जिसे ब्रह्मज्ञान कहा जाता है तथा जिसके द्वारा ब्रह्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त होता है, जिसकी अनुभूति (ब्रह्मतत्त्व की) उस परम ज्ञान के अपने जीवन में पूर्ण रूप से अवतरण के पश्चात् ही होती है। उपनिषदों में विस्तार से बताये गये इस ज्ञान को जब तक हम अपने जीवन में नहीं उतारेंगे तब तक उसकी अनुभूति प्राप्त नहीं होती। जैसे-

गीता पढ़ें, पढ़ायें, जीवन में लायें।

तदोपरान्त बालकों से प्रश्न पूछना प्रारम्भ किया गया। प्रत्येक श्लोक के अन्त में कुछ प्रश्न नन्हे गीता जिज्ञासाओं से पूछे गये तथा उत्तर को उन्हें समझाया भी गया-

प्रश्न- मत्स्य देश के राजा का क्या नाम था?
उत्तर- राजा विराट। राजा विराट के राज्य में आश्रय लेते हुए पाण्डवों ने अपना अज्ञातवास पूर्ण किया था।

प्रश्न- श्रीकृष्ण जी के माता-पिता का क्या नाम था?
उत्तर- माता का नाम देवकी एवम् पिता का नाम वसुदेव।

प्रश्न- श्रीकृष्ण जी के भाई एवम् बहन का क्या नाम था?
उत्तर- भाई का नाम बलराम एवम् बहन का नाम सुभद्रा।

9.1

श्रीभगवानुवाच
इदं(न्) तु ते गुह्यतमं(म्), प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं(व्ँ) विज्ञानसहितं(य्ँ), यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥9.1॥

श्रीभगवान् बोले -- यह अत्यन्त गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान दोष दृष्टि रहित तेरे लिये तो (मैं फिर) अच्छी तरह से कहूँगा, जिसको जानकर (तू) अशुभ से अर्थात् जन्म-मरण रूप संसार से मुक्त हो जायगा।

विवेचन:-  अर्जुन एक महान योद्धा होते हुए भी, कभी किसी से ईर्ष्या नहीं करते तथा न ही किसी की त्रुटियों को उजागर करने का प्रयास करते हैं। आज प्राय: हम देखते हैं कि जब किसी बालक के प्राप्तॉंक अधिक आते हैं तथा वह कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करता है तो अन्य उससे ईर्ष्या करने लगते हैं। उसकी ऐसी त्रुटियों को उजागर करने का प्रयास करेंगे जैसे वह अच्छा बालक नहीं है। वह अपने माता-पिता एवम् अपने शिक्षकों का सम्मान भी नहीं करता आदि।

श्रीभगवान् कहते हैं कि- हे अर्जुन! चूँकि तुम किसी से कभी ईर्ष्या नहीं करते अत: मैं तुम्हें यह परम गुह्यज्ञान तथा अनुभूति बताऊँगा, जिसे जान तुम संसार के समस्त क्लेशों से मुक्त हो जाओगे।         

ज्ञान- ब्रह्मज्ञान- ईश्वर की उपस्थिति का ज्ञान।

विज्ञान- अनुभूत ज्ञान- ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव करना।

ज्ञान का अर्थ तो हम समस्त समझते हैं परन्तु यहाँ विज्ञान का अर्थ स्पष्ट करने की आवश्यकता है।

विज्ञान का अर्थ है अनुभूति।
उदाहरणतः जब तक किसी बालक ने रसगुल्ला या किसी मिठाई का स्वाद न चखा हो तथा कोई अन्य बालक उसे रसगुल्ले या अन्य मिठाई के स्वाद के विषय में समझाने का प्रयास करे तो, क्योंकि उस बालक ने कभी भी मीठे का स्वाद ही नहीं चखा है, अत: अनुभव के अभाव में किसी अन्य बालक के समझाए जाने पर भी, वह मीठे स्वाद का अनुभव ही नहीं कर पाएगा। उसी प्रकार मनुष्य भी जब तक इस परम ज्ञान को अपने जीवन में नहीं लाता, उस ज्ञान का अनुभव नहीं करता, तब तक ईश्वर की उपस्थिति को समझना सम्भव न होगा।

गीता जी में अट्ठारह अध्याय हैं परन्तु नवें अध्याय में कर्म, ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय है। इसमें सम्पूर्ण गीता जी आ जाती है। जिसको जानने के पश्चात् मनुष्य संसार के सभी क्लेशों से मुक्त हो जाएगा।

9.2

राजविद्या राजगुह्यं(म्), पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं(न्) धर्म्यं(म्), सुसुखं(ङ्) कर्तुमव्ययम्।।9.2।।

यह (विज्ञान सहित ज्ञान अर्थात् समग्र रूप) सम्पूर्ण विद्याओं का राजा (और) सम्पूर्ण गोपनीयों का राजा है। यह अति पवित्र (तथा) अतिश्रेष्ठ है (और) इसका फल भी प्रत्यक्ष है। यह धर्ममय है, अविनाशी है (और) करने में बहुत सुगम है अर्थात् इसको प्राप्त करना बहुत सुगम है।

विवेचन:- सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है, गुप्त ज्ञान। यह ज्ञान अज्ञानियों की समझ में नहीं आता। जैसे एक कहावत है-

भैस के आगे बीन बजाए, भैस खड़ी पगुराय।

अर्थात् भैस के आगे बीन बजाने से वह नाच नहीं करती, क्योंकि बीन की ध्वनि उसके समझ से परे होती है। उसी प्रकार जो अज्ञानी हैं, वे इस ज्ञान को नहीं समझ पाते। जो पूर्ण श्रद्धा के साथ श्रीभगवान् की पूजा, भजन आदि करते हैं, वे ही इस ज्ञान को समझ पाते हैं। इस ज्ञान को विज्ञान के साथ समझने वाले बलवान बन जाते हैं, वे पवित्र हो जाते हैं।

हमारे कितने पुनर्जन्म हुए हैं, यह कभी आपने सोचा है? कहा गया है कि-

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

अर्थ: मेरे एवम् तुम्हारे अनन्त जन्म हुए हैं, जो गणना से परे हैं। हम भिन्न-भिन्न रूपों में आते हैं। जो जीव अच्छे कर्म करते हैं, जैसे गीता जी का पाठ, भजन सुनना, माता-पिता एवम् बुजुर्गों का आदर आदि तथा जीव जो बुरे कर्म करते हैं जैसे माता-पिता से दुर्व्यवहार, असत्य बोलना एवम् ईर्ष्या आदि। जब मनुष्य इस ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त कर लेता है तत्पश्चात् वह समस्त प्रकार के कर्म फलों से मुक्त हो जाता है।

हम जानते हैं कि न जाने कितने ही योगी, तपस्वी ध्यान करते हुए, हिमालय की कन्दराओं (गुफाओं) में बैठे हैं। कुछ उनमें से अदृश्य भी होते हैं, ऐसी स्थिति तब आती है जब उनके शरीर में पृथ्वी तत्त्व लुप्त को जाता है। पृथ्वी तत्त्व की उपस्थिति के करण ही हम धरती में विद्यमान जीवों को देख पाते हैं।

मानव शरीर में कितने तत्त्व होते हैं?
पाँच होते हैं, आकाश, वायु, जल, अग्नि एवम् पृथ्वी।


जब हम तपस्या करते हैं, तब हमारे पास एक या दो ही तत्त्व शेष रह जाते हैं। जब किसी योगी के पास केवल दो तत्त्व- आकाश एवम् वायु ही शेष रहते हैं, तब वे भोजन त्याग कर वायु पर ही जीवित रहते हैं एवम् अदृश्य हो जाते हैं। वातावरण में विद्यमान यह परम ज्ञान अपने आप साधना से युक्त योगी में प्रवाहित होना प्रारम्भ कर देता है। ऐसे ही उदाहरण मीराबाई एवम् सूरदास जी हैं, जिन्होंने शुद्ध भक्ति द्वारा उस परम ज्ञान को प्राप्त कर ईश्वर की प्राप्ति की।

यह ज्ञान समस्त विद्याओं में सर्वेश्रेष्ठ है, इसे समस्त विद्याओं का राजा कहना उचित होगा, जो समस्त रहस्यों में सर्वाधिक गोपनीय है। यह परम शुद्ध है तथा चूँकि यह आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति कराने वाला है, अत: यह धर्म का सिद्धान्त है। यह अविनाशी है एवम् अत्यन्त सुखपूर्वक सम्पन्न किया जाता है।

9.3

अश्रद्दधानाः(फ्) पुरुषा, धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां(न्) निवर्तन्ते, मृत्युसंसारवर्त्मनि।।9.3।।

हे परंतप! इस धर्म की महिमा पर श्रद्धा न रखने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसार के मार्ग में लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।

विवेचन:- जो श्रद्धा से रहित हो भगवान् की पूजा-अर्चना करते हैं, वे इस मृत्यु लोक में बारम्बार आते हैं। जन्म-मृत्यु का यह चक्र चलता रहता है।

पृथ्वी को मृत्यु संसार क्यों कहते हैं? इस लोक में निरन्तर कोई न कोई जीव मृत्यु को प्राप्त होता है, अत: इसे मृत्युलोक कहते हैं। बार-बार जन्म एवम् मृत्यु का कारण कर्म भोग ही है। हम जैसे कर्म करते हैं, उसी अनुसार हमें जन्म मिलता है। यदि हम सात्त्विक कर्म करते हैं, तब हम मनुष्य जन्म प्राप्त करते हैं। बुरे या अच्छे कर्म न करने पर छिपकली आदि पशु जन्म प्राप्त होता है। अत: यदि हम गीता जी पढ़ेंगे, अनुसरण करेंगे, तब हमें मनुष्य जन्म ही प्राप्त होगा।

श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं - हे परन्तप! जो जीव, भक्ति में श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे कदापि प्राप्त नहीं कर पाते। अत: वे इस भौतिक सृष्टि में जन्म-मृत्यु के बन्धनों से युक्त हो निरन्तर इस मार्ग पर वापस आते रहते हैं।

प्रश्न: श्रीकृष्ण जी का जन्म किस जगह हुआ था?
उत्तर: कंस के कारागार में, जो मथुरा में स्थित है।

प्रश्न: श्रीकृष्ण जी के मामाश्री का क्या नाम था?
उत्तर: कंस। जिसने देवकी मैया के श्रीकृष्ण जी से पहले जन्में सात भाईयों को मार दिया था। श्रीकृष्ण जी के जन्म पर कारागार के द्वार स्वयम् खुल गये। अत्यधिक वर्षा के मध्य पिता वसुदेव, बाल श्रीकृष्ण जी को यमुना पार कर, गोकुल अपने मित्र नन्द बाबा के पास ले गये, जहाँ यशोदा माता द्वारा उनका पालन-पोषण किया गया।

परित्रणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
जब श्रीकृष्ण बड़े हो पुनः मथुरा वापस आते हैं तब अपने मामा कंस का वध कर अपने माता-पिता को कारागार से मुक्त करते हैं।

9.4

मया ततमिदं(म्) सर्वं(ञ्), जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि, न चाहं(न्) तेष्ववस्थितः।।9.4।।

यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूप से व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा (वे) प्राणी (भी) मुझ में स्थित नहीं हैं - मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग (सामर्थ्य) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियों को उत्पन्न करने वाला और प्राणियों का धारण, भरण-पोषण करने वाला मेरा स्वरूप उन प्राणियों में स्थित नहीं है। (9.4-9.5)

9.4 writeup

9.5

न च मत्स्थानि भूतानि, पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो, ममात्मा भूतभावनः।।9.5।।

विवेचन:- श्रीभगवान् के इस कथन को इस उदाहरण द्वारा समझने का प्रयास करते हैं-

बर्फ पानी से निर्मित हुई है परन्तु पानी उसमें नहीं दिखता, लेकिन पानी बर्फ में उपस्थित है। उसी प्रकार सृष्टि के कण-कण में ईश्वर विद्यमान हैं, परन्तु दिखते नहीं हैं। इसी प्रकार सम्पूर्ण सृष्टि में भगवान् हैं परन्तु दिखते नहीं हैं।

ज्ञानी पुरुष मानते हैं कि ईश्वर सृष्टि के रचयिता हैं। ईश्वर एवम् प्रकृति एक ही हैं, अर्थात् जिस प्रकार जल एवम् बर्फ एक ही तत्त्व से निर्मित हुए हैं, अत: एक ही हैं, परन्तु अज्ञानी पुरुष मानते हैं कि ईश्वर एवम् संसार पृथक-पृथक हैं एवम् सृष्टि के कण-कण में ईश्वर विद्यमान नहीं हैं, अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर के अव्यक्त रूप द्वारा व्याप्त नहीं है।

समस्त जीव मुझमें हैं, किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ। तथापि मेरे द्वारा उत्पन्न समस्त पदार्थ मुझमें स्थित नहीं रहते। मेरे योग ऐश्वर्य को देखो! यद्यपि मैं समस्त जीवों का पालनकर्ता हूँ तथा सर्वत्र व्याप्त हूँ, परन्तु मैं इस विराट अभिव्यक्ति का अंश नहीं हूँ, क्योंकि मैं इस सृष्टि का कारण स्वरूप हूँ।

9.6

यथाकाशस्थितो नित्यं(व्ँ), वायुः(स्) सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि, मत्स्थानीत्युपधारय॥9.6॥

जैसे सब जगह विचरने वाली महान् वायु नित्य ही आकाश में स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं - ऐसा तुम मान लो।

विवेचन:- श्रीभगवान् कहते हैं कि जैसे आकाश में नित्य वायु है, प्रत्येक स्थान पर है वैसे ही प्राणी भी मेरे भीतर हैं परन्तु जैसे वायु आकाश से लिप्त नहीं होती, वैसे ही मैं भी प्राणीमात्र से लिप्त नहीं होता। श्रीकृष्ण जी कितने सुदृढ़ हैं। हम बालक तो अपने पेंसिल बॉक्स से भी इतने लिप्त हो जाते हैं कि उसके टूट जाने का भी शोक मनाते हैं।
 
सर्वत्र प्रवाहमान प्रबल वायु, सदैव आकाश में स्थित रहती है, उसी प्रकार समस्त उत्पन्न प्राणियों को मुझमें स्थित जानो।

प्रश्न: भगवान् श्रीकृष्ण के बाल्य काल के प्रिय मित्र कौन थे?
उत्तर: सुदामा जी।

प्रश्न: भगवान् श्रीकृष्ण के शड्ख का क्या नाम था?
उत्तर: पाञ्चजन्य। जो भगवान् श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व बजाया था। युद्ध के प्रारम्भ में योद्धाओं में उत्साह उत्पन्न करने हेतु नगाड़े तथा अन्य प्रकार के वाद्य यन्त्र बजाए जाते हैं। हाथी, अश्वों सहित वाद्य-यन्त्रों के कोलाहल के मध्य युद्ध प्रारम्भ होता है।

प्रश्न: भगवान् श्रीकृष्ण की अँगुली पर धारण करने वाले अस्त्र का क्या नाम था?
उत्तर: सुदर्शन चक्र। शिशुपाल जो श्रीकृष्ण जी का सम्बन्धी भी था, श्रीकृष्ण जी से प्राप्त अभयदान के चलते उनसे अभद्रता करता है, उनसे अपशब्द कहता है। उसकी निन्यानवें भूलों तक तो श्रीकृष्ण जी ने उसे क्षमा किया परन्तु जैसे ही उसने सौवीं भूल की, दण्डस्वरूप उसका सिर श्रीकृष्ण जी ने अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया।

9.7

सर्वभूतानि कौन्तेय, प्रकृतिं(य्ँ) यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि, कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥9.7॥

हे कुन्तीनन्दन ! कल्पों का क्षय होने पर (महाप्रलय के समय) सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं (और) कल्पों के आदि में (महासर्ग के समय) मैं फिर उनकी रचना करता हूँ।

विवेचन:- हे कुन्तीपुत्र! कल्प का अन्त होने पर समस्त प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं अर्थात् कल्प के अन्त में श्रीभगवान् सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश कर देते हैं एवम् अन्य कल्प के प्रारम्भ होने पर मैं उन्हें स्वयम् की शक्ति से पुनः उत्पन्न करता हूँ।

श्लोक आठ हेतु आपको एक प्रश्न का उत्तर खोजना है-
श्रीभगवान् एवम् मनुष्य में क्या अन्तर है?

आगे का विवेचन अगले सप्ताहान्त इसी प्रश्न के उत्तर के साथ प्रारम्भ होगा।
             

विचार - मन्थन (प्रश्नोत्तर):-

प्रश्नकर्ता: आदिशक्ति जी

प्रश्न: श्रीकृष्ण जी को यशोदा मैया को देकर उनकी सन्तान योगमाया जी को वसुदेव जी लेकर आ गए थे और कंस ने उनका वध कर दिया था, तो सुभद्रा जी कैसे श्रीकृष्ण जी की बहन हुईं?

उत्तर: योगमाया जी को कंस ने मारने का प्रयास तो किया, परन्तु मार नहीं पाया। योगमाया जी कंस के हाथों से निकल कर अपने शक्ति (दुर्गा) स्वरूप में आ गई और कंस उन्हें मार नहीं पाया। उन्होंने घोषणा भी कर दी- हे कंस! तुम्हें मारने वाले का जन्म हो चुका है।

जैसे हमारे अन्य भी भाई-बहन होते हैं। उसी तरह सुभद्रा जी उनकी दूसरी बहन थीं।

प्रश्नकर्ता: संवित जी

प्रश्न : हमारे ऋषि-मुनि हिमालय जाकर तपस्या करते थे, ये तो बहुत कठिन है?

उत्तर: तपस्या करना तो कठिन होता ही है। अब आपको अच्छे प्राप्तॉंक लाने हैं, यह कठिन तो है ही परन्तु निरन्तर अभ्यास (तपस्या) करने से अच्छे प्राप्तॉंक अवश्य आयेंगे। उसी भाँति तपस्या द्वारा निरन्तर अभ्यास (जप, स्मरण) करने से ही श्रीभगवान् प्राप्त हो सकते हैं।

प्रश्नकर्ता: इशिका जी

प्रश्न: पहले श्लोक का अर्थ एक बार फिर से बताएँ।

उत्तर: पहले श्लोक में श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं कि इस  ज्ञान को तुम्हें पुनः (फिर से) बता रहा हूँ, क्योंकि तुम अनसूय (दोष- दृष्टि रहित) हो। इसे जानकर तुम दु:खरूप संसार से मुक्त हो जाओगे।

प्रश्नकर्ता: मधुश्री जी

प्रश्न: श्रीकृष्ण जी को यशोदा मैया ने पाला। बाद में वो कंस को मारने मथुरा गए। उसके बाद क्या वो यशोदा मैया के पास फिर से गए थे?

उत्तर: नहीं, उसके बाद वो फिर से यशोदा मैया के पास नहीं गए। उनकी बहुत यात्रा चलती रही ।


           ।। ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।