विवेचन सारांश
भक्ति की शक्ति
अनेक साधक ऐसे होंगे जिन्होंने पहले श्रीमद्भगवद्गीता न पढ़ी हो या उसका अर्थ न समझा हो। धर्म का अर्थ उपासना पद्धति से नहीं है। इसका अर्थ यह नही है कि तिलक कैसे करें, चोटी रखनी है या नहीं? श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीभगवान ने सभी बातों का मूल चित्रण किया है। उन्होंने मार्ग की कोई बात नहीं की है।
किसी को दिल्ली से मुम्बई जाना हो तो सड़क मार्ग, हवाई मार्ग या रेल
पार्थो वत्स: सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।।
श्रीभगवान ने अर्जुन को बछड़ा रूपी निमित्त बनाकर सारे संसार के कल्याण हेतु यह अमृत हम सबको दे दिया है। भगवद्गीता को वही पढ़ पाते हैं, जो श्रीभगवान के द्वारा चुने हुए हैं। श्रीभगवान स्वयं कहते हैं कि भगवद्गीता मेरा हृदय है।
अट्ठारहवें अध्याय के अड़सठवें श्लोक में श्रीभगवान ने कहा कि जो श्रीगीता जी को पढ़ेगा, चिन्तन करेगा, वह सीधा मुझे ही प्राप्त करेगा।
18:68
नये साधकों के मन में यह प्रश्न निश्चित ही उत्पन्न हुआ होगा कि हम गीता जी का अध्ययन प्रथम अध्याय से न करके, बारहवें अध्याय से ही क्यों कर रहे हैं। गीता परिवार में गीता जी का अध्ययन बारहवें अध्याय से इसलिये महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि भक्तियोग नामक यह अध्याय गीता जी का हृदय है। अति लघु होने के साथ-साथ सरलतम है। पठन-पाठन में इसे समझने एवं जानने की दृष्टि से एक सुन्दर अध्याय है। इसमें अनुष्टुप छन्द के बीस श्लोक हैं। अनुष्टुप छन्द आठ-आठ मात्राओं वाला बीस मात्रा का छोटा छन्द है, जो समझने में सरल है, अत: प्रारम्भ में बारहवाँ अध्याय पढ़ने के लिये उपयुक्त है।
ग्रन्थ को उपन्यास की भाँति नहीं पढ़ा जा सकता। हमारे शास्त्रों को पढ़ने से पूर्व गुरु से आज्ञा लेनी पड़ती है। गुरु के बताए अनुसार पढ़ने से ही शास्त्र ग्रन्थों की मूल भावना आत्मसात हो पाती है।
जब दोनों सेनाएँ युद्ध भूमि में आमने-सामने खड़ी हुईं, दोनों ओर से युद्ध की तैयारी है। तब अर्जुन ने भगवान से कहा - हे केशव! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले चलो।
उर्वशी के श्राप के परिणाम स्वरूप अर्जुन ने नपुंसक वृहन्नला के रूप में विराटराज की पुत्री उत्तरा को नृत्य का प्रशिक्षण दिया। पूरे महाभारत में अर्जुन किसी बड़े के समक्ष एक बार भी तीव्र स्वर में नहीं बोले हैं। अपनी किसी उपलब्धि का वर्णन भी किसी के समक्ष नहीं किया है। उनकी वीरता का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता, फिर भी वे अत्यन्त विनम्र, सौम्य और नीतिज्ञ हैं, इसलिए कृष्ण उन पर रीझे हुए हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता को जानना है तो मन और बुद्धि को परे रख दें। सात सौ श्लोकों की श्रीमद्भगवद्गीता में एक श्लोक धृतराष्ट्र ने कहा, इकतालीस श्लोक सञ्जय ने कहे, चौरासी श्लोक अर्जुन ने कहे और पॉंच सौ चौहत्तर श्लोक भगवान श्रीकृष्ण ने कहे हैं।
12.1
अर्जुन उवाच
एवं(म्) सततयुक्ता ये, भक्तास्त्वां(म्) पर्युपासते|
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं (न्), तेषां(ङ्) के योगवित्तमाः||1||
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥
11:41
श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीभगवान ने चार मार्ग बताए हैं -
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां(न्), नित्ययुक्ता उपासते|
श्रद्धया परयोपेता:(स्), ते मे युक्ततमा मताः||2||
नित्ययुक्ता-
एक बार एक युवा बालक को अपनी शादी का निमन्त्रण पत्र देने जाना था, उसी समय उसका अति विशिष्ट मित्र उसके घर आया। वह उसे अपने साथ चलने के लिये आग्रह करने लगा। मित्र ने अपने कपड़े अच्छे न होने के कारण जाने से मना किया। किन्तु युवा बालक ने कहा कि तुम मेरे कपड़े पहन लो और चलो। उस मित्र ने उसकी पसन्द के सबसे अच्छे कपड़े पहन लिये। उन कपड़ों को पहने देख कर युवा बालक को बहुत क्रोध आया, किन्तु वह कुछ बोला नहीं और दोनों चल दिये। वहाँ जाकर उसने मित्र का परिचय दिया और कहा कि यह मेरा मित्र है, इसने जो कपड़े पहने हैं वे भी मेरे ही हैं। वह ऐसा कहना नहीं चाहता था, किन्तु इन कपड़ों में मन ऐसा लगा हुआ था कि उसने बोल दिया। दूसरे मित्र ने बहुत अपमानित अनुभव किया और अत्यन्त क्रोधित हुआ। मित्र के क्रोधित होने पर उसने दूसरे घरों में वही बात दूसरे ढङ्ग से कही, पर कही अवश्य। इसका कारण था कि उसका मन कपड़ों में ही लगा हुआ था। इसी प्रकार जब हम हर कार्य करते हुए मन श्रीभगवान में लगा कर रखते हैं तो यह नित्ययुक्ता होता है।
दूसरे शब्दों में श्रीभगवान ने अर्जुन को स्पष्ट बता दिया कि ज्ञानयोग तुम्हारे लिए नहीं है। श्रीभगवान ने तीसरे और चौथे श्लोक में ज्ञानयोग बताया है।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यम्, अव्यक्तं(म्) पर्युपासते|
सर्वत्रगमचिन्त्यं(ञ्) च, कूटस्थमचलं(न्) ध्रुवम्||3||
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं(म्), सर्वत्र समबुद्धयः|
ते प्राप्नुवन्ति मामेव, सर्वभूतहिते रताः||4||
नाम रूप गति अकथ कहानी।
अचल एवम् ध्रुव- वे अचल हैं, कभी बदलते नहीं, स्थिर रहते हैं।
चराचर सभी के हित में लगे रहने वाले (सम्पूर्ण भूतों के हित में जो लगे हुए हैं) और सबमें समान भाव रखने वाले योगी मुझे ही प्राप्त होते हैं। ब्रह्म के उपर्युक्त विशेषण मुझसे भिन्न नहीं हैं। जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार संयत करके, मन-बुद्धि के चिन्तन से अत्यन्त परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप, सदा एकरस रहनेवाले, नित्य, अचल, अव्यक्त, आकार रहित और अविनाशी ब्रह्म की उपासना करते हैं, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्, अव्यक्तासक्तचेतसाम्|
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं(न्), देहवद्भिरवाप्यते||5||
बचपन से आज तक जब भी हमने अपना चिन्तन किया है, शरीर के रूप में ही किया है। बचपन से वृद्धावस्था तक की विभिन्न आयु वर्ग के विभिन्न चित्रों को देख कर पहचानना कठिन कार्य है। हम स्वयं का पुराना चित्र भी कठिनाई से पहचान पाते हैं। अगर हम शरीर ही होते तो पहचानना कठिन नहीं होता। शरीर प्रतिक्षण बदलता रहता है, उसे धारण करने वाला जीवात्मा लाखों जन्मों में भी परिवर्तित नहीं होता। साढ़े तीन वर्ष में शरीर की सम्पूर्ण कोशिकाएँ बदल जाती हैं।
within three & half years.
शरीर का रङ्ग, रूप, आकार सब बदल जाता है। यहॉं तक कि शरीर की आदतें भी बदल जाती हैं। पसन्द-नापसन्द, आचार-विचार और व्यवहार भी बदलता रहता है।
शरीर बदलता रहता है,
शरीर में स्थित मैं नहीं बदलता।
शरीर की स्थिति और प्रत्येक आयु वर्ग का समय यथावत, अपरिवर्तित रहता है। शरीर जन्म लेता है, बाल्यावस्था, युवावस्था, वृद्धत्व और फिर मर जाता है। शरीर में स्थित चैतन्य तत्त्व वही रहता है। लाखों करोड़ों शरीर बदलने पर भी चैतन्य तत्त्व नहीं बदलता।
जिसे यह शरीर ही सत्य लगता है, वह निराकार स्वरूप की उपासना नहीं कर सकता। जिसने स्वयं को शरीर न मानकर, चैतन्य तत्त्व होना जान लिया है, वही निर्गुण उपासना कर सकता है।
श्रीभगवान ने अर्जुन को आगे शास्त्रों में वर्णित नौ प्रकार की भक्ति बताई है, उस मार्ग से उपासना कर सकते हैं।
श्रवण- श्रीभगवान की कथाएँ सुनना
कीर्तन- श्रीभगवान की कीर्ति का गायन करना।
स्मरण- हर क्षण श्रीभगवान को स्मरण करते रहना।
पादसेवन- श्रीभगवान के पॉंव दबाना, जैसे लक्ष्मी माता।
अर्चना- राजा पृथु के जैसे।
वन्दनं - अक्रूर जी महाराज के जैसे।
दास्य- हनुमान जी के जैसे श्रीभगवान की दास्य भाव से सेवा करते रहना।
सख्य- अर्जुन के समान श्रीभगवान के प्रति सखा भाव रखना।
आत्मनिवेदन- स्वयं को श्रीभगवान के समक्ष अर्पित कर देना, जैसे राजा बलि।
यह नौ प्रकार की भक्ति होती है। इनमें से कोई भी एक प्रकार की भक्ति प्रमुखता से जीवन में आ जानी चाहिए।
ये तु सर्वाणि कर्माणि, मयि सन्न्यस्य मत्पराः|
अनन्येनैव योगेन, मां(न्) ध्यायन्त उपासते||6||
तेषामहं(म्) समुद्धर्ता, मृत्युसंसारसागरात्|
भवामि नचिरात्पार्थ, मय्यावेशितचेतसाम्||7||
मय्येव मन आधत्स्व, मयि बुद्धिं(न्) निवेशय|
निवसिष्यसि मय्येव, अत ऊर्ध्वं(न्) न संशयः||8||
अथ चित्तं(म्) समाधातुं(न्), न शक्नोषि मयि स्थिरम्|
अभ्यासयोगेन ततो, मामिच्छाप्तुं(न्) धनञ्जय||9||
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान।।
उसने शिवजी से कहा- हे महादेव! मैं तो दीपक बुझाने आती थी। आपके समक्ष मेरी जेठानी ही दीपक प्रज्वलित करती रही है। भोलेनाथ ने कहा कि मैं तुम्हारी निरन्तरता के नियम से प्रसन्न होकर, तुम्हारे मन की कलुषता समाप्त होने का वरदान देता हूॅं। भक्ति में निरन्तरता का नियम महत्त्वपूर्ण है। हम अपनी सुविधानुसार विकल्प तलाश कर लेते हैं। मन की सन्तुष्टि के लिए बहाना तलाश लेते हैं और कह देते हैं -
मन चङ्गा तो कठौती में गङ्गा
अर्जुन अभ्यास से भी सरल विकल्प चाहते हैं तो आगे श्रीभगवान बताते हैं।
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि, मत्कर्मपरमो भव|
मदर्थमपि कर्माणि, कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि||10||
हे नाथ मैं तुम्हें भूलूँ नहीं।
कभी तो दीनदयाल के भनक पड़ेगी कान।।
तुलसी मेरे राम को रीझ भजो या खीझ।
भौम पड़ा जामे सभी उल्टा सीधा बीज।।
बीज को भूमि में कैसे भी डालें वह ऊपर ही आयेगा। हम जिस भूमिका में हैं, उसी को श्रीभगवान की इच्छा समझ कर पूर्ण करें। ईश्वर को समर्पित करके कर्म करें।
बालकाण्ड
संकीर्तन:-
हरि शरणं हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम्
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विचार मन्थन (प्रश्नोत्तर):-
प्रश्नकर्ता- विनोद जी शर्मा
प्रश्न- मैं एक बार गाय को रोटी खिलाने गया। वहाँ तीन-चार गायें और आ गईं। सबको मैंने रोटी बाँट दी। उसके बाद थोड़ा मैं आगे बढ़ा तो देखा कि चार-पाँच गायें और आ रही थी। मेरा मन थोड़ा असन्तुष्ट रहा। मैं सब को रोटी नहीं दे सका। मेरा मन द्वन्द्व में है कि मैं सबको नहीं दे पाया। क्या करूँ?
उत्तर -अभी नहीं दे पाए कोई बात नहीं, अगली बार ज्यादा लेकर जाइये और सभी गायों को रोटी दे दीजियेगा।
प्रश्नकर्ता:- शिव शंकर भैया
प्रश्न:- फल की इच्छा का त्याग मन, बुद्धि से होता है या स्वयं से होता है?
उत्तर:- आत्मा कुछ नहीं करती, हम प्रत्येक क्रिया स्थूल शरीर एवम् सूक्ष्म शरीर से करते हैं, हमारा अन्तर्मन चतुष्टय, जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं, जब वह सङ्कल्प विकल्प करता है तो मन कहलाता है, निर्णय करता है तो बुद्धि कहलाता है, धारणा करता है तो चित्त कहलाता है। मैं हूँ- अहम् भाव में रहता है तो अहम् कहलाता है। प्रत्येक कर्म की निश्चयता भी मन, बुद्धि, चित्त, अहम् से होती है, अत: फल की इच्छा का त्याग भी बुद्धि से होता है।
प्रश्नकर्ता:- बी एम भैया
प्रश्न:- साकार और निराकार तो स्पष्ट है, किन्तु सगुण-निर्गुण क्या है? क्या श्रीभगवान में कोई गुण नहीं है?
उत्तर:-जब हम सच्चिदानन्द कहते हैं तो वह सगुण हो जाता है, हम उसमें सत्, चित्, आनन्द की अनुभूति करते हैं। जो सच्चिदानन्द से परे हैं, वे सच्चिदानन्द को बनाने वाले हैं, वे निर्गुण हैं। वे सर्वशक्तिमान हैं, अत: वहीं निर्गुण सगुण रूप में प्रकट हो जाते हैं। जिनके गुणों का वर्णन किया जा सकता है, वे सगुण हैं। जो किसी भी गुण, सत्य-असत्य से परे हैं वे निर्गुण हैं।
प्रश्न:- ध्यान बहुत कम होता है। कुछ दिन तो माला, जप, पाठ सबका उत्साह रहता है, किन्तु धीरे-धीरे उसमें न्यूनता आने लगती है। यह निरन्तरता कैसे बनी रहे?
उत्तर- जब हमारे भाव सात्त्विक होते हैं तो हमारा मन सात्त्विक कर्मों को करने के लिये प्रेरित होता है। जैसे ही रजोगुण एवम् तमोगुण की प्रधानता होती है, हम सात्त्विक कर्मों से विरत होने लगते हैं, इसलिये श्रीभगवान ने चतुर्थ अध्याय में बताया कि सत्त्वगुण को बढ़ाने के लिये रजोगुण एवम् तमोगुण को दबाओ। अपने पूरे दिन की दिनचर्या में यह बात ध्यान रखनी चाहिये कि हमने जो भी कार्य किये उनमें किन गुणों की प्रधानता है। हमारा भोजन, अध्ययन, पठन, मनोरञ्जन सब में सात्त्विक गुणों की धीरे-धीरे वृद्धि करनी चाहिये। हमें जप आदि की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ानी चाहिये।