विवेचन सारांश
सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया
बालकों के लिए आयोजित इस विशेष विवेचन सत्र का आरम्भ प्रार्थना और दीप प्रज्जवलन के साथ हुआ। उसके पश्चात बालकों के साथ एक प्रश्न के उत्तर को लेकर सम्भाषण हुआ। पिछले सत्र में आठवें श्लोक की भूमिका के रूप में बालकों से पूछा गया था कि श्रीभगवान एवं मनुष्य में क्या अन्तर है ?
सभी बालक इस प्रश्न के उत्तर को लेकर तैयार और बहुत उत्साहित थे। उनके द्वारा दिए गए कुछ उत्तर इस प्रकार थे -
* भगवान अनश्वर (इनफाइनाईट) हैं जबकि मनुष्य नश्वर (फाइनाईट) है।
* भगवान का वर्णन नहीं किया जा सकता जबकि मनुष्य का वर्णन किया जा सकता है।
* भगवान निराकार और साकार (फॉर्मलेस और फॉर्म) दोनों रूपों में हो सकते हैं मनुष्य केवल साकार (एक फार्म) रूप में ही हो सकता है।
* भगवान सभी जगह होते हैं मनुष्य केवल धरती पर होता है।
* भगवान सत्य और अमर हैं, मरने पर मनुष्य भगवान के पास ही जाता है।
* भगवान में कोई दोष नहीं होता, मनुष्य में तो कुछ ना कुछ दोष होते ही हैं।
सभी बालक इस प्रश्न के उत्तर को लेकर तैयार और बहुत उत्साहित थे। उनके द्वारा दिए गए कुछ उत्तर इस प्रकार थे -
* भगवान अनश्वर (इनफाइनाईट) हैं जबकि मनुष्य नश्वर (फाइनाईट) है।
* भगवान का वर्णन नहीं किया जा सकता जबकि मनुष्य का वर्णन किया जा सकता है।
* भगवान निराकार और साकार (फॉर्मलेस और फॉर्म) दोनों रूपों में हो सकते हैं मनुष्य केवल साकार (एक फार्म) रूप में ही हो सकता है।
* भगवान सभी जगह होते हैं मनुष्य केवल धरती पर होता है।
* भगवान सत्य और अमर हैं, मरने पर मनुष्य भगवान के पास ही जाता है।
* भगवान में कोई दोष नहीं होता, मनुष्य में तो कुछ ना कुछ दोष होते ही हैं।
9.7
सर्वभूतानि कौन्तेय, प्रकृतिं(य्ँ) यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि, कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥9.7॥
हे कुन्तीनन्दन ! कल्पों का क्षय होने पर (महाप्रलय के समय) सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं (और) कल्पों के आदि में (महासर्ग के समय) मैं फिर उनकी रचना करता हूँ।
विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं कि सारी सृष्टि की रचना भी मैं करता हूँ और उसे नष्ट भी मैं करता हूँ। यह बात सुनने पर हमारे मन में अनेक प्रश्न उठते हैं इस सृष्टि की रचना क्यों की जाती है, इसे कैसे बनाया जाता है? इन प्रश्नों का उत्तर हमें एक उपनिषद में मिलता है।
उपनिषद में बताया गया है कि ब्रह्माजी की इच्छा थी कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ, तो इस तरह पञ्चमहाभूत बनाए। पञ्चमहाभूत हैं आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। सबसे पहले परम तत्त्व से आकाश बना,आकाश हर जगह होता है हमें दिखाई नहीं देता लेकिन होता है। उसके बाद आकाश से वायु बनी जो एक बहुत विस्तृत तत्त्व है, फिर वायु से तेज बना जिसे हम अग्नि के रूप में जानते हैं। अग्नि से जल बना और फिर जल से यह पृथ्वी बनी। पृथ्वी अर्थात हमें जो गोलाकार दिखाई देता है केवल वह नहीं, जब हम पृथ्वी कहते हैं तो इसका मतलब होता है गन्ध। तो इस प्रकार यह पञ्चमहाभूत बने और इन्हीं महाभूतों से पूरा संसार बना है। हमारा शरीर भी इन्हीं महाभूतों से बना है।
अब इन पाँच तत्त्वों से हमारा शरीर बना है, इसका प्रमाण (प्रूफ) हम देते हैं तो देखो इसका क्या प्रमाण है-

आकाश पहला तत्त्व है जिसका गुण है शब्द, आकाश से ही शब्द आता है। आपने गीता परिवार का बैनर देखा होगा उसमें एक हाथ दिखाया है, हाथ में एक डमरू होता है और उस डमरू से शब्द निकलते हैं। तो कहानी कुछ ऐसी है कि हमारे शब्दों के अर्थात व्याकरण की रचना करने वाले पाणिनि जी थे। उन्होंने बहुत तपस्या की तब महेश्वर अर्थात शिव जी ने प्रसन्न होकर उन्हें एक शक्ति या दिव्य दृष्टि दी जिसके कारण उन्हें आकाश में स्थित सभी शब्द दिखने लगे। आपको पता है हमारे बोलने से जो ध्वनि निकलती है वह भी आकाश से निकलती है, तो ऐसे शब्दों को लेकर पाणिनि जी ने वर्णमाला और व्याकरण के सभी सूत्र लिखे।
दूसरा तत्त्व आता है वायु और वायु का गुण है स्पर्श। स्पर्श का अनुभव करने के लिए हमारे पास त्वचा है। अगला तत्त्व है तेज अर्थात रूप, इस रूप को हमारी आँखें देखती हैं, उससे अगला तत्त्व आता है जल, जल का लक्षण है शीत अर्थात जहाँ भी हमें कुछ ठण्डा लगता है वहाँ जल है और जहाँ ऊष्ण स्पर्श होता है वहाँ तेज है। जल का एक गुण रस भी है, इस रस का अनुभव हम अपनी जिह्वा से करते हैं। इसी तरह पृथ्वी तत्त्व का लक्षण है गन्ध जिसे अनुभव करने के लिए हमारे पास नासिका है।
तो इस तरह इन पाँच तत्त्वों से पूरा यूनिवर्स अर्थात यह ब्रह्माण्ड बना है और हमारे शरीर में भी यही पाँच तत्त्व होते हैं। जब हम मरते हैं तो यह पाँच तत्त्व मिट्टी में मिल जाते हैं और हमारे शरीर में जो जीवात्मा होता है वह परमात्मा से मिल जाता है। इस तरह हम बनते हैं और फिर जब प्रलय होता है, तो हम मरते हैं। तो यह प्रलय क्या होता है मालूम है?
प्रलय अर्थात जिस क्रम में यह सभी वस्तुएँ बनी हैं उससे उल्टे क्रम में यह समाप्त हो जाती हैं। जब प्रलय होता है तो पहले पूरा संसार जलमय हो जाता है फिर वह अग्निमय होता है उसके बाद वायुमय और अन्त में आकाशमय हो जाता है, तो हुआ ना उल्टा क्रम, इस तरह आरम्भ होने के बाद समापन होने तक पूरा चक्र चलता रहता है।
कल्पक्षये पुनस्तानि, कल्पादौ विसृजाम्यहम्
अर्थात कल्प के आरम्भ में सृष्टि होती है और अन्त में वह समाप्त हो जाती है।
अच्छा अब यह बताइए आपको मालूम है कि कल्प क्या है ? चार युग क्या हैं ??
चार युग हैं सत् या कृत् युग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग। इन चारों को मिलाकर एक चतुर्युग कहा जाता है, इसे ही महायुग भी कहते हैं।
अब एक महायुग से एक मन्वन्तर बनता है और एकहत्तर मन्वन्तरों से मिलकर एक कल्प बनता है।
एक कल्प का अर्थ होता है ब्रह्मा जी का एक दिन और एक कल्प के बराबर ब्रह्माजी की एक रात।
ब्रह्माजी की आयु कितनी है ??
ब्रह्माजी की आयु है सौ वर्ष। तो इस तरह एक कल्प के आरम्भ में यह सृष्टि बनती है और उसके अन्त में उसका नाश हो जाता है।
दिन और रात की यह गणना (कैलकुलेशन ) भगवान और मनुष्यों के स्तर पर अलग-अलग होता है। इसी तरह यह गणना (कैलकुलेशन ) पितरों के स्तर पर और देवताओं के स्तर पर भी अलग होती है।
क्या आप जानते हैं कि शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष क्या होता है??
शुक्ल पक्ष होता है अमावस्या से पूर्णिमा तक, हमारे यह पन्द्रह दिन पितरों के एक दिन के बराबर होते हैं फिर आता है कृष्ण पक्ष, अर्थात पूर्णिमा से अमावस्या तक के पन्द्रह दिन और यह होती है पितरों की एक रात। अर्थात हमारे पन्द्रह दिन पितरों के स्तर पर अर्थात पितृलोक में एक दिन के बराबर और हमारी पन्द्रह रातें उनके स्तर पर एक रात के बराबर होती है।
देवताओं का एक दिन हमारे छः महीनों के बराबर होता है और उसे उत्तरायण कहा जाता है इसी तरह अगले छः माह एक रात के बराबर होते हैं और उन्हें दक्षिणायन कहते हैं। इस तरह से हम देखते हैं कि भगवान, हमारे पितर और देवता यह सभी अलग-अलग आयामों में रहते हैं इसलिए उनके दिन और रात की गणना (कैलकुलेशन) भी अलग-अलग होती है।
तो श्रीभगवान कहते हैं एक कल्प के आरम्भ में मैं सृष्टि को बनाता हूँ और उसके अन्त में मैं उसका नाश कर देता हूँ और मैं हमेशा ऐसा करता रहता हूँ, अर्थात सृष्टि बनती है फिर खत्म होती है फिर दोबारा से बन जाती है तो दोबारा से खत्म हो जाती है और यह चक्र चलता रहता है।
उपनिषद में बताया गया है कि ब्रह्माजी की इच्छा थी कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ, तो इस तरह पञ्चमहाभूत बनाए। पञ्चमहाभूत हैं आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। सबसे पहले परम तत्त्व से आकाश बना,आकाश हर जगह होता है हमें दिखाई नहीं देता लेकिन होता है। उसके बाद आकाश से वायु बनी जो एक बहुत विस्तृत तत्त्व है, फिर वायु से तेज बना जिसे हम अग्नि के रूप में जानते हैं। अग्नि से जल बना और फिर जल से यह पृथ्वी बनी। पृथ्वी अर्थात हमें जो गोलाकार दिखाई देता है केवल वह नहीं, जब हम पृथ्वी कहते हैं तो इसका मतलब होता है गन्ध। तो इस प्रकार यह पञ्चमहाभूत बने और इन्हीं महाभूतों से पूरा संसार बना है। हमारा शरीर भी इन्हीं महाभूतों से बना है।
अब इन पाँच तत्त्वों से हमारा शरीर बना है, इसका प्रमाण (प्रूफ) हम देते हैं तो देखो इसका क्या प्रमाण है-
आकाश पहला तत्त्व है जिसका गुण है शब्द, आकाश से ही शब्द आता है। आपने गीता परिवार का बैनर देखा होगा उसमें एक हाथ दिखाया है, हाथ में एक डमरू होता है और उस डमरू से शब्द निकलते हैं। तो कहानी कुछ ऐसी है कि हमारे शब्दों के अर्थात व्याकरण की रचना करने वाले पाणिनि जी थे। उन्होंने बहुत तपस्या की तब महेश्वर अर्थात शिव जी ने प्रसन्न होकर उन्हें एक शक्ति या दिव्य दृष्टि दी जिसके कारण उन्हें आकाश में स्थित सभी शब्द दिखने लगे। आपको पता है हमारे बोलने से जो ध्वनि निकलती है वह भी आकाश से निकलती है, तो ऐसे शब्दों को लेकर पाणिनि जी ने वर्णमाला और व्याकरण के सभी सूत्र लिखे।
दूसरा तत्त्व आता है वायु और वायु का गुण है स्पर्श। स्पर्श का अनुभव करने के लिए हमारे पास त्वचा है। अगला तत्त्व है तेज अर्थात रूप, इस रूप को हमारी आँखें देखती हैं, उससे अगला तत्त्व आता है जल, जल का लक्षण है शीत अर्थात जहाँ भी हमें कुछ ठण्डा लगता है वहाँ जल है और जहाँ ऊष्ण स्पर्श होता है वहाँ तेज है। जल का एक गुण रस भी है, इस रस का अनुभव हम अपनी जिह्वा से करते हैं। इसी तरह पृथ्वी तत्त्व का लक्षण है गन्ध जिसे अनुभव करने के लिए हमारे पास नासिका है।
तो इस तरह इन पाँच तत्त्वों से पूरा यूनिवर्स अर्थात यह ब्रह्माण्ड बना है और हमारे शरीर में भी यही पाँच तत्त्व होते हैं। जब हम मरते हैं तो यह पाँच तत्त्व मिट्टी में मिल जाते हैं और हमारे शरीर में जो जीवात्मा होता है वह परमात्मा से मिल जाता है। इस तरह हम बनते हैं और फिर जब प्रलय होता है, तो हम मरते हैं। तो यह प्रलय क्या होता है मालूम है?
प्रलय अर्थात जिस क्रम में यह सभी वस्तुएँ बनी हैं उससे उल्टे क्रम में यह समाप्त हो जाती हैं। जब प्रलय होता है तो पहले पूरा संसार जलमय हो जाता है फिर वह अग्निमय होता है उसके बाद वायुमय और अन्त में आकाशमय हो जाता है, तो हुआ ना उल्टा क्रम, इस तरह आरम्भ होने के बाद समापन होने तक पूरा चक्र चलता रहता है।
कल्पक्षये पुनस्तानि, कल्पादौ विसृजाम्यहम्
अर्थात कल्प के आरम्भ में सृष्टि होती है और अन्त में वह समाप्त हो जाती है।
अच्छा अब यह बताइए आपको मालूम है कि कल्प क्या है ? चार युग क्या हैं ??
चार युग हैं सत् या कृत् युग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग। इन चारों को मिलाकर एक चतुर्युग कहा जाता है, इसे ही महायुग भी कहते हैं।
अब एक महायुग से एक मन्वन्तर बनता है और एकहत्तर मन्वन्तरों से मिलकर एक कल्प बनता है।
एक कल्प का अर्थ होता है ब्रह्मा जी का एक दिन और एक कल्प के बराबर ब्रह्माजी की एक रात।
ब्रह्माजी की आयु कितनी है ??
ब्रह्माजी की आयु है सौ वर्ष। तो इस तरह एक कल्प के आरम्भ में यह सृष्टि बनती है और उसके अन्त में उसका नाश हो जाता है।
दिन और रात की यह गणना (कैलकुलेशन ) भगवान और मनुष्यों के स्तर पर अलग-अलग होता है। इसी तरह यह गणना (कैलकुलेशन ) पितरों के स्तर पर और देवताओं के स्तर पर भी अलग होती है।
क्या आप जानते हैं कि शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष क्या होता है??
शुक्ल पक्ष होता है अमावस्या से पूर्णिमा तक, हमारे यह पन्द्रह दिन पितरों के एक दिन के बराबर होते हैं फिर आता है कृष्ण पक्ष, अर्थात पूर्णिमा से अमावस्या तक के पन्द्रह दिन और यह होती है पितरों की एक रात। अर्थात हमारे पन्द्रह दिन पितरों के स्तर पर अर्थात पितृलोक में एक दिन के बराबर और हमारी पन्द्रह रातें उनके स्तर पर एक रात के बराबर होती है।
देवताओं का एक दिन हमारे छः महीनों के बराबर होता है और उसे उत्तरायण कहा जाता है इसी तरह अगले छः माह एक रात के बराबर होते हैं और उन्हें दक्षिणायन कहते हैं। इस तरह से हम देखते हैं कि भगवान, हमारे पितर और देवता यह सभी अलग-अलग आयामों में रहते हैं इसलिए उनके दिन और रात की गणना (कैलकुलेशन) भी अलग-अलग होती है।
तो श्रीभगवान कहते हैं एक कल्प के आरम्भ में मैं सृष्टि को बनाता हूँ और उसके अन्त में मैं उसका नाश कर देता हूँ और मैं हमेशा ऐसा करता रहता हूँ, अर्थात सृष्टि बनती है फिर खत्म होती है फिर दोबारा से बन जाती है तो दोबारा से खत्म हो जाती है और यह चक्र चलता रहता है।
प्रकृतिं(म्) स्वामवष्टभ्य, विसृजामि पुनः(फ्) पुनः।
भूतग्राममिमं(ङ्) कृत्स्नम्, अवशं(म्) प्रकृतेर्वशात्।।9.8।।
प्रकृति के वश में होने से परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणी समुदाय की (कल्पों के आदि में) मैं अपनी प्रकृति को वश में करके बार-बार रचना करता हूँ।
विवेचन: अब यहाँ भगवान प्रकृति और पुरुष की बात करते हैं। आपको पता है प्रकृति सब कुछ निर्माण (क्रिएट) करती है और पुरुष अर्थात चैतन्य उसको नियन्त्रित ( कंट्रोल) करता है।
जैसे हम देखें कि यह पङ्खा होता है जो कि केवल एक वस्तु है, यह चलता कैसे है? तो उसके लिए विद्युत (इलेक्ट्रिसिटी) अर्थात शक्ति की आवश्यकता होती है जो उस पङ्खे को चलाती है, इसी प्रकार हमारी प्रकृति एक वस्तु है और उसे चलाने वाला पुरुष अर्थात वह चेतना शक्ति है।
ऐसा कहते हैं कि प्रकृति त्रिगुणात्मक होती है। प्रकृति के यह तीन गुण कौन से हैं आपको मालूम है ?
जी हाँ आपने सही उत्तर दिया है, यह तीन गुण होते हैं सात्विक गुण, राजसिक गुण और तामसिक गुण अर्थात सत्, रज और तम, प्रकृति के यही तीन गुण हमें बाँधते हैं।
इन तीन गुणों के साथ प्रकृति बहुत शक्तिशाली हो जाती है और वह कभी-कभी हमारी मालिक बन जाती है। जैसे हमें सुबह उठना होता है लेकिन हमारा उठने का मन नहीं होता, उस समय प्रकृति का तामसिक गुण बढ़ जाता है इसलिए हम उठना नहीं चाहते।

यदि हमारे घर में खाने के लिए रसगुल्ला है लेकिन हमें बाहर का बर्गर खाने का मन करता है तो इस समय हमारा रजोगुण शक्तिशाली होता है। इन गुणों के सहारे प्रकृति हम पर नियन्त्रण (कंट्रोल) करने लगती है लेकिन हमें उसके नियन्त्रण (कंट्रोल) में न होकर उसे हमारे नियन्त्रण (कंट्रोल) में करना है, हमें अपनी प्रकृति को अपने वश में करना है।
श्रीभगवान के साथ प्रकृति की यह शक्ति नहीं चलती। भगवान प्रकृति के वश में न होकर प्रकृति को अपने वश में रखने का काम करते हैं। भगवान को क्या करना है यह बात वे स्वयं ही निश्चित करते हैं, उनका कोई विकार बड़ा नहीं हो पाता इसलिए भगवान प्रकृति के मालिक बन जाते हैं। इसी प्रकार हम भी चाहें तो स्व नियन्त्रण ( सेल्फ कंट्रोल )से उस प्रकृति के मालिक बन सकते हैं, इसे ही कहा जाता है संयतेन्द्रीय होना अर्थात हम अपनी प्रकृति के मालिक बन जाएंगे, नौकर नहीं। गीताजी के अलग-अलग श्लोकों में यह संयतेन्द्रीय और सम दो शब्द बार-बार आते हैं, सम शब्द का अर्थ होता है सुख और दुख दोनों में समान बने रहना, हमें ऐसे बनना है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जीवात्मा प्रकृति के नियन्त्रण (कंट्रोल ) में होती है और प्रकृति को परमात्मा या भगवान नियन्त्रित (कंट्रोल) करते हैं। महान लोग प्रकृति को नियन्त्रित (कंट्रोल) कर पाते हैं, यदि हम भी वैसा कर लेंगे तो हम भी वहाँ तक पहुँच सकते हैं। यदि हम उदाहरण देखें तो विवेकानन्द जी और उनके जैसे अनेक महापुरुषों ने यह काम किया था इसलिए हम उन्हें महान कहते हैं।
जैसे हम देखें कि यह पङ्खा होता है जो कि केवल एक वस्तु है, यह चलता कैसे है? तो उसके लिए विद्युत (इलेक्ट्रिसिटी) अर्थात शक्ति की आवश्यकता होती है जो उस पङ्खे को चलाती है, इसी प्रकार हमारी प्रकृति एक वस्तु है और उसे चलाने वाला पुरुष अर्थात वह चेतना शक्ति है।
ऐसा कहते हैं कि प्रकृति त्रिगुणात्मक होती है। प्रकृति के यह तीन गुण कौन से हैं आपको मालूम है ?
जी हाँ आपने सही उत्तर दिया है, यह तीन गुण होते हैं सात्विक गुण, राजसिक गुण और तामसिक गुण अर्थात सत्, रज और तम, प्रकृति के यही तीन गुण हमें बाँधते हैं।
इन तीन गुणों के साथ प्रकृति बहुत शक्तिशाली हो जाती है और वह कभी-कभी हमारी मालिक बन जाती है। जैसे हमें सुबह उठना होता है लेकिन हमारा उठने का मन नहीं होता, उस समय प्रकृति का तामसिक गुण बढ़ जाता है इसलिए हम उठना नहीं चाहते।
यदि हमारे घर में खाने के लिए रसगुल्ला है लेकिन हमें बाहर का बर्गर खाने का मन करता है तो इस समय हमारा रजोगुण शक्तिशाली होता है। इन गुणों के सहारे प्रकृति हम पर नियन्त्रण (कंट्रोल) करने लगती है लेकिन हमें उसके नियन्त्रण (कंट्रोल) में न होकर उसे हमारे नियन्त्रण (कंट्रोल) में करना है, हमें अपनी प्रकृति को अपने वश में करना है।
श्रीभगवान के साथ प्रकृति की यह शक्ति नहीं चलती। भगवान प्रकृति के वश में न होकर प्रकृति को अपने वश में रखने का काम करते हैं। भगवान को क्या करना है यह बात वे स्वयं ही निश्चित करते हैं, उनका कोई विकार बड़ा नहीं हो पाता इसलिए भगवान प्रकृति के मालिक बन जाते हैं। इसी प्रकार हम भी चाहें तो स्व नियन्त्रण ( सेल्फ कंट्रोल )से उस प्रकृति के मालिक बन सकते हैं, इसे ही कहा जाता है संयतेन्द्रीय होना अर्थात हम अपनी प्रकृति के मालिक बन जाएंगे, नौकर नहीं। गीताजी के अलग-अलग श्लोकों में यह संयतेन्द्रीय और सम दो शब्द बार-बार आते हैं, सम शब्द का अर्थ होता है सुख और दुख दोनों में समान बने रहना, हमें ऐसे बनना है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जीवात्मा प्रकृति के नियन्त्रण (कंट्रोल ) में होती है और प्रकृति को परमात्मा या भगवान नियन्त्रित (कंट्रोल) करते हैं। महान लोग प्रकृति को नियन्त्रित (कंट्रोल) कर पाते हैं, यदि हम भी वैसा कर लेंगे तो हम भी वहाँ तक पहुँच सकते हैं। यदि हम उदाहरण देखें तो विवेकानन्द जी और उनके जैसे अनेक महापुरुषों ने यह काम किया था इसलिए हम उन्हें महान कहते हैं।
न च मां(न्) तानि कर्माणि, निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनम्, असक्तं(न्) तेषु कर्मसु।।9.9।।
हे धनञ्जय ! उन (सृष्टि-रचना आदि) कर्मों में अनासक्त और उदासीन की तरह रहते हुए मुझे वे कर्म नहीं बाँधते।
विवेचन : श्रीभगवान कहते हैं कि हम आसक्ति के कारण इन सब चीजों में बँध जाते हैं अब इस बात को समझने के लिए केनोपनिषद से एक उदाहरण लेते हैं।
केनोपनिषद एक उपनिषद है, क्या आप जानते हैं उपनिषद कितने हैं??
उपनिषदों की कुल संख्या ग्यारह है। इशोपनिषद, केनोपनिषद, कठोपनिषद आदि। अगली कक्षा में आप इन ग्यारह उपनिषदों की एक सूची बनाएँगे या ऐसा करेंगे कि इसकी सूची बनाकर अपने समूह में डालेंगे, जिससे जो लोग आज का विवेचन सुनने नहीं आए हैं उन्हें भी वे ग्यारह उपनिषद कौन से हैं? यह पता चलेगा इन ग्यारह उपनिषदों का नाम बताने वाला भी एक श्लोक है उसे भी हम ढूँढ लेंगे।
केनोपनिषद में एक कथा है-हमें पता है कि कई देवता होते हैं, जैसे इन्द्र देव, अग्निदेव, वायुदेव आदि। तो यह कथा इन्द्र देव की है, एक बार देवता और असुरों के बीच युद्ध हुआ तो कौन जीता होगा ? आप तो जानते हैं, देवताओं की जीत हुई। अब जीतने के बाद कई बार, जीतने वाले को एक अहङ्कार या अभिमान हो जाता है, ऐसा ही अभिमान इन्द्र देवता को हो गया। भगवान ने सोचा कि ऐसा अभिमान होना तो अच्छी बात नहीं है, अभिमान होने से क्या होता है? हमारा स्तर गिर जाता है हम नीचे गिरने लगते हैं, तो यह बात इन्द्र देवता को समझाने के लिए भगवान कुछ लीला करते हैं वह एक अद्भुत स्वरूप धारण कर लेते हैं।
आप बताइए नवें अध्याय में कुल कितने श्लोक हैं और इस अध्याय का नाम क्या है??
इस अध्याय में 34 श्लोक हैं और इसका नाम है राजविद्या राजगुह्य योग।
हम बात कर रहे थे श्रीभगवान के अद्भुत स्वरूप की। श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में श्रीभगवान के एक अद्भुत रूप का वर्णन है। जब भगवान ने यह रूप धारण किया तो सभी उसे देखकर चकित हो गए, कैसा था यह रूप? भगवद्गीता में कहा गया है कि उसके अनन्त बाहू अर्थात बहुत सारे, हजारों हाथ थे, अनन्त सिर थे और उनका सिर इतना ऊँचा था कि आकाश से जाकर मिल गया था। इस स्वरूप के अनन्त उदर अर्थात अनन्त पेट थे, इस तरह यह भगवान का एक विकराल स्वरूप था, एक विराट स्वरूप था।
इस कथा में इन्द्र देव का अहङ्कार देखकर भगवान ने ऐसा विराट रूप तो नहीं लेकिन एक विशेष स्वरूप धारण किया। जब इन्द्र देव ने उन्हें देखा तो बोले कि यह कौन है, पहले तो इन्हें कभी नहीं देखा। उन्होंने अपनी सेना के अन्य देवताओं से कहा पास जाकर देखो कि यह कौन है। लेकिन जब उनके कुछ देवता उस तेजोमय रूप के पास गए तो वह इतना प्रकाशित था, उसमें से इतना प्रकाश निकल रहा था कि वे लोग उस रूप को देख ही नहीं पाए। तब इन्द्र ने सोचा मैं अपने सबसे शक्तिशाली देवता अर्थात अग्नि देवता को उन्हें देखने के लिए भेजता हूँ। अग्नि देव भी बड़े अभिमान से बोले मैं पता लगा कर आता हूँ। अग्नि देव की ताकत तो हमें मालूम है उनकी यह तेज वाली ताकत घटती-बढ़ती रहती है, कभी-कभी वह इसे इतना बढ़ा देते हैं कि जंगल को भी भस्म करने की ताकत रखते हैं।
अग्नि देव उस अद्भुत स्वरूप के पास पहुँचे। उस दिव्य स्वरूप ने उनसे पूछा तुम कौन हो तब इन्होंने कहा मैं अग्नि देव हूँ, मैं बहुत शक्तिशाली हूँ, मैं समस्त सृष्टि और आपको भी भस्म कर सकता हूँ, तो श्रीभगवान ने उन्हें सूखी घास का एक तिनका दिया और बोला कि जरा इसे जलाकर तो दिखाओ। अग्नि देव प्रयत्न करते रहे, प्रयास करते रहे लेकिन वह घास का टुकड़ा नहीं जला। श्रीभगवान ने उनकी शक्ति को छीन लिया था वह निराश होकर वापस आ गए।
अब इन्द्र ने वायु देव को भेजा, वह भी बड़े अहङ्कार से बोले मैं वायु देव हूँ मैं एक क्षण में त्राहि-त्राहि मचा सकता हूँ, मैं सब कुछ तहस-नहस कर सकता हूँ। भगवान बोले चलो तुरन्त घास के इस एक टुकड़े को उड़ाकर दिखाओ, वायु देव ने उसे उडाने की पूरी कोशिश की लेकिन उनकी भी शक्ति क्षीण हो गई थी क्योंकि भगवान ने उस शक्ति को वापस ले लिया था, वह भी हताश होकर वापस आ गए।
अब इन्द्र देव स्वयं ही भगवान के पास गए लेकिन उन्होंने क्या देखा कि वह दिव्य स्वरुप तो उन्हें दिखाई ही नहीं दिया, वह तो अदृश्य हो गया था। इन्द्र देव को लगा कि क्या मेरी इतनी भी क्षमता नहीं है कि मैं उन्हें देख सकूँ, तब पार्वती जी प्रकट हुईं और बोलीं कि इन्द्र देव आप इतने दुखी क्यों है??
अच्छा आप लोग जानते हैं कि पार्वती जी किसकी पत्नी थीं? जी हाँ, शिव जी की पत्नी थीं। क्या आपको इस बारे में एक बात और मालूम है? हम हमेशा शिवजी लिखते हैं श्री शिव नहीं लिखते महादेव लिखते हैं शिव जी के आगे श्री शब्द नहीं लगाते, क्यों??
क्योंकि शिवजी तो बैरागी थे, बाद में उनका विवाह हो गया था लेकिन उन्होंने कभी लक्ष्मी का ग्रहण नहीं किया सांसारिक भोग में कभी नहीं लगे इसीलिए उनके नाम के आगे कभी भी श्री शब्द नहीं लगाया जाता।
हमने देखा, कथा में इन्द्र जी पार्वती जी से मिले, पार्वती जी ने उनसे कहा कि यह रूप तो ब्रह्मा जी का बनाया हुआ था और उन्होंने उसे आपके अहङ्कार को दूर करने के लिए बनाया था। युद्ध में जीतने के कारण जब आपका झूठा अभिमान बढ़ गया था तब उसे कम करने के लिए या उसे नष्ट करने के लिए ही श्रीभगवान ने वह दिव्य रूप लिया था। इन्द्र देव इस बात को बहुत अच्छी तरह समझ गए कि इस तरह का अहङ्कार कभी नहीं करना चाहिए।
भगवान आगे उदासीन शब्द का प्रयोग करते हैं, हमें उदासीन होना है। श्रीकृष्ण भगवान ने गोवर्धन पर्वत को उठाया, कंस जैसे राक्षस को मारा, पूतना का भी वध किया फिर भी उन्हें कभी अहङ्कार नहीं हुआ। उन्होंने शिशुपाल की निन्यानवे गलत बातें भी सुनीं लेकिन कभी क्रोध नहीं किया, शिशुपाल की सौंवी गलती पर श्रीभगवान उसे दण्डित करते हैं। इसका अर्थ यह है कि भगवान हमेशा उदासीन रहते हैं, परेशान नहीं होते, अहङ्कार भी नहीं होने देते लेकिन समय आने पर जो काम करना है उसे करते हैं अर्थात सौ गलत बातें सुनने के बाद उन्होंने शिशुपाल का वध किया। भगवान कहते हैं मैं किसी से व्यक्तिगत द्वेष नहीं करता। बड़ा से बड़ा पापी भी मेरा भजन करेगा तो मुझे पा सकता है।
केनोपनिषद एक उपनिषद है, क्या आप जानते हैं उपनिषद कितने हैं??
उपनिषदों की कुल संख्या ग्यारह है। इशोपनिषद, केनोपनिषद, कठोपनिषद आदि। अगली कक्षा में आप इन ग्यारह उपनिषदों की एक सूची बनाएँगे या ऐसा करेंगे कि इसकी सूची बनाकर अपने समूह में डालेंगे, जिससे जो लोग आज का विवेचन सुनने नहीं आए हैं उन्हें भी वे ग्यारह उपनिषद कौन से हैं? यह पता चलेगा इन ग्यारह उपनिषदों का नाम बताने वाला भी एक श्लोक है उसे भी हम ढूँढ लेंगे।
केनोपनिषद में एक कथा है-हमें पता है कि कई देवता होते हैं, जैसे इन्द्र देव, अग्निदेव, वायुदेव आदि। तो यह कथा इन्द्र देव की है, एक बार देवता और असुरों के बीच युद्ध हुआ तो कौन जीता होगा ? आप तो जानते हैं, देवताओं की जीत हुई। अब जीतने के बाद कई बार, जीतने वाले को एक अहङ्कार या अभिमान हो जाता है, ऐसा ही अभिमान इन्द्र देवता को हो गया। भगवान ने सोचा कि ऐसा अभिमान होना तो अच्छी बात नहीं है, अभिमान होने से क्या होता है? हमारा स्तर गिर जाता है हम नीचे गिरने लगते हैं, तो यह बात इन्द्र देवता को समझाने के लिए भगवान कुछ लीला करते हैं वह एक अद्भुत स्वरूप धारण कर लेते हैं।
आप बताइए नवें अध्याय में कुल कितने श्लोक हैं और इस अध्याय का नाम क्या है??
इस अध्याय में 34 श्लोक हैं और इसका नाम है राजविद्या राजगुह्य योग।
हम बात कर रहे थे श्रीभगवान के अद्भुत स्वरूप की। श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में श्रीभगवान के एक अद्भुत रूप का वर्णन है। जब भगवान ने यह रूप धारण किया तो सभी उसे देखकर चकित हो गए, कैसा था यह रूप? भगवद्गीता में कहा गया है कि उसके अनन्त बाहू अर्थात बहुत सारे, हजारों हाथ थे, अनन्त सिर थे और उनका सिर इतना ऊँचा था कि आकाश से जाकर मिल गया था। इस स्वरूप के अनन्त उदर अर्थात अनन्त पेट थे, इस तरह यह भगवान का एक विकराल स्वरूप था, एक विराट स्वरूप था।
इस कथा में इन्द्र देव का अहङ्कार देखकर भगवान ने ऐसा विराट रूप तो नहीं लेकिन एक विशेष स्वरूप धारण किया। जब इन्द्र देव ने उन्हें देखा तो बोले कि यह कौन है, पहले तो इन्हें कभी नहीं देखा। उन्होंने अपनी सेना के अन्य देवताओं से कहा पास जाकर देखो कि यह कौन है। लेकिन जब उनके कुछ देवता उस तेजोमय रूप के पास गए तो वह इतना प्रकाशित था, उसमें से इतना प्रकाश निकल रहा था कि वे लोग उस रूप को देख ही नहीं पाए। तब इन्द्र ने सोचा मैं अपने सबसे शक्तिशाली देवता अर्थात अग्नि देवता को उन्हें देखने के लिए भेजता हूँ। अग्नि देव भी बड़े अभिमान से बोले मैं पता लगा कर आता हूँ। अग्नि देव की ताकत तो हमें मालूम है उनकी यह तेज वाली ताकत घटती-बढ़ती रहती है, कभी-कभी वह इसे इतना बढ़ा देते हैं कि जंगल को भी भस्म करने की ताकत रखते हैं।
अग्नि देव उस अद्भुत स्वरूप के पास पहुँचे। उस दिव्य स्वरूप ने उनसे पूछा तुम कौन हो तब इन्होंने कहा मैं अग्नि देव हूँ, मैं बहुत शक्तिशाली हूँ, मैं समस्त सृष्टि और आपको भी भस्म कर सकता हूँ, तो श्रीभगवान ने उन्हें सूखी घास का एक तिनका दिया और बोला कि जरा इसे जलाकर तो दिखाओ। अग्नि देव प्रयत्न करते रहे, प्रयास करते रहे लेकिन वह घास का टुकड़ा नहीं जला। श्रीभगवान ने उनकी शक्ति को छीन लिया था वह निराश होकर वापस आ गए।
अब इन्द्र ने वायु देव को भेजा, वह भी बड़े अहङ्कार से बोले मैं वायु देव हूँ मैं एक क्षण में त्राहि-त्राहि मचा सकता हूँ, मैं सब कुछ तहस-नहस कर सकता हूँ। भगवान बोले चलो तुरन्त घास के इस एक टुकड़े को उड़ाकर दिखाओ, वायु देव ने उसे उडाने की पूरी कोशिश की लेकिन उनकी भी शक्ति क्षीण हो गई थी क्योंकि भगवान ने उस शक्ति को वापस ले लिया था, वह भी हताश होकर वापस आ गए।
अब इन्द्र देव स्वयं ही भगवान के पास गए लेकिन उन्होंने क्या देखा कि वह दिव्य स्वरुप तो उन्हें दिखाई ही नहीं दिया, वह तो अदृश्य हो गया था। इन्द्र देव को लगा कि क्या मेरी इतनी भी क्षमता नहीं है कि मैं उन्हें देख सकूँ, तब पार्वती जी प्रकट हुईं और बोलीं कि इन्द्र देव आप इतने दुखी क्यों है??
अच्छा आप लोग जानते हैं कि पार्वती जी किसकी पत्नी थीं? जी हाँ, शिव जी की पत्नी थीं। क्या आपको इस बारे में एक बात और मालूम है? हम हमेशा शिवजी लिखते हैं श्री शिव नहीं लिखते महादेव लिखते हैं शिव जी के आगे श्री शब्द नहीं लगाते, क्यों??
क्योंकि शिवजी तो बैरागी थे, बाद में उनका विवाह हो गया था लेकिन उन्होंने कभी लक्ष्मी का ग्रहण नहीं किया सांसारिक भोग में कभी नहीं लगे इसीलिए उनके नाम के आगे कभी भी श्री शब्द नहीं लगाया जाता।
हमने देखा, कथा में इन्द्र जी पार्वती जी से मिले, पार्वती जी ने उनसे कहा कि यह रूप तो ब्रह्मा जी का बनाया हुआ था और उन्होंने उसे आपके अहङ्कार को दूर करने के लिए बनाया था। युद्ध में जीतने के कारण जब आपका झूठा अभिमान बढ़ गया था तब उसे कम करने के लिए या उसे नष्ट करने के लिए ही श्रीभगवान ने वह दिव्य रूप लिया था। इन्द्र देव इस बात को बहुत अच्छी तरह समझ गए कि इस तरह का अहङ्कार कभी नहीं करना चाहिए।
भगवान आगे उदासीन शब्द का प्रयोग करते हैं, हमें उदासीन होना है। श्रीकृष्ण भगवान ने गोवर्धन पर्वत को उठाया, कंस जैसे राक्षस को मारा, पूतना का भी वध किया फिर भी उन्हें कभी अहङ्कार नहीं हुआ। उन्होंने शिशुपाल की निन्यानवे गलत बातें भी सुनीं लेकिन कभी क्रोध नहीं किया, शिशुपाल की सौंवी गलती पर श्रीभगवान उसे दण्डित करते हैं। इसका अर्थ यह है कि भगवान हमेशा उदासीन रहते हैं, परेशान नहीं होते, अहङ्कार भी नहीं होने देते लेकिन समय आने पर जो काम करना है उसे करते हैं अर्थात सौ गलत बातें सुनने के बाद उन्होंने शिशुपाल का वध किया। भगवान कहते हैं मैं किसी से व्यक्तिगत द्वेष नहीं करता। बड़ा से बड़ा पापी भी मेरा भजन करेगा तो मुझे पा सकता है।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः(स्), सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय, जगद्विपरिवर्तते।।9.10।।
प्रकृति मेरी अध्यक्षता में सम्पूर्ण चराचर जगत को रचती है। हे कुन्तीनन्दन ! इसी हेतु से जगत का (विविध प्रकार से) परिवर्तन होता है।
विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं कि मैं प्रकृति का कभी अपमान नहीं करता, वह तो मेरी ताकत है, प्रकृति मेरी शक्ति है, मैं उसका उपयोग (यूटिलाइज) करता हूँ। भगवान मूर्ख लोगों के बारे में आगे बता रहे हैं।
अवजानन्ति मां(म्) मूढा, मानुषीं(न्) तनुमाश्रितम्।
परं(म्) भावमजानन्तो, मम भूतमहेश्वरम्।।9.11।।
मूर्ख लोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियों के महान् ईश्वररूप श्रेष्ठ भाव को न जानते हुए मुझे मनुष्य शरीर के आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर (मेरी) अवज्ञा करते हैं।
विवेचन: श्रीभगवान बता रहे हैं कि मूर्ख लोग तो वह हैं जो सोचते हैं कि श्रीभगवान मनुष्य की तरह साधारण या सामान्य हैं। वह मेरे रूप को और मेरे परम भाव को नहीं मानते, वह नहीं सोचते कि मैंने इस सृष्टि का निर्माण किया है। हमें भगवान के रूप में यह मानना चाहिए कि वे कोई सामान्य नहीं हैं, वे तो बहुत शक्तिशाली हैं इसीलिए तो वे इस पूरी सृष्टि को बना पाए हैं। अब आगे भगवान इन मूर्ख लोगों के तीन प्रकारों के बारे में बात करते हैं।
मोघाशा मोघकर्माणो, मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं(ञ्) चैव, प्रकृतिं(म्) मोहिनीं(म्) श्रिताः।।9.12।।
(जो) आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृति का ही आश्रय लेते हैं, ऐसे अविवेकी मनुष्यों की सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभ-कर्म व्यर्थ होते हैं (और) सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान (समझ) सत्-फल देने वाले नहीं होते।
विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं कि मूर्ख लोग वे होते हैं जो व्यर्थ की आशाएँ रखते हैं, व्यर्थ (यूजलेस) प्रयत्न करते रहते हैं। हम सब जानते हैं कि यह शरीर तो पाँच महाभूतों से बना है और अन्त में जब हम मर जाएँगे तब वह पञ्चमहाभूतों में ही समा जाएगा तो फिर हम चाहे इस शरीर को कितना भी सुन्दर बना लें, हम कितने भी अमीर हो जाएँ, अन्त समय में तो उसका कोई उपयोग नहीं होने वाला। अमीर बनने के लिए हम कई गलत काम करते हैं तो ऐसा क्यों करें?

ज्यादा कमाने से तो कुछ नहीं होगा। खाना हमें है, हम तो केवल एक प्लेट खाना ही खा सकते हैं, करोड़ों रुपए होने पर भी हमारी क्षमता तो उतनी ही है, फिर गलत काम करके धन और नाम कमाने के लिए व्यर्थ चेष्टा क्यों करें? जो लोग ऐसा करते हैं वे मूर्ख हैं, मेहनत करके भी अन्त में उनकी मेहनत व्यर्थ ही हो जाती है क्योंकि व्यर्थ की आशाएँ रखना और व्यर्थ की चेष्टाएँ करना यह तो गलत और मूर्खता का काम है।
महात्मानस्तु मां(म्) पार्थ, दैवीं(म्) प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो, ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।।9.13।।
परन्तु हे पृथानन्दन ! दैवी प्रकृति के आश्रित अनन्य मन वाले महात्मा लोग मुझे सम्पूर्ण प्राणियों का आदि (और) अविनाशी समझकर मेरा भजन करते हैं।
विवेचन: जो महात्मा पुरुष होते हैं वे सर्वश्रेष्ठ होते हैं। वे जानते हैं कि शरीर तो नश्वर है, नष्ट होने वाला है। इसलिए ये लोग अनन्य मन से भजन कीर्तन करते हैं। उनका तो यह ध्येय होता है कि जितना हो सके श्रीभगवान के निकट पहुँचें और प्रकृति को वश में कर सकें। ये महात्मा पुरुष चाहते हैं कि प्रकृति को अपने वश में लें, ना कि प्रकृति उनको अपने वश में ले ले। जब भजन कीर्तन करते हैं तो किसी भी विषय को वश में करने का सामर्थ्य बढ़ने लगता है। साथ ही संसार के प्रति जो आसक्ति हमारे भीतर होती है वह कम होती जाती है और हमारा आत्मनिग्रह बढ़ता चला जाता है।

सततं(ङ्) कीर्तयन्तो मां(य्ँ), यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां(म्) भक्त्या, नित्ययुक्ता उपासते॥9.14॥
नित्य- निरन्तर (मुझ में) लगे हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर लगन पूर्वक साधन में लगे हुए और प्रेम पूर्वक कीर्तन करते हुए तथा मुझे नमस्कार करते हुये निरन्तर मेरी उपासना करते हैं।
विवेचन: हम भक्त प्रह्लाद के विषय में जानते हैं, वे भगवत् चिन्तन एवं सदैव भजन-कीर्तन में लगे रहते थे। हम साधक, निरन्तर भजन-कीर्तन एवं भगवत् चिन्तन कैसे कर सकते हैं। जबकि हम ज़ूम पर होते हैं और भी दूसरे कई सारे कार्यों में व्यस्त रहना पडता हैं। इसलिए श्रीभगवान पाँचवे अध्याय में इसका उपाय बताते हैं।
नैव किञ्चित्करोमीति, युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्, नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥५.८॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्, नुन्मिषन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु, वर्तन्त इति धारयन्॥५.९॥
ये दोनों श्लोक भगवद्गीता के सर्वोत्कृष्ट श्लोकों में से हैं और बहुत कठिन भी हैं। भगवद्गीता सीखने की उत्सुकता से भरे हुए एवं बुद्धिमान बालकों से जब पूछा गया कि क्या वे भक्त प्रह्लाद को जानते हैं? तो बहुत सारे बच्चों ने हाँ में उत्तर दिया। आश्चर्य का विषय, कि वे भक्त प्रह्लाद के पिताजी का नाम भी जानते हैं। भक्त प्रह्लाद की माता जी का नाम पूछने पर भी सही उत्तर दे सके, बताया गया कि प्रहलाद की माता जी का नाम कयाधू था।
एक समय की बात है, जब कयाधू गर्भावस्था में यात्रा कर रही थीं तब रास्ते में उन्हें नारद मुनि मिल जाते हैं। नारद मुनि भगवान श्रीमन्नारायण के परम भक्त थे। वे जहाँ कहीं भी जाते, सबसे पहले भगवान नारायण का नाम लेकर ही अपनी बात करते थे। वे दो बार दोहराते 'नारायण-नारायण'। प्रह्लाद की माताजी से वे यात्रा में मिले। तभी से प्रह्लाद पर उनका प्रभाव हुआ और प्रह्लाद जन्म के पहले से ही नारायण का नाम लेने लगे थे।
जब प्रह्लाद का जन्म होता है तो वह जन्म से ही नारायण नाम लेने लग जाते हैं। प्रह्लाद के पिताजी हिरण्यकश्यप को यह देखकर बहुत चिढ़ होने लगती है। कहने लगते हैं यह तो मेरा बेटा है इसे मेरा नाम लेना चाहिए। यह तो उल्टा मेरे शत्रु का नाम लेता है। प्रह्लाद जानता था कि श्रीभगवान नारायण तो सृष्टि के रचयिता है, सभी के पालनहार हैं।
हिरण्यकश्यप ने कई सारे उपाय भी किये कि वे अपने बेटे के प्राण ले लें। पर वे अन्त तक सफल नहीं हो पाए। हिरण्यकश्यप अपने पुत्र को मारने के लिए अपनी बहन होलिका से कहते हैं। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में जल नहीं सकती। उसे कहा गया कि वह प्रह्लाद को अपने साथ लेकर अग्नि में बैठ जाए तो प्रह्लाद का अन्त होगा। लेकिन होता उसके विपरीत है। होलिका जल जाती है और प्रह्लाद बच जाता है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि प्रह्लाद सदैव-सदैव ही नारायण का नाम लेते रहते, उनका चिन्तन करते रहते थे। वे अपने भक्ति में दृढ़ थे। श्रीभगवान कहते हैं, जो सच्चे भक्त होते हैं वे निरन्तर मेरा नाम लेते रहते हैं, मेरा चिन्तन करते रहते हैं और वे अपनी भक्ति में दृढ़ होते हैं।
अन्त में साधक बालकों को एक कार्य दिया गया कि वे अगले सत्र में कर्मयोग की जानकारी लेकरआएँ।
इसके साथ ही आज का बालकों हेतु विशेष रोचक एवं ज्ञानवर्धक सत्र उनकी जिज्ञासाओं के समाधान के साथ समाप्त हुआ।
प्रश्नोत्तर
नैव किञ्चित्करोमीति, युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्, नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥५.८॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्, नुन्मिषन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु, वर्तन्त इति धारयन्॥५.९॥
ये दोनों श्लोक भगवद्गीता के सर्वोत्कृष्ट श्लोकों में से हैं और बहुत कठिन भी हैं। भगवद्गीता सीखने की उत्सुकता से भरे हुए एवं बुद्धिमान बालकों से जब पूछा गया कि क्या वे भक्त प्रह्लाद को जानते हैं? तो बहुत सारे बच्चों ने हाँ में उत्तर दिया। आश्चर्य का विषय, कि वे भक्त प्रह्लाद के पिताजी का नाम भी जानते हैं। भक्त प्रह्लाद की माता जी का नाम पूछने पर भी सही उत्तर दे सके, बताया गया कि प्रहलाद की माता जी का नाम कयाधू था।
एक समय की बात है, जब कयाधू गर्भावस्था में यात्रा कर रही थीं तब रास्ते में उन्हें नारद मुनि मिल जाते हैं। नारद मुनि भगवान श्रीमन्नारायण के परम भक्त थे। वे जहाँ कहीं भी जाते, सबसे पहले भगवान नारायण का नाम लेकर ही अपनी बात करते थे। वे दो बार दोहराते 'नारायण-नारायण'। प्रह्लाद की माताजी से वे यात्रा में मिले। तभी से प्रह्लाद पर उनका प्रभाव हुआ और प्रह्लाद जन्म के पहले से ही नारायण का नाम लेने लगे थे।
जब प्रह्लाद का जन्म होता है तो वह जन्म से ही नारायण नाम लेने लग जाते हैं। प्रह्लाद के पिताजी हिरण्यकश्यप को यह देखकर बहुत चिढ़ होने लगती है। कहने लगते हैं यह तो मेरा बेटा है इसे मेरा नाम लेना चाहिए। यह तो उल्टा मेरे शत्रु का नाम लेता है। प्रह्लाद जानता था कि श्रीभगवान नारायण तो सृष्टि के रचयिता है, सभी के पालनहार हैं।
हिरण्यकश्यप ने कई सारे उपाय भी किये कि वे अपने बेटे के प्राण ले लें। पर वे अन्त तक सफल नहीं हो पाए। हिरण्यकश्यप अपने पुत्र को मारने के लिए अपनी बहन होलिका से कहते हैं। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में जल नहीं सकती। उसे कहा गया कि वह प्रह्लाद को अपने साथ लेकर अग्नि में बैठ जाए तो प्रह्लाद का अन्त होगा। लेकिन होता उसके विपरीत है। होलिका जल जाती है और प्रह्लाद बच जाता है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि प्रह्लाद सदैव-सदैव ही नारायण का नाम लेते रहते, उनका चिन्तन करते रहते थे। वे अपने भक्ति में दृढ़ थे। श्रीभगवान कहते हैं, जो सच्चे भक्त होते हैं वे निरन्तर मेरा नाम लेते रहते हैं, मेरा चिन्तन करते रहते हैं और वे अपनी भक्ति में दृढ़ होते हैं।
अन्त में साधक बालकों को एक कार्य दिया गया कि वे अगले सत्र में कर्मयोग की जानकारी लेकरआएँ।
इसके साथ ही आज का बालकों हेतु विशेष रोचक एवं ज्ञानवर्धक सत्र उनकी जिज्ञासाओं के समाधान के साथ समाप्त हुआ।
प्रश्नोत्तर
प्रश्नकर्ता: अनय रेड्डी भैया
प्रश्न: भगवान श्रीकृष्ण हमें क्यों नहीं दिखाई देते?
उत्तर: भगवान श्रीकृष्ण पहले दिखते थे परन्तु अब नहीं दिखते क्योंकि अब हम मनुष्य उनका आदर नहीं करते। अब वे केवल उन्हीं को दिखेंगे जो उनके अत्यन्त प्रिय और सच्चे भक्त हैं। श्रीकृष्ण को यदि देखना है तो हमें उनका प्रिय बनना पड़ेगा और उसके लिए सम्पूर्ण भगवद्गीता कण्ठस्थ कर उसे समझना होगा।
प्रश्नकर्ता: रिया अग्रवाल दीदी
प्रश्न: बारहवें अध्याय में अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि आपके अनन्य भक्त और निरन्तर आपके चिन्तन में रत भक्त, इन दोनों में आपका सबसे प्रिय कौन है?
एवं सतत युक्ता ये, भक्तास्त्वां पर्युपासते।
एवं सतत युक्ता ये, भक्तास्त्वां पर्युपासते।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं, तेषां के योगवित्तमा:।।12•01।।
नौवें अध्याय के चौदहवें श्लोक में भी श्रीकृष्ण यही बात दोहराते हैं।
सततं कीर्तयन्तो मां, यतन्तश्च दृढव्रता:।
ऐसा क्यों है?
उत्तर: बारहवाँ अध्याय भक्तियोग है और नौवें अध्याय का चौदहवाँ श्लोक भी भक्ति से सम्बन्धित है। श्रीभगवान एक ही बात को बार-बार दोहराते हैं ताकि उसे अच्छे से समझ सकें।
प्रश्नकर्ता: आदिशक्ति दीदी
प्रश्न: कल्प क्या है?
उत्तर: कल्प समय की एक इकाई (unit) है। चार युग हैं - सत् युग, द्वापर, त्रेता और कलियुग, इन चारों से एक चतुर्युग बनता है जो महायुग भी कहलाता है। एक हजार महायुगों का एक कल्प होता है। दो कल्प मिलकर ब्रह्माजी का एक दिन और रात होता है।
प्रश्नकर्ता: रिद्धिमा दीदी
प्रश्न : क्या भगवान धरती पर आते हैं? यदि हाँ तो क्या वे हम जैसे ही होते हैं? कलियुग में भगवान किस अवतार में आते हैं?
उत्तर: भगवान पृथ्वी पर अवश्य आते हैं विभिन्न अवतार लेकर, जैसे दशावतार। कलियुग में श्री शङ्कराचार्य जी को शिवजी को अवतार माना जाता है।
भगवान भी हम मनुष्यों की तरह ही होते हैं, उनके भी माता-पिता होते हैं, मित्र होते हैं,वे शरारतें करते हैं और उन्हें बड़ों से डाँट भी पड़ती है।
प्रश्नकर्ता: रिद्धिमा दीदी
प्रश्न: क्या भगवान हमें देखते हैं? भगवान शिवजी तो कैलाश पर्वत पर रहते हुए तपस्या में लीन हैं तो हमें कैसे देखते हैं?
उत्तर: भगवान की शक्ति और महिमा अपरम्पार होती है, वे तपस्या करते हुए भी हमें देख सकते हैं।
प्रश्नकर्ता: जीविका दीदी
प्रश्न: भगवान कल्कि अवतार लेकर कितने साल बाद आएँगे और किस रूप में आएँगे?
उत्तर: भगवान कब आएँगे यह तो वे नहीं बताते परन्तु जब कलियुग चरम सीमा पर पहुँचेगा तब भगवान अवतरित होंगे।
प्रश्नकर्ता: मधुश्री सक्सेना दीदी
प्रश्न: परीक्षा के लिए श्लोक कङ्ठस्थीकरण कैसे कर सकते हैं?
उत्तर: इसके लिए गुरुकुल पद्धति अपनाई जा सकती है, जिसमें श्लोक के प्रत्येक पद को कई बार दोहराया जाता है इससे श्लोक जल्दी कङ्ठस्थ हो जाता है। गीता परिवार द्वारा कङ्ठस्थीकरण की विशेष कक्षाएँ भी सञ्चालित की जाती हैं।