विवेचन सारांश
जीवात्मा की स्थिति
सनातन वैदिक परम्परा का पालन करते हुए, दीप प्रज्वलन, गुरु वन्दना, प्रारम्भिक प्रार्थना के साथ सत्र का आरम्भ हुआ। केवल गीताजी में ही श्रीभगवान ने यह बात कही है-
आप किस विधि से मेरी साधना करते हैं?
उससे कोई अन्तर नहीं पड़ता।
आपके अन्दर कितना परिवर्तन आया?
अन्तर उस बात से पड़ता है।’
भक्ति के कितने गुण आप में आए? मैत्री, करुणा, दया, मार्ग से अन्तर नहीं पड़ता, बल्कि लक्ष्य और गन्तव्य तक पहुँचना महत्त्वपूर्ण होता है। एकमात्र श्रीमद्भगवद्गीता है जिससे सभी सम्प्रदाय सहमत हैं। श्रीभगवान ने अपने धाम का पता इस अध्याय में बताया है।
15.7
ममैवांशो जीवलोके, जीवभूतः(स्) सनातनः।
मनः(ष्) षष्ठानीन्द्रियाणि, प्रकृतिस्थानि कर्षति।।7।।
पुरातन- अर्थात् बहुत पुराना, लाखों साल पुराना। पुराण सबसे पुराने हैं। सनातन- जिसका आदि और अन्त नहीं है। मैं जितना पुराना हूॅं, उतने ही पुराने तुम हो।
जब हम व्यापकता की बात करते हैं।
व्यष्टि-
जब हम बात को सङ्कुचित करते हैं।
श्रीभगवान कहते हैं कि अर्जुन तुम मेरा ही अंश हो। न मेरा आदि है न अन्त है। जीवात्मा की चार स्थितियाँ हैं।
पहली है परमात्मा- हम अपने दु:खों से परेशान हैं। सन्तों को सभी के दु:खों की चिन्ता होती है इसलिए सन्त की दृष्टि समष्टि और हमारी दृष्टि व्यष्टि है। परमात्मा समष्टि हैं। आत्मा- जब तक उसमें कर्म का भाव नहीं जुड़ा। आत्मा से हमारे पाप-पुण्य, कर्म-बन्धन जुड़ गए, तो वह जीवात्मा हो जाती है। शुभ-अशुभ कर्मों को भोगने के लिए शरीर धारण करना पड़ेगा। जीवात्मा किसी देह में प्रविष्ट हो जाती है तो वह देहधारी हो जाती है।
"जो जग में रहूँ तो ऐसे रहूँ
ज्यों जल में कमल का फूल रहे"
इस संसार में जो वासनाओं का स्पर्श नहीं करता, वह आत्म-तत्त्व को प्राप्त कर लेता है।
एक सुन्दर भजन है-
शरीरं(य्ँ) यदवाप्नोति, यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति, वायुर्गन्धानिवाशयात्॥15.8॥
जब नये तारों को वैज्ञानिकों ने खोजा है, तो रीगल नामक तारा आर्केटस से भी कई गुना बड़ा है। इसी प्रकर जब एण्टारस के सामने देखते हैं तो हमारा सूर्य दिखता भी नहीं है। जिस सूर्य के सामने हमारी पृथ्वी बिन्दी जैसी दिखती है, वह सूर्य एण्टारस के सामने बिन्दी जैसा दिखता है।
वैज्ञानिकों ने नए तारे को खोजा है, उसके सामने तो हमारा सूर्य दिखता भी नहीं है। नासा ने कहा है, इससे भी बड़े-बड़े तारे हैं। वहाॅं तक तो हम पहुॅंच भी नहीं पाए हैं। यह तो एक ब्रह्माण्ड की बात है। ऐसे कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड हैं। हम सब कुछ जानना चाहते हैं, पर हमारी क्षमता इतनी नहीं है। हमें ऐसा लगता है कि सबकी आत्मा अलग-अलग है।
और जीवात्मा का सिद्धान्त दिया गया है।
हम बाहर खड़े होकर आकाश को देखते हैं और घर के अन्दर भी आकाश वही होता है। केवल उसका तापमान अलग होता है। घर में घड़ा है, उस घड़े के अन्दर भी आकाश है। घर के अन्दर का आकाश, घर के बाहर का आकाश और घड़े के अन्दर का आकाश एक ही है या अलग अलग है? तापमान अलग-अलग दिखता है, लेकिन आकाश एक ही है।
घटाकाश को हमारा शरीर समझ लीजिए।
जब इस शरीर में जीवात्मा प्रवेश करती है, तो मन और पाॅंच इन्द्रियाॅं होती है। इसी तरह परमात्मा, आत्मा तथा जीवात्मा अलग-अलग नहीं हैं। उनका स्वरूप अलग-अलग दिखता है।
इसे एक और उदाहरण से समझते हैं-
हम सब घर में बिजली का उपयोग करते हैं। विद्युत गृह से विद्युत शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में वितरित होती है। वह विद्युत सोसाइटी के ट्रांसफार्मर में आई, उससे घर के विद्युत-मीटर में, उससे हमारे घर के प्रत्येक स्विच बोर्ड में लेकिन पड़ोसी की बिजली का बिल हमारे बिजली के बिल से अलग होता है। मूल में हम एक ही हैं।
हमारे शुभ-अशुभ पाप -पुण्य कर्मों के अनुसार हमें देह मिलती है। हम अलग-अलग शरीर धारण करके, अपने पाप-पुण्य को भोगते हैं। यह गहरी बात है, लेकिन हम गीता पढ़ने वालो लोगों को यह लाभ होता है कि हमें यह बात समझने को मिलती है। वायु से कोई चीज चिपकती नहीं है। अगर दुर्गन्ध या सुगन्ध वायु के निकट से जाएगी तो भी वह वायु से नहीं चिपकती है, वह वायु के साथ हमेशा के लिए नहीं होती है। जीवात्मा भी कर्मों में लिप्त नहीं होती है। मान लीजिये एक दीवार है। वह उत्तर की ओर झुक गई तो वह कभी भी गिरे, साल भर बाद या वर्षों बाद, वह उत्तर की ओर ही गिरेगी।
जिसने अपना पूरा जीवन अहङ्कार में बिताया है, अन्त समय में उसे अहङ्कार ही याद आएगा। जिसने अपना पूरा जीवन मान -प्रतिष्ठा में बिताया है, उसे मान-प्रतिष्ठा ही याद आएगी। जिसने अपना पूरा जीवन धन की लालसा में बिताया, उसे धन ही याद आएगा। जिस प्रवृत्ति में हम पूरा जीवन बिताते हैं, अन्त समय में वही प्रवृत्ति याद आती है।
श्रोत्रं(ञ्) चक्षुः(स्) स्पर्शनं(ञ्) च, रसनं(ङ्) घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं(व्ँ), विषयानुपसेवते॥15.9॥
उत्क्रामन्तं(म्) स्थितं(व्ँ) वापि, भुञ्जानं(व्ँ) वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति, पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥15.10॥
उस शरीर के द्वारा भोगों में रम गया, उसे कहा गया भुञ्जान्।
गोस्वामी जी ने कहा है -
मुझे उतना पता चला कि
मैं और कितना नहीं जानता।"
एक कहावत भी है-
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं।
और
यतन्तो योगिनश्चैनं(म्), पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो,नैनं(म्) पश्यन्त्यचेतसः।।11।।
पूजा का यत्न तो किया किन्तु अन्त:करण को शुद्ध करने का कोई यत्न नहीं किया। अन्तःकरण को स्वच्छ नहीं किया, तब तक जीवन में पूजा की उपलब्धता सार्थक नहीं होगी। अन्तःकरण से झूठ, कपट, वासना, पाप, द्वेष को मिटाना है। इस हृदय में न दया, न करुणा, न मैत्री, न प्रेम, न उदारता, न त्याग तो क्या लाभ? श्रीभगवान अन्तःकरण की शुद्धता को अधिक महत्त्व देते हैं। अपनी कमजोरियों को पहचान कर उसे ठीक करना चाहिये।
यदादित्यगतं(न्) तेजो, जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ,तत्तेजो विद्धि मामकम्।।12।।
गामाविश्य च भूतानि, धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः(स्) सर्वाः(स्), सोमो भूत्वा रसात्मकः।।13।।
अहं(व्ँ) वैश्वानरो भूत्वा, प्राणिनां(न्) देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः(फ्), पचाम्यन्नं(ञ्) चतुर्विधम्॥15.14॥
एक दावाग्नि, जो जङ्गल में होती है।
एक जठराग्नि, जो पेट में होती है।
और वैश्वानर अग्नि,
श्रीभगवान कहते हैं कि वैश्ववानर अग्नि के रूप में चार प्रकार के भोजन को मैं ही पचाता हूॅं।
चबाकर, चाट कर ,पीकर, चूस कर खाने वाले।
सर्वस्य चाहं(म्) हृदि सन्निविष्टो, मत्तः(स्) स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं(ञ्) च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो, वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।15।।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके, क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः(स्) सर्वाणि भूतानि, कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।16।।
उत्तमः(फ्) पुरुषस्त्वन्यः(फ्), परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य, बिभर्त्यव्यय ईश्वरः।।17।।
श्रीभगवान कहते हैं कि यह बात ठीक है कि तुम मेरे अंश हो, लेकिन क्या तुम मुझे बना सकते हो? अर्थात् ईश्वर ने हमें बनाया किन्तु हम ईश्वर को नहीं बना सकते। हम उनके ही अंश हैं, हमारी शक्तियाँ वैसी ही हैं, फिर भी हमारी शक्तियाँ सीमित हैं इसलिए श्रीभगवान कहते हैं कि मैं इनसे उत्तम हूँ और उत्तम होने के कारण ही मुझे परम ईश्वर अर्थात् परमेश्वर या परम आत्मा या परमात्मा कहा जाता है।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहम्, अक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च, प्रथितः(फ्) पुरुषोत्तमः।।18।।
यो मामेवमसम्मूढो, जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां(म्),सर्वभावेन भारत।।19।।
इति गुह्यतमं(म्) शास्त्रम्, इदमुक्तं(म्) मयानघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्, कृतकृत्यश्च भारत।।20।।
अनुसूय वह है जो किसी दूसरे की निन्दा नहीं करता,
दोष नहीं निकालता।
गुह्य की तीन श्रेणियाँ होती हैं-
गुह्य, गुह्यतर तथा गुह्यतम।
जो यह मणि हित जतन कराहीं ||
बसइ गरुड़ जाके उर अन्तर ॥
प्रश्नोत्तर:-
प्रश्नकर्ता- एन. आर. रमन भैया
प्रश्न- मनुष्य यदि केवल अन्तकाल में ईश्वर का ध्यान करता है तो क्या उसका कल्याण होता है?
उत्तर- अर्जुन ने प्रश्न किया कि यह बात सही है कि मैंने पूरा जीवन शास्त्रोक्त जिया है, कभी कोई पाप नहीं किया है, किन्तु आप जिस प्रकार की भक्ति कह रहे हैं, उसमें मैं ठहर पाऊँगा कि नहीं? कहीं मेरी स्थिति छिन्न-भिन्न बादलों जैसी तो नहीं हो जाएगी? तब श्रीभगवान ने कहा कि जो एक बार मेरे मार्ग पर लग गया, इस जन्म में कल्याण नहीं होगा तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि इस जीवन में श्रीभगवान का चिन्तन करने का भाव मन में आ गया तो अगले जन्म में-
“शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ।।”
अर्थात् वह शुचिमान्, पवित्र आत्माओं के बीच में श्रीमान् पुरुष होकर जन्म लेता है और जहाँ तक की यात्रा इस जन्म में हो गयी, वहाँ से आगे की यात्रा आरम्भ करता है, इसलिए जीवन के किसी भी अवसर पर यदि मैं सन्मार्ग पर लग गया, तो आगे की यात्रा के लिये हमें ईश्वर की कृपा से मार्ग मिलता जाता है। आपने देखा होगा कि छोटे-छोटे, तीन-चार वर्ष के बालक श्रीमद्भगवद्गीता को कण्ठस्थ कर लेते हैं। वे पूर्वजन्मों के गीताव्रती हैं। वे केवल अभ्यास करते हैं और बोलने लगते हैं। उन्हें बाल्यकाल में ही इस प्रकार के गुरु मिल जाते हैं और उन्हें सात्त्विकता प्राप्त हो जाती है।
प्रश्नकर्ता- रेणु धवन दीदी
प्रश्न- हम उपासना तो करते हैं, किन्तु अन्तःकारण शुद्ध नहीं है तो फल नहीं मिलता, तो हम अन्तःकरण को शुद्ध कैसे करें?
उत्तर- ऐसा नहीं है कि फल नहीं मिलता। उसका फल भी मिलता है, पुण्य भी मिलता है और उस कारण हमारे अगले जन्म की वृत्तियाँ अच्छी होंगी, किन्तु इस जीवन में तत्त्वज्ञान नहीं होगा। इस जीवन में ईश्वर नहीं मिलेंगे। अन्तःकरण की शुद्धता के लिये श्रीभगवान ने भक्त के जो उन्तालीस लक्षण बताये हैं, उन्हीं को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।
प्रश्नकर्ता- कन्दर्प अनुराधा दीदी
प्रश्न- हमारे आस-पास अनेक ऐसे व्यक्ति होते हैं जो नकारात्मक मानसिकता के होते हैं, किन्तु हम उन्हें छोड़ भी नहीं सकते। ऐसे में व्यक्ति सात्त्विक रहने का प्रयास कैसे करें?
उत्तर- यदि आपकी सात्त्विकता दूसरे व्यक्ति के कारण नष्ट हो रही है तो वह सात्त्विकता नहीं है बल्कि राजसिकता है। वास्तव में हम स्वयं को तो सात्त्विक मानते हैं और दूसरों को नकारात्मक मानते हैं। जैसे हमें दूसरों की कोई बात प्रिय नहीं होती, वैसे ही उन्हें भी हमारी अनेक बातें अप्रिय हो सकती हैं इसलिए हमें किसी को छोड़ना नहीं है, बल्कि सहज रह कर उन बातों का प्रभाव अपने ऊपर नहीं होने देना है।
प्रश्नकर्ता- शेफाली दीदी
प्रश्न- इस ग्रन्थ का नाम श्रीमद्भगवद्गीता कैसे पड़ा?
उत्तर- श्री से युक्त यह श्रीभगवान द्वारा स्वयं गाया गया, इसलिये इसका नाम श्रीमद्भगवद्गीता पड़ा। गीता का अर्थ है गाकर कहा गया। केवल यही एक गीताजी नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग ग्रन्थों में अट्ठारह प्रकार की प्रमुख गीताएँ हैं। जैसे अष्टावक्र गीता, श्रीराम गीता आदि।
इसका महत्त्व इसलिये अधिक है क्योंकि इसे श्रीभगवान ने रण के मैदान में मोक्ष का उपदेश देने के लिये कहा है। यह विलक्षण है। यह एकमात्र ग्रन्थ है, जिसकी जयन्ती मनायी जाती है। यह अलग ग्रन्थ नहीं है, बल्कि महाभारत का सात सौ श्लोकों का एक छोटा सा भाग है।
प्रश्नकर्ता- हेमन्त भैया
प्रश्न- हम बोलते हैं कि जीवात्मा सनातन है, दूसरी तरफ हम कहते हैं कि यह चौदह लोकों में विचरण करती है, अलग-अलग योनियों में जन्म लेती है तो सृष्टि बनने के पहले या उसके बाद यह जीवात्मा कहाँ होती है?
उत्तर- यह प्रश्न हमारे मस्तिष्क में इसलिये आता है क्योंकि हम जन्म लेते हैं और हमारी मृत्यु हो जाती है। श्रीभगवान ने हमें अनन्त को समझने की शक्ति नहीं दी है। श्रीभगवान ने कहा है-
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा
अर्थात् जिसका न आदि है और न अन्त है, लेकिन यह बात हमारे मस्तिष्क में बैठती ही नहीं। सृष्टि अनन्त है। जो हम आज देखते हैं, वह करोड़ों वर्ष पूर्व हो चुका होता है और जो आज हो रहा है, अरबों वर्ष बाद दिखेगा। यह अनन्त है।
प्रश्नकर्ता- हेमन्त भैया
प्रश्न- अक्सर हम कहते हैं कि यह पिछले जन्म के कर्मों का फल है। हमें कैसे पता चलेगा कि यह पिछले जन्म का फल है या इस जन्म का?
उत्तर- श्रीभगवान कहते हैं कि कर्म की गति अति गहन है। इसे सामान्य बुद्धि से समझना असम्भव है। तीन प्रकार के फल होते हैं- एक त्वरित फल, जैसे मुझे किसी ने थप्पड़ मारा, मैंने उसे पलट कर थप्पड़ मार दिया। दूसरा है सञ्चित फल, जैसे मुझे किसी ने थप्पड़ मारा तो मैं सोचूँगा कि मौका देखकर बाद में मारूँगा और एक होता है कि पूरा जीवन बीत गया, मैं प्रतीक्षा करता रह गया तो वह फल शेष रह गया। अब यह हमारा प्रारब्ध बन गया। अगले जन्म में निपटेगा। यह कर्मफल का सिद्धान्त है। इसे कोई नहीं जान सकता। नैसर्गिक रूप से जो स्थिति आती है उसी के अनुसार यह तय होता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्याय:॥