विवेचन सारांश
विज्ञानसहित ज्ञान- ईश्वर की अनुभूति
सर्वज्ञ होने का अहम् लिए उस पुत्र को यह कहाँ पता था कि उसके पिताजी उससे जो प्रश्न पूछेंगे, वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सर्वाधिक कठिन प्रश्न होने वाला था। जिसका उत्तर उपनिषद के एक सम्पूर्ण अध्याय में समाहित हुआ।
इसका उत्तर श्वेतकेतु न दे सका। उसका समस्त अभिमान स्वतः ही विलुप्त हो गया। प्रारम्भ में तो उसने इस विषय में अपने शिक्षकों द्वारा न समझाए जाने का दोष दिया, परन्तु अन्त में पिताजी से अपने इस व्यवहार हेतु क्षमा माँगते हुए, प्रश्न का उत्तर पूछा।
प्रश्न- मत्स्य देश के राजा का क्या नाम था?
उत्तर- राजा विराट। राजा विराट के राज्य में आश्रय लेते हुए पाण्डवों ने अपना अज्ञातवास पूर्ण किया था।
प्रश्न- श्रीकृष्ण जी के माता-पिता का क्या नाम था?
उत्तर- माता का नाम देवकी एवम् पिता का नाम वसुदेव।
प्रश्न- श्रीकृष्ण जी के भाई एवम् बहन का क्या नाम था?
उत्तर- भाई का नाम बलराम एवम् बहन का नाम सुभद्रा।
9.1
श्रीभगवानुवाच
इदं(न्) तु ते गुह्यतमं(म्), प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं(व्ँ) विज्ञानसहितं(य्ँ), यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥9.1॥
ज्ञान- ब्रह्मज्ञान- ईश्वर की उपस्थिति का ज्ञान।
विज्ञान- अनुभूत ज्ञान- ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव करना।
ज्ञान का अर्थ तो हम समस्त समझते हैं परन्तु यहाँ विज्ञान का अर्थ स्पष्ट करने की आवश्यकता है।
गीता जी में अट्ठारह अध्याय हैं परन्तु नवें अध्याय में कर्म, ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय है। इसमें सम्पूर्ण गीता जी आ जाती है। जिसको जानने के पश्चात् मनुष्य संसार के सभी क्लेशों से मुक्त हो जाएगा।
राजविद्या राजगुह्यं(म्), पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं(न्) धर्म्यं(म्), सुसुखं(ङ्) कर्तुमव्ययम्।।9.2।।
भैस के आगे बीन बजाए, भैस खड़ी पगुराय।
अर्थात् भैस के आगे बीन बजाने से वह नाच नहीं करती, क्योंकि बीन की ध्वनि उसके समझ से परे होती है। उसी प्रकार जो अज्ञानी हैं, वे इस ज्ञान को नहीं समझ पाते। जो पूर्ण श्रद्धा के साथ श्रीभगवान् की पूजा, भजन आदि करते हैं, वे ही इस ज्ञान को समझ पाते हैं। इस ज्ञान को विज्ञान के साथ समझने वाले बलवान बन जाते हैं, वे पवित्र हो जाते हैं।
हमारे कितने पुनर्जन्म हुए हैं, यह कभी आपने सोचा है? कहा गया है कि-
अर्थ: मेरे एवम् तुम्हारे अनन्त जन्म हुए हैं, जो गणना से परे हैं। हम भिन्न-भिन्न रूपों में आते हैं। जो जीव अच्छे कर्म करते हैं, जैसे गीता जी का पाठ, भजन सुनना, माता-पिता एवम् बुजुर्गों का आदर आदि तथा जीव जो बुरे कर्म करते हैं जैसे माता-पिता से दुर्व्यवहार, असत्य बोलना एवम् ईर्ष्या आदि। जब मनुष्य इस ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त कर लेता है तत्पश्चात् वह समस्त प्रकार के कर्म फलों से मुक्त हो जाता है।
हम जानते हैं कि न जाने कितने ही योगी, तपस्वी ध्यान करते हुए, हिमालय की कन्दराओं (गुफाओं) में बैठे हैं। कुछ उनमें से अदृश्य भी होते हैं, ऐसी स्थिति तब आती है जब उनके शरीर में पृथ्वी तत्त्व लुप्त को जाता है। पृथ्वी तत्त्व की उपस्थिति के करण ही हम धरती में विद्यमान जीवों को देख पाते हैं।
पाँच होते हैं, आकाश, वायु, जल, अग्नि एवम् पृथ्वी।
जब हम तपस्या करते हैं, तब हमारे पास एक या दो ही तत्त्व शेष रह जाते हैं। जब किसी योगी के पास केवल दो तत्त्व- आकाश एवम् वायु ही शेष रहते हैं, तब वे भोजन त्याग कर वायु पर ही जीवित रहते हैं एवम् अदृश्य हो जाते हैं। वातावरण में विद्यमान यह परम ज्ञान अपने आप साधना से युक्त योगी में प्रवाहित होना प्रारम्भ कर देता है। ऐसे ही उदाहरण मीराबाई एवम् सूरदास जी हैं, जिन्होंने शुद्ध भक्ति द्वारा उस परम ज्ञान को प्राप्त कर ईश्वर की प्राप्ति की।
यह ज्ञान समस्त विद्याओं में सर्वेश्रेष्ठ है, इसे समस्त विद्याओं का राजा कहना उचित होगा, जो समस्त रहस्यों में सर्वाधिक गोपनीय है। यह परम शुद्ध है तथा चूँकि यह आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति कराने वाला है, अत: यह धर्म का सिद्धान्त है। यह अविनाशी है एवम् अत्यन्त सुखपूर्वक सम्पन्न किया जाता है।
अश्रद्दधानाः(फ्) पुरुषा, धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां(न्) निवर्तन्ते, मृत्युसंसारवर्त्मनि।।9.3।।
पृथ्वी को मृत्यु संसार क्यों कहते हैं? इस लोक में निरन्तर कोई न कोई जीव मृत्यु को प्राप्त होता है, अत: इसे मृत्युलोक कहते हैं। बार-बार जन्म एवम् मृत्यु का कारण कर्म भोग ही है। हम जैसे कर्म करते हैं, उसी अनुसार हमें जन्म मिलता है। यदि हम सात्त्विक कर्म करते हैं, तब हम मनुष्य जन्म प्राप्त करते हैं। बुरे या अच्छे कर्म न करने पर छिपकली आदि पशु जन्म प्राप्त होता है। अत: यदि हम गीता जी पढ़ेंगे, अनुसरण करेंगे, तब हमें मनुष्य जन्म ही प्राप्त होगा।
श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं - हे परन्तप! जो जीव, भक्ति में श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे कदापि प्राप्त नहीं कर पाते। अत: वे इस भौतिक सृष्टि में जन्म-मृत्यु के बन्धनों से युक्त हो निरन्तर इस मार्ग पर वापस आते रहते हैं।
प्रश्न: श्रीकृष्ण जी का जन्म किस जगह हुआ था?
उत्तर: कंस के कारागार में, जो मथुरा में स्थित है।
प्रश्न: श्रीकृष्ण जी के मामाश्री का क्या नाम था?
उत्तर: कंस। जिसने देवकी मैया के श्रीकृष्ण जी से पहले जन्में सात भाईयों को मार दिया था। श्रीकृष्ण जी के जन्म पर कारागार के द्वार स्वयम् खुल गये। अत्यधिक वर्षा के मध्य पिता वसुदेव, बाल श्रीकृष्ण जी को यमुना पार कर, गोकुल अपने मित्र नन्द बाबा के पास ले गये, जहाँ यशोदा माता द्वारा उनका पालन-पोषण किया गया।
मया ततमिदं(म्) सर्वं(ञ्), जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि, न चाहं(न्) तेष्ववस्थितः।।9.4।।
न च मत्स्थानि भूतानि, पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो, ममात्मा भूतभावनः।।9.5।।
बर्फ पानी से निर्मित हुई है परन्तु पानी उसमें नहीं दिखता, लेकिन पानी बर्फ में उपस्थित है। उसी प्रकार सृष्टि के कण-कण में ईश्वर विद्यमान हैं, परन्तु दिखते नहीं हैं। इसी प्रकार सम्पूर्ण सृष्टि में भगवान् हैं परन्तु दिखते नहीं हैं।
ज्ञानी पुरुष मानते हैं कि ईश्वर सृष्टि के रचयिता हैं। ईश्वर एवम् प्रकृति एक ही हैं, अर्थात् जिस प्रकार जल एवम् बर्फ एक ही तत्त्व से निर्मित हुए हैं, अत: एक ही हैं, परन्तु अज्ञानी पुरुष मानते हैं कि ईश्वर एवम् संसार पृथक-पृथक हैं एवम् सृष्टि के कण-कण में ईश्वर विद्यमान नहीं हैं, अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर के अव्यक्त रूप द्वारा व्याप्त नहीं है।
यथाकाशस्थितो नित्यं(व्ँ), वायुः(स्) सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि, मत्स्थानीत्युपधारय॥9.6॥
उत्तर: सुदामा जी।
प्रश्न: भगवान् श्रीकृष्ण के शड्ख का क्या नाम था?
उत्तर: पाञ्चजन्य। जो भगवान् श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व बजाया था। युद्ध के प्रारम्भ में योद्धाओं में उत्साह उत्पन्न करने हेतु नगाड़े तथा अन्य प्रकार के वाद्य यन्त्र बजाए जाते हैं। हाथी, अश्वों सहित वाद्य-यन्त्रों के कोलाहल के मध्य युद्ध प्रारम्भ होता है।
प्रश्न: भगवान् श्रीकृष्ण की अँगुली पर धारण करने वाले अस्त्र का क्या नाम था?
उत्तर: सुदर्शन चक्र। शिशुपाल जो श्रीकृष्ण जी का सम्बन्धी भी था, श्रीकृष्ण जी से प्राप्त अभयदान के चलते उनसे अभद्रता करता है, उनसे अपशब्द कहता है। उसकी निन्यानवें भूलों तक तो श्रीकृष्ण जी ने उसे क्षमा किया परन्तु जैसे ही उसने सौवीं भूल की, दण्डस्वरूप उसका सिर श्रीकृष्ण जी ने अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया।
सर्वभूतानि कौन्तेय, प्रकृतिं(य्ँ) यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि, कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥9.7॥
श्लोक आठ हेतु आपको एक प्रश्न का उत्तर खोजना है-
श्रीभगवान् एवम् मनुष्य में क्या अन्तर है?
आगे का विवेचन अगले सप्ताहान्त इसी प्रश्न के उत्तर के साथ प्रारम्भ होगा।
विचार - मन्थन (प्रश्नोत्तर):-
प्रश्नकर्ता: आदिशक्ति जी
प्रश्न: श्रीकृष्ण जी को यशोदा मैया को देकर उनकी सन्तान योगमाया जी को वसुदेव जी लेकर आ गए थे और कंस ने उनका वध कर दिया था, तो सुभद्रा जी कैसे श्रीकृष्ण जी की बहन हुईं?
उत्तर: योगमाया जी को कंस ने मारने का प्रयास तो किया, परन्तु मार नहीं पाया। योगमाया जी कंस के हाथों से निकल कर अपने शक्ति (दुर्गा) स्वरूप में आ गई और कंस उन्हें मार नहीं पाया। उन्होंने घोषणा भी कर दी- हे कंस! तुम्हें मारने वाले का जन्म हो चुका है।
जैसे हमारे अन्य भी भाई-बहन होते हैं। उसी तरह सुभद्रा जी उनकी दूसरी बहन थीं।
प्रश्नकर्ता: संवित जी
प्रश्न : हमारे ऋषि-मुनि हिमालय जाकर तपस्या करते थे, ये तो बहुत कठिन है?
उत्तर: तपस्या करना तो कठिन होता ही है। अब आपको अच्छे प्राप्तॉंक लाने हैं, यह कठिन तो है ही परन्तु निरन्तर अभ्यास (तपस्या) करने से अच्छे प्राप्तॉंक अवश्य आयेंगे। उसी भाँति तपस्या द्वारा निरन्तर अभ्यास (जप, स्मरण) करने से ही श्रीभगवान् प्राप्त हो सकते हैं।
प्रश्नकर्ता: इशिका जी
प्रश्न: पहले श्लोक का अर्थ एक बार फिर से बताएँ।
उत्तर: पहले श्लोक में श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं कि इस ज्ञान को तुम्हें पुनः (फिर से) बता रहा हूँ, क्योंकि तुम अनसूय (दोष- दृष्टि रहित) हो। इसे जानकर तुम दु:खरूप संसार से मुक्त हो जाओगे।
प्रश्नकर्ता: मधुश्री जी
प्रश्न: श्रीकृष्ण जी को यशोदा मैया ने पाला। बाद में वो कंस को मारने मथुरा गए। उसके बाद क्या वो यशोदा मैया के पास फिर से गए थे?
उत्तर: नहीं, उसके बाद वो फिर से यशोदा मैया के पास नहीं गए। उनकी बहुत यात्रा चलती रही ।
।। ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।