विवेचन सारांश
ईश्वर प्राप्ति के उपाय

ID: 5532
हिन्दी
शनिवार, 21 सितंबर 2024
अध्याय 12: भक्तियोग
1/2 (श्लोक 1-11)
विवेचक: गीता प्रवीण ज्योति जी शुक्ला


सुमधुर देशभक्ति गीत, हनुमान चालीसा पाठ, प्रारम्भिक प्रार्थना और दीप प्रज्वलन के साथ बालकों हेतु विशेष रूप से आयोजित आज के सत्र का आरम्भ हुआ।


चूँकि यह सत्र विशेष रूप से बालकों हेतु था, अतः विवेचक दीदी ने बालकों के साथ संवाद करते हुए इस सत्र को रोचक बनाने का प्रयास किया। सर्वप्रथम बालकों को गीता कक्षाओं के स्वरूप के विषय में बताया गया। बालकों को बताया गया कि सप्ताह में पाँच दिन उन्हें श्लोकों के उच्चारण सिखाए जाते हैं तथा उनका अर्थ समझने के लिए और उन्हें अपने जीवन में उतारने के लिए सप्ताह के अन्त में विवेचन सत्र आयोजित किए जाते हैं।

ईश्वर की हम सभी पर विशेष कृपा है कि हमें गीता जी सीखने का अवसर मिला है और हम गीता जी सीख पा रहे हैं। श्रीभगवान ने हमें स्वयं चुना है इसलिए हमें भी इस सुनहरे अवसर का पूरा लाभ उठाना चाहिए और अच्छी तरह से गीता जी के श्लोक सीखने चाहिए।




हम सभी के मन में यह प्रश्न उठ रहा होगा कि बारहवें अध्याय को हम पहले क्यों सीख रहे हैं, या पढ़ रहे हैं? श्रीमद्भगवद्गीता में तो अट्ठारह अध्याय हैं। अध्याय एक से क्यों नहीं? तो इसका उत्तर है- “बारहवाँ अध्याय सबसे छोटा और सरल है। इसमें केवल बीस श्लोक हैं।” हम जब भी कुछ नया सीखते हैं तो सरल से शुरू करते हैं। यदि प्रारम्भ में ही कोई कार्य कठिन माध्यम से सीखेंगे तो वह बीच में ही छूट जाता है, जैसे यदि हम गणित सीख रहे हैं तो पहले हमें जोड़ना, घटाना, गुणा करना, भाग देना सीखना होगा तभी हम गणित के सवाल हल कर पाएँगे।

श्रीमद्भगवद्गीता अच्छे से सीख सकें, इसलिए हम बारहवें अध्याय से शुरू करते हैं। हमें यह भी जानना आवश्यक है कि श्रीमद्भगवद्गीता क्या है? हमने सुना है कि यह दो व्यक्तियों के बीच का संवाद है, उपदेश है, आदि। यह श्रीभगवान के द्वारा गाया गया गीत है।

‘श्रीभगवान के मुख से स्वयं गाया हुआ गीत' 

भगवद् अर्थात् भगवान और गीता अर्थात् गीत। यह श्रीकृष्ण ने गाया इसलिए इसे श्रीमद्भगवद्गीता कहते हैं।

बच्चों से एक प्रश्न पूछा गया- “महाभारत का युद्ध किनके मध्य हुआ था? इसके चार विकल्प भी दिए गए- ‘भगवान श्रीराम और रावण के मध्य’, ‘भगवान श्रीकृष्ण और कंस के मध्य’, ‘कौरवों और पाण्डवों के मध्य’ या फिर ‘पता नहीं’।

अधिकांश बच्चों ने बिलकुल सही उत्तर दिया- ‘महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य हुआ था।’ हम जानते हैं कि महाभारत के नायक या हीरो अर्जुन थे। हम सब यह भी जानते हैं कि इस युद्ध में श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी थे। सारथी का अर्थ है- रथ चलाने वाला। अर्जुन बहुत आत्मविश्वास के साथ युद्ध के मैदान में आते हैं और श्रीकृष्ण से कहते हैं, “हे माधव! बताइये मुझे किससे युद्ध करना है? जब श्रीकृष्ण रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाते हैं तो अर्जुन दोनों सेनाओं को देखकर डर जाते हैं। उनका मुख सूखने लगता है, चेहरा पीला पड़ जाता है। जब अर्जुन अपने पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य को देखते हैं तो उनका साहस नहीं होता। उन्हें लगता है, कि वे इनसे कैसे लड़ेंगें? जब अर्जुन घबरा जाते हैं, सोच में पड़ जाते हैं तब उनका आत्मविश्वास खोने लगता है। श्रीभगवान उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए जो बात कहते हैं, वही श्रीमद्भगवद्गीता है। श्रीभगवान ने जो उपदेश कुरुक्षेत्र में, युद्ध के मैदान में दिया है, वही श्रीमद्भगवद्गीता है।




हमें अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए, प्रतिदिन गीता पढ़नी चाहिए। हम देखेंगे कि जो भी व्यक्ति प्रतिदिन गीता जी पढ़ते हैं, उनका आत्मविश्वास बहुत बढ़ जाता है। बच्चे भी जब यह पढ़ना आरम्भ करेंगे तो कुछ समय बाद देखेंगे कि उनके और अन्य सभी बच्चों के आत्मविश्वास में बहुत अन्तर आ गया है।

इस अध्याय का नाम ‘भक्तियोग’ है, अर्थात् भक्ति के द्वारा श्रीभगवान से जुड़ना। भक्ति का अर्थ है आरती करना, पूजा करना, प्रसाद चढ़ाना, भजन गाना। ये सब भक्ति के प्रकार हैं। हमें प्रतिदिन पूजा करनी चाहिए। इससे हमारा आत्मविश्वास एवं ऊर्जा बढ़ती है। इस अध्याय में हम यही देखने वाले हैं कि हम श्रीभगवान से कैसे जुड़ सकते हैं? कौन से भक्त अच्छे कहलाते हैं? भक्तों के क्या गुण-अवगुण हैं? ये सारी बातें श्रीभगवान इस अध्याय में बताने वाले हैं।

बच्चों से एक और प्रश्न पूछा गया- “आप सब किस-किस प्रकार से पूजा करते हैं?” इसके विकल्प दिये गए- ‘आरती, भजन, प्रसाद चढ़ा कर, ध्यान करके, ये सब करके’ या ‘कुछ नहीं'। बच्चों द्वारा उत्तर बताया गया कि दो प्रतिशत बच्चे प्रसाद चढ़ा कर, चार प्रतिशत बच्चे भजन गाकर, चार प्रतिशत बच्चे ध्यान करके, छः प्रतिशत बच्चे फूल चढ़ा कर, सत्रह प्रतिशत बच्चे आरती करके तथा छियासठ प्रतिशत बच्चे सब कुछ करते हैं। बच्चों को बताया गया कि प्रतिदिन पूजा करनी चाहिए। पूजा करने से हमें ऊर्जा प्राप्त होती है, जिससे हम बड़े-बड़े काम कर पाते हैं।

इस अध्याय में अर्जुन श्रीकृष्ण से प्रश्न पूछते हैं-  



12.1

अर्जुन उवाच
एवं(म्) सततयुक्ता ये, भक्तास्त्वां(म्) पर्युपासते|
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं (न्), तेषां(ङ्) के योगवित्तमाः||1||

अर्जुन बोले - जो भक्त इस प्रकार (ग्यारवें अध्याय के पचपनवें श्लोक के अनुसार) निरन्तर आप में लगे रहकर आप (सगुण साकार) की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निर्गुण निराकार की ही (उपासना करते हैं), उन दोनों में से उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?

विवेचन- अर्जुन श्रीभगवान से पूछते हैं कि कौन से भक्त ज्यादा उत्तम हैं? सगुण उपासक या निर्गुण उपासक? 

सगुण उपासक का अर्थ है जो मूर्ति पूजा करते हैं, आरती करते हैं, फूल चढ़ाते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं। 

निर्गुण उपासक अर्थात् जो हिमालय में जाकर बर्फ में पद्मासन में बैठकर ध्यान करते हैं, तपस्या करतें हैं। उनके सामने कोई मूर्ति नहीं होती है, वे मन में ही श्रीभगवान का चिन्तन करते हैं। ऐसे भक्त श्रीभगवान में इतने लीन हो जाते हैं कि उन्हें सर्दी, गर्मी आदि किसी भी स्थिति से कोई अन्तर नहीं पड़ता है।


12.2

श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां(न्), नित्ययुक्ता उपासते|
श्रद्धया परयोपेता:(स्), ते मे युक्ततमा मताः||2||

श्रीभगवान् बोले - मुझ में मन को लगाकर नित्य-निरन्तर मुझ में लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी (सगुण साकार की) उपासना करते हैं, वे मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।

विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि जो भक्त अपना कार्य करते हुए मेरा स्मरण करते हैं, मन में मेरा चिन्तन करते रहते हैं, वे भक्त मुझे प्रिय हैं।

हमारे साथ ऐसा होता है कि जब हम पढ़ाई करते हैं तो खेलने की ओर ध्यान जाता है या कार्टून देखने का मन करता है। जो सच्चे भक्त होते हैं उनका ध्यान, चिन्तन निरन्तर श्रीभगवान में बना रहता है। वे कोई भी कार्य करें, श्रीभगवान का स्मरण करते रहते हैं। 

नित्ययुक्ता

नित्ययुक्ता का अर्थ है प्रतिदिन पूजा करना, जैसे हम प्रतिदिन भोजन करते हैं, पढ़ाई करते हैं, स्नान करते हैं। ऐसा नहीं कि केवल सोमवार को मन्दिर जाएँ या किसी दिन पूजा कर ली, किसी दिन नहीं। ऐसा नहीं होना चाहिए। प्रतिदिन पूजा करने से हमारी ऊर्जा और आत्मविश्वास बढ़ेगा।




हम अपने अध्यापक या अध्यापिका के प्रिय बनना चाहते हैं और सोचते हैं कि हम उनके प्रिय बन जाएँगे तो हमें अच्छे अङ्क मिल जाएँगे। इसी प्रकार हमारे मन में श्रीभगवान के लिए भी बहुत सारा लालच होना चाहिए, इसलिए हमें प्रतिदिन पूजा करनी चाहिए और उन्हें प्रसन्न करना चाहिए।

अगले श्लोक में श्रीभगवान निर्गुण उपासक के विषय में बताने वाले हैं-

12.3

ये त्वक्षरमनिर्देश्यम्, अव्यक्तं(म्) पर्युपासते|
सर्वत्रगमचिन्त्यं(ञ्) च, कूटस्थमचलं(न्) ध्रुवम्||3||

और जो (अपने) इन्द्रिय समूह को वश में करके चिन्तन में न आने वाले, सब जगह परिपूर्ण, देखने में न आने वाले, निर्विकार, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की तत्परता से उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में प्रीति रखन् वाले (और) सब जगह समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

विवेचन- श्रीभगवान इस श्लोक में निर्गुण ब्रह्म के आठ विशेषण बताते हैं।

अक्षरम्

जिनका कभी नाश नहीं होता, सदा बने रहने वाले।

अनिर्देश्यम्

जिन्हें निर्देश करके नहीं बताया जा सकता। 

एक बच्चे ने अपनी माँ से पूछा कि मुझे कैसे पता चलेगा कि श्रीभगवान हैं, यदि उनका वर्णन नहीं कर सकते? हमारे मन में भी यह प्रश्न उठता है कि श्रीभगवान कैसे दिखते हैं? माँ ने बेटे को एक थप्पड़ लगाया। बेटा ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। माँ ने पूछा- क्यों रोते हो? बेटा बोला, आपने मुझे चाँटा मारा तो मुझे दर्द हो रहा है। माँ ने कहा- मुझे तो दर्द दिखाई नहीं दे रहा। बेटा बोलता है- माँ दर्द दिखेगा कैसे? वह तो महसूस हो रहा है। तब माँ ने कहा- ठीक उसी तरह श्रीभगवान भी दिखते नहीं हैं। उन्हें महसूस किया जा सकता है, अनुभव किया जा सकता है।

इसी प्रकार हम भी जब भक्ति करेंगे, ध्यान करेंगे, पूजा करेंगे तो इन सभी के माध्यम से हम श्रीभगवान को महसूस कर पाएँगे।

अव्यक्तम्

जिनका विवरण (explanation, description) नहीं दिया जा सकता।

श्रीभगवान को आँखों से नहीं देखा जा सकता है। यहाँ निर्गुण भगवान की बात हो रही है। 

सर्वत्र

जो सभी जगह विद्यमान हैं।

श्रीभगवान सभी जगह हैं, किन्तु न तो हम उन्हें देख सकते हैं और न ही स्पर्श कर सकते हैं। जैसे जहाँ भी खाली जगह है, वहाँ सब जगह आकाश होता है। उसी प्रकार श्रीभगवान भी सब जगह फैले हुए हैं। ऐसा कहते हैं कि कण-कण में श्रीभगवान हैं।



अचिन्त्यम्

जिनके बारे में सोचा नहीं जा सकता। 

निर्गुण श्रीभगवान के विषय में सोचा नहीं जा सकता, क्योंकि उनका कोई आकार नहीं है। श्रीराम, श्रीकृष्ण के बारे में हम सोच सकते हैं, क्योंकि उनकी तस्वीर हमने देखी हैं। उन्हें हम टीवी पर भी देख सकते हैं। जिनको हमने देखा ही नहीं, उनके विषय में हम कैसे सोचेंगे?

अगर आपसे पूछा जाय कि चूँ-चूँ का मुरब्बा कैसा होता है? तो आप क्या बताएँगे? आप नहीं बता पाएँगे, क्योंकि आपने कभी इसे खाया ही नहीं है। इसके विपरीत यदि आपसे कहा जाए कि रसगुल्ला कैसा होता है? तो आप उसका रङ्ग, स्वाद और आकार आदि सब बता पाएँगे। इसी प्रकार निर्गुण श्रीभगवान कूटस्थ, अचल और ध्रुव हैं।


12.4

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं(म्), सर्वत्र समबुद्धयः|
ते प्राप्नुवन्ति मामेव, सर्वभूतहिते रताः||4||

जो अपनी इन्द्रियों को वश में करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में रत और सब जगह समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

विवेचन- श्रीभगवान आगे कहते हैं कि अपनी इन्द्रियों पर संयम रखना चाहिए। हमें अपनी ज्ञानेन्द्रियों जैसे- आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा पर संयम रखना सीखना होगा। हम पढ़ाई करते समय खेलते रहें, गाना अच्छा लग रहा है तो सुनते ही जाएँ, ऐसा नहीं होना चाहिए। जब खेलने का समय हो, तभी खेलना चाहिए। जब पढ़ने का समय हो तो पढ़ना चाहिए। 

श्रीभगवान के जो भक्त होते हैं, उनका इन्द्रियों पर पूरा संयम होता है। श्रीभगवान उन्हीं बच्चों को पसन्द करते हैं जिनका अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण होता है। इसका तात्पर्य है कि यदि अपनी इन्द्रियों पर हमारा संयम नहीं है तो श्रीभगवान हमें पसन्द नहीं करेंगे। 


कई बार ऐसा होता है कि माँ कहती हैं, पढ़ाई कर लो, कल परीक्षा है, लेकिन हम कहते हैं कि बस पाँच मिनट। पाँच-पाँच मिनट करके हमारे कई घण्टे बर्बाद हो जाते हैं। यह गलत बात है। हमें उस समय पढ़ाई करनी चाहिए, इसलिए इन्द्रियों पर संयम रखना, सही समय पर सही कार्य करना आवश्यक है। यदि हमें परीक्षा में सफलता प्राप्त करनी है और हम घण्टों खेलते रहेंगे, घण्टों तक सोते रहेंगे तो सफल कैसे होंगे?  

सर्वभूतहिते रता:

सब की सहायता करना, सबका भला चाहना, सभी के काम आना।

इसका अर्थ है वह व्यक्ति, जो सभी के लिए अच्छा सोचता है। स्वार्थी व्यक्ति सभी का हित नहीं चाहते। वे हमेशा अपने बारे में सोचते रहते हैं। अगर सड़क पर कुत्ता जा रहा है और किसी ने उसे लात मार दी, तो क्या यह अच्छी बात है? यह बिलकुल अच्छी बात नहीं है। किसी को कोई आवश्यकता है और हम उसकी सहायता करते हैं, तो यह अच्छी बात है। जैसे अगर कक्षा में किसी को पेंसिल की आवश्यकता है और हमारे पास दो पेंसिल हैं, तो हम एक पेंसिल उस समय उसे दे सकते हैं। कभी कोई टिफिन नहीं लाया, तो अपने टिफिन से उसे भोजन करवा सकते हैं।

बच्चों से फिर एक प्रश्न पूछा गया- “पहले श्लोक में कितने प्रकार के भक्तों की बात की गई है?” विकल्प दिये गए- ‘चार, दो, तीन तथा छः।’ पाँच प्रतिशत बच्चों ने ‘तीन', सात प्रतिशत बच्चों ने ‘छः’, अट्ठारह प्रतिशत बच्चों ने ‘चार' तथा सत्तर प्रतिशत बच्चों ने सही उत्तर ‘दो' कहा।


12.5

क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्, अव्यक्तासक्तचेतसाम्|
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं(न्), देहवद्भिरवाप्यते||5||

अव्यक्त में आसक्त चित्त वाले उन साधकों को (अपने साधन में) कष्ट अधिक होता है; क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्त-विषयक गति कठिनता से प्राप्त की जाती है।

विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि निर्गुण ईश्वर की उपासना करना साधारण भक्त के लिए कठिन होता है। बहुत देर तक बिना कुछ खाए-पिए तपस्या करना अथवा ठण्ड में हिमालय पर जाकर ध्यान में बैठना, यह बहुत कठिन है।

आगे श्रीभगवान बताने वाले हैं कि अगर हम निर्गुण उपासना नहीं कर सकते तो उन्हें कैसे प्राप्त कर सकते हैं?


12.6

ये तु सर्वाणि कर्माणि, मयि सन्न्यस्य मत्पराः|
अनन्येनैव योगेन, मां(न्) ध्यायन्त उपासते||6||

परन्तु जो कर्मों को मेरे अर्पण करके (और) मेरे परायण होकर अनन्य योग (सम्बन्ध) से मेरा ही ध्यान करते हुए (मेरी) उपासना करते हैं।

विवेचन- इस श्लोक में आगे श्रीभगवान कहते हैं कि हम सुबह से शाम तक जो भी कार्य करें- खाते हुए, चलते हुए, पढ़ते हुए, श्रीभगवान का स्मरण करते हुए उन्हें अर्पण करे दें, अर्थात् जो भी कार्य करें, वह श्रीभगवान को अर्पण कर दें, उनको सौंप दें।





अगर कभी हमारे परीक्षा में अस्सी प्रतशत अङ्क आते हैं जबकि हमने तो नब्बे प्रतिशत सोचा था, तो हम दुःखी हो जाते हैं। यहाँ श्रीभगवान कहते हैं कि कर्म करो, उसके फल की चिन्ता हमें नहीं करनी है। जो भी कर रहे हैं, श्रीभगवान के लिए कर रहे हैं, ऐसा मानकर हर कार्य करें। अपने सब कार्य श्रीभगवान को अर्पण कर दें।





एक श्लोक जो हम ने अनेक बार सुना है।

       ""कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूः(र्), मा ते सङ्गोઽस्त्वकर्मणि॥२.४७॥"

यह दूसरे अध्याय में श्रीभगवान ने कहा है और वहाँ हम इसको विस्तार से समझेंगे परन्तु यहाँ भी हमने इसका अर्थ कुछ-कुछ समझ ही लिया है। 

12.7

तेषामहं(म्) समुद्धर्ता, मृत्युसंसारसागरात्|
भवामि नचिरात्पार्थ, मय्यावेशितचेतसाम्||7||

हे पार्थ ! मुझ में आविष्ट चित्त वाले उन भक्तों का मैं मृत्युरूप संसार-समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।

विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि मैं अपने ऐसे भक्तों को दिव्य शक्ति दे देता हूँ, जिससे वे इस संसार की सारी समस्याओं से मुक्त हो जाते हैं। मैं उनका उद्धार कर देता हूँ। 

यहाँ श्रीभगवान कह रहे हैं कि मैं सबका उद्धार नहीं करता, बल्कि केवल अपने भक्तों का उद्धार करता हूँ, तो यदि हमें अपना उद्धार करवाना है तो श्रीभगवान को याद करते रहना होगा। उनकी पूजा भी करनी होगी, भजन भी करना होगा।



12.8

मय्येव मन आधत्स्व, मयि बुद्धिं(न्) निवेशय|
निवसिष्यसि मय्येव, अत ऊर्ध्वं(न्) न संशयः||8||

(तू) मुझ में मन को स्थापन कर (और) मुझ में ही बुद्धि को प्रविष्ट कर; इसके बाद (तू) मुझ में ही निवास करेगा (इसमें) संशय नहीं है।

विवेचन- इस श्लोक में श्रीभगवान कहते हैं कि एक हमारा मन होता है और एक हमारी बुद्धि होती है। जब हम पढ़ाई करने जाते हैं तो कई बार ऐसा होता है कि हमारे मन में विचार आता है कि हमें पढ़ना चाहिए या खेलना चाहिए। बुद्धि कहती है- पढ़ाई कर लो और मन कहता है- टीवी देख लो, वीडियो गेम खेल लो।

हम अधिकतर अपने मन की बात सुन लेते हैं। मन की बात सुनने से हमारा नुकसान होता है। श्रीभगवान कहते हैं कि अपने मन और बुद्धि, दोनों को मेरे पास भेज दो। मन और बुद्धि के झगड़े को दूर करने के लिए हमें मन और बुद्धि को श्रीभगवान को सौंप देना चाहिए। श्रीभगवान को समर्पित कर देना चाहिए।

जैसे श्री हनुमानजी ने जब अपना सीना चीरा था तो श्रीराम और सीताजी उनके हृदय में दिखे थे, वैसे ही हमारे हृदय में श्रीभगवान का वास हो जाए और हमारी बुद्धि में भी श्रीभगवान का वास हो जाए।

यहाँ श्रीभगवान ने ध्यानयोग के विषय में बताया है। ध्यानयोग में हम अपने मन और बुद्धि को श्रीभगवान में लगाते हैं। जब हम पूजा करते हैं तो उस समय हमारे मन में अनेक प्रकार के विचार आते हैं। हमारी बुद्धि कहती है कि अभी हम ध्यान कर रहे हैं तो हमें अपना मन, ध्यान करने पर ही केन्द्रित करना है, लेकिन हमारा मन इतना चञ्चल होता है कि उसी समय हम अमेरिका भी चले जाते हैं और उसी समय खेल भी लेते हैं, इसलिए श्रीभगवान ने कहा कि तुम अपने मन और बुद्धि, दोनों को मेरे पास भेज दो फिर तुम अच्छे से अपने कर्म कर पाओगे।



अर्जुन कहते हैं कि ध्यान भी थोड़ा कठिन है, मैं तो ध्यान भी नहीं कर पाउँगा। आगे श्रीभगवान पूजा करने के और भी तरीके बताते हैं।  


12.9

अथ चित्तं(म्) समाधातुं(न्), न शक्नोषि मयि स्थिरम्|
अभ्यासयोगेन ततो, मामिच्छाप्तुं(न्) धनञ्जय||9||

अगर (तू) मन को मुझ में अचल भाव से स्थिर (अर्पण) करने में अपने को समर्थ नहीं मानता, तो हे धनञ्जय ! अभ्यास योग के द्वारा (तू) मेरी प्राप्ति की इच्छा कर।

विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि ‘अगर तुम अपना ध्यान मुझ में नहीं लगा पा रहे हो, तुम एकाग्रचित्त नहीं हो पा रहे हो तो कोई बात नहीं। तुम्हें ध्यान करने का अभ्यास करना है।’ हमें जब कोई कार्य नहीं आता है, तो हम उसे बार-बार करके अभ्यास करते हैं। जैसे गणित और विज्ञान में हमें जब कोई प्रश्न कठिन लगता है तो हम बार-बार उसे करके अभ्यास करते हैं। Formulas (फ़ॉर्मूले) और Reaction (रिएक्शन) याद करते हैं। तब वह हमारे मस्तिष्क में बैठता है। हमारे गुरुजन भी हमें कहते हैं कि अभ्यास करके आना। इसी प्रकार जब हम श्रीभगवान का ध्यान लगाने का अभ्यास करेंगे तो धीरे-धीरे यह कार्य कर पाएँगे।  

जब भी हम ध्यान लगाने बैठते हैं तो मन में दूसरी बातें आने लगती हैं। कभी नींद आने लगती है, कभी कुछ और सोचने लगते हैं। यह कार्य बड़ा कठिन होता है। अभ्यास से यह सब कर पाना सम्भव हो जाता है इसलिए कहा भी गया है। 

Practice makes a man perfect.




यहाँ man का अर्थ केवल पुरुष नहीं है, बल्कि पुरुष, महिला और बच्चे सभी के लिए कहा गया है। बार-बार अभ्यास करने से हम उसमें पारङ्गत हो जाते हैं, इसलिए अगर हम अभी से ध्यान का अभ्यास करना आरम्भ कर देंगे तो एक दिन ऐसा आएगा कि हम इतने ध्यान मग्न हो जाएँगे कि हमें कोई हिला भी रहा होगा, तो भी हमें पता ही नहीं चलेगा। आगे श्रीभगवान बताने वाले हैं कि अगर हम यह भी नहीं कर पा रहे हैं तो क्या करें?  

 


12.10

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि, मत्कर्मपरमो भव|
मदर्थमपि कर्माणि, कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि||10||

(अगर तू) अभ्यास (योग) में भी (अपने को) असमर्थ (पाता) है, (तो) मेरे लिये कर्म करने के परायण हो जा। मेरे लिये कर्मों को करता हुआ भी (तू) सिद्धि को प्राप्त हो जायगा।

विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं यदि तुम अभ्यास भी नहीं कर पा रहे हो तो मेरे परायण होकर सब कर्म करो। परायण का अर्थ है कि हमें सब कुछ उनको ही समझ कर करना है। हमें यह नहीं सोचना है कि “यह मैं कर रहा हूँ, मेरे लिए कर रहा हूँ, उनके लिए कर रहा हूँ।" हमें ऐसा मानना चाहिए कि श्रीभगवान ने हमें इस धरती पर भेजा है, वे सब कार्य हम उन्हीं के लिए कर रहे हैं और बस वे कार्य करके हम यहाँ से निकल जाएँगे।  




12.11

अथैतदप्यशक्तोऽसि, कर्तुं(म्) मद्योगमाश्रितः|
सर्वकर्मफलत्यागं(न्), ततः(ख्) कुरु यतात्मवान्||11||

अगर मेरे योग (समता) के आश्रित हुआ (तू) इस (पूर्व श्लोक में कहे गये साधन) को भी करने में (अपने को) असमर्थ (पाता) है, तो मन इन्द्रियों को वश में करके सम्पूर्ण कर्मों के फल की इच्छा का त्याग कर।

विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि यदि तुमसे अभ्यास भी नहीं होता है तो जो भी कर्म कर रहे हो, वह मुझे सौंप दो और हर कार्य इस प्रकार से करो कि मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ, वह श्रीभगवान के लिए ही कर रहा हूँ। कर्म का अर्थ- हम जो भी कार्य  कर रहे हैं, वह कर्म कहलाता है। कर्मों के फल का अर्थ है परिणाम। फल का त्याग करने का अर्थ है कि हमें कर्म करके भूल जाना है कि इसका क्या परिणाम होगा? कर्मफल श्रीभगवान को समर्पित कर देना है ।

मान लीजिये, हम परीक्षा की तैयारी करते हैं, तो हम सोचते हैं कि इतने प्रतिशत अङ्क लाने हैं। यह सोचना अच्छी बात है, लेकिन अगर वह नहीं मिला तो उसके लिए चिन्ता नहीं करनी है। हम लक्ष्य तो निर्धारित अवश्य करें, अपने कर्म पूरी निष्ठा से करें किन्तु उसके परिणाम के लिए बिलकुल परेशान नहीं होंगे, दुःखी नहीं होंगे। हम बस यह सोचेंगे कि हम जो भी कर रहे हैं, श्रीभगवान के लिए कर रहे हैं, उनके ही माध्यम से कर रहे हैं। उन्होंने हमें भेजा है, तभी कर पा रहे हैं। हमें कर्मों के फल का त्याग कर देना है, अपने लिए कर्म कर रहे हैं, ऐसा बिलकुल नहीं मानना है।

बच्चों से पुनः एक प्रश्न पूछा गया- “धनञ्जय किसका नाम है?” विकल्प थे-’कर्ण, दुर्योधन, श्रीकृष्ण, अर्जुन और सञ्जय।’ एक प्रतिशत बच्चों ने दुर्योधन, दो प्रतिशत बच्चों ने कर्ण, दस प्रतिशत बच्चों ने सञ्जय, बारह प्रतिशत बच्चों ने श्रीकृष्ण तथा बहत्तर प्रतिशत बच्चों ने अर्जुन कहा। बच्चों को बताया गया कि बहत्तर प्रतिशत बच्चों का उत्तर बिलकुल सही है। अर्जुन का नाम धनञ्जय है।


इस प्रकार आज हमने सगुण और निर्गुण उपासक के विषय में जाना। हमने देखा कि हम श्रीभगवान को कैसे प्राप्त कर सकते हैं और इसमें क्या कठिनाई होती है?

अगले सत्र में श्रीभगवान अच्छे भक्त के उन्तालीस गुणों की बात करने वाले हैं। श्रीभगवान के माध्यम से उन्तालीस पेपर आप सबके लिए खोले जाएँगे। उसमें आप सबको अपने आप को अङ्क देते जाना है। इस परीक्षा में आप स्वयं को अङ्क देंगे। हर प्रश्न दस अङ्क का होगा और आपको उसमें सोचना होगा कि इसमें मैं कैसी हूँ? मैं कैसा हूँ? इसमें मुझे दस में से कितने अङ्क मिलेंगे?  

इसी के साथ हरिनाम सङ्कीर्तन करते हुए सत्र का समापन हुआ 

    हरि शरणं, हरि शरणं, हरि शरणं, हरि शरणं |

इस के उपरान्त प्रश्न उत्तर प्रारम्भ हुए।

प्रश्नकर्ता : परी दीदी 

प्रश्न: परीक्षा की तैयारी हमें कहाँ से करनी है?
उत्तर: आपको जो श्लोक कक्षा में पढ़ाया जा रहा है, उसे ही ध्यानपूर्वक पढ़ने से आपकी तैयारी हो जाएगी।

प्रश्नकर्ता: रन्जीत भैया
प्रश्न: हमें कर्म क्यों करना है?
उत्तर: कर्म तो हमें करना ही है। हम कर्म  किए  बिना नहीं रह सकते हैं परन्तु हमें अच्छे कर्म करना चाहिए जिससे श्रीभगवान हमें समय-समय पर उपहार देते हैं।

इसके अतिरिक्त अनेक बच्चों ने परीक्षा सम्बन्धी प्रश्न पूछे कि परीक्षा कब देनी है, कैसे देनी है? आदि। जिसका विवरण सभी को समझाया गया।

इसके उपरान्त समापन प्रार्थना और श्रीहनुमान चालीसा जी के पाठ के साथ आज के विवेचन सत्र का समापन हुआ।